मंगलवार, 2 जून 2026

वन नेशन-वन इलेक्शन: जेपीसी का तैयार 'टू-फेज रोडमैप'

युगांतरकारी लोकतांत्रिक सुधार से बदलेगा भारत? 
By-ओ.पी. पाल 
भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा और सबसे जीवंत लोकतांत्रिक ढांचा है। देश में 'वन नेशन-वन इलेक्शन' महज एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि देश के प्रशासनिक स्वास्थ्य, आर्थिक सुदृढ़ता और विकास की निरंतरता के लिए एक आवश्यक ढांचागत सुधार है। देश को बार-बार के चुनावी मोड से बाहर निकाल कर 'विकास मोड' में लाना समय की मांग है। बेशर्ते इस प्रक्रिया में भारतीय संविधान के मूल तत्व 'लोकतंत्र' और 'संघवाद' की बलि नहीं चढ़नी चाहिए। जेपीसी देश को 'विकास मोड' में लाने की दिशा में एक युगांतरकारी और ढांचागत सुधार की पटकथा तैयार करने की तैयारी में है। 'एक देश-एक चुनाव' विधेयक की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने पिछले सप्ताह गुजरात के गांधीनगर में हुई बैठक में गहन मंथन करने के बाद एक बेहद व्यावहारिक 'टू-फेज ट्रांजिशन मॉडल' (दो चरणों वाला मॉडल) पर विचार किया है। इस मॉडल का मुख्य उद्देश्य भारतीय संविधान के मूल तत्व 'लोकतंत्र' और 'संघवाद' की सुरक्षा करते हुए साल 2029 और 2034 के बीच पूरे देश को एक साझा चुनावी चक्र की परिधि में लाना है। यदि संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) और देश का राजनीतिक नेतृत्व दलगत राजनीति से ऊपर उठकर, विधिक सुरक्षा उपायों के साथ इस 'टू-फेज ट्रांजिशन मॉडल' को क्रियान्वित करता है, तो निश्चित रुप से यह 21वीं सदी के भारत का सबसे बड़ा और युगांतरकारी लोकतांत्रिक सुधार सिद्ध होगा? इससे न केवल जनता के धन की बचत होगी, बल्कि देश 'गवर्नेंस' के एक नए युग में प्रवेश करेगा। 

संयुक्त संसदीय समिति, शुरुआती दौर में'वन नेशन-वन इलेक्शन' की अवधारणा को लागू करने के लिए दो चरणों में चुनाव कराने की सिफारिश कर सकती है। मसलन जेपीसी के 'टू-फेज ट्रांजिशन मॉडल' के तहत पहले चरण में साल 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ देश के लगभग 20 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं। इसके अंतर्गत उन राज्यों को लक्षित किया जाएगा जिनका कार्यकाल 2029 के आसपास (कुछ महीने पहले या बाद में) समाप्त हो रहा होगा। इसके लिए कुछ विधानसभाओं के कार्यकाल में आंशिक विस्तार या कुछ महीनों की कटौती की जा सकती है। जेपीसी के अध्ययन के अनुसार दूसरे चरण में शेष बचे राज्यों को 2034 तक इस साझा चुनावी चक्र के अंतर्गत शामिल कर लिया जाएगा। इस प्रकार 2034 तक देश का 100 प्रतिशत हिस्सा एक देश-एक चुनाव की परिधि में आ जाएगा। जेपीसी को अपनी अंतिम रिपोर्ट संसद के मानसून सत्र के आखिरी सप्ताह के पहले दिन सौंपनी है, जिसके बाद विधिवत विधायी प्रक्रिया शुरू होगी। संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) इस महत्वाकांक्षी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए 'टू-फेज ट्रांजिशन मॉडल' (दो चरणों वाला मॉडल) का उद्देश्य 2029 और 2034 के बीच देश को एक साझा चुनावी चक्र में लाना है। 

चुनावी चक्र की एकरूपता पर छिड़ी गंभीर बहस 
विश्व का सबसे बड़े भारतीय लोकतांत्रिक देश में भारतीय निर्वाचन आयोग निष्पक्ष चुनाव कराता आ रहा हैं। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में भारतीय राजनीति में एक नई प्रवृत्ति उभरी है। इसी वजह से देश के किसी न किसी हिस्से में हर 3 से 6 महीने में चुनाव हो रहे होते हैं। इस राजनीतिक विसंगति को दूर करने के लिए 'वन नेशन-वन इलेक्शन' (एक देश-एक चुनाव) यानी समकालिक चुनाव की अवधारणा पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बहस छिड़ी हुई है। 'वन नेशन-वन इलेक्शन' का सीधा अर्थ है कि पूरे भारत में लोकसभा, सभी राज्यों की विधानसभाओं और स्थानीय निकायों (नगरपालिकाओं व पंचायतों) के चुनाव एक निश्चित समयावधि के भीतर एक साथ कराए जाएं। यह विचार नया नहीं है, बल्कि यह भारत के मूल राजनीतिक स्वरूप की ओर लौटने की एक कोशिश है। इसी मकसद से केंद्र सरकार ने एक ठोस विधिक आधार 'एक देश-एक चुनाव' की संभावनाओं को तलाशने के लिए 2 सितंबर 2023 को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। इस समिति ने देश के विभिन्न राजनीतिक दलों, विधि विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों और आम जनता से व्यापक परामर्श किया। 191 दिनों के गहन शोध, बैठकों और विश्लेषण के बाद, समिति ने 14 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी 18,626 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट के मुताबिक 47 राजनीतिक दलों ने अपने विचार समिति के साथ साझा किए, जिनमें से 32 दल 'वन नेशन, वन इलेक्शन' के समर्थन में थे। प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सितंबर 2024 कोविंद समिति की सिफ़ारिशों को मंजूरी दी। इसके बाद 12 दिसंबर को 'वन नेशन, वन इलेक्शन' से जुड़े विधेयक को भी केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हरी झंडी दिखाई और अगले सप्ताह इस संबन्धी संविधान का 129वां संशोधन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक को संसद में पेश कर दिया गया। यह भी गौरतलब है कि 1999 में विधि आयोग भी हर पांच साल में लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की सिफारिश कर चुका है। 

पृष्ठभूमि: जब भारत में एक साथ होते थे चुनाव 
हालांकि यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत के पास समकालिक चुनाव कराने का एक सफल अनुभव मौजूद है। आज जिस व्यवस्था को 'असंभव' या 'संघवाद विरोधी' कहा जा रहा है, वह आज़ादी के बाद के शुरुआती दो दशकों तक भारत की सामान्य चुनावी व्यवस्था थी। भारत में प्रथम आम चुनाव (1951-52), द्वितीय आम चुनाव (1957), तृतीय आम चुनाव (1962) और चतुर्थ आम चुनाव (1967) के दौरान लोकसभा और देश के लगभग सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही होते थे। लेकिन यह एकरूपता 1967 के बाद उस समय भंग हुई जब राजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू हुआ। कई राज्यों में गठबंधन सरकारें समय से पहले गिर गईं और अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का व्यापक प्रयोग करके विधानसभाएं भंग कर दी गईं। 1968 और 1969 में कई विधानसभाएं समय से पहले भंग हुईं। इसके बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिसंबर 1970 में लोकसभा को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही भंग करने की सिफारिश कर दी, जिसके परिणामस्वरूप 1971 में मध्यावधि लोकसभा चुनाव हुए। यहीं से देश का साझा चुनावी चक्र पूरी तरह बिखर गया। अब कोविंद समिति की मुख्य सिफारिशों में पहले चरण में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाना और दूसरे चरण में पहले चरण के 100 दिनों के भीतर में स्थानीय निकाय (नगर पालिका और पंचायत) चुनाव कराना शामिल है। समिति ने त्रिशंकु सदन की स्थिति में समाधान में यह भी सिफारिश की है कि यदि किसी राज्य में सरकार गिरती है या त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनती है, तो पूरे 5 साल के बजाए शेष कार्यकाल के लिए ही नई विधानसभा का गठन (मध्यावधि चुनाव) हो। भारत निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोगों के समन्वय से एक साझा मतदाता सूची और एकल मतदाता पहचान पत्र तैयार किया जाए। 

समकालिक चुनावों की आवश्यकता क्यों?
'वन नेशन-वन इलेक्शन' के पक्ष में प्रशासनिक, आर्थिक और नीतिगत स्तर पर कई बेहद मजबूत तर्क दिए जाते हैं। इसमें वित्तीय बोझ में भारी कटौती का प्रस्तावत है, क्योंकि आधुनिक समय में चुनाव बेहद खर्चीले हो गए हैं। इसमें न केवल चुनाव आयोग का सरकारी खर्च शामिल होता है, बल्कि राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा किया जाने वाला अदृश्य खर्च भी होता है। वहीं जब सरकारें हर समय चुनावी मोड़ में रहती हैं, तो आर्थिक सुधार, भूमि सुधार या कड़े कानून जैसे दीर्घकालिक और कड़े सुधारात्मक लेने से बचती हैं। राजनीतिक दल दीर्घकालिक राष्ट्रीय विकास के बजाय तात्कालिक चुनावी लाभ के लिए मुफ्त उपहारों और लोकलुभावन योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं। समकालिक चुनावों से सरकारों को 5 साल तक बिना किसी चुनावी दबाव के काम करने का अवसर मिलेगा। दूसरी ओर एक पहलू यह भी कि भारत जैसे विशाल देश में एक साथ चुनाव कराने के लिए अभूतपूर्व संख्या में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (इवीएम) और वीवीपीएटी मशीनों की आवश्यकता होगी। भारतीय निर्वाचन आयोग के अनुसार, यदि स्थानीय निकायों को भी जोड़ दिया जाए, तो लाखों नई मशीनों के निर्माण, उनके सुरक्षित भंडारण और सुरक्षा के लिए अरबों रुपये के अतिरिक्त बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होगी। इसके अलावा ईवीएम की शेल्फ-लाइफ लगभग 15 वर्ष होती है, जिसका अर्थ है कि इन मशीनों का उपयोग उनके पूरे जीवनकाल में केवल तीन बार ही किया जा सकेगा। 

संवैधानिक और व्यावहारिक चुनौतियां 
'वन नेशन-वन इलेक्शन' की अवधारणा को लागू करना जितना आकर्षक दिखता है, उतना ही भारतीय संवैधानिक ढांचे के भीतर इसकी राह जटिल है। विपक्ष और कई क्षेत्रीय दलों द्वारा इस कवायद को संघीय ढांचे को चोट पहुंचने की आशंका करार दिया जा रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 के अनुसार, भारत राज्यों का एक संघ है। आलोचकों का तर्क है कि प्रत्येक राज्य की अपनी विशिष्ट राजनीतिक परिस्थितियां और जनभावनाएं होती हैं। यदि किसी राज्य की सरकार समय से पहले गिर जाती है और वहां जबरन राष्ट्रपति शासन थौंप दिया जाता है या केवल शेष अवधि के लिए चुनाव कराया जाता है, तो यह उस राज्य की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों और संघीय स्वायत्तता का हनन होगा। अभी तक देश में 'वन नेशन-वन इलेक्शन' को लागू करने के लिए केवल एक साधारण कानून पर्याप्त नहीं है। इसके लिए संविधान के कई अनुच्छेदों में संशोधन करना होगा। इनमें अनुच्छेद 83 (2) के तहत लोकसभा का कार्यकाल (5 वर्ष), अनुच्छेद 85 (2)(बी) के तहत राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा को भंग करने का अधिकार, अनुच्छेद 172 (1) के तहत राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल(5 वर्ष), अनुच्छेद 174 (2)(बी) के तहत राज्यपाल द्वारा विधानसभा भंग करने का अधिकार, अनुच्छेद 356 के तहत राज्यों में राष्ट्रपति शासन का प्रावधान शामिल है। वहीं जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में भी आमूलचूल बदलाव करने होंगे। कोविंद समिति का मानना है कि इन संशोधनों के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत और कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं के अनुसमर्थन की आवश्यकता होगी। 
-03June-2026

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें