रविवार, 12 अप्रैल 2026

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव: द्रविड़ सियासत का 'लिटमस टेस्ट' या नए युग का आगाज़

-चुप्पी के पीछे का तूफ़ान: कौन जीतेगा 'तमिल गौरव' की जंग? 
By-ओ.पी. पाल 
मिलनाडु की राजनीति को समझने के लिए अक्सर वहां की रैलियों का शोर और सिनेमाई सितारों का 'कट-आउट' काफी माना जाता रहा है। लेकिन 23 अप्रैल 2026 को विधानसभा की 234 सीटो पर होने वाले चुनाव से ठीक पहले राज्य की गलियों में पसरा 'सन्नाटा' किसी खामोशी का नहीं, बल्कि एक बहुत बड़े सियासी मंथन का संकेत है। इस बार का चुनाव केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि यह इस बात का लिटमस टेस्ट है कि क्या 50 साल पुराना द्रविड़ वर्चस्व अब बहु-ध्रुवीय राजनीति के सामने झुकने को तैयार है? यानी एक गहरी राजनैतिक परिपक्वता और त्रिस्तरीय मुकाबले का संकेत है। विशेषकर महिला मतदाता, जो राज्य की आबादी का 51 प्रतिशत हैं, उन्होंने अपनी चुप्पी से डीएमके और एआईएडीएमके दोनों खेमों की नींद उड़ा दी है। हालांकि सभी राजनीतिक दल अपनी नई चुनावी रणनीति के साथ चुनावी जंग में हैं। 
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मिलनाडु राजनीति के इतिहास पर नजर डाली जाए, तो चुनाव में तमिलनाडु की राजनीति में इस समय द्रविड़ दलों यानी द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एडीएमके) को अक्सर एक राजनीतिक महाशक्ति के रूप में देखा जाता है। ये दोनों प्रमुख दल ही पिछले दशकों से राज्य पर शासन करते आ रहे हैं। लेकिन तमिलनाडु विधानसभा चुनाव को लेकर इस बार सियासी तस्वीर काफी बदली हुई नजर आ रही है। जहां पहले चुनावों में किसी एक पार्टी या गठबंधन की लहर नजर आती थी, वहीं इस बार ऐसा कोई सियासी परिदृश्य नहीं है। राजग और इंडिया गठबंधन दोनों अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान में हैं, लेकिन जनता का मूड अभी भी शांत और सोच-समझकर फैसला लेने वाला दिख रहा है। राज्य में चुनावी सरगिर्मयों के बीच इस बार चुनावी रैलियों में वह पारंपरिक उन्माद नहीं दिख रहा, जो कभी एमजीआर, जयललिता या करुणानिधि के दौर में होता था। इस बार मतदाता मौन है और लगता है कि जनता इस बार उम्मीदवारों के चेहरों को नहीं, बल्कि उनके ट्रैक रिकॉर्ड को तौल रही है। यह सन्नाटा बताता है कि मतदाता इस बार 'लहर' के बहाव में नहीं, बल्कि 'परिणाम' के प्रभाव पर वोट करेगा। मसलन इस बार का चुनाव यह तय करेगा कि क्या तमिलनाडु अपनी पारंपरिक द्रविड़ सीमाओं में ही रहेगा या फिर वह राष्ट्रीय मुख्यधारा की राजनीति और नए क्षेत्रीय चेहरों के लिए अपने दरवाजे खोलेगा। दरअसल जब तमिलनाडु का मतदाता शांत होता है, तो वह अक्सर किसी बड़े 'उलटफेर' की पटकथा लिख रहा होता है। 4 मई के नतीजे केवल एक मुख्यमंत्री नहीं चुनेंगे, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति की अगली आधी सदी का रुख तय करेंगे। 

डीएमके का वर्चस्व और एडीएमके का अस्तित्व 
सत्ताधारी डीएमके अपने 'द्रविड़ मॉडल' और महिला केंद्रित कल्याणकारी योजनाओं के भरोसे मैदान में है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के लिए यह चुनाव अपनी विरासत को स्थायी बनाने की लड़ाई है। इसमें उनका मजबूत कैडर और सरकारी योजनाओं की जमीनी पहुंच मानी जा रही है। हालांकि मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का चेहरा सबसे बड़ा है, लेकिन गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस, छोटे दलों और वामपंथी दलों में दबी हुई नाराजगी के साथ ही कार्यकर्ताओं के बीच जमीनी स्तर पर तालमेल की कमी एक ‘अदृश्य दरार’ पैदा कर रही है। वहीं सनातन धर्म जैसे विवादित बयानों ने जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन को असहज किया है, उसका असर स्थानीय स्तर पर भाजपा भुनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के लिए तमिलनाडु हमेशा से एक 'अजेय दुर्ग' रहा है, लेकिन इस बार पार्टी ने अपनी रणनीति बदली है। एआईएडीएमके के साथ दोबारा हुए गठबंधन ने राजग को नई ऊर्जा दी है। हालांकि एआईएडीएमके का आंतरिक नेतृत्व संकट अभी भी पूरी तरह सुलझा नहीं है। के. अन्नामलाई के नेतृत्व में भाजपा ने खुद को 'आक्रामक विपक्ष' के रूप में पेश किया है। वे हिंदुत्व को 'तमिल गौरव' से जोड़कर उस वैचारिक चक्रव्यूह को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे द्रविड़ राजनीति ने दशकों से बनाया था। वहीं इस चुनाव में अभिनेता से नेता बने विजय और उनकी पार्टी तमिझगा वेत्री कझगम (टीवीके) इस चुनाव के सबसे बड़े 'ब्लैक हॉर्स' साबित हो सकते हैं। पहली बार वोट देने वाले करोड़ों युवा, जो पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से अलग विकल्प ढूंढ रहे हैं। यह विजय का 'फैन बेस' अगर पोलिंग बूथ तक पहुँचा, तो वह बड़े-बड़े दिग्गजों का सियासी गणित बिगाड़ सकता है। 

मुख्यधारा के दलों का 'ब्राह्मण मुक्त' दांव 
तमिलनाडु की सियासत में 2026 का विधानसभा चुनाव एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व मोड़ पर खड़ा है। राज्य के राजनीतिक इतिहास में शायद यह पहला मौका है जब डीएमके, एडीएमके, भाजपा और कांग्रेस जैसे सभी मुख्यधारा के दलों ने किसी भी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है। राज्य में करीब 3 फीसदी ब्राह्मण आबादी वाले इस समुदाय का मुख्यधारा की चुनावी राजनीति से यह 'पूर्ण निर्वासन' कई गहरे सवाल खड़े करता है। जयललिता (जो स्वयं ब्राह्मण थीं) के दौर में पार्टी इस समुदाय की स्वाभाविक पसंद थी, लेकिन 35 साल में पहली बार एआईएडीएमके ने एक भी ब्राह्मण चेहरा मैदान में नहीं उतारा है। वहीं हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा ने भी अपने कोटे की 27 सीटों पर किसी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया। जबकि जयललिता के निधन के बाद यह समुदाय पूरी तरह भाजपा की ओर शिफ्ट हो गया। भाजपा ने संगठन में तो एच. राजा और के.टी. राघवन जैसे चेहरे रखे हैं, लेकिन चुनावी जंग के लिए ओबीसी और दलित कार्ड पर भरोसा जताया है। इससे यही संकेत मिलता है कि भाजपा की रणनीति अब 'ब्राह्मण-बनिया' छवि से बाहर निकलकर 'पिछड़ा वर्ग' की पार्टी बनने की है, ताकि वह द्रविड़ दलों के कोर वोट बैंक में सेंध लगा सके। इसी प्रकार द्रविड़ विचारधारा की ध्वजवाहक डीएमके के लिए यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन कांग्रेस ने भी इस बार सामाजिक समीकरणों के चलते ब्राह्मण समुदाय से दूरी बना ली है। जबकि सीमन की 'नाम तमिलर काची' (एनटीके) ने सबसे ज्यादा 6 ब्राह्मण उम्मीदवारों (4 महिलाएं, 2 पुरुष) को टिकट दिया है। सीमन का तर्क है कि तमिल ब्राह्मण भी मूल तमिल हैं, जो पेरियारवादी राजनीति के 'ब्राह्मण-विरोध' से बिल्कुल अलग रुख है। 

त्रिकोणीय मुकाबले की उम्मीद? 
राजग द्रविड संस्कृति वाली सियासत के इस चुनावी मुकाबले को नई रणनीति के साथ उतरी है। पिछले लोकसकभा चुनाव में एडीएमके से टूटे रिश्ते बहाल करके भाजपा अब विधानसभा के चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की इस रणनीति के साथ चुनाव मैदान में है। एडीएमके के नेतृत्व में राजग गठबंधन में एडीएमके ने खुद 178 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि सहयोगी दलों में भाजपा को 27 औ पीएमके को 18 सीट दी हैं। वहीं इंडिया गठबंधन गठबंधन के फॉर्मूले के तहत डीएमके 164 सीटों पर खुद चुनाव लड़ेगी, जबकि 70 सीटें कांग्रेस और अन्य सहयोगियों को दी गई हैं, जिसमें कांग्रेस को 28 सीटें मिली हैं। तमिलनाडु की राजनीति में डीएमके और एडीएमके जैसे प्रमुख दलों के अलावा के. कृष्णा सामी की पुथिया तमिलागम, जीके वासन की तमिल मनीला कांग्रेस(मूपनार), भाकपा, सीपीआईएम, वीसीके, आईयूएमएल, वाइको की एमडीएमके, एसी शनमुगम की पीएनके जैसे दल चुनावी जंग में रहे हैं। 

महिलाएं और युवा बन सकती है ‘गेम चेंजर’ 
तमिलनाडु की जनसंख्या में 80 प्रतिशत ओबीसी और लगभग 24 प्रतिशत एमबीसी आबादी है। भाजपा और डीएमके दोनों ने ही अपने उम्मीदवारों की सूची में इस सामाजिक संतुलन को साधने की कोशिश की है। वहीं राज्य की लगभग 12-15 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी (मुस्लिम और ईसाई) इस बार निर्णायक भूमिका में होगी। आमतौर पर अल्पसंख्यक वोट बैंक पारंपरिक रूप से डीएमके की ओर जाता रहा है, लेकिन अगर एडीएमके और टीवीके ने खुद को एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प के रूप में मजबूती से पेश किया, तो यहां बिखराव देखने को मिल सकता है। अल्पसंख्यक वोटों का यह बिखराव सीधे भाजपा-एआईएडीएमके गठबंधन के लिए राह आसान हो सकता है। दूसरा पहलू ये भी है कि तमिलनाडु में लगभग 51 प्रतिशत महिला मतदाता किसी भी चुनाव का रुख बदल सकती हैं। वहीं युवा मतदाता बड़ी संख्या में हैं, जिनका रुझान विजय की टीवीके का प्रभाव जरूर है, लेकिन यह वोट में कितना बदलेगा, यह चुनाव के दिन ही पता चलेगा। इसलिए महिला और युवा वोटर इस बार चुनाव के सबसे बड़े ‘गेम चेंजर’ माना जा रहा है। 
  12-13Apr-2026

केरल विधानसभा चुनाव: भाजपा के लिए आसान नहीं ‘रेड कॉरिडोर’ पर भगवा फहराना

ध्रुवीकरण के दौर में कांग्रेस के सामने भी दोहरे मोर्चे पर साख बचाना बड़ी चुनौती

 
By-ओ.पी. पाल 
केरल में 9 अप्रैल, 2026 को होने वाले 140 सीटों के लिए विधानसभा चुनाव राज्य के राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित होने वाले हैं। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में आकर इतिहास रचने की कोशिश में है, वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) और भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा (राजग) अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। मसलन यह चुनाव केवल यह तय नहीं करेगा कि अगली सरकार किसकी होगी, बल्कि यह केरल के ‘द्वि-ध्रुवीय’ राजनीतिक ढांचे के भविष्य को भी तय करेगा। यदि एलडीएफ जीतता है, तो यह पिनाराई विजयन के 'अजेय' होने की पुष्टि करेगा। यदि यूडीएफ जीतता है, तो यह कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संजीवनी का काम करेगा। वहीं राजग का प्रदर्शन यह बताएगा कि क्या भाजपा दक्षिण के इस दुर्ग में सेंध लगा पाई है। दूसरी ओर केरल की 15वीं विधानसभा का लेखा-जोखा राज्य की लोकतांत्रिक परिपक्वता और विधायी प्राथमिकताओं की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करता है। पिछले पांच वर्षों का डेटा यह दर्शाता है कि जहाँ एक ओर कार्यक्षमता में वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर विधायी समीक्षा की गहराई को लेकर कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठे हैं। फिर भी 4 मई को आने वाले नतीजे आएंगे, तो वह केवल एक सरकार का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह केरल के साक्षर और जागरूक मतदाताओं के उस 'विवेक' का परिणाम होगा, जो वैश्विक युद्ध से लेकर स्थानीय पेंशन तक हर पहलू को बारीकी से परखता नजर आएगा? 


केरल की राजनीति मुख्य रूप से तीन ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिसमें वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और माकपा के नेतृत्व में यह गठबंधन नव केरल के विजन और पिछले 10 वर्षों के प्रोग्रेस रिपोर्ट के साथ मैदान में है। वाम लोकतांत्रिक मोर्चा ने अपने 'दो कार्यकाल' वाले कड़े नियम में ढील देकर यह साफ कर दिया है कि वह जीत के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। जबकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेतृत्व में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सत्ता परिवर्तन की लहर पर सवार है। 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में मिली जीत ने यूडीएफ के कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा है। इन्होंने इंदिरा गारंटी के माध्यम से महिलाओं और युवाओं को लुभाने की कोशिश की है। जबिक राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा के नेतृत्व करने वाली भाजपा केरल में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए संघर्ष कर रही है। तिरुवनंतपुरम और त्रिशूर जैसे क्षेत्रों में बढ़ते जनाधार के साथ, राजग इस बार ‘विकसित केरल’ के नारे के साथ किंगमेकर बनने की उम्मीद कर रहा है। सत्ता पक्ष को इसिलए वापसी की उम्मीद है कि उसने मौजूदा कार्यकाल के दौरान केरल की विधानसभा ने कामकाज के मामले में एक मानक स्थापित किया है, विशेषकर समितियों के उपयोग और बिलों के पारित होने की संख्या में वृद्धि सरकार की तीव्रता दर्शाता है। राज्य 2026 के चुनावों में ये विधायी रिकॉर्ड शासन के मॉडल को समझने में मतदाताओं के लिए एक प्रमुख आधार साबित हो सकता है। मसलन इस कार्यकाल के दौरान विधायी कार्यों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। पिछली विधानसभा (2016-21) में जहां 80 बिल पास हुए थे, वहीं 15वीं विधानसभा में यह संख्या बढ़कर 129 तक पहुंच गई। जो पिछले कार्यकाल की तुलना में 61 फीसदी की वृद्धि दर्शाता है। वहीं यह राज्य में व्यापक कानूनी और प्रशासनिक बदलावों का संकेत देती है। ऐसे में केरल की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ इतिहास और भविष्य का आमना-सामना हो रहा है। 140 सीटों और 2.7 करोड़ मतदाताओं वाले इस राज्य में चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर है। 

मुख्य गठबंधन और राजनीतिक समीकरण 

केरल की राजनीति मुख्य रूप से तीन ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिसमें वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और माकपा के नेतृत्व में यह गठबंधन नव केरल के विजन और पिछले 10 वर्षों के प्रोग्रेस रिपोर्ट के साथ मैदान में है। जबकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेतृत्व में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सत्ता परिवर्तन की लहर पर सवार है और कांग्रेस की 21 सीटो समेत 41 सीटों को बढ़ाकर दोगुना करने की रणनीति के साथ चुनाव मैदान में है। इसका कारण 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में मिली जीत ने यूडीएफ के कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा है। इन्होंने इंदिरा गारंटी के माध्यम से महिलाओं और युवाओं को लुभाने की कोशिश की है। जबिक राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा के नेतृत्व करने वाली भाजपा केरल में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए संघर्ष कर रही है। तिरुवनंतपुरम और त्रिशूर जैसे क्षेत्रों में बढ़ते जनाधार के साथ, राजग इस बार ‘विकसित केरल’ के नारे के साथ किंगमेकर बनने की उम्मीद कर रहा है। साल 2021 के विधानसभा चुनाव में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) 97 सीटों के साथ सत्ता में वापसी की थी। 

प्रमुख चुनावी मुद्दे 
इस बार का चुनाव केवल ‘कल्याणकारी योजनाओं’ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई नए आयाम जुड़े हैं, जिसमें शिक्षित बेरोजगारी, केरल में युवाओं का बड़े पैमाने पर विदेश एक बड़ा मुद्दा है। विपक्ष इसे सरकार की विफलता बता रहा है। आर्थिक प्रबंधन राज्य के बढ़ते कर्ज और वित्तीय संकट को लेकर यूडीएफ ने सरकार को घेरा है। मसलन कांग्रेस के लिए यह चुनाव 'करो या मरो' जैसा है। राहुल गांधी की 'पुथुयुग यात्रा' ने कार्यकर्ताओं में जान फूं की है। भ्रष्टाचार के आरोप और बेरोजगारी कें मुद्दे की सियसत के बीच राहुल गांधी का आरोप है कि सीपीआई(एम) और भाजपा के बीच कांग्रेस को रोकने के लिए एक अघोषित गठबंधन है। लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व के चेहरे पर स्पष्टता की कमी और एलडीएफ के मजबूत कैडर बेस का मुकाबला करना कांग्रेस के सामने चुनौती होगा। भाजपा की रणनीति बेहद सटीक है। पार्टी ने पूरे राज्य के बजाय 30 चुनिंदा सीटों पर अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। त्रिशूर लोकसभा सीट पर जीत और तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर कब्जे ने बीजेपी को मनोवैज्ञानिक बढ़त दी है। पारंपरिक रूप से वामपंथियों का आधार रहा हिंदू ईझवा समुदाय अब 'भारत धर्म जनसेना' और सीधे बीजेपी की ओर आकर्षित हो रहा है। वहीं भले ही प्रधानमंत्री मोदी पूरे राज्य में प्रचार कर रहे हैं, लेकिन भाजपा के लिए यह चुनावी डगर बेहद मुश्किल नजर आ रही है। इस चुनाव में अल्पसंख्यक मत मुस्लिम और ईसाई समुदायों का झुकाव निर्णायक होगा। एलडीएफ और यूडीएफ दोनों ही इन समुदायों को साधने में जुटे हैं। केरल राज्य में हालांकि सबसे ज्यादा 54.73 प्रतिशत हिंदू आबादी है, तो मुस्लिम आबादी 26.56 प्रतिशत और ईसाई आबादी 18.38 प्रतिशत है। जबकि केरल में रहने वाले सिक्खों, बौद्ध, जैन और अन्य धर्म के लोगों की संख्या एक प्रतिशत भी पूरी नहीं है। 

सत्ता विरोधी लहर 
इस बार लगातार 10 साल सत्ता में रहने के बाद मौजूदा सरकार के खिलाफ असंतोष स्वाभाविक है। सोने की तस्करी और कुछ सहकारी बैंक घोटालों ने सरकार की छवि पर असर डाला है। यूडीएफ के लिए संगठनात्मक कमजोरी के चलते निचले स्तर पर बूथ प्रबंधन और गुटबाजी कांग्रेस के लिए पुरानी चुनौती रही है। पिनाराई विजयन के कद के सामने एक सर्वमान्य चेहरा पेश करना यूडीएफ के लिए कठिन रहा है। उधर राजग के लिए इस बार त्रिकोणीय मुकाबले की केरल की द्विदलीय राजनीति में जगह बनाना अभी भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि राज्य की जनसांख्यिकी को देखते हुए केवल हिंदू मतों के आधार पर जीत हासिल करना मुश्किल है। वहीं ईरान-इजरायल तनाव: मध्य-पूर्व में युद्ध जैसी स्थिति ने प्रवासियों के बीच सुरक्षा और रोजगार को लेकर डर पैदा किया है। जानकारों का मानना है कि यह 'भू-राजनीतिक अस्थिरता' भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है, क्योंकि मतदाता ऐसे समय में केंद्र की विदेश नीति और राज्य की सुरक्षा को तौल रहे हैं। 
08-04-2026

रविवार, 5 अप्रैल 2026

भारतीय राजनीति का 'नया भूगोल': भारत में 'नारी शक्ति' का नया अध्याय

महापरिवर्तन की ओर भारतीय लोकतंत्र: लोकसभा विस्तार और महिला आरक्षण का नया खाका 
 संसद का 'महा-विस्तार': 816 सीटों वाली लोकसभा और नारी शक्ति का नया उदय 

 By-ओ.पी. पाल 
भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में 16 अप्रैल का दिन एक युगांतरकारी मोड़ साबित हो सकता है। केंद्र सरकार ने 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को धरातल पर उतारने के लिए एक साहसिक और दूरगामी योजना तैयार की है। इस योजना के केंद्र में केवल महिला आरक्षण ही नहीं, बल्कि लोकसभा की संरचना में अब तक का सबसे बड़ा विस्तार भी शामिल है। मसलन 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' में बड़े संशोधनों के साथ ही लोकसभा की 50 प्रतिशत सीटो की बढ़ोतरी की तैयारी कर ली है। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य न केवल विधायी निकायों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना है, बल्कि दशकों से लंबित परिसीमन की प्रक्रिया को एक नई दिशा देना भी है। सरकार द्वारा इस तैयारी के लिए खींचे गये खाके को लेकर स्पष्ट कर दिया है कि वह महिलाओं को संसद में भेजने के अपने वादे को 2029 के आम चुनाव तक हर हाल में पूरा करना चाहती है। देश को उम्मीद है कि लोकसभा की नई सरंचना न केवल भारत की बढ़ती आबादी का प्रतिनिधित्व करेगी, बल्कि 'नारी शक्ति' को राष्ट्र के नीति-निर्माण में बराबर का हिस्सेदार बनाएगी। 

संसद के बजट सत्र के अंतिम दिन केंद्र सरकार ने भारतीय राजनीति और संसदीय इतिहास में उस समय चौंकाने वाला निर्णय लिया, जिसमें अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने वाले बजट सत्र को समाप्त करने के बजाय, 16 अप्रैल सुबह 11 बजे तक के लिए टाल दिया गया है। यानी संसद कं बजट सत्र का यह विशेष हिस्सा अब 16 से 18 अप्रैल तक फिर से चलेगा। केंद्र सरकार का मकसद 'महिला आरक्षण कानून' (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को समय से पहले जमीन पर उतारना है। सरकार का पूरा फोकस अब उस कानूनी अड़चन को खत्म करना है, जो महिला आरक्षण और जनगणना तथा परिसीमन के बीच फंसी हुई है। दरअसल 2023 में पास हुए नारी शक्ति वंदन अधिनियम के मुताबिक, आरक्षण अगली जनगणना के बाद ही लागू हो सकता था, जिसमें वर्षों का समय लगना स्वाभाविक था। अब सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही लंबित परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए संशोधन बिल लाने की तैयारी में है। सरकार चाहती है कि महिलाओं को उनके हक के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े। इसलिए जनगणना और परिसीमन की तकनीकी अड़चनों को दूर करने के लिए यह सत्र मील का पत्थर साबित होगा। 

लोकसभा सीटों में 50फीसदी की बढ़ोतरी संभव? 
इस सत्र के विस्तार का सबसे बड़ा आकर्षण लोकसभा सीटों का पुनर्गठन हो सकता है। चर्चा है कि सरकार सदन में सीटों की संख्या 543 में 50 फीसदी सीटे बढ़ाने का प्रस्ताव है, जिससे लोकसभा की 816 सीटें होने पर 33 प्रतिशत यानी एक-तिहाई आरक्षण के फार्मूले के तहत लोकसभा में लगभग 273 सीटें सीधे महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी। मसलन इन 273 सीटों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए उनके आरक्षित कोटे के भीतर सीटें तय होंगी। संसद में यदि यह संशोधन पास होता है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले ही देश की संसद का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा और महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच जाएगी। माना जा रहा है कि इसके लिए बजट सत्र की आगामी तीन दिन की बैठकों में सरकार जहां एक संविधान संशोधन विधेयक के जरिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम में बदलाव करेगी। वहीं दूसरा सामान्य विधेयक परिसीमन अधिनियम में संशोधन लाएगी। इन दोनों प्रस्तावित कानून 31 मार्च 2029 से लागू किया जा सकता है। यदि ऐसा हुआ तो आगामी लोकसभा चुनावों और ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनावों में महिलाओं को आरक्षण मिल सकेगा। यही फॉर्मूला राज्यों की विधानसभाओं में भी लागू किया जाएगा, ताकि पंचायत से लेकर संसद तक महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का एक समान ढांचा तैयार हो सके। माना जा रहा है कि उत्तर बनाम दक्षिणसीटों की संख्या बढ़ने से बड़े राज्यों, विशेषकर हिंदी भाषी राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में भारी उछाल आएगा। नए परिसीमन के जरिए राज्यों में फिलहाल संसदीय सीटों में 50 फीसदी बढ़ोतरी होगी और उत्तर प्रदेश में यह संख्या सबसे ज्यादा होकर तीन अंक में पहुंच जाएगी। 


लोकसभा का ऐतिहासिक विस्तार 
वर्तमान में लोकसभा की सदस्य संख्या 543 है, जो 1971 की जनगणना के आधार पर टिकी हुई है। सरकार के नए प्रस्ताव के अनुसार यदि सीटों में 50 फीसदी की बढ़ोतरी होती है तो यह संख्या बढ़कर 816 हो जाएगी। इस विस्तार का आधार 2011 की जनगणना को बनाया जाएगा यानी अब 2011 के आंकड़ों के आधार पर ही सीटों का पुनर्गठन (परिसीमन) किया जाएगा। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि नई जनगणना में होने वाली देरी के कारण आरक्षण के क्रियान्वयन में बाधा आ रही थी। यदि ये दोनों विधेयक संसद में पारित हाते हैं, तो महिला आरक्षण के बाद यूपी में सबसे ज्यादा 40 लोकसभा सीटें बढ़ेंगी। 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी। महाराष्ट्र में 48 से बढ़कर 72 हो जाएंगी, जिनमें महिलाओं के लिए 24 सीटें आरक्षित होगी। बिहार में महिला सीटों की संख्या 20 हो सकती है, जहां कुल सीटें 40 से 60 तक पहुंच सकती है। मध्यप्रदेश में 29 से 44 सीटों में 15 महिला आरक्षित सीटें बढ़ सकती हैं। तमिलनाडु में 39 से 59 प्रस्तावित सीटों में 20 और दिल्ली प्रस्तावित 11 में 4 यानी महिला सीटें होंगी। झारखंड में 7 महिला आरक्षित सीटें बढ़ने का अनुमान है, जहां फिलहाल 14 सीटें हैं। ऐसे ही अन्य राज्यों की सीटे भी नए परिसीमन में बढ़ेंगी। 

कानूनी और राजनीतिक चुनौतियां 
सरकार को हालांकि इस ऐतिहासिक बदलाव को अमली जामा पहनाने के लिए दो मोर्चों पर काम करना होगा। इसके लिए संविधान संशोधन के लिए सरकार को संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता है। यानी इन दोनों विधेयकों को पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा। इसी वजह से सरकार विपक्ष का समर्थन जुटाने में लगी है। यही कारण है कि इसके लिए गृहमंत्री अमित शाह सपा, राजद, बीजद, वाईएसआर कांग्रेस, एनसीपी (एसपी), और एआईएमआईएम जैसे विपक्षी दलों के साथ निरंतर संवाद कर रहे हैं। दरअसल विपक्ष में खासतौर से कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दल लगातार मांग कर रहे हैं कि महिला कोटे के भीतर ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए, क्योंकि फिलहाल इसमें ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान शामिल नहीं है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार सरकार इसी फॉर्मूले पर राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटें बढ़ाने और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की योजना है, ताकि पूरे देश में एक जैसा ढांचा रहे। 

पृष्ठभूमि: नौ दशक पुराना मुद्दा 
देश में महिला आरक्ष्ण का मुद्दा नया नही है, बल्कि साल 1931 यानी लगभग एक सदी पुरानी है। साल 1931 में सरोजिनी नायडू और बेगम शाह नवाज ने पहली बार राजनीतिक समानता की आवाज को बुलंद किया था। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महिलाओं के लिए राजनीति में आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हुई थी, लेकिन तब प्रस्ताव खारिज कर दिया गया था। इसके बाद 1971 में भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति का गठन किया गया, जिसमें कई सदस्यों ने महिला आरक्षण का विरोध किया। जबिक 1974 में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए महिलाओं की स्थिति पर एक समिति ने शिक्षा और समाज कल्याण मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की सिफारिश की गई थी। इसके बाद साल 1988 में महिलाओं के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना ने पंचायत स्तर से संसद तक महिलाओं को आरक्षण देने की सिफारिश की और यहीं से पंचायती राज संस्थानों और सभी राज्यों में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य करने वाले संविधान संशोधनों की नींव रखी और 1993 में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गईं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल सहित कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किया है। मोदी सरकार ने साल 2023 में महिला आरक्षण कानून के स्थान पर 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' कानून पास हुआ और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी इसकी मंजूरी दे चुकी हैं। लेकिन जनगणना और परिसीमन की शर्त के कारण यह अटका हुआ है। अब सरकार 2011 की जनगणना को आधार मानकर इसे तत्काल प्रभावी बनाने की योजना बना रही है। 
04-05Apr2026 
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लाल गलियारे का सूर्यास्त: नक्सलवाद मुक्ति के मुहाने पर भारत

आंतरिक सुरक्षा के इतिहास को बदल देगी 31 मार्च की तारीख?
BY-ओ.पी. पाल 
भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में 31 मार्च 2026 की तारीख महज एक कैलेंडर तिथि नहीं, बल्कि एक युग के अंत का उद्घोष बनने जा रही है। आधी सदी से अधिक समय तक देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना रहा नेपाल के पशुपति से लेकर आंध्र प्रदेश के तिरुपति तक फैला 'लाल गलियारा' (रेड कॉरिडोर) अब अपने अस्तित्व की अंतिम सांसे गिन रहा है। यानी 'नक्सलबाड़ी' से शुरू हुआ यह हिंसक अध्याय अब अपने अंतिम पृष्ठ पर है। गृह मंत्रालय की 'जीरो टॉलरेंस' नीति और 'सुरक्षा-विकास-विश्वास' के त्रिकोणीय प्रहार ने नक्सली नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। 2018 में जहां 126 जिले इस समस्या से जूझ रहे थे, वहीं अब यह संख्या घटकर मात्र 08 रह गई है और अब केवल छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में 3 जिले ऐसे बचे हैं, जिन्हें 'अत्यधिक प्रभावित' की श्रेणी में रखा गया है, जहां सुरक्षा बल का प्रहार अंतिम चरणों में है। मसलन की 31 मार्च 2026 की समय-सीमा केवल एक प्रशासनिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि उन लाखों आदिवासियों की आकांक्षा है, जिन्होंने दशकों तक हिंसा का दंश झेला है। हालांकि उग्रवाद अपने अंतिम दौर में है, लेकिन चुनौती अब इन क्षेत्रों में लोकतांत्रिक संस्थाओं को और मजबूत करने और विकास की गति को निरंतर बनाए रखने की है। 
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केंद्र सरकार की वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) से निपटने के लिए वर्ष 2015 में शुरु की गई राष्ट्रीय नीति एवं कार्य योजना' ने आज आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से इस लड़ाई की दिशा बदल दी? सरकार ने इसे केवल 'कानून-व्यवस्था' की समस्या न मानकर एक बहु-आयामी चुनौती माना और इस रण्नीतिक बदलाव के लिए सरकार ने सुरक्षा का अभेद्य चक्रव्यूह तैयार करने, राज्य पुलिस बलों के आधुनिकीकरण और केंद्रीय बलों के समन्वय पर जोर दिया। कंद्रीय गृह मंत्रालय के ताजा आंकड़ो पर गौर करें, तो इस योजना के तहत दुर्गम इलाकों में 656 फोर्टीफाइड पुलिस स्टेशन बनाए गए, जो सुरक्षा बलों के लिए 'लॉजिस्टिक हब' साबित हुए। वहीं सुरक्षा संबंधी व्यय के तहत इस दौरान राज्यों को अब तक 3681.73 करोड़ रुपये जारी किए गए। सरकार की इस रणनीतिक पहल ने नक्सलियों के वित्तीय स्रोतों को भी पूरी तरह सुखा दिया गया। वहीं केंद्रीय एजेंसियों को 1224.59 करोड़ रुपये की मदद से हेलीकॉप्टर, ड्रोन और आधुनिक कैंप अवसंरचना प्रदान की गई। नक्सल प्रभावित राज्यों में नक्सलियों की 'इलाकों का कटना' और 'अशिक्षा' जैसी सबसे बड़ी ताकत को सड़कें और स्कूल जैसे बुनियादी विकास की योजनाओं ने आज खत्म कर दिया है। दो प्रमुख योजनाओं (आरआरपी और आरसीपीएलडब्ल्यूईए) के तहत 15,016 किलोमीटर सड़कों का जाल बिछाया गया। यही नहीं 'लाल गलियारा' के दायरे में जंगलों के बीच 9,233 मोबाइल टावर चालू किए गए, जिससे नक्सलियों का सूचना तंत्र कमजोर हुआ। नक्सल प्रभावित राज्यों में 179 एकलव्य स्कूल और 46 आईटीआई के माध्यम से आदिवासी युवाओं के हाथों में बंदूक की जगह औजार और किताबें थमाई जा रही हैं। वित्तीय समावेशन के दृष्टिकोण से 6,025 अधिक डाकघरों,1,804 बैंक शाखाओं और खोले गए 1,321 एटीएम ने बिचौलियों और नक्सलियों के समानांतर आर्थिक तंत्र को ध्वस्त कर दिया है। 


मुख्यधारा में लौटने को मजबूर नक्सली 
सरकार ने केवल बंदूकों के दम पर नहीं, बल्कि 'विश्वास' के जरिए नक्सलवाद के खिलाफ इस जंग को जीता है। सरकार ने पुनर्वास पैकेज के माध्यम से बंदूक छोड़कर समाज में लौटने वाले नक्सलियों के लिए 'सुनहरा गलियारा' बनाया है। आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में साल 2025 में 364 नक्सलियों का खात्मा, 1022 की गिरफ्तारी और सर्वाधक 2337 नक्सलियों का आत्मसमर्पण यह साबित करता है कि नक्सलियों में अब माओवादी विचारधारा का आकर्षण पूरी तरह खत्म हो चुका है। पुनर्वास पैकेज के तहत उच्च रैंक कैडरों को 5 लाख रुपये और अन्य को 2.5 लाख रुपये दिये जा रहे हैं, वहीं 3 साल तक 10 हजार रुपये प्रति माह और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यही नहीं समर्पित हथियारों और गोला-बारूद के लिए अलग से प्रोत्साहन राशि की दी जा रही है। इसका मतलब सरकार ने केवल सैन्य बल का प्रयोग नहीं किया, बल्कि नक्सलियों के वैचारिक और आर्थिक आधार पर प्रहार किया है। आज जब हम 31 मार्च 2026 की डेडलाइन की बात करते हैं, तो उसकी सफलता का असली श्रेय सुरक्षा बलों के अलावा उन शिक्षकों और स्वास्थ्य कर्मियों को भी जाता है, जो सुरक्षा बलों के साथ-साथ उन इलाकों में पहुँचे, जहाँ जाना मौत को दावत देना था। 'विकास' की इस सुगबुगाहट ने नक्सलियों के उस नैरेटिव को खत्म कर दिया है कि सरकार आदिवासियों की दुश्मन है। आज नक्सलवाद केवल एक ढ़हता हुआ ढांचा है। जिसमें भारत 'सुरक्षा-विकास-विश्वास' के मंत्र के साथ एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहा है जहाँ विकास की रोशनी देश के सबसे दूरस्थ अंचलों तक बिना किसी डर के पहुंचेगी।


डेढ़ दशक वाला 'ब्लडी संडे' वाला दौर खत्म 
सरकार की इस निर्णायक पहल ने आज शांति की नई इबारत रखते हुए साल 2010 के 'ब्लडी संडे' वाले दौर और आज के शांत होते बस्तर व अभुझमाड़ की तुलना इन आंकड़ों से की जा सकती है। साल 2025 में सुरक्षा बलों ने 364 नक्सलियों को मार गिराया, 1022 को गिरफ्तार किया और 2337 से आत्मसमर्पण कराकर नक्सलवाद की कमर तोड़ कर जनता में विश्वास कायम किया है। साल 2026 के ढ़ाई माह में दो दर्जन से ज्यादा उग्रवादी मारे जा चुके हैं और करीब 350 ने आधुनिक हथियारों के साथ आत्मसमर्पण करके समाज की मुख्यधारा में अपना नया जीवन शुरु करने का फैसला कर चुके हैं। पिछले एक दशक से ज्यादा समय में अब तक सुरक्षा बलो के विभिन्न अभियानों के तहत जहां 16,550 नक्सली गिरफ्तार किये जा चुके हैं। वहीं अब तक उच्च रैंक कैडरों समेत करीब 10,225 नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं। सरकारी आंकड़ो के मुताबिक, इस दशक में दिसंबर 2025 तक नक्सलवादी घटनाओं में जहां 1734 नागरिक मारे गये और उच्चाधिकारियों समेत करीब 600 सुरक्षाकर्मी शहीद हो चुके हैं। वहीं 1841 उग्रवादी मारे गये हैं। यही कारण है कि नक्सली हिंसा में 2010 की तुलना में आज घटनाओं में 88 फीसदी और मौतों में 90 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। नक्सल से प्रभावित प्रभावित पुलिस स्टेशनों में भी 74 फीसदी कमी आई है। 


बहु-आयामी रणनीति में ‘समाधान’ 
गृह मंत्रालय ने में नक्सलवाद से निपटने के लिए 'समाधान'(SAMADHAN)रणनीति के रूप में एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें(Smart Leadership) कुशल नेतृत्व और समन्वय, (Aggressive Strategy)उग्रवादियों के खिलाफ आक्रामक अभियान, (Motivation and Training) सुरक्षा बलों का मनोबल और बेहतर प्रशिक्षण, (Actionable Intelligence)सटीक खुफिया जानकारी का तंत्र, (Dashboard Based KPIs) विकास कार्यों की निरंतर निगरानी, (Harnessing Technology) ड्रोन और आधुनिक हथियारों का उपयोग, (Action Plan for Each Theatre) हर प्रभावित क्षेत्र के लिए अलग रणनीति और (No Access to Financing) नक्सलियों की फंडिंग और रसद आपूर्ति को रोकना शामिल रहा है। 
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विचारधारा 
देश में दशकों पहले, पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव 'नक्सलबाड़ी' से उठी चिंगारी ने भारत के एक बड़े हिस्से को अपनी लपटों में ले लिया था। 'लाल गलियारा' के नाम से मशहूर यह इलाका पशुपति (नेपाल) से तिरुपति (आंध्र प्रदेश) तक फैला हुआ था। माना जाता है कि नक्सलवाद की जड़ें 1967 के किसान विद्रोह में निहित हैं, जिसका नेतृत्व चारु मजूमदार और कानू सान्याल ने किया था। यह विचारधारा माओत्से तुंग के 'सशस्त्र क्रांति' के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका लक्ष्य लोकतांत्रिक व्यवस्था को उखाड़ फेंककर 'जनता की सरकार' स्थापित करना है। एक समय था जब नक्सलवाद का प्रभाव भारत के 10 से अधिक राज्यों में था, जिसे 'पशुपति से तिरुपति' तक का लाल गलियारा कहा जाता था। इसमें छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य प्रमुख रूप से शामिल थे। 
27-28Mar2026 ---

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

पश्चिम बंगाल चुनाव: सत्ता की जंग से बड़ी 'चुनाव आयोग की साख' की अग्नि परीक्षा

लोकतंत्र के उत्सव और साख की अग्निपरीक्षा के बीच 'सत्ता का संग्राम' 
By-ओ.पी. पाल 

श्चिम बंगाल की सत्ता का रण एक बार फिर सज चुका है। भारत निर्वाचन आयोग ने राज्य की 294 विधानसभा सीटों के लिए चुनावी बिगुल फूंक दिया है, जहां की राजनीति हमेशा से ही 'प्रतिबद्धता' और 'प्रतिरोध' की प्रयोगशाला रही है। लेकिन इस बार का यह महामुकाबला केवल यह तय नहीं करेगा कि कोलकाता के ऐतिहासिक 'राइटर्स बिल्डिंग' में अगला मुख्यमंत्री कौन बैठेगा, बल्कि यह भारतीय चुनाव आयोग की उस वैश्विक साख की भी सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है, जिसने 2021 के चुनाव और उसके बाद हुई भीषण हिंसा के दाग को धोने और 'हिंसा मुक्त बंगाल' का संकल्प लिया है। मसलन इस बार का चुनाव न केवल राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया के प्रबंधन के लिहाज से एक बड़ी चुनौती वाला चुनाव है। आयोग ने इस बार अपने आत्मविश्वास को दर्शाते हुए पिछले 8 चरणों के लंबे कार्यक्रम को घटाकर मात्र दो चरणों में समेटने का 'साहसिक' फैसला लिया है, जो अपने आप में एक बड़ा दावं माना जा रहा है। हालांकि इसका असली परिणाम 23 और 29 अप्रैल को होने वाले दोनों चरणों के मतदान की शांति और सुरक्षा से तय होगा? 
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श्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में 'हिंसा' एक ऐसा शब्द रहा है जिसने लोकतांत्रिक उत्सव को कई बार फीका किया है। 2021 के चुनाव और उसके बाद हुई हिंसा के कड़वे अनुभवों को देखते हुए, इस बार चुनाव आयोग का पूरा जोर 'हिंसा मुक्त मतदान' पर है, जिसके लिए पिछले सप्ताह कोलकाता का तीन दिवसीय दौरा करके मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों भाजपा, तृणमूल कांग्रेस, सीपीआई(एम), कांग्रेस और अन्य दलों से रुबरु होकर स्पष्ट संदेश दिया है कि चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने हिंसा, धमकाने की कोशिशों और चुनाव कर्मचारियों को प्रभावित करने वाली किसी भी गतिविधि के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाने का ऐलान किया है। मुख्य आयुक्त ने जोर देकर कहा कि आयोग पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी चुनाव कराने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। अब सवाल है कि क्या यह विधानसभा चुनाव राज्य के चुनावी इतिहास में 'हिंसा-मुक्त' होने का नया कीर्तिमान स्थापित कर पाएगा? हालांकि यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन आयोग की सक्रियता ने उन मतदाताओं में भरोसा जरूर जगाया है, जो लंबे समय से शांतिपूर्ण मतदान की बाट जोह रहे हैं। एक मायने में यह चुनाव न केवल बंगाल का भविष्य तय करेगा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव कराने वाली सर्वोच्च संस्था की साख को भी पुनर्स्थापित करेगा। चुनावी कार्यक्रम के अनुसार इस बार पहले चरण के लिए 23 अप्रैल को उत्तर बंगाल और जंगलमहल के इलाके की 152 सीटों और दूसर चरण में 29 अप्रैल को दक्षिण बंगाल और कोलकाता के आसपास के इलाके की 142 सीटों पर मतदान होना है। जबकि चुनाव के नतीजे चार मई को आएंगे। 
बेहद चुनावी मुकाबले के आसार 
बंगाल की जमीन पर राजनीतिक बिसात भी दिलचस्प है, जहां चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से सत्ताधारी टीएमसी और मुख्य विपक्षी दल भाजपा के बीच आर-पार का है। वहीं पिछले चुनाव में शून्य पर सिमटने के बाद, वाम मोर्चा और कांग्रेस वाला गठबंधन इस बार 'प्रासंगिकता' बचाने की जंग लड़ रहा है। टीएमसी की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने चौथी बार सत्ता बरकरार रखने की बड़ी चुनौती है, जिसमें टीएमसी को 'भ्रष्टाचार' के गंभीर आरोपों और 'एंटी-इनकंबेंसी' (सत्ता विरोधी लहर) से लड़ना है। सत्तापक्ष के लिए हाल ही में मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) को लेकर उपजे विवाद भी भी किसी चुनौती से कम नहीं होगा, जिसका मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पंहुचा है। आयोग के एसआईआर और केंद्रीय फंड में हो रही कटौती को लेकर फैली बेचैनी ने बंगाल में खासतौर से टीएमसी के लिए राजनीतिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। वहीं 2021 में 77 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार सत्ता परिवर्तन की पुरजोर कोशिश में जुटी है। पार्टी व्यापक चुनावी रणनीति के साथ 'घुसपैठ' और 'महिला सुरक्षा' जैसे मुद्दों को आधार बना रही है, लेकिन उसे अभी भी स्थानीय स्तर पर एक सर्वमान्य मजबूत नेतृत्व और सांगठनिक एकजुटता की तलाश है। भले ही सीटों के मामले में टीएमसी आगे दिख रही हो, लेकिन वोट प्रतिशत के मामले में फासला बहुत कम रह गया है, जिसमें यह आंकड़ा बताता है कि बंगाल का मुकाबला बेहद करीबी होने वाला है। हालांकि क्या जमीन पर यह आंकड़े हकीकत में बदलेंगे या 4 मई के नतीजे कुछ और ही कहानी कहेंगे? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। 
सुरक्षा आयोग की सर्वोच्च प्राथमिकता 
पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में 'हिंसा' एक ऐसा शब्द रहा है जिसने लोकतांत्रिक उत्सव को कई बार फीका किया है। 2021 के चुनाव और उसके बाद हुई हिंसा के कड़वे अनुभवों को देखते हुए इस बार आयोग का पूरा जोर 'हिंसा मुक्त मतदान' पर है। इसी रणनीति के तहत चुनाव आयोग चुनाव की घोषणा से पहले ही केंद्रीय बलों 480 कंपनियां राज्य में भेज चुका हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि केंद्रीय बलों का उपयोग केवल मतदान के दिन ही नहीं, बल्कि मतदाताओं में विश्वास पैदा करने के लिए बलों द्वारा एरिया डोमिनेशन और गश्त में पहले से कर रहा है। वहीं दागी अधिकारियों को लेकर भी चुनाव आयोग पूरी तरह से मुस्तैद है यानी आयोग इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। इसलिए आयोग ने उन पुलिस अधिकारियों की सूची मांगी है जिन पर पिछले चुनावों में हिंसा को बढ़ावा देने या लापरवाही बरतने के आरोप लगे थे। ऐसे दागी अधिकारियों को चुनाव प्रक्रिया से दूर रखने के लिए आयोग ने उन्हें हटाने की कार्रवाई भी शुरु कर दी है। वहीं चुनाव आयोग इस बार 'फर्जी मतदान' की गुंजाइश खत्म करने की दिशा में मतदान केंद्रों के बाहर चेहरा सत्यापन के लिए विशेष काउंटर बनाने पर विचार कर रहा है, जहाँ बुर्का या घूंघट वाले मतदाताओं की पहचान महिला कर्मचारियों द्वारा की जाएगी। 
बंगाल के चुनावी 'एक्स-फैक्टर' 
राजनीतिक जानकारों की माने तो पश्चिम बंगाल में महिलाएं अक्सर साइलेंट वोटर होती हैं। 'संदेशखाली' जैसी घटनाओं और 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं के बीच उनका झुकाव ही सत्ता की चाबी तय करेगा। राज्य में बढ़ती बेरोजगारी और भर्ती घोटाले युवाओं के बीच एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुके हैं। बंगाल में बदलते राजनीतिक परिदृश्य ने नए अवसर पैदा किए हैं। कभी बनर्जी को संदेह की नजर से देखने वाले शहरी बंगाली 'भद्रलोक' मतदाता अब एसआईआर के दखल को लेकर अपनी नाराजगी साझा कर रहे हैं। वहीं, 'मतुआ' और 'राजबंशी' जैसे समुदाय जिनके समर्थन ने भाजपा को बंगाल में मुख्य विपक्षी दल के रूप में खड़ा करने में मदद की थी, अब उनमें भी बेचैनी के संकेत दिख रहे हैं। उत्तर बंगाल में भाजपा की पकड़ मजबूत रही है, जबकि दक्षिण बंगाल टीएमसी का किला है। इस बार दोनों दल एक-दूसरे के गढ़ में घुसपैठ की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए इस बार पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव महज आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों मतदाताओं की उम्मीदों का परीक्षण है, जो दशकों से शांतिपूर्ण मतदान का सपना देख रहे हैं। यदि चुनाव आयोग हिंसा मुक्त मतदान कराने में सफल रहता है, तो यह भारतीय चुनाव प्रबंधन के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा। 4 मई के नतीजे यह बताएंगे कि बंगाल ने 'दीदी' की 'निरंतरता' को चुना या 'परिवर्तन' के 'केसरिया' संकल्प को पर भरोसा जताया है। 
19Mar-2026

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: नीति से लेकर शक्ति तक-भारतीय महिलाओं का ऐतिहासिक उदय

नारी शक्ति: भारत के विकास परिदृश्य में नेतृत्व के नए शिखर तक महिलाएं 
By-ओ.पी. पाल 

भारत की प्रगति का पहिया अब केवल पुरुष प्रधान नीति-निर्माण पर नहीं, बल्कि महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और उनके नेतृत्व पर टिका है। आज देश के छोटे गाँवों से लेकर महानगरों तक, महिलाएं न केवल अपनी किस्मत बदल रही हैं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य को एक नई दिशा दे रही हैं। यह बदलाव महज कागजी नहीं है, बल्कि यह खेतों में चलती मशीनों, कार्यालयों में होते फैसलों और स्थानीय पंचायतों में गूँजती आवाजों में साफ झलकता है। आज के समय में न्याय की सुलभता ने महिलाओं को अपनी बात रखने की हिम्मत दी है। कानूनी सुधारों और नीति-निर्माण में बढ़ते प्रतिनिधित्व ने उन्हें एक ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान किया है, जिससे वे आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में बिना किसी डर के अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही हैं। हर वर्ष 8 मार्च को मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस में वर्ष 2026 की ‘अधिकार और न्याय के साथ-साथ हर महिला और बालिका के सशक्तिकरण के लिए वास्तविक कार्रवाई’ पर केंद्रित है। भारत जैसे-जैसे अपनी विकास यात्रा पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसमें स्पष्ट है कि महिलाओं को अब केवल 'भागीदार' के रूप में नहीं, बल्कि 'निर्णायक' के रूप में देखा जा रहा है। परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। अधिकार और न्याय के साथ की गई 'वास्तविक कार्रवाई' ही वह बीज है, जो आने वाले समय में एक सशक्त और समृद्ध भारत का वृक्ष तैयार करेगा। 
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भारत में महिलाओं को लेकर आज कहानी बदल चुकी है। अब हम 'महिलाओं के विकास' से आगे बढ़कर 'महिला-नेतृत्व वाले विकास' के युग में प्रवेश कर चुके हैं। स्वयं सहायता समूह और स्थानीय शासन के तहत आज देश में करोड़ों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं। इस पहल में भविष्य की कृषि क्षेत्र में 1,261 करोड़ के बजट के साथ 15,000 स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन संचालन के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। देश में 10.05 करोड़ ग्रामीण परिवार अब 90.90 लाख स्वयं सहायता समूहों का हिस्सा हैं। इन समूहों ने 12.18 लाख करोड़ रुपये के संस्थागत ऋण तक पहुँच बनाई है, जो ग्रामीण उद्यमशीलता में एक क्रांति है। देश में 3 करोड़ से अधिक महिलाएं अब प्रति वर्ष कम से कम एक लाख रुपये कमाने के लक्ष्य (लखपति दीदी) की ओर तेजी से बढ़ रही हैं। यह पहल ग्रामीण महिलाओं को आधुनिक तकनीक के 'इकोसिस्टम' का हिस्सा बना रही है। यह केवल पैसे बचाने का जरिया नहीं, बल्कि उद्यमशीलता का एक बड़ा मंच बन चुका है। यही नहीं आधुनिक तकनीक के तहत डिजिटल बैंकिंग से लेकर आधुनिक कृषि यंत्रों तक, महिलाओं की पहुँच ने उन्हें पारंपरिक बंधनों से मुक्त किया है और औपचारिक वित्तीय प्रणालियों और मुद्रा ऋण जैसी योजनाओं ने महिला उद्यमियों के लिए सफलता के नए द्वार खोले हैं। 
भविष्य की दिशा तय करती महिलाएं 

तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र यानी क्लासरूम से लेकर प्रयोगशालाओं और स्पेस मिशन तक, भारतीय महिलाएं आज भविष्य की दिशा तय कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 केवल अतीत के संघर्षों को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह उस गहरे बदलाव को पहचानने का अवसर है जो हमारे समाज में आ चुका है। आज महिलाएं खेतों से लेकर कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक भारत की विकास यात्रा को नया आकार दे रही हैं। आज महिलाएं खेतों से लेकर कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक भारत की विकास यात्रा को नया आकार दे रही हैं। यह 'वास्तविक कार्रवाई' ही एक ऐसे समाज का निर्माण करेगी जो समावेशी, न्यायपूर्ण और सशक्त होगा। नतीजन परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। तकनीकी क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए 'नमो ड्रोन दीदी' योजना एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। भारत की विकास यात्रा अब केवल विकास दर (जीडीपी) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात पर टिकी है कि महिलाएं कितनी सशक्त हैं। निर्णय लेने की शक्ति से लेकर ड्रोन उड़ाने तक, भारतीय महिलाएं आज न केवल अपनी प्रगति लिख रही हैं, बल्कि एक विकसित और समावेशी भारत की दिशा भी तय कर रही हैं। 
राजनैतिक क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी 
देश में आज राजनैतिक दृष्टि से भी महिलाएं उड़ान भर रही हैं। भारत के पंचायती राज संस्थानों में लगभग 50 प्रतिशत निर्वाचित प्रतिनिधि महिलाएं हैं। स्थानीय शासन स्तर पर बड़ी संख्या में महिलाएं अब निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में स्थानीय निकायों का संचालन कर रही हैं। महिला नेताओं ने शासन के एजेंडे को स्वास्थ्य, पेयजल, शिक्षा और सामाजिक कल्याण जैसे बुनियादी मुद्दों की ओर मोड़ा है, जिससे समुदायों का समग्र विकास हो रहा है। भारत ने अपनी आजादी के पहले दिन से ही महिलाओं को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रदान किया था। यह उस समय की एक साहसिक वैश्विक मिसाल थी, क्योंकि तब दुनिया के कई विकसित राष्ट्र भी महिलाओं को वोट देने के अधिकार पर हिचकिचा रहे थे। इस संवैधानिक दूरदर्शिता ने भारतीय महिलाओं को गणतंत्र की शुरुआत से ही एक 'निर्णायक' की भूमिका में रखा। 
शिक्षा बनी सशक्तिकरण की पहली सीढ़ी 
शिक्षा के क्षेत्र में आए बदलावों ने सशक्तिकरण की एक मजबूत नींव तैयार की है। सरकार की विभिन्न पहलों के परिणामस्वरूप उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की उपस्थिति में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। उच्च शिक्षा में महिलाओं का नामांकन 2014-15 के 1.57 करोड़ से बढ़कर 2022-23 में 2.18 करोड़ हो गया है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित जैसे विषयों में यूजीसी, नेट, जेआरएफ शोधार्थियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 53 प्रतिशत को पार कर गई है। यह दर्शाता है कि आधुनिक अनुसंधान और नवाचार की बागडोर अब महिलाओं के हाथों में है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की पहल वंचित समुदायों की लड़कियों के लिए शिक्षा के द्वार खोल रही है, जिससे सामाजिक असमानता की खाई कम हो रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा तक उनकी समान पहुँच ने 'महिला-नेतृत्व वाले विकास' को वास्तविकता में बदल दिया है। 
आर्थिक और सामाजिक विकास की धुरी 
भारत में 1990 के दशक के बाद से भारत की नीतियों में एक ‘पैराडाइम शिफ्ट’ आया है। आज महिलाओं को केवल सुरक्षा या कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उन्हें आर्थिक और सामाजिक विकास के मुख्य स्टेकहोल्डर के रूप में पहचाना जाता है। एक महिला का स्वास्थ्य पूरे परिवार की खुशहाली का केंद्र माना गया है। भारत सरकार ने 'मातृ स्वास्थ्य' को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत 4.26 करोड़ महिलाओं को सीधे वित्तीय सहायता पहुँचाई गई है। वहीं ऐसे निरंतर प्रयासों का सबसे सुखद परिणाम मैटरनल मॉर्टेलिटी रेश्यो में आई भारी गिरावट है, जो वर्ष 2014-16 की दर 130 से घटकर 2021-23 में 88 पर आ गई है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि हजारों माताओं के जीवन सुरक्षित होने का द्योतक है। ये सभी योजनाएं अलग-अलग नहीं, बल्कि एक संयुक्त 'इकोसिस्टम' के रूप में काम कर रही हैं। जब एक महिला को धुएं से मुक्ति मिलती है, घर में पानी मिलता है और कार्यस्थल पर सुरक्षा का अहसास होता है, तब वह अपनी पूरी ऊर्जा शिक्षा, उद्यम और नेतृत्व में लगा पाती है। यही वह बुनियाद है जिस पर विकसित भारत की इमारत खड़ी हो रही है। 
सुरक्षा और न्याय: भयमुक्त सशक्तिकरण 
किसी भी देश में सशक्तिकरण तभी संभव है जब वातावरण सुरक्षित हो। मिशन शक्ति के तहत 'वन स्टॉप सेंटर' जैसे तंत्र महिलाओं को संकट के समय कानूनी और चिकित्सा सहायता प्रदान कर रहे हैं। कार्यस्थल पर सुरक्षा के तहत पीओएसएच अधिनियम, 2013 के माध्यम से सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित किया जा रहा है। वहीं सामाजिक सुधार कीदृष्ट से देश में जनवरी 2026 तक 2,153 बाल विवाहों को प्रभावी ढंग से रोका गया है, जो समाज की बदलती सोच का प्रतीक है। जनवरी 1992 में एक सांविधिक निकाय के रूप में स्थापित राष्ट्रीय महिला आयोग ने भारत में महिलाओं के कानूनी हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका प्राथमिक कार्य केवल कानूनों की निगरानी करना नहीं, बल्कि समय के साथ उनमें आवश्यक सुधारों का सुझाव देना भी है। यह आयोग सुनिश्चित करता है कि संविधान द्वारा दी गई समानता की गारंटी धरातल पर भी प्रभावी रहे। 
इतिहास के झरोखे से महिला दिवस 
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की जड़ें किसी उत्सव में नहीं, बल्कि श्रमिक आंदोलनों के कड़े संघर्ष में दबी हैं। इसकी शुरुआत 20वीं सदी की शुरुआत में उत्तरी अमेरिका और यूरोप से हुई थी। लेकिन 8 मार्च की तारीख का असली संबंध वर्ष 1917 से है। उस समय रूस की महिलाओं ने 'रोटी और शांति' की मांग को लेकर एक ऐतिहासिक हड़ताल की थी। दिलचस्प बात यह है कि तत्कालीन जूलियन कैलेंडर के अनुसार वह दिन 23 फरवरी था, लेकिन पूरी दुनिया में प्रचलित ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से वह 8 मार्च की तारीख थी। इसी ऐतिहासिक मोड़ को सम्मान देने के लिए 1977 में संयुक्त राष्ट्र ने इसे आधिकारिक मान्यता दी गई। 
08Mar-2026
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सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

संसदीय गरिमा और मर्यादाओं में गिरावट का जिम्मेदार कौन?

बजट सत्र के दौरान लोकतांत्रिक जवाबदेही के बजाय बढ़ा टकराव
BY-ओ.पी. पाल
संसद मे बजट सत्र का पहला चरण हुई कई घटनाओं का गवाह बना है और इस दौरान जिस प्रकार से संसदीय गरिमा और मर्यादाओं को तार तार होते देखा गया है, उसकी पृष्ठभूमि में देश की राजनीति के गिरते स्तर की तस्वीर साफतौर से नजर आई है। हालांकि ये पहला मौका नहीं है जब सत्ता पक्ष और विपक्ष का टकराव सामने आया हो। पिछले कई दशकों से संसद सत्रों के दौरान कामकाज कम और विभिन्न मुद्दों पर टकराव ज्यादा रहा है। ऐसे में सवाल है कि संसद सत्रों के दौरान लोकतांत्रिक जवाबदेही के बजाय टकराव की वजह से विधायी कार्यों, बजट चर्चाओं और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा तक नहीं हो पाती, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? खासतौर पर लोकसभा में मौजूदा बजट सत्र में राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर परंपरा के अनुसार प्रधानमंत्री का संबोधन तक नहीं हो सका हो।  
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में विधायी प्रक्रिया की प्रभावशीलता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिहाज से संसद की बैठकों की संख्या में लगातार हो रही कटौती भी राजनीति के गिरते स्तर का कारण मानी जा सकती है। संसद की संस्थागत शक्तियों और लोकतंत्र को कमजोर करने की वजह भी बिगड़ती राजनीतिक तस्वीर है, जो महज चुनाव जीतने के स्वार्थ तक सिमित होने लगी है। इसी कारण से संसद या विधान मंडलों में विधायी कामकाज, बहस और जवाबदेही स्वत: ही कमजोर हो रही है, जो लोकतांत्रिक दृष्टि से एक बेहद बड़ी चिंता का विषय ही नहीं है, बल्कि हमारा लोकतंत्र और ज्यादा शर्मसार होता है।। संसद सत्र के दौरान हाल ही में लोकसभा में प्रधानमंत्री के राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर संबोधन से पहले विपक्ष की कुछ महिला सांसद हाथों में पारे लिखी तख्तियां लेकर प्रधानमंत्री की सीट के पास पहुंच गई थी, जिसके कारण लोकसभा स्पीकर के आग्रह पर पीएम सदन में नहीं आये। संसद में पिछले 22 सालों में ऐसी दूसरी घटना हुई, जब संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रधानमंत्री धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में अपना संबोधन नहीं कर पाए। इसका कारण लोकसभा स्पीकर ने अगले दिन पीएम की सुरक्षा का हवाला देकर स्पष्ट कर दिया था। स्पीकर ने सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष का टकराव के कारण पीएम के साथ सदन में कोई अप्रिय घटना होने की आशंका से उनसे सदन में न आने का आग्रह किया था। हालांकि अगले दिन राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर अपनी बात रखी। इससे पहले 10 जून 2004 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह विपक्षी दल राजग के विरोध के सामने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अपनी बात सदन में नहीं रख सके थे। 
लोकसभा अध्यक्ष से खफा विपक्ष 
सदन के भीतर और बाहर वैसे तो सत्ता पक्ष और विपक्ष के एक दूसरे के खिलाफ आरोप प्रत्यारोप चलता रहा है, लेकिन लोकसभा में एक दूसरी बड़ी घटना हुई, जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी 2020 के चीन गतिरोध पर पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमए नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा का हवाला देना चाहते थे, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने नियमों का हवाला देकर उन्हें इस पुस्तक पर बोलने की इजाजत नहीं दी, तो कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों के सांसदों ने सदन में प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी शुरु कर दी थी। सदन में विपक्षी नेता राहुल गांधी की बार-बार की अड़चनों और विवादों के कारण संसदीय कार्यवाही में भी तनाव के चलते अध्यक्ष ओम बिरला को हस्तक्षेप करना पड़ा, तो विपक्ष उनसे इतना खफा नजर आया कि संसद में सरकार और विपक्ष के बीच टकराव विकराल रुप लेता नजर आया कि विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष पर सदन की कार्यवाही में पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए 118 सांसदों के हस्ताक्षरों के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस ही दे दिया। इससे पहले विपक्ष सदन में कांग्रेस समेत आठ सांसदों को अनुशासनहीन व्यवहार के चलते बजट सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित करने से नारज था। दूसरी तरफ भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया कि राहुल गांधी के सोरोस फाउंडेशन और फोर्ड फाउंडेशन से संबंध हैं। वहीं भाजपा ने राहुल गांधी के आचरण पर भी चर्चा की मांग करते हुए उनकी सदस्यता रद्द करने और भविष्य में चुनाव लड़ने से रोक की मांग की, जो अक्सर निर्वाचन आयोग, सर्वोच्च न्यायालय और लोकसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप लगाते रहे हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष के एक दूसरे पर ऐसे ही आरोप-प्रत्यारोप संसद और संसद के बाहर टकराव का कारण बने हैं। 
बदजुबानी तक पहुंची सियासत 
लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए दिये गये नोटिस के बाद संसद में यह सियासी टकराव ओर ज्यादा तेज हो गया है, जब केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर आरोप लगाया है कि प्रियंका गांधी और केसी वेणुगोपाल के साथ कांग्रेस के कुछ सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के कक्ष में जाकर उनके साथ गाली-गलौज की। रिजिजू ने यह भी दावा किया कि उस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रियंका गांधी और केसी वेणुगोपाल, सांसदों के इस व्यवहार का विरोध करने के बजाय अपने सांसदों को और उकसा रहे थे। ऐसे सियासी टकराव के कारण साफ संकेत हैं कि बजट सत्र का पहला चरण हंगामे में ही कटेगा, क्योंकि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सदन के सुचारु संचालन के लिए बजट पर चर्चा से पहले भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर संक्षिप्त चर्चा की शर्त रखी थी, जिसके जवाब में सरकार ने उनसे सत्र के दौरान सदन में हुई घटनाओं पर खेद जताने की शर्त रखी है। बजट सत्र के दौरान अप्रकाशित किताब, सांसदों के निलंबन, विपक्षी महिला सांसदों पर पीएम पर हमले की साजिश जैसे मुद्दे ने सरकार और विपक्ष के संबंधों की खाई चौड़ी कर दी है। संसद के बजट सत्र का पहला चरण सत्ता पक्षा और विपक्ष के हंगामें के बीच औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कराने के बाद संपन्न तो हो गया, लेकिन 9 मार्च से शुरु होने वाले दूसरे चरण के लिए भी सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों पक्षों के बीच इस टकराव को दूर करने की चुनौती खड़ा कर गया है? हालांकि इस बीच इस टकराव को दूर करने की दिशा में दोनों पक्षों के लिए कोई न कोई रास्ता तलाशने का प्रर्याप्त मौका है और देश व जनहित में यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरुरी भी है। 
15-16-Feb-2026
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