BY-ओ.पी. पाल
पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से जुनून, विचारधारा और जबरदस्त जनभागीदारी का मिश्रण रही है। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव ने जो तस्वीर पेश की है, उसने न केवल राज्य के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, बल्कि भारतीय चुनावी इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया है। दो चरणों के मतदान के बाद सामने आए रिकार्ड 92.47 प्रतिशत वोटिंग के अविश्वसनीय आंकड़े ने राजनीतिक विश्लेषकों, सत्ता पक्ष और विपक्ष यानी तीनों को गहरे आत्ममंथन में डाल दिया है। क्या यह मतदान किसी बड़े बदलाव की आहट है, या फिर अपनी मौजूदा सत्ता को बचाने के लिए जनता का संगठित प्रयास? वैसे इतिहास गवाह रहा है कि जब-जब बंगाल में मतदान का प्रतिशत अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है, तब-तब सत्ता के गलियारों में बड़े भूकंप आए हैं। 2011 का उदाहरण हमारे सामने है। क्या 2026 में इतिहास खुद को दोहराएगा या ममता बनर्जी अपनी 'अजेय' छवि को बरकरार रखने में कामयाब होंगी? इसकी तस्वीर 4 मई को होने वाली मतगणना के नतीजे तय कर देगी?
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पश्चिम बंगाल के 24 जिलों में विधानसभा की 294 सीटों पर इस बार के चुनाव में जो सबसे बड़ी बात उभरकर सामने आई है, वह है मतदाताओं की संख्या में भारी इजाफा है। साल 2021 के विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार करीब 34 लाख ज्यादा वोटरों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है। पहले चरण में 93.19 प्रतिशत और दूसरे चरण में 91.66 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। मसलन इस आजाद भारत में पश्चिम बंगाल विधान सभा के चुनावी इतिहास का कुल 92.47 प्रतिशत मतदान एक रिकार्ड तैयार कर गया है यानी राज्य में अब तक का सर्वाधिक मतदान है। इससे पहले 2011 में 84.72 प्रतिशत मतदान का रिकॉर्ड था, जिसमें टीएमसी ने भाजपा से करीब 60 लाख ज्यादा वोट हासिल किए थे। जब राज्य में 34 साल पुराने वामपंथी शासन का अंत हुआ था। राजनीतिक विश्लेष्कों के मुताबिक ऐसे मतदान के रिकार्ड सत्ता परिवर्तन का संकेत देते रहे हैं। राज्य की 294 सीटों पर कुल 6.81 करोड़ मतदाता हैं। दो चरणों के इस चुनाव में जिस तरह से लोग घरों से बाहर निकले, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल का वोटर अब 'मौन' नहीं है, बल्कि यह मतदाताओं की ताकत है। राजनीतिक विशषज्ञों की माने बंगाल की जनता ने इस बार किन मुद्दों पर मुहर लगाई होगी, उन प्रमुख बिंदुओं का जिक्र करना भी जरुरी है। मसलन भ्रष्टाचार बनाम विकास के दृष्टिकोण से केंद्रीय एजेंसियों (ईडी या सीबीआई) द्वारा टीएमसी नेताओं पर की गई कार्रवाई और भ्रष्टाचार के आरोपों को भाजपा ने बड़ा मुद्दा बनाया। वहीं टीएमसी ने इसे 'बंगाल के अपमान' और 'केंद्र की तानाशाही' के रूप में पेश किया। वहीं युवाओं के लिए रोजगार की कमी और राज्य से बाहर पलायन एक ऐसा मुद्दा रहा है जो ग्रामीण बंगाल में गहराई तक असर करता है। हालांकि राज्य में पहचान की राजनीति की बात करें तो, मतुआ समुदाय के वोट और सीएए (सीएए) का मुद्दा भी इस बार के चुनाव में बैकग्राउंड में सक्रिय रहा है।
चुनावी बिसात की असली 'किंगमेकर' महिला शक्ति
बंगाल चुनाव के आंकड़ों का सबसे दिलचस्प पहलू महिलाओं की भागीदारी है। दूसरे चरण में जहाँ पुरुषों का मतदान प्रतिशत 91.07 प्रतिशत रहा, वहीं महिलाओं ने 92.28प्रतिशत मतदान कर बाजी मार ली। यह भी सच है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीति का एक बड़ा आधार 'महिला वोट बैंक' रहा है। 'लक्ष्मी भंडार', 'कन्याश्री' और 'रूपश्री' जैसी योजनाओं ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के प्रति महिलाओं में एक मजबूत जुड़ाव पैदा किया है। दूसरी ओर, भाजपा ने 'संदेशखाली' जैसे मुद्दों को उठाकर महिला सुरक्षा के सवाल पर टीएमसी को घेरने की कोशिश की थी। महिलाओं के इस रिकॉर्ड मतदान का मतलब है कि उन्होंने किसी एक नैरेटिव को पूरी तरह अपनाया है। अब देखना यह है कि वह 'सुरक्षा' का मुद्दा था या 'कल्याणकारी योजनाओं' का लाभ।
भाजपा का 'बदलाव' बनाम टीएमसी का 'कवच'
भाजपा इस चुनाव को 'सत्ता विरोधी लहर' (एंटी-इनकंबेंसी) मान रही है। पार्टी का तर्क है कि जब लोग बड़ी संख्या में बाहर निकलते हैं, तो वे मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट होकर बदलाव के लिए वोट करते हैं। भाजपा का कहना है कि केंद्रीय बलों की भारी तैनाती और 100 प्रतिशत वेबकास्टिंग के कारण इस बार मतदाता बिना किसी डर के बूथ तक पहुंचा। खासतौर से शहरी इलाकों और हाउसिंग सोसायटियों के भीतर बूथ बनाए जाने से मध्यम वर्ग का वोट प्रतिशत बढ़ा है, जिसे भाजपा अपना पारंपरिक वोट बैंक मानती है। उधर ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी इस अतिरिक्त 34 लाख वोटरों को अपना 'सुरक्षा कवच' मान रही है। टीएमसी का मानना है कि भाजपा के आक्रामक प्रचार और केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के खिलाफ उनके समर्थक और अल्पसंख्यक मतदाता एकजुट होकर बाहर निकले हैं। टीएमसी नेताओं का कहना है कि लोगों को यह डर था कि अगर वे वोट नहीं देंगे तो भविष्य में उनकी नागरिकता या पहचान पर संकट आ सकता है, इसलिए 'प्रतिरोध' स्वरूप यह भारी मतदान हुआ है।
चुनाव आयोग की भूमिका: तकनीक और पारदर्शिता
इस बार के चुनाव में चुनाव आयोग ने जिस तरह की मुस्तैदी दिखाई, उसने भी मतदान प्रतिशत बढ़ाने में मदद की। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनकी टीम ने कंट्रोल रूम से हर बूथ की शत-प्रतिशत वेबकास्टिंग (निगरानी )की गई। इससे धांधली की गुंजाइश कम हुई और आम जनता का विश्वास बढ़ा। बैलेट पेपर पर उम्मीदवारों की रंगीन तस्वीरें, दिव्यांगों के लिए मुफ्त परिवहन और व्हीलचेयर जैसी सुविधाओं ने मतदान को 'सुगम' बनाया। वहीं चुनाव के दौरान 120 करोड़ रुपये के नशीले पदार्थ जब्त करना और 23 लाख से ज्यादा अवैध विज्ञापनों को हटाना यह दर्शाता है कि आदर्श आचार संहिता को कड़ाई से लागू किया गया।
एग्जिट पोल और 2021 की तुलना
पश्चिम बंगाल के साल 2021 के चुनाव में टीएमसी और भाजपा के बीच करीब 60 लाख वोटों का अंतर था। टीएमसी ने 213 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था। जबकि 77 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार सत्ता परिवर्तन की पुरजोर कोशिश में जुटी है। इस बार के एग्जिट पोल की स्थिति काफी पेचीदा है। जहां कुछ एग्जिट पोल भाजपा को 140 से 170 सीटों के साथ सत्ता के करीब दिखा रहे हैं। जबकि तृणमूल कांग्रेस को 95 से 140 सीटों के बीच बताया गया है। कुछ सर्वे टीएमसी की वापसी का भी दावा कर रहे हैं, हालांकि उनकी सीटों में गिरावट का अनुमान लगाया गया है। ऐसे में यह मुकाबला और दिलचस्प हो गया है। हालांकि उनकी सीटों में गिरावट का अनुमान लगाया गया है। अतिरिक्त 34 लाख वोटर्स का यह ‘स्विंग’ भी तय करेगा कि 4 मई को आने वाले नतीजों के दौरान जीत का जश्नअकोलकाता के कालीघाट में मनेगा या भाजपा के राज्य मुख्यालय में आतिशबाजी नजर आएगी?
03May-2026