रविवार, 10 मई 2026

बंगाल का नवनिर्माण: सुवेंदु सरकार के समक्ष चुनौतियां और 'सोनार बांग्ला' का रोडमैप

-सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन तक: पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी की अग्निपरीक्षा

BY-ओ.पी. पाल 
श्चिम बंगाल की सत्ता में पहली बार भारतीय जनता पार्टी का आना और सुवेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना राज्य के राजनीतिक इतिहास का एक बड़ा बदलाव है। सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार के सामने पुराने ढांचे को बदलने और जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की कई गंभीर चुनौतियां हैं। जिसमें राजनीतिक हिंसा, अवैध घुसपैठ और अराजकता पर नियंत्रण करना सबसे अहम है। इसिलए बंगाल में सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार सत्तासीन होना कोई फूलों की सेज नहीं, बल्कि कांटों से भरा ताज है? सुवेंदु सरकार की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कितनी जल्दी 'बदले की राजनीति' से ऊपर उठकर 'बदलाव की राजनीति' शुरू करते हैं। बंगाल की जनता अब केवल नारों से नहीं, बल्कि ठोस परिणामों से संतुष्ट होगी। यदि सुवेंदु अधिकारी कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने, युवाओं को रोजगार देने और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देने में सफल रहते हैं, तो वे वास्तव में बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक नए स्वर्ण युग के सूत्रधार बन सकते हैं। मसलन सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा सरकार के लिए यह एक कठिन परीक्षा भी है और अपनी क्षमता सिद्ध करने का ऐतिहासिक अवसर भी साबित होगा? मसलन 'सोनार बांग्ला' का सपना तभी साकार होगा, जब बंगाल का आम आदमी खुद को सुरक्षित महसूस करेगा और उसे अपनी मिट्टी में ही उन्नति के अवसर मिलेंगे। 
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श्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए युग की आहट सुनाई दे रही है। 34 साल के वामपंथी शासन और उसके बाद 15 वर्षों के ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के वर्चस्व का अस्त करके, यदि भाजपा ने सत्ता की दहलीज पार की है और सुवेंदु अधिकारी जैसा कद्दावर नेता मुख्यमंत्री का पदभार संभालता है, तो यह केवल एक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक वैचारिक और प्रशासनिक 'पुनर्जन्म' की चुनौती होगी। हालांकि सुवेंदु सरकार के सामने चुनौतियां पहाड़ जैसी हैं, क्योंकि उन्हें केवल सरकार नहीं चलानी, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति को बदलना है जिसने बंगाल की पहचान को पिछले कई दशकों से जकड़ रखा है। इतिहास गवाह है कि बंगाल की राजनीति का इतिहास रक्त रंजित रहा है। यहाँ सत्ता परिवर्तन का अर्थ अक्सर विपक्षी कार्यकर्ताओं के दमन से लगाया जाता है। सुवेंदु सरकार के लिए पहली और सबसे कठिन चुनौती इस 'हिंसक संस्कृति' को जड़ से मिटाना भी है। कैडर आधारित हिंसा पर रोकने की दिशा में कानून व्यवस्था दुरस्थ करना जरुरी है, क्योंकि बंगाल में राजनीतिक दल चुनाव के बाद भी अपने कैडर के माध्यम से जमीनी नियंत्रण बनाए रखते हैं, जो अक्सर झड़पों का कारण बनता है और इस बार भी सबने देखा है। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) जो कि अब मुख्य विपक्षी दल है और अन्य वामपंथी दलों के मजबूत धरातलीय कैडर के साथ तालमेल बिठाना तथा राजनीतिक प्रतिशोध की भावना को खत्म कर शांति बहाल करना भाजपा सरकार के सामने किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं होगी। सुवेंदु अधिकारी, जो स्वयं कभी टीएमसी के जमीनी शिल्पकार रहे हैं, उनके लिए यह एक व्यक्तिगत चुनौती होगी, कि वे बिना किसी प्रतिशोध के शांति बहाल करें। यदि राजनीतिक प्रतिशोध की भावना जारी रही, तो 'सोनार बांग्ला' का सपना हिंसा की भेंट चढ़ जाएगा। 

प्रशासनिक ढांचा और पुलिस का गैर-राजनीतिकरण 

पश्चिम बंगाल में प्रशासन पर 'पार्टी तंत्र' के हावी होने के आरोप लगते रहे हैं। पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता बहाल करना सुवेंदु सरकार की दूसरी बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए राज्य की पुलिस और नौकरशाही को यह विश्वास दिलाना होगा कि वे किसी दल के नहीं, बल्कि संविधान के प्रति उत्तरदायी हैं। पुलिस थानों को राजनीतिक दफ्तरों के प्रभाव से मुक्त करना अनिवार्य है। यानी अधिकारियों में निष्पक्षता, पारदर्शिता और कानून के प्रति जवाबदेही स्थापित करना एक बड़ी चुनौती है। वहीं भ्रष्टाचार पर नकेल (कट-मनी संस्कृति) कसनी होगी, क्योंकि बंगाल की स्थानीय राजनीति में 'कट-मनी' (सरकारी योजनाओं के लाभ के बदले कमीशन) एक गहरे नासूर की तरह फैल चुका है। सुवेंदु सरकार को एक पारदर्शी तंत्र विकसित करना होगा, जहाँ योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थी के बैंक खातों (डीबीटी) में पहुँचे, जिससे बिचौलियों का प्रभाव खत्म हो सके।

सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक न्याय
बंगाल एक संवेदनशील सीमावर्ती राज्य है। यहाँ की जनसांख्यिकी और सामाजिक ताने-बाने को सुरक्षित रखना सरकार की बड़ी जिम्मेदारी होगी। घुसपैठ पर नियंत्रण करते हुए सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा और अवैध गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए केंद्र के साथ मिलकर सख्त कदम उठाने होंगे। नए सीएम सुवेंदु अधिकारी को यह साबित करना होगा कि उनकी सरकार किसी धर्म या जाति विशेष की नहीं, बल्कि हर बंगाली की सरकार है। अल्पसंख्यकों के मन से डर निकालकर उन्हें विकास की मुख्यधारा में शामिल करना उनके नेतृत्व की सफलता तय करेगा। 


आर्थिक पुनरुद्धार और औद्योगिक क्रांति 
बंगाल जो कभी भारत की औद्योगिक राजधानी था, आज वहां से युवाओं का पलायन एक गंभीर समस्या है। सुवेंदु सरकार को 'इन्वेस्ट बंगाल' के नारे को हकीकत में बदलना होगा। बंद कारखानों का पुनरुद्धार करने की दिशा में नई सरकार को हावड़ा, हुगली और दुर्गापुर-आसनसोल बेल्ट में बंद पड़ी जूट मिलों और इंजीनियरिंग फैक्ट्रियों को फिर से शुरू करने के लिए विशेष पैकेज और नीतिगत बदलाव की आवश्यकता है। वहीं आईटी और सेवा क्षेत्र में कोलकाता को बेंगलुरु या हैदराबाद की तर्ज पर आईटी हब के रूप में विकसित करना होगा। इसके लिए भूमि अधिग्रहण की नीतियों को उद्योग-अनुकूल बनाना और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' में सुधार करना होगा। जब तक राज्य में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा नहीं होंगे, तब तक युवाओं का पलायन नहीं रुकेगा। लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) को प्रोत्साहन देना इस दिशा में क्रांतिकारी कदम हो सकता है। 

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का कायाकल्प 
बंगाल एक कृषि प्रधान राज्य है, लेकिन यहाँ का किसान आज भी बिचौलियों और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। आलू और धान की बम्पर पैदावार के बावजूद भंडारण की कमी के कारण किसान औने-पौने दाम पर फसल बेचने को मजबूर हैं। सरकार को हर ब्लॉक स्तर पर कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स की स्थापना करनी होगी। कृषि और किसान कल्याण के लिए राज्य के ग्रामीण और कृषि आधारित क्षेत्रों में किसानों की आय बढ़ाना और मंडियों की व्यवस्था को पारदर्शी बनाना आर्थिक मोर्चे पर परीक्षा होगी। वहीं कृषि उपज मंडियों में पारदर्शिता लाकर किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाना आर्थिक मोर्चे पर बड़ी परीक्षा होगी। केंद्र की किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं का शत-प्रतिशत क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा। 

शिक्षा और स्वास्थ्य: व्यवस्था का शुद्धिकरण 
जनता की बुनियादी सुविधाओं में स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था की दृष्टि से सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव और शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार को मिटाकर नई और पारदर्शी नीतियां लागू करके पारदर्शी व्यवस्था अपनानी होगी। हाल के सालों में शिक्षा भर्ती घोटालों ने भी बंगाल की साख को भारी ठेस पहुँचाई है। इसलिए सुवेंदु सरकार को शिक्षक भर्ती और अन्य सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता लाने के लिए डिजिटल और योग्यता-आधारित तंत्र बनाना होगा ताकि मेधावी युवाओं का विश्वास बहाल हो सके। वहीं स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार पर ध्यान देना होगा। यहां सरकारी अस्पतालों में आधुनिक सुविधाओं का अभाव और 'रेफरल कल्चर' ग्रामीण जनता के लिए अभिशाप है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं को राज्य में प्रभावी ढंग से लागू कर गरीबों को मुफ्त इलाज की सुविधा देना अनिवार्य है। 

बुनियादी ढांचा और जन-कल्याणकारी योजनाएं 
बंगाल ग्रामीण क्षेत्रों में पक्की सड़कें, 24 घंटे बिजली और हर घर नल से जल पहुँचाना भाजपा सरकार के लिए सुशासन की कसौटी होगी। खासकर उत्तर बंगाल और दक्षिण बंगाल के बीच की दूरी को कम करने के लिए एक्सप्रेस-वे और बेहतर रेल कनेक्टिविटी पर ध्यान देना होगा। सिलीगुड़ी को पूर्वोत्तर भारत के प्रवेश द्वार के रूप में और अधिक विकसित करने की आवश्यकता है। वहीं कल्याणकारी योजनाओं का सही वितरण करने की व्यवस्था के तहत भाजपा सरकार को यह साबित करना होगा कि केंद्र और राज्य की जन-कल्याणकारी योजनाएं (जैसे राशन, आवास योजना, पेंशन) बिना किसी भेदभाव और भ्रष्टाचार के सीधे अंतिम पायदान तक पहुंचें। इसी प्रकार पर्यटन के क्षेत्र में सुंदरबन, दार्जिलिंग और दीघा जैसे पर्यटन स्थलों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विपणन कर राज्य के राजस्व को बढ़ाया जा सकता है।
  -10May2026

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गुरुवार, 7 मई 2026

लहूलुहान लोकतंत्र: क्या नई सरकार बदलेगी बंगाल का हिंसक इतिहास?

चुनावी नतीजों के बाद जलता पश्चिम बंगाल: रक्तरंजित हुआ जनादेश 
By-ओ.पी. पाल 
श्चिम बंगाल में चुनाव के बाद की हिंसा केवल दो दलों का झगड़ा नहीं है, बल्कि यह बंगाल के लोकतांत्रिक मूल्यों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। क्या सत्ता का परिवर्तन केवल चेहरों का बदलना है, या यह उस हिंसक संस्कृति का भी अंत है, जिसने दशकों से इस महान प्रदेश को जकड़ रखा है? इसका जवाब आने वाले दिनों में नई सरकार की कार्यप्रणाली और पुलिस की निष्पक्षता से तय होगा, जहां शांति बहाली ही इस समय बंगाल की सबसे बड़ी जरूरत है। दरअसल बंगाल में सत्ता केवल सचिवालय (नबन्ना) तक सीमित नहीं है, यह गांवों के 'पाड़ा' और स्थानीय क्लबों तक फैली होती है। 15 साल तक सत्ता में रहने वाली तूणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का ढांचा बेहद मजबूत था। जैसे ही चुनाव परिणामों ने इस ढांचे को तोड़ा, प्रशासनिक स्तर पर एक 'शून्यता' पैदा हो गई और इस ऐतिहासिक जनादेश के बाद शांति की जगह आगजनी, तोड़फोड़ और हत्याओं ने ले ली और हार-जीत के इस खेल के बीच मानवता और कानून-व्यवस्था लहूलुहान होती नजर आई। शायद पुलिस और प्रशासन, जो कल तक पुरानी सरकार के आदेशों पर चल रहे थे, सत्ता परिवर्तन के इस दौर में दिशाहीन नजर आए और इसका फायदा उपद्रवियों ने उठाया। 

श्चिम बंगाल की जनता ने भाजपा को प्रचंड बहुमत देकर एक बदलाव की उम्मीद जताई है। लेकिन यदि यह बदलाव केवल 'चेहरों' का है और 'संस्कृति' वही हिंसक रही, तो बंगाल के विकास की राह फिर से अवरुद्ध हो जाएगी। हिंसा का असली कारण केवल 'हताशा' या 'अहंकार' नहीं है, बल्कि वह राजनीतिक व्यवस्था है, जहाँ असहमति के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। हालांकि पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा कोई नई घटना नहीं है। 1970 के दशक से लेकर वामपंथी शासन और फिर टीएमसी के कार्यकाल तक, सत्ता का रास्ता हमेशा संघर्षों से होकर गुजरा है। मसलन पश्चिम बंगाल की राजनीति में 'सत्ता' और 'हिंसा' का रिश्ता दशकों पुराना है यानी पश्चिम बंगाल की का शोर अक्सर हिंसा की गूंज के राजनीति में 'सत्ता परिवर्तन' साथ सुनाई देता है। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद जो मंजर दिखा, उसने राज्य के लोकतांत्रिक इतिहास में एक और काला अध्याय जोड़ दिया है। राज्य के विभिन्न हिस्सों से हिंसा की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे लोकतंत्र के लिए सुखद नहीं हैं। यहां राजनैतिक दल का कार्यकर्ता केवल समर्थक नहीं, बल्कि एक योद्धा की भूमिका में होता है। शायद यही कारण है कि भाजपा और टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व के बीच संवाद की कमी और एक-दूसरे के प्रति 'शत्रुतापूर्ण' भाषा ने निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को और उग्र कर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई औचित्य नहीं हो सकता। यदि भाजपा को राज्य में सुशासन स्थापित करना है, तो उसे 'प्रतिशोध की राजनीति' से ऊपर उठकर कानून का शासन स्थापित करना होगा। वहीं टीएमसी को एक जिम्मेदार विपक्ष के रूप में जनादेश को स्वीकार कर अपने कार्यकर्ताओं को शांत करना होगा। प्रशासन को चाहिए कि वह दोषियों की पहचान दलगत राजनीति से ऊपर उठकर करे ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। 

प्रशासनिक विफलता और चुनाव आयोग की भूमिका 
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव, डीजीपी और पुलिस कमिश्नर को सख्त निर्देश दिए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि उपद्रवियों को किसी भी राजनीतिक संरक्षण के बावजूद जेल भेजा जाए। चुनाव खत्म होने के बावजूद 700 से अधिक कंपनियां राज्य में रोकी गई हैं, ताकि स्थिति को नियंत्रित किया जा सके। अक्सर पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान तो सुरक्षा बल तैनात रहते हैं, लेकिन परिणामों के बाद स्थानीय पुलिस पर अक्सर 'मूकदर्शक' होने के आरोप लगते हैं। इस बार चुनाव आयोग ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। शायद आयोग राज्य में स्थिति की गंभीरता को समझ रहा है। इसी कारण केंद्रीय बलों को तैनात रखना और उपद्रवियों को सीधे जेल भेजने का फरमान प्रशासन की साख बचाने की आखिरी कोशिश है। 


लोकतंत्र में इन घटनाओं के क्या मायने
 
बंगाल में के बीरभूम के नानूर में टीएमसी कार्यकर्ता अबीर शेख की गला रेतकर हत्या और कोलकाता के न्यू टाउन में भाजपा कार्यकर्ता मधु मंडल की पीट-पीटकर हत्या इस हिंसा की क्रूरता को दर्शाती है। पिछले 24 घंटों में भाजपा और टीएमसी दोनों दलों के कम से कम 2-2 कार्यकर्ताओं की जान जा चुकी है। कोलकाता के न्यू मार्केट में टीएमसी दफ्तर को बुलडोजर से गिराना और आसनसोल, सिलीगुड़ी, हावड़ा में कार्यालयों को आग के हवाले करना यह बताता है कि यह केवल कार्यकर्ताओं की झड़प नहीं, बल्कि 'वर्चस्व' को खत्म करने की लड़ाई है। मुर्शिदाबाद में लेनिन की प्रतिमा को गिराना वैचारिक विद्वेष का प्रतीक बनकर उभरा, जो त्रिपुरा की 2018 की घटनाओं की याद दिलाता है। ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि चुनावी रंजिश अब व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल चुकी है। बंगाल में राजनीतिक दल केवल विचारधारा नहीं, बल्कि 'पाड़ा' (इलाके) पर नियंत्रण के लिए लड़ते हैं। सत्ता बदलते ही निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में इलाके पर कब्जा करने की होड़ मच गई। लेनिन की मूर्ति का गिराया जाना या विपक्षी दल के झंडे फाड़ना केवल संपत्ति का नुकसान नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करने की कोशिश है। 


ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन 
पश्चिम बंगाल में 4 मई 2026 को आए चुनावी नतीजों ने न केवल राज्य की राजनीति को बदल दिया, बल्कि राजनीतिक संघर्ष के एक नए युग की की शुरुआत भी कर दी। जहां 2021 में भाजपा 77 सीटों पर रुकी थी, वहीं इस बार उसने दो-तिहाई बहुमत (207 सीटें) प्राप्त कर राज्य की राजनीति का ध्रुवीकरण अपनी ओर कर लिया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अपने ही गढ़ भवानीपुर से भाजपा के सुवेंदु अधिकारी के हाथों हारना, इस हार की गंभीरता को और गहरा कर देता है। सत्ता का यह विशाल हस्तांतरण केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि यह वर्षों से चले आ रहे प्रशासनिक और जमीनी ढांचे के ढहने का संकेत भी था। लेकिन इस ऐतिहासिक जनादेश के साथ ही राज्य के हर हिस्से से आगजनी, तोड़फोड़ और हत्याओं की खबरें आने लगीं। 

'हार की हताशा' बनाम 'जीत का अहंकार' 
ऐसा लगता है कि इस हिंसा के पीछे दो विपरीत मनोवैज्ञानिक स्थितियाँ काम कर रही हैं, जिन पर दोनों दलों के अपने-अपने तर्क हैं। टीएमसी की हताशा भी स्वाभाविक है जहां 15 साल तक निर्बाध शासन करने के बाद इतनी बड़ी हार को स्वीकार करना टीएमसी के जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए कठिन रहा है और निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों के खत्म होने का डर है। माना जाता है कि जब भी किसी कैडर-आधारित पार्टी की हार होती है, तो उसका निचला स्तर या तो रक्षात्मक हिंसा करता है या पलायन। कई जगहों पर हार के बाद टीएमसी के भीतर गुटबाजी उभरी है, जिसे 'भाजपा के हमले' का नाम देकर दबाने की कोशिश की जा रही है। वैसे भी कई दशकों से बंगाल की राजनीति 'विजेता सब कुछ ले जाता है' की तर्ज पर चली है। सत्ता खोने का अर्थ है कि सरकारी संरक्षण का जाना, थानों में सुनवाई बंद होना और आर्थिक प्रभाव का कम होना। वहीं भाजपा का विजय के बाद पनपे उन्माद की दृष्टि पर गौर करें तो भाजपा ने दशकों के संघर्ष के बाद बंगाल में अपनी सरकार बनाई है। कई विश्लेषकों का मानना है कि लंबे समय तक टीएमसी के दमन का सामना करने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं में 'बदले की भावना' या 'विजय का अहंकार' दिखाई दे रहा है। विजय रैलियों के दौरान हुई झड़पें इसी आक्रामकता का परिणाम हैं।
 -07May-2026

https://bharatsarathi.com/?p=243490

https://www.pravakta.com/bleeding-democracy-will-the-new-government-change-bengals-violent-history/

https://janlekh.com/blood-soaked-democracy-will-the-new-government-change-bengals-violent-history/

रविवार, 3 मई 2026

भ्रष्टाचार बनाम विकास: बंगाल के भारी मतदान में छिपे हैं सत्ता परिवर्तन के गहरे संकेत

पश्चिम बंगाल में रिकार्ड 92.47 फीसदी मतदान, बदलाव की आहट या सत्ता का कवच? 

 
BY-ओ.पी. पाल 
श्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से जुनून, विचारधारा और जबरदस्त जनभागीदारी का मिश्रण रही है। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव ने जो तस्वीर पेश की है, उसने न केवल राज्य के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, बल्कि भारतीय चुनावी इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया है। दो चरणों के मतदान के बाद सामने आए रिकार्ड 92.47 प्रतिशत वोटिंग के अविश्वसनीय आंकड़े ने राजनीतिक विश्लेषकों, सत्ता पक्ष और विपक्ष यानी तीनों को गहरे आत्ममंथन में डाल दिया है। क्या यह मतदान किसी बड़े बदलाव की आहट है, या फिर अपनी मौजूदा सत्ता को बचाने के लिए जनता का संगठित प्रयास? वैसे इतिहास गवाह रहा है कि जब-जब बंगाल में मतदान का प्रतिशत अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है, तब-तब सत्ता के गलियारों में बड़े भूकंप आए हैं। 2011 का उदाहरण हमारे सामने है। क्या 2026 में इतिहास खुद को दोहराएगा या ममता बनर्जी अपनी 'अजेय' छवि को बरकरार रखने में कामयाब होंगी? इसकी तस्वीर 4 मई को होने वाली मतगणना के नतीजे तय कर देगी? 

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पश्चिम बंगाल के 24 जिलों में विधानसभा की 294 सीटों पर इस बार के चुनाव में जो सबसे बड़ी बात उभरकर सामने आई है, वह है मतदाताओं की संख्या में भारी इजाफा है। साल 2021 के विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार करीब 34 लाख ज्यादा वोटरों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है। पहले चरण में 93.19 प्रतिशत और दूसरे चरण में 91.66 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। मसलन इस आजाद भारत में पश्चिम बंगाल विधान सभा के चुनावी इतिहास का कुल 92.47 प्रतिशत मतदान एक रिकार्ड तैयार कर गया है यानी राज्य में अब तक का सर्वाधिक मतदान है। इससे पहले 2011 में 84.72 प्रतिशत मतदान का रिकॉर्ड था, जिसमें टीएमसी ने भाजपा से करीब 60 लाख ज्यादा वोट हासिल किए थे। जब राज्य में 34 साल पुराने वामपंथी शासन का अंत हुआ था। राजनीतिक विश्लेष्कों के मुताबिक ऐसे मतदान के रिकार्ड सत्ता परिवर्तन का संकेत देते रहे हैं। राज्य की 294 सीटों पर कुल 6.81 करोड़ मतदाता हैं। दो चरणों के इस चुनाव में जिस तरह से लोग घरों से बाहर निकले, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल का वोटर अब 'मौन' नहीं है, बल्कि यह मतदाताओं की ताकत है। राजनीतिक विशषज्ञों की माने बंगाल की जनता ने इस बार किन मुद्दों पर मुहर लगाई होगी, उन प्रमुख बिंदुओं का जिक्र करना भी जरुरी है। मसलन भ्रष्टाचार बनाम विकास के दृष्टिकोण से केंद्रीय एजेंसियों (ईडी या सीबीआई) द्वारा टीएमसी नेताओं पर की गई कार्रवाई और भ्रष्टाचार के आरोपों को भाजपा ने बड़ा मुद्दा बनाया। वहीं टीएमसी ने इसे 'बंगाल के अपमान' और 'केंद्र की तानाशाही' के रूप में पेश किया। वहीं युवाओं के लिए रोजगार की कमी और राज्य से बाहर पलायन एक ऐसा मुद्दा रहा है जो ग्रामीण बंगाल में गहराई तक असर करता है। हालांकि राज्य में पहचान की राजनीति की बात करें तो, मतुआ समुदाय के वोट और सीएए (सीएए) का मुद्दा भी इस बार के चुनाव में बैकग्राउंड में सक्रिय रहा है। 

चुनावी बिसात की असली 'किंगमेकर' महिला शक्ति 
बंगाल चुनाव के आंकड़ों का सबसे दिलचस्प पहलू महिलाओं की भागीदारी है। दूसरे चरण में जहाँ पुरुषों का मतदान प्रतिशत 91.07 प्रतिशत रहा, वहीं महिलाओं ने 92.28प्रतिशत मतदान कर बाजी मार ली। यह भी सच है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीति का एक बड़ा आधार 'महिला वोट बैंक' रहा है। 'लक्ष्मी भंडार', 'कन्याश्री' और 'रूपश्री' जैसी योजनाओं ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के प्रति महिलाओं में एक मजबूत जुड़ाव पैदा किया है। दूसरी ओर, भाजपा ने 'संदेशखाली' जैसे मुद्दों को उठाकर महिला सुरक्षा के सवाल पर टीएमसी को घेरने की कोशिश की थी। महिलाओं के इस रिकॉर्ड मतदान का मतलब है कि उन्होंने किसी एक नैरेटिव को पूरी तरह अपनाया है। अब देखना यह है कि वह 'सुरक्षा' का मुद्दा था या 'कल्याणकारी योजनाओं' का लाभ। 

भाजपा का 'बदलाव' बनाम टीएमसी का 'कवच' 
भाजपा इस चुनाव को 'सत्ता विरोधी लहर' (एंटी-इनकंबेंसी) मान रही है। पार्टी का तर्क है कि जब लोग बड़ी संख्या में बाहर निकलते हैं, तो वे मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट होकर बदलाव के लिए वोट करते हैं। भाजपा का कहना है कि केंद्रीय बलों की भारी तैनाती और 100 प्रतिशत वेबकास्टिंग के कारण इस बार मतदाता बिना किसी डर के बूथ तक पहुंचा। खासतौर से शहरी इलाकों और हाउसिंग सोसायटियों के भीतर बूथ बनाए जाने से मध्यम वर्ग का वोट प्रतिशत बढ़ा है, जिसे भाजपा अपना पारंपरिक वोट बैंक मानती है। उधर ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी इस अतिरिक्त 34 लाख वोटरों को अपना 'सुरक्षा कवच' मान रही है। टीएमसी का मानना है कि भाजपा के आक्रामक प्रचार और केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के खिलाफ उनके समर्थक और अल्पसंख्यक मतदाता एकजुट होकर बाहर निकले हैं। टीएमसी नेताओं का कहना है कि लोगों को यह डर था कि अगर वे वोट नहीं देंगे तो भविष्य में उनकी नागरिकता या पहचान पर संकट आ सकता है, इसलिए 'प्रतिरोध' स्वरूप यह भारी मतदान हुआ है। 

चुनाव आयोग की भूमिका: तकनीक और पारदर्शिता 
इस बार के चुनाव में चुनाव आयोग ने जिस तरह की मुस्तैदी दिखाई, उसने भी मतदान प्रतिशत बढ़ाने में मदद की। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनकी टीम ने कंट्रोल रूम से हर बूथ की शत-प्रतिशत वेबकास्टिंग (निगरानी )की गई। इससे धांधली की गुंजाइश कम हुई और आम जनता का विश्वास बढ़ा। बैलेट पेपर पर उम्मीदवारों की रंगीन तस्वीरें, दिव्यांगों के लिए मुफ्त परिवहन और व्हीलचेयर जैसी सुविधाओं ने मतदान को 'सुगम' बनाया। वहीं चुनाव के दौरान 120 करोड़ रुपये के नशीले पदार्थ जब्त करना और 23 लाख से ज्यादा अवैध विज्ञापनों को हटाना यह दर्शाता है कि आदर्श आचार संहिता को कड़ाई से लागू किया गया। 

एग्जिट पोल और 2021 की तुलना 
पश्चिम बंगाल के साल 2021 के चुनाव में टीएमसी और भाजपा के बीच करीब 60 लाख वोटों का अंतर था। टीएमसी ने 213 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था। जबकि 77 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार सत्ता परिवर्तन की पुरजोर कोशिश में जुटी है। इस बार के एग्जिट पोल की स्थिति काफी पेचीदा है। जहां कुछ एग्जिट पोल भाजपा को 140 से 170 सीटों के साथ सत्ता के करीब दिखा रहे हैं। जबकि तृणमूल कांग्रेस को 95 से 140 सीटों के बीच बताया गया है। कुछ सर्वे टीएमसी की वापसी का भी दावा कर रहे हैं, हालांकि उनकी सीटों में गिरावट का अनुमान लगाया गया है। ऐसे में यह मुकाबला और दिलचस्प हो गया है। हालांकि उनकी सीटों में गिरावट का अनुमान लगाया गया है। अतिरिक्त 34 लाख वोटर्स का यह ‘स्विंग’ भी तय करेगा कि 4 मई को आने वाले नतीजों के दौरान जीत का जश्नअकोलकाता के कालीघाट में मनेगा या भाजपा के राज्य मुख्यालय में आतिशबाजी नजर आएगी? 03May-2026

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

बदलते भारत की नई आर्थिक तस्वीर: वैश्विक अमीरों का नया ठिकाना बना मुंबई

वैश्विक 'अल्ट्रा-हाई-नेट-वर्थ' आबादी के लिए एक प्रमुख पावर हाउस 
By-ओ.पी. पाल 
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था के मंच पर अपनी एक अलग और मज़बूत पहचान बनाई है। तकनीक, नवाचार और पूंजी बाज़ारों में आए उछाल ने देश के भीतर धन-सृजन की प्रक्रिया को अभूतपूर्व गति दी है। हालिया जारी 'द वेल्थ रिपोर्ट 2026' इस बात की पुष्टि करता है कि भारत अब केवल एक विकासशील अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक 'अल्ट्रा-हाई-नेट-वर्थ' आबादी के लिए एक प्रमुख पावर हाउस बन चुका है। इस पूरे परिदृश्य के केंद्र में खड़ा है मुंबई, जो अभी भी मोनाको, हांगकांग और जिनेवा जैसे शहरों के मुकाबले बहुत अधिक 'वैल्यू फॉर मनी' प्रदान करता है। ऐसे ही मुंबई में प्राइम प्रॉपर्टी की कीमतों में इस उछाल की तुलना वैश्विक शहरों से की जाए, तो टोक्यो और दुबई जैसे शहरों के बाद भारत के बेंगलुरु और मुंबई ने दुनिया के कई विकसित देशों के बाज़ारों को पीछे छोड़ दिया है। मुंबई की सफलता के पीछे केवल धन का संकेंद्रण नहीं है, बल्कि बुनियादी ढांचे में हो रहे सुधार की भी गवाह है। 
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भारत का आर्थिक पावरहाउस इस रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले और महत्वपूर्ण आंकड़ों में से एक यह है कि भारत के कुल अल्ट्रा-अमीर लोगों में से 35.4 प्रतिशत अकेले मुंबई में निवास करते हैं। यह केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि इस शहर की आर्थिक गहराई और इसके प्रति निवेशकों के अटूट विश्वास का प्रमाण है। नाइट फ्रैंक की 'द वेल्थ रिपोर्ट 2026' के 20वें संस्करण की ताजा रिपोर्ट इस बात की भी पुष्टि करती है कि मुंबई की यह सफलता अचानक नहीं आई है, बल्कि पिछले पांच वर्षों में भारत की जीडीपी में हुई 38 प्रतिशत की वृद्धि का सबसे बड़ा लाभ इसी शहर को मिला है। देश की वित्तीय राजधानी होने के नाते, मुंबई ने न केवल पुराने औद्योगिक घरानों को सहेजा है, बल्कि नए ज़माने के टेक-टाइकून और स्टार्टअप संस्थापकों को भी अपनी ओर आकर्षित किया है। सीमित भूमि उपलब्धता और भौगोलिक सीमाओं (तटीय क्षेत्र) के बावजूद, मुंबई की मांग में कोई कमी नहीं आई है, जिसने यहाँ की प्रॉपर्टी की कीमतों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना दिया है। यानी मुंबई में 1 मिलियन USD में अब केवल 96 वर्ग मीटर (लगभग 1,033 वर्ग फ़ीट) जगह खरीदी जा सकती है। हालांकि यह संख्या दिल्ली और बेंगलुरु की तुलना में कम है, लेकिन अगर हम वैश्विक संदर्भ में देखें, तो मुंबई अभी भी मोनाको (16 वर्ग मीटर), हांगकांग (23 वर्ग मीटर) और जिनेवा (28 वर्ग मीटर) जैसे शहरों के मुकाबले बहुत अधिक 'वैल्यू फॉर मनी' प्रदान करता है। 

भारत का बढ़ता वैश्विक कद 
वेल्थ रिपोर्ट 2026 भारत की आर्थिक परिपक्वता की एक गौरवशाली तस्वीर पेश करती है। 2021 से 2026 के बीच, 30 मिलियन USD (लगभग 250 करोड़ रुपये) से अधिक की संपत्ति रखने वाले लोगों की संख्या में 63 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी देखी गई है। यह संख्या 12,000 से बढ़कर 19,877 हो गई है। इस वृद्धि के साथ ही भारत अब दुनिया का छठा सबसे बड़ा उच्च निवल संपत्ति (UHNW) वाला बाज़ार बन गया है। रिपोर्ट का 'वेल्थ साइज़िंग मॉडल' अनुमान लगाता है कि यह रफ़्तार यहीं नहीं रुकने वाली। 2031 तक भारत की अल्ट्रा-अमीर आबादी 27 प्रतिशत और बढ़कर 25,217 तक पहुँचने की उम्मीद है। हम वैश्विक स्तर पर जब हम लक्ज़री रियल एस्टेट की तुलना करते हैं, तो '1 मिलियन USD' (लगभग 8.3 करोड़ रुपये) एक मानक पैमाना माना जाता है। यह रिपोर्ट दिखाती है कि मुंबई में जमीन की कीमतें कितनी तेज़ी से बढ़ रही हैं। 

अल्ट्रा-लक्ज़री मार्केट में बड़ा उछाल 
'द वेल्थ रिपोर्ट 2026' रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 मुंबई के रियल एस्टेट इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ है। इस साल शहर में 5 मिलियन यूएसडी (लगभग 41 करोड़ रुपये) से अधिक मूल्य वाले 56 नए अल्ट्रा-लक्ज़री घरों के सौदे हुए। यह रुझान एक गहरे व्यवहारिक बदलाव की ओर इशारा करता है। नाइट फ्रैंक इंडिया के चेयरमैन शिशिर बैजल के अनुसार, अब भारत के अमीर लोग केवल 'निवेश' के लिए घर नहीं खरीद रहे, बल्कि वे अपनी 'जीवनशैली' को अपग्रेड कर रहे हैं। कोरोना महामारी के बाद के दौर में, बड़े रहने की जगहें, विश्व-स्तरीय सुख-सुविधाएं और 'ब्रांडेड रेजिडेंस' की मांग तेज़ी से बढ़ी है। 
अमीर खरीदार अब ऐसे घरों की तलाश में हैं जो उन्हें वैश्विक स्तर का अनुभव प्रदान करें। मुंबई में कोस्टल रोड, नए मेट्रो लिंक और ट्रांस-हार्बर लिंक जैसे प्रोजेक्ट्स ने शहर की कनेक्टिविटी को वैश्विक स्तर पर पहुँचा दिया है। आने वाले समय में, जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था और मज़बूत होगी, मुंबई जैसे शहरों में लक्ज़री रियल एस्टेट की मांग 'एंड-यूज़र' (स्वयं रहने वाले खरीदारों) द्वारा संचालित होगी। यह न केवल रियल एस्टेट सेक्टर के लिए अच्छा संकेत है, बल्कि यह देश की समग्र आर्थिक स्थिरता और आत्मविश्वास का भी प्रतीक है। 

बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले में मुंबई 
यह रिपोर्ट के मुताबिक 'प्राइम इंटरनेशनल रेजिडेंशियल इंडेक्स' में 100 शहरों में लक्ज़री हाउसिंग के प्रदर्शन को ट्रैक किया गया है, जिसके निष्कर्षों पर नजर ड़ालें तो साल 2025 में प्राइम रेजिडेंशियल कीमतों में औसतन 3.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो लगातार दूसरे साल मुख्यधारा के हाउसिंग बाज़ारों से बेहतर प्रदर्शन रहा। साल 2025 में प्राइम और सुपर-प्राइम सेगमेंट में मज़बूत मांग के चलते प्राइम रेजिडेंशियल कीमतों में 8.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। लक्ज़री रेजिडेंशियल बाज़ारों का प्रदर्शन के मामले में वैश्विक रैंकिंग में भी इस शहर ने काफ़ी ऊपर छलांग लगाई, और 2024 में 21वें स्थान से बढ़कर 2025 में 10वें स्थान पर पहुँच गया। हालांकि बेंगलुरु 9.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 8वें स्थान पर है। इस वैश्विक रैंकिंग में 58.5 प्रतिशत के साथ टोक्यो पहले पायदान पर है, इसके बाद दुबई 25.1 प्रतिशत, मनीला 17.5 प्रतिशत और सियोल 14.7 प्रतिशत टॉप 5 में शामिल हैं। भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली इस मामले में 6.9 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 17वें स्थान पर आती है। 
30Apr, 01May-2026

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

महिला आरक्षण: 'आधी आबादी' का हक या परिसीमन की पेचीदा बिसात?

महिला आरक्षण और परिसीमन: क्या 'सीटें' बढ़ाए बिना मुमकिन है 'हक' देना? 
आरक्षण की 'शक्ति' और परिसीमन का 'पेंच' 
BY-ओ.पी. पाल 
भारतीय राजनीति में 'महिला आरक्षण' एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिसे हर दल चलाना चाहता है, लेकिन इसकी 'कमान' किसके हाथ में रहेगी, इसी पर असली युद्ध छिड़ा है। वर्तमान परिस्थितियों में परिसीमन वह पुल है, जिसे पार किए बिना आरक्षण की मंजिल तक पहुंचना नामुमकिन है। यदि लोकसभा में वर्तमान 543 सीटों पर ही 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होता है, तो लगभग 181 सीटें सीधे तौर पर पुरुषों के हाथ से निकल जाएंगी। इससे राजनीतिक दलों के भीतर अंदरूनी विद्रोह और पुरुष प्रधान राजनीति में असंतोष पैदा हो सकता है। मसलन महिलाओं को आरक्षण देने के लिए परिसीमन ही एक समाधान है, जिसके बाद लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 800 से अधिक होने पर यदि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित भी होती हैं, तो भी पुरुषों के लिए उपलब्ध सीटों की संख्या वर्तमान की तुलना में कम नहीं होगी। यही कारण है कि 'सीटें बढ़ाना' इस गतिरोध का एकमात्र व्यावहारिक समाधान है। सरकार का भी शायद यही मकसद है कि लोकसभा सीटें बढ़ाने के बाद ही 33 प्रतिशत आरक्षण लागू हो, ताकि पुरुष सांसदों की सीट पर असर न पड़े। इसके विपरीत, मौजूदा सीटों में ही आरक्षण लागू करना भी संभव माना जाता है, जो इसे बिना सीट बढ़ाए भी मुमकिन बनाता है। 
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भारतीय लोकतंत्र में समावेशिता के लिए इन दोनों विधेयकों (आरक्षण और परिसीमन) पर सर्वसम्मति अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं होता, तो यह मुद्दा केवल चुनावी घोषणापत्रों तक सीमित रहेगा। हालांकि महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को परिसीमन से जोड़ना एक जटिल राजनीतिक और संवैधानिक मुद्दा है। केंद्र सरकार ने साल 2023 के (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) महिला आरक्षण के क़ानून को लागू करने के लिए नोटिफ़िकेशन जारी करके महिला आरक्षण का 'चेक' तो काट दिया गया है, लेकिन उस पर 'तारीख' परिसीमन की डाली गई है। यह भी सत्य है कि सदनों में बिना सीटें बढ़ाए महिला आरक्षण लागू करने से 'पुरुषों का हक' छिनने का डर पैदा होगा। इसीलिए सरकार ने लोकसभा में केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक भी महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को परिसीमन के साथ पेश किया था, ताकि केंद्र शासित प्रदेशों के निर्वाचन, क़ानून व आरक्षण व्यवस्था को नए परिसीमन और लोकसभा के विस्तार ढांचे से जोड़ा जा सके। लेकिन विपक्ष ने इसे अटकाकर सरकार के इरादों पर पानी फेर दिया। लोकसभा में महिला आरक्षण क़ानून और डीलिमिटेशन से जुड़ा 131वां संवैधानिक संशोधन विधेयक गिरने के बाद राजनैतिक गलियारे में यह भी चर्चा है कि महिला आरक्षण और डीलिमिटेशन से जुड़े बिलों का गिरना भाजपानीत एनडीए के लिए झटका है या 'मास्टरस्ट्रोक'? हालांकि विश्लेषकों की नजर में इस विधेयक का गिरना सरकार के लिए झटका है। 

विपक्ष पर फूटा ठींकरा? 
बहराल, लोकसभा में हालिया घटनाक्रम के बाद देश की महिलाओं के बीच जो संदेश गया है, उसके दो पहलू माने जा रहे हैं। इनमें एनडीए के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने इस बिल के जरिए जहां खुद को 'नारी शक्ति' का सबसे बड़ा पैरोकार साबित करने की कोशिश की है, वहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दृष्टि से इसे 'नारी शक्ति वंदन' नाम देकर एक भावनात्मक और सांस्कृतिक मुद्दा बना दिया गया है। इसलिए बिल के लागू होने में देरी या बाधा के लिए एनडीए सरकार अब विपक्ष को 'महिला विरोधी' करार दे रही है। गृहमंत्री अमित शाह का यह बयान कि विपक्ष को महिलाओं के क्रोध का सामना करना पड़ेगा, इसी रणनीति का हिस्सा है। सरकार का तर्क है कि सीटों की संख्या बढ़ाकर महिलाओं को आरक्षण देने से मौजूदा सीटों का पुनर्गठन नहीं करना पड़ेगा और पुरुष सांसदों का हक भी सुरक्षित रहेगा। 

विपक्ष की चुनौती और तर्क 
लोकसभा में पिछले 12 साल में ये पहली बार हुआ है, जब सदन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सरकार की तरफ़ से पेश कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक सदन में गिरा हो। सदन में इस विधेयक को लेकर हुई चर्चा के दौरान कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों (सपा, राजद) का तर्क दिया है कि बिना एससी/एसटी और ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटे के, यह बिल केवल 'सभ्रांत महिलाओं' तक सीमित रह जाएगा। परिसीमन का संदेह जताते हुए विपक्ष ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार परिसीमन की आड़ में दक्षिण भारत की सीटें कम करना चाहती है और उत्तर भारत (जहां भाजपा मजबूत है) का प्रभाव बढ़ाना चाहती है। विपक्ष हवा-हवाई वादा करार देते हुए इसे ‘चुनावी जुमला’ कह रहा है, क्योंकि इसके लागू होने की तारीख (संभवतः 2029) बहुत दूर है। जबकि विपक्ष इस बिल को अटकाकर जातिगत जनगणना और तत्काल लागू करने की मांग कर रहा है। 


राजनीतिक परिस्थितियों का विश्लेषण 
एनडीए ने महिला वोट बैंक' लाड़ली बहना' जैसी योजनाओं से महिलाओं में पकड़ मजबूत की है। एनडीए का मानना है कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार देना केवल संवैधानिक मजबूरी नहीं, बल्कि एक सशक्त राष्ट्र के लिए नैतिक जिम्मेदारी है। इसलिए अब उनके 'हक और हिस्सेदारी' की बात कर ओबीसी और दलित महिलाओं को साधने के अलावा दक्षिण भारत के राज्यों के साथ 'अन्याय' का मुद्दा उठाकर क्षेत्रीय गौरव भुनाने की कोशिश की है। एनडीए को उत्तर-दक्षिण विभाजन उत्तर भारत में सीटों की बढ़ोत्तरी से बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है। एनडीए का मानना है कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार देना केवल संवैधानिक मजबूरी नहीं, बल्कि एक सशक्त राष्ट्र के लिए नैतिक जिम्मेदारी है। लेकिन लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक का अधूरा रहना केवल एक विधायी पराजय नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की अधूरी प्रतिबद्धता का प्रतीक भी माना जा रहा है। 


केवल कानून नहीं, सामाजिक न्याय का मार्ग 
राजनैतिक विशेषज्ञ मानते है कि महिला आरक्षण विधेयक केवल सीटों के आवंटन का मामला नहीं है। यह नीतियों में संवेदनशीलता लाने का एक जरिया है। यदि विधानसभाओं और लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी 33 प्रतिशत होती है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक व्यावहारिक और मानवीय होगी। वर्तमान में संसद में महिलाओं की उपस्थिति 15 प्रतिशत से भी कम होना इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र का यह हिस्सा अब भी असंतुलित है। दशकों तक यह विधेयक राजनीतिक असहमति के कारण अधर में लटका रहा। जनगणना आधारित सीटों के पुनर्वितरण (परिसीमन) और 'कोटे के भीतर कोटा' जैसी आपत्तियों ने इसे कभी पारित नहीं होने दिया। सपा और अन्य क्षेत्रीय दलों की अपनी आशंकाएं थीं, वहीं भाजपा के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाना एक कठिन चुनौती बनी रही। इन तमाम कारणों ने कई बार एक ऐतिहासिक अवसर को जन्म लेने से पहले ही समाप्त कर दिया। 
  20Apr-2026
https://www.pravakta.com/womens-reservation-and-delimitation-is-it-possible-to-give-rights-without-increasing-the-seats/?fbclid=IwY2xjawRWs4lleHRuA2FlbQIxMQBzcnRjBmFwcF9pZBAyMjIwMzkxNzg4MjAwODkyAAEegArjEbHqitoNbPDXnYm4OR8VpPeOdx9dtMGz2y7PBz_u163fdQGobnXFb0k_aem_y2Gfdrby1GIPuUdEEhTMJg
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रविवार, 12 अप्रैल 2026

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव: द्रविड़ सियासत का 'लिटमस टेस्ट' या नए युग का आगाज़

-चुप्पी के पीछे का तूफ़ान: कौन जीतेगा 'तमिल गौरव' की जंग? 

By-ओ.पी. पाल 
मिलनाडु की राजनीति को समझने के लिए अक्सर वहां की रैलियों का शोर और सिनेमाई सितारों का 'कट-आउट' काफी माना जाता रहा है। लेकिन 23 अप्रैल 2026 को विधानसभा की 234 सीटो पर होने वाले चुनाव से ठीक पहले राज्य की गलियों में पसरा 'सन्नाटा' किसी खामोशी का नहीं, बल्कि एक बहुत बड़े सियासी मंथन का संकेत है। इस बार का चुनाव केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि यह इस बात का लिटमस टेस्ट है कि क्या 50 साल पुराना द्रविड़ वर्चस्व अब बहु-ध्रुवीय राजनीति के सामने झुकने को तैयार है? यानी एक गहरी राजनैतिक परिपक्वता और त्रिस्तरीय मुकाबले का संकेत है। विशेषकर महिला मतदाता, जो राज्य की आबादी का 51 प्रतिशत हैं, उन्होंने अपनी चुप्पी से डीएमके और एआईएडीएमके दोनों खेमों की नींद उड़ा दी है। हालांकि सभी राजनीतिक दल अपनी नई चुनावी रणनीति के साथ चुनावी जंग में हैं। 
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मिलनाडु राजनीति के इतिहास पर नजर डाली जाए, तो चुनाव में तमिलनाडु की राजनीति में इस समय द्रविड़ दलों यानी द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एडीएमके) को अक्सर एक राजनीतिक महाशक्ति के रूप में देखा जाता है। ये दोनों प्रमुख दल ही पिछले दशकों से राज्य पर शासन करते आ रहे हैं। लेकिन तमिलनाडु विधानसभा चुनाव को लेकर इस बार सियासी तस्वीर काफी बदली हुई नजर आ रही है। जहां पहले चुनावों में किसी एक पार्टी या गठबंधन की लहर नजर आती थी, वहीं इस बार ऐसा कोई सियासी परिदृश्य नहीं है। राजग और इंडिया गठबंधन दोनों अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान में हैं, लेकिन जनता का मूड अभी भी शांत और सोच-समझकर फैसला लेने वाला दिख रहा है। राज्य में चुनावी सरगिर्मयों के बीच इस बार चुनावी रैलियों में वह पारंपरिक उन्माद नहीं दिख रहा, जो कभी एमजीआर, जयललिता या करुणानिधि के दौर में होता था। इस बार मतदाता मौन है और लगता है कि जनता इस बार उम्मीदवारों के चेहरों को नहीं, बल्कि उनके ट्रैक रिकॉर्ड को तौल रही है। यह सन्नाटा बताता है कि मतदाता इस बार 'लहर' के बहाव में नहीं, बल्कि 'परिणाम' के प्रभाव पर वोट करेगा। मसलन इस बार का चुनाव यह तय करेगा कि क्या तमिलनाडु अपनी पारंपरिक द्रविड़ सीमाओं में ही रहेगा या फिर वह राष्ट्रीय मुख्यधारा की राजनीति और नए क्षेत्रीय चेहरों के लिए अपने दरवाजे खोलेगा। दरअसल जब तमिलनाडु का मतदाता शांत होता है, तो वह अक्सर किसी बड़े 'उलटफेर' की पटकथा लिख रहा होता है। 4 मई के नतीजे केवल एक मुख्यमंत्री नहीं चुनेंगे, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति की अगली आधी सदी का रुख तय करेंगे। 


डीएमके का वर्चस्व और एडीएमके का अस्तित्व 
सत्ताधारी डीएमके अपने 'द्रविड़ मॉडल' और महिला केंद्रित कल्याणकारी योजनाओं के भरोसे मैदान में है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के लिए यह चुनाव अपनी विरासत को स्थायी बनाने की लड़ाई है। इसमें उनका मजबूत कैडर और सरकारी योजनाओं की जमीनी पहुंच मानी जा रही है। हालांकि मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का चेहरा सबसे बड़ा है, लेकिन गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस, छोटे दलों और वामपंथी दलों में दबी हुई नाराजगी के साथ ही कार्यकर्ताओं के बीच जमीनी स्तर पर तालमेल की कमी एक ‘अदृश्य दरार’ पैदा कर रही है। वहीं सनातन धर्म जैसे विवादित बयानों ने जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन को असहज किया है, उसका असर स्थानीय स्तर पर भाजपा भुनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के लिए तमिलनाडु हमेशा से एक 'अजेय दुर्ग' रहा है, लेकिन इस बार पार्टी ने अपनी रणनीति बदली है। एआईएडीएमके के साथ दोबारा हुए गठबंधन ने राजग को नई ऊर्जा दी है। हालांकि एआईएडीएमके का आंतरिक नेतृत्व संकट अभी भी पूरी तरह सुलझा नहीं है। के. अन्नामलाई के नेतृत्व में भाजपा ने खुद को 'आक्रामक विपक्ष' के रूप में पेश किया है। वे हिंदुत्व को 'तमिल गौरव' से जोड़कर उस वैचारिक चक्रव्यूह को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे द्रविड़ राजनीति ने दशकों से बनाया था। वहीं इस चुनाव में अभिनेता से नेता बने विजय और उनकी पार्टी तमिझगा वेत्री कझगम (टीवीके) इस चुनाव के सबसे बड़े 'ब्लैक हॉर्स' साबित हो सकते हैं। पहली बार वोट देने वाले करोड़ों युवा, जो पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से अलग विकल्प ढूंढ रहे हैं। यह विजय का 'फैन बेस' अगर पोलिंग बूथ तक पहुँचा, तो वह बड़े-बड़े दिग्गजों का सियासी गणित बिगाड़ सकता है। 


मुख्यधारा के दलों का 'ब्राह्मण मुक्त' दांव 
तमिलनाडु की सियासत में 2026 का विधानसभा चुनाव एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व मोड़ पर खड़ा है। राज्य के राजनीतिक इतिहास में शायद यह पहला मौका है जब डीएमके, एडीएमके, भाजपा और कांग्रेस जैसे सभी मुख्यधारा के दलों ने किसी भी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है। राज्य में करीब 3 फीसदी ब्राह्मण आबादी वाले इस समुदाय का मुख्यधारा की चुनावी राजनीति से यह 'पूर्ण निर्वासन' कई गहरे सवाल खड़े करता है। जयललिता (जो स्वयं ब्राह्मण थीं) के दौर में पार्टी इस समुदाय की स्वाभाविक पसंद थी, लेकिन 35 साल में पहली बार एआईएडीएमके ने एक भी ब्राह्मण चेहरा मैदान में नहीं उतारा है। वहीं हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा ने भी अपने कोटे की 27 सीटों पर किसी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया। जबकि जयललिता के निधन के बाद यह समुदाय पूरी तरह भाजपा की ओर शिफ्ट हो गया। भाजपा ने संगठन में तो एच. राजा और के.टी. राघवन जैसे चेहरे रखे हैं, लेकिन चुनावी जंग के लिए ओबीसी और दलित कार्ड पर भरोसा जताया है। इससे यही संकेत मिलता है कि भाजपा की रणनीति अब 'ब्राह्मण-बनिया' छवि से बाहर निकलकर 'पिछड़ा वर्ग' की पार्टी बनने की है, ताकि वह द्रविड़ दलों के कोर वोट बैंक में सेंध लगा सके। इसी प्रकार द्रविड़ विचारधारा की ध्वजवाहक डीएमके के लिए यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन कांग्रेस ने भी इस बार सामाजिक समीकरणों के चलते ब्राह्मण समुदाय से दूरी बना ली है। जबकि सीमन की 'नाम तमिलर काची' (एनटीके) ने सबसे ज्यादा 6 ब्राह्मण उम्मीदवारों (4 महिलाएं, 2 पुरुष) को टिकट दिया है। सीमन का तर्क है कि तमिल ब्राह्मण भी मूल तमिल हैं, जो पेरियारवादी राजनीति के 'ब्राह्मण-विरोध' से बिल्कुल अलग रुख है। 


त्रिकोणीय मुकाबले की उम्मीद? 
राजग द्रविड संस्कृति वाली सियासत के इस चुनावी मुकाबले को नई रणनीति के साथ उतरी है। पिछले लोकसकभा चुनाव में एडीएमके से टूटे रिश्ते बहाल करके भाजपा अब विधानसभा के चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की इस रणनीति के साथ चुनाव मैदान में है। एडीएमके के नेतृत्व में राजग गठबंधन में एडीएमके ने खुद 178 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि सहयोगी दलों में भाजपा को 27 औ पीएमके को 18 सीट दी हैं। वहीं इंडिया गठबंधन गठबंधन के फॉर्मूले के तहत डीएमके 164 सीटों पर खुद चुनाव लड़ेगी, जबकि 70 सीटें कांग्रेस और अन्य सहयोगियों को दी गई हैं, जिसमें कांग्रेस को 28 सीटें मिली हैं। तमिलनाडु की राजनीति में डीएमके और एडीएमके जैसे प्रमुख दलों के अलावा के. कृष्णा सामी की पुथिया तमिलागम, जीके वासन की तमिल मनीला कांग्रेस(मूपनार), भाकपा, सीपीआईएम, वीसीके, आईयूएमएल, वाइको की एमडीएमके, एसी शनमुगम की पीएनके जैसे दल चुनावी जंग में रहे हैं। 

महिलाएं और युवा बन सकती है ‘गेम चेंजर’ 
तमिलनाडु की जनसंख्या में 80 प्रतिशत ओबीसी और लगभग 24 प्रतिशत एमबीसी आबादी है। भाजपा और डीएमके दोनों ने ही अपने उम्मीदवारों की सूची में इस सामाजिक संतुलन को साधने की कोशिश की है। वहीं राज्य की लगभग 12-15 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी (मुस्लिम और ईसाई) इस बार निर्णायक भूमिका में होगी। आमतौर पर अल्पसंख्यक वोट बैंक पारंपरिक रूप से डीएमके की ओर जाता रहा है, लेकिन अगर एडीएमके और टीवीके ने खुद को एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प के रूप में मजबूती से पेश किया, तो यहां बिखराव देखने को मिल सकता है। अल्पसंख्यक वोटों का यह बिखराव सीधे भाजपा-एआईएडीएमके गठबंधन के लिए राह आसान हो सकता है। दूसरा पहलू ये भी है कि तमिलनाडु में लगभग 51 प्रतिशत महिला मतदाता किसी भी चुनाव का रुख बदल सकती हैं। वहीं युवा मतदाता बड़ी संख्या में हैं, जिनका रुझान विजय की टीवीके का प्रभाव जरूर है, लेकिन यह वोट में कितना बदलेगा, यह चुनाव के दिन ही पता चलेगा। इसलिए महिला और युवा वोटर इस बार चुनाव के सबसे बड़े ‘गेम चेंजर’ माना जा रहा है। 
  12-13Apr-2026

केरल विधानसभा चुनाव: भाजपा के लिए आसान नहीं ‘रेड कॉरिडोर’ पर भगवा फहराना

ध्रुवीकरण के दौर में कांग्रेस के सामने भी दोहरे मोर्चे पर साख बचाना बड़ी चुनौती

 
By-ओ.पी. पाल 
केरल में 9 अप्रैल, 2026 को होने वाले 140 सीटों के लिए विधानसभा चुनाव राज्य के राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित होने वाले हैं। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में आकर इतिहास रचने की कोशिश में है, वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) और भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा (राजग) अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। मसलन यह चुनाव केवल यह तय नहीं करेगा कि अगली सरकार किसकी होगी, बल्कि यह केरल के ‘द्वि-ध्रुवीय’ राजनीतिक ढांचे के भविष्य को भी तय करेगा। यदि एलडीएफ जीतता है, तो यह पिनाराई विजयन के 'अजेय' होने की पुष्टि करेगा। यदि यूडीएफ जीतता है, तो यह कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संजीवनी का काम करेगा। वहीं राजग का प्रदर्शन यह बताएगा कि क्या भाजपा दक्षिण के इस दुर्ग में सेंध लगा पाई है। दूसरी ओर केरल की 15वीं विधानसभा का लेखा-जोखा राज्य की लोकतांत्रिक परिपक्वता और विधायी प्राथमिकताओं की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करता है। पिछले पांच वर्षों का डेटा यह दर्शाता है कि जहाँ एक ओर कार्यक्षमता में वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर विधायी समीक्षा की गहराई को लेकर कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठे हैं। फिर भी 4 मई को आने वाले नतीजे आएंगे, तो वह केवल एक सरकार का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह केरल के साक्षर और जागरूक मतदाताओं के उस 'विवेक' का परिणाम होगा, जो वैश्विक युद्ध से लेकर स्थानीय पेंशन तक हर पहलू को बारीकी से परखता नजर आएगा? 


केरल की राजनीति मुख्य रूप से तीन ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिसमें वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और माकपा के नेतृत्व में यह गठबंधन नव केरल के विजन और पिछले 10 वर्षों के प्रोग्रेस रिपोर्ट के साथ मैदान में है। वाम लोकतांत्रिक मोर्चा ने अपने 'दो कार्यकाल' वाले कड़े नियम में ढील देकर यह साफ कर दिया है कि वह जीत के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। जबकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेतृत्व में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सत्ता परिवर्तन की लहर पर सवार है। 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में मिली जीत ने यूडीएफ के कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा है। इन्होंने इंदिरा गारंटी के माध्यम से महिलाओं और युवाओं को लुभाने की कोशिश की है। जबिक राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा के नेतृत्व करने वाली भाजपा केरल में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए संघर्ष कर रही है। तिरुवनंतपुरम और त्रिशूर जैसे क्षेत्रों में बढ़ते जनाधार के साथ, राजग इस बार ‘विकसित केरल’ के नारे के साथ किंगमेकर बनने की उम्मीद कर रहा है। सत्ता पक्ष को इसिलए वापसी की उम्मीद है कि उसने मौजूदा कार्यकाल के दौरान केरल की विधानसभा ने कामकाज के मामले में एक मानक स्थापित किया है, विशेषकर समितियों के उपयोग और बिलों के पारित होने की संख्या में वृद्धि सरकार की तीव्रता दर्शाता है। राज्य 2026 के चुनावों में ये विधायी रिकॉर्ड शासन के मॉडल को समझने में मतदाताओं के लिए एक प्रमुख आधार साबित हो सकता है। मसलन इस कार्यकाल के दौरान विधायी कार्यों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। पिछली विधानसभा (2016-21) में जहां 80 बिल पास हुए थे, वहीं 15वीं विधानसभा में यह संख्या बढ़कर 129 तक पहुंच गई। जो पिछले कार्यकाल की तुलना में 61 फीसदी की वृद्धि दर्शाता है। वहीं यह राज्य में व्यापक कानूनी और प्रशासनिक बदलावों का संकेत देती है। ऐसे में केरल की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ इतिहास और भविष्य का आमना-सामना हो रहा है। 140 सीटों और 2.7 करोड़ मतदाताओं वाले इस राज्य में चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर है। 

मुख्य गठबंधन और राजनीतिक समीकरण 

केरल की राजनीति मुख्य रूप से तीन ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिसमें वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और माकपा के नेतृत्व में यह गठबंधन नव केरल के विजन और पिछले 10 वर्षों के प्रोग्रेस रिपोर्ट के साथ मैदान में है। जबकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेतृत्व में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सत्ता परिवर्तन की लहर पर सवार है और कांग्रेस की 21 सीटो समेत 41 सीटों को बढ़ाकर दोगुना करने की रणनीति के साथ चुनाव मैदान में है। इसका कारण 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में मिली जीत ने यूडीएफ के कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा है। इन्होंने इंदिरा गारंटी के माध्यम से महिलाओं और युवाओं को लुभाने की कोशिश की है। जबिक राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा के नेतृत्व करने वाली भाजपा केरल में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए संघर्ष कर रही है। तिरुवनंतपुरम और त्रिशूर जैसे क्षेत्रों में बढ़ते जनाधार के साथ, राजग इस बार ‘विकसित केरल’ के नारे के साथ किंगमेकर बनने की उम्मीद कर रहा है। साल 2021 के विधानसभा चुनाव में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) 97 सीटों के साथ सत्ता में वापसी की थी। 

प्रमुख चुनावी मुद्दे 
इस बार का चुनाव केवल ‘कल्याणकारी योजनाओं’ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई नए आयाम जुड़े हैं, जिसमें शिक्षित बेरोजगारी, केरल में युवाओं का बड़े पैमाने पर विदेश एक बड़ा मुद्दा है। विपक्ष इसे सरकार की विफलता बता रहा है। आर्थिक प्रबंधन राज्य के बढ़ते कर्ज और वित्तीय संकट को लेकर यूडीएफ ने सरकार को घेरा है। मसलन कांग्रेस के लिए यह चुनाव 'करो या मरो' जैसा है। राहुल गांधी की 'पुथुयुग यात्रा' ने कार्यकर्ताओं में जान फूं की है। भ्रष्टाचार के आरोप और बेरोजगारी कें मुद्दे की सियसत के बीच राहुल गांधी का आरोप है कि सीपीआई(एम) और भाजपा के बीच कांग्रेस को रोकने के लिए एक अघोषित गठबंधन है। लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व के चेहरे पर स्पष्टता की कमी और एलडीएफ के मजबूत कैडर बेस का मुकाबला करना कांग्रेस के सामने चुनौती होगा। भाजपा की रणनीति बेहद सटीक है। पार्टी ने पूरे राज्य के बजाय 30 चुनिंदा सीटों पर अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। त्रिशूर लोकसभा सीट पर जीत और तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर कब्जे ने बीजेपी को मनोवैज्ञानिक बढ़त दी है। पारंपरिक रूप से वामपंथियों का आधार रहा हिंदू ईझवा समुदाय अब 'भारत धर्म जनसेना' और सीधे बीजेपी की ओर आकर्षित हो रहा है। वहीं भले ही प्रधानमंत्री मोदी पूरे राज्य में प्रचार कर रहे हैं, लेकिन भाजपा के लिए यह चुनावी डगर बेहद मुश्किल नजर आ रही है। इस चुनाव में अल्पसंख्यक मत मुस्लिम और ईसाई समुदायों का झुकाव निर्णायक होगा। एलडीएफ और यूडीएफ दोनों ही इन समुदायों को साधने में जुटे हैं। केरल राज्य में हालांकि सबसे ज्यादा 54.73 प्रतिशत हिंदू आबादी है, तो मुस्लिम आबादी 26.56 प्रतिशत और ईसाई आबादी 18.38 प्रतिशत है। जबकि केरल में रहने वाले सिक्खों, बौद्ध, जैन और अन्य धर्म के लोगों की संख्या एक प्रतिशत भी पूरी नहीं है। 

सत्ता विरोधी लहर 
इस बार लगातार 10 साल सत्ता में रहने के बाद मौजूदा सरकार के खिलाफ असंतोष स्वाभाविक है। सोने की तस्करी और कुछ सहकारी बैंक घोटालों ने सरकार की छवि पर असर डाला है। यूडीएफ के लिए संगठनात्मक कमजोरी के चलते निचले स्तर पर बूथ प्रबंधन और गुटबाजी कांग्रेस के लिए पुरानी चुनौती रही है। पिनाराई विजयन के कद के सामने एक सर्वमान्य चेहरा पेश करना यूडीएफ के लिए कठिन रहा है। उधर राजग के लिए इस बार त्रिकोणीय मुकाबले की केरल की द्विदलीय राजनीति में जगह बनाना अभी भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि राज्य की जनसांख्यिकी को देखते हुए केवल हिंदू मतों के आधार पर जीत हासिल करना मुश्किल है। वहीं ईरान-इजरायल तनाव: मध्य-पूर्व में युद्ध जैसी स्थिति ने प्रवासियों के बीच सुरक्षा और रोजगार को लेकर डर पैदा किया है। जानकारों का मानना है कि यह 'भू-राजनीतिक अस्थिरता' भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है, क्योंकि मतदाता ऐसे समय में केंद्र की विदेश नीति और राज्य की सुरक्षा को तौल रहे हैं। 
08-04-2026