इंसानियत की मधुशाला
बैर
बढ़ाते मंदिर-मस्जिद-प्यार बढ़ाती मधुशाला..। हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला
से निकलते इन शब्दों से तो इसी दौलतखाने की सच्च्चाई का पता चलता है। यही
नहीं एक फिल्म में ओमपुरी का यह डायलॉग ‘इंसान मजहब के लिए नहीं, बल्कि
मजहब इंसानों के लिए बना है’ भी धर्मनिरपेक्षता की सियासत करने वालों को
ऐसी ही नसीहत देती है। इसके बावजूद बीफ और जातियों के नाम पर बांटने की
सियासत के परिपेक्ष्य में अपने आपको सेक्युलर बताने वाले स्यापाबाजों की
एक-दूसरे के खिलाफ बदजुबानी देश व समाज में जिस तानेबाने को बुनने का
प्रयास कर रही है। उसे देखते हुए कुछ बुद्धिजीवियों ने हरिवंश राय बच्चन की
मधुशाला की याद ताजा कर दी और मयखाने को ही तथाकथित सेक्युलर स्यापाबाजों
की बस्ती से बेहतर करार दे दिया, जहां कम से कम इन्सान और इंसानियत तो
देखने को मिलती है। देश की सियायत में धर्मनिरेपक्षता को चोला ओढ़कर
इंसानियत की दुहाई देने वाले स्यापाबाज सेक्युलरिस्ट जब गिरगिट की तरह रंग
बदलते हैं, तो ऐसे में मधुशाला ही इस सांप्रदायिकता के रंग से दूर मोहब्बत
का पैगाम देती है,जहां कम से कम हिंदू-मुसलमान नहीं, बल्कि इन्सान तो मिलते
हैं, जो मिलजुल कर खर्च उठाते हैं और ठहाके के साथ गम भी भुलाते हैं। मसलन
सबका प्याला एक, मगर प्यास अलग जरूर है, पर गजब की मोहब्बत है रिंदों में।