मंगलवार, 12 जनवरी 2016

चालकों को प्रशिक्षण देना जरूरी: राजनाथ

सड़क सुरक्षा सप्ताह का प्रारम्भ
हरिभूमि ब्यूरो. नई दिल्ली।
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने देश में हो रहे सड़क हादसों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताते हुए कहा कि सभी हितधारकों से सड़कों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में प्रभावी भूमिका निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि चालकों को ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने से पहले उन्हें उचित प्रशिक्षण दिए जाने की जरूरत है।
राजनाथ सिंह ने सोमवार को यहां इंडिया गेट से शुरू हुए सड़क सुरक्षा सप्ताह का शुभारंभ किया। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने देश में हर साल लगभग पांच लाख सड़क दुर्घटनाओं और उनमें लगभग 1.45 लाख लोगों की हो रही मौतों को बेहद दुखद और चिंताजनक बताया। उन्होंने समारोह में मौजूद केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को सुझाव दिया कि ऐसे नियम लागू किये जाए जिसमें चालकों को ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने से पहले उनकी उचित प्रशिक्षण लेने की अनिवार्यता हो। इस मौके पर केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन भी मौजूद थे। इससे पहले गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इंडिया गेट से रोड सेμटी वॉक ‘वॉकेथॉन’ को भी हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इसका आयोजन सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने आम जनता में सड़क सुरक्षा के बारे में जागरूकता जगाने और उसे सड़क सुरक्षा आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाने के लिए किया है। लोगों को सडक सुरक्षा के प्रति प्रेरित करने वाले इस अभियान में केंद्र सरकार के साथ दिल्ली पुलिस और सोसायटी फॉर इंडियन आॅटोमोबील मैन्यूफैक्चरर्स सहयोग कर रही है। गौरतलब है कि देशभर में हर साल सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया जाता है, ताकि जनता में सड़क सुरक्षा के बारे में जागरूकता फैलाई जा सके। समारोह में इस अवसर पर कई सांसद, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग सचिव, दिल्ली पुलिस के आयुक्त, क्रिकेट खिलाड़ी गौतम गम्भीर और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।
देशभर में खुलेंगे प्रशिक्षण केंद्र
गृहमंत्री राजनाथ सिंह की इस सड़क हादसों को लेकर बनी चिंता में सुर में सुर मिलाते हुए केंद्री सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने के तरीके के लिए उठाए जा रहे कदमों की जानकारी दी, जिसके लिए उन्होंने बताया कि उनके मंत्रालय ने चालकों को कौशल शिक्षा के लिए देशभर में प्रशिक्षण स्कूल खोलने की योजना चलाई जा रही है, वहीं ड्राइविंग टेस्ट लेने के लिए कम्प्यूटरों का उपयोग करने की योजना पर काम चल रहा है। यही नहीं वाहनों में सवारों के लिए सीट बेल्ट और हेलमेट की अनिवार्यता जैसे सख्त नियम तैयार किये जा रहे हैं। इसके अलावा इस बात पर भी ध्यान दिया गया है कि ड्राइविंग के दौरान लोगों से वाहन चलाते समय मोबाइल फोन इस्तेमाल न करने का भी प्रावधान लागू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि चालक प्रशिक्षण के अलावा प्रत्येक कार में एयरबैग को भी अनिवार्य बनाया जाएगा।

सोमवार, 11 जनवरी 2016

सड़क हादसों रोकने पर आगे बढ़ी सरकार!

12 हजार करोड़ की योजना को अंतिम रूप
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देशभर में कल सोमवार से सड़क सुरक्षा सप्ताह की शुरूआत हो रही है। इससे पहले ही सड़कों पर होने वाले हादसों को रोकने के लिए लगातार कवायद में जुटी केंद्र सरकार ने 12 हजार करोड़ की सड़क सुरक्षा योजना को अंतिम रूप देकर शुरू करने का फैसला लिया है।
दरअसल सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं को लेकर होने वाली मौतों के मामले में पूरी दुनिया में भारत अव्वल रहा है। इसी कलंक को मिटाने के लिए केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने केंद्रीय सड़क परियोजनाओं में राज्यों के समन्वय से सड़क सुरक्षा को प्राथमिकता पर रखा है और सड़क हादसों पर अंकुश लगाने के लिए मंत्रालय में विशेषज्ञों के परामर्श से लगातार जारी अध्ययन के बाद जो तथ्य सामने आए हैं उसका खाका तैयार करके एक सड़क सुरक्षा योजना तैयार की गई है। मंत्रालय के अनुसार सरकार की इस योजना में राज्यों की सरकारों और पुलिस रिकार्ड की मदद से देश में दुर्घटनाग्रस्त क्षेत्रों को चिन्हित किया जा रहा है, जिसके आधार पर राजमार्गो के डिजाइन को सुरक्षित करने का काम शुरू किया जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा कराये गये अध्ययन में वाहन चालकों की मानवीय चूक को भी शामिल किया गया है, खासकर लंबा सफर करने वाले ट्रक या बस चालकों की सहूलियमों को भी योजना में शामिल किया गया है। मंत्रालय के अनुसार इसके लिए पहले ही केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ऐलान कर चुके हैं कि राष्‍ट्रीय राजमार्गो और प्रमुख राजमार्गो व सड़कों के किनारे ट्रक चालकों के लिए सभी बुनियादी सुविधाओं के साथ विश्राम गृह बनाने की योजना शुरू कर दी गई है।

नमामि गंगे मिशन पर आगे बढ़ा कानपुर!

कानपुर में अन्य जगहों से ज्यादा हो रहा काम
हरिभूमि ब्यूरो.
नई दिल्ली
केंद्र सरकार की राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा अभियान के तहत चलाई जा रही महत्वकांक्षी योजना नमामि गंगे मिशन ने कानपुर में ज्यादा गति पकड़ी है, जहां केंद्र सरकार के जारी दिशा-निर्देशों के तहत परियोजना को अन्य जगहों से ज्यादा काम हो रहा है। केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के अनुसार गंगा को बचाने की इस मुहिम में वैसे तो जनजागृति का प्रसार हुआ है, लेकिन यूपी के कानपुर से गुजर रही गंगा की स्वच्छता के लिए प्रशासन, पुलिस और लोग सक्रिय होकर इस अभियान में तेजी से आगे बढ़े हैं। दावा किया जा रहा है कि कानपुर में कानपुर और आस-पास के घाटों और गंगा नदी किनारे बसे गांवों में लोगों की मदद से शवों को गंगा में प्रवाहित करने से रोकने के प्रयास में नदी पुलिसिंग और प्रशासन के साथ आम लोगों में सक्रियता बनी हुई है। इसमें गंगा किनारे शवों को जलाने वाले लोग भी घाटों की सफाई से जुड़ी किसी भी परियोजना या नियम को समझने का प्रयास कर रहे हैं, जिनमें गंगा सफाई को लेकर जागरुकता भी बढ़ रही है। इसका कारण यह भी है कि गंगा के किनारे और घाटों को साफ करने के लिए जीआरएफडी प्लान को केंद्र पहले ही मंजूरी दे चुकी है।
मंत्रालय के अनुसार 1986 में गंगा एक्शन प्लान का उद्देश्य गंगाजल में प्रदूषण की मात्रा को कम करना और गंगाजल की गुणवत्ता को सुधारने के लिए बनाई गई स्कीमों के कार्यान्वयन के तहत अन्य राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी लक्षित सीवेज ट्रीटमेंट संयंत्र लगाए जा रहे हैं। मौजूदा केंद्र सरकार ने गंगा कार्ययोजना का दायरा बढ़ाते हुए ऐसी स्कीमें भी लागू की है जिसमें शहरों और गांवों के नालो तथा औद्योगिक ईकाइयों का प्रदूषित जल गंगा नदी में न आ सके। जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए सिर्फ गंगा ही नहीं, बल्कि इसमें मिलने वाले और इसके किनारे पर स्थित झील एवं तालाबों को भी साफ करने की योजनाओं को भी शुरू किया गया है और गंगा और इसमें वाली नदियों को भी साफ किए जाने की पहल शुरू हो चुकी है।

रविवार, 10 जनवरी 2016

रागदरबार: नीतीश का राष्ट्रधर्म या सियासत

नीतीश नरम और लालू गरम 
देश की राजनीति में सेक्युलर स्यापाबाजों में भी कभी कभी विवादित मुद्दों के समाधान के लिए राष्टÑधर्म जाग ही जाता है। शायद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 36 का सियासी आंकड़ा होते हुए भाी पठानकोट एयरबेस के आतंकी हमले से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अचानक पाकिस्तान दौरे की तरफदारी करके दुनियाभर के देशों के साथ सुर में सुर मिलाया। नीतीश का राष्ट्रधर्म की भूमिका ऐसे समय सामने आई, जब पठानकोट के इस आतंकी हमले को लेकर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस और कुछ तथाकथित सेक्युलर दल पीएम की पाक से बेहतर रिश्ते कायम करने के कदम पर आगबबूला होकर तरह-तरह के सवाल खड़े करके आलोचना करने में लगे हुए है। नीतीश के पीएम के लाहौर दौरे का अच्छा कदम बताते ही महागठबंधन मे उनके प्रमुख सहयोगी राजद प्रमुख लालू यादव का पारा गरम हुआ तो उसके बाद नीतीश ने यह कहकर पिंड छुडाने की सियासत को उजागर किया कि यह उनकी निजी राय है। राजनीति गलियारों में चर्चा है कि भारत-पाक संबन्धों को बेहतर बनाने के लिए अचानक लाहौर जाकर दुनियाभर के देशों का दिल जीतने वाले पीएम नरेन्द्र मोदी ऐसे पहले नेता है, जिन्होंने 56 इंच का सीना को जोखिम उठाते हुए प्रकट किया है। आज तक आजाद भारत में इससे पहले कोई पीएम नहीं कर सका है, जहां तक आतंकी हमले का सवाल है यह इन दोनों रिश्तों में दुश्मनी परिणिती है। ऐसे में राजनीतिकारों का मानना है कि जब देश की सुरक्षा और हितों पर खतरा है तो सभी राजनीतिक दलों को एक सुर में बोलना चाहिए अथवा लोकतांत्रिक ताकतों की एकजुटता प्रकट करने के लिए नीतीश की तरह अपनी भूमिका को प्रकट करना चाहिए, भले ही उनके राष्ट्रधर्म में सियासत ही क्यों न छुपी हो...।
सन्न रह गए मंत्रीजी
एक भारी भरकम मंत्रालय के एक जूनियर मंत्री इन दिनों अपने कार्यालय में बैठकर भविष्य के सुनहरे सपने बुनने में लगे हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश से आने वाले इन मंत्रीजी को यह आभास हो रहा है कि वह 2017 के विधानसभा चुनाव बाद उत्तर प्रदेश की कमान संभालेंगे। इतना ही नही, वह क्षेत्र से आने वाले कार्यकर्त्ताओं से भी यह टोह ले रहे हैं कि यूपी में उनकी पार्टी से मुख्यमंत्री पद की दौड़ में कौन आगे निकल सकता है। कार्यकर्त्ता और क्षेत्रीय लोगों की मुलाकात में यूपी का जिक्र करने के साथ-साथ वो यह भी बताने से नही चूक रहे कि केंद्रीय नेतृत्व उनमें रूचि ले रहा है। अब इतना सुनने के बाद भई,कौन सा कार्यकर्त्ता नेताजी के प्रति मुग्ध न हो जाएगा। लेकिन इसके उलट, एक कार्यकर्त्ता ने मुंह खोल ही दिया। कारण, मंत्रीजी माह भर से उसकी बात सुनने की बजाय अपनी ही कथा सुनाते आ रहे थे। नतीजतन, कार्यकर्त्ता भी बौराए हुआ था और ज्यों ही मंत्रीजी ने फिर से अपनी कथा छेड़ी तो उसने आपने काम के बारे में सवाल दाग दिया। मंत्रीजी का गोल-गोल जवाब सुनकर उससे रहा नही गया और यह कहता हुआ कार्यालय से निकल गया कि, जो मिल गया है वही बहुत है। अगली बारलाालबत्ती तो दूर संसद की दहलीज भी नही पार कर पाएंगे। इतना सुन मंत्रीजी सन्न रह गए।
तू-तू मैं-मैं का दौर शुरू?
हमारे देश में अक्सर किसी बड़े हमले, प्राकृतिक आपदा के बाद सुरक्षा एजेंसियों के बीच तू-तू मैं-मैं का लंबा दौर शुरू हो जाता है। कोई कहता है मैं ज्यादा सक्षम हूं मुझे जिम्मेदारी मिलनी चाहिए थी। मुझे मिलती तो मैं इस अभियान को तुरंत उसके मुक्कमल अंजाम तक बिना किसी लाग लपेट के पहुंचा देता। कोई कहता है कि मैं ज्यादा बेहतर हूं। ये आपसी रस्साकसी शुरू होती है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। इस बीच जो होना है वो हो जाता है और हम उलझे ही रह जाते हैं। शुरूआत से अंत ये ऐसी उलझन है जिसका फिलहाल किसी के पास कोई सटीक जवाब नहीं है। लेकिन फिर भी हम उलझे हुए हैं और तू-तू मैं-मैं है कि थमने का नाम ही नहीं लेती। कौन जाने कब थमेगी ये तू-तू मैं-मैं।
10Jan-2016

आगे बढ़ी हर घर रोशन करने की मुहिम!






सभी को चैबीस घंटे बिजली देगी राज्य विशेष कार्य योजनाएं
-ओम प्रकाश पाल
भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़ती आवश्यकताओं और बिजली संकट से निपटने की चुनौती को स्वीकार करते हुए राजग की नरेन्द्र मोदी सरकार ने वर्ष 2019 तक देश भर में सातों दिन चैबीस घंटे बिजली देने के महत्वाकांक्षी मिशन पर कार्य को तेजी से आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। मसलन इस चुनौतीपूर्ण लक्ष्य में देश के छह लाख गांवों में से 1,25,000 गांवों को ग्रिड से जोडना है। सातों दिन चैबीस घंटे बिजली देने के मिशन में और भी अनेक कार्य शामिल हैं।
केंद्रीय विद्युत, कोयला तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने सरकार के इस मिशन के तहत मेगा योजनाओं का खाका पटरी पर उतार दिया है। बिजली सुधार की दिशा में मंत्रालय ने ट्रांसमिशन तथा वितरण को मजबूत बनाने, फीडर को अलग करने तथा उपभोक्ताओं के यहां मीटर लगाने के अलावा ताप विद्युत उत्पादन, पनबिजली विशेषकर सौर, पवन ऊर्जा उत्पादन तथा अन्य हरित ऊर्जा के संबंध में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। पूर्वोत्तर विद्युत प्रणाली सुधार परियोजना तथा पूर्वोत्तर राज्यों में ट्रांसमिशन और वितरण व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने की योजना को मंजूरी देकर पूर्वोत्तर क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया गया है।
ऐसे बढ़ेगी योजनाओं की गति
बिजली सुधार और पुनर्संरचना के मोर्चे पर बिजली अधिनियम तथा शुल्क नीति में अनेक संशोधन करने के साथ सरकार ने राज्यों के साथ साझेदारी में सभी घरों को सातों दिन चैबीस घंटे बिजली मुहैया कराने के लिए राज्य विशेष कार्य योजनाएं तैयार की जा रही हैं। इन योजनाओं में बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन तथा वितरण शामिल होगा। विद्युत मंत्रालय ने ‘सभी के लिए बिजली’ कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न राज्य सरकारों के साथ सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इसका उद्देश्य पूरे देश को कवर करना है। सरकार कृषि तथा ग्रामीण घरेलू उपभोग के लिए अलग-अलग फीडरों के माध्यम से बिजली सप्लाई करने की 43,033 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी योजना लागू कर रही है, ताकि ग्रामीण घरों में चैबीस घंटे बिजली सुनिश्चित की जा सके। सब-ट्रांसमिशन तथा वितरण प्रणालियों को मजबूत बनाने के लिए 32,612 करोड़ रुपये की एकीकृत बिजली विकास योजना लांच की गई है। ट्रांसमिशन नुकसान में पांच प्रतिशत की कमी करने की महत्वपूर्ण योजना बनाई जा रही है। ट्रांसमिशन नुकसान 27 प्रतिशत के आस-पास रहा है। ट्रांसमिशन नुकसान में पांच प्रतिशत की कमी का अर्थ बिना किसी नये निवेश के 15 हजार मेगावाट अतिरिक्त बिजली भारत के पास उपलब्ध होना है। एक मेगावाट बिजली उत्पादन का अर्थ 5-7 करोड़ रुपये का निवेश है और नुकसान में 15,000 मेगावाट की
कटौती का अर्थ 75,000 से लेकर 1.05 लाख करोड़ रुपये तक की उपलब्धता अन्य निवेश के लिए सुनिश्चित होना है।
राज्यों में होगा नया सूर्योदय
केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने विद्युत वितरण कंपनियों के समक्ष मौजूद वित्तीय कठिनाइयों में कमी सुनिश्चित करने के लिए हाल ही में उज्ज्वल डिस्कॉम आश्वासन योजना अथवा ‘उदय’ को मंजूरी दी है। इस स्कीम का उद्देश्य विद्युत वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) पर 4.3 लाख करोड़ रुपये के कर्ज बोझ से निपटना है। इसके अतिरिक्त स्कीम में बिजली की चोरी रोकने संबंधी कदमों और बिजली उत्पादन की लागत के अनुरूप उपभोक्ता शुल्क दरें तय करने का उल्लेख किया गया है। ‘उदय’ इस क्षेत्र से जुड़े बीते एवं आने वाले समय के मुद्दों के स्थायी निदान के जरिए कुशल और बेहतरीन डिस्कॉम के उभरने का आश्वासन है। इससे डिस्कॉम को अगले 2-3 वर्षों में लाभ की स्थिति में आने का मौका मिलेगा। यह इन चार कदमों की बदौलत संभव होगा, जिसमें डिसकॉम की परिचालन क्षमता बेहतर करना, विद्युत की लागत में कमी लाना, डिस्कॉम की ब्याज लागत कम करना और राज्यों की वित्तीय व्यवस्था के साथ तालमेल के जरिए डिस्कॉम पर आर्थिक अनुशासन लागू करना शामिल है। अभी तक इस स्कीम को आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड जैसे 12 राज्यों ने ‘उदय’ से जुड़ने की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। मसलन सरकार ने उपभोक्ताओं को बिजली की अबाधित आपूर्ति करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राज्य सरकारों के साथ तालमेल करते हुए अनेक कदम उठाए हैं।

बदली भारतीय खनन उद्योग की सूरत


खनन उद्योग में हुआ सकारात्मक सुधार
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में केंद्रीय खान मंत्रालय ने राज्यों को संसाधन संपन्न करने के लिए जिस तरह के कदम उठाए हैं उसमें नये अधिनियम को लागू करने की कवायद ने भारतीय खनन उद्योग की ही सूरत बदल दी। खनन उद्योग के बदले इस निजाम की बदोलत 19 माह के राजग शासनकाल में खनन मंत्रालय द्वारा लिये गये फैसलों के खनन उद्योग में सकारात्मक सुधार तो हुआ ही है, वहीं राज्यों को प्राप्त होने वाले राजस्व में तेजी से इजाफा दर्ज करने का दावा किया जा रहा है। मसलन खनन की नीलामी मे पारदर्शिता, निष्पक्षता और स्पष्टता आने से निवेशकों का भरोसा भी बढ़ने लगा है। जिससे आने वाले दिनों में खनन उद्योग को पंख लगेंगे। राजग सरकार द्वारा लागू किये गये नये अधिनियम के तहत रॉयल्टी दर तथा अनिवार्य किराए में संशोधन के कारण अब राज्यों को मिलने वाला कुल राजस्व लगभग 9400 करोड़ रुपए से बढ़कर तकरीबन 15 हजार करोड़ से भी ज्यादा पहुंच गया है।
मोदी सरकार को मई 2014 में सत्ता संभालते ही देश में आम आदमी का अविश्वास, भ्रष्टाचार, आर्थिक बदहाली, बढ़ती बेरोजगारी और सरकारी खजाना विरासत में मिला, जिसकी चुनौतियों को स्वीकारते हुए केंद्र सरकार ने जनता में केंद्र सरकार का विश्वास हासिल ही नहीं किया, बल्कि देश के विकास और जनता की उन अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चुनौती से भी पार पाया है। केंद्रीय खान मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने अपने मंत्रालय की उपलब्धियों को जारी करते हुए कहा कि देश के सर्वांगीण विकास और कल्याणकारी योजनाओं को दिशा देना बड़ी चुनौती माना जा रहा था। सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ के सपने को साकार करने के लिए उद्योग जगत के प्रति सकारात्मक माहौल तैयार किया है। इसी मकसद से सरकार ने खान और खनिज (संशोधन) विधेयक को संसद में पारित कराकर खनन उद्योग को मजबूती मजबूत ही नहीं किया, बल्कि सख्त सजा के प्रावधान के जरिए अवैध खनन पर भी लगाम लगाई है। रोकने को सख्त सजा का प्रावधान भी किया गया है। खनन उद्योग को बुलंदियों पर ले जाने के लिए इस ट्रस्ट में मौजूदा रॉयल्टी दर पर इस निधि में प्रतिवर्ष 300 करोड़ रुपये की राशि प्राप्त होने का अनुमान है। मसलन केंद्र सरकार ने कोयला व लिग्नाइट जैसे प्रमुख खनिजों(भंडारण के लिए रेत को छोड़ कर) की रायल्टी दरों को संशोधित ऐसा प्रावधान किया है जिससे प्रमुख खनिजों की रायल्टी में वृद्धि से 100 प्रतिशत रायल्टी पाने वाली राज्य सरकारों को लाभ निलेगा। इस संशोधन से कुछ राज्यों के राजस्व उगाही में तो 45 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। यही नहीं नए अधिनियम में इस नीति को अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को पूर्वेक्षण कार्य हेतु भी अधिसूचित किया है। इसका मकसद खनन प्रभावित क्षेत्रों के लोगो के कल्याण और विकास पर पहली बार ध्यान देकर एक व्यवस्था के तहत जिला खनिज निधि की स्थापना का प्रावधान किया गया है। इस तंत्र बनाने का मकसद के जरिए खनन क्षेत्र में विशेष रूप से अनुसूचित जाति के लोगों के जीवन स्तर को मजबूत बनाना है।
नीति और विधान की राह पर चलते हुए एमएमडीआर अधिनियम-1957 में संशोधन करके देश के सामने लाये गये नए अधिनियम ने खान ब्लॉकों की नीलामी व्यवस्था को भी पारदर्शी बनाया है। इसी संशोधन के माध्यम से केंद्र सरकार द्वारा खनिज संसाधन प्रदान करने की ‘पहले आओ, पहले पाओ’ जैसी विवेकाधीन व्यवस्था के स्थान पर पारदर्शी और स्पर्धी नीलामी प्रक्रिया अपनाना शुरू किया है। इस व्यवस्था से राज्यों को खनिज संसाधनों के मूल्य में अधिक हिस्सा मिलने की प्रक्रिया शुरू हुई है, वहीं समयावधि की निश्चितता और खनिज रियायतों के सहज अंतरण को सुनिश्चित करने के लिए प्रावधानों को लागू किया गया है। खान मंत्री नरेन्द्र तोमर का दावा है कि इस नीति को लागू करने के लिए सरकार द्वारा खनिज(खनिज सामग्री साक्ष्य)नियम-2015 तथा खनिज(नीलामी) नियम-2015 के जरिए प्रासंगिक नियमों के तहत मॉडल टेंडर दस्तावेज(एमडीटी) को राज्य सरकारों को उपब्ध कराया गया है ताकि वह नीलामी शुरू कर सकें। इसके बाद राज्यों की ओर से एनआईटी जारी करना प्रारंभ कर दिया है। गुजरात ,राजस्थान तथा महाराष्ट्र ने नवंबर 2015 में एनआईटी जारी किए हैं। कर्नाटक , तथा छत्तीसगढ़ जैसे राज्य शीघ्र ही इस दिशा में कदम उठाएंगे।

शनिवार, 9 जनवरी 2016

ई-न्यायालय मिशन मोड पर केंद्र सरकार!

पहले चरण का जल्द पूरा होगा लक्ष्य
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
मोदी सरकार की ई-गवर्नेंस मिशन में देशभर के न्यायालयों को कंप्यूटरीकृत करने की दिशा में शुरू की गई ई-न्यायालय मिशन मोड परियोजना तेजी से बढ़ी है। इस परियोजना के पहले चरण का काम 95 प्रतिशत से ज्याद होने से उम्मीद है कि जल्द ही पहले चरण के लक्ष्य को हासिल कर लिया जाएगा।
केंद्र की मोदी सरकार ने देश के उच्च न्यायालयों एवं जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों के कंप्यूटरीकृत करने की दिशा ई-न्यायालय मिशन मोड परियोजना शुरू की, जिसमें ई-गवर्नेंस मिशन के तहत पहले चरण में 95.95 प्रतिशत काम होने का दावा किया है। विधि एवं न्याय मंत्रालय के अनुसार चालू वित्तीयवर्ष से पहले इस चरण के पूरा होने की उम्मीद है। इसके अलावा सरकार का लक्ष्य सुप्रीम कोर्ट एवं आईसीटी बुनियादी ढांचे को भी उन्नत बनाने का फैसला किया है। मंत्रालय के अनुसार इस योजना में 14249 वित्त पोषित और तैयार स्थलों का लक्ष्य शतप्रतिशत हासिल कर लिया गया है, जबकि इनमें से 13436 में हार्डवेयर, 13683 में एनएएन यानि स्थानीय क्षेत्र नेटवर्क की स्थापना के अलावा 13672 न्यायालय स्थलों में सॉफ्टवेयर परिनियोजन का कार्य पूरा हो चुका है। सरकार द्वारा पहले चरण में चयनित किये गये 20 उच्च न्यायलय के अंतर्गत 14249 स्थलों में सर्वाधिक 2009 इलाहाबाद उच्च न्यायलय के तहत जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय ई-गवनेंस मिशन के तहत शामिल रहे।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

देश में बनंगे सौलह ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे!

पिछड़े इलाकों को सड़क नेटवर्क से जोड़ने की तैयारी
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश को सड़कों के जाल से जोड़ने की योजना के तहत केंद्र सरकार ने दूर-दराज और पिछड़े इलाको तक सड़क नेटवर्क बनाने की दिशा में 16 ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे बनाने का निर्णय लिया है। केंद्र सरकार की इस मेगा परियोजना के खाके पर 16,680 करोड़ रुपये की लागत से ऐसे एक हजार किलोमीटर लंबे एक्सप्रेस-वे का निर्माण किया जाएगा, जिसमें प्रमुख रूप से सात गलियारे होंगे।
मोदी सरकार ने एनएचडीपी चौथे चरण के तहत डीबीएफओटी आधार पर 16,680 करोड़ रुपये की लागत से 1000 किलोमीटर एक्सप्रेसवेज का निर्माण करने की योजना को मंजूर कर दिया है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार पिछड़े इलाकों को सड़क संपर्क मार्ग से जोड़ने की दिशा में इन एक्सप्रेस-वे गलियारों में 400 किमी लंबे वडोदरा-मुम्बई गलियारे पहली प्राथमिकता में शामिल किया गया है, जिसमें 93 किलोमीटर लंबा अहमदाबाद-वडोदरा गलियारा देश के पहले एक्सप्रेस-वे के रूप में माना जाता है। सरकार ने शेष 600 किलोमीटर के चयन में यह तय किया गया है कि यातायात घनत्व के आधार पर ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे का चयन किया जा रहा है। मंत्रालय के अनुसार ये सभी ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे देश के सुदूर इलाकों और पिछड़े हुए इलाकों से होकर गुजरेंगे। इस परियोजना का मकसद है कि सड़क संपर्क बढ़ने से पिछड़े इलाकों को आर्थिक विकास की दिशा में बल मिल सके। इन सड़क परियोजनाओं के बारे में स्वयं सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का भी कहना है कि वडोदरा-मुंबई, जयपुर-अजमेर-अहमदाबाद और अमरावती-हैदराबाद-बेंगलुरू में पिछड़े इलाकों को सड़क संपर्क मार्गो से जोड़ने के लिए ये सभी 16 एक्सप्रेस-वे तैयार किए जाएंगें।
यूपीए ने भी बनाई थी परियोजना
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि हालांकि ऐसे सात ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे बनाने का ऐलान कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने वर्ष 2005 में ही कर दिया था, लेकिन ऐसी सड़क परियोजना को यूपीए अपने दूसरे कार्यकाल तक अंजाम तक पहुंचाने में कोई कदम नहीं बढ़ा सकी। ऐसी महत्वकांक्षी परियोजना की समीक्षा के बाद मोदी सरकार ने इन परियोजना को नए सिरे से आगे बढ़ाने के लिए अपनी नौ परियोजनाएं शामिल करते हुए 16 एक्सप्रेस-वे बनाने की परियोजनाओं को मंजूरी दे दी और इसके लिए अनुमानित लागत को भी स्वीकृत कर लिया गया है। मंत्रालय का कहना है कि देश के विकास के लिए राजमार्गो के संपर्क की हालत को सुधारने की दिशा में सरकार ने तेजी के साथ कदम बढ़ाने का फैसला किया है। हालांकि मंत्रालय का कहना है कि इतनी बड़ी परियोजना में भूमि अधिग्रहण और वित्तीय व्यस्था की सभी बाधाओं को दूर करने के प्रयास जारी है, लेकिन परियोजना को सरकार अंजाम तक पहुंचाएगी।
ये एक्सप्रेसवे भी रडार पर
केंद्र सरकार देश हर कोने को सड़क संपर्क मार्ग से जोड़ने वाली परियोजनाओं में पूर्वी परिधीय एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे तथा वडोदरा-मुम्बई एक्सप्रेसवे को अंतिम रूप दे चुकी है। इसी प्रकार एक्सप्रेस-वे के रडार पर नागपुर-मुंबई, जयपुर-अजमेर अहमदाबाद, नागपुर-हैदराबाद, पुणे-हैदराबाद, हैदराबाद-बैंगलुरू, अमृतसर-हैदराबाद-बैंगलुरू तथा दिल्ली-अमृतसर-जम्मू- कटरा को भी आपस में राष्टÑीय राजमार्गो से जोड़ने की योजना तैयार की जा रही है।
08Jan-2016

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

केंद्र अपने भरोसे पूरा करेगी नमामि गंगे मिशन!



केंद्र और राज्य के 75:25 अनुपात खर्च में बदलाव
अब केंद्र सरकार ही वहन करेगी पूरा खर्च
ओ.पी. पाल
. नई दिल्ली।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की महत्वकांक्षी ‘नमामि गंगे’ परियोजना को केंद्र सरकार ने अपने भरोसे शुरू कर दिया है। गंगा को अविरल और निर्मल बनाने वाली इस परियोजना की वित्तीय व्यवस्था में बदलाव करते हुए केंद्र सरकार ने पूरा खर्च अपने जिम्मे वहन करने का फैसला किया है। इससे पूवे इस परियोजयना के लिए केंद्र का 75 प्रतिशत और राज्य का 25 प्रतिशत खर्च होने की व्यवस्था थी। केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के अनुसार राज्य अपने हिस्से की 25 प्रतिशत धनराशि करने में हिचक रहे हैं जिसके कारण इस महत्वपूर्ण परियोजना में विलंब हो रहा है। सरकार नमामि गंगे परियोजना को तेजी के साथ आगे बढ़ाकर लक्ष्य हासिल करना चाहती है। ऐसी स्थिति में मंत्रालय के इस परियोजना के लिए नये ढांचागत एवं वित्तीय व्यवस्था के प्रस्ताव को बुधवार को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है, जिसमें राज्यों के खर्च करने वाली 25 प्रतिशत व्यवस्था में बदलाव करते हुए संपूर्ण खर्च केंद्र सरकार ही वहन करेगी। केंद्र सरकार को इस परियोजना को तीन चरणों में पूरा करना है।नमामि गंगे परियोजना की शुरूआत
मंत्रालय के अनुसार नमामि गंगे मिशन के रूप में इस परियोजना की शुरूआत यूपी में अनूपशहर से कर दी गई है। इससे पहले इस परियोजना में केंद्र और राज्य के बीच खर्च का बंटवारा 75:25 के अनुपात मे होने की व्यवस्था की गई थी, लेकिन बाद में इसमें बदलाव किया गया और अब शत प्रतिशत खर्च केंद्र वहन करेगा। सूत्रों के अनुसार इस परियोजना का पहलो चरण एक वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य है जिसमें गंगा नदी की अविरलता पर विशेष ध्यान दिया जायेगा। कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी में इस पहल को सबसे पहले आगे बढ़ाया जा रहा है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार नदी के किनारे स्थिति उद्योगों से निकलने वाले प्रवाह को हम 24 घंटे चलने वाले प्रदूषण निगरानी उपकरण से जोड़ने का कार्य आगे बढ़ा रहे हैं। यह नयी प्रौद्योगिकी पर आधारित है और कई तरह की श्रेणियों में हैं।

ढ़ाई दशक में देश ने झेले 136 आतंकी हमले!

खुफिया तंत्र के अलर्ट के बावजूद चुकानी पड़ी बड़ी कीमत
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
पठानकोट एयरबेस पर पाकिस्तानी आतंकी संगठन के हमले से पहले भी लगातार ढाई दशक से ज्यादा समय से भारत को एक नहीं,बल्कि 136 आतंकी हमले झेलने पड़े हैं। इन हमलों में हजारों लोगों और सुरक्षाकर्मियों को जान गंवानी पड़ी है।
भारत पर इस काली छाया में पाकिस्तान में ढाई दशकों में कई आंतकी संगठनों को पैदा किया और उनका मकसद भारत में आतंक फैलाना ही रहा है। इतने लंबे अरसे से देश में कई सरकारों ने करवट बदली और भारतीय खुफिया एजेंसियों के अलर्ट के रडार भी ऐसी काली छाया लगातार रही है। हालांकि भारतीय सेना और सुरक्षा बलों ने ज्यादातर फिदायीन आतंकी हमलों में पाकिस्तानी आतंकवादियों को ढेर तो किया है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जान-माल का नुकसान भारत को सहने के लिए मजबूर होना पड़ा है। गृह मंत्रालय के आतंकवाद को लेकर आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो पिछले 26 सालों में भारत में 136 आतंकी हमले हुए हैं, जिसमें पठानकोट एयरबेस हमला भी शामिल है। विदेश मामलों और रक्षा विशेषज्ञों का का कहना है कि एयर फोर्स स्टेशन पर पाक समर्थित आतंकवादियों के हमले से देश की सरकार को सबक लेना चाहिए कि आखिर इस ताजा हमले ने सुरक्षा को लेकर जो चिंता बढ़ाई है उसमें सुरक्षा के मुद्दे पर भारी-भरकम धनराशि खर्च करने के बावजूद देश के सुरक्षा बल, खुफिया एजेंसियां ऐसी घटनाओं को क्यों नहीं रोक पा रही हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक सरकार को राज्यों की पुलिस में अत्याधुनिक संसाधनों के साथ बेहतर से बेहतर सुधार करने की ज्यादा जरूरत है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार इन आतंकी हमलों में 14 हमले वीआईपी पर हुए हैं तो 121 हमले आम नागरिकों पर हुए जिनमें सुरक्षाकर्मियों समेत दो हजार से ज्यादा लोगों की मौतें हुई हैं और छह हजार से ज्यादा घायल हुए हैं। इन आतंकी हमलों में सबसे ज्यादा 34 हमले पंजाब में, 27 हमले जम्मू कशमीर,18 हमले दिल्ली, 13 महाराष्ट्र व यूपी नें 6 हमले झेले हैं।