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सोमवार, 7 मार्च 2016

ट्रांसपोर्टरों को राहत देगी सरकार!

ओवलोडिंग पर पर पांच फीसदी छूट देने का निर्णय
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देशभर में सड़क हादसों का सबब बनती आ रही ओवरलोडिंग पर शिकंजा कसने के लिए केंद्र सरकार कमर कसे हुए है, लेकिन कार्मिशियल वाहनों के नियमों में ढ़ील देते हुए ओवलोडिंग पर वसूली जाने वाली दस गुणा जुर्माने में राहत दी है। यानि अब ट्रक में ओवरलोडिंग की तयसीमा में पांच प्रतिशत की छूट दी जाएगी।  
दरअसल भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने कार्मिशियल वाहनों यानि ओवरलोडिंग ट्रकों पर शिकंजा कसते हुए जनवरी में एक अधिसूचना जारी की थी, जिसमें ओवरलोडिंग ट्रकों को टोल प्लाजा पर जाते ही या तो ट्रक के सामान को वहीं उतारना पडेंगा और साथ में टोल टैक्स का दस गुणा जुर्माने के रूप में भुगतान करने का भी प्रावधान किया था। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार ट्रांसपोर्टरों की मांग पर सरकार ने ओवरलोड ट्रकों पर लग रही 10 गुणा जुर्माने से कुछ राहत देते हुए उन माल वाहक वाहनों से पेनल्टी न लेने की योजना को हरी झंडी दी है, जो माल के वजन की तय सीमा से पांच फीसदी से ज्यादा ओवरलोड हों। इसके लिए अब एनएचएआई ने सर्कुलर जारी किया है। वहीं सड़क मंत्रालय ने सभी राज्यों और यूनियन टेरेटरी के प्रमुख सचिव ट्रांसपोर्ट को पत्र लिख कर इस राहत से अवगत करा दिया है। मंत्रालय के अनुसार ओवरलोडिंग पर यह छूट मोटर व्हीकल एक्ट के सेक्शन 113 के सब-सेक्शन(3) के अंतर्गत दी गई है। यह वाहन के ग्रॉस व्हीकल वेट पर मान्य होगा। मसलन ट्रांसपोर्टरों की मांग पर मोदी सरकार की नई नीति के तहत व्हीकल के कुल लोड का पांच फीसदी अधिक होने पर उसे ओवरलोड नहीं माना जाएगा। सरकार ने पहले इस राहत को रोड सेफ्टी बिल में देने की योजना बनाई थी, लेकिन यह विधेयक संसद में लंबित है, जिसमें इस नियम को भी शामिल किया जाएगा। हालांकि यूपीए-2 सरकार ने भी ओवरलोडिंग रोकने के लिए टोल प्लाजाओं पर ट्रकों के लोड़ की जांच करने और जुर्माना वसूल करने के निर्देश दिये थे, लेकिन उसका ज्यादा असर नहीं हो सका।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

संसद में पेश हुई आर्थिक समीक्षा:अच्छे दिनों के संकेत !

भारतीय अर्थव्यवस्था: मजबूत जमीन की उम्मीद
दो साल में विकास दर 8% से ज्यादा का अनुमान
सरकार के सामने चुनौतियों की भी कमी नहीं
ओ. पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार ने आर्थिक परिस्थितियों में भारतीय अर्थव्यवस्था को वृहद आर्थिक स्थिरता, दृढता और उम्मीदों की जमीन करार देते हुए अनुमान लगाया है कि अगले वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक वृद्धि सात से 7.75 प्रतिशत के दायरे में होगी। वहीं अगले दो साल में यह विकास दर आठ प्रतिशत से भी अधिक होने की उम्मीद जताई गई है।
संसद में शुक्रवार को वर्ष 2015-16 की आर्थिक समीक्षा पेश करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली कहा कि प्रतिकूल वैश्विक परिस्थितियों और लगातार कमजोर मानसून से कृषि क्षेत्र पर पड़े प्रभाव के बावजूद चालू वित्त वर्ष में 7.6 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि का अनुमान अच्छे दिनों के संकेत है। आर्थिक समीक्षा के अनुसार देश में वैश्विक आर्थिक स्थिरता में सुधारो के प्रयासों और देश में वृहत-आर्थिक स्थिरता का माहौल को देखते हुए आर्थिक वृद्धि के अगले कुछ सालों में आठ प्रतिशत से भी ज्यादा होने की उम्मीद है। हालांकि समीक्षा में उच्च आर्थिक वृद्धि की राह में विश्व अर्थव्यवस्था में लगातार नरमी का रूख रहा तो भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ी चुनौती का मुकाबला करना पड़ सकता है। वर्ष 2016-17 के परिदृश्य को ध्यान में रखते हुये हमें समग्र मांग, निर्यात, खपत,निजी निवेश और सरकार से जुड़े हर पहलू पर गौर करना होगा। समीक्षा में अनिश्चित वातावरण और कमजोर मांग से वैश्विक अर्थव्यवस्था में विश्वास की कमी और दुनिया के उभरते बाजारों में भी साफ तौर पर सुस्ती होने का जिक्र भी किया गया, जिसमें निवेश और खपत गतिविधियों को नये सिरे से संतुलित किये जाने से ज्यादा चिंता दर्शाई गई है। ऐसे माहौल में भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता को जुझारुपन और आशावाद के नजरियों को देखें तो आने वाले सालों सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी में 7 से 7.75 प्रतिशत के दायरे में वृद्धि होने की उम्मीद जताई गई। समीक्षा के मुताबिक वर्ष 2015 के दौरान दुनिया की कुछ विकसित अर्थव्यवस्थाओं में सुधार आया है। लेकिन कुछ विकसित और विकासशील देश ऐसे भी रहे हैं जिनमें लगातार पांचवे साल गिरावट रही है। कुल मिलाकर 2015 में वैश्विक आर्थिक गतिविधियां कमजोर रही। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 2015 में विश्व अर्थव्यवस्था की वृद्धि 3.1 प्रतिशत से बढ़कर 2016 में 3.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। इनमें विकसित देशों की वृद्धि 2016 में 2.1 प्रतिशत और 2017 में भी इसी दर पर रहने का अनुमान व्यक्त किया है। समीक्षा के अनुसार यदि विश्व अर्थव्यवस्था में लगातार नरमी बनी रहती है तो भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ी चुनौती का मुकाबला करना पड़ सकता है। वर्ष 2016.17 के परिदृश्य को ध्यान में रखते हुये हमें समग्र मांग, निर्यात, खपत, निजी निवेश और सरकार से जुड़े हर पहलू पर गौर करना होगा।
ये होंगी प्रमुख चुनौतियां
भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष खतरों का जिक्र करते हुए कहा गया है कि तीन प्रमुख चुनौतियां हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था में उठापटक से निर्यात और सख्त वित्तीय स्थिति का परिदृश्य और बिगड़ेगा। दूसरा कच्चे तेल के दाम यदि अनुमान से ज्यादा बढ़ जाते हैं, तो इसका खपत पर असर पड़ेगा। यह असर एक तो सीधे होगा और दूसरे मौद्रिक नरमी की संभावनायें भी इससे कम होंगी। अंत में यदि दोनों ही बातें हो जातीं हैं तो यह काफी गंभीर जोखिम होगा। तेल उत्पादक देश यदि उत्पादन में कटौती का समझौता कर लेतीं हैं तो स्थिति बिगड़ सकती है।
जीएसटी बनेगा सुधार का आधार
वित्त मंत्री जेटली द्वारा पेश समीक्षा में वस्तु एवं सेवाकर यानि जीएसटी को आधुनिक वैश्विक कर इतिहास में असाधारण उपाय करार दिया गया। खासतौर से जीएसटी दीर्घकाल में भारत की आर्थिक वृद्धि आठ से दस प्रतिशत तक बढ़ाने की संभावनाओं का प्रबल करेगा। लेकिन अल्पकाल में वास्तविक आर्थिक वृद्धि वैश्विक वृद्धि और मांग पर निर्भर करेगी। विनिर्मित वस्तु और सेवाओं का भारत का निर्यात देश के जीडीपी का 18 प्रतिशत हिस्सा है, जो एक दशक पहले यह करीब 11 प्रतिशत था।
7वें वेतन आयोग का होगा यह असर
केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आर्थिक समीक्षा में आम आदमी को प्रभावित करने वाले 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों पर कहा कि इसके लागू करने से बाजार की कीमतों से अस्थिरता नहीं आएगी, लेकिन वेतन वृद्धि लागू करने से महंगाई पर थोड़ा असर पड़ेगा, लेकिन कीमतें अस्थिर होने की कोई संभावना नहीं है। मसलन वेतन वृद्धि से कीमतों में अस्थिरता की संभावना नहीं है। आर्थिक समीक्षा के अनुसार रेलवे सहित अनुमानित वेतन का बिल सातवें वेतन आयोग के तहत करीब 52 प्रतिशत बढ़ जाएगा, जबकि छठे वेतन आयोग में यह 70 प्रतिशत बढ़ा था। इससे कहा गया है कि चूंकि सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने को प्रतिबद्ध है इस लिए वेतन में बढोतरी होने के बावजूद कीमतों का दबाव कम होगा।

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

देश के बांधो के खतरे दूर करेगी सरकार

सुरक्षा सुनिश्चित करने को तैयार होगी योजना
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार नदियों से जुड़े मुद्दों के साथ देशभर के बांधों परियोजनाओं के खतरों की आशंकाओं से निपटने की भी योजना पर आगेबढ़ती नजर आ रही है। इसके लिए सरकार ने बांध पुनर्वास एवं सुधार परियोजनाओं से सबक लेने के सुरक्षा सुनिश्चित करने की योजना तैयार करने का निर्णय लिया है।
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसर देश के सभी राज्यों में बदहाल स्थिति में मौजूद कई विशाल बांधों के पुनर्वास की तत्काल आवश्यकता के बारे में विविध मंचों पर चिंता जाहिर की जाती रही है, ताकि उनकी सुरक्षा और प्रचालन संबंधी दक्षता सुनिश्चित की जा सके। इसलिए देश में बांधों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए मोदी सरकार ने बांध पुनर्वास एवं सुधार परियोजना यानि डीआरआईपी की शुरूआत की है। यह परियोजना विश्व बैंक से प्राप्त ऋण सहायता के साथ सात राज्यों में लगभग 250 बांधों की स्थिति में सुधार लाने के लिए प्रारंभ की गई है। हालांकि छह वर्षीय डीआरआईपी परियोजना अप्रैल 2012 में प्रारम्भ हो चुकी थी, जिस पर काम जारी है।
खस्ता हालत में 80 फीसदी बांध
मंत्रालय के अनुसार देश में करीब 4900 विशाल बांधों में 80 फीसदी बांध 25 साल से भी ज्यादा पुराने होने के कारण उनसे बाढ़ और भूकंप जैसी आपदा के खतरे की आशंकाएं बनी रहती है। इनके पुराने प्रचलित डिजाइन की कार्यप्रणालियां और सुरक्षा की स्थितियां भी डिजाइन के वर्तमान मानकों और सुरक्षा मानदंडों से मेल नहीं खा रही हैं। बांधों के आकलन और सर्वे के तहत नींव की अभियांत्रिकी संबंधी सामग्री अथवा बांधों का निर्माण में उपयोग की गयी सामग्री भी समय के साथ नष्ट होने के कगार पर है। मसलन उनके रखरखाव से जुड़े इन पृथक कारकों और मामलों के कारण कुछ बांध खस्ता हालत में हैं, जिनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा उनकी प्रचालन संबंधी विश्वसनीयता बहाल करने के लिए उन बांधों की तत्काल मरम्मत करना जरूरी है।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

बासमती चावल वार में औंधेमुहं गिरा पाकिस्तान!

भारत से आगे निकलने की होड़ में नाकाम पाक
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
पाकिस्तान से बेहतर संबन्ध बनाने की कवायद के बावजूद पाकिस्तान की भारतीय बासमती चावल को ना-पाक चुनौती देने के माममले में भी मुहं की खानी पड़ी है। मसलन व्यापारिक स्पर्धा में भारत को पछाड़ने के प्रयास में भारत का विरोध करके पाकिस्तान की अपने बासमती चावल पर जीई टैग लेने की कोशिश नाकाम हो गई है।
भारत के बासमती चावल के विरोध के सामने इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी अपीलेट बोर्ड ने पाक की उस अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें पाकिस्तान ने अपने बासमती चावल के लिए भारत के मुकाबले जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानि जीई टैग हासिल करने का प्रयास किया था। बासमती चावल के मामले में आईपीएबी का यह फैसला भारत को पछाड़ने के लिए पाकिस्तान के प्रयास को एक बड़ा झटका माना जा रहा है। पाक के बजाए अब जीआई टैग अब भारत को मिलने की संभावना प्रबल हो गई है। दरअसल पाकिस्तान में लाहौर स्थित बासमती ग्रोवर्स असोसिएशन यानि बीजीए ने भारतीय संस्था कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण यानि एपीडा के जीआई टैक आवेदन को चुनौती देते हुए आईपीएबी में दस्तक दी थी और अपने बासमती चावल पर जीआई टैग हासिल करने का दावा किया था। पाकिस्तान की इस अपील को एक दिन पहले ही आईपीएबी ने दलील देते हुए खारिज कर दिया है। गौरतलब है कि भारत की ओर से एपीडा ने पहले ही पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड जैसे सात राज्यों में उत्पादित बासमती चावल के लिए जीआई टैग की मांग की थी।

शनिवार, 30 जनवरी 2016

बीस स्मार्ट शहरों पर खर्च होंगे 51 हजार करोड़!



मध्य प्रदेश के तीन शहरों पर 12539 करोड़ रुपये खर्च करेगी सरकार
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार द्वारा पहले चरण में जिन बीस शहरों को स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने का ऐलान किया है, उन्हें विकसित करने के लिए 50845.20 करोड़ खर्च किया जाएगा। इस अनुमानित कुल खर्च में 12539 करोड़ अकेले मध्य प्रदेश के जबलपुर, इंदौर और भोपाल शहरों पर खर्च होगा।
केंद्र सरकार ने पहले चरण के लिए एक दिन पहले ही 12 राज्यों के बीस शहरों को स्मार्ट शहरों के रूप में विकसित करने का ऐलान किया है। इन बीस शहरों पर केंद्र सरकार ने पांच साल में 50,845.20 करोड़ रुपए खर्च करेगी। इनमें 38,657.10 करोड़ शहरी क्षेत्र के विकास और 12188.10 करोड़ रुपये की रकम इन शहरों में बुनियादी सुविधाओं समेत करीब पांच दर्जन मद्दों में सुविधाएं मुहैया कराने पर खर्च किया जाएगा। मसलन केंद्र सरकार इन शहरों में पानी और बिजली आपूर्ति, सफाई और ठोस कचरा प्रबंधन, समुचित शहरी आवागमन और सार्वजनिक परिवहन, आईटी कनेक्टीविटी, ई-गवर्नेंस के माध्यम, बुनियादी सुविधाएं और नागरिक सहभागिता विकसित करने की योजना पर काम कर रही है।
मध्य प्रदेश के स्मार्ट सिटी का खर्च
पहले चरण में 20 शहरों को स्मार्ट शहरों के रूप में विकसित करने के लिए पांच साल तक खर्च की कुल अनुमानित राशि में से अकेले 12539 करोड़ की राशि मध्य प्रदेश के र्स्माट शहरों जबलपुर, इंदौर और भोपाल के विकास पर खर्च की जाएगी। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के अनुसार जबलपुर को स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने के लिए कुल 2290 करोड़ रुपये की लागत का अनुमान लगाया गया है, जिसमें 1751 करोड़ से 590 एकड़ क्षेत्र के विकास और 539 करोड़ रुपये शहरी बुनियादी सुविधााओं पर खर्च होंगे। इसी प्रकार इंदौर में खर्च होने वाली 5099.60 करोड़ की राशि में से 4468.76 करोड़ रुपये 742 एकड़ ऐतिहासिक क्षेत्र को विकसित करने और 388 करोड़ की राशि शहरी समस्याओं के समाधान पर खर्च होने हैं। जब कि राज्य की राजधानी भोपाल को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए 3440.90 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। इस राशि में से शहर में ही 350 एकड़ सरकारी भूमि क्षेत्र को विकसित करने के लिए 2565.20 करोड़ तथा 875.70 करोड़ शहर की जनता की बुनियादी सुविधाओं को सुनिश्चित करने पर खर्च किये जाएंगे।

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

जीडीपी पर भारी पड़ रहे हैं सड़क हादसे!

सड़कों के बुनियादी सुधार पर 11 हजार खर्च करेगी सरकार
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
दुनियाभर के देशों के मुकाबले सबसे ज्यादा भारत में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं से चिंतित मोदी सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने कई ठोस योजनाएं शुरू की हैं। सरकार ने यह भी माना है कि सड़क दुर्घटनाओं से हर साल 60 हजार करोड़ यानि तीन प्रतिशत जीडीपी का नुकसान हो रहा है।  इन सड़क हादसों को रोकने की दिशा में देशभर में दुर्घटनाग्रस्त जगहों को चिन्हित करके उनके बुनियादी ढांचों में सुधार के लिए सरकार ने 11 हजार रुपये खर्च करने की योजना बनाई है।
देशभर में इस साल मनाए जा रहे ‘सड़क सुरक्षा सप्ताह’ में सरकार ने सड़क हादसों पर अंकुश लगाने के अभियान को फोकस किया गया है। स्वयं केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने माना है कि देश में सड़क दुर्घटनाओं का सीधा प्रभाव जीडीपी दर पर पड़ रहा है। मसलन तीन प्रतिशत जीडीपी का हर साल नुकसान का अनुमान लगाया गया है। सड़क हादसों के कारण हर साल होने वाले करीब 60 हजार करोड़ रुपये से बिगड़ती अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए मंत्रालय ने दुर्घटनाग्रस्त स्थानों का चयन करके उनके बुनियादी ढांचे में सुधार करके सुरक्षित बनाने के लिए अगले पांच साल में 11 हजार करोड़ रुपये खर्च करने का खाका तैयार किया गया है। इसके अलावा सरकार ने सड़क हादसों में ज्यादा से ज्यादा कमी लाने के लिए कई अन्य ठोस कदम उठाते हुए योजनाओं को भी पटरी पर उतारा है। इन योजनाओं में सड़क इंजीनियरिंग में सुधार, μलाईओवर तथा अंडरपास का निर्माण आदि जैसे अन्य कदम भी उठाये जा रहे हैं।
एक युद्ध से भी ज्यादा मौतें
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने भारत में होने वाले सड़क हादसों में होने वाली मौतों की बड़ी संख्या पर चिंता जताते हुए यहां तक कहा कि भारत में हर साल सड़क हादसों के कारण हो रही डेढ़ लाख लोगों की मौते किसी युद्ध के दौरान होने वाली मौतों से भी कहीं अधिक हैं। गौरतलब है कि हाल ही के एक साल में करीब पांच लाख सड़क दुर्घटनाओं में करीब 1.5 लोगों की मौत हुई और तीन लाख लोग अपंग हुए हैं, जो बेहद चिंता का विषय है। सड़क दुघर्टनाओं में स्वीडन जैसे देश से सीख लेकर भारत इस चिंता को कम कर सकता है यानि स्वीडन में पिछले साल केवल एक दुर्घटना हुई।

सोमवार, 11 जनवरी 2016

नमामि गंगे मिशन पर आगे बढ़ा कानपुर!

कानपुर में अन्य जगहों से ज्यादा हो रहा काम
हरिभूमि ब्यूरो.
नई दिल्ली
केंद्र सरकार की राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा अभियान के तहत चलाई जा रही महत्वकांक्षी योजना नमामि गंगे मिशन ने कानपुर में ज्यादा गति पकड़ी है, जहां केंद्र सरकार के जारी दिशा-निर्देशों के तहत परियोजना को अन्य जगहों से ज्यादा काम हो रहा है। केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के अनुसार गंगा को बचाने की इस मुहिम में वैसे तो जनजागृति का प्रसार हुआ है, लेकिन यूपी के कानपुर से गुजर रही गंगा की स्वच्छता के लिए प्रशासन, पुलिस और लोग सक्रिय होकर इस अभियान में तेजी से आगे बढ़े हैं। दावा किया जा रहा है कि कानपुर में कानपुर और आस-पास के घाटों और गंगा नदी किनारे बसे गांवों में लोगों की मदद से शवों को गंगा में प्रवाहित करने से रोकने के प्रयास में नदी पुलिसिंग और प्रशासन के साथ आम लोगों में सक्रियता बनी हुई है। इसमें गंगा किनारे शवों को जलाने वाले लोग भी घाटों की सफाई से जुड़ी किसी भी परियोजना या नियम को समझने का प्रयास कर रहे हैं, जिनमें गंगा सफाई को लेकर जागरुकता भी बढ़ रही है। इसका कारण यह भी है कि गंगा के किनारे और घाटों को साफ करने के लिए जीआरएफडी प्लान को केंद्र पहले ही मंजूरी दे चुकी है।
मंत्रालय के अनुसार 1986 में गंगा एक्शन प्लान का उद्देश्य गंगाजल में प्रदूषण की मात्रा को कम करना और गंगाजल की गुणवत्ता को सुधारने के लिए बनाई गई स्कीमों के कार्यान्वयन के तहत अन्य राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी लक्षित सीवेज ट्रीटमेंट संयंत्र लगाए जा रहे हैं। मौजूदा केंद्र सरकार ने गंगा कार्ययोजना का दायरा बढ़ाते हुए ऐसी स्कीमें भी लागू की है जिसमें शहरों और गांवों के नालो तथा औद्योगिक ईकाइयों का प्रदूषित जल गंगा नदी में न आ सके। जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए सिर्फ गंगा ही नहीं, बल्कि इसमें मिलने वाले और इसके किनारे पर स्थित झील एवं तालाबों को भी साफ करने की योजनाओं को भी शुरू किया गया है और गंगा और इसमें वाली नदियों को भी साफ किए जाने की पहल शुरू हो चुकी है।

शनिवार, 2 जनवरी 2016

हाइवे ट्रक लूट पर बनेगी विशेष योजना!


राज्यों की मदद से जल्द तैयार होगा सुरक्षा नेटवर्क
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
देश में सड़कों का जाल बिछाने की कवायद के साथ सुरक्षित सफर बनाने के लिए भी केंद्र सरकार ने खासकर  राष्ट्रीय राजमार्गो पर बढ़ती जा रही ट्रक जैसे वाहनों की लूट पर अंकुश लगाने के लिए भी एक विशेष योजना का खाका तैयार किया है। केंद्र सरकार इस योजना को आगामी मार्च तक लागू करने की तैयारी में है, जिसमें राज्यों की पुलिस की मदद से एक सुरक्षा नेटवर्क तैयार किया जा रहा है।
केंद्र सरकार ने देश में राष्ट्रीय राजमार्गो के निर्माण की सड़क परियोजनाओं को पटरी पर उतारा है, जिसमें सरकार ने सड़क पर सफर करने वाले वाहनों और लोगों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता पर रखा है। दरअसल राजमार्गो पर रात्रि के समय चलने वाले ट्रकों और उनमें लदे माल की लूट की वारदातों के मद्देनजर केंद्र सरकार ने इस विशेष योजना का खाका तैयार किया है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार ट्रक लूट की वारदातों पर लगाम कसने की दिशा में गृह मंत्रालय के साथ मिलकर बनाई जा रही इस विशेष योजना में राज्यों की सरकारों और पुलिस के समन्वय से एक तकनीकी सुरक्षा नेटवर्क बनाने के तहत एक ऐसा साफ्टवेयर तैयार किया जा रहा है, जो कंप्यूटर के जरिए इस विशेष योजना को कारगर बनाएगा। केंद्र सरकार और राज्य सरकार के समन्वय से ट्रक लूट की घटनाओं पर लगाम कसने के लिए बनने वाली इस तकनीकी आधारित विशेष योजना से हाइवे राबरी पर अंकुश लगने की उम्मीद है।
कैसी होगी विशेष योजना
केंद्र सरकार की इस विशेष योजना में विकसित किये जा रहे साफ्टवेयर के जरिए हाइवे पर होने वाली लूट जैसी वारदातों और उसे अंजाम देने वाले अपराधियों का डाटा तैयार हो सकेगा। वहीं अपराधियों के हुलिए और फिंगर प्रिंट भी कंप्यूटर के डाटा बैंक में होंगे। इस योजना के जरिए खासकर राज्यों की सीमा के पुलिस अधिकारियों का टेलीफोन और इंटरनेट सिस्टम के तहत गृह मंत्रालय से भी संपर्क बना रहेगा। ऐसी तकनीकी योजना के जरिए लूट के शिकार ट्रक चालकों का संदेश की पहुंच पुलिस और इस कंप्यूटरीकृत सिस्टम तक हो जाएगी। केंद्र सरकार ने टोल बेरियर पर फोन सुविधा और व उच्चकोटि के कैमरे लगाने की व्यवस्था को इस योजना के दायरे में शामिल किया है। फिलहाल गृहमंत्रालय ने राज्यों की सरकारों को सुझाव दिया है कि वारदात होने पर पुलिस शून्य एफआईआर दर्ज करके बाद में उसे संबन्धित पुलिस थाना क्षेत्र को हस्तांतरित करने की पहल को आगे बढ़ाए।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

संसद में काम करने का संकल्प करे कांग्रेस!

नये साल पर पीएम मोदी ने नसीहत देते हुए दी सलाह
ओ.पी. पाल. नोएडा।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में अवरोधों को लेकर बिना नाम लिये कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि उसे कल से शुरू हो रहेनए साल में वह संसद को कार्य करने देने और देश के विकास में बाधा उत्पन्न नहीं करने का संकल्प ले। उन्होंने सभी राजनीतिकदलों से भी ऐसा ही आव्हान किया है।
यहां सड़क परियोजना के शिलान्यास समारोह में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद सत्र के दौरान कार्यवाही को बाधा करने की टीस को उजागर किया। उन्होंने एक तरह से कांग्रेस पर यह हमला बोलते हुए कहा कि जिन्हें जनता ने नकार दिया था उन्होंने संसद को बंधक बना लिया। उन्होंने कहा कि हमारे से ज्यादा ये लोग जानते हैं कि संसद के काम रूकने से देश और जनता के हितों पर किस तरह आघात होता है। देश पर 60 साल तक राज करने और हमारे से ज्यादा यह जानते हुए कि संसद के काम रूकने से देश और जनता के हितों का किस तरह से नुकसान होता है और संसद में काम करना कितना जरूरी है। ऐसी स्थिति में उन्हें छह दशक तक सत्ता का सुख भोगने के बाद उसे अपने राजनीतिक कारणों से संसद में कामकाज को बाधित करने और देश के विकास को रोकने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जिनको अवसर नहीं मिला, उनकी नाराजगी समझी जा सकती है, लेकिन जिन्होंने 60 साल तक देश पर हर प्रकार की सत्ता का उपभोग किया उन्हें तो संसंद को बर्बाद करने का कतई अधिकार नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने हालांकि इस मंच से सभी राजनीतिक दलों से 2016 में एक संकल्प करने का आव्हान किया कि नए साल 2016 में वे संसद का कार्य चलने देंगे और गरीबों के लाभ के लिए काम करेंगे। उन्होंने कहा कि भारत के नागरिकों ने अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन संसद में बहस करने, परिचर्चा करने एवं विचार-विमर्श करने के लिए किया है इसलिए यह उनका दायित्व है।

बुधवार, 16 दिसंबर 2015

राज्यों के 43 विधेयक नही बन सके कानून!

छत्तीसगढ़ के तीन व मप्र का एक लंबित बिल
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार जहां संसद में महत्वपूर्ण लंबित विधेयकों को पारित कराने का प्रयास कर रही है, वहीं संसद में राज्यों के करीब चार दर्जन विधेयक कानून बनने का इंतजार कर रहे हैं। पिछले चार साल में राज्यों की विधानसभाओं में पारित होकर अनुमोदन के लिए केंद्र सरकार के पास आये 105 विधेयकों में 43 विधेयक अभी भी संसद में लंबित हैं, जो कानूनी दर्जा हासिल करने के लिए अभी केंद्र के विभिन्न मंत्रालयों व विभागों की खाक छानने को मजबूर हैं।
देश की राज्यों सरकारों द्वारा विधानसभाओं में पारित ऐसे विधेयकों की संख्या भी केंद्र सरकार के पास लगातार बढ़ती जा रही है, जिन्हें राज्य में काननू का दर्जा देने के लिए केंद्र सरकार और और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी का बेसब्री से इंतजार है। हालांकि मौजूदा सरकार का दावा है कि उसने ज्यादातर राज्य के विधेयकों को अंतिम रूप दे दिया है। मसलन वर्ष 2014 में केंद्र के पास ऐसे 104 विधेयक लंबित थे, जिनकी संख्या घटकर 43 रह गई है। राज्य सरकारों से केंद्र की जांच पड़ताल और राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए पिछले चार साल में केंद्र के पास ऐसे 105 विधेयक लंबित थे, जिन्हें विधानसभाओं या राज्य मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद संबन्धित केंद्रीय मंत्रालय और विभागों को जांच-पड़ताल के बाद अंतिम मुहर लगने के लिए राष्ट्रपति के समक्ष भेजा गया था। गौरतलब है कि राज्यों के विधेयकों में कई ऐसे महत्वपूर्ण बिल होते हैं जिनकी केंद्र में जांच पड़ताल में होने वाले विलंब के कारण राज्यों को कभी-कभी नाजुक स्थिति के दौर से गुजरना पड़ता है।

सोमवार, 14 दिसंबर 2015

उपग्रह से होगी परिवहन व्यवस्था की निगरानी!

सड़क हादसों पर काबू करने की कवायद
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
दुनियाभर में सड़क हादसों में भारत में हो रही सर्वाधिक मौतों को काबू करने की कवायद में जुटी केंद्र सरकार विभिन्न योजनाओं में में ही एक फार्मूला तैयार किया है। जिसके जरिए भीड़भाड़ वाले शहरों और उसके आसपास की सड़कों पर आसमान में उपग्रह के जरिए यातायात व्यवस्था पर पैनी नजर रखी जा सकेगी।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार मंत्रालय ने सड़कों की आसमान से कैमरों के जरिए निगरानी रखने के लिए एक पायलेट परियोजना शुरू करने का खाका तैयार करके काम शुरू कर दिया है। सरकार के इस फार्मूले के तहत पहले चरण में उन शहरों को शामिल किया गया है जिनकी आबादी पांच लाख या उससे ज्यादा है। मंत्रालय के अनुसार इस फार्मूले का मकसद सड़क हादसों को रोकने और यातायात व्यवस्था में सुधार लाना है। इस नई व्यवस्था को लागू करने से यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाले उन लोगों पर शिकंजा कसा जा सकेगा, जो पुलिस के चालान को अदालत में चुनौती देकर बचते रहे हैं। अब सरकार ने यातायात नियमों के उल्लंघन को रिकार्ड करने के लिए उपग्रहों से जुड़े कैमरे लगाने की योजना शुरू की है। इससे यदि अदालत में चुनौती देने वाला व्यक्ति यातायात नियमों के उल्लंघन का दोषी पाया गया तो उससे दोगुना जुर्माना वसूल किया जाएगा। केंद्र सरकार का मानना है कि इससे जहां यातायात व्यवस्था में सुधार होगा, वहीं सड़क हादसों में भी कमी आएगी। इसके अलावा पुलिस पर वाहन चालकों को तंग करने की शिकायते कम होने से भ्रष्टाचार पर भी लगाम लग सकेगी। एक अध्ययन में पाया गया है कि देश में यातायात नियम तोड़ने वालों में 30 फीसदी लोग चालान के खिलाफ अदालत में चले जाते हैं। इस नई व्यवस्था लागू होने से अब पुलिस या परिवहन प्राधिकरण को भी दोष साबित करने में मशक्कत नहीं करनी पडेगी।

रविवार, 6 दिसंबर 2015

जीएसटी व रियल एस्टेट बिल पर बनी बात!

अगले सप्ताह होगी चर्चा, संसद में भारी-भरकम एजेंडा तैयार
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
संसद सत्र के शीतकालीन सत्र में अगले सप्ताह के लिए केंद्र सरकार ने जीएसटी और रियल एस्टेट विधेयक समेत महत्वपूर्ण 16 विधेयको को आगे बढ़ाने का फैसला किया है। जीएसटी और रियल एस्टेट विधेयक के लिए तो चर्चा के लिए समय भी तय कर दिया गया है। इनमें कुछ विधेयक लोकसभा से पारित होने के बावजूद राज्यसभा में अटके हुए हैं, तो कुछ लोकसभा में लंबित हैं। 
संसदीय कार्य मंत्रालय के अनुसार संसद के शीतकालीन सत्र के सोमवार से शुरू हो रहे तीसरे सप्ताह में राज्यसभा कामकाज सलाहकार समिति ने जीएसटी व रीयल इस्टेट बिल पर बहस के लिए समय तय किया। यानि राज्यसभा की कामकाज सलाहकार समिति ने जीएसटी बिल के लिए 4 घंटे व रीयल इस्टेट बिल के लिए 2 घंटे की चर्चा का समय निर्धारित किया है। सदन की प्रवर समितियों ने इन दो विधेयकों पर पहले ही अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। राज्यसभा में इन विधेयकों समेत दस विधेयक पर आगे बढ़ने का निर्णय लेते हुए सूचीबद्ध किये गये हैं। जबकि लोकसभा में सरकार की और से 4 और विधेयक लाने का प्रस्ताव है। मसलन सरकार ने सोमवार यानि 7 दिसंबर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान चर्चा व पारित कराने के लिए भारी भरकम विधायी एजेंडा तय किया है। इसमें लोकसभा में लंबित 2 विधेयकों के साथ 4 और विधेयक तथा राज्यसभा में 7 विधेयक, जिसमें की 3 पहले से ही सदन में बहस के लिए सूचीबद्ध हैं, को पेश किया जाना है। इस संबन्ध में संसदीय मामलों के राज्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने पहले ही सरकार के एजेंडे की जानकारी दी है।

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

तीन साल में दोगुना बढ़े बाल अत्याचार के मामले

धरी रह गई सरकार की सभी योजनाए
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार भले ही देश में बाल अत्याचारों पर काबू पाने के लिए सख्त कानून और तमाम तरह के दावे किये जाते रहे हों, लेकिन पिछले तीन साल में बाल अत्याचारों के मामले कम होने के बजाए दो गुना से भी ज्यादा मामले बढ़े हैं। मसलन सरकार की रोकथाम और ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने की दिशा में जागरूकता शिविर और अन्य सभी अभियान धरे के धरे रह गये हैं। केंद्र सरकार ने गुरुवार को बाल अत्याचारों में हो रही निरंतर बढ़ोतरी को स्वीकार करते हुए आंकडे पेश किये हैं। गृह मंत्रालय के जारी इन आंकड़ों के मुताबिक स्पष्ट है कि बाल अत्याचार को रोकने के लिये देश में लागू सख्त कानून और देशभर में चलाए जा रहे विभिन्न अभियानों का प्रभाव पूरी तरह से नगण्य है। मसलन इन अभियानों में खर्च की जा रही करोड़ो की रकम भी बट्टे खाते में जा रही है। यदि पिछले तीन साल के आंकड़ो पर गौर की जाए तों देश भर में बच्चों पर अत्याचार की घटनाओं में दोगुना वृद्धि देखने के मिलती है। उधर केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने भी गुरुवार को राज्यसभा में सांसदों द्वारा पूछे गये सवालों में इस आंकड़े की पुष्टि करते हुए कहा कि बच्चों पर अत्याचार की घटनाएं लगातार बढ़ रही है। उन्होंने राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के आधार पर कहा कि देशभर में वर्ष 2012 में बच्चों के खिलाफ अत्याचार के 38 हजार 172 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2013 में 58 हजार 224 और 2014 में 89 हजार 423 मामले दर्ज हुए हैं। आंकड़ो से जाहिर है कि पिछले तीन साल में पिछले तीन साल में बाल अत्याचार की घटनाओं में दोगुनी वृद्धि हुई।

सोमवार, 23 नवंबर 2015

संसद: लंबित बिल पास करना सरकार की चुनौती!

शीर्ष प्राथमिकता पर होंगे अध्यादेश संबंधी विधेयक
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
संसद के शीतकालीन सत्र में लंबित विधेयकों को पारित कराने के लिए मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौती मानी जा रही है, जिसमें सरकार के सामने जीएसटी और अध्यादेश से संबन्धित विधेयकों को पारित कराना पहली प्राथमिकता होगी। हालांकि सरकार नई रणनीति के साथ विपक्षी दलों से बातचीत करके महत्वपूर्ण विधायी कार्यो पर आगे बढ़ने का प्रयास करेगी।
आगामी 26 नवंबर से शुरू होने जा रहे संसद के शीतकालीन सत्र में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश की समयावधि समाप्त होने के साथ केंद्र की राजग सरकार अध्यादेश संबंधी तीन अन्य विधेयकों को प्राथमिकता के साथ पारित कराने का प्रयास करेगी। इनमें चेक बाउंस मामलों से निपटने के लिए परक्राम्य साधन(संशोधित) विधेयक 2015 के अलावा वाणिज्यिक अपील प्रभाग एवं वाणिज्यिक विधेयक 2015 भी शामिल हैं। ये दोनों विधेयक उच्च न्यायालयों में वाणिज्यिक प्रभागों के गठन को आसान बनाऐंगे। जबकि तीसरे अध्यादेश संबन्धी विधेयक में सुलह समझौते के जरिए विवादों के तेजी से निपटान की दिशा में मध्यस्थता और सुलह समझौता(संशोधन)अध्यादेश 2015 को कानून का रूप देना सरकार की उच्च प्राथमिकता में शामिल है। हालांकि सरकार के एजेंडे में शीतकालीन सत्र के लिए अन्य महत्वपूर्ण लंबित विधेयकों में सचेतक संरक्षण (संशोधन) विधेयक, भ्रष्टाचार रोधी विधेयक, निरसन और संशोधन (चौथा) विधेयक, बेनामी लेनदेन (निषेध)विधेयक, उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश (वेतन एवं सेवा शर्तें) संशोधन विधेयक के अलावा माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन)विधेयक, अनुसूचित जाति, जनजाति (अत्याचार बचाव)संशोधन विधेयक, किशोर न्याय कानून विधेयक शामिल हैं। सूत्रों की माने तो भूमि अधिग्रहण विधेयक में उचित मुआवजा एवं पारद र्शिता के अधिकार पर सरकार को कोई जल्दबाजी नहीं है, जिसका कारण केंद्र सरकार इस मामले में अब राज्य सरकारों को अपने-अपने विधेयक तैयार करने को तरजीह देना चाहती है। राज्यसभा में महत्वपूर्ण लंबित बिलों में जीएसटी विधेयक भ्रष्टाचार रोकथाम (संशोधन) विधेयक और व्हिसल ब्लोअर सुरक्षा (संशोधन) विधेयक के अलावा लोकसभा से पारित कंपनी (संशोधन) विधेयक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (संशोधन) विधेयक भी राज्यसभा में लंबित हैं।

सोमवार, 9 नवंबर 2015

मिशन मोड से हर गांव के सभी घर होंगे रोशन!

वंचित गांवों का विद्युतीकरण पर राज्यों से बनी सहमति
ओ.पी. पाल
. नई दिल्ली।
प्रधानमंत्री मोदी के देश में वंचित सभी गांवों में हर घर को चौबीस घंटे बिजली की चमक से रोशन करने के लक्ष्य को हासिल करने की कवायद में कई योजनाएं शुरू की गई हैं। केंद्र सरकार ने ऐसे वंचित सभी गांवों जल्द से जल्द दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण ज्योति योजना के तहत मिशन के जरिए रोशन करने की तैयारी शुरू की है।
देश में ऊर्जा संकट से निपटने की दिशा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आजादी के 68 वर्षों के बाद तथा 21वीं सदी के 15 वर्ष बीत जाने के बावजूद आधुनिक भारत के 18 हजार गांवों में अभी तक बिजली न होने पर दुख व्यक्त कर चुके हैं, जिनका सपना है कि कम से कम वर्ष 2022 तक देश के हर गांव में हर दिन चौबीस घंटे बिजली मुहैया कराई जाए। मोदी के इस लक्ष्य को जल्द से जल्द आगे बढ़ाने की दिशा में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने एक और कदम आगे बढ़ाते हुए विद्युतीकरण से बचे शेष सभी गांवों को दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण ज्योति योजना के तहत मिशन पर वर्ष 2017 तक ही पूरा करने की कवायद को तेज कर दिया है। विद्युत मंत्रालय के अनुसार इसके लिए हाल ही में पीयूष गोयल ने सभी राज्यों में केंद्र शासित प्रदशों के साथ सर्वसम्मति सभी वंचित सभी गांवों में विद्युतीकरण सुनिश्चित करने का रोडमैप तैयार कर लिया है। यही नहीं केंद्र सरकार ने राज्यों को इस बात के लिए भी तैयार कर लिया है कि देश में वर्ष 2019 तक या उससे पहले 24 घंटे बिजली सुलभ कराने के लिए योजना निर्माण से संबंधित गतिविधियों को मिशन मोड के जरिए पूरा किया जाए।

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

लंबित सड़क परियोजनाओं पर आगे बढ़ी सरकार!


सुस्त पड़ी परियोजनाओं को मिलेगी एकमुश्त राशि
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने उन लंबित सड़क परियोजनाओं को भी पूरा करने के लिए कमर कस ली है, जिनके लिए अभी तक किसी न किसी बाधा के कारण संघर्ष करना पड़ा रहा था। ऐसी राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं के लिए केंद्र सरकार ने एकमुश्त राशि देने का फैसला किया है।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने बताया कि बुधवार को ही केंद्र सरकार द्वारा अधर में लटकी और सुस्त पड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं को पुनर्जीवित करने और उसके पूरा करने के लिए एकमुश्त राशि को मंजूरी प्रदान की है। यह यह मंजूरी बीओटी (टोल) परियोजनाओं से लेकर बीओटी (वार्षिकी) के लिए उपलब्ध प्रावधानों के विस्तार के तहत की गई है। इस निर्णय से इस वर्ष जून में एनएचएआई द्वारा बीओटी (टोल) परियोजना को विस्तृत करने के लिए एकमुश्त राशि देने पर जारी नीति परिपत्र के प्रावधानों को बीओटी (वार्षिकी) तक विस्तृत करने की अनुमित मिल जाएगी। मंत्रालय के अनुसार इस निर्णय के बाद 50 प्रतिशत काम पूरा होने के बावजूद एक नवंबर 2014 से लटकी पड़ी इस तरह की परियोजनाओं के लिए धन का एकमुश्त राशि के तौर पर वितरण किया जाएगा। इस तरह के सभी मामले और प्रत्येक मामले में जरूरी धनराशि प्राधिकरण द्वारा स्वीकृत की जाएगी। प्रस्ताव के अनुसार राजमार्ग क्षेत्र 3.8 लाख करोड़ रुपये की लटकी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहा है, लेकिन कई मामलों में निर्माण एजेंसी इसमें रुचि नहीं दिखा पा रही थी। सरकार के इस निर्णय से देश में लटकी पड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में एक बार फिर से जान आएगी। इससे देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति और बेहतर होगी। वहीं इस नीति को अपनाने से पीपीपी व्यवस्था में सभी प्रमुख हितधारकों प्राधिकरण, ऋणदाता और डेवलपर, रियायतग्राहियों को फायदा होगा। इस क्षेत्र के पुनर्जीवित होने से इस क्षेत्र में नागरिक और यात्रियों को राहत मिलेगी और इससे आर्थिक गतिविधियां भी बढ़ेंगी। इसके लिए वित्तपोषण करने वाली एजेंसी, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण तथा बिल्डर के बीच त्रिपक्षीय करार किया जाएगा।

शनिवार, 26 सितंबर 2015

सड़क हादसों पर अंकुश लगाना बड़ी चुनौती!

रिपोर्ट: तेरह राज्यों में ज्यादा बेकाबू रहे सड़क हादसे
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
दुनियाभर में भारत उन देशों में शुमार है,जहां लोगों की सबसे ज्यादा जीवन लीला सड़क हादसों में दफन हो जाती है। केंद्र सरकार लगातार सड़क हादसों में हो रही मौतों पर अंकुश लगाने के लिए सड़क और वाहनों के लिए बेहतर से बेहतर परियोजनाएं लागू कर रही है, लेकिन सड़क हादसों में होने वाली मौतों पर अंकुश लगाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की हाल ही में जारी हुई एक रिपोर्ट में सड़क हादसों और उनमें मौत की संख्या को लेकर चिंताजनक और चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। हालांकि इस रिपोर्ट में वर्ष 2014 तक के सड़क हादसों के आंकड़े पेश किये गये हैं, लेकिन इन आंकड़ों को देखते हुए भारत दुनिया के विकासशील देशों में इस मामले में दो दशक से भी ज्यादा पीछे खड़ा नजर आ रहा है। मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014 में हर घंटे औसतन 56 सड़क दुर्घटनाएं हुई, जिनमें औसतन डेढ़ दर्जन लोगों को अपनी जान गंवाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इस साल हुए करीब 4.90 लाख सड़क हादसों में देश में करीब 1.40 लाख लोग मौत के शिकार हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार किये गये अध्ययन 50 शहर देश के ऐसे हैं जहां पर 22.7 प्रतिशत सड़क हादसे होते हैं और हादसों के शिकार 11.9 प्रतिशत लोग अपनी जान गंवाने को मजबूर हैं। जबकि 16.8 प्रतिशत लोगों को गंभीर घायल होते देखे गये हैं। केंद्र सरकार ने भारत में कॉमर्शियल वाहनों के लिए एक अप्रैल 2015 से एबीएस जरूरी कर दिया गया है। वहीं वाहन निर्माण कंपनियों के लिए भी अंतर्राष्‍ट्रीय मानको का अनिवार्य किया गया है। वहीं सड़क सुरक्षा कानून लाने की तैयारी भी की जा रही है। मोटरसाइकिलों और कारों के लिए भी यह जरूरी करने जा रही है। हादसों का दूसरा बड़ा कारण भारतीय ड्राइवरों की अनुशासनहीनता है। कार चलाते समय सीट बेल्ट न पहनना, हेलमेट न पहनना आदि भी हादसों के कारण हैं।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

औद्योगिक विकास में रोड़ा बना गिरता भू-जल!

पन्द्रह राज्यों में 162 ब्लॉकों में नहीं मिलेगी अनुमति
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
जल प्रबंधन की दिशा में देश के विभिन्न हिस्सों में तेजी के साथ गिरते भू-जल को लेकर उपाय और योजनाएं बनाने के बावजूद सरकार की चिंताएं बढ़ना दिगर है। वहीं ऐसे क्षेत्रों में गिरता भू-जल औद्योगिक विकास की राह में रोड़ा बनता जा रहा है, जिसमें सरकार ने देश के एक दर्जन से ज्यादा राज्यों में ऐसे 162 ब्लॉक चिन्हित किये हैं, जहां गिरते भूजल की समस्या के कारण औद्योगिक ईकाई लगाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इस दायरे में हरियाणा के समूचे गुडगांव समेत लगभग सभी जिलों में 17 ब्लॉक अधिसूचित किये गये हैं।
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने जल प्रबंधन की दिशा में गिरते भूजल में सुधार करने की योजना को एक चुनौती मानते हुए राज्यों के लिए मास्टर प्लान बनाने एक कार्ययोजना भी तैयार की है। केंद्र सरकार की देश को विकास की दिशा में ले जाने के लिए जहां औद्योगिक विकास को भी प्रोत्साहन देने की नीति बनाई है, लेकिन वहीं जिन भागों में भूमि-जल तेजी के साथ गिर रहा है, वहां किसी प्रकार की औद्योगिक ईकाई स्थापित करने की अनुमति न देने की नीति भी बनाई है। मंत्रालय के अनुसार हाल ही में केंद्रीय भूमि जल प्राधिकरण के जरिए ऐसे क्षेत्रों को चिन्हित कराया है, जहां पेयजल को छोड़कर अन्य किसी उद्देश्यों खासतौर से औद्योगिक ईकाई लगाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। केंद्रीय भूमि जल प्राधिकरण द्वारा विभिन्न राज्यों में सबसे तेजी से गिर रहे भू-जल वाले 162 क्षेत्रों को अधिसूचित किया है, जो इससे पहले इस दायरे में केवल 43 स्थान ही ऐसे थे जहां औद्योगिक ईकाई लगाने की मनाही थी। ऐसे क्षेत्रों की संख्या बढ़कर 162 होना भू-जल के गिरते स्तर को लेकर सरकार की चिंताओं में इजाफा होना लाजिमी है। मंत्रालय के अनुसार औद्योगिक ईकाईयों के लिए प्रतिबन्धित ऐसे क्षेत्रों में हरियाणा के 17, मध्य प्रदेश के सात,  राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्ली के तीन, पंजाब के 46, गुजरात व आंध्र प्रदेश के चार-चार, राजस्थान के 35, तमिलनाडु के 18, तेलंगाना के दो, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल व दीव का एक-एक ब्लॉक शामिल है।

मंगलवार, 30 जून 2015

दिल्ली पुलिस के पर कतरने की तैयारी में केंद्र!

संसदीय समिति ने की कामकाज की समीक्षा
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच तल्खी का कारण बनती आ रही दिल्ली पुलिस के पर कतरने की तैयारी शुरू कर दी है? वहीं केंद्र सरकार पुलिस आधुनिकीकरण की दिशा में संसाधनों को बढ़ाने की कवायद में जुटी हुई। शायद इसी मकसद से गृह मंत्रालय की संसदीय समिति ने सोमवार को दिल्ली पुलिस मुख्यालय पहुंचकर दिल्ली पुलिस के कामकाज और कार्यशैली की समीक्षा की और पुलिस की समस्याओं को भी समझा है।
सूत्रों के अनुसार राज्यसभा की पी. भट्टाचार्य की अध्यक्षता वाली गृह कार्य संबन्धी संसदीय समिति के करीब दो दर्जन सांसद सदस्यों ने दिल्ली पुलिस मुख्यालय पहुंचकर पुलिस आयुक्त बीएस बस्सी समेत अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ विचार विमर्श किया। समिति ने पुलिस के कामकाज और कार्यशैली का जायजा लेने के महकमें के सामने आने वाली समस्याओं और पुलिस की जरूरतों के बारे में पुलिस अधिकारियों से पूछा। सूत्रों की माने तो हालिया एंटीकरप्सन ब्यूरो के प्रमुख को लेकर केंद्र व दिल्ली की केजरीवाल सरकार के बीच चल रही तल्खी के बीच केंद्र सरकार दिल्ली पुलिस के साथ संसदीय समिति के जरिए यह भी जताना चाहती है कि दिल्ली की पुलिस दिल्ली सरकार के नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के अधीन कार्य करती है। गौरतलब है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार का दिल्ली पुलिस को अपने अधिकार क्षेत्र में लेने के लगातार किये जा रहे प्रयासों के बीच केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच दिल्ली पुलिस की भूमिका तल्खी का कारण बनी है, लेकिन दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है यह जानते हुए भी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एसीबी की नियुक्ति जैसे ताजा प्रकरण को लेकर सीधे केंद्र सरकार को निशाने पर लेते नजर आए हैं।