गुरुवार, 16 जुलाई 2026

भारतीय उच्च शिक्षा की स्वायत्तता और केंद्रीयकरण का महासंग्राम

-विकसित भारत शिक्षा विधेयक: नियंत्रण या प्रोत्साहन? 
-नए शिक्षा विधेयक के प्रावधानों पर क्यों छिड़ी है बहस 
By-ओ.पी. पाल 
भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े और निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। 15 दिसंबर 2025 को लोकसभा में पेश किए गए 'विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025' ने देश के शैक्षणिक, राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में एक गंभीर बहस छेड़ दी है। वर्तमान में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास विचाराधीन यह विधेयक अपने अंतिम चरण में है और समिति आगामी मॉनसून सत्र में अपनी रिपोर्ट सौंपने जा रही है, जिसके साथ ही नया कानून बनने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। यह विधेयक केवल कुछ प्रशासनिक फेरबदल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आजादी के बाद से चले आ रहे उच्च शिक्षा के पूरे ढांचे को आमूल-चूल बदलने का खाका है। दशकों पुराने नियामकों-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) को समाप्त कर एक एकीकृत ‘सुपर आयोग’और उसकी तीन सहायक काउंसिलों की स्थापना का प्रस्ताव इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सरकार एक राष्ट्र, एक नियामक की नीति पर आगे बढ़ रही है। परंतु, इस ऐतिहासिक बदलाव के साथ ही जो सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा हुआ है, वह है कि क्या यह सुधार भारतीय उच्च शिक्षा को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाएगा, या यह स्वायत्तता को समाप्त कर इसे पूरी तरह से नौकरशाही और केंद्रीय नियंत्रण के पिंजरे में कैद कर देगा?
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केंद्र सरकार का 'विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025' निस्संदेह भारतीय उच्च शिक्षा के औपनिवेशिक और अप्रचलित ढांचे को बदलने का एक साहसिक प्रयास है। विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग नियामकों की भूलभुलैया को खत्म करना एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इस प्रक्रिया में 'सुधार' के नाम पर 'स्वायत्तता की बलि' चढ़ाना आत्मघाती साबित हो सकता है। इसलिए इस प्रयास में भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने के लिए नियंत्रण की नहीं, बल्कि प्रोत्साहन की आवश्यकता है। संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को अपनी अंतिम रिपोर्ट में विशेष रुप से स्वतंत्र अपीलीय न्यायाधिकरण को लेकर सरकार को अपीलीय शक्ति अपने हाथ में रखने के बजाय 'उच्च शिक्षा अपीलीय न्यायाधिकरण' का गठन करने की सिफारिश करना अनिवार्य है, जिसका नेतृत्व उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश करें। इसी प्रकार आईंआईटी और आईआईएम जैसे 'राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों' के लिए इस कानून में एक विशेष उपबंध होना चाहिए, ताकि उनकी वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता और अकादमिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहे। इसके अलावा फंडिंग के लिए पारदर्शी बोर्ड को लेकर शिक्षा मंत्रालय द्वारा सीधे फंडिंग के बजाय एक स्वायत्त 'हायर एजुकेशन ग्रांट्स कमेटी' का गठन करना चाहिए, जो पूरी तरह गैर-राजनीतिक और अकादमिक विशेषज्ञों से सुसज्जित हो। यदि सरकार इन सुझावों को समाहित कर एक संतुलित कानून लाती है, तभी यह विधेयक सही मायनों में 'विकसित भारत' की नींव रख पाएगा। अन्यथा, अत्यधिक केंद्रीयकरण और नौकरशाही के बोझ तले दबकर हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था अपनी बची-खुची रचनात्मकता भी खो देगी। 

एक सुपर आयोग और तीन काउंसिल 
इस प्रस्तावित कानून के तहत मौजूदा विखंडित नियामक व्यवस्था को समाप्त कर एक एकल महा-आयोग स्थापित किया जाएगा। इस आयोग के अधिकार क्षेत्र में सामान्य उच्च शिक्षा के अलावा तकनीकी शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण और आर्किटेक्चर शिक्षा को लाया गया है। विधेयक के प्रावधानों के अनुसार केवल चिकित्सा और कानूनी पाठ्यक्रमों को इसकी सीमा से बाहर रखा गया है। इस महा-आयोग के सुचारु संचालन के लिए तीन विशिष्ट काउंसिलों का गठन किया जाएगा, जो कार्यात्मक रूप से स्वतंत्र होंगी। इनमें रेगुलेटरी काउंसिल (नियामक परिषद), जो नए संस्थानों की स्थापना और उनके संचालन के लिए न्यूनतम भौतिक व शैक्षणिक मानकों का अनुपालन सुनिश्चित कराने और छात्रों व संस्थानों की शिकायतों के निवारण के लिए प्राथमिक निकाय होगी। दूसरी स्टैंडर्ड्स काउंसिल (मानक परिषद), जिसका मुख्य कार्य पाठ्यक्रमों के लिए 'लर्निंग आउटकम' (सीखने के परिणाम) तय करना और अकादमिक मानकों का निर्धारण करना होगा ताकि देश के सभी विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता में एकरूपता लाई जा सके। तीसरी वर्तमान में 'नैक' (एनएएसी) की व्यवस्था का स्थान पर एक्रेडिटेशन काउंसिल (प्रत्यायन परिषद) होगी, जो काउंसिल संस्थानों की ग्रेडिंग, रैंकिंग और मान्यता के लिए एक नया व पारदर्शी 'एक्रेडिटेशन फ्रेमवर्क' तैयार करेगी। हालांकि प्रसिद्ध नीति विश्लेषक संस्था 'पीआरएस' द्वारा इस विधेयक के प्रावधानों के विश्लेषण पर नजर ड़ाले, तो इस बिल के कई विरोधाभासों को रेखांकित किया गया है। खासतौर से नई शिक्षा नीति-2020 में एक ऐसे 'अंब्रेला रेगुलेटर' का खाका खींचा गया था, जिसमें रेगुलेशन, एक्रेडिटेशन, फंडिंग और एकेडमिक मानक तय करने के लिए चार स्वतंत्र वर्टिकल होने थे। लेकिन, इस नए बिल में 'फंडिंग' के महत्वपूर्ण हिस्से को आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया गया है। केंद्र से फंड पाने वाले संस्थानों को अब ग्रांट सीधे केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के जरिए दी जाएगी, जो एनईपी के मूल ढांचे से अलग है। 

वैश्विक स्तर के संस्थानों स्वायत्तता का संकट? 
आईआईटी और आईआईएम जैसे शीर्ष संस्थानों पर संकट भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और भारतीय प्रबंधन संस्थान भारत के ऐसे मुकुट रत्न हैं जिनकी वैश्विक साख उनकी शैक्षणिक और प्रशासनिक स्वतंत्रता के कारण है। ये संस्थान 'संसद के विशेष अधिनियमों' के तहत स्थापित 'राष्ट्रीय महत्व के संस्थान' हैं, जिन्हें अपनी प्रवेश परीक्षा आयोजित करने, पाठ्यक्रम तय करने और फीस निर्धारित करने की खुली आजादी रही है। लेकिन नया विधेयक इन संस्थानों की इस विशिष्ट स्वायत्तता पर सीधा प्रहार करता प्रतीत होता है। सुपर आयोग के सीधे नियंत्रण में आना अब तक अपनी स्वायत्त शासी बोर्ड ऑफ गवर्नर्स द्वारा संचालित होने वाले आईआईटी और आईआईएम भी सीधे इस नए आयोग के विनियामक दायरे में आ जाएंगे। यदि इन वैश्विक स्तर के संस्थानों को भी सामान्य विश्वविद्यालयों की तरह एक ही लाठी से हांका गया, तो इनकी निर्णय लेने की गति धीमी हो जाएगी। वैश्विक शोध और नवाचार के लिए जिस त्वरित और लचीली प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता होती है, वह नौकरशाही के जटिल नियमों में उलझकर रह जाएगी। गौरतलब है कि वर्ष 2018 में यूजीसी ने उच्च श्रेणी के विश्वविद्यालयों को बिना पूर्व अनुमति के देश-विदेश में 'ऑफ-कैंपस' या सैटेलाइट सेंटर खोलने की स्वतंत्रता दी थी। इसका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का विस्तार करना था। लेकिन इस नए विधेयक में किसी भी ऑफ-कैंपस सेंटर को खोलने के लिए रेगुलेटरी काउंसिल की 'पूर्व मंजूरी' को अनिवार्य बनाने का प्रावधान है। यह प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को वापस पलटने जैसा है। न्यायिक शून्यता और अपीलीय व्यवस्था में सरकार का एकाधिकार इस विधेयक का सबसे विवादित और चिंताजनक पहलू इसकी अपीलीय संरचना है। एक स्वस्थ लोकतंत्र और निष्पक्ष विनियामक व्यवस्था में 'चेक्स एंड बैलेंसेज' (नियंत्रण और संतुलन) का होना अनिवार्य है। 

विधेयक को लेकर तर्क-वितर्क 
संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने इस विधेयक का अध्ययन किया है और अब तक 20 से अधिक बैठकों के बाद अपनी रिपोर्ट 20 जुलाई से शुर हो रहे संसद के मानसून सत्र के दौरान अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश करने वाली है। शिक्षाविदों और विपक्ष के बीच इस बात को लेकर गंभीर चिंताएं हैं कि यह विधेयक उच्च शिक्षा पर सरकारी नियंत्रण को अत्यधिक बढ़ा देगा। इस विधेयक के समर्थकों का तर्क है कि सीधे मंत्रालय द्वारा फंडिंग से लालफीताशाही कम होगी और बजटीय आवंटन त्वरित गति से सीधे संस्थानों तक पहुंचेगा। जबकि आलोचकों और शिक्षाविदों का मानना है कि फंडिंग का सीधे मंत्रालय के हाथ में जाना शैक्षणिक संस्थानों की रीढ़ तोड़ने जैसा है। जब कोई राजनीतिक या प्रशासनिक विंग सीधे वित्तीय कमान संभालेगा, तो अनुदानों का राजनीतिकरण होने का खतरा बढ़ जाएगा। जो संस्थान सरकार की नीतियों या विचारधारा के अनुकूल नहीं होंगे, उनकी फंडिंग को रोकना या प्रभावित करना आसान हो जाएगा। यह कदम नियामक की निष्पक्षता को भी कमजोर करता है। -16July-2026

बुधवार, 8 जुलाई 2026

वोकल फॉर लोकल: भारतीय हस्तशिल्प उद्योग की डिजिटल छलांग, भारतीय विरासत, डिजिटल सियासत 
BY-ओ.पी. पाल 
भारत की धरती केवल विविधताओं का देश नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी कला, संस्कृति और शिल्प कौशल का एक जीवंत कोलाज भी है। कश्मीर के पहाड़ों में बुनी जाने वाली पश्मीना शॉल से लेकर दक्षिण के तटीय इलाकों में पहने जाने वाले मुंडू वस्त्रों तक, और बनारस की गलियों में खटकती हथकरघा मशीनों से लेकर मध्य प्रदेश के चंदेरी सिल्क तक यानी भारत का हर कोना अपनी एक विशिष्ट कलात्मक पहचान रखता है। लेकिन, इस बदलते आधुनिक युग में आधुनिक, गतिशील और डिजिटल होते जा रहे बाज़ार में इन पारंपरिक शिल्पों के सामने अपनी जगह बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती थी। इसी चुनौती को अवसर में बदलने और भारत के ग्रामीण व दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लाखों कारीगरों को आधुनिक अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए 'इंडियाहैंडमेड' डिजिटल प्लेटफॉर्म की शुरुआत की गई, जो आज भारत की समृद्ध हथकरघा और हस्तशिल्प परंपराओं के लिए एक मजबूत 'डिजिटल इंडिया ब्रिज' बन चुका है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर देश के आर्थिक सशक्तिकरण की एक नई पटकथा भी लिख रहा है। साल 2023 में लॉन्च हुआ यह मंच भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के तहत डिजिटल इंडिया कॉर्पोरेशन द्वारा विकसित यह समर्पित ई-कॉमर्स पोर्टल है, जो हमारी पारंपरिक विरासत को संरक्षित कर रहा है। 'इंडियाहैंडमेड' न केवल भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित कर रहा है, बल्कि करीब 65 लाख शिल्पी कारीगरों को व्यापक बाजार देकर 'आत्मनिर्भर भारत' और 'डिजिटल इंडिया' के विजन को भी मजबूत कर रहा है। 
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देश की शिल्प विरासत को वैश्विक पहचान दिलाते इस क्रांतिकारी डिजिटल ‘इंडिया हैंडमेड’ पोर्टल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'आत्मनिर्भर भारत' और 'वोकल फॉर लोकल' के नारे को धरातल पर सच करता नजर आ रहा है। यह मंच केवल एक आर्थिक लेन-देन की जगह नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का भी एक मजबूत उपकरण है। जब दुनिया के किसी दूसरे कोने में बैठा व्यक्ति इस पोर्टल से कोई हस्तनिर्मित वस्तु खरीदता है, तो वह केवल एक उत्पाद नहीं खरीद रहा होता, बल्कि वह उस भारतीय कारीगर की उंगलियों के जादू, उसकी पीढ़ियों की विरासत और भारत की मिट्टी की कहानी को अपने घर ले जा रहा होता है। जैसे-जैसे हम डिजिटल युग में आगे बढ़ रहे हैं, इंडियाहैंडमेड यह सुनिश्चित कर रहा है कि हमारी प्राचीन कलाएं और तकनीकें पीछे न छूट जाएं। यह मंच आधुनिकतम ई-कॉमर्स तकनीक और प्राचीनतम मानवीय कौशलों का एक अद्भुत और सफल संगम है। यह हमारे बुनकरों और शिल्पकारों को केवल जीवित रहने का साधन नहीं दे रहा, बल्कि उन्हें सम्मान, वैश्विक पहचान और समृद्धि का एक नया आसमान दे रहा है। इंडियाहैंडमेड के माध्यम से भारत की यह अनमोल विरासत न केवल सुरक्षित है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए निरंतर आजीविका, नवाचार और गौरव का एक शाश्वत स्रोत बनकर चमक रही है। प्रत्येक भारतीय और वैश्विक नागरिक के लिए, इस मंच से जुड़ना भारत की आत्मा और उसकी कलात्मक धड़कन से जुड़ने जैसा है। 

आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण का अनूठा मॉडल 
भारत का हथकरघा और हस्तशिल्प क्षेत्र, कृषि के बाद देश में रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है। वस्त्र मंत्रालय के वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 64.66 लाख हथकरघा और हस्तशिल्प कारीगर हैं। मसलन देश में 71 प्रतिशत हथकरघा बुनकरों में 64 प्रतिशत महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी इस क्षेत्र की सबसे खूबसूरत और मजबूत सामाजिक संरचना है। यानी जब एक ग्रामीण महिला बुनकर के बनाए उत्पाद को वैश्विक मंच मिलता है, तो वह न केवल आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती है, बल्कि अपने पूरे परिवार और समुदाय की सामाजिक स्थिति को भी बदल देती है। यही एक सशक्तिकरण और समावेशी विकास का एक सबसे बड़ा माध्यम है। यह एक ऐसा ई-कॉमर्स पोर्टल है जो पूरी तरह से 'मेड इन इंडिया' और 'हैंडमेड' (हाथ से बने) उत्पादों के लिए समर्पित है। यहाँ मशीनी या कृत्रिम रूप से तैयार उत्पादों की कोई जगह नहीं है, जिससे हस्तनिर्मित कला की शुद्धता और प्रामाणिकता बनी रहती है। इंडियाहैंडमेड के माध्यम से अब कारीगर सीधे देश-विदेश के खरीदारों से जुड़ते हैं, जिससे उन्हें अपनी मेहनत का उचित और पारदर्शी मुआवजा मिलता है। एक छोटे से गांव में रहने वाले हुनरमंद शिल्पकार के पास पहले केवल स्थानीय मेलों या हाट-बाजारों तक ही पहुंच होती थी। लेकिन इस डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से, उनके उत्पादों को एक क्लिक पर करोड़ों ग्राहकों के सामने प्रदर्शित किया जाता है, जिससे उनकी बाजार सीमाएं असीमित हो गई हैं। 

क्षेत्रीय शिल्पों को अंतरराष्ट्रीय पहचान 
इंडियाहैंडमेड की एक सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह रोजमर्रा के उत्पादों के साथ-साथ भारत की विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान वाले शिल्पों को एक वीआईपी स्थान देता है। इसके तहत दो प्रमुख सरकारी पहलों को इस मंच पर विशेष रूप से एकीकृत किया गया है, जिसमें जीआई-टैग और ओडीओपी शामिल है। जीआई-टैग किसी उत्पाद की उस विशिष्ट गुणवत्ता, प्रतिष्ठा और विशेषताओं को प्रमाणित करता है जो मुख्य रूप से उसके भौगोलिक उद्गम के कारण होती हैं। इंडियाहैंडमेड पर खरीदार देश के कोने-कोने के प्रामाणिक जीआई उत्पादों को खरीद सकते हैं। इनमें उत्तराखंड की ऐपन कला, कश्मीर की सबसे नरम और बेशकीमती शुद्ध पश्मीना शॉल, केरल के पारंपरिक सूती वस्त्रों में शुमार मुंडू उत्पाद, यूपी के वाराणसी रेशमी बुनाई के लिए विश्व प्रसिद्ध बनारसी साड़ी (सिल्क उत्पाद), व गोरखपुर व अन्य क्षेत्र के मिट्टी से बनी जीवंत मूर्तियां और घरेलू सजावट के सामान टेराकोटा उत्पाद, मध्य प्रदेश की चंदेरी सिल्क, पश्चिम बंगाल की बारीक सूती बुनाई और हाथ से तैयार तंगेल साड़ी और झारखंड/बिहार के प्राकृतिक सुनहरे रंग और अनूठे टेक्सचर जैसे उत्पाद भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना ‘एक जिला एक उत्पाद’ का हिस्सा बन चुके हैं। 

छोटे विक्रेताओं के लिए 'समावेशी नीतियां' 
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कई ऐसे अत्यंत कुशल कारीगर हैं जो बहुत छोटे स्तर पर काम करते हैं और उनके पास जीएसटी पंजीकरण नहीं होता। डिजिटल व्यापार में उनके प्रवेश को आसान बनाने के लिए इंडियाहैंडमेड ने एक बेहद प्रगतिशील नियम लागू किया है। वहीं विशेष नामांकन आईडी सुविधा के तहत छोटे कारीगर या बुनकर जीएसटी पंजीकृत से छूट दी गई है। वे एक साधारण नामांकन आईडी के साथ खुद को इस पोर्टल पर पंजीकृत कर सकते हैं। इसके तहत उन्हें अपने गृह राज्य के भीतर ऑनलाइन सामान बेचने की अनुमति मिलती है। यह कदम देश के सबसे निचले स्तर पर बैठे शिल्पकार को भी डिजिटल कॉमर्स की ताकत से जोड़ता है। 

डिजिटल क्रांति की प्रेरक कहानियां 
देश में इंडियाहैंडमेड जैसे इस मंच के माध्यम से कई शिल्प समूहों और सूक्ष्म उद्यमों की किस्मत बदली है, जो किसी प्रेरक कहानियों से कम नहीं हैं। एक नजर में देखा जाए तो जहां सैंटर्म्स जैसी पहल के तहत लकड़ी की सुंदर नक्काशीदार सजावट, सुगंधित मोमबत्तियां, कलात्मक टेराकोटा दीये, संगमरमर की मूर्तियां और शानदार हथकरघा साड़ियां जैसी हस्तनिर्मित शिल्पों की गर्माहट को हमारे रोजमर्रा के आधुनिक जीवन का हिस्सा बना रही है। इसी प्रकार बांस और बेंत को नया जीवन देने की दिशा में खासतौर से उत्तर-पूर्व और भारत के विभिन्न हिस्सों में बांस और बेंत के काम की एक समृद्ध परंपरा रही है। 'दस्तकार क्राफ्ट' इस मंच के जरिए 500 से अधिक स्थानीय कारीगरों के हुनर को सीधे वैश्विक बाजार में ले आया है। इसके अलावा विलेज क्राफ्ट को आगे बढ़ा रहे कुशल कारीगरों द्वारा बेहद प्यार और सावधानी से बनाए गए सूती तौलिए, पारंपरिक गमछे और आरामदायक बेडशीट इस बात का प्रमाण हैं कि हमारी विरासत केवल खास मौकों पर सजाने के लिए नहीं, बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन को आराम और गुणवत्ता देने के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है। 
-08July-2026

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

भारतीय रेल यात्री 64 करोड़ के पार, वंदे भारत व अमृत भारत ट्रेनो ने पकडी रफ्तार

-वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 419 मिलियन टन माल ढुलाई का रिकॉर्ड, माल ढुलाई में भी शानदार प्रदर्शन 
BY-ओ.पी.पाल 
नई दिल्ली। भारतीय रेल ने देश के 'विकास इंजन' के रूप में अपनी भूमिका को और मजबूत करते हुए जून 2026 के दौरान बेहतरीन परिचालन प्रदर्शन जारी रखा है। रेलवे ने माल ढुलाई (फ्रेट) और यात्री सेवाओं दोनों ही मोर्चों पर मजबूत और स्थिर वृद्धि दर्ज की है। यह बढ़ोतरी न केवल देश की आर्थिक गतिविधियों में तेजी को दर्शाती है, बल्कि यात्रियों को सुगम और आधुनिक यात्रा अनुभव देने की रेलवे की प्रतिबद्धता को भी प्रमाणित करती है। 

यात्री यातायात में उछाल:करीब 64 करोड़ लोगों ने किया सफर 
रेल मंत्रालय के अनुसार, भारतीय रेलवे में माल ढुलाई के साथ-साथ यात्री यातायात में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। जून 2026 में कुल 63.81 करोड़ यात्रियों ने भारतीय रेल से सफर किया, जबकि पिछले साल यह संख्या 62.37 करोड़ थी।

कुल यात्री: 63.81 करोड़ 
गैर-उपनगरीय यात्री : 30.04 करोड़ (3.9% वृद्धि) 
उपनगरीय यात्री: 33.77 करोड़ (0.9% वृद्धि) 
लंबी और अल्प दूरी की यात्रा (गैर-उपनगरीय) : यात्रियों की संख्या 3.9 प्रतिशत बढ़कर 28.90 करोड़ से 30.04 करोड़ हो गई। 
लोकल ट्रेनें (उपनगरीय क्षेत्र) : यात्रियों की संख्या 0.9 प्रतिशत की बढ़त के साथ 33.77 करोड़ तक पहुंच गई।

पटरियों पर उतरीं नई वंदे भारत और अमृत भारत 
भारतीय रेल यात्रियों को सुरक्षित, विश्वसनीय और किफायती सफर देने के लिए अपनी प्रीमियम सेवाओं का लगातार आधुनिकीकरण कर रही है। देश में वंदे भारत ट्रेनों की संख्या अब बढ़कर 164 हो गई है, जिसमें हाल ही में शुरू की गई हावड़ा और कामाख्या के बीच की 'वंदे भारत स्लीपर सेवा' प्रमुख है। वहीं, आम लोगों के लिए बेहद किफायती और आधुनिक मानी जाने वाली अमृत भारत ट्रेनों की संख्या भी 72 तक पहुंच गई है, जिसमें जून महीने में ही 4 नई ट्रेनें शामिल की गई हैं। निरंतर क्षमता विस्तार और ग्राहक-केंद्रित नीतियों के दम पर भारतीय रेल देश के आर्थिक विकास को नई ऊंचाई देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध नजर आ रही है। 

माल ढुलाई से ₹430 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व 
रेल मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, भारतीय रेल ने जून 2026 में 142.21 मिलियन टन माल ढुलाई की, जो पिछले वर्ष के इसी महीने (136.71 मिलियन टन) की तुलना में 4 प्रतिशत अधिक है। माल परिवहन में आई इस तेजी से रेलवे को लगभग ₹430 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हुआ है, जो जून 2025 के मुकाबले 3 प्रतिशत की वृद्धि दिखाता है। 

एक नजर में रेलवे का जून 2026 प्रदर्शन 
माल ढुलाई : 1422.1 लाख टन (4% वृद्धि) 
अतिरिक्त माल: 55 लाख टन 
ऊर्जा संयंत्रों को कोयला आपूर्ति : 7% अधिक 
सबसे अधिक बढ़ोतरी : उर्वरकों की ढुलाई में 19.1% 
लौह अयस्क (Iron Ore) : 9.4 प्रतिशत की तेजी 
अन्य वस्तुएं : 17.3 प्रतिशत की बढ़त 

सीमेंट कच्चा माल: 7.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी 
यह मजबूत प्रदर्शन केवल जून महीने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भी निरंतर वृद्धि देखी गई। रेलवे ने इस तिमाही में 419.08 मिलियन टन माल की ढुलाई की, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के 413.05 मिलियन टन के आंकड़े को पार कर गई है। 

घरेलू कोयला ढुलाई को तेज 
इसके अलावा, भीषण गर्मी के मौसम में देश के ताप विद्युत संयंत्रों की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए रेलवे ने घरेलू कोयला ढुलाई को तेज किया। जून 2026 में बिजली संयंत्रों को पिछले साल के मुकाबले 7 प्रतिशत अधिक कोयले की आपूर्ति की गई, जिससे देश भर में निर्बाध बिजली उत्पादन सुनिश्चित हो सका।
03July-2026

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

गांव की लोकतांत्रिक आत्मा: क्या कागजों पर सिमट रही हैं ग्राम सभाएं?

जमीनी लोकतंत्र का गिरता ग्राफ: सर्वे रिपोर्ट के झकझोरने वाले आंकड़े 
By-ओ.पी. पाल 
भारतीय लोकतंत्र का जमीनी आधार और भारत की आत्मा गांवों में बसती है, और उन गांवों की लोकतांत्रिक आत्मा 'ग्राम सभा' में निहित है। भारतीय संविधान के 73वें संशोधन ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देकर सत्ता के विकेंद्रीकरण की जो नींव रखी थी, उसकी सबसे महत्वपूर्ण और प्रत्यक्ष इकाई ग्राम सभा ही है। ग्राम सभा केवल स्थानीय शासन की एक संस्था नहीं है, बल्कि यह देश के हर ग्रामीण नागरिक को सीधे नीति-निर्माण, बजट निर्धारण और विकास कार्यों की निगरानी का अधिकार देने वाला एक सशक्त मंच है। परंतु समय के साथ इस बुनियादी लोकतांत्रिक संस्था की कार्यप्रणाली में कई विसंगतियां और चुनौतियां सामने आई हैं। इनमें सबसे बड़ी और चिंताजनक चुनौती यही है कि आज के इस तकनीकी युग के बावजूद ग्राम सभा की बैठकों में आम नागरिकों की भागीदारी घट रही है। मसलन, केंद्र सरकार और नीति आयोग की जारी ताजा रिपोर्ट ने जमीनी लोकतंत्र की बुनियाद मजबूत करने की चुनौती खड़ी कर दी है। हालांकि यह अध्ययन भारत की ग्रामीण विकास नीतियों को 'संख्या-केंद्रित' से 'परिणाम-केंद्रित' बनाने का एक बेहद सटीक मार्गदर्शक दस्तावेज साबित हो सकता है। 

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रअसल देश में जमीनी लोकतंत्र की इसी गंभीर समस्या का बारीकी से अध्ययन करने और इसका समाधान खोजने के लिए केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय के तत्वावधान में एक व्यापक राष्ट्रीय अध्ययन कराया गया। राष्ट्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज संस्थान, हैदराबाद द्वारा तैयार की गई यह द्वि-खंडीय रिपोर्ट देश में नागरिक-केंद्रित शासन को सुदृढ़ करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और साक्ष्य-आधारित दस्तावेज़ है। खासबात है कि इस अध्ययन दायरा और सांख्यिकी के हिसाब से भारत के ग्रामीण नीति-निर्माण के इतिहास में सबसे व्यापक और विशाल क्षेत्र-आधारित आकलनों में से एक है। देश की ग्राम सभाओं को लेकर यह राष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट भारत के ग्रामीण स्वशासन के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ है। जैसा कि रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है, कि नागरिक-केंद्रित शासन देने के लिए जीवंत ग्राम सभाएँ अनिवार्य हैं। जब तक देश के गांवों का अंतिम व्यक्ति ग्राम सभा की बैठक में बैठकर अपने गांव के भविष्य का फैसला करने में सक्षम और उत्सुक नहीं होगा, तब तक लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का सपना अधूरा रहेगा। पंचायती राज मंत्रालय और नीति आयोग का यह संयुक्त प्रयास साक्ष्य-आधारित नीतियों के माध्यम से देश की जमीनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को एक नई ऊर्जा, समावेशन और शक्ति प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र सरकार देश के हर नागरिक को सशक्त बनाने और नीतियों के केंद्र में 'नागरिक' को रखने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने ग्राम सभा को जमीनी लोकतंत्र की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति करार देकर ग्रामीण ढांचागत और संस्थागत व्यवस्था की नीवं मजबूती देने की पहल की है। 

देश का सबसे बड़ा सर्वे: 26 राज्यों और 7,800 लोगों से संवाद 
इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता और इसकी साक्ष्य-आधारित प्रकृति को समझने के लिए इसके सांख्यिकीय दायरे को समझना आवश्यक है। इस रिपोर्ट में संस्थान के सह-अध्यापक डॉ. अंजन कुमार भांजा द्वारा प्रस्तुत किए गए निष्कर्षों पर गौर की जाए, तो यह देश के सबसे बड़े क्षेत्र-आधारित अध्ययनों में से एक है। इस शोध के दायरे में देश के 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 213 जिलों को शामिल किया गया। टीम ने लगभग 400 ग्राम पंचायतों (जिनमें पेसा 'PESA' क्षेत्र और महिला-हितैषी पंचायतें भी शामिल हैं) का दौरा कर 7,800 उत्तरदाताओं से सीधा संवाद किया, जिसके बाद यह साक्ष्य-आधारित द्वि-खंडीय रिपोर्ट तैयार की गई। इसमें 10 राज्यों की उन 'बेस्ट प्रैक्टिसेज' (सर्वोत्तम प्रयोगों) को भी शामिल किया गया है, जिन्होंने अपने यहाँ भागीदारी बढ़ाने में सफलता पाई है। है। इस अध्ययन रिपोर्ट को 30 जून 2026 को नई दिल्ली में नीति आयोग के सदस्य डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम और पंचायती राज मंत्रालय के सचिव विवेक भारद्वाज द्वारा इस जारी किया, जिसमें जमीनी लोकतंत्र की कमजोर होती नीवं और उसकी चुनौतियों को लेकर चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। 

आंकड़ो की नजर में अध्ययन रिपोर्ट 
अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार भागीदारी में सबसे बड़ी बाधाएं ग्राम सभाओं में लोगों का न आना केवल उदासीनता नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरे सामाजिक-आर्थिक और व्यावहारिक कारण हैं। इसमें आजीविका और समय के संकट के कारण 55.5 प्रतिशत भागीदारी न होने का सबसे बड़ा कारण है, इसमें ग्रामीण आबादी का एक बड़ा हिस्सा दैनिक मजदूरी या कृषि पर निर्भर है। जबकि व्यस्त कार्य दिनचर्या (41.74 प्रतिशत) और कृषि कार्यों की व्यस्तता (30.26प्रतिशत) के कारण लोग अपनी दिहाड़ी छोड़कर बैठकों में नहीं आ पाते। इसके अलावा कम प्रतिनिधित्व वाले समूह को लेकर खुलासा हुआ है कि प्रवासी परिवार (17.61 प्रतिशत), युवा (16.73 प्रतिशत), बुजुर्ग (15.80 प्रतिशत) और महिलाएं (13.40 प्रतिशत) ग्राम सभा की प्रक्रियाओं में सबसे कम शामिल हो पाते हैं। यही नहीं इसके अलावा 45.46 प्रतिशत चर्चा के विषयों का प्रासंगिक न होना और 42.0 प्रतिशत हर बार एक जैसी उबाऊ और दोहराव वाली चर्चाएं भी इस व्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं। जबकि 33.4 प्रतिशत प्रशासन और व्यवस्था के प्रति अविश्वास, 32.7 प्रतिशत राजनीतिक हस्तक्षेप और 27.9 प्रतिशत स्थानीय गुटबाजी के साथ 16.2 प्रतिशत शिकायतों के निवारण की कमजोर व्यवस्था भी बड़ा कारण माना गया है। 

हाशिए पर मौजूद समुदायों, महिलाओं और युवाओं पर रहेगा विशेष फोकस 
पंचायती राज मंत्रालय के सचिव विवेक भारद्वाज का कथन है कि ग्रामीण भारत में आए बदलावों को रेखांकित करते हुए कहा कि पिछले एक दशक में गांवों तक बुनियादी सुविधाओं की सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित हुई है। अब बारी जमीनी लोकतंत्र को और गहरा करने की है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि यह अध्ययन महिलाओं, युवाओं और हाशिए पर रहने वाले समुदायों की भागीदारी बढ़ाने के लिए रणनीतिक कदम उठाने में मील का पत्थर साबित होगा। मंत्रालय जल्द ही राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ मिलकर इस रिपोर्ट की सिफारिशों को जमीन पर लागू करेगा, ताकि देश की ग्राम सभाएं अधिक समावेशी और परिणामोन्मुख बन सकें। इस अध्ध्यन रिपोर्ट से एक बड़ा संदेश यह भी मिलता है कि ग्राम सभाओं को सफल बनाने का पैमाना केवल 'बैठक में जुटी भीड़' या 'हाजिरी रजिस्टर' नहीं होना चाहिए। वास्तविक सफलता इस बात में है कि चर्चाएं कितनी प्रासंगिक हैं, निर्णय कितने पारदर्शी हैं और शिकायतों का निवारण कितनी तेजी से होता है। जब तक ग्रामीण नागरिकों को ग्राम सभा के निर्णयों का जमीन पर वास्तविक असर नहीं दिखेगा, तब तक उनका भरोसा जीतना नामुमकिन है। 

विशेष और विषय-आधारित ग्राम सभाएं 
अध्ययन में सुझाव दिए गये हैं कि महिलाओं के मुद्दों के लिए 'महिला ग्राम सभा' और बच्चों व युवाओं के लिए 'बाल सभा' जैसे मंचों का नियमित आयोजन होना चाहिए, जिनकी सिफारिशों को मुख्य ग्राम सभा के एजेंडे में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। ग्राम सभा को विकास कार्यों के सोशल ऑडिट का वास्तविक अधिकार मिलना चाहिए। जब लोगों को दिखेगा कि उनके द्वारा किए गए ऑडिट से भ्रष्टाचार पर रोक लग रही है और काम की गुणवत्ता सुधर रही है, तो उनकी भागीदारी स्वतः बढ़ेगी। पंचायत प्रतिनिधियों (विशेषकर महिला सरपंचों और वार्ड सदस्यों) के साथ-साथ आम नागरिकों के लिए भी क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए ताकि वे ग्राम सभा की प्रक्रियाओं को बेहतर समझ सकें। 
02July-2026

शनिवार, 27 जून 2026

प्रशासनिक शुचिता पर सवाल: क्या सचमुच बदला गया यूपी लोक सेवा आयोग का ढांचा?

आचार संहिता के बीच नियुक्ति: संस्थागत भ्रष्टाचार या विशेषाधिकार? 
 By-ओ.पी. पाल 
लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधायिका की शुचिता और प्रशासनिक पारदर्शिता उसके सबसे मजबूत स्तंभ होते हैं। लोकतंत्र के स्तंभ तब सबसे ज्यादा डगमगाते हैं, जब जनसेवा और कानून व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने वाली संस्थाओं पर ही भ्रष्टाचार और विधिक उल्लंघन के गंभीर आरोप लगते हैं। पिछले दिनो ही उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव के खिलाफ प्रयागराज में दी गई एक ताजा विधिक शिकायत ने एक बार फिर प्रशासनिक नियुक्तियों, शक्तियों के हस्तांतरण और चुनावी आचार संहिता के अनुपालन पर गंभीर बहस छेड़ दी है और इस एक शिकायत ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। एक अधिवक्ता द्वारा दी गई इस तहरीर ने न केवल चयन प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि 'संस्थागत भ्रष्टाचार' की ओर भी इशारा किया है। वहीं दूसरी ओर इस पूरे मामले के विधिक और प्रशासनिक पहलुओं को भी सामने लाकर खड़ा करने का दावा किया गया है। 

विवाद की जड़: शक्तियों का 'असंवैधानिक' हस्तांतरण? 
रअसल,इस मामले की शुरुआत साल 2011 से जुड़ी है। शिकायत के अनुसार, 11 जनवरी 2011 को तत्कालीन प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य एवं विधानसभा) द्वारा एक अधिसूचना जारी की गई थी। आरोप है कि इस अधिसूचना के जरिए उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) जैसी संवैधानिक संस्था के अधिकारों को छीनकर विधानसभा की एक आंतरिक 'चयन समिति' को सौंप दिया गया। यद्यपि इस प्रक्रिया में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 187(3) का हवाला दिया गया था, लेकिन आरोप है कि इसके वास्तविक संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी की गई। यह शक्तियों का विकेंद्रीकरण नहीं, बल्कि कथित तौर पर एक ऐसा ढांचा तैयार करना था जिसके जरिए नियुक्तियों पर मनमाना नियंत्रण पाया जा सके। इसके बाद हुई समीक्षा अधिकारी (आरओ) और सहायक समीक्षा अधिकारी (एआरओ) की भर्तियां लगातार विवादों के घेरे में रहीं, यहाँ तक कि उच्च न्यायालय को इसमें सीबीआई जांच तक के आदेश देने पड़े। 

आचार संहिता का उल्लंघन? 
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू दिसंबर 2011 से मार्च 2012 के बीच का है। उत्तर प्रदेश में उस वक्त विधानसभा चुनावों के मद्देनजर आदर्श आचार संहिता लागू थी। नियमतः इस अवधि में किसी भी प्रकार की नई नियुक्ति या स्थानांतरण पर पूर्ण प्रतिबंध होता है। परंतु, शिकायत में लगाए गए आरोपों के मुताबिक जनवरी 2012 में बिना किसी पूर्व रिक्ति के और बिना लोक सेवा आयोग के परामर्श के विज्ञापन जारी किया गया। 6 मार्च 2012 को, जब मतगणना चल रही थी, प्रदीप कुमार दुबे को विधानसभा का प्रमुख सचिव नियुक्त कर दिया गया। सबसे गंभीर विसंगति यह सामने आती है कि तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर उस दिन लखनऊ में नहीं, बल्कि आजमगढ़ के दीदारगंज क्षेत्र में अपनी मतगणना में व्यस्त थे। ऐसे में उनकी भौतिक अनुपस्थिति के बावजूद उनकी 'उपस्थिति और संस्तुति' दिखाना सीधे तौर पर दस्तावेजों की कूटरचना की ओर संकेत करता है। 

प्रशासनिक एवं विधिक बचाव का दृष्टिकोण 
इस प्रकार के मामलों में यदि प्रशासनिक परंपराओं, नियमों और आरोपित पक्ष के संभावित विधिक बचाव को देखा जाए, तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 187(3) विधानसभा सचिवालय को एक स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय का दर्जा देता है। इसके तहत विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल के परामर्श से सचिवालय अपने भर्ती नियम बनाने या उनमें संशोधन करने के लिए अधिकृत होता है। पूर्व में भी कई राज्यों के सचिवालयों ने अपने यहाँ सीधी भर्ती के लिए स्वयं की चयन समितियां बनाई हैं, जिसे विधिक रूप से जायज ठहराया जाता रहा है। वैसे भी विधानसभा सचिवालय के भीतर नियुक्तियों और निर्णयों पर विधानसभा अध्यक्ष का सर्वोच्च नियंत्रण होता है। ऐसे मामलों में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि अध्यक्ष द्वारा ली गई संस्तुतियां या उनके निर्देश विशेषाधिकार के दायरे में आते हैं, जिन्हें सामान्य प्रशासनिक आचार संहिता के चश्मे से पूरी तरह नहीं देखा जा सकता। वहीं आवश्यक प्रशासनिक पदों (जैसे प्रमुख सचिव) को खाली न रखने या संक्रमण काल (चुनाव के दौरान) में व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने के लिए राज्यपाल या सक्षम प्राधिकारी की विशेष अनुमति से नियुक्तियां या कार्यभार सौंपे जाने के विधिक प्रावधान और अपवाद मौजूद होते हैं। 

'संस्थागत भ्रष्टाचार' और युवाओं का भविष्य 
जब किसी राज्य में युवाओं के रोजगार से जुड़ी संस्थाएं विवादों में घिरती हैं, तो इसका सीधा असर प्रदेश के लाखों बेरोजगारों के मनोबल पर पड़ता है। प्रतियोगिता परीक्षाओं की दिन-रात तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों का भरोसा व्यवस्था से उठने लगता है। यदि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की जगह 'अपराधिक साठगांठ' और 'फर्जी दस्तावेजों' का सहारा लिया गया है, तो यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य के साथ किया गया एक गंभीर खिलवाड़ है? 

निष्पक्ष जांच की आवश्यकता 
लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था (विधानसभा) की साख और लाखों युवाओं के भरोसे से जुड़े इस पूरे मामले की एक उच्च स्तरीय, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होना अनिवार्य है। कानून का यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। चूंकि यह मामला सीधे तौर पर लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था (विधानसभा) की साख और लाखों युवाओं के भरोसे से जुड़ा है, इसलिए इस पूरे मामले की एक उच्च स्तरीय, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होना अनिवार्य है। वैसे भी कानून का शासन यही कहता है कि आरोप चाहे कितने भी ऊंचे पद पर बैठे व्यक्ति पर क्यों न हों, उनकी निष्पक्षता से जांच होनी चाहिए। यदि उत्तर प्रदेश में पारदर्शिता और विधि का शासन बनाए रखना है, तो इस मामले की तह तक जाकर सच को सामने लाना होगा, ताकि राज्य के युवाओं को यह भरोसा मिल सके कि उनकी योग्यता की कद्र है, किसी कूटरचना की नहीं? यह जांच के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि 2011-12 में लिए गए निर्णय प्रशासनिक विवशता और विधिक अधिकारों के तहत थे या फिर यह वाकई 'सत्ता के दुरुपयोग' का एक गंभीर मामला है। शिकायतकर्ता ने इस पूरे मामले में 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988' और 'भारतीय न्याय संहिता' (BNS) की गंभीर धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज कर सभी संबंधित अभिलेखों की फॉरेंसिक और आपराधिक जांच की मांग की है। 

राजनीतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य 
इस मामले में विपक्ष के रुख पर नजर ड़ाली जाए तो यही तर्क होते हैं कि जब भी ऐसे संवेदनशील मामले सामने आते हैं, विपक्षी दल इसे 'संस्थागत भ्रष्टाचार' और सत्ता के दुरुपयोग का मुद्दा बनाते हैं। विपक्ष का लगातार यह आरोप रहता है कि बैकडोर एंट्री (पीछे के दरवाजे से भर्ती) के जरिए योग्य उम्मीदवारों के हक की अनदेखी की जाती है। वहीं बेरोजगार युवाओं और अभ्यर्थियों का पक्ष होता है कि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग और अन्य सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों का मानना है कि भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता का अभाव उनके भविष्य को अंधकार में धकेलता है। यदि किसी भी स्तर पर नियमों को शिथिल या परिवर्तित किया जाता है, तो इससे पूरी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है। युवाओं की मांग हमेशा 'समान अवसर' और 'निष्पक्ष चयन' की रही है। 

शिकायत में क्या मुख्य आरोप 
अधिवक्ता सौरभ सिंह सोमवंशी द्वारा प्रयागराज पुलिस कमिश्नर को दी गई तहरीर का पूरा ब्योरा दिया गया है। जिसमें आरोप है कि 1990 के दशक से लेकर अब तक विधानसभा सचिवालय में विभिन्न पदों पर रहते हुए वित्तीय विसंगतियों, नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को उपकृत करने और लोक सेवा आयोग के समानांतर एक ऐसी व्यवस्था बनाने के आरोप हैं जिससे नियुक्तियों में धांधली की जा सके। रिपोर्ट में सुल्तानपुर और रायबरेली रोड के बीच की संपत्तियों, कथित 'संस्थागत भ्रष्टाचार' और उत्तर प्रदेश के बेरोजगार युवाओं के साथ हुए अन्याय का विस्तार से उल्लेख किया गया है। विधानसभा सचिवालय में समीक्षा अधिकारी और सहायक समीक्षा अधिकारी के पदों पर जो नियुक्तियां हुईं, उनमें बड़े पैमाने पर भाई-भतीजावाद और फर्जीवाड़े के आरोप लगाए गए हैं। यही नहीं विधेयक और नियम का जिक्र करते हुए अखबार में छपे विज्ञापन संख्या 1/2019 और अन्य भर्तियों के दस्तावेजों, कट-ऑफ लिस्ट और चयन सूची का भी हवाला देते हुए कहा गया है कि किस प्रकार योग्य और मेरिट में आने वाले अभ्यर्थियों को दरकिनार कर कम अंक या अयोग्य लोगों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। तत्कालीन विधानसभा अध्यक्षों और उच्चाधिकारियों की भूमिका और उनके कार्यकाल के दौरान दी गई संस्तुतियों की विधिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। 
-27June-2026

बुधवार, 24 जून 2026

अब राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर आसानी से मिलेंगी पंचर और गाड़ी मरम्मत की सुविधाएं

एनएचएआई का फैसला: देशभर में अब एक्सप्रेसवे पर सफर होगा और भी महफूज़ 
BY-ओ.पी. पाल 
नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर सफर करने वाले करोड़ों साफिरों और माल ढुलाई करने वाले कमर्शियल वाहन चालकों के लिए केंद्र सरकार की ओर से एक बड़ी और राहत भरी खबर आई है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी 'नेशनल हाइवेज लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट लिमिटेड' (NHLML) ने देश भर के अपने सभी क्षेत्रीय कार्यालयों को एक कड़ा और महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। इस नए आदेश के तहत अब देश के सभी नेशनल हाईवे और एक्सप्रेसवे पर 'वेसाइड एमेनिटीज' (सड़क किनारे मिलने वाली जनसुविधाओं) के अंतर्गत जल्द से जल्द वाहन मरम्मत (Repair) की दुकानें और पंचर ठीक करने की आधुनिक सेवाएं स्थापित की जाएंगी। 
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अक्सर देखा गया है कि एक्सप्रेसवे या हाईवे पर अचानक टायर फटने, पंचर होने या गाड़ी में कोई तकनीकी खराबी आने पर यात्रियों को मीलों तक कोई मैकेनिक नहीं मिलता। ऐसी आपातकालीन स्थिति में न केवल यात्रियों का कीमती समय बर्बाद होता है, बल्कि सुनसान रास्तों पर सुरक्षा को लेकर भी बड़ा जोखिम खड़ा हो जाता है। सरकार की इस नई पहल का मुख्य उद्देश्य वाहनों की खराबी की स्थिति में लगने वाले समय को कम करना, सड़क दुर्घटनाओं पर रोक लगाना और यात्रियों के साथ-साथ लॉजिस्टिक्स (माल ढुलाई) ऑपरेटरों को त्वरित व समयबद्ध सहायता सुनिश्चित करना है। 

पीपीपी मॉडल के तहत विकसित होगा 'सर्विस नेटवर्क' 
NHLML वर्तमान में देश भर के मुख्य मार्गों पर सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत दीर्घकालिक पट्टे (Long-term Lease) पर सड़क किनारे आधुनिक जनसुविधा केंद्रों (WSA) का एक विशाल नेटवर्क तैयार कर रहा है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार, इन केंद्रों पर अनुबंध के तहत पहले से निर्धारित अनिवार्य सुविधाओं (जैसे फूड कोर्ट, टॉयलेट आदि) के अलावा वाहन मरम्मत और पंचर ठीक करने के इंफ्रास्ट्रक्चर को संविदात्मक ढांचे के भीतर विशेष रूप से शामिल किया गया है। अब निजी रियायतकर्ताओं और पट्टेदारों को इन दुकानों का निर्माण तेजी से करना होगा। 

एक ही छत के नीचे मिलेंगी सभी विश्वस्तरीय सुविधाएं 
इन राष्ट्रीय राजमार्ग केंद्रों (WSA) को 'एकीकृत सेवा केंद्रों' (Integrated Service Hubs) के रूप में परिकल्पित किया गया है। यहाँ रुककर यात्री न केवल आराम कर सकेंगे, बल्कि अपने वाहनों की किसी भी आपातकालीन तकनीकी खराबी को भी तुरंत ठीक करवा सकेंगे। इस स्तर का इंफ्रास्ट्रक्चर भारत में विश्वस्तरीय राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क के निर्माण और उपयोगकर्ताओं को निर्बाध (Seamless) परिवहन सेवाएं उपलब्ध कराने के व्यापक लक्ष्य को गति देगा। 

यूजर-केंद्रित विकास के लिए कटिबद्ध है एनएचएआई 
यह नीतिगत निर्णय सुरक्षित और उपयोगकर्ता-केंद्रित राष्ट्रीय राजमार्ग गलियारों को विकसित करने की दिशा में NHAI की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है। प्राधिकरण का मानना है कि इन सुविधाओं के सुचारू रूप से शुरू होने के बाद न केवल देश के आर्थिक विकास और लॉजिस्टिक्स चेन को मजबूती मिलेगी, बल्कि आम आदमी का हाईवे पर सफर करने का अनुभव भी बेहद सुखद और तनावमुक्त हो जाएगा।
-24June-2026

मंगलवार, 23 जून 2026

क्या राम मंदिर घोटाले में गेम चेंजर बनेगी एसआईटी की रणनीति?

-राम मंदिर चढ़ावा घोटाला: आस्था की कसौटी पर रामलला का खजाना 
BY-ओ.पी. पाल
अयोध्या के भव्य और ऐतिहासिक श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और समर्पण के प्रतीक स्वरूप चढ़ाए गए दान और बहुमूल्य आभूषणों को लेकर हाल ही में एक बड़ा विवाद सुर्खियों में है। मंदिर प्रबंधन, दान और बैंकिंग प्रणाली में कथित अनियमितताओं एवं वित्तीय हेरफेर के आरोपों ने न केवल प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि करोड़ों सनातनी श्रद्धालुओं की भावनाओं को भी झकझोर कर रख दिया है। इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल ने अब तक की सबसे बड़ी और निर्णायक कार्रवाई शुरू कर दी है। इस पूरे प्रकरण, एसआईटी की जांच पद्धति, प्रशासनिक व कानूनी पेचीदगियों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं नजर ड़ाली जाए तो देशभर की मीडिया में प्रमुखता से उछलते इस मुद्दे पर मंदिर की बैंकिंग व्यवस्था और दान प्रबंधन पर गंभीर सवाल उठाए। वहीं जहां तक एसआईटी जांच का सवाल है, उसमें एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप दी है। अब अपनी विस्तृत जांच में एसआईटी देश और दुनिया के उन सभी श्रद्धालुओं, उद्योगपतियों, राजनेताओं या धार्मिक संस्थाओं, जिन्होंने रामलला के चरणों में सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात या अन्य बहुमूल्य आभूषण अर्पित किए थे, उनसे सीधे उनसे संपर्क कर रही है। लेकिन यह भी एक टेढ़ी खीर है, क्योंकि अधिकांश दान गुप्त रुप से दिया जाता है, जिसका हिसाब बनाता श्रद्धालुओं के विवेक पर निर्भर करेगा? 
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अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर केवल एक कंक्रीट या पत्थरों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह सदियों के संघर्ष, तपस्या और दुनिया भर के करोड़ों सनातनी हिंदुओं की अगाध श्रद्धा का साक्षात केंद्र है। ऐसे पावन स्थान पर चढ़ने वाले दान और आभूषणों में एक रत्ती भर की भी हेरफेर या चोरी केवल एक वित्तीय अपराध नहीं है, बल्कि यह जन-आस्था पर एक बहुत बड़ा आघात है। एसआईटी द्वारा शुरू की गई 'रिवर्स ट्रैकिंग' और मुख्यमंत्री को सौंपी गई प्रारंभिक रिपोर्ट इस बात का स्पष्ट संकेत है, कि उत्तर प्रदेश सरकार इस मामले में किसी भी स्तर पर ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। चाहे वे ट्रस्ट के प्रभावशाली पदाधिकारी हों या बैंक के बड़े अधिकारी हों। यदि उन्होंने रामलला के खजाने पर कुदृष्टि डाली है, तो उनका जेल जाना तय है। आने वाले दिन इस ऐतिहासिक जांच के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं, क्योंकि जैसे ही पहली आधिकारिक एफआईआर दर्ज होगी और दानदाताओं के सबूतों का मिलान शुरू होगा, 'रामलला के लुटेरों' के चेहरे पूरी तरह से बेनकाब हो जाएंगे। मंदिर के गर्भगृह और परिसर में रखे गए दानपात्रों से निकलने वाली नकदी, सोने-चांदी के आभूषणों और अन्य कीमती रत्नों की गिनती तथा उन्हें बैंक में सुरक्षित जमा करने की पूरी प्रक्रिया पर उंगलियां उठना स्वाभाविक है। 

जांच एजेंसी के लिए सच तक पहुंचना बड़ी चुनौती 
इस प्रकरण में जांच में जुटी एसआईटी के सामने सत्यापन का अभाव और कई सवाल भी सामने हैं, मसलन दानपात्रों से निकाली गई भारी-भरकम नकदी और सोने-चांदी का वास्तविक और सटीक हिसाब किस स्तर पर रखा जा रहा था? क्या इसके सत्यापन के लिए कोई पारदर्शी और त्रिस्तरीय प्रणाली मौजूद थी? बैंकिंग प्रक्रिया के दौरान जब आभूषण और नकदी बैंक कर्मियों या ट्रस्ट के प्रतिनिधियों को सौंपी जा रही थी, तब अंतिम जवाबदेही किसकी तय की गई थी? वहीं क्या दानपात्र खोलने से लेकर बैंक लॉकर में जमा करने तक की पूरी प्रक्रिया सीसीटीवी और स्वतंत्र निरीक्षकों की कड़ी निगरानी में थी? ऐसे सवालों से स्पष्ट है कि बैंक कर्मियों और मंदिर प्रशासन के कुछ स्तरों पर या तो भारी लापरवाही बरती गई या फिर आपसी मिलीभगत से एक बड़े गबन को अंजाम दिया गया। उधर जांच दल के सूत्रों का भी मानना है कि केवल श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट, संबंधित बैंकों और मंदिर प्रशासन के बही-खातों के भरोसे रहकर इस घोटाले की वास्तविक गहराई और गबन के सही आंकड़े का पता लगाना असंभव है। यदि रिकॉर्ड में ही हेरफेर कर दिया गया हो, तो कागजी जांच कभी भी सच को सामने नहीं ला पाएगी। इसी कारण से एसआईटी रिवर्स ट्रैकिंग के फार्मूले में अब सीधे उन अंतिम कड़ियों यानी दातादाता तक पहुंच रही है, जिन्होंने इस पूरी व्यवस्था को अपनी आस्था सौंपी थी। जांच एजेंसी ने दानदाताओं से अनुरोध किया जा रहा है कि वे अपने दान से जुड़े सभी संभावित साक्ष्य जैसे आधिकारिक रसीदें, दान करते समय खींची गई तस्वीरें, वीडियो फुटेज, या उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स और बैंक से कीमती सामान निकालने के प्रमाण जांच टीम को सौंपें, ताकि दानदाताओं से प्राप्त इन पुख्ता सबूतों का मिलान मंदिर ट्रस्ट के स्टॉक रजिस्टर और संबंधित बैंकों के डिपॉजिट इनवेंटरी से किया जाएगा। 

गेम चेंजर बन सकता है पूरा प्रकरण 
माना जा रहा है क्योंकि एसआईटी की जांच के बाद 'रामलला के लुटेरों' के लिए कानून के शिकंजे से बच पाना नामुमकिन हो जाएगा। छह दिनों की मथानी जैसी गहन और चौबीसों घंटे चली शुरुआती जांच के बाद, एसआईटी की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सौंपी गई प्रारंभिक जांच रिपोर्ट की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें संकलित किए गए डिजिटल साक्ष्य, दस्तावेजी सबूत, सीसीटीवी फुटेज और संदिग्धों के बयानों का ब्यौरा कुल 12 पेन ड्राइव में है। इस जांच के पहले सप्ताह में ही लगभग 150 ऐसे लोगों को चिह्नित किया गया है जिनकी भूमिका किसी न किसी रूप में इस चढ़ावा और आभूषण प्रबंधन प्रक्रिया में संदिग्ध पाई गई है। इनमें से कम से कम 25 लोग ऐसे हैं जिनके खिलाफ संज्ञेय अपराध वित्तीय हेरफेर के सीधे और पुख्ता सबूत मिले हैं। 

संगठनात्मक और प्रशासनिक खामियां 
एसआई की प्रारंभिक रिपोर्ट में पर गौर करें तो मंदिर ट्रस्ट के आंतरिक प्रबंधन की कुछ बेहद गंभीर और चौंकाने वाली खामियां भी उजागर हुई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, गोपाल राव नामक व्यक्ति, जो कि तकनीकी या कानूनी रूप से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के आधिकारिक सदस्य नहीं थे, वे मंदिर के भीतर कई महत्वपूर्ण और संवेदनशील जिम्मेदारियां संभाल रहे थे। वहीं दूसरी ओर, ट्रस्ट के प्रमुख ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र पर यह आरोप लगा है कि वे अपनी तयशुदा प्रशासनिक और निगरानी संबंधी जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरी मुस्तैदी से करने में विफल रहे। जिसे बड़ी चूक और चोरी को रास्ता मिला। इन प्राथमिक तथ्यों और संज्ञेय अपराधों के सामने आने के बाद अब एसआईटी, पुलिस में एक विस्तृत और गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज कराने की वैधानिक प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। 

कानूनी विशेषज्ञों में वैचारिक मतभेद 
इस हाई-प्रोफाइल मामले में बिना एफआई दर्ज किए छह दिनों तक की गई प्रारंभिक जांच को लेकर देश के प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञों और पुलिस अधिकारियों के बीच एक दिलचस्प कानूनी बहस छिड़ गई है। इसमें पूर्व पुलिस महानिदेशक सूर्यकुमार शुक्ला का कानूनी तर्क और दृष्टिकोण है कि इतनी बड़ी मात्रा में नकदी और जेवरात की गणना में कहीं न कहीं भारी चूक हुई है और इसमें बैंक कर्मियों की लापरवाही या सीधी मिलीभगत साफ दिखती है। ट्रस्ट और बैंक दोनों स्तरों पर निगरानी तंत्र की बेहद कमजोरी का फायदा अपराधियों ने उठाया। वहीं इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति डी.पी. सिंह ने कहा कि गबन और वित्तीय धोखाधड़ी जैसे जटिल मामलों में सीधे एफआईआर दर्ज करने से पहले तथ्यों को खोजने के लिए प्रारंभिक जांच करना पूरी तरह वैध है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार' मामले के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि प्रारंभिक जांच में संज्ञेय अपराध की पुष्टि होने पर तुरंत एफआई दर्ज कर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। जबकि इसके विपरीत अयोध्या के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रियनाथ सिंह ने इस प्रक्रिया को अनुचित और कानून के सिद्धांतों के खिलाफ बताया। उनका तर्क है कि औपचारिक एफआईआर दर्ज किए बिना किसी भी मामले की इस स्तर पर जांच नहीं की जानी चाहिए। 

आग में घी ड़ालता राजनीतिक घमासान 
अयोध्या और राम मंदिर का मुद्दा हमेशा से ही भारत की राजनीति के केंद्र में रहा है। ऐसे में रामलला के चढ़ावे में घोटाले की खबर आते ही विपक्षी दलों ने सरकार और मंदिर प्रशासन को आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया है। खासतौर से राज्य के प्रमुख सियासी दल समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस पूरे मामले और सरकार द्वारा कराई जा रही एसआईटी जांच बेहद तीखा और व्यंग्यात्मक तंज कसा है। अखिलेश ने कहा कि कहीं जांच की रिपोर्ट ही चोरी न हो जाए, फिर कहेंगे 15 दिन और इंतजार कर लो, रिपोर्ट सौंपने में दिन बढ़ेंगे क्योंकि सबूत ठिकाने लगाने हैं। उनका यह साफ करता है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा केवल एक प्रशासनिक जांच तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा चुनावी और राजनीतिक हथियार भी बनेगा। विपक्ष का यहां तक आरोप है कि जांच के नाम पर केवल समय खींचा जा रहा है ताकि मुख्य दोषियों को बचाया जा सके और सबूतों को मिटाया जा सके। 

न्यायपालिका का ये रहा रुख 
इस बीच, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में दायर याचिका को लेकर टिप्पणियां करते हुए इस मामले में किसी भी प्रकार की तत्काल आपात स्थिति से साफ इनकार कर दिया। पीठ कहा कि राज्य सरकार पहले ही इस पूरे मामले का स्वतः संज्ञान ले चुकी है और एसआईटी के माध्यम से आवश्यक और कड़ी कानूनी पहल कर रही है। जब कार्यपालिका सक्रिय रूप से जांच कर रही है, तो अदालत द्वारा तत्काल हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। यह जनहित याचिका मोहित अशोक नामक एक याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में दायर थी, जिसमें उन्होंने राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए गए चढ़ावे और वित्तीय अनियमितताओं की एक पूर्णतः स्वतंत्र एजेंसी से उच्च स्तरीय जांच कराने तथा मंदिर के गठन के बाद से अब तक के पूरे वित्तीय लेन-देन और आभूषणों का भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से एक विस्तृत और निष्पक्ष ऑडिट कराने की मांग की थी। 
  -23June-2026

गुरुवार, 18 जून 2026

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस: शांति, स्वास्थ्य और एकता का वैश्विक महामंत्र

भारत का विश्व को कालजयी उपहार-आत्म-साक्षात्कार का मार्ग 
BY-ओ.पी. पाल 
दुनियाभर में मानव सभ्यता ने 21वीं सदी में जहां एक ओर तकनीकी और वैज्ञानिक मोर्चे पर अभूतपूर्व प्रगति की है, वहीं दूसरी ओर मानसिक तनाव, जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां और आंतरिक अशांति जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना भी किया है। भौतिकता की अंधी दौड़ में हांफती हुई मानवता को जब एक ऐसे संबल की तलाश थी जो बिना किसी कृत्रिम साधन के शरीर, मन और आत्मा को एकाकार कर सके, तब भारत ने दुनिया को 'योग' का शाश्वत उपहार दिया। प्रत्येक वर्ष 21 जून को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस केवल एक कैलेंडर आयोजन नहीं है, बल्कि यह समूची मानवता को आरोग्य, शांति और एकात्मता के सूत्र में पिरोने का एक वैश्विक महाअभियान है। संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएन) के इतिहास में सबसे तेजी से स्वीकृत होने वाले इस प्रस्ताव की पृष्ठभूमि, इसके पीछे का दर्शन, वैज्ञानिक आधार और वैश्विक यात्रा बेहद गौरवमयी रही है। 21 जून का दिन हमें याद दिलाता है कि भले ही हमारी भाषाएं, पहनावे, देश और संस्कृतियां अलग हों, लेकिन हमारी सांसें और आंतरिक चेतना एक ही हैं। योग की यह वैश्विक लहर पूरी मानवता को विनाश से विकास की ओर, अवसाद से आनंद की ओर और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का एक सशक्त राजमार्ग बन चुकी है। यह आधुनिक युग का सबसे बड़ा जन-आंदोलन है, जो आने वाली पीढ़ियों को अधिक संवेदनशील, स्वस्थ और जागरूक बनाएगा।
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संयुक्त राष्ट्र में भारत की कूटनीतिक विजय 
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को वैश्विक मान्यता दिलाने का पूरा श्रेय भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजन और भारत की मजबूत सांस्कृतिक कूटनीति को जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 69वें सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहली बार दुनिया के सामने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने वैश्विक नेताओं के सामने योग की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा था कि योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है। यह मन और शरीर, विचार और कर्म, संयम और पूर्ति की एकात्मकता का प्रतीक है। यह मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाला है। यह केवल व्यायाम नहीं है, बल्कि अपने आप में, दुनिया और प्रकृति के साथ एकात्मता की भावना को खोजने का माध्यम है। जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी यह हमारी जीवनशैली को बदलकर चेतना जागृत कर सकता है। आइए, हम एक अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस शुरू करने की दिशा में काम करें। भारत द्वारा रखे गए इस प्रस्ताव का दुनिया के देशों ने अभूतपूर्व स्वागत किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत के तत्कालीन स्थायी प्रतिनिधि ने प्रस्ताव संख्या 69/131 पेश की। इस प्रस्ताव को रिकॉर्ड 175 देशों का सह-प्रायोजन प्राप्त हुआ। संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में आज तक किसी भी सामान्य सभा के प्रस्ताव को इतने बड़े पैमाने पर देशों का समर्थन नहीं मिला था। बिना किसी मतदान के, सर्वसिद्ध रूप से इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया और घोषणा की गई कि हर साल 21 जून को 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' के रूप में मनाया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में महज 75 दिनों का समय लगा, जो संयुक्त राष्ट्र में अपने आप में एक रिकॉर्ड है। इसी वजह से लगातार 12वें साल में प्रवेश कर चुका अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस अपनी चरम पर है। 

आदिगुरु से आधुनिक युग तक 
योग का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। भारतीय सनातन परंपरा में भगवान शिव को 'आदिगुरु' या 'आदियोगी' माना गया है। उन्होंने ही सबसे पहले हिमालय पर कांति सरोवर के तट पर अपने सात शिष्यों (सप्तऋषियों) को योग का गूढ़ ज्ञान दिया था। यही ज्ञान बाद में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फैला। वेदों (विशेषकर ऋग्वेद) और उपनिषदों में योग का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने योग को परिभाषित करते हुए कहा है कि कर्मों में कुशलता ही योग है। योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की 'युज' धातु से हुई है, जिसका अर्थ है-जुड़ना, एकत्र होना या मिलना। आध्यात्मिक स्तर पर इसका अर्थ जीवात्मा का परमात्मा से मिलन है, जबकि व्यावहारिक स्तर पर यह शरीर, मन और चेतना के बीच पूर्ण सामंजस्य स्थापित करने की कला है। यानी शरीर, मन और चेतना का पूर्ण संतुलन योग के माध्यम से ही है। 

21 जून के चयन के पीछे वैज्ञानिक और भौगोलिक कारण 
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के लिए 21 जून की तारीख का चयन कोई संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरा भौगोलिक और आध्यात्मिक महत्व है। ग्रीष्म संक्रांति जून उत्तरी गोलार्ध का सबसे लंबा दिन होता है। इस दिन सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सबसे लंबे समय तक रहती हैं। इसे 'ग्रीष्म संक्रांति' कहा जाता है। भारतीय खगोल विज्ञान और अध्यात्म के अनुसार, 21 जून के बाद सूर्य दक्षिणायन की ओर बढ़ने लगता है। दक्षिणायन के समय को आध्यात्मिक साधनाओं और आत्म-निरीक्षण के लिए बेहद अनुकूल माना जाता है। इसकी पृष्ठभूमि में यह भी मान्यता है कि ग्रीष्म संक्रांति के बाद आने वाले पहले चक्र (पूर्णिमा) पर ही आदिगुरु शिव ने सप्तऋषियों को योग की दीक्षा दी थी, जिसे 'गुरु पूर्णिमा' के रूप में भी मनाया जाता है। वहीं जिस प्रकार 21 जून का दिन साल का सबसे लंबा दिन होता है और सूर्य की ऊर्जा चरम पर होती है, उसी प्रकार योग भी मनुष्य को दीर्घायु और असीमित ऊर्जा प्रदान करता है।

वैश्विक और कूटनीतिक प्रभाव 

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस ने वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को एक 'विश्व गुरु' और 'वैश्विक कल्याणकर्ता' के रूप में स्थापित किया है। योग ने भौगोलिक सीमाओं, धर्मों, जातियों और राजनीतिक विचारधाराओं की दीवारों को तोड़ दिया है। आज अमेरिकी राष्ट्रपति के व्हाइट हाउस से लेकर एफिल टॉवर (पेरिस) और चीन की महान दीवार तक, हर जगह योग दिवस पर लोग चटाइयां बिछाए नजर आते हैं। वैश्विक स्तर पर योग के प्रसार से भारत में वैलनेस टूरिज्म का तेजी से विकास हुआ है। ऋषिकेश, मैसूर, और केरल जैसे क्षेत्र वैश्विक योग हब बन चुके हैं। योग मैट, परिधानों और ऑर्गेनिक उत्पादों का वैश्विक बाजार अरबों डॉलर का हो चुका है। 

चुनौतियां और भविष्य की राह 
यद्यपि अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस ने योग को जन-आंदोलन बना दिया है, लेकिन अभी भी कुछ चुनौतियां मौजूद हैं। वैश्विक स्तर पर योग के कई विकृत रूप जैसे 'हॉट योग', 'बीयर योग' आदि सामने आए हैं। योग के मूल आध्यात्मिक और वैज्ञानिक स्वरूप को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है। कई लोग योग को केवल 21 जून के एक दिन का उत्सव मान लेते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इसे 'कैलेंडर इवेंट' से निकालकर 'डेली हैबिट' (दैनिक आदत) बनाया जाए। भविष्य में योग को स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम, कॉर्पोरेट कार्यसंस्कृति और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए ताकि एक स्वस्थ और शांतिपूर्ण विश्व का निर्माण हो सके। 
17June-2026

सोमवार, 15 जून 2026

आठवां वेतन आयोग: देश में करोड़ो कर्मचारियों और पेंशनर्स को नए वेतनमान का इंतजार

-वेतन ढांचे में बड़े बदलाव की तैयारी: नई उम्मीदों का होगा नया सवेरा 
By-ओ.पी. पाल 
भारत में केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए 'वेतन आयोग' केवल एक वित्तीय समीक्षा नहीं, बल्कि उनके जीवन स्तर को तय करने वाला सबसे बड़ा प्रशासनिक दस्तावेज होता है। हर दस साल में आने वाले इस बदलाव की श्रृंखला में अब आठवें वेतन आयोग की सुगबुगाहट अपने चरम पर है। वर्ष 2026 में प्रवेश करते ही सातवें वेतन आयोग का कार्यकाल तकनीकी रूप से समाप्त हो चुका है और आठवें वेतन आयोग के गठन व उसकी सिफारिशों को लेकर देशभर के करीब 49 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और 68 लाख से अधिक पेंशनभोगियों की नजरें सरकार के हर कदम पर टिकी हैं। क्योंकि भारतीय प्रशासनिक और आर्थिक सुधारों की दिशा में आठवां वेतन आयोग एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता के लिए एक मील का पत्थर है। यह बढ़ते जीवनयापन के खर्च और महंगाई के दौर में सरकारी कर्मचारियों को एक सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन देने का माध्यम है। जहां कर्मचारी वर्ग एक उच्च फिटमेंट फैक्टर की उम्मीद कर रहा है, वहीं सरकार को देश की आर्थिक स्थिरता, मुद्रास्फीति के नियंत्रण और बुनियादी ढांचे के विकास के बजट को भी देखना है। बहराल देश के करोड़ो कर्मचारियों और पेंशनरों को वेतन ढांचे में बड़े बदलाव में नए सवेरा होने का इंतजार है।
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भारत सरकार द्वारा केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी देने के बाद सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में आठवें वेतन आयोग का औपचारिक गठन किया जा चुका है। आयोग में उनके साथ प्रोफेसर पुलक घोष (अंशकालिक सदस्य) और पंकज जैन (सदस्य-सचिव) शामिल हैं। प्रशासनिक दिशानिर्देशों के अनुसार, आयोग को गठन के बाद अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है। उम्मीद की जा रही है कि न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाला यह आयोग मध्य-2027 तक एक ऐसा संतुलित और व्यावहारिक फॉर्मूला पेश करेगा, जो कर्मचारियों की आकांक्षाओं को भी पूरा करे और देश की आर्थिक रफ्तार को भी नई ऊर्जा दे। तब तक, कर्मचारियों को छमाही आधार पर मिलने वाले महंगाई भत्ते (डीए) के जरिए अंतरिम राहत मिलती रहेगी। इस दिशा में आयोग ने कर्मचारी यूनियनों, रक्षा कर्मियों, पेंशनभोगी संगठनों और अन्य हितधारकों से सुझाव व मांगपत्र प्राप्त करने के लिए 'MyGov' और आधिकारिक पोर्टल (8cpc.gov.in) के माध्यम से 15 जून 2026 की अंतिम तिथि देकर ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन हितधारकों की मांग पर सुझाव दर्ज करने के लिए समयावधि को विस्तार दिया है और फिलहाल आयोग देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर जमीनी स्तर पर हितधारकों और कर्मचारी संघों के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर रहा है। अप्रैल और मई के महीनों में नई दिल्ली और हैदराबाद में सफल बैठकों के बाद श्रीनगर, लद्दाख और लखनऊ (22-23 जून) में परामर्श सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। इसके बाद जुलाई में कोलकाता और भुवनेश्वर का दौरा प्रस्तावित है। 

कब लागू होगी नई व्यवस्था? 
अक्सर कर्मचारियों के बीच यह भ्रम रहता है कि यदि आयोग अपनी रिपोर्ट देर से सौंपेगा, तो क्या उन्हें नुकसान होगा? ऐतिहासिक रूप से, भारत में नया वेतनमान प्रत्येक 10 वर्ष के अंतराल पर 1 जनवरी से प्रभावी माना जाता है। सातवां वेतन आयोग 1 जनवरी 2016 से प्रभावी हुआ था, इस लिहाज से आठवें वेतन आयोग की संदर्भ तिथि 1 जनवरी 2026 तय की गई है। वास्तविक भुगतान और एरियर का गणितचूंकि आयोग वर्तमान में परामर्श प्रक्रिया में है और अपनी रिपोर्ट मध्य-2027 (लगभग मई 2027) तक सरकार को सौंपेगा, इसलिए सरकार द्वारा इसे मंजूरी देने और अधिसूचना जारी करने में 2027 की तीसरी या चौथी तिमाही तक का समय लग सकता है। इसमें महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भले ही वास्तविक बढ़ा हुआ वेतन 2027 के उत्तरार्ध में मिलना शुरू हो, लेकिन यह व्यवस्था 1 जनवरी 2026 से ही 'भूतलक्षी प्रभाव' से लागू होगी। इसका अर्थ यह है कि जनवरी 2026 से लेकर वास्तविक लागू होने के महीने तक की बढ़ी हुई राशि का भुगतान कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को एकमुश्त एरियर के रूप में किया जाएगा। वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, यह एरियर राशि कर्मचारियों के पे-मैट्रिक्स स्तर के आधार पर ₹5 लाख से लेकर ₹14 लाख तक हो सकती है। 

कर्मचारियों को क्या लाभ होगा? 
आठवें वेतन आयोग के आने से केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन ढांचे में व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा। इसके प्रमुख तथ्यों पर गौर की जाए तो वेतन आयोग की सिफारिशों में सबसे महत्वपूर्ण तत्व 'फिटमेंट फैक्टर' होता है, जो पुराने बेसिक पे (मूल वेतन) को नए बेसिक पे में बदलने का गुणांक होता है। 7वें वेतन आयोग में इसे 2.57 रखा गया था, जिससे न्यूनतम मूल वेतन ₹18,000 तय हुआ था। वर्तमान में, केंद्रीय कर्मचारी संगठन 3.25 से 3.68 तक के फिटमेंट फैक्टर की मांग कर रहे हैं। हालांकि, आर्थिक संतुलन को देखते हुए विशेषज्ञ इसके 2.28 से 2.86 के बीच रहने का अनुमान लगा रहे हैं। यदि न्यूनतम फिटमेंट फैक्टर 2.28 या उससे अधिक या इसे 2.5 से 3.0 के बीच भी स्वीकृत किया जाता है, तो न्यूनतम मूल वेतन वर्तमान के ₹18,000 से बढ़कर सीधे ₹26,000 से ₹32,000 के दायरे में पहुंच सकता है। कुछ कर्मचारी संगठन तो इसे ₹41,000 तक ले जाने का दबाव बना रहे हैं। 

मूल वेतन में कैसे होगा महंगाई भत्ते का विलय 
एक जनवरी 2026 की संदर्भ तिथि के अनुसार, सातवें वेतन आयोग के तहत महंगाई भत्ता (डीए) 60% पर पहुंच चुका है। आठवें वेतन आयोग के नियमों के तहत, इस 60 प्रतिशत महंगाई भत्ते को शून्य प्रतिशत पर रीसेट कर दिया जाएगा और इसकी पूरी राशि को कर्मचारियों के नए मूल वेतन में समाहित कर दिया जाएगा। इससे कर्मचारियों का भविष्य निधि (PF) अंशदान, ग्रेच्युटी और अन्य भत्ते अपने आप बढ़ जाएंगे। वहीं इस संशोधन के तहत मूल वेतन में वृद्धि होते ही मकान किराया भत्ता और यात्रा भत्ता भी आनुपातिक रूप से बढ़ जाएंगे। इसके अलावा, कर्मचारी संगठनों ने वार्षिक वेतन वृद्धि की दर को वर्तमान के 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत करने की पुरजोर मांग की है। 

पेंशनभोगियों के लिए क्या बदलेंगे नियम? 
आठवां वेतन आयोग देश के वरिष्ठ नागरिकों और सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए भी बड़ी राहत लेकर आ रहा है। आयोग के 'कार्य-क्षेत्र की शर्तो में यह स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है कि 31 दिसंबर 2025 या उससे पहले सेवानिवृत्त हुए सभी पेंशनभोगी इस नए पेंशन संशोधन के दायरे में आएंगे। जिस प्रकार कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन बढ़ेगा, उसी प्रकार पेंशनभोगियों की न्यूनतम पेंशन में भी सम्मानजनक वृद्धि होगी। वर्तमान में न्यूनतम पेंशन ₹9,000 है, जिसके बढ़कर ₹15,000 से ₹20,000 के बीच होने की संभावना है। वहीं कर्मचारियों के डीए की तरह ही पेंशनभोगियों का 60 प्रतिशत महंगाई राहत भी मूल पेंशन में जोड़ दिया जाएगा। वर्तमान में पेंशनभोगी अपनी पेंशन का जो हिस्सा एकमुश्त अग्रिम लेते हैं, उसकी पूरी बहाली में 15 वर्ष का लंबा समय लगता है। पेंशनभोगी संगठनों की प्रमुख मांग है कि इस अवधि को घटाकर 10 से 12 वर्ष किया जाए, क्योंकि अब जीवन प्रत्याशा और वित्तीय जरूरतें बदल चुकी हैं। हालांकि आयोग एकीकृत पेंशन योजना और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली के तहत मिलने वाले लाभों की भी समीक्षा कर रहा है, ताकि सेवानिवृत्त कर्मचारियों को कम से कम ₹10,000 की न्यूनतम सुनिश्चित पेंशन की गारंटी और बेहतर सामाजिक सुरक्षा मिल सके।

सरकारी खजाने पर वित्तीय बोझ 
जहां एक ओर यह कदम देश में मांग और उपभोग को बढ़ाकर आर्थिक विकास को गति देगा, वहीं दूसरी ओर सरकार के राजकोषीय घाटे पर इसका भारी दबाव पड़ेगा। वेतन और पेंशन बिल में होने वाली इस भारी वृद्धि को संतुलित करने के लिए सरकार को अपने कर राजस्व को बढ़ाना होगा और गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करनी होगी। यही कारण है कि आयोग को अपनी सिफारिशें तय करते समय 'राजकोषीय विवेक' का विशेष ध्यान रखने को कहा गया है। 

अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक असर 
आठवें वेतन आयोग का प्रभाव केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा, इसका एक 'डोमिनो इफेक्ट' (व्यापक श्रृंखला प्रभाव) पूरे देश की व्यवस्था पर पड़ेगा:लाभार्थी वर्गसंभावित प्रभाव और लाभराज्य सरकारी कर्मचारीआमतौर पर केंद्रीय वेतन आयोग के लागू होने के कुछ महीनों के भीतर ही देश के अधिकांश राज्य (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान आदि) भी अपने कर्मचारियों के लिए इसी अनुरूप नया वेतनमान घोषित करते हैं। इससे करोड़ों राज्य कर्मियों को सीधा लाभ होगा। सशस्त्र बल और अर्धसैनिक बलरक्षा कर्मियों की कठिन सेवा शर्तों को देखते हुए सैन्य सेवा वेतन (MSP) और जोखिम भत्तों में विशेष बढ़ोतरी की उम्मीद है।बाजार और निजी क्षेत्रजब 1 करोड़ से अधिक परिवारों (कर्मचारी + पेंशनभोगी) के हाथ में एकमुश्त एरियर और बढ़ा हुआ मासिक वेतन आएगा, तो देश में उपभोक्ता वस्तुओं, ऑटोमोबाइल, रियल एस्टेट और इलेक्ट्रॉनिक्स की मांग में भारी उछाल आएगा। 
-15June-2026

बुधवार, 10 जून 2026

जोजिला टनल का ऐतिहासिक मुकाम: आपस में जुड़े कश्मीर और लद्दाख के दोनों छोर

बालटाल और मिनीमर्ग के जुड़ने से 3 घंटे का सफर महज 15 मिनट में होगा पूरा 
गडकरी ने रिमोट दबाकर किया अंतिम विस्फोट 
By-ओ.पी. पाल 
नई दिल्ली/श्रीनगर। श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर रणनीतिक और सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण 'जोजिला सुरंग परियोजना' ने मंगलवार को देश के बुनियादी ढांचा क्षेत्र के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय लिख दिया। मुख्य सुरंग की खुदाई का काम सफलतापूर्वक पूरा होने के बाद पहली बार कश्मीर के बालटाल और लद्दाख के मिनीमर्ग के दोनों छोर आधिकारिक रूप से आपस में जुड़ गए हैं। 

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनते हुए मिनीमर्ग में पूर्वी प्रवेश-द्वार के पास अंतिम विस्फोट करने के लिए रिमोट का बटन दबाया। इस गरिमामयी समारोह में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी विशेष रूप से उपस्थित रहे। इस परियोजना को भारत की तकनीकी शक्ति, इंजीनियरिंग क्षमता और अदम्य संकल्प" का अद्भुत प्रतीक बताते हुए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि यह सुरंग हर मौसम में संपर्क सुनिश्चित कर लद्दाख और जम्मू-कश्मीर के लिए एक जीवनरेखा साबित होगी। उन्होंने सुरंग निर्माण में जुटे इंजीनियरों, अधिकारियों और मजदूरों को संबोधित करते हुए कहा कि यह भारत के बुनियादी ढांचे के विकास का एक स्वर्णिम काल है। 

3 घंटे का सफर महज 15 मिनट में होगा तय 
करीब 14 किलोमीटर (वास्तविक लंबाई 13.15 किमी) लंबी यह अत्याधुनिक सुरंग विश्वस्तरीय सुरक्षा मानकों के अनुसार बनाई गई है। चार बार टेंडर मंजूर होने के बाद भी यह प्रोजेक्ट अटका हुआ था। जब इसकी अनुमानित लागत 12 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गई, तब उन्होंने प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए और आज मुझे गर्व है कि इतने बड़े पैमाने पर काम होने के बावजूद हमने देश के लगभग 5,000 करोड़ रुपये बचाए हैं। यह परियोजना लद्दाख और जम्मू-कश्मीर के लिये एक जीवनरेखा बनेगी। 

इंजीनियरिंग व लोकल वर्कफोर्स का कमाल 
केंद्रीय मंत्री ने विपरीत और बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करने के लिए जम्मू-कश्मीर प्रशासन, एनएचआईडीसीएल के अधिकारियों, सलाहकारों और निर्माण एजेंसियों की सराहना की। उन्होंने इस बात पर विशेष खुशी जताई कि इस पूरी सुरंग के निर्माण में शामिल कुल कार्यबल में से लगभग 80 प्रतिशत मजदूर इसी क्षेत्र के स्थानीय निवासी थे, जिन्होंने देश के इस सपने को साकार किया है। 
10June-2026