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शनिवार, 21 नवंबर 2015

अब सड़क पर बाएं चलेंगे भारी वाहन!

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बदले नियम
हरिभूमि ब्यूरो.
नई दिल्ली। 
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के हाल में जारी आदेश पर सभी ट्रक, बसों और अन्य कामर्शियल वहानों के सड़क पर चलने के नियमों को सख्त करने का निर्णय लिया है। मसलन ऐसे भारी वाहन एक दिसंबर से सड़क पर बांयी लेन में चलेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब भारी वाहनों को बायें चलना जरूरी होगा, जिससे के आम यात्रियों को सड़क पर ट्रक, बस और कामर्शियल वाहनों की मुश्किल से अब निजात मिल सकती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक केंद्र सरकार की जारी अधिसूचना में जारी दिशानिर्देशों का पालन करते हुए भारी, कॉमर्शियल वाहनों को एक दिसंबर से बायें चलना अनिवार्य होगा। इन वाहनों को ना सिर्फ हाईवे बल्कि आवासीय क्षेत्रों में इस नियम का पालन करना होगा। कोर्ट ने यह आदेश सड़क पर बढ़ते हादसों के चलते दिया है। कामर्शियल वाहनों, ट्रक और बसों को ओवरटेक करते समय होने वाले हादसों को रोकने के लिए इस नियम को लागू करने का आदेश दिया गया है। हालांकि देखने वाली बात यह है कि कोर्ट के आदेश को लागू कराने में स्थानीय प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस किस हद तक कामयाब हो पाती है। माना जा रहा है कि इन नियमों के लागू होने के बाद आम लोगों को सड़क पर काफी राहत मिलने वाली है।
21Nov-2015

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

अब नहीं मिलेगी विदेशियों को किराए की कोख!

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिया शपथपत्र
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देकर स्पष्ट कर दिया है कि वह विदेशियों के लिए किराए पर कोख यानि सरोगेसी के कारोबार पर रोक लगाना चाहती है। इसके लिए सरकार जल्द की संसद में एक विधेयक भी लेकर आएगी।
केंद्र सरकार ने सरोगेसी के कानूनी नियमों को सख्त बनाकर ऐसे प्रावधान लागू करने के लिए जल्द ही एक विधेयक को संसद में पेश करके उसे पारित कराने की पूरी तैयारी कर ली है। केंद्र सरकार का मकसद सरोगेसी के लिए कानूनी नियमों को सख्त करके किराये की कोख के दुरुपयोग रोकना है। इस काननू के लागू होने पर किसी भी विदेशी नागरिक का भारत में किराये की कोख लेना नामुमकिन ही नहीं, बल्कि असंभव हो जाएगा। सूत्रों के अनुसार नये ‘असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी रेगुलेशन बिल’ में ऐसे प्रावधान किए जा रहे हैं जिससे सरोगेसी के मामलों में बहुत हद दुरुपयोग को रोका जा सकेगा।
भारतीयों पर मान्य होगी सेरोगेसी 
केंद्र सरकार ने शपथपत्र में कहा है कि वह विदेशियों के लिए व्यावसायिक तौर पर होने वाली सरोगेसी को प्रतिबंधित करेगा। वहीं सरोगेसी केवल भारतीय दंपती के लिए मान्य रहेगी। सरकार ने कहा है कि इस संबंध में कानून लाने में थोड़ा वक्त लगेगा। सूत्रों के अनुसार सरकार ने इस नए विधेयक में ओवरसीज सिटिजंस आॅफ इंडिया, भारतीय मूल के लोग, नॉन रेजिडेंट इंडियंस और भारतीय नागरिक से विवाह करने वाले किसी भी विदेशी को पहले की तरह यह सुविधा देने का प्रावधान भी रखा है। इसी प्रकार भारतीय महिला से शादी रचाने वाले विदेशी नागरिक को शादी के दो साल बाद ही सरोगेट मदर का लाभ उठाने का मौका मिल सकेगा, लेकिन इसके लिए उन्हें अपने देश की आथॉरिटी से लिखित में यह देना होगा कि उनकी पत्नी मां नहीं बन सकती।

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

आरटीआई के दायरे में नहीं आना चाहते सियासी दल!

एकजुट राजनीतिक दलों के बचाव में उतरी केंद्र सरकार
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
केंद्रीय सूचना आयोग के निर्देश के बाद सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बावजूद कोई भी राजनीतिक दल आरटीआई के दायरे में आने को तैयार नहीं है और इस मुद्दे पर एकजुट राजनीतिक दलों के बचाव में अब केंद्र सरकार भी सामने आ गई है, जिसने सुप्रीम कोर्ट में एक शपथ पत्र देकर राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे से बाहर ही रखने की वकालत की है।
देश में आरटीआई आंदोलन के साथ ही तमाम सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों के बारे में जानकारी हासिल करने का अधिकार आम लोगों को मिल गया था, जिसमें सभी राजनीतिक दलों को भी आरटीआई के दायरे में शामिल करने की मुहिम में केंद्रीय सूचना आयोग ने एक आदेश के तहत सभी राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में शामिल कर लिया था, लेकिन इस आदेश के खिलाफ तमाम राजनीतिक दल एकजुट होते नजर आए थे। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो शीर्ष अदालत ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत गत 13 सितंबर 2013 को एक आदेश में स्पष्ट किया था कि उम्मीदवारों के शपथपत्र का कोई भी हिस्सा खाली नहीं रहना चाहिए, इसी तर्ज पर फार्म 24-ए जो राजनीतिक दलों द्वारा बीस हजार रुपये से ज्यादा दान देने वाले लोगों के लिए प्रस्तुत किया जाता है। चुनाव सुधार के लिए चुनाव आयोग के साथ मिलकर काम कर रहे गैर राजनीतिक संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म यानि एडीआर राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने के लिए निरंतर आवाज बुलंद की। वहीं प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण ने भी राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में शामिल करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। इसी याचिका की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सोमवार को केंद्र सरकार ने हलफनामा दायर करके राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे से बाहर रखने की मांग की है।

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

भूमि बिल पर सरकार की बढ़ी मुश्किलें!

सुप्रीम कोर्ट ने भी किया केंद्र का जवाब तलब
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधनों के चौतरफा विरोधी सुरों से घिरी मोदी सरकार की मुश्किलों में अब सुप्रीम कोर्ट के नोटिस ने इजाफा कर दिया है। ऐसे में सरकार के लिए संसद के मानसून सत्र में इस विधेयक को पारित करना आसान नहीं है और इसके अटकने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। नीति आयोग की संचालन परिषद की बैठक का कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बहिष्कार और भूमि बिल की जांच पड़ताल में जुटी संसद की संयुक्त समिति में विपक्षी दलों के सदस्यों के विरोध से सरकार पहले ही असमंजस की स्थिति में फंसी हुई है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीसरी बार लाए गये भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को चार सप्ताह में जवाब देने के लिए नोटिस जारी कर दिया है। जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बुधवार को बुलाई गई नीति आयोग की संचालन परिषद की बैठक में भूमि अधिग्रहण विधेयक पर चर्चा के नाम से बिदकी कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की गैरहाजिरी सरकार की मुश्किलों से कम नहीं हैं। मोदी सरकार के लिए 21 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में भूमि अधिग्रहण विधेयक-2013 में किये गये संशोधनों को मंजूरी दिलाना पहली प्राथमिकता इसलिए भी है कि अब सरकार भूमि विधेयक पर अध्यादेश भी नहीं ला सकती है और इसी राजनीति का फायदा कांग्रेस व इस बिल का विरोध करने वाले दल उठाने की तैयारी में हैं। वहीं भूमि अर्जन और पुनर्वास (संशोधन) विधेयक जांच-पड़ताल कर रही संयुक्त संसदीय समिति में शामिल ऐसे दलों के सदस्य भी इस मुद्दे पर बिफरे हुए हैं और इन संशोधनों को खारिज करने की सिफारिश पर बहुमत बनाने का प्रयास कर रहे हैं। जेपीसी को भूमि अधिग्रहण पर सिफारिशों के साथ अपनी रिपोर्ट 28 जुलाई तक संसद में पेश करनी है, लेकिन समिति में विपक्षी दलो के तेवरों से हो रही देरी से समिति कार्यकाल बढ़ाने की मांग कर रही है। मसलन कांग्रेस और अन्य दलों की लामबंदी भी 13 अगस्त तक चलने वाले मानसून सत्र में भूमि बिल पर ब्रेक लगाने की रणनीति लगभग तय कर चुकी है। यही नहीं जदयू-राजद भी कांग्रेस के सुर में सुरमिलाकर तय कर चुके हैं कि किसानों की जमीन छीनने वाले इस विधेयक का संसद में पुरजोर विरोध ही नहीं करेंगे, बल्कि बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव में भी इसे मुद्दा बनाया जाएगा।