मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

फास्‍ट ट्रैक पर आएगी नदियों को जोडने की परियोजना।

नदियों को आपस में जोड़ने पर गंभीर सरकार 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में सूखे और बाढ़ तथा जल संकट जैसी समस्या से निपटने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी की नदियों को आपस में जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को फास्ट ट्रैक पर लाने की तैयारी शुरू हो गई है। इन परियोजनाओं में आ रही अड़चनों और समस्याओं के समाधान के लिए राज्यों के साथ मंथन का आधार भी फास्ट ट्रैक होगा।
मोदी की केंद्र सरकार को नदियों को आपस में जोड़ने वाली परियोजनाओं को अंजाम देने के लिए जो कदम उठाए हैं उसमें केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती की अध्यक्षता में एक विशेष समिति गठित की थी, जिसके सदस्यों के रूप में राज्यों के मुख्यमंत्री स्वयं भी शामिल हैं। जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार इस विशेष समिति की अभी तक आठ बैठकें हुई है और केवल उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के हित में केन-बेतवा नदी को जोड़ने की परियोजना ही अभी तक अंतिम चरण की प्रक्रिया में आ सकी है। इसके बाद इस परियोजना के तहत केंद्र के लक्ष्य में दमनगंगा-पिंजाल और पार-तापी-नर्मदा लिंक परियोजनाएं गुजरात और महाराष्ट्र के बीच जल बंटवारे के मुद्दे पर अटकी है, हालांकि बकौल उमा भारती दोनों राज्यों की सरकारों ने जल बंटवारे के मुद्दे पर सहमति बना ली है और इन परियोजनाओं की डीपीआर रिपोर्ट पर राज्यों से अंतिम मंजूरी का इंतजार है। इसी प्रकार ओडिशा में महानदी-गोदावरी लिंक परियोजना के संबंध में आ रही अड़चनों के लिए केंद्र और राज्य सरकार के संबन्धित अधिकारियों का एक दल संपर्क में है जिसकी छह माह में रिपोर्ट आते इस परियोजना को अंतिम रूप देने के लिए ओडिशा के मुख्यमंत्री के साथ स्वयं उमा भारती मंथन करेगी।
अंतर्राज्यीय लिंक चुनौती
देश में नदियों को आपस में जोड़ने वाली परियोजनाओं के तहत सरकार लक्ष्य अंतर्राज्यीय लिंक परियोजनाओं में बिहार की बूढ़ी गंडक-नून-बया-गंगा लिंक परियोजना को शुरू करना भी लक्ष्य में शामिल है, जिसके लिए मंत्रालय ने डीपीआर तैयार हो चुकी है। ऐसी ही पंचेश्वर-शारदा लिंक परियोजना पर भी काम किया जा रहा है। मंत्रालय के अनुसार सरकार के एजेंडे में नदियों को जोड़ने वाली ऐसी ही 35 परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की चुनौती है, जिन पर आगे बढ़ने की दिशा में विशेष समिति की बैठक में विचार विमर्श किया गया है।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

बासमती चावल वार में औंधेमुहं गिरा पाकिस्तान!

भारत से आगे निकलने की होड़ में नाकाम पाक
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
पाकिस्तान से बेहतर संबन्ध बनाने की कवायद के बावजूद पाकिस्तान की भारतीय बासमती चावल को ना-पाक चुनौती देने के माममले में भी मुहं की खानी पड़ी है। मसलन व्यापारिक स्पर्धा में भारत को पछाड़ने के प्रयास में भारत का विरोध करके पाकिस्तान की अपने बासमती चावल पर जीई टैग लेने की कोशिश नाकाम हो गई है।
भारत के बासमती चावल के विरोध के सामने इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी अपीलेट बोर्ड ने पाक की उस अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें पाकिस्तान ने अपने बासमती चावल के लिए भारत के मुकाबले जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानि जीई टैग हासिल करने का प्रयास किया था। बासमती चावल के मामले में आईपीएबी का यह फैसला भारत को पछाड़ने के लिए पाकिस्तान के प्रयास को एक बड़ा झटका माना जा रहा है। पाक के बजाए अब जीआई टैग अब भारत को मिलने की संभावना प्रबल हो गई है। दरअसल पाकिस्तान में लाहौर स्थित बासमती ग्रोवर्स असोसिएशन यानि बीजीए ने भारतीय संस्था कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण यानि एपीडा के जीआई टैक आवेदन को चुनौती देते हुए आईपीएबी में दस्तक दी थी और अपने बासमती चावल पर जीआई टैग हासिल करने का दावा किया था। पाकिस्तान की इस अपील को एक दिन पहले ही आईपीएबी ने दलील देते हुए खारिज कर दिया है। गौरतलब है कि भारत की ओर से एपीडा ने पहले ही पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड जैसे सात राज्यों में उत्पादित बासमती चावल के लिए जीआई टैग की मांग की थी।

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

पांच लाख करोड़ की सड़कों रोडमैप तैयार!


सड़क पर  50 लाख को रोजगार देने का लक्ष्य
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
देश में सड़कों का जाल बिछाकर विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने अगले तीन सालों में पांच लाख करोड़ रुपये की सड़क परियोजनाएं पूरी करने का लक्ष्य तय किया है। सरकार का दावा है कि इस दौरान सड़क क्षेत्र से 50 लाख से ज्यादा रोजगार अवसर पैदा किये जाएंगे।
केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्रालय के सूत्रों ने देश में चल रही सड़क परियोजनाओं के अलावा अगले तीन साल में करीब पांच लाख रुपये की लागत वाली सड़क परियोजनाओं को शुरू करने का फैसला किया है, जिसके लिए रोड़मैप अंतिम चरणों में हैं। सरकार का लक्ष्य आने वाले सालों में 96 हजार किलोमीटर वाले सड़क नेटवर्क का 1.5 लाख किलोमीटर तक विस्तार करना है। ऐसी उम्मीद है कि संसद के बजट सत्र में प्रधानमंत्री गा्रम सड़क योजना के आवंटन में इजाफा होगा। मोदी सरकार अभी तक डेढ़ लाख करोड़ रुपये की लागत वाली सड़क परियोजनाओं को मंजूरी दे चुकी है, जिनको पूरा करने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग और अन्य सड़कों को निर्माण तेजी से काम हो रहा है। उधर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने दावा किया है कि सरकार का प्रतिदिन 30 किमी सड़क निर्माण करने का लक्ष्य मार्च तक हासिल हो जाएगा और फिलहाल 18 किमी लंबी सड़कें रोजाना बनाई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि जब राजग सरकार सत्ता में आई थी, तो उस समय प्रतिदिन दो किमी सड़क बनाने का औसत था। विश्व बैंक की एक ताजा रिपोर्ट का हवाला देते हुए गडकरी ने कहा कि सड़क परियोजनाओं में एक करोड़ रुपए के निवेश से करीब 800 लोगों को रोजगार मिलता है। यानि सरकार की सड़क परियोजनाओं पर अगले तीन साल में पांच लाख करोड़ का निवेश करने की योजना से इस क्षेत्र में 50 लाख से ज्यादा लोगों को नौकरी के अवसर प्रदान किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जब राजग सरकार सत्ता में आई थी, तो उस समय प्रतिदिन दो किमी सड़क बनाने का औसत था।

राग दरबार: यह कैसा मजाक है जनाब

माननीय के गले की फांस
सरकारी बंगलों पर अपनी सुविधानुसार बसने की चाह में माननीय न जाने क्या-क्या कह जाते हैं, लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के एक कांग्रेसी सांसद की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने सरकारी बंगले को खाली न कराए जाने की गुजारिश की थी। दरअसल कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के बदलने के बाद केंद्र की नई सरकार ने उन्हें कुछ माह बाद ही दूसरा बंगला आवंटित किया गया था, लेकिन उन्होंने कुछ बहाना बनाते हुए वहां जाने से इंकार कर दिया था, बल्कि सरकार पर मजाक करने जैसी टिप्पणी करके कई तरह के नियमों को धत्ता तक करार दे दिया। सरकारी बंगले की सुविधाओं की खातिर यह मामला अदालत तक भी जहां पहुंचा, जहां दिल्ली हाई कोर्ट ने माननीय को अंतरिम राहत देते हुए केंद्र सरकार से कहा कि मामले की सुनवाई पूरी होने तक बंगला खाली न कराया जाए। जबकि केंद्र सरकार की दलील रही कि इन सांसद महोदय ने सरकारी आवास में रहने के लिए तीन बार अलग अलग तरह की बातें कही हैं जिसके साथ ही आवास में ठहरने की उनकी सारी योग्यता खत्म हो गई है। लेकिन हाई कोर्ट से मिली इस राहत पर अतिउत्साहित माननीय ने मीडिया के समक्ष यहां तक कह दिया कि 'ये क्या मजाक है। मसलन केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए उनका कहना था कि उन्हें ऐसा बंगला तो दिया जाए, जो रहने लायक तो होना चाहिए। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रूख अपनाया तो कांग्रेस के इन माननीय का मजाकिया लहजा गले की हड्डी बन गया यानि सुप्रीम कोर्ट ने माननीय को गरिमा का ख्याल रखने जैसी टिप्पणियां करते हुए बंगला खाली करने का फरमान दे दिया है। राजनीति गलियारों में चर्चा है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी अब क्या ये माननीय मजाक करार देंगे?

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

‘नमामि गंगे’ मिशन में ऐसे बढ़ेगी सहभागिता!

कार्यान्वयन में वेतन आधारित होगी निजी भागीदारी
ओ.पी. पाल
. नई दिल्ली।
मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी मिशन के रूप में नमामि गंगे कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाने की दिशा में सार्वजनिक व निजी भागीदारी को मिश्रित वेतन आधारित बनाने की पहल शुरू कर दी गई है, ताकि इस मिशन को जनांदोलन के रूप में गंगा और सहायक नदियों की स्वच्छता को स्थायी रूप दिया जा सके।
राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता अभियान के तहत कई मंत्रालयों की भागीदारी में नमामि गंगे मिशन की तेजी से शुरूआत करने की कवायद की जा रही है, जिसके लिए केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने जनता, स्थानीय प्रशासन और शासन के अलावा अन्य संस्थाओं को भी जोड़ते हुए इस कार्यक्रम को जनांदोलन बनाने की रणनीति अपनाई है। मिशन को स्थातित्व देने की दिशा में नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत मिश्रित वार्षिक वेतन आधारित सार्वजनिक-निजी भागीदारी शुरू करने के प्रस्ताव पर केंद्र सरकार अपनी मुहर लगा चुकी है। मिश्रित वेतन आधारित सार्वजनिक निजी साझेदारी यानि पीपीपी मॉडल अपनाने का मकसद मिशन में तेजी लाने की दृष्टि से एक नया बदलाव है।
नीति बदलाव से होगा लाभ
मंत्रालय के अनुसार केंद्र सरकार के फैसले के अनुसार इस मॉडल में पूंजीगत निवेश के एक हिस्से यानि 40 प्रतिशत तक का भुगतान सरकार द्वारा किया जाएगा और शेष भुगतान वार्षिक के रूप में 20 वर्षों तक किया जाता रहेगा। इस कदम के तहत कार्य प्रदर्शन मानकों को वार्षिक भुगतान के साथ जोड़ने से समुचित मानक वाले शोधित जल का उद्देश्य सुनिश्चित होगा, ताकि कार्य प्रदर्शन,सक्षमता, व्यावहारिकता तथा निरंतरता को सुनिश्चित किया जा सके। जिसमें भारत में अपशिष्ट जल क्षेत्र में सुधार लाने की भी तैयारियां शामिल होंगी। इसके लिए रेलवे की तर्ज पर विद्युत, पेट्रोलियम तथा उद्योग आदि केंद्रीय मंत्रलायों के साथ भी करार किये जा रहे हैं।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

बजट सत्र: साफ नहीं हुई जीएसटी पर तस्वीर!


विपक्षी दलों की रणनीति सरकार के पक्ष में नहीं
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
संसद के बजट सत्र की बैठकों की तारीखें तय करने से पहले केंद्र सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर आम सहमति बनाने का प्रयास किया। जहां सरकार ने बजट सत्र में जीएसटी, रियल एस्टेट जैसे महत्वपूर्ण बिलों के पारित होने की उम्मीद जताई है, वहीं विपक्षी दलों की रणनीति संकेत दे रही है कि सरकार द्वारा एक अप्रैल को देश में जीएसटी कानून लागू करने की तस्वीर साफ नहीं हो सकी है।
केंद्र सरकार आगामी एक अपै्रल से देश में वस्तु एवं सेवा कर विधेयक यानी जीएसटी लागू करने का हर संभव प्रयास कर रही है। सरकार द्वारा गुरुवार को संसद भवन में बुलाई गई सर्वदलीय बैठक का मकसद भी जीएसटी और अन्य महत्वपूर्ण विधेयकों पर सहयोगी नीति बनाने का रास्ता साफ करना माना जा रहा है। हालांकि सरकार ने उम्मीद जताई है कि जीएसटी और रियल एस्टेट के अलावा कई आर्थिक सुधार संबन्धी विधेयक पारित हो जाएंगे। इसके बावजूद विपक्षी दलों की ओर से मिल रहे संकेतों से जाहिर है कि वस्तु एवं सेवा कर विधेयक यानी जीएसटी विधेयक को लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं हो सकी है। विपक्षी दलों का तर्क है कि विपक्षी दलों के साथ बजट सत्र के मुद्दों पर हुई चर्चा के दौरान सरकार की ओर से जीएसटी का जिक्र तक नहीं किया गया। गौरतलब है कि बजट सत्र की तारीखें तय करने से पहले केंद्र सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री एम वेंकैया नायडू की कांग्रेस, जदयू,तृणमूल कांग्रेस, सीपीएम, समाजवादी पार्टी आदि दलों के नेताओं से संसद भवन में एक बैठक के दौरान मुलाकात हुई। इन दलों के नेताओं का कहना है कि इस बार पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुदुच्चेरी में अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, जिसके मद्देनजर सरकार ने विपक्ष से यह जानना चाहा कि दो सत्रों में होने वाले बजट सत्र को क्या एक ही बार में करा लिया जाए। इस मुद्दे पर सरकार और विपक्षी दलों में आमसहमति न बनने पर बजट सत्र को परंपारिक दो हिस्सों में आयोजित करने का निर्णय लिया गया। दरअसल बजट सत्र के दोनों चरणों के बीच चालीस दिनों का अवकाश होगा और इस दौरान संसदीय स्थायी समितियां विभिन्न विधेयकों पर चर्चा कर सकेगीं।
उम्मीद पर कायम सरकार
संसद के बजट सत्र में केंद्र सरकार के पास जहां जीएसटी, रियल एस्टेट जैसे महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने की चुनौती होगी, वहीं इसी दौरान सरकार को अरुणाचल प्रदेश में लगे राष्ट्रपति शासन का अनुमोदन भी कराना है। इसके बावजूद सरकार का प्रयास होगा कि किसी तरह वह जीएसटी बिल पास करा लें। सूत्रों के अनुसार ऐसी संभावना जताई जा रही है कि सरकार जीएसटी को बजट सत्र के दूसरे चरण में लेकर आए और तब तक पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा के नतीजे भी राजनीतिक तस्वीर काफी हद तक बदलती नजर आएगी। सरकार को उम्मीद है कि राज्यसभा में जीएसटी पर अडंगेबाजी इन चुनावों के नतीजों के बाद कुछ कम हो सकती है और सरकार को जीएसटी जैसे लंबित बिलों को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। मसलन उस समय तक राज्यसभा में कुछ नए सदस्य भी आ जाएंगे।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

प्रदूषण रोकेगा ई-किट नियम!

वाहनों में वैकल्पिक र्इंधन पर आगे बढ़ी सरकार!
छह फरवरी से लागू होंगे हाईब्रिड ई-किट नियम
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में प्रदूषण की समस्या के निपटने के लिए केंद्र सरकार ने वैकल्पिक र्इंधन के रूप में हाईब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, जिसके लिए छह फरवरी से हाईब्रिड इलेक्ट्रिक किट नियम लागू करने के लिए अधिसूचना जारी कर दी है।
केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल चालित वाहनों में हाईब्रिड इलेक्ट्रिक किट लगवाने वालों के लिए केंद्रीय मोटर वाहन नियमावली में संशोधन के लिए एक मसौदे की अधिसूना जारी की है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए वैकल्पिक र्इंधन को बढ़ावा देने के लिए यह कदम उठाया गया है। भारत स्टेज-2 यानि बीएस-2 प्रदूषण मानक के अनुकूल होने के आलवा इन संशोधित नियमों को छह फरवरी को लागू हो जाएगा। हाइब्रिड इलेक्ट्रिक किट फिट कराने के लिए वाहन का भारत स्टेज-2 प्रदूषण मानक के अनुकूल होना जरूरी है। यानि कारें, बसें और ट्रक जैसी श्रेणी के वाहनों में मानकों के अनुरूप हाइब्रिड इलेक्ट्रिक किटें लगाई जा सकेगीं। इस नियमावली के तहत यह किट तभी लगेगी, जब संबन्धित वाहन में इससे पहले किसी तरह की किट न लंगवाई गई हो। मसलन पेट्रोल और डीजल के अलावा अन्य किसी ईंधन से चलने वाले वाहनों में यह किट नहीं लगाई जा सकेगी। हाईब्रिड इलेक्ट्रिक किट भारतीय मानक ब्यूरो के मानकों के अनुरूप होने और प्राधिकृत एजेंसी से ही लगवाना जरूरी होगा।

पीपीपी मॉडल पर मजबूत होगा बुनियादी ढांचा


छह सड़क व एक बंदरगाह परियोजना को मंजूरी
नई दिल्ली
।
केंद्र सरकार की आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव की अध्यक्षता में सार्वजनिक निजी परियोजना आकलन समिति और उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक के प्रस्ताव को केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दी है। इस प्रस्ताव में 9672.12 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली छह सड़क परियोजनाओं और एक बंदरगाह क्षेत्र परियोजना को शुरू किया जाएगा।
देश में बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं को मजबूती और तेजी से चलाने की दिशा में ऐसी परियोजनाओं को केंद्र सरकार के विभागों और संबन्धित मंत्रालयों द्वारा सार्वजनिक निजी परियोजनाओं यानि पीपीपी मॉडल पर क्रियान्वित किया जाना है। ऐसी परियोजनाओं के साथ-साथ केंद्र व राज्य सरकारों के विभागों की केन्द्रीय राशि कम पड़ने पर केंद्रीय सहायता वाली पीपीपी परियोजनाओं को भी संस्थागत व्यवस्थाओं द्वारा मंजूरी दी गई है। पीपीपीएसी और ईसी के 9672.12 करोड़ रुपये की अनुमानित परियोजना लागत वाली 6 सड़क परियोजनाओं और एक बंदरगाह क्षेत्र परियोजना को केंद्र सरकार की मंजूरी मिल गई है। इस प्रस्ताव में 4 राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं भी शामिल हैं, जिनमें से एक-एक परियोजना महाराष्ट्र एवं हिमाचल प्रदेश में और दो परियोजनाएं उत्तर प्रदेश में हैं। सरकार ने जिस बंदरगाह क्षेत्र परियोजना को मंजूरी दी है, वह गोवा राज्य के लिए प्रस्तावित है।
बिजली-खाद क्षेत्रों में नहीं होगी कोयले की नीलामी
केंद्र सरकार ने देश में आर्थिक विकास की गतिविधियों को तेज करने के लिए बिजली और खाद को छोड़कर अन्य सभी क्षेत्रों में भी उत्पादन का स्तर बढ़ाने के लिए कोयले की आपूर्ति नीलामी के जरिए करने का निर्णय लिया है। कैबिनेट की आर्थिक मामलों की समिति की बैठक में इसकी मंजूरी दी गई। कोयला मंत्री पीयूष गोयल ने यह जानकारी देते हुए बताया कि सीमेंट, अस्पताल, स्पंज लौह, एल्यूमिनियम और अन्य क्षेत्रों के लिए अब पारदर्शी तरीके से कोयले की आपूर्ति करने के लिए यह फैसला लिया गया है। उनका कहना था कि बिजली और यूरिया क्षेत्र के लिए कोयले की आपूर्ति के लिए इस प्रक्रिया का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
04Feb-2016

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

‘नमामि गंगे’ मिशन में रोड़ा बने स्लॉटर हाउस!

ऐसे कैसे पूरा होगा उमा का ड्रीम प्रोजेक्ट
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना में ‘नमामि गंगे’ मिशन को हालांकि सरकार तेजी से आगे बढ़ाने के लिए पूरे दमखम के साथ जुटी हुई है, जिसमें उन्होंने गंगा और अन्य नदियों में औद्योगिक ईकाईयों, शहरों और कस्बों के अलावा गांवों से पड़ने वाले गंदे नालों की रोकथाम पर ठोस कदम उठाए हैं। इसके बावजूद खासकर यूपी में कई जिलों में संचालित स्लॉटर हाउस केंद्रीय जल संसाधन मंत्री के इस ड्रीम प्रोजेक्ट का रोड़ा बने हुए हैं।
केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने नमामि गंगे मिशन को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए उन सभी राज्यों की सरकारों, नगर निगमो, नगर पालिकाओं, नगर पंचायतों के अलावा हाल ही में ग्राम प्रधानों व सरपंचों के साथ भी विचार विमर्श कर आबादी से नालों के जरिए नदियों में गिरने वाले गंदे पानी को रोकने की योजना को अंजाम दिया है। केंद्र सरकार द्वारा गंगा व सहायक नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के भरे जा रहे दम के तहत नमामि गंगे कार्यक्रम में रोड़ा बने स्लॉटर हाउस यानि कतल खाने एक चुनौतीपूर्ण समस्या बनी हुई है। जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार खासकर यूपी में केंद्र सरकार ने यूपी सरकार से इन पर शिकंजा कसने के लिए उचित कार्रवाही करने का भी अनुरोध किया है।
पशुओ के अवैध कटान की चुनौती
दरअसल उत्तर प्रदेश में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति से केवल आठ स्लॉटर हाउस ही वैध हैं, जिन्हें प्रदूषित जल, मल और पशुओं के कचरे को नदियों में जाने से रोकने की सख्त हिदायत है। सूत्रों के अनुसार इन वैध स्लॉटर हाउस के अलावा इनसे कई गुणा अवैध तरीके से पशुओं के कटान के लिए ठिकाने बने हुए हैं, जिसके कारण बड़ी संख्या में काटे जा रहे जानवरों से जल प्रदूषण की समस्या तो गहरा रही ही है, वहीं जानवरों की हड़ियां एवं अन्य दुर्गन्धयुक्त कचरे को बनाई गई भट्टियों में जलाने से वायु प्रदूषण को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
केंद्र सरकार के लिए चुनौती
केंद्र सरकार के लिए नमामि गंगे मिशन में ऐसे स्लॉटर हाउसों का संचालन बड़ी चुनौती बना हुआ है। खासकर पशु कटान के लिए बनाए गये अवैध ठिकानों से बड़े पैमाने पर हो रहे भूजल के दोहन भी जल संसाधन मंत्रालय की अन्य योजनाओं के लिहाज से भी चिंताजनक है। सूत्रों के अनुसार यही नहीं स्लॉटर हाउस से खून तथा जानवरों के अवशेष वाले दूषित पानी सीधे नालों में बहाया जा रहा है। यह भी चिंताजनक पहलू है कि अवैध स्लॉटर हाउसों को संचालित करने वालों ने ऐसे गंदे और प्रदूषित पानी की निकासी के लिए नालों का प्रवाह नदियों की और कर रखा है, जिसके जरिए गंगा-यमुना जैसी नदियां प्रदूषण और गंदगी से मैली हो रही हैं।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

खेलों से तैयार होगा सोनोवाल का सियासी मैदान!


पीएम मोदी पांच फरवरी करेंगे दक्षिण एशियाई खेलों उद्घाटन
ओ.पी. पाल
. नई दिल्ली।
असम में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले गुहावटी में शुरू हो रहे 12वें दक्षिण एशियाई खेल राज्य में भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री के उम्मीदवार सर्वानंद सोनोवाल के लिए सियासी जमीन की तैयार करने की नींव साबित हो सकते हैं। सोनोवाल के नेतृत्व में हो रहे इन खेलों का शुभारंभ पांच फरवरी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करेंगे।
पूर्वोत्तर राज्यों में विकास और अन्य गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत ही पांच फरवरी से असम और मेघालय में 12वें दक्षिण एशियाई खेलों का आयोजन किया गया है। भारत के इन खेलों की मेजबानी करने से जहां केंद्र की मोदी सरकार दक्षिण एशियाई देशों को खेल कूटनीति के जरिए अपने बेहद निकट लाने का प्रयास कर रही है। वहीं पूर्वोत्तर में केंद्र सरकार का नेतृत्व कर रही भाजपा भी अपनी सियासी जमीन तलाश रही है। असम में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं जिन्हें देखते हुए रानीतिक दृष्टि से केंद्री खेल मंत्री सर्बानंद सोनोवाल को असम राज्य में भाजपा प्रमुख और फिर हाल ही में पुन: राष्ट्रीय अध्यक्ष बने अमित शाह ने सोनोवाल को असम के आगामी विधानसभा चुनाव में सोनोवाल को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी घोषित कर दिया है। ऐसे में दक्षिण एशियाई खेल सोनोवाल के लिए सियासी जमीन का टेÑक तैयार करने में भी सहायक साबित हो सकते हैं। इसके लिए पांच से 16 फरवरी तक होने वाले दक्षिण एशियाई खेलों की कामयाबी के लिए सभी तैयारियां दुरस्त कर दी गई हैं। यानि इन खेलों से केंद्रीय खेल मंत्री सोनोवाल की प्रतिष्ठा भी जुड़ी हुई है।
दोनो हाथों में लड्डू
दरअसल असम में पहली बार भाजपा सत्ता के संग्राम के लिए मैदान में है, जिसके लिए गठबंधन करने की रणनीति भी चलाई जा रही है। उसी का नतीजा है कि कांग्रेस के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के सामने भाजपा ने सर्बानंद सोनोवाल को पूरी तरह लाकर अपनी तस्वीर भी साफ कर दी है। राजनीतिकारों का मानना है कि इन अंतर्राष्टÑीय खेलों में केंद्रीय खेल मंत्री सोनोवाल चुनाव मैदान में उतरने से पहले खेल के मैदान से एक कुशल और सफल प्रशासक साबित होने की जुगत में हैं। दिलचस्प पहलू यह है कि सोनोवाल भाजपा की असम ईकाई के अध्यक्ष होने के साथ मुख्यमंत्री के दावेदार भी घोषित हो गये हैं, वहीं दक्षिण एशियाई खेल भी उन्हीं के नेतृत्व में हो रहे हैं, जो उनकी सियासत का माध्यम भी साबित होगा। सूत्रों के अनुसार असम चुनाव की सियासत के लिहाज से सार्क देशों के खलों के लिए बनी समिति के अध्यक्ष भी स्वयं सोनोवाल ही हैं जिसके नाते उनहोंने भारतीय प्रदर्शन को भी बेहतर बनाने की दिशा में पहले ही खेल संघों को सतर्क कर दिया है।