आज से लागू भारत-बांग्लादेश सीमा समझौता
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
भारत
और बांग्लादेश की सीमावर्ती इलाकों में बिना किसी देश की नागरिकता के
पिछले चार दशकों से ज्यादा समय से जीवन व्यवतीत कर रहे करीब 51 हजार लोगों
को किसी देश का नाम मिल रहा है। मसलन दोनों देशों की विवादित जमीन की
अदला-बदली का ऐतिहासिक समझौता शुक्रवार की मध्यरात्रि यानि एक अगस्त से
लागू हो रहा है।
भारत-बांग्लादेश की सीमा पर पिछले चार दशकों से
ज्यादा समय से खानाबदोशी की हालत में जिंदगी जीते आ रहे 51 हजार से ज्यादा
लोगों को आखिरकार उनकी इच्छा के अनुसार भारत या बांग्लादेशी नागरिकता के
रूप में पहचान मिली ही गई है। दोनों देशों की सीमाओं पर इन बस्तियों के
निर्धारण को अंतिम रूप देने के बाद इस समझौते को एक अगस्त से लागू किया जा
रहा है। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि बांग्लादेशी सीमा से
घिरी 100 से ज्यादा भारतीय बस्तियों और भारतीय जमीं से घिरी 50 से ज्यादा
बांग्लादेशी बस्तियों का लेन-देन हो रहा है। भारत और बांग्लादेश ने
ऐतिहासिक भू-सीमा समझौते के तहत अपने-अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले
भू-भाग के एकीकरण के तहत एक दूसरे के सीमा क्षेत्र में स्थित 162 बस्तियों
में रहने वाले करीब 51, 584 लोगों की राष्ट्रीयता की पसंद को दर्ज करने के
लिए पिछले सप्ताह ही दोनों देशों ने इन लोगों को भारत या बांग्लादेश चुनने
का विकल्प को एक संयुक्त सर्वेक्षण के तहत पूरा कर लिया है। इस सर्वेक्षण
के तहत चुने गये विकल्प के साथ इन नागरिकों की भारत व बांग्लादेश की
नागरिकता के रूप में सूचियां तैयार कर ली गई है। नागरिकों की इन सूचियों को
दोनों देशों के संबंधित प्रशासन को रिपोर्ट सौंप दी गई है, जो अपने अपने
देश में रहने वालों को नागकरता देने का काम कर रहे हैं।
बांग्लादेशियों को रास आया भारत

ऐसे बना ऐतिहासिक फैसला
दोनों
देशों की इन बस्तियों का यह आदान-प्रदान इसी साल 6 जून को ढाका में
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी बांग्लादेशी समकक्ष शेख हसीना की
मौजूदगी में दस्तखत किए करार के तहत दोनों देश सीमा से लगी बस्तियों का
आदान-प्रदान कर रहे हैं। इन बस्तियों के लोग जन सुविधाओं से वंचित थे और
खराब हालत में रह रहे थे। भारत और बांग्लादेश के बीच एक करार पर दस्तखत के
बाद हो रहा है। हालांकि इससे पहले मूल रुप से यह भूमि समझौता 1974 में
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख
मुजीब-उर-रहमान के बीच हुआ था। 1975 में मुजीब की हत्या के बाद लंबे अरसे
तक करार पर प्रगति रुकी रही। बाद की सरकारें बस्तियों के आदान प्रदान पर
सहमत नहीं हो पाईं। पीएम मोदी के साथ हुए समझौते के बाद संसद में इस समझौते
संबन्धी एक विधेयक बजट सत्र में पारित करने के बाद इस ऐतिहासिक फैसले की
राह को आसान बनाया गया।
01Aug-2015
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