-नए शिक्षा विधेयक के प्रावधानों पर क्यों छिड़ी है बहस
By-ओ.पी. पाल
भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े और निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। 15 दिसंबर 2025 को लोकसभा में पेश किए गए 'विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025' ने देश के शैक्षणिक, राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में एक गंभीर बहस छेड़ दी है। वर्तमान में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास विचाराधीन यह विधेयक अपने अंतिम चरण में है और समिति आगामी मॉनसून सत्र में अपनी रिपोर्ट सौंपने जा रही है, जिसके साथ ही नया कानून बनने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। यह विधेयक केवल कुछ प्रशासनिक फेरबदल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आजादी के बाद से चले आ रहे उच्च शिक्षा के पूरे ढांचे को आमूल-चूल बदलने का खाका है। दशकों पुराने नियामकों-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) को समाप्त कर एक एकीकृत ‘सुपर आयोग’और उसकी तीन सहायक काउंसिलों की स्थापना का प्रस्ताव इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सरकार एक राष्ट्र, एक नियामक की नीति पर आगे बढ़ रही है। परंतु, इस ऐतिहासिक बदलाव के साथ ही जो सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा हुआ है, वह है कि क्या यह सुधार भारतीय उच्च शिक्षा को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाएगा, या यह स्वायत्तता को समाप्त कर इसे पूरी तरह से नौकरशाही और केंद्रीय नियंत्रण के पिंजरे में कैद कर देगा?
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केंद्र सरकार का 'विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025' निस्संदेह भारतीय उच्च शिक्षा के औपनिवेशिक और अप्रचलित ढांचे को बदलने का एक साहसिक प्रयास है। विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग नियामकों की भूलभुलैया को खत्म करना एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इस प्रक्रिया में 'सुधार' के नाम पर 'स्वायत्तता की बलि' चढ़ाना आत्मघाती साबित हो सकता है। इसलिए इस प्रयास में भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने के लिए नियंत्रण की नहीं, बल्कि प्रोत्साहन की आवश्यकता है। संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को अपनी अंतिम रिपोर्ट में विशेष रुप से स्वतंत्र अपीलीय न्यायाधिकरण को लेकर सरकार को अपीलीय शक्ति अपने हाथ में रखने के बजाय 'उच्च शिक्षा अपीलीय न्यायाधिकरण' का गठन करने की सिफारिश करना अनिवार्य है, जिसका नेतृत्व उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश करें। इसी प्रकार आईंआईटी और आईआईएम जैसे 'राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों' के लिए इस कानून में एक विशेष उपबंध होना चाहिए, ताकि उनकी वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता और अकादमिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहे। इसके अलावा फंडिंग के लिए पारदर्शी बोर्ड को लेकर शिक्षा मंत्रालय द्वारा सीधे फंडिंग के बजाय एक स्वायत्त 'हायर एजुकेशन ग्रांट्स कमेटी' का गठन करना चाहिए, जो पूरी तरह गैर-राजनीतिक और अकादमिक विशेषज्ञों से सुसज्जित हो। यदि सरकार इन सुझावों को समाहित कर एक संतुलित कानून लाती है, तभी यह विधेयक सही मायनों में 'विकसित भारत' की नींव रख पाएगा। अन्यथा, अत्यधिक केंद्रीयकरण और नौकरशाही के बोझ तले दबकर हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था अपनी बची-खुची रचनात्मकता भी खो देगी।
एक सुपर आयोग और तीन काउंसिल
इस प्रस्तावित कानून के तहत मौजूदा विखंडित नियामक व्यवस्था को समाप्त कर एक एकल महा-आयोग स्थापित किया जाएगा। इस आयोग के अधिकार क्षेत्र में सामान्य उच्च शिक्षा के अलावा तकनीकी शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण और आर्किटेक्चर शिक्षा को लाया गया है। विधेयक के प्रावधानों के अनुसार केवल चिकित्सा और कानूनी पाठ्यक्रमों को इसकी सीमा से बाहर रखा गया है। इस महा-आयोग के सुचारु संचालन के लिए तीन विशिष्ट काउंसिलों का गठन किया जाएगा, जो कार्यात्मक रूप से स्वतंत्र होंगी। इनमें रेगुलेटरी काउंसिल (नियामक परिषद), जो नए संस्थानों की स्थापना और उनके संचालन के लिए न्यूनतम भौतिक व शैक्षणिक मानकों का अनुपालन सुनिश्चित कराने और छात्रों व संस्थानों की शिकायतों के निवारण के लिए प्राथमिक निकाय होगी। दूसरी स्टैंडर्ड्स काउंसिल (मानक परिषद), जिसका मुख्य कार्य पाठ्यक्रमों के लिए 'लर्निंग आउटकम' (सीखने के परिणाम) तय करना और अकादमिक मानकों का निर्धारण करना होगा ताकि देश के सभी विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता में एकरूपता लाई जा सके। तीसरी वर्तमान में 'नैक' (एनएएसी) की व्यवस्था का स्थान पर एक्रेडिटेशन काउंसिल (प्रत्यायन परिषद) होगी, जो काउंसिल संस्थानों की ग्रेडिंग, रैंकिंग और मान्यता के लिए एक नया व पारदर्शी 'एक्रेडिटेशन फ्रेमवर्क' तैयार करेगी। हालांकि प्रसिद्ध नीति विश्लेषक संस्था 'पीआरएस' द्वारा इस विधेयक के प्रावधानों के विश्लेषण पर नजर ड़ाले, तो इस बिल के कई विरोधाभासों को रेखांकित किया गया है। खासतौर से नई शिक्षा नीति-2020 में एक ऐसे 'अंब्रेला रेगुलेटर' का खाका खींचा गया था, जिसमें रेगुलेशन, एक्रेडिटेशन, फंडिंग और एकेडमिक मानक तय करने के लिए चार स्वतंत्र वर्टिकल होने थे। लेकिन, इस नए बिल में 'फंडिंग' के महत्वपूर्ण हिस्से को आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया गया है। केंद्र से फंड पाने वाले संस्थानों को अब ग्रांट सीधे केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के जरिए दी जाएगी, जो एनईपी के मूल ढांचे से अलग है।
वैश्विक स्तर के संस्थानों स्वायत्तता का संकट?
आईआईटी और आईआईएम जैसे शीर्ष संस्थानों पर संकट भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और भारतीय प्रबंधन संस्थान भारत के ऐसे मुकुट रत्न हैं जिनकी वैश्विक साख उनकी शैक्षणिक और प्रशासनिक स्वतंत्रता के कारण है। ये संस्थान 'संसद के विशेष अधिनियमों' के तहत स्थापित 'राष्ट्रीय महत्व के संस्थान' हैं, जिन्हें अपनी प्रवेश परीक्षा आयोजित करने, पाठ्यक्रम तय करने और फीस निर्धारित करने की खुली आजादी रही है। लेकिन नया विधेयक इन संस्थानों की इस विशिष्ट स्वायत्तता पर सीधा प्रहार करता प्रतीत होता है। सुपर आयोग के सीधे नियंत्रण में आना अब तक अपनी स्वायत्त शासी बोर्ड ऑफ गवर्नर्स द्वारा संचालित होने वाले आईआईटी और आईआईएम भी सीधे इस नए आयोग के विनियामक दायरे में आ जाएंगे। यदि इन वैश्विक स्तर के संस्थानों को भी सामान्य विश्वविद्यालयों की तरह एक ही लाठी से हांका गया, तो इनकी निर्णय लेने की गति धीमी हो जाएगी। वैश्विक शोध और नवाचार के लिए जिस त्वरित और लचीली प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता होती है, वह नौकरशाही के जटिल नियमों में उलझकर रह जाएगी। गौरतलब है कि वर्ष 2018 में यूजीसी ने उच्च श्रेणी के विश्वविद्यालयों को बिना पूर्व अनुमति के देश-विदेश में 'ऑफ-कैंपस' या सैटेलाइट सेंटर खोलने की स्वतंत्रता दी थी। इसका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का विस्तार करना था। लेकिन इस नए विधेयक में किसी भी ऑफ-कैंपस सेंटर को खोलने के लिए रेगुलेटरी काउंसिल की 'पूर्व मंजूरी' को अनिवार्य बनाने का प्रावधान है। यह प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को वापस पलटने जैसा है। न्यायिक शून्यता और अपीलीय व्यवस्था में सरकार का एकाधिकार इस विधेयक का सबसे विवादित और चिंताजनक पहलू इसकी अपीलीय संरचना है। एक स्वस्थ लोकतंत्र और निष्पक्ष विनियामक व्यवस्था में 'चेक्स एंड बैलेंसेज' (नियंत्रण और संतुलन) का होना अनिवार्य है।
विधेयक को लेकर तर्क-वितर्क
संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने इस विधेयक का अध्ययन किया है और अब तक 20 से अधिक बैठकों के बाद अपनी रिपोर्ट 20 जुलाई से शुर हो रहे संसद के मानसून सत्र के दौरान अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश करने वाली है। शिक्षाविदों और विपक्ष के बीच इस बात को लेकर गंभीर चिंताएं हैं कि यह विधेयक उच्च शिक्षा पर सरकारी नियंत्रण को अत्यधिक बढ़ा देगा। इस विधेयक के समर्थकों का तर्क है कि सीधे मंत्रालय द्वारा फंडिंग से लालफीताशाही कम होगी और बजटीय आवंटन त्वरित गति से सीधे संस्थानों तक पहुंचेगा। जबकि आलोचकों और शिक्षाविदों का मानना है कि फंडिंग का सीधे मंत्रालय के हाथ में जाना शैक्षणिक संस्थानों की रीढ़ तोड़ने जैसा है। जब कोई राजनीतिक या प्रशासनिक विंग सीधे वित्तीय कमान संभालेगा, तो अनुदानों का राजनीतिकरण होने का खतरा बढ़ जाएगा। जो संस्थान सरकार की नीतियों या विचारधारा के अनुकूल नहीं होंगे, उनकी फंडिंग को रोकना या प्रभावित करना आसान हो जाएगा। यह कदम नियामक की निष्पक्षता को भी कमजोर करता है।
-16July-2026