रविवार, 21 फ़रवरी 2016

राग दरबार: सेक्युलर स्यापों की देशभक्ति..

जेएनयू का जिन्न या सियासत
एक विशालकाय हाथी भी चींटी से मात खा जाता है, ऐसा ही देश के सेक्युलर स्यापों को जेएनयू में राजद्रोह पर हो रही सियासत का नतीजा देखना पड़ सकता है, लेकिन जेएनयू का जिन्न जो गरमाई सियासत का पिंड छोड़ने को तैयार ही नहीं है। दिलचस्प बात है कि इस सियासत में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के नेता अपनी रगो में देशभक्ति का खून दौडने की दुहाई देने के बावजूद देश को बर्बाद करने का मंसूबा पालने वालों की हौंसलाअफजाई करने में सबसे आगे है। देशभक्ति का गुणगान करके मौजूदा सरकार पर सवाल खड़े करने कांग्रेस नेताओं की जुबान भी फिसल रही है, जो आतंकवादी अफजल को शहीद मानकर शायद सम्मान में जी का संबोधन कर गये। राजनीतिक गलियारों में ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर भी ऐसी चर्चा जोर पकड़ रही है कि कांग्रेस प्रवक्ता यदि अफजल को गुरू जी कह रहे हैं, तो इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उनकी इस जुबानी होने के साथ कांग्रेस युवराज ने जेएनयू पहुंचकर देश को बर्बाद करने का मंसूबा पालने वालों की हौसलाअफजाई की, वहीं रुड़की आईआईटी में एक अन्य बड़बोले कांग्रेसी नेता अय्यर ने खुलकर जेएनयू में देशद्रोही नारेबाजी करने वालों की जमकर पैरवी की। भले ही मणिशंकर को छात्रों की खरी-खोटी सुननी पड़ी हो। सोशल मीडिया पर ऐसी टिप्पणियां भी सुर्खियां बन रही हैं कि कांग्रेसी, वामपंथी और देश के तमाम सेक्युलर सूरमा गुरू ही नहीं,अफजल को अब्बा भी कह सकते हैं..। इशरतजहां के एनकाउंटर पर जी भरकर स्यापा हुआ था, वहीं नितीश कुमार ने इशरत को बेटी बताया, तो अब हेडली ने उसे आतंकी मानव बम बताकर देश की सियासत में छाए ऐसे सेक्युलरिस्टों का चेहरा बेनकाब ही कर दिया है..जिसके नतीजे आने वाली राजनीति में कितने घातक हो सकते हैं इसका अंदाजा लगाना कठिन होगा।
मुख्यमंत्री बनने के सपने
उत्तराखंड भाजपा में चुनाव से पहले ही कई नेता मुख्यमंत्री बनने के सपने देखने लगे हैं। अगले साल इस पहाड़ी राज्य में विधानसभा चुनाव है। फिलहाल उत्तराखंड में कांग्रेस सत्ता पर काबिज है। भाजपा ने चुनावी जंग जीतने के लिए तैयारियों पर मंथन शुरू किया तो नेताओं के मन में सीएम की कुर्सी पाने के लिए लड्ढू फूटने लगे। इसी हμते भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दिल्ली में उत्तराखंड भाजपा कोर ग्रुप की बैठक बुलाकर लंबी चर्चा इस बात पर की कि चुनाव कैसे जीता जाए। खबर है कि जब राष्टÑीय अध्यक्ष रणनीति पर चर्चा कर रहे थे तो कुछ बड़े नेताओं की इच्छा थी कि मुख्यमंत्री का चेहरा भी तय कर देना चाहिए। शाह भी राजनीति अच्छी तरह समझते है लिहाजा उन्होंने अपने पत्ते नहीं खोले और सभी को हिदायत दी कि प्रदेश में लोगों के बीच समय बिताओ। कोई कसर नहीं रहनी चाहिए। दरअसल सूबे में भाजपा के पास कई पूर्व मुख्यमंत्री हैं। भगत सिंह कोश्यारी और भुवन चंद्र खंडूरी से लेकर निशंक तक। सभी पार्टी हाईकमान को बता रहे हैं कि चुनाव जीतना है तो उनको बागडोर सौंपो। पार्टी में चर्चा है कि नेताओं का उतावलापन अपनी जगह ठीक है पर फैसला समय आने पर ही होगा।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

हलवा खाते ही टूटा इनका बाहरी नेटवर्क!

बजट पेश होने तक वित्त मंत्रालय के मेहमान रहेंगे नौकरशाह
हरिभूमि ब्यूरो.
नई दिल्ली।
संसद के सत्र के दौरान आगामी 29 फरवरी को पेश होने वाले आम बजट से जुड़े दस्तावेजों छपाई का काम शुक्रवार से शुरू हो गया है, जिसका शुभारंभ परांरागत हलवा कार्यक्रम से हुआ। मसलन संसद में बजट से पहले दस्तावेजों को तैयार और छपाई के जिम्मेदार अधिकारियों एवं कर्मचारियों को मंत्रालय में ही बंद रहना होगा और किसी को भी अपने घर या बाहर जाने की इजाजत नहीं होगी। वहीं ये लोग इंटरनेट या मोबाइल या किसी अन्य के जरिए परिजनों समेत किसी भी बाहरी लोगों से संपर्क कर सकेंगे।
वित्त मंत्रालय के अनुसार संसद में 29 फरवरी को पेश होने वाले आम बजट 2016-17 के लिए दस्तावेजों की छपाई का काम शुक्रवार को शुरू हो गया। इस कार्य की शुरूआत परंपरागत रस्म ‘हलवा कार्यक्रम’ से की गई। मसलन नॉर्थ ब्लॉक में हुए इस हलावा कार्यक्रम में वित्त मंत्री अरुण जेटली और वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा की मौजूदगी में अरसों से चली आ रही इस परंपरा के तहत एक बड़ी कढ़ाही में हलवा बनाया गया, जिसे वित्त मंत्रालय के हरेक स्टाफ को परोसा गया है। कार्यक्रम में वित्त सचिव रतन वतल, राजस्व सचिव हसमुख अधिया, आर्थिक मामलों के सचिव के अलावा बजट निर्माण से जुड़े दूसरे अधिकारी और कर्मचारी तथा अन्य स्टाफ भी मौजूद रहा। इस कार्यक्रम के तहत बजट निर्माण और इसकी छपाई की प्रक्रिया से सीधे तौर पर जुड़े अधिकारी और कर्मचारी अब मंत्रालय के ही मेहमान बनकर रहेंगे। मसलन वित्त मंत्री द्वारा संसद में बजट पेश किए जाने तक अब इनका अपने परिवार और अन्य लोगों के संपर्क में नहीं हो सकेगा। नियमों के मुताबिक इन लोगों को अपने जानकारों से ईमेल, फोन या अन्य किसी दूसरे माध्यम से संपर्क करने की भी सख्त मनाही रहेगी। केवल वित्त मंत्रालय के बेहद वरिष्ठ अधिकारी को ही घर जाने की इजाजत दी जाती है। मंत्रालय के अनुसार बजट की छपाई प्रक्रिया में करीब 100 कर्मचारी शामिल हैं, जो बजट पेश होने तक अब नॉर्थ ब्लॉक स्थति वित्त मंत्रालय के कार्यालय में ही बंद रहेंगे। इस प्रक्रिया का मकसद बजट के तथ्यों की गोपनीयता को कायम रखना है।
ये है बजट और हलवे का कनेक्शन
बजट का इंतजार हर कोई करता है आम बजट हो या रेल बजट। देश खास आदमियों के साथ आम आदमी को भी इसका बेसब्री से इंतजार रहता है। सभी यह जानना चाहते है कि इस साल सरकार उनकी झोली में क्या डालेगी। पर आम बजट के बारे में कुछ खास बातें ज्यादातर लोगों को पता नहीं होती हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आम बजट के लिए सबसे खास है हलवा। जी हां भारत की यह खास मिठाई बजट से जुड़ी सबसे खास चीजों में एक है।
क्या है आम बजट?
बजट किसी सत्तारुढ़ पार्टी का दस्तावेज होता है जिसमें सरकार के द्वारा प्रस्तावित राजस्व और अलग अलग योजनाओं पर किए जाने वाले खर्चों का लेखा जोखा पेश किया जाता है। यह बजट भारत के वित्त मंत्री द्वारा हर साल संसद में पेश किया जाता है।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

भारतीय बने बांग्लादेशियों को जल्द मिलेगा मताधिकार!

संविधान में संशोधन लाएगी सरकार, कैबिनेट से मिली मंजूरी
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
भारत और बांग्लादेश की सीमावर्ती इलाकों में चार दशकों से खानाबदोश की जिंदगी जी रहे करीब 51 हजार लोगों को भारतीय नागरिकता देने के बाद केंद्र सरकार ने अब उन्हें मौलिक अधिकार और मताधिकार देने की पहल की है। इसके लिए सरकार ने पश्चिमा बंगाल में संसदीय क्षेत्रों के परिसीमन के बारे में परिसीमन अधिनियम 2002 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत संसद में एक विधेयक पेश होगा। 
पिछले चार दशकों से ज्यादा समय से दोनों देशों के बीच लंबित विवादित जमीन की अदला-बदली का ऐतिहासिक समझौता साढे छह माह पहले एक अगस्त को लागू कर दिया गया था। इस समझौते में दोनों देशों की सीमाओं पर एक दूसरे देशों में खानाबदोश की जिंदगी जी रहे लोगों की इच्छा के अनुसार देश चुनने की छूट दी गई थी, जिसके बाद भारत में रहने के इच्छुक बांग्लादेशियों को भारतीय नागरिकता दे दी गई। सूत्रों के अनुसार इस अदला-बदली समझौते के तहत भारतीय सीमा में भारतीय क्षेत्र में 51 बांग्लादेशी बस्तियों के 14,215 लोगों ने भारत में रहना पसंद किया था, जबकि बांग्लादेश के भीतर रह रहे भारतीय बस्तियों में 37,369 में से 223 परिवारों के 163 मुस्लिमों समेत 1057 लोगों ने भारतीय नागरिकता को चुना। यानि करीब 16 हजार से ज्यादा इन नागरिकों को मौलिक अधिकार और मताधिकार देने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है।
संसद में पेश होगा विधेयक
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी। प्रस्ताव के अनुसार भारत और बांग्लादेश के बीच क्षेत्रों के आदान-प्रदान के बाद पश्चिम बंगाल में संसदीय क्षेत्रों के परिसीमन के बारे में ‘परिसीमन अधिनियम-2002 की धारा 11 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 की धारा 9 में संशोधन करना शामिल है, ताकि इन लोगों को मताधिकार के साथ मौलिक अधिकार हासिल हो सकें। इसके लिए सरकार जल्द ही संसद में इन कानूनों में संशोधन के अलावा निर्वाचन कानून (संशोधन) विधेयक-2016 पेश करेगी। हालांकि यह संविधान (100वां संशोधन) अधिनियम-2015 के अनुरूप है। इस कानून के तहत भारत और बांग्लादेश के बीच क्रमश: 51 बांग्लादेशी और 111 भारतीय इनक्लेव के आदान-प्रदान के बाद पश्चिम बंगाल के कूच बिहार जिले में विधानसभा और संसदीय क्षेत्र का सीमित परिसीमन करने में चुनाव आयोग को मदद मिलेगी।

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

देश के बांधो के खतरे दूर करेगी सरकार

सुरक्षा सुनिश्चित करने को तैयार होगी योजना
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार नदियों से जुड़े मुद्दों के साथ देशभर के बांधों परियोजनाओं के खतरों की आशंकाओं से निपटने की भी योजना पर आगेबढ़ती नजर आ रही है। इसके लिए सरकार ने बांध पुनर्वास एवं सुधार परियोजनाओं से सबक लेने के सुरक्षा सुनिश्चित करने की योजना तैयार करने का निर्णय लिया है।
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसर देश के सभी राज्यों में बदहाल स्थिति में मौजूद कई विशाल बांधों के पुनर्वास की तत्काल आवश्यकता के बारे में विविध मंचों पर चिंता जाहिर की जाती रही है, ताकि उनकी सुरक्षा और प्रचालन संबंधी दक्षता सुनिश्चित की जा सके। इसलिए देश में बांधों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए मोदी सरकार ने बांध पुनर्वास एवं सुधार परियोजना यानि डीआरआईपी की शुरूआत की है। यह परियोजना विश्व बैंक से प्राप्त ऋण सहायता के साथ सात राज्यों में लगभग 250 बांधों की स्थिति में सुधार लाने के लिए प्रारंभ की गई है। हालांकि छह वर्षीय डीआरआईपी परियोजना अप्रैल 2012 में प्रारम्भ हो चुकी थी, जिस पर काम जारी है।
खस्ता हालत में 80 फीसदी बांध
मंत्रालय के अनुसार देश में करीब 4900 विशाल बांधों में 80 फीसदी बांध 25 साल से भी ज्यादा पुराने होने के कारण उनसे बाढ़ और भूकंप जैसी आपदा के खतरे की आशंकाएं बनी रहती है। इनके पुराने प्रचलित डिजाइन की कार्यप्रणालियां और सुरक्षा की स्थितियां भी डिजाइन के वर्तमान मानकों और सुरक्षा मानदंडों से मेल नहीं खा रही हैं। बांधों के आकलन और सर्वे के तहत नींव की अभियांत्रिकी संबंधी सामग्री अथवा बांधों का निर्माण में उपयोग की गयी सामग्री भी समय के साथ नष्ट होने के कगार पर है। मसलन उनके रखरखाव से जुड़े इन पृथक कारकों और मामलों के कारण कुछ बांध खस्ता हालत में हैं, जिनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा उनकी प्रचालन संबंधी विश्वसनीयता बहाल करने के लिए उन बांधों की तत्काल मरम्मत करना जरूरी है।

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

रेल यात्रियों को सुविधाएं देने की तैयारियां!


रेल बजट में किराया नहीं, बढ़ सकती है ट्रेने एवं उनकी गति 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
संसद के बजट सत्र में आम बजट के साथ रेल बजट को लेकर भी तरह-तरह की अटकले लगाई जा रही है। रेल बजट में हालांकि सरकार का जोर रेल यात्रियों की सुविधओं को बढ़ाने पर रहेगा, जिसमें ट्रेनों और उनकी गति में वृद्धि के अलावा रेल किराए में राहत देना शामिल है।
रेल मंत्रालय में रेल बजट तैयार करने की गतिविधियां तेजी पर हैं। मोदी सरकार का यह तीसरा रेल बजट होगा, जिसमें यात्रियों की सुविधा को प्राथमिकता देने के संकेत दिये जा रहे हैं। रेल बजट में सरकार का प्रयास होगा कि यात्रियों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं देते हुए भारतीय रेल को सुधारों की पटरी पर दौड़ाया जाए। रेलवे के सूत्रों के अनुसार यात्रियों की सुविधाओं के ख्याल के साथ सरकार यात्री किरायों में वृद्धि करने के बजाए मालवहन, पार्सल, विज्ञापन और खानपान व्यवस्था की नयी नीतियों के माध्यम से राजस्व बढाने की नीतियों का रेल बजट में ऐलान करेगी। सूत्रों के अनुसार इस बार के रेल बजट में दोहरीकरण, तिहरीकरण,विद्युतीकरण, सिंगनल एवं संचार आधुनिकीकरण जैसी क्षमता वृद्धि की नयी योजनाओं के अलावा प्रमुख रेल मार्गों पर तकनीकी उन्नयन करके पटरियों पर रेल गाड़यिों की गति में दस किलोमीटर प्रति घंटा तक की वृद्धि करने की योजना का ऐलान होने की उम्मीद है। यही नहीं देशभर में मोबाइल के जरिये अनारक्षित टिकट की सुविधा एवं अन्य सूचना प्रौद्योगिक आधारित सेवाओं का विस्तार करने पर ज्यादा जोर देगी। मसलन रेलवे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर रेलवे को पेपरलैस करने की कवायद में जुटा हुआ है।

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

राग दरबार: सियाचिन पर चिकचिक


कांग्रेस की सियासत
जब रोम जल रहा तो नीरो बंसी बजा रहा था..यह कहावत शायद कांग्रेस पर सटीक बैठती है। मसलन जब पूरा देश सियाचिन मेें हिमस्खलन का काल बने सैनिकों की मौत पर गमगीन हो, तो भी कांग्रेस की चिकचिक करने वाली सियासत पैर पसारती नजर आई। यानि जो अपने राज में देश की सीमाओं के प्रहरियों के हित में कुछ ज्यादा कदम नहीं उठा पाई, उस कांग्रेस ने राजग सरकार पर तोहमंद मंढने का ऐसा प्रयास किया, जैसे इस दुखद घटना के लिए मोदी सरकार ही जिम्मेदार हो। यही नहीं जांबाज हनुमंथप्पा की जिंदगी को लेकर देशभर में जारी दुआओं के बीच कांग्रेस प्रमुख ने भी हनुमंथाप्पा की मां को एक पत्र लिखकर दुखी परिवार के प्रति सहानुभूति पेश की, जिसमें कोई गलत नहीं है, लेकिन शायद कांग्रेस को इस आपदा में ज्यादा ही सहाहनुभूति लेने का श्रेय लेने की टीस थी। तभी तो कांग्रेस की एक राज्यसभा सदस्य ने सियाचिन ग्लेशियर में हिमस्खलन से जवानों की मौत के मुद्दे को संसद में उठाने का कुछ इस तर्ज पर ऐलान कर दिया, जैसे जांबाजों की मौत के लिए केंद्र की सरकार ही जिम्मेदार हो। सियासी गलियारों में चर्चा है कि रक्षा मामलों की संसदीय समिति में सदस्य इस कांग्रेस नेत्री ने सियाचिन जैसे दुर्गम इलाकों में तैनात सैनिकों को नियमों में छूट और अन्य सुविधाओं का राग अलापने से पहले यह भी नहीं सोचा कि सैनिकों की मौत पर देश का माहौल गमगीन है। राजनीतिकारों का कहना है कि ऐसी सियासत करने से पहले कांग्रेस को गिरेबान में भी छांकना चाहिए, जिसने देश में सबसे ज्यादा राज किया है। जहां तक संसद में इस मामले का सवाल है वह तो परंपरा के अनुसार वैसे भी उठना तय है।
बर्थ-डे ब्वाय विश्वास
आम आदमी पार्टी भी शायद दूसरे दलों के रंग में रंगने लगी है। आप नेता और कवि कुमार विश्वास के जन्मदिन की पार्टी में जब भाजपा और कांग्रेस के नेताओं का जमवाड़ा लगा तो तमाम तरह के कयास लगने शुरू हो गये। चर्चा है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पहले से ही पता था कि वहां कुछ ऐसे चेहरे जुटेंगे जो राजनैतिक तौर पर उन्हें पसंद नहीं है लिहाजा आप पार्टी के सर्वेसर्वा अपने साथी को जन्मदिन की मुबारकबाद देने पहुंचे ही नहीं। इतना ही नहीं केजरीवाल ने विश्वास के जन्मदिन पर कोई बधाई ट्विट भी नहीं किया। पार्टी में कुमार विश्वास भाजपा और कांग्रेस नेताओं की आवभगत में जुटे रहे लेकिन उनके चेहरे पर सबसे ज्यादा खुशी तब देखी गई जब राष्टÑीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डाभोल का आगमन हुआ। डाभोल इस तरह के कार्यक्रमों में कम ही शिरकत करते हैं। उनका पहुंचना इस बात का संकेत था कि विश्वास की पैठ प्रधानमंत्री मोदी के अति करीबी लोगों तक है। कुछ ही दिन हुए हैं जब दिल्ली पुलिस ने एक महिला द्वारा कुमार विश्वास पर लगाये गये आरोपों को लेकर एक स्थानीय अदालत में उनको क्लीन चिट दी है। पार्टी में दिल्ली पुलिस कमिश्नर बीएस बस्सी भी थे। अब कहा जा रहा है कि विश्वास की पहुंच वहां तक है जहां उनके साथी और नेता केजरीवाल को लेकर नाराजगी पसरी रहती है। विश्वास के एक नजदीकी ने चुटकी लेते हुए कहा कि ऊंचे ओहदों पर बैठे इतने लोग आये कि केजरीवाल के नहीं आना खला नहीं। कुछ भी हो अब आप में भी राजनैतिक लड़ाई एक तरफ और निजी संबंध दूसरी तरफ का युग शुरू हो गया है।
जब फिल्मी सितारे बन जाते हैं ‘ब्रैंड एंबेसडर’...
फिल्मी सितारों के बाजार में मौजूद उत्पादों का मूल्य बढ़ाने के लिए उनका ब्रैंड एंबेसडर बनना एक आम बात है। उत्पाद लोगों में पॉपुलर हो जाता है और कलाकारों को उनके काम की अच्छी खासी धनराशि भी मिल जाती है। लेकिन जब ये कारनामा सशस्त्र सेनाआें में होने लगे तो चर्चा होना तो तय है। जी हां कुछ ऐसा ही नजारा देश की समुद्री सीमाआें की रक्षक कही जाने वाली नौसेना के एक कार्यक्रम में देखने को मिला कार्यक्रम शाखापट्टनम में हुआ अंतरराष्टÑीय μलीट रिव्यू 2016 था जिसमें इसके आगाज के दौरान बैं्रड एंबेसडर के रूप में बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार और अभिनेत्री कंगना रनौत न सिर्फ पहुंचे बल्कि उन्होंने नौसेनाप्रमुख के साथ मंच भी साझा किया। इसे देखकर सभी हैरान रह गए। नौसेना के कार्यक्रम में बॉलीवुड हस्तियों का भला क्या काम। क्या बल में ऐसा कोई जाबांज या शूरवीर नहीं है जिसे कार्यक्रम के दौरान एंबेसडर बनाया जाता। इससे भी रोचक यह तथ्य कि यह सबकुछ इतने गुपचुप अंदाज में हुआ कि मीडिया को भी इसकी कानो कान भनक तक नहीं लगी। लेकिन सितारे पहुंचे भी और उनकी चमक धमक सभी ने देखी भी। ऐसा तभी होता है जब फिल्मी सितारे बन जाते हैं ‘ब्रैंड एंबेसडर’।
उपर वाला साथ है
एक अहम मंत्रालय का जिम्मा संभाल रही महिला मंत्री जी की उपर वाले पर बहुत गहरी आस्था है। वह इसको जाहिर करने में भी नहीं हिचकती। अब हाल ही का वाकया है। मंत्रीजी के कार्यालय में कुछ पत्रकार मिलने पहुंचे। बात-बात में एक पत्रकार ने कहा कि, कैबिनेट में फेरबदल होने वाली है। आपका भी मंत्रालय बदल रहा है क्या? पहले तो उन्होंने इंकार किया। फिर कहा कि, अभी कोई फेरबदल नही होने वाली। इतना कह वह मुस्कुरा दी। फिर उन्होंने अपनी सीट के पीछे की दीवार पर उपर की तरफ टंगी एक तस्वीर को ध्यान से देखा। उसके बाद कहा कि, मैं इस मंत्रालय से कहीं नहीं जा रही। जब तक उपर वाला साथ है मैं यही रहूंगी। उनके इतना कहते ही सबने दीवार की तरफ देखा। जो तस्वीर दिखी उसके बाद सभी ने चुप्पी साध ली।
14Feb-2016

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

राज्य ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन को राहत देने की तैयारी!

प्रदूषण से निपटने को केंद्र ने तैयार किया प्रस्ताव
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार सड़क परियोजनाओं में सड़क हादसों पर अंकुश लगाने और वाहनों के कारण प्रदूषण की बढ़ रही समस्या से निपटने के लिए बजट में रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन को राहत देने की तैयारी में है। केंद्रीय भूतल मंत्रालय ने राज्यों में बसों की μलीट बढ़ाने के लिए राज्यों के परिवहन निगमों के लिए 2500 करोड़ रुपये का बजट में प्रावधान करने का प्रस्ताव किया है।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार ऐसा एक प्रस्ताव मंत्रालय से तैयार होकर वित्त मंत्रालय को भेजा जा चुका है, जिसमें देश में सड़क परिवहन की व्यवस्था में सुधार के लिए संसद के बजट में शामिल करने का अनुरोध किया गया है। वर्ष 2016 के बजट में में यदि यह प्रस्ताव पारित कर दिया जाता है तो राज्य परिवहन निगमों के लिए एक अच्छी खबर होगी। मंत्रालय के अनुसार इस बजट में बसों की μलीट को बढ़ाने के लिए 2500 करोड़ रुपए का बजट संसद में पारित होने की संभावना है। मंत्रालय का इस प्रस्ताव को तैयार करने का मकसद है कि राज्यों में बसों की संख्या बढ़ सके और नई बसें आने से जहां सड़क हादसों में कमी आएगी, वहीं प्रदूषण की समस्या को भी कहीं हद तक कम किया जा सकेगा। वित्त मंत्रालय को भेजे इस प्रस्ताव में इस बात पर जोर दिया गया है कि रोड ट्रांसपोर्ट के लिए 2500 करोड़ रुपए के बजट में ऐसा प्रावधान किया जाए जिसमें हर राज्य को बराबर राशि मिल सके। ऐसा करने से बसों की संख्या में इजाफा होगा और हर राज्य में ई-बसों की योजना को बढ़ावा मिल सके। केंद्र सरकार इस प्रस्ताव के जरिए देश में राज्य परिवहन निगमों की बसों को इलेक्ट्रिक बसों में तब्दील करने का लक्ष्य भी पूरा करने का प्रयास करेगी, जिसके लिए वाहनों के प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए भी ऐसी योजनाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
ई-बसों पर रहेगा फोकस
सड़क मंत्रालय के प्रस्ताव के अनुसार केंद्र सरकार देशभर में स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन की करीब 1.50 लाख बसों को इलेक्ट्रिक बस के रूप में बदलने का प्रयास कर रही है। वहीं क्रूड और पेट्रोलियम का आठ लाख करोड़ रुपए के बोझ को भी कम किया जा सकेगा। सरकार चाहती है कि राज्य निगमों को इस बजट के जरिए मिलने वाली धनराशि के जरिए जहां राज्य परिवहन निगमों की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा और बसों को बेहतर बनाया जाए। वहीं क्रूड और पेट्रोलियम का आठ लाख करोड़ रुपए के बोझ को भी कम हो सकेगा। प्रस्ताव में भारत को प्रदूषण रहित बनाने की दिशा में इस दिशा में ई-वाहन परियोजना पर जोर देने की बात कही गई है। इसके आलवा केंद्र सरकार वाहनों को बायो डीजल और एथनॉल मोड पर लाने का भी प्रयास कर रही है।

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

आतंकवाद पर संयुक्त राष्ट्र में फिर चूका भारत!

यूएन की समिति में मनोनीत नहीं कर सका विशेषज्ञ
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
पठानकोट एयरबेस हमले के मास्टरमाइंड मसूद अजहर को संयुक्त  राष्ट्र की प्रतिबंधित आतंकियों की सूची में शामिल कराने की मुहिम में भारत फिर चूक गया है। मसलन भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध लगाने वाली समिति में अपना विशेषज्ञ नियुक्त करने का पहला मौका गंवा दिया।
सूत्रों के अनुसार भारत को यूएन की इस समिति में अपना विशेषज्ञ नियुक्त करने के लिए जनवरी तक का समय दिया गया था, लेकिन समयसीमा के भीतर विशेषज्ञ की नियुक्ति न होने के कारण पठानकोट हमले के मास्टरमाइंड और जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को कालीसूची में शामिल करने की कोशिश पहले दौर में अटक गई है। गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार विशेषज्ञ मनोनीत करने के लिए यूएन ने नाम भेजे जाने के लिए भारत को एक पखवाड़े का समय दिया था। गृहमंत्रालय के सूत्रों की माने तो यूएन में ऐसे नामांकनों हेतु भारत की आंतरिक प्रक्रिया काफी लम्बी है, जिसमें कई निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक है। हालांकि भारत मसूद अजहर को पठानकोट का गुनाहगार मानते हुए उसे यूएन की प्रतिबंधों की सूची में डाले जाने के लिए लगातार प्रयास में जुटा है। इसका कारण यह भी है कि पाकिस्तान पठानकोट हमले में मसूद अजहर को क्लीनचिट दे रहा है। गृहमंत्रालय ने संकेत दिये हैं कि यूएन की आतंकियों को प्रतिबंधित करने वाली इस महत्वपूर्ण कमेटी के लिए किसी योग्य सेवानिवृत्त और विशेषज्ञ नौकरशाह की तलाश जारी है और गृह मंत्रालय ने एक ऐसे नौकरशाह की नियुक्ति का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेज दिया है, जिस पर जल्द ही निर्णय होने की उम्मीद है।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

अदालतों में लंबित मामलों का निपटान चुनौती

ढाई करोड़ से ज्यादा मामलों का अंबार
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट में हजारो और देश के उच्च न्यायालयों में लाखों मुकदमें लंबित हैं, तो निचली अदालतों में ऐसे लंबित मामलों की संख्या करोड़ो में पहुंच गई है, जो कानून सुधार की कवायद में जुटी केंद्र सरकार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।
देश में न्यायिक सुधार के लिए पिछले साल मोदी सरकार की पहल पर उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन के दौरान तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू ने सम्मेलन में आए सुझावों के बूते पर कहा था कि अगले पांच साल में अदालतों में कोई भी मामला लंबित नहीं रहेगा। लेकिन इसके विपरीत देश के शीर्ष अदालत से लेकर निचली अदालतों पर मुकदमों को बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। विधि एवं न्याय मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 31 दिसंबर तक देश के सभी राज्यों की जिला अदालतों में दो करोड़ 61 हजार मामलें लंबित हैं। चिंताजनक बात है कि इनमें करीब 21.73 लाख मुकदमें तो पिछले दस साल से निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। जबकि 83 लाख 462 यानि 41.38 फीसदी मामले केवल पिछले दो वर्षों से कम समय से लंबित हैं। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि लंबित मामलों का अंबार ऐसे ही लगता रहा तो सैकड़ो साल में भी इनका निपटारा करना संभव नहीं हो सकता।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना

अन्नदाताओं की नई जीवन रेखा
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में अन्नदाता यानि किसानों की दुदर्शा को पटरी पर उतारने के लिए मोदी सरकार ने एक सौगात देते हुए बड़ा फैसला लिया है,जिसमें देश में लगातार दो साल से सूखे और कम बारिश जैसी मौसम की मार के कारण किसानों की फसले चौपट होती रही हैं और उन्हें आर्थिक तंगी के दौर से गुजरना पड़ रहा है। किसानों की आत्महत्या की कहानी भी उनकी इसी बदहाली के पन्नों में जुड रही है। यह भी नहीं है कि देश की सरकार किसानों के लिए फसल बीमा योजना नहीं चला रही है, लेकिन उनके प्रीमियम को लेकर किसानों की झोली में नुकसान की भरपाई होना संभव नहीं था।
इसलिए किसानों की जीवन रेखा को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने की दिशा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की केंद्र सरकार ने एक नई बीमा योजना के रूप में‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ को मंजूरी देकर देश के अन्नदाताओं की झोली भरने का प्रयास किया है।
इस बहु-प्रतीक्षित नई फसल बीमा योजना में खासबात यह भी है कि इसमें किसानों की अनाज एवं तिलहनी फसलों के बीमा संरक्षण के लिए अधिकतम दो प्रतिशत और उद्यानिकी तथा कपास की फसलों के लिए अधिकतम पांच प्रतिशत तक प्रीमियम रखा गया है। इतना कम प्रीमियम आजाद भारत में इससे पहले कभी नहीं रखा गया। किसानों को तत्काल राहत देने की दिशा में मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को इस साल खरीफ सत्र से लागू कर दिया है।दरअसल मोदी सरकार को इस नई फसल बीमा योजना पटरी पर लाने के लिए इससे पहले चल रही राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना में आमूल-चूल परिवर्तन करना पड़ा है, जिसमें कहीं ज्यादा ही अंतर्निहित खामियां थी। किसानों को राहत देने के लिए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह ने अभी तक चली आ रही योजना की समीक्षा के बाद कृषि विशेषज्ञों द्वारा कराये गये अध्ययन के बाद नई बीमा योजना के प्रस्ताव को मंजूरी दिलाई है। मोदी सरकार ने अगले तीन वर्षों में देश की 50 फीसदी फसलों को बीमे का सुरक्षा कवच देने का लक्ष्य तय किया है। नई फसल बीमा योजना में इस बात का भी ध्यान रखा जाएगा कि किसानों को बर्बाद हुई फसल के बीमे की रकम देने में कंपनियां अपनी तरफ से कोई अड़चन पैदा न करें। इसके लिए सरकार ने तय किया है कि कैमरा, स्मार्टफोन्स और टैबलेट कंप्यूटर में रिकॉर्ड किए गए वीडियो और तस्वीरें क्लेम लेने के लिए मान्य होंगे। इसके अलावा नई योजना में दावों का निपटारा नुकसान के आकलन के 30 से 45 दिनों के अंदर किये जाने को जरूरी बनाया गया है। मौजूदा फसल बीमा योजना में क्लेम का 33 फीसदी हिस्सा बीमा कंपनी देती है लेकिन नई बीमा योजना के तहत किसानों को खराब हुई फसल की 50 फीसदी रकम बीमे के तौर पर देने का प्रावधान है।
कैसा होगा बीमा का दायरा
मोदी सरकार ने किसानों के लिए रबी के अनाज और तिलहनी फसलों के लिए 1.5 और खरीफ के अनाज तथा तिलहनों के लिए दो प्रतिशत प्रीमियम देना होगा। जबकि उद्यानिकी तथा कपास की फसलों के बीमा के लिए पांच प्रतिशत तक प्रीमियम रखे जाने का प्रावधान किया है। उद्यानिकी और कपास की फसल के लिए दोनों सत्रों मौसम में पांच प्रतिशत तक प्रीमियम तय किया गया है। मसलन इस नई बीमा योजना के तहत धान-मक्का और बाजरे जैसी खरीफ फसलों का बीमा कराने के लिए ढाई फीसदी प्रीमियम देना होगा। गेहूं छोड़कर बाकी सभी रबी फसलों का बीमा करवाने के लिए दो फीसदी का प्रीमियम देना होगा। गेहूं और दालों की फसलों के लिए डेढ़ से दो फीसदी प्रीमियम पर बीमा हो जाएगा। जबकि फल-सब्जियों और अन्य फसलों का बीमा करवाने के लिए 5 फीसदी प्रीमियम देना होगा। इससे पहले किसानों को फसलों का बीमा करवाने के लिए बीमे की रकम का पांच से 15 फीसदी तक का हिस्सा बतौर प्रीमियम भरना पड़ता था। यही नहीं कुछ मामलों में तो फसल बीमे का प्रीमियम 25 फीसदी तक देना होता था, जो किसानों के लिए मुमकिन नहीं हो सकता। इस नई योजना के तहत बाकी का प्रीमियम सरकार अपनी तरफ से भरेगी, जिसके लिए सरकार ने 7500 करोड़ रुपये का बजट भी तैयार किया है। कृषि मंत्रालय के अनुसार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से फसल बीमा संरक्षण का दायरा कुल 19.44 करोड़ हेक्टेयर फसल क्षेत्र के 50 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा, जो फिलहाल इसके 25-27 प्रतिशत रकबे तक ही है। इससे इस योजना पर व्यय बढ़कर करीब 9,500 करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। इस योजना में प्रीमियम पर काई सीमा नहीं होगी और बीमित राशि में भी कमी नहीं की जाएगी। वहीं संभावित दावे के 25 प्रतिशत के बराबर राशि का भुगतान सीधे किसानों के खाते में किया जाएगा और पूरे राज्य के लिए एक बीमा कंपनी होगी।
प्रीमियम सब्सिडी से भरपाई
भारतीय कृषि बीमा कंपनी लिमिटेड के साथ निजी बीमा कंपनियां इस योजना का कार्यान्वयन करेंगी। दावों से जुड़ा सारा उत्तरदायित्व बीमाकर्ता का होगा और सरकार शुरू में ही प्रीमियम सब्सिडी देगी। यही कंपनी स्थानीय जोखिम के लिए कृषि पर नुकसान और फसल के बाद नुकसान का आकलन भी करेगी। मोदी सरकार की लागू की जा रही यह नई फसल बीमा योजना इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि देश मानसूनी बारिश में कमी के कारण लगातार दूसरे साल सूखे का सामना कर रहा है और किसान आर्थिक तंगी के दौर से गुजरने को मजबूर है। इसलिए केंद्र सरकार चाहती है कि बीमा के दायरे में कुछ और फसलों को भी शामिल किया जाए, ताकि किसानों को मानसून की अनिश्चितता से बचाया जा सके।