छत्तीसगढ़
व ओडिशा के बीच है महानदी जल विवाद
हरिभूमि ब्यूरो. नई दिल्ली।
आखिर
केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ और के बीच चल रहे महानदी जल विवाद को निपटाने के लिए ट्रिब्यूनल
गठित करने की मंजूरी दे दी है। इस विवाद के निपटारे के लिए पिछले माह ही ओडिशा
सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक माह के भीतर ट्रिब्यूनल
का गठन करने का आदेश दिया था।
प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में
छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच महानदी जल विवाद के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट के बाद
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) गठित करने के प्रस्ताव
को मंजूरी दी गई दे दी। कैबिनेट की मंजूरी के अनुसार गठित किये जाने वाला यह ‘ट्रिब्यूनल’
महानदी बेसिन में पानी की संपूर्ण उपलब्धता, प्रत्येक राज्यों के योगदान और राज्यों
में जल संसाधन के मौजूदा उपयोग के साथ ही भविष्य के विकास की संभावनाओं के आधार पर
दोनों राज्यों में जल बंटवारे पर निर्धारण करेगा। गौरतलब है कि दोनों राज्यों के
बीच महानदी विवाद को निपटाने के लिए ओडिशा सरकार केंद्र सरकार से ट्रिब्यूनल का
गठन करन की मांग करती आ रही थी, जिसने इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर
की थी। ओडिशा सरकार की दिसंबर 2016 में दायर इस याचिाका पर सुप्रीम कोर्ट ने गत 23
जनवरी को केंद्र सरकार को एक माह के भीतर इस विवाद के निपटान के लिए ट्रिब्यूनल का
गठन करने का आदेश दिया था। इसी आदेश के अनुपालन में केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव
को मंजूरी दी। गौरतलब है कि पिछले साल 28 जनवरी को उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर
महानदी मुद्दे के समाधान करने का आग्रह किया था। दरअसल इस विवाद में ओडिशा का तर्क
है कि डीपीआर के अनुसार महानदी के हीराकुंड बांध से 12.28 मिलियन एकड़ फीट का पानी
के अलावा 3.67 मिलियन एकड़ का अतिरिक्त पानी उपयोग के लिए मिलना चाहिए। इससे पहले
ओडिशा सरकार ने छत्तीसगढ़ सरकार का भी पत्र लिखा था, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार के
महानदी पर निर्माण कार्य रोकने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद पीएम से हस्तक्षेप
करने का अनुरोध किया गया था। हालांकि उससे पहले ही ओडिशा सरकार सुप्रीम कोर्ट में
ट्रिब्यूनल के गठन की मांग के लिए याचिका दायर कर चुकी थी।
तीन वर्ष में देनी होगी रिपोर्ट
जल संसाधन
मंत्रालय के अनुसार गठित किये जा रहे ट्रिब्यूनल (न्यायाधिकरण) को अपनी रिपोर्ट और
फैसले तीन वर्ष की अवधि के भीतर देने होंगे, जिसे अपरिहार्य कारणों से दो वर्ष के लिए
बढ़ाया जा सकता है। इस ट्रिब्यूनल का गठन अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद कानून-1956 के
प्रावधानों के तहत किया जा रहा है, जिसमें एक अध्यक्ष और दो अन्य सदस्य होंगे,
जिसमें अध्यक्ष औद दोनों सदस्यों को सुप्रीम कोर्ट में भारत के मुख्य न्यायाधीश मनोनीत
करेंगे। इसके अलावा न्यायाधिकरण की कार्यवाही में सलाह देने के लिए दो अनुभवी जल संसाधन
विशेषज्ञ आकलनकर्ताओं के रूप में शामिल किये जाएंगे। उम्मीद है कि न्यायाधिकरण द्वारा
विवाद के न्यायिक निपटारे के साथ ही महानदी नदी पर ओडिशा और छत्तीसगढ़ राज्यों के बीच
लंबित विवाद का अंतिम निपटारा हो सकेगा।
साढ़े तीन दशक पुराना है विवाद
दोनों
राज्यों के बीच महानदी के जल बंटवारे के विवाद में करीब 35 साल पहले अविभाजित मध्य
प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अुर्जन सिंह और ओडिशा के तत्काली मुख्यमंत्री जेबी
पटनायक के बीच 28 अप्रैल 1983 को एक समझौता हुआ था। सूत्रों के अनुसार इस समझौते
में महानदी पर बांध और अन्य निर्माण संबन्धी विवादों का निराकरण अंतर्राज्य परिषद
में निपटाने पर सहमति बनी थी ,लेकिन विभाजन के बाद पृथक राज्य बने छत्तीसगढ़ के
साथ यह विवाद गहराता चला गया, जिसे केंद्र सरकार ने सुलझाने के लिए केई विशेषज्ञ
समितियां भी गठित की, लेकिन ओडिशा की इस विवाद को ट्रिब्यूनल में लाने की रही है।
पिछले साल 19 जनवरी को केंद्र सरकार द्वारा इस विवाद निपटाने और दोनों राज्यों के बीच
समझौता कराने की दिशा में केंद्रीय जल आयोग के आयुक्त की अध्यक्षता में गठित एक समाधान
समिति को कानून का उल्लंघन करार देते हुए इंकार तक कर दिया था।
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कर्नाटक में छह लेन का
बनेगा नीदागट्टा-मैसूर हाइवे
केंद्रीय मंत्रिमंडल
ने परियोजना के प्रस्ताव को मंजूरी
हरिभूमि ब्यूरो. नई दिल्ली।
केंद्र
सरकार ने कर्नाटक में नेशनल हाइवे-275 नीदागट्टा-मैसूर सेक्शन पर हाईब्रिड एन्यूइटी
मोड के करीब 61 किलोमीटर को छह लेन का बनाने के लिए मंजूरी दी है।
पीएम
नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में केंद्रीय सड़क
परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के प्रस्ताव को मंजूरी दी है जिसमें 74.200 किलोमीटर
से 135.304 किलोमीटर तक राष्ट्रीय राजमार्ग-275 के नीदागट्टा-मैसूर सेक्शन को छह लेन
का बनाया जाएगा। इस परियोजना में करीब 61 किलोमीटर को छह लेन बनाने पर 2919.81 करोड़
रुपये खर्च आने का अनुमान है। इसमें भूमि अधिग्रहण का खर्च और निर्माण गतिविधियां शामिल
है। इसके निर्माण पर 2028.93 करोड़ रुपये खर्च आने का अनुमान है। इस परियोजना के निर्माण
राजमार्ग को चौड़ा करने और उसमें सुधार किया जाएगा। मंत्रालय के अनुसार यह परियोजना
सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग-275 का एक हिस्सा है, जो कर्नाटक के दो प्रमुख शहरों व्यावसायिक
राजधानी बैंगलुरु और सांस्कृतिक राजधानी मैसूर को जोड़ेगी। वहीं यह महत्वपूर्ण स्थलों
मेंगलोर, कोडागू, केरल के कुछ हिस्सों आदि को बैंगलुरु से जोड़ेगी।
सुधरेगी सार्वजिन परिवहन व्यवस्था
मंत्रायल
के अनुसार इस परियोजना में दोनों तरफ करीब 60.35 किलोमीटर सर्विस रोड़ का निर्माण होगा,
जिससे बसे हुए शहरी इलाकों में स्थानीय यातायात का आवागमन सरल हो सकेगा। बसों के शैल्टर
21 स्थानों पर बनाए जा रहे हैं, जिससे सार्वजनिक परिवहन की सुविधा में सुधार होगा।
इस क्षेत्र में यातायात वर्तमान में 41433 से 52163 यात्री कार यूनिट है और निकट भविष्य
में यातायात में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने
बड़े अच्छे समय पर छह लेन के विस्तार का कदम उठाया है। वर्तमान चार लेन वाली सड़क से
क्षमता से अधिक वाहन गुजरते हैं जिसके कारण ट्रैफिक जैम और दुर्घटनाएं होती हैं। यह
सड़क भीड़-भाड़ वाले और घनी आबादी वाले शहरों और बस्तियों जैसे मद्दूर, मांडया और श्रीरंगपटना
आदि से गुजरती है। इस परियोजना के पूरा होने पर दोनों तरफ सात मीटर की सर्विस रोड़
पर छह लेन के उन्नयन और मद्दूर, मांडया और श्रीरंगपटना पर बाईपास के निर्माण और राष्ट्रीय
राजमार्ग के इस हिस्से को अलग करने के ढांचे के तैयार हो जाने पर यात्रा के समय और
खर्च की बचत होगी।