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रविवार, 5 जुलाई 2015

राग दरबार- पीछे छूट गए बेचारे लालू

सेक्यूलर सूरमाओं का हिंदू तुष्टिकरण
भारत की राजनीति भी गजब है, जहां सियासत के लिए राजनीतिक दल अपने सिद्धांत और मर्यादाओं को भी ताक पर रखने में पीछे नहीं रहते। बिहार में आने वाले दिनों में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और धर्मनिरपेक्षता का चोला पहने सियासी दल भाजपा को सांप्रदायिक बताकर अपना उल्लू सीधा करना तो चाहते हैं, लेकिन शायद यह भाजपा का बढ़ता दबाव ही हो सकता है कि सेक्यूलर सूरमाओं को भी अब हिंदू तुष्टिकरण की जरूरत महसूस होती नजर आ रही है। बिहार के सुशासन बाबू के नाम से मशहूर होते नीतीश कुमार द्वारा सियासी जमीन का दायरा बढ़ाने की गरज में शुरू किया गया है ‘दस्तक अभियान’ और इसका आगाज करने का तरीका ही शायद उन्हें हिंदू तुष्टिकरण की तरफ खींच लाया। मसलन घर-घर दस्तक का आगाज नीतीश बाबू ने जिस तरह मत्था टेक कर नारियल फोड़ने देवी मंदिर पहुंचे, उसे देख कर तो यही कहा जा सकता है कि धर्मनिरपेक्षता के सुरमाओं ने अब भाजपा की सियासी राह को पकड़ना शुरू कर दिया है। राजनीति के गलियारों में ही नहीं सोशल मीडिया में सेक्यूलर सुरमाओं के हिंदू तुष्टिकरण की याद ताजा होती नजर आ रही है। बिहार की सियासत की बात की जाए तो यूं भी कहा जा सकता है कि इस बार का बिहार चुनाव पूरी तरह मोदी और नीतीश के रंग से सराबोर होगा। इसका कारण भी साफ है कि लालू ने जैसे ही नीतीश कुमार को नेता माना वैसे ही सुशासन बाबू ने ‘बढ़ चला बिहार’ का नारा देकर पूरा चुनाव प्रचार हाइजेक कर लिया। सोशल मीडिया पर तो ऐसी टिप्पणी भी सामने आई कि बिहार में समय की पहचान अब होने लगीं हैं, तभी लालू को साथ नहीं लिया गया, कहीं भगवान जी पहचान लेंगे, तो सेक्यूलर सुरमाओं का कबाडा हो जायेगा। अब पर्चे पर चर्चा हो या दरवाजे पर दस्तक, जिधर भी निगाह पड़ेगी उधर ही नीतीश बाबू ही नजर आएंगे और बेचारे लालू तो पीछे छूट गये..। समय की पहचान अब होने लगीं हैं, तभी लालू को साथ नहीं लिया गया, कहीं भगवान जी पहचान लेंगे, तो कबाडा हो जायेगा?