सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

चौपाल: हास्य कला में भी छिपे हैं समाजोत्थान के संदेश: रेणू दूहन

अभिनय और हास्य व्यंग्य कला में हासिल की लोकप्रियता 
    व्यक्तिगत परिचय 
नाम: रेणू दूहन 
जन्मतिथि: 17 अक्टूबर 1995 
जन्म स्थान: गांव पेटवाड़, जिला हिसार 
शिक्षा:बीए. एमए(हिंदी), डीईपीएड 
संप्रत्ति: हास्य कलाकार एवं मिमिक्री आर्टिस्ट 
संपर्क: रोहतक रोड़, जींद(हरियाणा), मोबा.-8396968657
 BY--ओ.पी. पाल 
 हरियाणा की लोक कला एवं संस्कृति को जीवंत रखने की दिशा में लेखक, लोक कलाकार, गीतकार अलग अलग विधाओं में अपनी कलाओं की अलख अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जगाने में जुटे हुए हैं। ऐसे ही कलाकारों में युवा महिला कलाकार रेणू दूहन ने सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों और संस्कृति के साथ सामयिक घटनाओं पर आधारित लेखन तथा लोक कला के प्रदर्शन से खासकर युवा पीढ़ी को नई दिशा देने का प्रयास करती आ रही है। कविता, निबंध लेखन के साथ अभिनय, हास्य व्यंग्य तथा मिमिक्री कलाओं से पहचान बनाने वाली कलाकार रेणू दूहन ने हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में कुछ ऐसे पहलुओं का जिक्र किया है, जिसमें उन्होंने समाज कल्याण और संस्कृति के संवर्धन में कलाकारों की अहम भूमिका निभाने का संदेश दिया है। 
---- 
हरियाणवी लोक कलाकार रेणू दूहन का जन्म 17 अक्टूबर 1995 को हिसार जिले के गांव पेटवाड़ में रमेश दूहन और श्रीमती वीना दूहन के घर में हुआ। जब वह पांच साल की थी, तो उनका परिवार जींद आकर रहने लगा। उनके घर में किसी प्रकार की साहित्य या सांस्कृतिक माहौल नहीं था। उनके पिता और भाई व्यापार करते हैं। जबकि उनका भाई पिछले नौ साल से दिल्ली में रहते हैं। परिवार में माता पिता ने तीन भाई बहनो में उसका भी एक लड़के की तरह पालन पोषण किया। किसी बात में या कुछ भी करने से पहले उसे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह एक लड़की है। उनके परिवार में कभी किसी तरह का साहित्य या सांस्कृतिक माहौल नहीं रहा और वह अकेली ही लोक कला के क्षेत्र में काम करने लगी। उन्हें बचपन से ही लोक कला के क्षेत्र में एक्टिंग में अभिरुचि रही, लेकिन उनके परिवार वालों को उनका कला के क्षेत्र में भागीदारी करना अच्छा नहीं लगा। हालांकि उनकी माता उन्हें प्रोत्साहित करती रही और इसके बाद भाई ने भी उनका कला के क्षेत्र में उसका सहयोग करना शुरु कर दिया। बकौल रेणू दूहन, बचपन से ही उन्हें मंच का बहुत शौंक था कि वह मंच पर आए और कुछ सुनाए। स्कूली शिक्षा में हर शनिवार को होने वाली बाल सभा में होने वाले कार्यक्रम में उन्हें एंकर बनाया जाता था। उन्होंने कई बार कविता, निबंध लेखन, नाटक, नृत्य आदि में भागीदारी की। स्कूल समय में एक निबंध लेखन प्रतियोगिता में राज्य स्तर पर उसे प्रथम स्थान मिला। जब वह कालेज में बीए कर रही थी तो उनकी कला को देखकर कई शिक्षिकाओं ने उन्हें इस दिशा में प्रोत्साहित करके मदद की। जब वह ग्रेजुएशन कर रही थी, तो रत्नावली फैस्टिवल में अपने कॉलेज से से वही जाती थी और अपनी लिखी कविता प्रतियोगिता भी होती थी। उसने भी कविता लिखने का मन बनाया और अपने चाचा की मदद से कविता लिखी, जो राज्य स्तर पर द्वितीय स्थान पर रही। इससे उनका लोक साहित्य के प्रति आत्मविश्वास बढ़ना स्वाभाविक था। इसी से प्रेरित होकर साल 2015 से उसने थोडा थोड़ा लिखना शुरु किया। इसके बाद से उसकी माता और परिजन भी खुश हुए और उसे प्रोत्साहित करना शुरु कर दिया। रेणू दूहन हास्य व्यंग्य और कविताएं भी लिखती हैं तो उनके इस हास्य में भी समाज के लिए कुछ न कुछ ऐसे संदेश छिपे होते हैं जो नशे की तरफ जाते आज के युवाओं को जागरुक करके उन्हें सही राहत दिखाने का काम कर सकते हैं। उनके लेखन, अभिनय या फिर हास्य व्यंग्य का फोकस समाज को सकारात्मक ऊर्जा देने की दिशा में ही रहा है, ताकि खासकर युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति की मूल जड़ो से जुड़ी रहे। इस आधुनिक युग में लोक कला और संस्कृति के सामने आ रही चुनौतियों को लेकर उनका कहना है कि यदि हम समाज के लिए अच्छा नहीं कर रहे या लिख रहे हैं तो हमारी लेखनी का कोई फायदा नहीं। उनका मानना है कि हमे अपने समाज के लिए अच्छा लिखना चाहिए, चाहे हम कोई वीडियो बना रहे हो या कोई नाटक कर रहे हों, वह ऐसा है जिसे एक बच्चा भी देख पाए ओर जवान व बुजुर्ग भी। हमारा कंटेंट ऐसा होना चाहिए जो हम एक नहीं, बल्कि पूरा परिवार एक साथ मिलकर देख सके। कई बार आज का युवा लोकप्रिय होने के लिए कुछ भी करने को तैयार है तो कि बहुत गलत है।
ऐसे मिली करियर को मंजिल 
हास्य कलाकार रेणू दूहन ने बताया कि अभिनय के क्षेत्र में वह पहले से ही अभिरुचि रखती थी। उनकी पहली यूट्रयूब वीडियो बहन भाई का प्यार रक्षा बंधन को लेकर थी, जिसमें उसने बहन का किरदार निभाया। ऐसे वीडियो में वह लगातार बहन की ही भूमिका में अभिनय कर रही हैं। जैसे जैसे वह कुरुक्षेत्र के रत्नावली, नुक्कड नाटक आदि में हिस्सा लेती रही तो उनकी इस क्षेत्र में पहचान बनने लगी। जब उनका पहला स्टेंडअप कॉमेडी शो था, तो स्टेज एप ओटीटी के लिए तो वो मुझे जिंदगी में याद रहेगा। दरअसल गर्मी का समय में इस शो की शूटिंग में 16 घंटे लगे। हम लोग निरंतर शो में लगे रहे तो वह संभव हो पाया। सौभाग्य से यह शो उनके ही घर हुआ तो माता पिता भी प्रसन्न हुए। यह मेहनत रंग लाई और शो बहुत अच्छा गया। उनका जब वह शो रिलीज हुआ तो 3-4 दिन में ही उसे लाखों लोगों ने देखा। ऐसे में इससे बढ़कर खुशी का कोई ठिकाना नहीं हो सकता था, क्योंकि चौतरफा रेणू दूहन की लोकप्रिता बढ़ने से महसूस हुआ कि उनकी मेहनत रंग ले आई है। फिर बस चलते चले गये और इस कला को आगे बढ़ाने के लिए पीछे मुड़कर नहीं देखा। 
 ---- 
आस्ट्रेलिया में किया प्रदर्शन 
हास्य कलाकार एवं अभिनेत्री के रुप में रेणू दूहन ने साल 2019 में आस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में भी अपनी कला का प्रदर्शन करके हरियाणवी संस्कृति की अलख जगाई है। वहीं उन्होंने जहां हरियाणवी फिल्म बहु काले में बहन का किरदार निभाया है। तो उन्होंने वेबसीरिज फिल्मों डिजिटल ताई, गौंरू ऑफ हंसीपुर के अलावा उन्होंने स्टेज एप पर करीब एक दर्शन स्टेंडअप कॉमेडी शो किये और वह पिछले छह साल से यूट्यूब चैनल पर काम कर रही हैं। पिछले पांच साल से वे अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव कुरुक्षेत्र में भी अपनी कला के रंग बिखेर रही हैं। थिएटर कार्यशाला के अलावा उन्होंने यूथ फेस्टिवल हिस्सेदारी करती रही हैं और कालेज में कार्यशाला आयोजित करके नई प्रतिभाओं को भी लोक कला व संस्कृति के प्रति उन्हें प्रशिक्षण देने का काम किया है। 
पुरस्कार 
रेणू दूहन को उनकी कला की विधाओं के लिए स्कूल व कालेज की शिक्षा के दौरान से ही कविता व चुटकले आदि लिखने और नुक्कड नाटक करने, रंगमंच के लिए राज्य स्तर पर दो बार चुटकलों के लिए प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अभिनय के क्षेत्र में रत्नावली फैस्टिवल में राज्य स्तर पर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से नवाजा गया। निबंध प्रतियोगिता में राज्य स्तर पर प्रथम पुरस्कार और कविता लेखन में द्वितीय व तृतीय पुरस्कार भी हासिल किये हैं। 
24Feb-2025

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2025

साक्षात्कार:सामाजिक विसंगतियों को दूर करने का माध्यम साहित्य: प्रो. शामलाल कौशल

हास्य व्यंग्य, काव्य और लघु कथाओं से समाज को दे रहे सकारात्मक संदेश 
      व्यक्तिगत परिचय 
नाम: प्रो. शामलाल कौशल 
जन्मतिथि: 9 दिसंबर 1943 
जन्म स्थान: डेरा ग़ाज़ी खान(पाकिस्तान) 
शिक्षा: एम.ए. (अर्थशास्त्र, अंग्रेज़ी तथाराजनीति शास्त्र) 
संप्रत्ति: सेवानिवृत्त प्रोफेसर( अध्यक्ष, अर्थशास्त्र), राजकीय महाविद्यालय, गोहाना सोनीपत( हरियाणा)। 
सम्पर्कः मकान न.975-बी/20, राजीव निवास, शक्ति नगर, ग्रीन रोड, रोहतक। मोबा-मे. 09416359045 
BY-ओ.पी. पाल 
साहित्य जगत में समाज को नई दिशा देने के मकसद से ही लेखक साहित्य साधना करते आ रहे हैं। मूर्घन्य विद्वानों ने साहित्य को समाज का दर्पण माना है। इसलिए लेखक और साहित्यकार अपनी विभिन्न विधाओं में समाजिक सरोकार के मुद्दों पर साहित्य साधना करके समाज को अपनी संस्कृति और सभ्यता के प्रति सकारात्मक संदेश देते आ रहे हैं। हरियाणा की समृद्ध संस्कृति के संवर्धन में जुटे शिक्षाविद् एवं लेखक शामलाल कौशल भी सामाजिक सरोकार के मुद्दों पर आलेख, काव्य, हास्य व्यंग्य और लघु कथओं जैसी विधाओं से अपने रचना संसार को बढ़ाकर साहित्य और समाज को एक दूसरे के पूरक होने की सार्थकता को सिद्ध करने में जुटे हैं। हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. शामलाल कौशल ने अपने साहित्यिक सफर को लेकर कई ऐसे पहलुओं को उजागर किया, जिसमें आजकल सामाजिक विसंगतियों के कारण दूर होती सभ्यता, संस्कृति, नैतिकता और बड़ों के प्रति आदर जैसी परंपराओं को जीवंत करने में साहित्य एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का माध्यम है। 
---- 
हरियाणा में रोहतक के वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. शामलाल कौशल का जन्म 9 दिसंबर 1943 को पाकिस्तान के डेरा ग़ाज़ी खान में एक साधारण परिवार में तोताराम तथा श्रीमती यशोदा बाई के घर में हुआ था। जब वह बहुत छोटे थे तो भारत के विभाजन के समय शोर शराबा होने लगा था और अलग से पाकिस्तान बनने पर हिंदू परिवार दंगाईयों के भय से अलग अलग स्थानों से होते हुए हिंदुस्तान की तरफ पलायन करने लगे। जहां उन्हें याद है वे पाकिस्तान से अपने माता पिता और भाई बहन और अन्य लोगों के साथ रेलगाड़ी की छत पर सवारी करके हिंदुस्तान पहुंचे। आखिरकार हमारा परिवार रेलगाड़ी से पंजाब मे संगरूर शहर में उतरा, जहां रेलवे स्टेशन के बार लगे एक हैंडपंप का पानी पीकर कई दिन के बाद अपनी प्यास बुझाई। उनके परिवार के अन्य सदस्य तथा रिश्तेदार भी वहां पहुंच गए, तो उन्हें दो-तीन कैंपो में बारी-बारी कुछ दिन के लिए रखा गया और बाद में हमें संगरूर की सलीम खान की कोठी में रहने के लिए जगह दी गई, 40- या 50 परिवारों ने शरण ली। हालांकि शरणार्थियों की जिस तरह देखभाल की जा सकती थी वह यथासंभव की गई। मसलन हिंदुस्तान आने के बाद प्रारंभिक दिन बहुत कठिन और संघर्ष के बीच बीते। लोगों ने कोई न कोई काम करके बड़ी मेहनत की और हिंदुस्तान आकर अपने आपको सभी परिवारों ने पैरों पर खड़े होकर पालन पोषण किया। इसी संघर्षशील जिंदगी के बीच साल 1953 में पिता के निधन के कारण पढ़ाई करना बहुत मुश्किल था, लेकिन फिर भी उन्होंने किसी तरह संगरूर के राज हाई स्कूल से मैट्रिक पास की। गवर्नमेंट रणबीर कॉलेज से बीए पास किया, जहां उन्हें अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले शिक्षक तथा समाजसेवी प्रोफेसर मुंशी राम वर्मा ने उनके लिए एक अभिभावक की भूमिका निभाई और हरसंभव सभी तरह की सहायता करके मार्गदर्शन किया। प्रोफेसर मुंशीराम वर्मा की वजह से ही वह इस मुकाम पर हैं। बाद में उन्होंने पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से एमए (अर्थशास्त्र) उत्तीर्ण की। प्रो. वर्मा के लिए उनका एहसान वह सारी उम्र नहीं भूल सकते, जिसके बाद 1966 में हरियाणा में गोहाना में हरियाणा वार हीरोज मेमोरियल कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के तौर पर उनकी नौकरी लगी। 1981 में यही कॉलेज सरकारी कॉलेज बन गया और यही से करीब 36 साल अध्यापन करने के बाद 2001 में वह सेवानिवृत्ति हुए, कॉलेज के विभिन्न प्राचार्यों, प्रोफेसरों तथा विद्यार्थियों से खूब मान सम्मान मिला। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि जीवन की इस यात्रा में जब कभी भी उन्हें किसी कठिनाई का सामना करना पड़ा, तो परमात्मा ने किसी न किसी को अपना प्रतिनिधि भेज कर उनकी मुश्किल आसान कराई। बकौल शामलाल कौशल, हमारे परिवार में किसी की भी साहित्य में रुचि नहीं रही है। परिवार में शायद वह अकेले सदस्य थे, जिन्हें बचपन से ही अखबार पढ़ने की रुचि रही है। वह अपने कॉलेज की पत्रिका का संस्कृत खंड का स्टूडेंट एडिटर थे और जब वह प्रोफेसर बने, तो अपने कॉलेज की पत्रिका में भी उनके लेख भी नियमित तौर पर लेख प्रकाशित होते रहते थे। बचपन से ही उनका व्यवहार हंसी मजाक का रहा है। इसलए छात्र जीवन में वह साथियों को चुटकुले सुना कर पहले उनका ध्यान आकर्षित करता था और फिर पढ़ता था। मसलन मन में जो आता है वह लिख लेते थे और इसी कारण अब लिखने की आदत बन गई है। बेशक वह कविताएं, कहानियाँ तथा लघु कथाएं लिखते हैं, लेकिन उनका फोकस लेख तथा हास्य व्यंग्य लिखने में रहता है, जिसमें वह सामयिक तथा सामाजिक विषयों को तरजीह सर्वोपरि रखते हैं। हास्य व्यंग्य लिखने में उनका मकसद किसी का व्यक्तिगत उपवास करना नहीं,बल्कि किसी विषय विशेष को लेकर वह हंसी-हंसी में भ्रष्टाचार, पुरस्कारों का मिलना, सामाजिक रिश्ते, राजनेताओं का व्यवहार जैसी समस्याओं का विश्लेषण करके समाज को सकारात्मक संदेश दने का प्रयास करते हैं। 
ऐसे बने साहित्यकार 
प्रो. शामलाल ने बताया कि सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने लेखन कार्य शुरु किया, जिसके लिए उन्हें डॉ. श्याम शाखा शाम, प्रख्यात साहित्यकार, समाजसेवी, शिक्षक डॉ मधुकांत जैसे कई ऐसे मूर्घन्य विद्वान और साहित्यकारों की प्रेरणा और मार्गदर्शन में साहित्य संवर्धन में कई विधाओं उन्होंने अपने रचना संसार को लगातार दिशा दी। इसमें उन्होंने सबसे पहले एक हास्य व्यंग्य लिखा, जिसके बाद लघु कथाएं लिखनी शुरू की। लेकिन साहित्य के क्षेत्र में उन्हें बड़े बड़े साहित्यकारों से परिचय करवाने का बहुमूल्य कार्य प्रख्यात साहित्यकार डॉ. मधु कांत ने करवाया, जिनसे आज तक बहुत मान सम्मान मिल रहा है। जो उन्हें लिखी गई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित कराने के लिए भेजने के लिए प्रोत्साहित करते आ रहे हैं। खास बात ये भी है कि सेवानिवृत्ति के बाद साहित्य लेखन से ही उनका समय बहुत आसानी से गुजर जाता है और वरिष्ठ साहित्यकारों से मुलाकात और कार्यक्रमों में हिस्सेदारी से उनके ज्ञान में वृद्धि तथा सम्मान मिल रहा है। 
आधुनिक युग में अच्छे साहित्य का अभाव 
वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर शामलाल कौशल का इस आधुनिक युग में साहित्य के सामने आई चुनौतियों को लेकर कहना है। साहित्य समाज का दर्पण है, अगर समाज में अच्छे संस्कार होंगे, तो संस्कृति होगी। मसलन साहित्य का प्रभाव समाज पर पड़ता है और समाज भी साहित्य को प्रभावित करता है। लेकिन आज के समय में अच्छे साहित्य का अभाव इसलिए पनपा है कि हमारा समाज भी आजकल सभ्यता, संस्कृति, नैतिकता और बड़ों के प्रति आदर व ईमानदारी से दूर होते जा रहे हैं। हालांकि जिन्हें साहित्य का जुनून है वह अभी साहित्य साधना में जुटे हैं, लेकिन भौतिकतावाद के इस युग में साहित्य के प्रति पाठकों की रुचि पहले के मुकाबले में बहुत कम हो रही हैं। युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति रूझान न होने का कारण वह अपने करियर को लेकर इंटरनेट का ज्यादा सहारा ले रहे हैं। समाज के ताने बाने को संस्कृति के अनुरुप संजोने के लिए युवा पीढ़ी को साहित्य के लिए प्रेरित करने की बहुत जरुरत है। इसके लिए शिक्षण संस्थानों में साहित्य से संबंधित सामग्री पाठ्यक्रमों में शामिल करके शिक्षक साहित्य की विभिन्न विधाओं के बारे में छात्रों को संस्कारी बना सकते है। युवाओं को साहित्य संबन्धित प्रतियोगिताओं में शामिल करके उन्हें प्रोत्साहित किया जा सकता है। वहीं साहित्य में आई गिरावट का कारण शॉर्टकट के रास्ते लोकप्रियता हासिल करने के प्रयास में लेखकों को भी बदलते सामाजिक परिवेश के अनुसार साहित्य संवर्धन करने की आवश्यकता है, तभी समाज और संस्कृति को जीवंत रखने की क्ल्पना की जा सकती है। 
प्रकाशित पुस्तकें 
वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. शामलाल कौशल की प्रकाशित 15 पुस्तकों में लेख संग्रह-जीना एक कला है तथा खुश कैसे रहें, काव्य संग्रह-यही तो जिंदगी है, हास्य व्यंग्य संग्रह-यह दुनिया पागलखाना, कुवारों का संडे बाजार व आज्ञाकारी पति होने के फायदे, लघुकथा संग्रह-अगर मां होती, हास्य व्यंग्य-ऐ बेशर्मी? तेरी सदा ही जय हो, लघु कविता संग्रह- जिनकी नहीं होती मां, अभी तो मैं जवान हूं और मेरे हीरो मेरे मां बाप, कहानी संग्रह-पिंजरे के पंछी सुर्खियों में हैं। वहीं संयुक्त लेखक डा. मधुकांत के साथ काव्य संग्रह- ऐ! जिन्दगी! तथा लेख संग्रह- तनाव ही तनाव भी उनकी कृतियों में शामिल है। 
पुरस्कार व सम्मान 
शिक्षाविद् एवं साहित्यकार प्रो. शामलाल कौशल को साहित्य साधना के लिए अनेक पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। हरियाणा साहित्य अकादमी ने उन्हें हास्य व्यंग्य संग्रह 'आज्ञाकारी पति होने के फायदे' को सर्वश्रेष्ठ कृति सम्मान से अलंकृत किया। वहीं लाल बहादुर शास्त्री 'साहित्य रत्न' पुरस्कार, निर्मला स्मृति आजीवन हिंदी साहित्य साधना सम्मान के अलवा दिल्ली, हरियाणा, यूपी आदि विभिन्न राज्यों की साहित्यिक संस्थाओं द्वारा अनेक बार सम्मान देकर पुरस्कृत कर चुकी हैं। 
17Feb-2025

सोमवार, 3 फ़रवरी 2025

साक्षात्कार: साहित्य में मानवीय रिश्तों को सर्वोपरि रखना जरुरी: भावना सक्सैना

महिला रचनाकार ने प्रवासी साहित्य में हासिल की लोकप्रियता 
            व्यक्तिगत परिचय 
नाम: भावना सक्सैना 
जन्म तिथि: 20 जनवरी 1973 
जन्म स्थान: दिल्ली 
शिक्षा: स्नातकोत्तर, अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक व एमए अंग्रेज़ी 
संप्रति: सहायक निदेशक, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार 
संपर्क: फरीदाबाद (हरियाणा), मोबा.-9560719353 
-BY-ओ.पी. पाल 
साहित्य जगत में समाज के परिदृश्य को सकारात्मक ऊर्जा देने के मकसद से लेखक एवं साहित्यकार अपनी विभिन्न विधाओं में साहित्य साधना से हिंदी, संस्कृति और सभ्यता का संवर्धन करने में जुटे हैं। हरियाणा के ऐसे लेखकों में शुमार महिला साहित्यकार भावना सक्सैना ने संपूर्ण शिक्षा अंग्रेजी में पूरी करने के बावजूद भारत में ही नही, बल्कि विदेश में भी हिंदी के प्रचार-प्रसार को महत्ता दी है। खासतौर से हरियाणा में ऐसे चुनिंदा लेखकों में शायद महिला लेखक के रुप में भावना सक्सैना ऐसी साहित्यकार हैं, जिन्होंने विदेश में रहते हुए प्रवासी साहित्य पर शोध के जरिए अपनी लेखनी से कहानी, आलेख, लघुकथा, कविता औऱ हाइकु जैसी विधाओं में अपने रचना संसार का परचम लहराया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग में सहायक निदेशक एवं लेखिका भावना सक्सैना ने अपने साहित्यिक सफर को लेकर हरिभूमि संवाददाता से बातचीत में कई ऐसे अनछुए पहलुओं को साझा किया है, जिन्होंने अपनी रचनाओं में मानवीय रिश्तों को सर्वोपरि माना है, जो उनके लेखन की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति को प्रकट करता है। 
---- 
सात समुंदर पार तक हिंदी साहित्य की अलख जगाने वाली हरियाणा की वरिष्ठ महिला साहित्यकार भावना सक्सैना का जन्म 20 जनवरी 1973 को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक शिक्षित परिवार में सुरेंद्र कुमार कौशिक और श्रीमती दर्शन कौशिक के घर में हुआ। उनके पिता दिल्ली में बैंकर थे, तो माता भी प्रशासनिक क्षेत्र में सेवारत थी। इसलिए उनका बचपन दादा-दादी के स्नेह की छांव में गुज़रा और यह उनकी अमूल्य पूंजी है। बचपन से ही दादी को नियमित रूप से गीता और सुखसागर पढ़ते हुए देखा। वह काम करते हुए अनेक भजन भी गुनगुनाती रहती थी। मेरा सबसे पसंदीदा भजन था ‘धन्य हो महिमा तेरी भगवन नहीं पार किसी ने पाया है, ओ निराकर भगवान मेरे ये जाग साकार बनाया है’। घर का वातावरण बहुत सात्विक और स्नेह से पूर्ण था। उस समय मझली और छोटी बुआ संस्कृत में स्नातक व स्नातकोत्तर कर रही थीं और साथ ही पास-पड़ोस के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाया करती थीं । पिताजी ने उनका प्रवेश प्रथम कक्षा में ही सेंट मेरी कॉन्वेंट स्कूल में करा दिया था, जहाँ छोटा मगर अच्छा पुस्तकालय था। अंग्रेज़ी हिंदी की खूब पुस्तकें उपलब्ध रहीं। जो बच्चे बुआ से पढ़ने आते थे उनका पाठ्यक्रम कुछ अलग था। वह उन सबकी पुस्तकें लेकर पढ़ती, अपने से बड़ी कक्षाओं की भी। पुस्तकों की सहज उपलब्धता और परिवार में सभी की प्रेरणा से पढ़ने में रुचि उत्पन्न हुई। उनकी कुछ तुकबंदियाँ तो सातवीं-आठवीं कक्षा में आरम्भ हुई थीं, लेकिन उन्होंने अपनी पहली पूर्ण कविता कक्षा नौ में अंग्रेज़ी भाषा में लिखी। उनके फूफाजी उस समय अंग्रेज़ी प्राध्यापक थे, जिन्होंने उस रचना को काफ़ी सराहा। फिर गाहे बगाहे वह अपने विचारों को कविताओं के रूप में कलमबद्ध करती रही। कॉलेज के समय काफ़ी कविताएँ लिखी, लेकिन कभी प्रकाशित नहीं कराईं। आज भी वे डायरी और रजिस्टरों के पन्नों में कैद हैं, वे मन की अनगढ़ अनुभूतियाँ हैं और बेहद निजी संपदा हैं। स्नातकोत्तर, अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक व एमए अंग्रेज़ी में करने के बाद उनकी भी केंद्र की सरकारी नौकरी मिल गई, जिनकी नियुक्ति केंद्रीय गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग के केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो में वरिष्ठ अनुवादक पद पर हुई, जिन्हें वर्ष 2007 में सूरीनाम में प्रतिनियुक्ति पर भेज दिया गया। उन्होंने सूरीनाम में भी साहित्यिक साधना पर ध्यान केंद्रित रखा। मसनल वहाँ के बारे में जानने का प्रयास किया, लेकिन उस समय इंटरनेट पर इतनी सूचना सामग्री उपलब्ध नहीं थी। लेकिन वह सूरीनाम के हिंदुस्तानियों की भाषा और संस्कृति के प्रति प्रेम से बेहद प्रभावित हुई और उन्होंने सूरीनाम के भारतवंशी हिंदी लेखकों के साहित्य का आलोचनात्मक अध्ययन करते हुए उन पर आलेख लिखने शुरू कर दिये। दरअसल 2012 में सूरीनाम पर ही प्रवासी साहित्य के रुप में उनकी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई। कुछ वर्ष पहले एक कहानी संग्रह नीली तितली प्रकाशित हुआ, जिसकी कई कहानियाँ सूरीनाम की पृष्ठभूमि पर हैं। इसके बाद एक हाइकु संग्रह और दूसरा कहानी संग्रह भी आया। बकौल भावना सक्सैना, साहित्य हो या काई अन्य क्षेत्र, हर क्षेत्र में उतार चढ़ाव मनुष्य की जिंदगी का हिस्सा है, जिसमें हताश होने के बजाए सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने वालों के मार्ग को कोई परास्त नहीं कर सकता। महिला साहित्यकार भावना सक्सैना ने साहित्य के क्षेत्र में जीवन की अनुभूतियाँ और समाज के घटनाक्रम ही रहे हैं। इनमें लेखन की सार्थकता होना आवश्यक है कि वह मानव जीवन और समाज के लिए मार्गदर्शन का सबब बने। उन्होंने ऐसी ही कहानी और कविताएं लिखकर महसूस किया है कि यह लेखन उनके लिए भावनाओं का सहज स्फूर्त प्रवाह है। खासबात ये है कि भावना सक्सैना ने अंग्रेजी माध्यम से पूरी शिक्षा ग्रहण करने के बावजूद देश और विदेश में हिंदी भाषा के लिए बहुत कार्य किया है। उन्होंने बताया कि जब वह एमए अंग्रेजी कर रही थी तो तब त्रिनदाद व टोबैगो में पाँचवा विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन की खबर सुनकर मन में विचार उठता था कि वह हिंदी में अध्ययन कर रही होती तो वह अपने देश और भाषा की सेवा बेहतर कर सकती थी। यह भी संयोग रहा कि एमए का परिणाम लेने विश्विद्यालय गयी तो अनुवाद पाठ्यक्रम सम्बन्धी सूचना देखी और वहीं निर्णय किया कि यह उनके लिए हिंदी सेवा करने का जरिया हो सकता है। तत्काल ही अनुवाद पाठ्यक्रम का फॉर्म लेकर पाठ्यक्रम पूरा किया और एसएससी की परीक्षा उत्तीर्ण की, जिसका नतीजा यह रहा कि उनकी तैनाती भारत सरकार के केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो में हो गई और अपनी मातृभाषा की सेवा करने का सपना पूरा हुआ, जिसके बाद उन्होंने हिंदी में भी एमए किया। केंद्रीय सेवा के दौरान वर्ष 2008 में विदेश मंत्रालय में प्रतिनियुक्ति के परिणामस्वरूप उनका चयन सूरीनाम जाने के लिए हुआ। सूरीनाम में तैनाती के दौरान वह हिंदी के एक अलग संसार से रूबरू हुई। वर्ष 2023 में 12वें विश्व हिंदी सम्मेलन से जुड़े कार्यों के लिए अस्थायी तैनाती कर दी गई, तो पुनः देश से दूर फिजी जाकर अपनी भाषा की सेवा करने का अवसर मिला। वहीं उनकी 'सूरीनाम में हिंदुस्तानी, भाषा, साहित्य व संस्कृति' तथा 'सूरीनाम का सृजनात्मक हिंदी साहित्य' नामक पुस्तकें दिल्ली विश्वविद्यालय के स्नातक पाठ्यक्रम में भी शामिल हैं। 
प्रवासी साहित्य पर शोध 
लेखिका भावना सक्सैना के अनुसार साल 2008 में सूरीनाम में हिंदी अताशे के रूप में प्रतिनियुक्त हुई तो उन्होंने सूरीनाम पदभार ग्रहण करने के बाद सूरीनाम के हिंदी लेखकों के बारे में जानकारियां जुटाना शुरु कर दिया, जहां हम वहां के बहुत कम कवियों व लेखकों से परिचित हैं। उसी दौरान सूरीनाम में पंडित हरिददेव सहतू के साथ मिलकर 'एक बाग के फूल' र्ग्षक से एक काव्य संकलन तैयार किया, जिसमें 27 कवियों की कविताओं का संकलन है। सूरीनाम में हिंदुस्तानी वंशजों के द्वारा बोली जाने वाली भाषा, उनकी रचित साहित्य और सहेजी गई संस्कृति जैसे अन्य पहलुओं पर भी अध्ययन किया और अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों के साक्षात्कार किये। इस प्रकार के शोध के बाद उन्होंने 'सूरीनाम में हिंदुस्तानी भाषा, साहित्य व संस्कृति' नामक पुस्तक तैयार की। साल 2012 में वापस भारत लौटने पर उनकी साहित्य साधना रुकी नहीं, बल्कि तमाम एकत्र जानकारियों और साहित्य को मूर्त रुप दिया। उन्होंने प्रतिष्ठित भाषा-वैज्ञानिक डॉ.विमलेशकान्ति वर्मा के सह-संपादन में 'सूरीनाम का सृजनात्मक हिंदी साहित्य' नामक पुस्तक लिखी। इसके बाद डॉ. विमलेशकान्ति वर्मा के ही प्रवासी भारतीय हिंदी साहित्य ग्रंथ पर भी कार्य किया, जिसमें सूरीनाम, मॉरिशस, दक्षिण अफ्रीका और फीजी के लेखकों की रचनाएँ संकलित हैं। उनकी एक एक पुस्तक राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से प्रकाशित हुई, जिसमें सरनामी हिंदी यानी सूरीनाम में बोली जाने वाली हिंदी पर शोध कार्य भी समाहित है। 
आधुनिक युग में साहित्य की चुनौतियां 
आधुनिक युग में साहित्य को लेकर भावना सक्सैना का कहना है कि साहित्य की हर युग में अपनी महत्ता है चाहे वह प्राचीन साहित्य हो या फिर वर्तमान में लिखा गया साहित्य। आज के समय में भी साहित्य को नए आयाम मिले हैं। पॉडकास्ट व अन्य डिजिटल माध्यमों से इसकी पहुंच बढ़ी है। इस युग में हर व्यक्ति के पास अच्छे साहित्य का भंडार उपलब्ध हो सकता है, बस उसे सतर्क रहने की आवश्यकता है। भारत में साहित्य के पाठक तो बहुत हैं, लेकिन हिंदी साहित्य के पाठक अपेक्षाकृत कम हैं। जहां तक युवा पीढ़ी को साहित्य के प्रति प्रेरित करने का सवाल है इसके लिए हिंदी के लेखकों को ऐसी रचनाओं पर फोकस करना होगा, जो युवा पीढ़ी को पढ़ने के लिए प्रेरित कर सके। लेकिन देखा जा रहा है कि आज संभवतः मौलिकता का अभाव है। आजकल हिंदी के बहुत से लेखक मानो फैक्ट्री में साहित्य सृजन कर रहे हैं, ताकि सोशल मीडिया पर आने वाली प्रतिक्रिया उन्हें लोकप्रिय बना सके। जबकि समाज को अपनी संस्कृति के प्रति सकारात्मक ऊर्जा देने के लिए साहित्यकारों और लेखकों को सजग रहने की आवश्यकता है। 
प्रकाशित पुस्तकें 
महिला लेखक एवं साहित्यकार भावना सक्सैना की प्रकाशित पुस्तकों में सूरीनाम में हिन्दुस्तानी, भाषा, साहित्य व संस्कृति, कहानी संकलन नीली तितली सुर्खियों में है। उन्होंने सूरीनाम का सृजनात्मक हिंदी साहित्य, प्रवासी हिंदी साहित्य, एक बाग के फूल, अभिलाषा, हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगंधा के मार्च 2018 महिला विशेषांक का संपादन भी किया है। यही नहीं उन्होंने कलाकारों का जीवन सरनामी(रोमन) से हिंदी में अनुवाद भी किया है। 
पुरस्कार व सम्मान 
साहित्य के माध्यम से हिंदी के संवर्धन एवं प्रचार प्रसार के लिए साहित्यकार भावना सक्सैना को अमेरिका के द्वीव सूरीनाम में सूरीनाम हिंदी परिषद, सूरीनाम साहित्य मित्र संस्था और ऑर्गेनाइज़ेशन हिंदू मीडिया, सूरीनाम द्वारा श्रेष्ठ हिंदी सेवाओं प्रचार प्रसार के लिए सम्मानित किया जा चुका है। वहीं हरियाणा साहित्य अकादमी से ने उन्हें साल 2014 में उनकी लिखित कहानी 'तिलिस्म' को प्रथम पुरस्कार से नवाजा है। उन्होंने नवंबर 2008 से जून 2012 तक भारत के राजदूतावास, पारामारिबो, सूरीनाम में अताशे पद पर रहकर हिंदी का प्रचार-प्रसार किया है।
03Feb-2025