By-ओ.पी. पाल
लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधायिका की शुचिता और प्रशासनिक पारदर्शिता उसके सबसे मजबूत स्तंभ होते हैं। लोकतंत्र के स्तंभ तब सबसे ज्यादा डगमगाते हैं, जब जनसेवा और कानून व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने वाली संस्थाओं पर ही भ्रष्टाचार और विधिक उल्लंघन के गंभीर आरोप लगते हैं। पिछले दिनो ही उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव के खिलाफ प्रयागराज में दी गई एक ताजा विधिक शिकायत ने एक बार फिर प्रशासनिक नियुक्तियों, शक्तियों के हस्तांतरण और चुनावी आचार संहिता के अनुपालन पर गंभीर बहस छेड़ दी है और इस एक शिकायत ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। एक अधिवक्ता द्वारा दी गई इस तहरीर ने न केवल चयन प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि 'संस्थागत भ्रष्टाचार' की ओर भी इशारा किया है। वहीं दूसरी ओर इस पूरे मामले के विधिक और प्रशासनिक पहलुओं को भी सामने लाकर खड़ा करने का दावा किया गया है।
विवाद की जड़: शक्तियों का 'असंवैधानिक' हस्तांतरण?
दरअसल,इस मामले की शुरुआत साल 2011 से जुड़ी है। शिकायत के अनुसार, 11 जनवरी 2011 को तत्कालीन प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य एवं विधानसभा) द्वारा एक अधिसूचना जारी की गई थी। आरोप है कि इस अधिसूचना के जरिए उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) जैसी संवैधानिक संस्था के अधिकारों को छीनकर विधानसभा की एक आंतरिक 'चयन समिति' को सौंप दिया गया। यद्यपि इस प्रक्रिया में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 187(3) का हवाला दिया गया था, लेकिन आरोप है कि इसके वास्तविक संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी की गई। यह शक्तियों का विकेंद्रीकरण नहीं, बल्कि कथित तौर पर एक ऐसा ढांचा तैयार करना था जिसके जरिए नियुक्तियों पर मनमाना नियंत्रण पाया जा सके। इसके बाद हुई समीक्षा अधिकारी (आरओ) और सहायक समीक्षा अधिकारी (एआरओ) की भर्तियां लगातार विवादों के घेरे में रहीं, यहाँ तक कि उच्च न्यायालय को इसमें सीबीआई जांच तक के आदेश देने पड़े।
आचार संहिता का उल्लंघन?
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू दिसंबर 2011 से मार्च 2012 के बीच का है। उत्तर प्रदेश में उस वक्त विधानसभा चुनावों के मद्देनजर आदर्श आचार संहिता लागू थी। नियमतः इस अवधि में किसी भी प्रकार की नई नियुक्ति या स्थानांतरण पर पूर्ण प्रतिबंध होता है। परंतु, शिकायत में लगाए गए आरोपों के मुताबिक जनवरी 2012 में बिना किसी पूर्व रिक्ति के और बिना लोक सेवा आयोग के परामर्श के विज्ञापन जारी किया गया। 6 मार्च 2012 को, जब मतगणना चल रही थी, प्रदीप कुमार दुबे को विधानसभा का प्रमुख सचिव नियुक्त कर दिया गया। सबसे गंभीर विसंगति यह सामने आती है कि तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर उस दिन लखनऊ में नहीं, बल्कि आजमगढ़ के दीदारगंज क्षेत्र में अपनी मतगणना में व्यस्त थे। ऐसे में उनकी भौतिक अनुपस्थिति के बावजूद उनकी 'उपस्थिति और संस्तुति' दिखाना सीधे तौर पर दस्तावेजों की कूटरचना की ओर संकेत करता है।
प्रशासनिक एवं विधिक बचाव का दृष्टिकोण
इस प्रकार के मामलों में यदि प्रशासनिक परंपराओं, नियमों और आरोपित पक्ष के संभावित विधिक बचाव को देखा जाए, तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 187(3) विधानसभा सचिवालय को एक स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय का दर्जा देता है। इसके तहत विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल के परामर्श से सचिवालय अपने भर्ती नियम बनाने या उनमें संशोधन करने के लिए अधिकृत होता है। पूर्व में भी कई राज्यों के सचिवालयों ने अपने यहाँ सीधी भर्ती के लिए स्वयं की चयन समितियां बनाई हैं, जिसे विधिक रूप से जायज ठहराया जाता रहा है। वैसे भी विधानसभा सचिवालय के भीतर नियुक्तियों और निर्णयों पर विधानसभा अध्यक्ष का सर्वोच्च नियंत्रण होता है। ऐसे मामलों में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि अध्यक्ष द्वारा ली गई संस्तुतियां या उनके निर्देश विशेषाधिकार के दायरे में आते हैं, जिन्हें सामान्य प्रशासनिक आचार संहिता के चश्मे से पूरी तरह नहीं देखा जा सकता। वहीं आवश्यक प्रशासनिक पदों (जैसे प्रमुख सचिव) को खाली न रखने या संक्रमण काल (चुनाव के दौरान) में व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने के लिए राज्यपाल या सक्षम प्राधिकारी की विशेष अनुमति से नियुक्तियां या कार्यभार सौंपे जाने के विधिक प्रावधान और अपवाद मौजूद होते हैं।
'संस्थागत भ्रष्टाचार' और युवाओं का भविष्य
जब किसी राज्य में युवाओं के रोजगार से जुड़ी संस्थाएं विवादों में घिरती हैं, तो इसका सीधा असर प्रदेश के लाखों बेरोजगारों के मनोबल पर पड़ता है। प्रतियोगिता परीक्षाओं की दिन-रात तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों का भरोसा व्यवस्था से उठने लगता है। यदि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की जगह 'अपराधिक साठगांठ' और 'फर्जी दस्तावेजों' का सहारा लिया गया है, तो यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य के साथ किया गया एक गंभीर खिलवाड़ है?
निष्पक्ष जांच की आवश्यकता
लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था (विधानसभा) की साख और लाखों युवाओं के भरोसे से जुड़े इस पूरे मामले की एक उच्च स्तरीय, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होना अनिवार्य है। कानून का यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। चूंकि यह मामला सीधे तौर पर लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था (विधानसभा) की साख और लाखों युवाओं के भरोसे से जुड़ा है, इसलिए इस पूरे मामले की एक उच्च स्तरीय, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होना अनिवार्य है। वैसे भी कानून का शासन यही कहता है कि आरोप चाहे कितने भी ऊंचे पद पर बैठे व्यक्ति पर क्यों न हों, उनकी निष्पक्षता से जांच होनी चाहिए। यदि उत्तर प्रदेश में पारदर्शिता और विधि का शासन बनाए रखना है, तो इस मामले की तह तक जाकर सच को सामने लाना होगा, ताकि राज्य के युवाओं को यह भरोसा मिल सके कि उनकी योग्यता की कद्र है, किसी कूटरचना की नहीं? यह जांच के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि 2011-12 में लिए गए निर्णय प्रशासनिक विवशता और विधिक अधिकारों के तहत थे या फिर यह वाकई 'सत्ता के दुरुपयोग' का एक गंभीर मामला है। शिकायतकर्ता ने इस पूरे मामले में 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988' और 'भारतीय न्याय संहिता' (BNS) की गंभीर धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज कर सभी संबंधित अभिलेखों की फॉरेंसिक और आपराधिक जांच की मांग की है।
राजनीतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य
इस मामले में विपक्ष के रुख पर नजर ड़ाली जाए तो यही तर्क होते हैं कि जब भी ऐसे संवेदनशील मामले सामने आते हैं, विपक्षी दल इसे 'संस्थागत भ्रष्टाचार' और सत्ता के दुरुपयोग का मुद्दा बनाते हैं। विपक्ष का लगातार यह आरोप रहता है कि बैकडोर एंट्री (पीछे के दरवाजे से भर्ती) के जरिए योग्य उम्मीदवारों के हक की अनदेखी की जाती है। वहीं बेरोजगार युवाओं और अभ्यर्थियों का पक्ष होता है कि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग और अन्य सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों का मानना है कि भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता का अभाव उनके भविष्य को अंधकार में धकेलता है। यदि किसी भी स्तर पर नियमों को शिथिल या परिवर्तित किया जाता है, तो इससे पूरी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है। युवाओं की मांग हमेशा 'समान अवसर' और 'निष्पक्ष चयन' की रही है।
शिकायत में क्या मुख्य आरोप
अधिवक्ता सौरभ सिंह सोमवंशी द्वारा प्रयागराज पुलिस कमिश्नर को दी गई तहरीर का पूरा ब्योरा दिया गया है। जिसमें आरोप है कि 1990 के दशक से लेकर अब तक विधानसभा सचिवालय में विभिन्न पदों पर रहते हुए वित्तीय विसंगतियों, नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को उपकृत करने और लोक सेवा आयोग के समानांतर एक ऐसी व्यवस्था बनाने के आरोप हैं जिससे नियुक्तियों में धांधली की जा सके। रिपोर्ट में सुल्तानपुर और रायबरेली रोड के बीच की संपत्तियों, कथित 'संस्थागत भ्रष्टाचार' और उत्तर प्रदेश के बेरोजगार युवाओं के साथ हुए अन्याय का विस्तार से उल्लेख किया गया है। विधानसभा सचिवालय में समीक्षा अधिकारी और सहायक समीक्षा अधिकारी के पदों पर जो नियुक्तियां हुईं, उनमें बड़े पैमाने पर भाई-भतीजावाद और फर्जीवाड़े के आरोप लगाए गए हैं। यही नहीं विधेयक और नियम का जिक्र करते हुए अखबार में छपे विज्ञापन संख्या 1/2019 और अन्य भर्तियों के दस्तावेजों, कट-ऑफ लिस्ट और चयन सूची का भी हवाला देते हुए कहा गया है कि किस प्रकार योग्य और मेरिट में आने वाले अभ्यर्थियों को दरकिनार कर कम अंक या अयोग्य लोगों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। तत्कालीन विधानसभा अध्यक्षों और उच्चाधिकारियों की भूमिका और उनके कार्यकाल के दौरान दी गई संस्तुतियों की विधिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं।
-27June-2026