सोमवार, 2 सितंबर 2024

चौपाल: हरियाणवी लोक कला व संगीत को समर्पित अभिनेत्री डा. रमन नासा

फिल्म ‘दंगल’ में आमिर खान के साथ अभिनय से मिली लोकप्रियता 
              व्यक्तिगत परिचय 
नाम: डॉ. रमन (हंस) नासा 
जन्मतिथि: 25 नवंबर1976 
जन्म स्थान: हिसार(हरियाणा) 
शिक्षा: पीएचडी(अंग्रेजी) 
संप्रत्ति: शिक्षिका, अभिनय, रंगमच
संपर्क: nassa.raman2511@gmail.com, मोबा. 9996702525 
BY--ओ.पी. पाल 
हरियाणा की लोक कला एवं समृद्ध संस्कृति की मिसाल देश में ही नहीं, विदेशों में भी कायम रखने के लिए लोक कलाकारों व गायकों की भूमिका अत्यंत महत्व रखती है। लोक कला, संगीत, संस्कृति या साहित्य के संवर्धन में जुटे ऐसे कलाकारों में बहुमुखी प्रतिभा डा. रमन नासा भी कला की विभिन्न विधाओं के जरिए समाज को सकारात्मक विचाराधारा के साथ नई ऊर्जा देने में सक्रीय है। खासतौर से दंगल जैसी बॉलीवुड फिल्म में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुकी रमन नासा की कला देश व समाज और हरियाणवी लोक कला को समर्पित नजर आती है। एक शिक्षिका होने के साथ लोक कला व संगीत के क्षेत्र में उन्होंने अभिनय की कला में लोकप्रियता हासिल की है। अपने थियेटर व रंगमंच से लेकर फिल्मों में एक अभिनेत्री के किरदार तक के सफर को लेकर डा. रमन नासा ने हरिभूमि संवाददाता से बातचीत में कई ऐसे अनछुए तथ्यों को उजागर किया है, जिसका सामाजिक और संस्कृति के हित में मानवता का संदेश मिलता है। 
हरियाणवी फिल्मों से बॉलीवुड तक का सफर करने वाली फिल्म अभिनेत्री एवं हरियाणवी लोक कलाकार डॉ. रमन (हंस) नासा का जन्म हिसार में अमरनाथ हंस और निर्मल हंस के घर में हुआ। उनके दादा और चाचा यानी परिवार में अधिकांश सदस्यों की गायन में रुचि रही है। मसलन परिवार में ही लोक कला संगीत के माहौल के बीच रमन को भी बचपन से ही गायन में अभिरुचि रही और अभी भी गाती हैं। लेकिन परिवार में अभिनय करने के सफर के सफर की शुरुआत रमन से ही शुरु हुई। डीएवी पुलिस पब्लिक स्कूल हिसार में पिछले 14 साल से अंग्रेजी की शिक्षिका के रुप में कार्यरत डा. रमन नासा अपनी कला और अभिनय के कारण बच्चों में भी लोकप्रिय है। बकौल डा. रमन नासा उनके अभिनय की शुरुआत थियेटर से शुरु हुई और बगिया बच्चा राम की, कथा एक कंस की, माई बोरिंग डैडी, रामायण और कृष्णा सोबती द्वारा लिखित आई लड़की जैसे नाटकों में बहुत प्ले करके वह रंगमंच में सक्रीय हुई। हिसार के रंग प्रयास नाट्य मंच के दया प्रकाश सिन्हा द्वारा लिखित नाटक ‘कथा एक कंस की’ में लोकेश मोहन खट्टर के निर्देशन में रमन नासा ने कंस की प्रेमिका स्वाति का किरदार निभाया है। उन्होंने बताया कि साल 2016 में आमिर खान प्रोडक्शन के साथ ‘दंगल’ फिल्म रिलीज हुई, जिसमें उन्हें अभिनय करने का मौका मिला। मसलन इसी फिल्म से उनका अभिनय का रियल सफर शुरू हुआ, जो फिर अभी तक रुका नहीं, बल्कि बढ़ता चला गया। अभी तक उनकी करीब 15 फिल्में रिलीज हो चुकी है। उन्होंने भोजपुरी, पंजाबी और मुल्तानी फिल्म के अलावा कई वेब सीरीज फिल्मों में भी एक्टिंग की हैं। फिल्मों में अभिनय के अलावा वह लोक कला व संगीत में भी अपनी कला के जरिए हरियाणवी संस्कृति और सामाजिक समरसता को समृद्ध बनाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। नौकरी और अभिनय के बीच समय को लेकर कुछ परेशानी भी आती हैं, लेकिन चुनौतियों का सामना करके वह सामंजस्य बना लेती हैं। अभिनय और लोककला के क्षेत्र में उन्हें अपने पति प्रो. देवेन्द्र मोहन नासा और परिजनों का सहयोग व प्रोत्साहन भी मिल रहा है। लोक कला, संगीत और फिल्म में अभिनय के क्षेत्र के कारण वह दूरदर्शन से भी जुड़ी रही हैं। लोक कला, संगीत और अभिनय के क्षेत्र में डा. रमन नासा को श्रेष्ठ अभिनेत्री का यशस्वी गौरव सम्मान भी मिल चुका है। इसके अलावा उन्हें अनेक सामाजिक व सांस्कृतिक तथा अन्य मंचों व समारोह में अनेक सम्मान व पुरस्कारों से भी नवाजा जा चुका है। 
अभिनय को ऐसे मिली मंजिल 
हरियाणवी लोक कलाकार श्रीमती रमन नासा ने थिएटर से अभिनय की शुरुआत करने के बाद फ़िल्मों, लघु फ़िल्मों वेब श्रृंखला, वृत्तचित्र, हरियाणवी गानों में ही नहीं, बल्कि विज्ञापनों के लिए भी अपने अभिनय की कला का प्रदर्शन कर लोकप्रियता हासिल की है। उनका कहना है कि थिएटर ही अभिनय सीखने का मंच है, जहां से फिल्मों तक की मंजिल मिलती है। उन्होंने रंगमंच के क्षेत्र में थिएटर शो बगिया बचा राम की, कथा एक कंस की, आई लड़की, (स्वांग) शिव पार्वती, (स्वांग) हीर रांझा, मेरे बोरिंग डैडी, रामायण(मामदोदरी), रामायण(केकई) जैसे नाटकों के अभिनय करके ऐसा कदम बढ़ाया कि उसके बाद उन्होंने बॉलीवुड अभिनेता और फिल्म निर्देशक आमिर खान प्रोडक्शन के साथ ‘दंगल’ फिल्म में भी अपने अभिनय से सबको चौंकाया। इसी प्रकार उनकी हरियाणवी फिल्म गौरव की स्वीटी’ और वेब सीरीज फिल्म ‘मेरे यार की शादी’ भी सुर्खियों में रही है। वहीं उनकी लघु फिल्म जन्नत, बूल, गाना बहु नई नवेली और रेल की भंबीरी, चटक मटक के अलावा विज्ञापन फिल्म ‘कानून सीखो’ के लिए भी किरदार निभाया है। अभिनेत्री रमन नासा की हरिओम प्रोडक्शंस के साथ ‘टोट्टा’, योगेंदर राठी के साथ ‘योग’ कुलदीप कुणाल के साथ ‘मोटर माचिस कटर’ एडमेक प्रोडक्शंस, बॉम्बे के साथ ‘द लॉस्ट गर्ल’ में भी अपने किरदार का प्रदर्शन किया है। 
आधुनिक युग में बढ़िया काम 
अभिनेत्री डा. रमन नासा का इस आधुनिक युग में साहित्य व लोक कला की स्थिति को लेकर कहना है कि हरियाणा में अब इस क्षेत्र में अच्छे तरीके से मुड़ रहा है, केवल प्रोत्साहन देकर इसे आगे बढ़ाने की जरुरत है, ताकि कलाकार अपनी अच्छी और बड़ी भूमिका को निभा सके। लोक कला व फिल्म के क्षेत्र में प्रोड्यूशरों को हरियाणा में निवेश करने की भी जरुरत है, ताकि लोक कला व संगीत की स्थिति को और ज्यादा मजबूत किया जा सके। नई युवा पीढ़ी भी साहित्य व कला के क्षेत्र में रुचि ले रही है, लेकिन उन्हें साहित्य और कला से जुड़े लोगों को अच्छे कंटेट देकर प्रोत्साहन देना बहुत आवश्यक है। अभिनय के क्षेत्र में भी अच्छे कंटेट की पटकथा के लेखन होना चाहिए, क्योंकि बच्चों से लेकर बुजुर्ग भी लोक कला व संगीत और फिल्में देखते हैं। आज के युग में यूट्यूब का दायरा बढ़ा है, जिनमें पहले की तरह अब द्विअर्थी कंटेट कम ही नजर आता है। यानी हरियाणा की बात करें तो अच्छे अच्छे गाने ही ज्यादा पसंद किये जा रहे हैं, जिनमें और बेहतर सुधार के साथ समाज को साहित्य, कला और संगीत के जरिए नई दिशा देना संभव है। 
02Sep-2024

सोमवार, 26 अगस्त 2024

साक्षात्कार: साहित्य सृजन के बिना समाज की कल्पना असंभव: संगीता बैनीवाल

बाल साहित्य, कविता, कहानी, लघुकथा, हाईकू तथा लेख जैसी विधाओं में साहित्य सृजन
         व्यक्तिगत परिचय 
नाम: संगीता बैनीवाल 
जन्मतिथि: 16 अक्टूबर 1966 
जन्म स्थान: गांव पारता जिला फतेहाबाद (हरियाणा)
शिक्षा: बी.ए., बी.एड, एम.ए.(हिंदी, अंग्रेजी व एजुकेशन)
संप्रत्ति: अध्यापिका एवं लेखिका 
संपर्क:1721, सेक्टर-21, पंचकूला(हरियाणा)। मोबा. 9417011424 
By- ओ.पी. पाल
भारतीय संस्कृति में समाजिक दृष्टि से घटित विषयों को लेकर लेखक एवं साहित्यकार विभिन्न विधाओं के माध्यम से सकारात्मक भूमिका निभाते आ रहे हैं, ताकि समाज अपनी संस्कृति, सभ्यता और रीति रिवाज की मूल जड़ो से जुड़ा रहे। हरियाणा की समृद्ध संस्कृति के संवर्धन की दिशा में महिला लेखकों और साहित्यकारों के योगदान को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता, जिन्होंने समाज को नई दिशा देने खासकर नारी विमर्श के विभिन्न पहलुओं को अपने लेखन के जरिए अपने साहित्य सृजन में उकेरा है। ऐसी ही महिला साहित्यकार संगीता बैनीवाल अपने रचना संसार में बाल मन से लेकर सामाजिक विषय, विचार, सोच, हर्ष तथा पीड़ा भाव को निहित करते हुए साहित्य साधना करने में जुटी हुई हैं। हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत के दौरान शिक्षिका और लेखिका संगीता बैनीवाल ने अपने साहित्यिक एवं लेखन के सफर को लेकर कई ऐसे अनछुए पहलुओं को उजागर किया है, जिसमें समाज में सकारात्मक विचारधाराओं का संचार करने में साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
हरियाणा की महिला साहित्यकार संगीता बैनीवाल का जन्म 16 अक्टूबर 1966 को जिला फतेहाबाद (हरियाणा) के गांव पारता में एक जमींदार परिवार में सज्जन सिंह नम्बरदार और श्रीमती चन्द्रो देवी के घर में हुआ। पिता सज्जन सिंह नम्बरदार ,माता श्रीमती चन्द्रो देवी हैं। परिवार में उनके माता पिता दोनों की शिक्षित थे। संगीता की प्राइमरी शिक्षा गांव के पांचवी कक्षा तक के स्कूल में हुई। इसलिए आगे की शिक्षा ग्रहण करने के लिए शहर में भेजा गया। उस समय गांव में वह पहली लड़की थी, जिसने ग्रेजुएशन तक की शिक्षा हासिल की। दरअसल उस समय आसपास के गांव में लड़कियों की शिक्षा पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता था और लड़कियों की छोटी उम्र में ही शादी कर दी जाती थी। उनके गांव और आसपास के गांव की उनके साथ पढ़ने वाली लड़कियों की पांचवीं पास करते ही शादियां हो चुकी थी। लेकिन उनका परिवार शिक्षित था इसलिए उसकी शादी 23 वर्ष की उम्र में कर दी गई। उनके पति धर्मपाल सिंह बैनीवाल रिटायर्ड चीफ इंजीनियर हैं। उनके दोनों बेटे दिव्यांक बैनीवाल और ध्वनित बैनीवाल भी इंजीनियर हैं। बकौल संगीता बैनीवाल शिक्षा अर्जित करने के लिए उन्हें परिवार से दूर रहना पड़ा उन्हें डायरी लिखने का शौक था। उनके लेखन कार्य की शुरुआत कालेज की वार्षिक पत्रिका से हुई, जिससे उनकी लेखनी को आत्मबल मिला। चूंकि उस समय फोन नहीं थे और अपने मन के भाव, सुख-दुख परिवार के साथ सांझा करने के लिए केवल पत्र ही एकमात्र जरिया था। यानी बाल मन में ही भावनाओं को शब्दों में पिरोने की कला के अंकुर पनपने लगे, जो उनके साहित्य सृजन की शुरुआत समझी जा सकती है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि जिंदगी में उतार चढ़ाव का होना भी स्वाभाविक है। इसलिए जब उनके पति का बहादुरगढ़ से सिरसा तबादला हुआ, तो घर का सामान पैक करने के दौरान उनकी दैनिक लेखन की डायरियां सामने आ गई। उन्हें एक शहर से दूसरे शहर में ढ़ोने के बजाए उन्होंने उन डायरियों को पुराने अखबार, पत्रिकाओं की रद्दी के सामान में रख दिया। उसी समय उनके पति की नजर उन डायरियों पर पड़ी तो वो उन डायरियों को अंदर उठा लाए और कहने लगे ये फेंकने की चीज नहीं है, इन्हें ले चलो सिरसा जा कर देखते हैं। सिरसा कुछ महीनों बाद पति ने साहित्यकारों से संपर्क किया कि उनकी पत्नी लेखन करती हैं। इन्हें पढ़कर बताएं पुस्तक छपवाने की विषयवस्तु है क्या?। इसके बाद मेरी रचनाएं पत्र पत्रिकाओं में छपने लगी और यहां उनकी दो पुस्तकें भी प्रकाशित हुई। इससे लेखन के प्रति बढ़े आत्मविश्वास के साथ उन्होंने अपनी रचनाओं में सामाजिक विषयक सामग्री पर ज्यादा फोकस किया, लेकिन उनके बाल साहित्य में बाल मन व प्रकृति प्रेम की झलक भी उकेरी, तो हरियाणवी साहित्य में ग्रामीण आंचलिकता व मौलिकता पर जोर रहा। जबकि उन्होंने हिंदी कविताओं में नारी विमर्श के विभिन्न पहलुओं को छूआ है, तो वहीं कहानियों में सामाज में घटित विषय, विचार, सोच, हर्ष -पीड़ा भाव निहित करते हुए लेखन किया। उनके साहित्य सृजन को इतना प्रोत्साहन मिला कि साहित्यिक गतिविधियों में सक्रीय होने के कारण वे हिन्दी साहित्य प्रेरक संस्था जीन्द की अध्यक्ष भी रहते हुए संस्था के लिए जमीन उपलब्ध कराकर संस्था के भवन निर्माण में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया। इसके अलावा वह हरियाणा लेखिका मंच सिरसा की उपाध्यक्ष और नवजागरण साहित्य संस्था नारनौंद में महासचिव के रूप में अपनी सेवा दे चुकी हैं। 
आधुनिक युग में बदली साहित्य की स्थिति 
आज के आधुनिक युग में साहित्य की स्थिति को लेकर संगीता बैनीवाल का मानना है कि साहित्य की स्थिति पहले जैसी नहीं रही। नये युग में नए प्रयोग और निरंतरता के साथ परिवर्तित रुप भी नजर आता है। साहित्य समाज का नवसृजन करता है, समाज को नई दशा व दिशा देने वाला है इसलिए थोड़ा चिंता का भाव भी है कि कुछ विषयवस्तु में गिरावट भी देखने को मिलती है। यह भी कटु सत्य है कि साहित्य के पाठक कम हो रहे हैं। इसका कारण रातोरात लोकप्रिय होने के लिए साहित्यकार भी पढ़ते कम और लिखते ज्यादा हैं। वहीं युवा पीढ़ी की साहित्य पढ़ने में रुचि बिल्कुल नहीं है, जिसका कारण इंटरनेट पर शोर्ट विडियो,रील के जरिए मिलने वाला लुभाना खतरनाक ज्ञान है, जो आज के युवा की तेजी से बदलती मानसिक प्रवृत्ति चिंता का विषय भी है। इसलिए सामाजिक ढांचा और संस्कृति को संजोए रखने के लिए युवाओं को साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है। इस दिशा में माता-पिता ही नहीं, बल्कि लेखकों और साहित्यकारों को भी चाहिए कि वे युवाओं के लिए अच्छे साहित्य का लेखन कर उन्हें प्रोत्साहित करें। साहित्यिक संस्थाओं को समय समय पर कार्यशाला आयोजित कर युवा लेखकों को साहित्य की विभिन्न विधाओं से विषय वस्तुओं के प्रति सकारात्मक संदेश दें। 
साहित्य पर शोध कार्य 
प्रसिद्ध महिला साहित्यकार संगीता बैनीवाल की कृतियों पर शोध कार्य भी हो चुके हैं और ‘देखी तेरी गली बाबुल’ में लोक संस्कृति विषय पर (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय विद्यालय में एमफिल के लिए विभिन्न युनिवर्सिटी से थिसिस लिखी जा चुकी हैं। वहीं संगीता बैनीवाल एवं उनका साहित्य कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय विद्यालय में पीएचडी के विषय में भी स्थान बना चुका है। इसके अलावा विनायका मिशन विश्वविद्यालय सेलम ,तामिलनाडु में शीर्षक ‘संगीता बैनीवाल: ‘व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ पर थिसिस लिखी जा चुकी है। 
प्रकाशित पुस्तकें 
महिला साहित्यकार संगीता बैनीवाल हिंदी व हरयिाणवी लेखन में बाल साहित्य, कविता, कहानी, लघुकथा, हाईकू तथा लेख जैसी विधाओं में साहित्य सृजन कर रही है। उनकी अब तक कविता संग्रह ‘मेरे गाँव की लड़की’, ‘चक्षूफूल बिछाए हैं’, ‘स्मृति का धागा’ और ‘शब्दों की तलाश’ के अलावा बाल साहित्य ‘चॉकलेट का पेड़’, हरियाणवी काव्य संग्रह ‘देखी तेरी गली बाबुल’, हाईकू संग्रह ‘अहसास’ तथा लेख ‘सृष्टि अनुपम धरोहर’ जैसी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। अभी उनका एक कविता संग्रह और कहानी संग्रह ‘मेरु की बहू’ प्रकाशाधीन है।
पुरस्कार व सम्मान 
साहित्य सृजन में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए प्रसिद्ध साहित्यकार संगीता बैनीवाल को अखिल भारतीय साहित्य परिषद् हरियाणा व अन्य साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। इनमें प्रमुख रुप से साहित्य सभा कैथल के श्री दयालचंद मदान स्मृति सम्मान, जागृति प्रकाश मलाड मुंबई से पूर्व पश्चिम काव्य गौरव सम्मान, हिंदी साहित्य प्रेरक संस्था जींद के शकुंतला देवी साहित्य-रत्न सम्मान शामिल हैं। हालांकि संगीता साहित्य क्षेत्र से जुड़ी हस्तियों को सम्मानित करने जैसी गतिविधियों में ज्यादा हिस्सेदार रही हैं। 26Aug-2024

मंगलवार, 20 अगस्त 2024

चौपाल: हरियाणवी संस्कृति और बोली के संवर्धन में जुटे लोक गायक सुनील बेरवाल

सामाजिक सरोकार के मुद्दों को हास्य व्यंग्य के जरिए उठाने से हुए लोकप्रिय 
                    व्यक्तिगत परिचय 
नाम: सुनील बेरवाल 
जन्मतिथि: 20 दिसम्बर 1987 
जन्मस्थान: गांव सीसर खरबला, हिसार (हरियाणा)
शिक्षा: पॉलिटेक्निक 
संप्रति: गायक, लेखक, 
सम्पर्क: गांव सीसर खरबला, हिसार (हरियाणा)
मोबा. 9812879328 ,8685995928, ई मेल-samundersingh328@gmail.com 
BY-ओ.पी. पाल 
हरियाणवी लोककला और संस्कृति के लिए लोक कलाकार, लेखक, गीतकार, गायक अपनी कला के हुनर से सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर फोकस करके समाज में फैली कुरितियों का उन्मूलन करने में जुटे हुए हैं। ऐसे ही लोक कलाकार के रुप में सुनील बेरवाल ने विभिन्न विधाओं में गीत लेखन और गायकी के जरिए समाज को ऊर्जा देने की दिशा में हरियाणवी संस्कृति, सभ्यता और हरियाणवी बोली के संवर्धन में जुटे हुए हैं। खासतौर से हास्य व्यंग्य गीत लेखन और गायकी में लोकप्रिय हुए सुनील बेरवाल ने हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में अपने लोक कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में अपने सफर को लेकर कई ऐसे पहलुओं को भी उजागर किया, जिसमें समाज को अपनी संस्कृति और सभ्यता की मूल जड़ों से जुड़े रहने के संदेश देकर सामाजिक समरसता को जीवंत रखा जा सकता है। 
हरियाणवी लोक संस्कृति को आगे बढ़ाते सुनील बेरवाल का जन्म 20 दिसम्बर 1987 हिसार जिले में गांव सीसर खरबला के एक किसान परिवार में शमशेर सिंह और रोशनी देवी के घर में हुआ। उनकी प्राइमरी शिक्षा गांव के सरकारी स्कूल में हुई। फिर गांव के ही स्कूल से साल 2004 में उन्होंने दसवीं कक्षा पास की, जिसके बाद उन्होंने राजकीय पॉलीटेक्निक हिसार में प्रवेश लिया और साल 2008 में पॉलीटेक्निक की शिक्षा पूरी की। लोक कलाकार सुनील बेरवाल के परिवार में कोई साहित्य या लोककला या संस्कृति का माहौल नहीं था, लेकिन परिवार में अपने ताऊ के बेटे को हरियाणवी नृत्य और एक्टिंग का शौंक हुआ। वहीं सुनील ने बचपन में अपनी माता को हरियाणवी गीत गुनगुनाते देखा, तो उसका प्रभाव इन पर होने लगा। यही वजह है कि गांव के सरकारी स्कूल मे प्राइमरी शिक्षा ग्रहण करते समय ही उनमें गाने के प्रति अभिरुचि होने लगी। हालांकि उनके परिवार में सुनील से पहले उनके ताऊ के बेटे वीरेंदर सिंह ने सबसे पहले हरियाणवी संस्कृति और नृत्य कला में हिस्सा लिया। परिवार में ऐसे माहौल को देख उनका शौंक भी कला और संस्कृति के क्षेत्र में बढ़ने लगा। जब वह महज 12 साल के थे तो उन्होंने अपनी लेखनी चलाई और पहली बार देशभक्ति का हरियाणवी गीत लिखा और फिर उस गीत को स्कूल में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में सुनाया। उनके खुद के लिखे गीत को सुनकर उनके लेखन और गायकी सबको पसंद आई और खूब सराहा गया। इससे उनका लेखन व गायकी के प्रति आत्मविश्वास बढ़ना स्वाभाविक था। इस बढ़ते मनोबल ने लोककला के क्षेत्र में उन्हें ऐसा प्रोत्साहन मिला कि उन्होंने इसके बाद लेखन और गायन को गति देना शुरु कर दिया। लोक कला व संस्कृति के क्षेत्र में उसके बाद उन्होंने बड़ी संख्या में हरियाणवी भजन और गीत लिखे और गांव के हर कार्यक्रम, कीर्तन और अन्य धार्मिक व सांस्कृतिक प्रोग्रामों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। बकौल सुनील बेरवाल उनकी आवाज को पसंद किया जाने लगा और वह देशभक्ति, सामाजिक, अध्यात्मिक तथा हास्य व्यंग्य गीतों का लेखन भी करने लगे। उनकी आवाज ने सभी कार्यक्रमों में दर्शकों व श्रोताओं को खूब लुभाया। अपनी स्कूली शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के दौरान वह संस्थानों में आयोजित होने वाले वार्षिकोत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लगातार हिस्सा लेते रहे और अपनी कला को निखारते रहे। इस दौरान उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन और गायी के अवार्ड भी मिले। 
यहां से मिली मंजिल 
लोक गायक सुनील बेरवाल ने बताया कि साल 2012 में उन्होंने एक ब्रेक के बाद गीत लेखन और गायन शुरु करके उसे ऐसी गति दी कि उनके गीतों और गायकी से इस क्षेत्र में उन्हें लोकप्रियता मिलने लगी। खासतौर से उन्होंने लेखन व गायकी के विस्तार में हास्य व्यंग्य गीतों के साथ अभिनय से लोगों के मनो को जीतकर उन्हें खूब आकर्षित किया। इस दौरान उन्होंने एक हास्य यानी कॉमेडी फिल्म बनाई, जिसे टेली फिल्म के रुप में बहुत ही ज्यादा चर्चित रही। लोककला के क्षेत्र में यह उनकी पहली टेली हास्य फिल्म थी, जिसमें उनकी हंसने की कला को सर्वाधिक पसंद किया गया। यही नहीं उनकी इस हास्य फिल्म को बेस्ट अवार्ड मिला और अनेक सांस्कृतिक मंचों पर भी उन्होंने हास्य व्यंग्य की कला का प्रदर्शन किया। उन्होंने बताया कि यह कटु सत्य है कि किसी भी क्षेत्र में उतार चढ़ाव जिंदगी का हिस्सा होता है। ऐसा उनकी कला में भी आया। मसलन पॉलीटेक्निक की पढ़ाई पूरी करने के बाद साल 2009 में उनके हरियाणवी गीतों का एक एलबम आया, लेकिन उसका प्रतिसाद यानी प्रत्युत्तर अच्छा नहीं रहा। इसका कारण था कि संगीत निर्देशक और कैमरामैन ने स्वार्थवश अच्छा काम नहीं किया और उससे एलबम बनाने के नाम पर काफी धनराशि हड़प कर ली। एक किसान परिवार का बेटा होने के नाते उनका ऐसा मनोबल टूटा कि मानसिक रुप से परेशान होने की वजह से दो साल तक लोक कला के क्षेत्र में कोई काम नहीं किया। गायक सुनील ने बताया कि इसके बाद मित्रों और परिवार के बढ़ाये गये हौंसले के बाद उन्होंने साल 2012 में फिर से अपना गीत लेखन और गायन शुरु किया, तो उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और वह अभी भी हरियाणवी संस्कृति और हरियाणवी बोली को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। 
संगीत कला की स्थिति नाजुक 
आधुनिक युग मे लोक कला और संगीत के सामने चुनौतियों को लेकर सुनील बेरवाल का कहना है कि इस सोशल मीडिया और व्यस्त जीवन के दौर में संगीत व कला की स्थिति नाजुक दौर में है। खासकर युवा पीढ़ी की लोक कला और संस्कृति के प्रति अभिरुचि बेहद कम है, इसका कारण पाश्चत्य संस्कृति और मोबाइल में उलझने के साथ द्विअर्थी लोक संगीत या अभिनय के आकर्षण युवाओं को सामाजिक और अपनी संस्कृति से दूर ले जा रहा है। आजकल युवाओं को कला के छोटे और ऑनलाइन प्लेटफार्म के फेर में पड़ी युवा पीढ़ी का सीधा प्रभाव समाज और संस्कृति को हाशिए पर ले जा रहा है। इसलिए लोक कलाकारों को द्विअर्थी लेखन या गायन को त्यागकर युवाओं को अभिनय और लोककला संगीत के लिए प्रेरित करना बहुत आवश्यक है। इसके लिए गांव से लेकर स्कूल व कालेज स्तर पर बच्चों को अपनी संस्कृति और संस्कारों से जुड़े कार्यक्रमों के प्रति प्रेरित करना आवश्यक है, तभी हम समाज को सकारात्मक विचाराधारा से जोड़े रख सकते हैं। 
19Aug-2024

शुक्रवार, 16 अगस्त 2024

साक्षात्कार: काव्यात्क शैली के अनूठे साहित्यकार त्रिलोक चंद फतेहपुरी

सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर साहित्य सृजन कर बनाई पहचान 
व्यक्तिगत परिचय 
नाम: त्रिलोक चंद फतेहपुरी 
जन्म तिथि: 04 अक्टूबर 1959 
जन्म स्थान: गांव फतेहपुर, जिला महेंद्रगढ़ (हरियाणा)
शिक्षा: एम.ए., बी.एड., पीएचडी 
संप्रत्ति: सेवानिवृता हिंदी प्रवक्ता, शिक्षा विभाग हरियाणा 
संपर्क: वार्ड नं.-29, गली -2 ,म. नं.- 1913 राव चिरंजी लाल कालोनी, हजारीवास, रेवाड़ी , हरियाणा। मोबा.-9992381001, ईमेल-sentrilokchand@gmail.com
 BY--ओ.पी. पाल 
साहित्यिक क्षेत्र के मूर्घन्य विद्वानों की नजर में साहित्य जगत में साहित्यकारों की हरेक विधा किसी कला से कम नहीं है। खासतौर से काव्यात्मक शैली में समाज के समक्ष अभिव्यक्ति को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ऐसी ही अनूठी कला में माहिर वरिष्ठ साहित्यकार त्रिलोक चंद फतेहपुरी ने अपनी कविताओं में सामाजिक बुराइयों और विसंगतियों पर करारा प्रहार करते हुए समाज को सकारात्मक संदेश देने का प्रयास किया है। ऐसा उनके रचना संसार में सामाजिक सरोकार और सामयिक मुद्दों का समावेश में साफतौर से देखा जा सकता है। हिंदी और हरियाणवी बोली में गद्य और पद्य शैलियों में साहित्य सृजन करते आ रहे साहित्यकार एवं कवि त्रिलोक चंद फतेहपुरी ने हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत के दौरान अपने साहित्यिक सफर को लेकर कई ऐसे पहलुओं को भी उजागर किया है, जिसमें उनकी काव्यात्मक शैली समाज को समर्पित रही हैं। 
हरियाणा के वरिष्ठ साहित्यकार त्रिलोक चंद का जन्म 04 अक्टूबर 1959 को महेन्द्रगढ़ जिले के गांव फतेहपुर में नंद राम और श्रीमती केशर देवी के घर में हुआ। उनके परिवार में कोई साहित्यिक माहौल तो नहीं था, लेकिन उनके पिता महाशय जी को गाने बजाने का शौक था। पिता का उन्हें हमेशा आशीर्वाद मिलता रहा। साल 1991 में वे रा.क.उ.वि. बाछौद में शिक्षक के पद पर कार्यरत थे, तो उन्होंने गुड़गांव ग्रामीण बैंक के ‘वृक्षारोपण कार्यक्रम’ में स्वयं की लिखी एक 16 पंक्तियों की बाल कविता पहली बार सुनाई। इस कविता की चर्चा उन्होंन अपनी पहली पुस्तक ‘ऐसी बेटी बण जाऊं’ में भी की है। उसके बाद उनका लेखन कार्य जारी रहा और अपनी लिखी कविताएं स्कूल में बच्चों के कार्यक्रम में ही पढ़ने लगे। जब उन्होंने 200 से अधिक कविताएं लिख ली, तो वह उन्हें छपवाना चाहता था, लेकिन एक शिक्षा अधिकारी ने उन्हें यह कहकर मना कर दिया कि विभाग की अनुमति के बिना वह पुस्तक नहीं छपवा सकते। इसलिए वह सेवानिवृत्त होने तक कोई पुस्तक नहीं छपवा सका और न ही कविता सुनाने के लिए उन्हें कोई मंच नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने ‘मुझे मंच पर आने दो’ शिर्षक से भी एक कविता लिख डाली। साल 2014 में इस कविता को उन्होंने अपने गुरुजी हास्य कवि हलचल हरियाणवी को सुनाई, जिससे वह प्रभावित हुए और उन्हें अपने साथ काव्य मंचों पर ले जाने लगे। उन्हीं के मार्ग दर्शन की वजह से वह एक मंचीय कवि बन गये। मसलन यहीं से उनका मंचों पर काव्य पाठ करने का सिलसिला आरंभ हुआ। इसके बाद अब तक देश के विभिन्न राज्यों व शहरों के अलावा उन्हें नेपाल के काठमांडू, विराटनगर और पोखरा में भी काव्य पाठ करने का मौका मिला है। उनके कविता लेखन और काव्य पाठ का फोकस बाल चरित्र निर्माण, सामाजिक समस्याएं, समाज सुधार, देशभक्ति, राष्ट्र प्रेम, महान व्यक्तित्व, प्रकृति चित्रण,तीज-त्यौहार और हास्य व्यंग्य पर रहा है। वहीं गुरु हलचल हरियाणवी के ही मार्ग दर्शन से उनकी पुस्तकें भी प्रकाशित होने लगी और अब तक उनकी पाठकों के समक्ष 16 पुस्तकें आ चुकी हैं। उनकी कविताएं देश के पत्र पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हो रही हैं। उन्हें आकाशवाणी व दूरदर्शन से काव्य पाठ तथा लघु कथा वाचन करने के भी मौके मिल रहे हैं। 
आधुनिक युग में साहित्य की स्थिति चिंताजनक
आधुनिक युग में साहित्य सृजन की स्थिति को लेकर त्रिलोक चंद फतेहपुरी का कहना है कि अनेक विषयों को लेकर गद्य व पद्य दोनों विधाओं में खूब साहित्य लिखा जा रहा है और साहित्य सृजन आज उच्च पराकाष्ठा पर है। उनका कहना है कि कोरोना काल के बाद तो लेखकों और कवियों की बाढ़ सी आ गई। गद्य लेखन की बजाय पद्य विद्या में ज्यादा लेखन हो रहा है। इसके चलते नाटक, उपन्यास, निबंध, कहानी, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत आदि के लेखन की गति कम नजर आ रही है। उनके विचार से साहित्य के पाठक बहुत कम हो हुए हैं, खासकर युवा पीढ़ी पुस्तक पढ़ने में रुचि नहीं रही। इसका कारण अधिकतर लेखक युवाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण अपना रहे हैं यानी ऐसे लेखक दोषों और कमियों को तो उजागर कर रहे हैं, लेकिन उनके गुणों का बखान करना भूलते जा रहे हैं। इस नकारात्मक लेखनी का असर युवाओं पर पड़ना स्वाभाविक है। आज के इस इंटरनेट युग में युवा पीढ़ी साहित्य पढ़ने की बजाय कंप्यूटर इंटरनेट व सोशल मीडिया पर व्यस्त रहने लगे हैं। इसी वजह से युवा पीढ़ी के निर्लज्ज, बेलगाम, अकर्मण्य, कर्तव्य पथ से विचलित और संस्कारहीन और दिशाहीन होने का समाज पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। जबकि समाज और अपनी संस्कृति को जीवंत रखने के लिए युवाओं को साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करने की ज्यादा जरुरत है। इसके लिए पुस्तकालय खोले जाएं जहां अच्छा साहित्य पढ़ने के लिए होना चाहिए। 
प्रकाशित पुस्तकें 
हरियाणा के साहित्यकार एवं कवि त्रिलोक चंद सेन की अभी तक 16 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें प्रमुख रुप से हरियाणवी बाल कविता संग्रह ऐसी बेटी बण जाऊं, बाल कविता संग्रह वाह! भारत की बेटियां, हरिवाणवी कविता संग्रह मुझे मंच पर आने दो, यो सै म्हारा हरियाणा, झलक हरियाणे की, डंडे की फटकार, दोहा संग्रह त्रिलोकी सतसई, हरियाणवी कहानी-किस्से घंटू के कारनामें व बदलू का ब्याह, कुंडलियां संग्रह खुली ढोल की पोल, यात्रा संस्मरण काठमांडू का आनंद तथा उत्कल दर्शन, चंपू संग्रह मांडू का सफ़र व कयामत का दौर, गद्य और पद्य महिमा लालदास की तथा हरियाणवी अनुवाद आधुनिक भारत निर्माण म्हॅं सतगुरु कबीर का योगदान शामिल हैं। इसके अलावा ये हीरे हिंदुस्तान के, गीत वतन के गाएं, रतनपुर की महामाया, घनाक्षरी छंद की छटा, मेरे मुक्तक, सैर सपाटा नेपाल का, महकता बचपन, हरियाणा के ठाठ बाट, अभागा घंटू और पड़ोसी नामा शीघ्र ही पाठकों के समक्ष आने को तैयार हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला से कोई पुरस्कार नहीं मिला है।
पुरस्कार एवं सम्मान 
साहित्यकार एवं कवि त्रिलोक चन्द फतेहपुरी को साहित्य सृजन में उत्कृष्ट योगदान के लिए अब तक सैकड़ो पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। उन्हें नेपाल भारत साहित्य महोत्सव काठमांडू के अंतर्राष्ट्रीय साहित्य सम्मान, राष्ट्रीय शिक्षा गौरव शिखर सम्मान, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान, लता मंगेशकर स्मृति सम्मान, स्वर साधना साहित्य सम्मान, हिंदी गौरव सम्मान, काव्य गौरव सम्मान, निराला सम्मान, हरियाणा स्मृति सम्मान, हरियाणवी काव्य साधक सम्मान, साहित्य सुमन एवं साहित्यश्री सम्मान, शब्द श्री सम्मान, कलमवीर सम्मान, निराला सम्मान, हस्तलिपि लिखावट सम्मान, राष्ट्र प्रेमी सम्मान, काव्य सुमन सम्मान, काव्य मेधा सम्मान, सूर्य साहित्य रत्न सम्मान, पर्यावरण संरक्षक सम्मान, ऋचा स्मृति सम्मान, भारत माता अभिनंदन सम्मान, शौर्य सम्मान, साहित्य गौरव सम्मान, भारतीय श्री सम्मान, हिंदी साहित्य शिरोमणि सम्मान प्रमुख रुप से शामिल हैं। इसके अलावा उन्हें साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा मंचों पर सम्मानित किया जा चुका है। 
12Aug-2024

सोमवार, 5 अगस्त 2024

चौपाल:हरियाणवी लोक संस्कृति के संवर्धन में जुटे गीतकार समुन्द्र सिंह

गीत, रागनी, भजन, गजल, कथा लेखन में भी बनाई पहचान 
        व्यक्तिगत परिचय 
नाम: समुन्द्र सिंह पंवार 
जन्मतिथि: 06 जुलाई 1976 
जन्मस्थान: गांव बहलबा, रोहतक (हरियाणा) 
शिक्षा: स्नातक, स्नातकोत्तर (हिन्दी) एवं आशुलिपि लेखक 
संप्रति: गीतकार, लेखक, सम्पादक, साहित्य-रचना इ पत्रिका 
सम्पर्क:गांव बहलबा, रोहतक (हरियाणा)। मोबा.9812879328/8685995928, ईमेल-samundersingh328@gmail.com 
By-ओ.पी. पाल 
हरियाणा की लोक कला और संस्कृति को समृद्ध बनाए रखने के लिए लोक कलाकारों, गीतकारों, गायकों ने अपनी कला के हुनर से देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी डंका बजाया है। लोक कला के क्षेत्र में सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर ऐसे ही समर्पित गीतकार एवं लेखक समुन्द्र सिंह पवार ने हरियाणवी लोक संस्कृति के संवर्धन के लिए अपनी पहचान बनाई है। उन्होंने कलाकारों व गायकों के लिए समाज में फैली कुरीतियों के साथ ही किसान, जवान, मजदूर, और महिलाओं की समस्याओं को उजागर करने वाले गीत, रागनी, भजन, गजल और कथाओं जैसे लेखन से लोक कला के क्षेत्र में अहम योगदान दिया है। एक गीतकार एवं लेखक के रुप में लोक कला-साहित्य के सफर को लेकर समुन्द्र सिंह ने हरिभूमि संवाददाता से बातचीत के दौरान कई ऐसे पहलुओं का जिक्र किया है, जिसमें उनका मकसद समाज को अपनी संस्कृति से जुड़े रहने के लिए सकारात्मक संदेश रहा है। ---- 
हरियाणा लोक गीतकार और लेखक समुन्द्र सिंह पंवार का जन्म 06 जुलाई 1976 को रोहतक जिले के गांव बहलबा में जबर सिंह और श्रीमती राजबाला देवी के घर में हुआ। उनके साधारण एवं कृषक परिवार का गीत, संगीत, अभिनय और साहित्य जैसी लोक कलाओं से कोई भी नाता नहीं था। लेकिन समुन्द्र सिंह को बचपन से ही भजन और रागनी सुनने और लिखने का शौक रहा है। उनका यह शौंक परिजनों को रास नहीं आया और कहते थे कि यह लाइन अच्छे लोगों का काम नहीं और न ही हमें यह शोभा देता है, क्योंकि गाने बजाने का काम मिरासियों का काम होता है। परिजन उसे हमेशा पढ़ाई पर ध्यान देने की दुहाई देते रहे। समुन्द्र सिंह ने अपनी आरम्भिक शिक्षा अपने गांव के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की और बाहरवीं जाट स्कूल रोहतक से उतीर्ण की। उन्होंने स्नातक की डिग्री राजकीय महाविद्यालय महम से हासिल की। लोककला व साहित्य के प्रति विशेष रुचि के चलते उन्होंने महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी रोहतक से हिंदी में स्नातकोत्तर किया। उन्होंने बताया कि 1996 में उनकी लिखी गई रागनियों की ‘ना जोबन बसका’ शीर्षक से पहली कैसेट रिलीज़ हुई, जिसे श्रोताओं ने बहुत ही पसंद किया। इसलिए उनका ऐसा आत्मविश्वास बढ़ा कि उन्होंने उसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनके ‘ताऊ देवीलाल की श्रद्धाजलि’ नामक कैसेट ने तो उन्हें लेखक और गीतकार के रुप में पूरे हरियाणा में लोकप्रिय कर दिया। उनके गीत व रागनी लेखन को भी बहुत पसंद किया गया। उनके गुरु कमल सिंह के प्रोत्साहन की वजह से अब तक उनके रचित गीतों के कैसेट के जमाने से लेकर सीडी, डीवीडी और अब यूट्यूब के युग में उन्हें लोक कला के क्षेत्र में बड़ी पहचान मिली है। यही नहीं लोक कला के क्षेत्र में उनके काव्य कोष, भजन माला, हरियाणवी ग़ज़ल संग्रह चांदना और रौनक, काव्य संग्रह बासन्ती अंदाज, काव्य पथ तथा काव्यवाणी पर साझा काव्य संग्रह, प्रेरणा, प्यारी मां, मर्यादा पुरुषोत्तम राम, रामदूत हनुमान और शिव महिमा आदि भी पसंद किये गये। उनकी लेखनी हमेशा समाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर चली है। उनकी कविता, गजल, गीत, भजन, लेख, लघुकथा, कहानी आदि रचनाएं देश के विभिन्न पत्र व पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। वहीं उनके गीत और भजन अकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारित हुए हैं। 
पुरस्कार व सम्मान 
हरियाणवी लोक कला के क्षेत्र में भजन, रागनी और गीत और गजल लेखन में उन्हें अनेक पुरस्कारों व सम्मान से नवाजा जा चुका है। इनमें प्रमुख रुप से उनहें सर्वश्रेष्ठ गीतकार, साहित्य रचना सम्मान, नव सृजन सम्मान, काव्य गौरव सम्मान तथा हिंदी सेवी सम्मान भी मिल चुका है। इसके अलावा साहित्यिक और सांस्कृतिक मंचों पर भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। 
दम तोड़ने के कगार पर लोककला 
आज के आधुनिक युग में लोक कलाओं के सामने चुनौतियों को लेकर समुन्द्र सिंह का कहना है कि इस युग में लोक कलाएं लगभग खत्म होने के कगार पर हैं, जिसकी वजह से कलाकार आर्थिक तंगी का सामना करने को भी मजबूर है। खासतौर से ग्रामीण क्षेत्रों के कलाकारों मान सम्मान तक नहीं मिल रहा है। इसका कारण युवाओं के लोक कलाओं से दूर होना है, जो इंटरनेट व सोशलमीडिया पर मनोरंजन के साधन खोज लेते हैं। ऐसा ही हाल साहित्य का भी है, जिसके लेखन में भी गिरावट आ रही है और अच्छा साहित्य पढ़ने में पाठक रुचि कम ले रहे हैं। हालांकि संगीत के क्षेत्र में रुचि रखने वाले युवाओं ने अच्छी पहचान भी बनाई है। आधुनिक युग में बदलते परिवेश में लोककला, अभिनय, रंगमंच में बदलाव हुए हैं, जिसमें गिरावट महसूस की जाती है। मसलन इस युग में गीतकार और संगीतकार वहीं परोस रहे है, तो श्रोता पसंद करते हैं। शायद यही कारण है कि उनके खुद तैयार किये गये गीत शिक्षाप्रद साबित हुए हैं, लेकिन श्रोताओं व पाठकों को पसंद नहीं आये। इसका कारण साफ है आज के इस युग में लोग शिक्षा नहीं, मनोरंजन ज्यादा पसंद कर रहे हैं। यही कारण है द्विअर्थी गीत संगीत से लेखक व गीतकार जल्द से जल्द लोकप्रिय होना चाहते हैं। लेकिन यह समाज को सकारात्मक संदेश न देकर उस पर कुप्रभाव साबित होता नजर आ रहा है। इसलिए लेखकों, गीतकारों और संगीतकारों का भी कर्तव्य है कि वे ऐसी कला का प्रदर्शन करे जिससे समाजिक, सांस्कृतिक और सभ्यता का संवर्धन करने में सहायक सिद्ध हो सके। 
05Aug-2024

सोमवार, 29 जुलाई 2024

साक्षात्कार: साहित्य सृजन से समाज को सकारात्मक संदेश देते बलदेव राज भारतीय

कहानीकार, व्यंग्यकार लेखक के रुप में साहित्य क्षेत्र में बनाई पहचान 
        व्यक्तिगत परिचय 
नाम: बलदेव राज भारतीय 
जन्मतिथि: 22 दिसंबर 1971 
जन्म स्थान: गांव असगरपुर (यमुनानगर) 
शिक्षा: एम.ए. (इतिहास, हिंदी) बी.एड. 
संप्रति: इतिहास प्रवक्ता एवं स्वतंत्र पत्रकार
संपर्क: गाँव असगरपुर, डाकघर सालेहपुर, तहसील साढौरा, जिला यमुनानगर(हरियाणा)। मोबाइल: 8901006901, 8930306901, Email: brbhartiya@gmail.gmail.com 
 BY-ओ.पी. पाल 
साहित्य जगत में साहित्यकारों, शिक्षाविदो एवं मूर्घन्य विद्वानों का विभिन्न विधाओं में जिस प्रकार से साहित्य सृजन किया जा रहा है, उसका सामाजिक क्षेत्र में सभ्यता, संस्कृति, रीति रिवाज और संस्कारों के संवर्धन में अहम योगदान है। ऐसे ही साहित्यकारों में शुमार बलदेव राज भारतीय सामाजिक, अध्यात्मिक, शैक्षणिक और विभिन्न सामयिक परिदृश्यों पर अपनी लेखनी चलाते हुए भारतीय संस्कृति और संस्कारों का संवर्धन करने में जुटे हुए हैं। उनके साहित्य सृजन में कविता, गीत, कहानियां, लघुकथाएं और व्यंग्य लेखों में मर्मस्पर्शी और हालातों पर चिंतन के साथ उनके सुधारने की दिशा में सकारात्मक संदेश की भी झलक नजर आती है। हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में शिक्षाविद् एवं साहित्यकार बलदेव राज भारतीय का स्पष्ट मत रहा कि उनके साहित्यिक सफर में उनका हमेशा सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दो पर किसी न किसी विधा में समाज को सकारात्मक विचारधारा का संदेश देने का प्रयास रहा है। 
हिंदी साहित्यकार बलदेव राज भारतीय का जन्म 22 दिसंबर 1971 को हरियाणा राज्य के जिला यमुनानगर (तत्कालीन जिला अंबाला, तहसील नारायणगढ़) के शिवालिक की तलहटी में बसे एक छोटे से गांव असगरपुर में मुकंदी लाल और श्रीमती शांति देवी के घर में हुआ था। उनके पिता हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग में एक अध्यापक थे। बचपन में पिता रामायण और महाभारत से संबंधित कहानियां सुनाते रहते थे, जिसका प्रभाव मेरे मानस पटल पर अंकित हो गया। परिवार की पृष्ठभूमि बेशक साहित्यिक नहीं थी, परन्तु बचपन से ही घर में हिंदी समाचार पत्र आया करते थे, जिनमें छपी कहानियों को अकसर वह पढ़ा करते थे। ऐसे पढ़ते-पढ़ते उन्हें लेखन के प्रति रुचि कब जागृत हो गई, मुझे पता ही नहीं चला। बलदेव राज की प्राथमिक शिक्षा निकटवर्ती गांव झंडा की राजकीय प्राथमिक पाठशाला में हुई, तो मैट्रिक तक राजकीय उच्च विद्यालय सालेहपुर से शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने उच्च शिक्षा यमुनानगर के प्रतिष्ठित कॉलेज मुकंद लाल नेशनल कॉलेज में ग्रहण की। जबकि सोहन लाल एजुकेशन कॉलेज अंबाला शहर से बी.एड. और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से प्राइवेट विद्यार्थी के तौर पर स्नातकोत्तर की परीक्षा पास की। बलदेव की लेखन के प्रति रुचि विद्यार्थी काल से ही रही। साहित्यकार बलदेव ने सितंबर 2006 से अतिथि अध्यापक के तौर पर राजकीय प्राथमिक विद्यालय ठसका सढौरा में कार्य शुरु किया। इसके बाद और अगस्त 2019 से इतिहास पीजीटी (शिक्षक) के रुप में कार्य शुरु किया। आजकल वह में पीएमश्री राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय सालेहपुर में इतिहास पीजीटी के रूप में कार्यरत हैं और साथ ही वह स्वतंत्र पत्रकारिता भी करते हैं। बकौल बलदेव राज उन्होंने आरंभ में कविता लिखना शुरु किया, तत्पश्चात कहानी लिखने लगे और लेखन की इस करवट ने उन्हें व्यंग्य की ओर भी मोड़ दिया और इसलिए व्यंग्य ने भी उनके मस्तिष्क में अपना स्थान बनाया। बलदेव की पहली रचना के रुप में उन्होंने साल 1991 में भारत माता को समर्पित एक कविता लिखी थी। 1993 में जब उनके बड़े भाई की मृत्यु हुई, तो भाई को समर्पित ‘दर्द’ शीर्षक नामक एक गीत लिखा। हालांकि वह आरंभिक अवस्था में अपने लेखन को गति नहीं दे पाए, लेकिन 1998 में ‘अपराध बोध’ नाम से एक छोटी सी कहानी लिखी, जो एक पंजाब केसरी के कहानी संस्करण में प्रकाशित हुई, तो उनके लेखन को पंख लगने लगे। इसके बाद उनके लेख, कहानियां, व्यंग्य, लघुकथाएं देश के प्रतिष्ठित समामचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे। लेकिन वह व्यक्तिगत रूप से एक बेरोजगार होते हुए कभी किसी पुस्तक को प्रकाशित करवाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। इस बीच लेखन में शिथिलता भी आ गई। परन्तु साहित्यिक मित्रों ने ऐन मौके पर इस शिथिलता को तोड़ा, जिनके प्रयास से साल 2018 में हरियाणा साहित्य अकादमी के द्वारा मेरे प्रथम कहानी संग्रह ‘निमंत्रण पत्र’ के लिए अनुदान मिला। उनकी रचनाएं जहां सामाजिक पारिवारिक ताने बाने में उच्च आदर्श मूल्यों के ह्रास को उद्धृत करती हैं, वहीं इन मूल्यों की पुनर्स्थापना का प्रयास करती हैं। बलदेव राज का मानना है कि साहित्य का काम केवल समाज की खामियों को गिनाना नहीं, अपितु एक अच्छे समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करना भी है। 
आधुनिक युग में बढ़ा साहित्य सृजन का पैमाना 
आधुनिक युग में साहित्य के हर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सृजन हो रहा है। परन्तु गुणवत्ता में कहीं न कहीं गिरावट महसूस की जा रही है। आज साहित्य नहीं, बल्कि साहित्यकार बोलता है। जो अपनी पुस्तक की जितनी अच्छी पब्लिसिटी कर लेता है, उसकी पुस्तक उतनी अधिक चर्चित हो जाती है। यहां तक कि कई साहित्यकार पब्लिसिटी के लिए ओछे तरीके भी अपनाते हैं। वे अपनी पुस्तकों में विवादित विषय डाल देते हैं और प्रेस में उसके लिए बयान भी दे देते हैं। जिससे पाठकों की उत्सुकता उस पुस्तक के विषय में बढ़ जाए। आज लिखे हुए साहित्य को पढ़ने का समय युवा पीढ़ी के पास नहीं है। मोबाइल के इस युग में युवा पीढ़ी की रुचि साहित्य के प्रति कम होती जा रही है। युवाओं को पुस्तकालयों के माध्यम से साहित्य के प्रति जागरूक किया जा सकता है। अच्छा साहित्य अच्छे समाज का निर्माण करता है। स्कूलों में विद्यार्थियों को साहित्य के प्रति जागरूक करके हम युवाओं की रुचि को साहित्य के प्रति जागृत कर सकते हैं। 
प्रकाशित पुस्तकें 
साहित्यकार बलदेव राज ने विभिन्न विधाओं में साहित्य सृजन किया है। अब तक उनकी प्रकाशित पुस्तकों में प्रमुख रुप से कहानी संग्रह ‘निमंत्रण-पत्र’, कविता संग्रह ‘अधूरी-कविता’, व्यंग्य संग्रह ‘कुछ उरे परे की’, लघु कविता संग्रह ‘संवेदना के स्वर’ प्रमुख हैं। जबकि 1998 से उनकी कविताएं, व्यंग्य, कहानियां और सामयिक लेख देश के विभिन्न समाचार-पत्र पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होते आ रहे हैं। 
पुरस्कार व सम्मान 
विश्व हिंदी सचिवालय मॉरीशस और सृजन ऑस्ट्रेलिया अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका की ओर से अंतर्राष्ट्रीय अटल काव्य लेखन प्रतियोगिता 2020 में प्रशस्ति पत्र, मुंबई प्रकाशित प्रवासी संदेश द्वारा आलेख लेखन के लिए प्रशस्ति पत्र, साहित्य सागर एवं सत्यम प्रकाशन की ओर से मुक्तक लहरी सम्मान, श्री राम नाट्य एवं लेखन मंडल नाहन की ओर से साहित्य रत्न सम्मान मिला है। हरियाणा प्रादेशिक लघुकविता मंच सिरसा की ओर से लघु कविता सेवी सम्मान 2023 तथा वर्चुअल प्लेनेट प्रोडक्शन प्रा लि. की ओर से लघुकविता सृजन सम्मान 2023 से सम्मानित किया गया। वहीं पिछले साल सिरमौर कला साहित्य संगम द्वारा डॉक्टर परमार पुरस्कार से नवाजते हुए सम्मानित किया गया है। 
29July-2024

सोमवार, 22 जुलाई 2024

चौपाल: समाज में लोक कला-संस्कृति की अलख जगाते खूबराम सैनी

हिंदी व हरियाणवी फिल्मों व रंगमंच पर एक अभिनेता के रुप में बनाई पहचान 
                    व्यक्तिगत परिचय 
नाम: खूबराम सैनी 
जन्मतिथि: 21 दिसंबर 1971 
जन्म स्थान: रेवाडी ( हरियाणा ) 
शिक्षा: स्नातक 
संप्रत्ति: अभिनय, रंगमच, 
संपर्क: 396/17, अंबेडकर चौक रेवाड़ी(हरियाणा), मोबा. 9034034101 
BY-- ओ.पी. पाल 
हरियाणवी लोक कला एवं संस्कृति के संवर्धन के लिए सूबे के लोक कलाकार और संस्कृतिकर्मी फिल्मों और रंगमंच या अन्य सांस्कृतिक मंचों पर अपनी कला का हुनर दिखाते आ रहे हैं। लोक कलाकार एवं अभिनेता खूबराम सैनी ने सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है, जो हिंदी और हरियाणवी फिल्मों तथा रंगमंच पर अपनी कला के हुनर के जरिए हरियाणवी संस्कृति की अलख जगाने में जुटे हुए हैं। हिंदी व हरियाणवी फिल्मों और नाटकों के मंचन में मुख्य किरदार में उन्होंने सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों को उजागर करते हुए सामाजिक विसंगतियों को उजागर करके सामाजिक चेतना जागृत करने का प्रयास किया है। फिल्मों व रंगमंच के कलाकार खूबराम सैनी ने हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में अपने तीन दशक के अभिनय और रंगकर्मी के सफर को लेकर कई ऐसे अनुछुए पहलुओं का जिक्र किया है, जिसमें कला के माध्यम से अपनी सभ्यता और संस्कृति के प्रति समाज को नई दिशा देना संभव है। 
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हरियाणा के लोक कलाकार एवं अभिनेता खूबराम सैनी का जन्म 21 दिसंबर 1971 को रेवाडी जिले में एक साधारण परिवार में रघुनाथ सैनी और श्रीमती रामबाई देवी के घर में हुआ। परिवार में धार्मिक माहौल के बीच उनके बड़े भाई को भजनों में बेहद रुचि थी, जिन्हें भजन गाते हुए वह बचपन में एक कलाकार बनने का सपना देखते थे। इसलिए खूबराम कोई भी कार्यक्रम देखते थे तो वह ऐसे कार्यक्रमों में अभिनय करने की अभिलाषा उनके मन में बसती चली गई। हालांकि बचपन में रंगमंच का कोई अनुभव नहीं मिल सका, लेकिन जब वह कालेज में शिक्षा ग्रहरण करने पहुंचे तो साल 1989 मे वह बंजारा ग्रुप के सम्पर्क में आया और पहली बार हास्य नाटक ‘वाह भई धारे’ मे एक छोटा यानी पीए का किरदार निभाने का मौका मिला। तभी से वह इस ग्रुप से जुड़े हुए हैं और अनेक नाटकों में छोटे और बड़े अनेक किरदार के रुप में अभिनय करते आ रहे हैं। सर्वश्रेष्ठ हास्य नाटक का पुरस्कार हासिल कर चुके सांस्कृतिक बंजारा ग्रुप के बहु चर्चित हरियाणावी हास्य नाटक ‘जै सुख तै चहावै जीवणा तो भौदू बणकै रह’ मे मुख्य अभिनय की भूमिका निभाते आ रहे खूबराम सैनी अब तक 72 शो कर चुके हैं। इसके अलावा उन्हें अनेक हिन्दी व हरियाणावी फीचर फिल्मों और टीवी सीरियलों में भी अभिनय करने का मौका मिला है। उनके नाटकों का मुख्य फोकस सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर रहा है, ताकि समाज में सकारात्मक संदेश के जरिए लोक संस्कृति को जीवित रखने के लिए समाज में विचाराधारा का संचार किया जा सके। 
यहां से मिली मंजिल 
लोक कलाकार खूबराम सैनी का कहना है कि सामाजिक और देशभक्ति व अध्यात्मिक नाटकों में उन्हें जब पहली बार हरियाणावी हास्य नाटक ‘जै सुख तै चहावै जीवणा तो भौदू बणकै रह’ में मुख्य किरदार का मौका मिला तो उसे सराहा जाने लगा और उसके बाद उन्हें बचपन में संजोए गये सपने पूरे होते नजर आने लगे। इसके बाद गिरगिट, अन्त हिन अंत, कोर्ट मार्शल, बेपैदी का लौटा, स्वर्ग का पासपोर्ट, अग्रनरेश, मातृशक्ति, शहीदों ने लो जगाई जो, महाभोग तथा संक्रामक जैसे नाटकों में अभिनय करके मुख्य किरदार की भूमिका निभाई है। साल 1995 मे रामनगर नैनीताल मे ‘हास्य नाटक "जै सुख तै चहावै जीवणा तो भौदू बणकै रह’ को प्रथम पुरस्कार मिला है। खूबराम सैनी को उनके अभिनय के लिए अनेक मंचों से कई सम्मान भी मिल चुके हैं। यही नहीं सैनी ने सरकार के प्रायोजित प्रौढ़ शिक्षा, दहेज प्रथा उन्मूलन एवं साहित्यिक जैसे कार्यक्रमों में समाज को नई दिशा देने में अपनी कला का प्रदर्शन किया है। 
इन फिल्मों ने बनाया कलाकार 
हरियाणा की लोक कला और संस्कृति के दर्शन कराती दूसरी लडकी में उन्होंने मुख्य अभिनेता का किरदार निभाया है। अरुण जेटली द्वारा निर्देशित एक रोटी ओर तथा अमेरिका में होता होगा के अलावा सामाजिक और परिवारिक पृष्ठभूमि पर आधारित यशवंत चौहान की निर्देशित हरियाणवी फिल्म पीहर की चुंदडी और परिवारिक फिल्म कुनबा में भी अभिनय किया, जिसके फोकस में आज के युग में बढ़ते एकल परिवार की परंपरा के लिए बनी उस चिंता का परिदृश्य फिल्माया गया है, जिसमें बिगड़ते जा रहे सामाजिक ताना बाना के बीच आज के युवा अपने माता पिता का बुढ़ापे का सहारा बनने के बजाए धन और शौहरत पाने के लालच में उन्हें वृद्धाश्रम में भेजना अपनी शान समझते हैं। वहीं फिल्म अभिनेता और निर्देशक विजय भटोटिया की लघु फिल्म चंदा में भी उनकी भूमिका को सराहा गया है। वहीं उनकी टीवी सीरियल सबक फॉर डीडी में अभिनय के साथ सहायक निर्देशक की भूमिका भी निभाई है। इसके अलावा अशोक तलवार के निर्देशित टीवी सीरियल में वेद कान्या में भी किरदार करके अपनी कला को दिशा दी है। 
लोक संस्कृति को जीवंत करना जरुरी 
लोक कलाकार खूबराम सैनी का मानना है कि इस आधुनिक युग में लोक कला एवं संस्कृति को बचाने के लिए लोक कलाकारों के सामने चुनौतियां हैं, कयोंकि समाज में खासकर युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक और लोक कला से दूर होती नजर आ रही है। इसका सबसे बड़ा कारण मोबाइल और सोशल मीडिया है। इसका असर सीधा रंगमंच और थिएटर पर पड़ रहा है, जहां आज का युवा कलाकार भी रंगमंच या थिएटर में समय बर्बाद होने की दुहाई देकर अपना स्वार्थ देख रहा है और वह सीधे फिल्म और टीवी में जाना चाहता है। आज के युग में पाश्चत्य संस्कृति का भी हमारे समाज पर यह असर पड़ता है, जिसकी वजह युवा पीढ़ी सामाजिक रीति रिवाज़ो और संस्कृति को भूलती जा रही है। अपनी संस्कृति को बचाने के लिए रंगमंच और थिएटर को जीवित रखने के लिए रंगकर्मियों और कलाकारों को आगे आने की ज्यादा जरुरत है। 
  22July-2024

सोमवार, 15 जुलाई 2024

साक्षात्कार: लोक साहित्य सृजन से संस्कृति के उत्थान में जुटी सविता गर्ग ‘सावी’

लोक कला व साहित्य के क्षेत्र में लेखन व गायन से बनाई पहचान 
              व्यक्तिगत परिचय 
नाम: सविता गर्ग ‘सावी’ 
जन्मतिथि: 3 अप्रैल 1983 
जन्म स्थान: गांव नगूरा, जींद(हरियाणा) 
शिक्षा: स्नातक डिग्री(जन प्रशासन) 
संप्रत्ति: समाज सेविका, गायिका, स्वतंत्रत लेखन
संपर्क:895,सेक्टर-7,पंचकूला(हरियाणा), मोबा.9501167168 
BY--ओ.पी. पाल 
हरियाणा की संस्कृति और संस्कारों की विरासत को संजोने के मकसद से लेखक, साहित्यकार, लोक कलाकार, गायक अपनी कला के हुनर से समाजिक उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। समाज सेवा में सक्रीय ऐसी ही लेखिका सविता गर्ग लोक साहित्य और कला जैसे क्षेत्र में हिंदी और हरियाणवी दोनों भाषाओं में लेखन और गायन के माध्यम से हरियाणवी सभ्यता और संस्कृति का संवर्धन करने में जुटी हुई हैं। भगवान कृष्ण को ईष्ट गुरु मानकर लोक साहित्य के क्षेत्र अपनी पहचान बनाने वाली लेखक, कवयित्री, गीतकार, गायिका सविता गर्ग ‘सावी’ ने हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में कई ऐसे अनछुए पहलुओं को उजागर किया, जिसमें साहित्य और लोक कला ही समाजिक सभ्यता और संस्कार के प्रति सकारात्मक ऊर्जा के साथ समृद्ध संस्कृति को जीवंत करने में सक्षम है। 
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लोक साहित्य के क्षेत्र में हरियाणा की लोक गायिका, कवयित्री और गीतकार सविता गर्ग का जन्म 3 अप्रैल 1983 को जींद के नगूरा गांव में व्यवसायी राम रत्न गोयल के घर में हुआ। माता जी गृहणी है और घर का माहौल धार्मिक व संस्कारिक रहा। उनकी मां बहुत अच्छा गाती है, जिनके गुण हम चारों भाई बहनों में हैं। बचपन में मां को भजन गुनगुनाते और गाते हुए सुना और उनके साथ गाते गाते कई भजन याद हो गये। बकौल सविता गर्ग जब वह आठ साल की थी तो उनके मामा उन्हें अपने साथ अपने गांव जाजनवाला ले गए और मेरी पढ़ाई वहीं हुई। नाना के घर भी वैसा ही माहौल मिला। वह जिस स्कूल में पढ़ती थी, वहां के हेड मास्टर पंजाब सिंह ने उन्हें गाते सुना तो स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम में गाने के लिए प्रेरित किया। इससे बालमन बड़ी बड़ी आशाओं से भर गया, जिसके बाद बहुत सारे कार्यक्रमों में नृत्य और गायन दोनों किया। बचपन से ही खासकर कविताएं और कहानियां पढ़ने का शौंक था। कोई कागज का लिखा हुआ लिफाफा बहुत सावधानी से खोलकर वह कागज़ के लिफाफों पर लिखी कहानियां भी पढ़ती थी। जहां कहीं कोई कागज़ का टुकड़ा मिलता, बस उसे खोलती और पढ़ती। उस वक्त साहित्य के बारे में तो कुछ भी नहीं जानती थी। वह ग्यारहवीं कक्षा में थी, तो सौभाग्य से वृंदावन जाना हुआ और बस वहीं से जीवन में एक ऐसा मोड़ आया कि घर आने के बाद बार बार वृंदावन जाने का मन करता था, लेकिन संभव नहीं था। मन के इस द्वंद्व में कब कलम हाथ में आई और पता ही नहीं चला, जो उसने लिखा है वह एक बहुत अच्छा भजन बन गया और उसके लेखन के केंद्र में कृष्ण कन्हैया ही थे। स्कूल की मैगजीन और उसके बाद कॉलेज की मैगजीन में मेरी छोटी छोटी रचनाएं प्रकाशित हुई। उन्होंने इसके अलावा दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, नारी उत्पीड़न, और भी कई विषयों पर कविताएं लिखी। सौभाग्य से एक बार उनके कॉलेज में जींद के जाने माने साहित्यकार राजेंद्र मानव गोष्ठी के उद्देश्य से आए, जिनके सामने उन्हें भी कविता पढ़ने का अवसर मिला, जिसे खूब सराहा गया। इसके बाद उन्हें गोष्ठियों में मंच पर गाने का निमंत्रण मिले, जहां से उनकी साहित्यिक गतिविधियां सार्वजनिक हुई। साहित्य और लोककला के क्षेत्र में उतार चढ़ाव भी एक जीवन का हिस्सा होता है। कुरुक्षेत्र में यूथ फेस्टिवल में पहली बार प्रस्तुति के लिए उसकी हरियाणवी नृत्य और गायन की तैयारी थी, लेकिन पिता ने जाने से इंकार कर दिया। पाबंदी की वजह से पहली बार यूथ फेस्टिवल में प्रस्तुति देने का अवसर खोना पड़ था। मन बहुत उदास था, लेकिन सर के समझाने पर भी पापा नहीं माने, तो ऐसे में मां उनका सहारा बनी और इस आयोजन में उनकी दोनों प्रस्तुतियां शानदार रही। सूबे की मां बोली हरियाणवी में लेखन और गायन उनका फोकस कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, के अलावा देश प्रेम, भाईचारा, संस्कृति अध्यात्मिक पर रहा है। अभी तक उनके 17 हिंदी और हरियाणवी भजन रिलीज हो चुके हैं। पंचकूला में उनके व्यवसायी पति पवन गर्ग भी उनके लोक साहित्य क्षेत्र में सहयोग दे रहे हैं। जन प्रशासन में स्नातक डिग्री प्राप्त महिला साहित्यकार और लोक गायिका सविता गर्ग राष्ट्रीय कवि संगम पंचकूला इकाई की अध्यक्ष होने के साथ ही साहित्य 24 संस्था की हरियाणा राज्य की अध्यक्ष भी हैं। इसके अलावा अनेक देश व राज्यों की विभिन्न संस्थाओं से जुड़ी सविता सोशल मीडिया के अनुक साहित्यिक पटलों पर आजीवन सदस्य के रुप में सक्रीय भूमिका निभा रही हैं। खास बात यह भी है कि हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा एकल काव्य संग्रह के प्रकाशन हेतु पाण्डुलिपत चयनित व अनुदान स्वीकृति प्राप्त सविता गर्ग हिंदी साहित्य सेवा के साथ समाज सेवा में सक्रीय हैं। 
युवाओं को प्रेरित करना जरुरी 
लोक साहित्यकार और गायिका सविता मानती हैं कि इस आधुनिक युग में साहित्य, लोक कला और संगीत एक दायरे में सिमट कर रह गए हैं और खासतौर से युवा पीढ़ी की कम होती रुचि का असर सामाजिक और संस्कृति नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। इसके जिम्मेदार हम ही हैं, जो सुविधाएं देने के नाम पर बच्चों को साहित्य, संस्कृति, और लोक कला से दूर कर रहे हैं। वहीं आधुनिकता की दौड़ में हास्य और श्रृंगार के नाम पर अधिकतर द्विअर्थी कविताएं श्रोताओं को परोसने से समाज पर बहुत ही बुरा असर पड़ रहा है। जहां तक समाजिक संस्कार और संस्कृति के हित में सुधार का सवाल है उसके लिए स्कूल स्तर पर बच्चों को साहित्य और लोककला के प्रति प्रेरित करके उन्हें सांस्कारिक बनाने की जरुरत है, ताकि सामाजिक संस्कारों और संस्कृति की विरासत को आने वाली पीढ़िया संजोकर रख सकें। 
प्रकाशित पुस्तकें 
लोक साहित्य के क्षेत्र में सविता की प्रकाशित पुस्तकों में एकल काव्य संग्रह ‘मेरी उड़ान’ और ‘मैं मीरा-सी’ तथा बाल काव्य संग्रह ‘प्यारी सोनपरी’ सुर्खियों में हैं। इसके अलावा नशामुक्ति जैसे सामाजिक विषय पर आधारित संयुक्त काव्य संकलन ‘ये जिंदगी है अनमोल’ तथा चुनिंदा कवित्रियों के संयुक्त काव्य संकलन ‘उमंग अभिव्यक्त’ में उनकी कविताएं प्रकाशित हुई हैं। वहीं हरियाणा राज्य की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष्य में प्रकाशित सांझा बाल काव्य संकलन ‘दुनिया गोल मटोल’ में उनकी कविताओं को प्रमुखता से स्थान मिला है। इसके अलावा उनके 17 भजन हिंदी और हरियाणवी दोनों भाषाओं में जारी हो चुके हैं। इसके अलावा विभिन्न समाचार पत्रों पत्रिकाओं में हिंदी व हरियाणवी कविताओं व गीतों का निरंतर प्रकाशन होता आ रहा है। 
पुरस्कार व सम्मान 
हिंदी और हरियाणवी लोक साहित्य में अहम योगदान देती आ रही कवियत्रि और गीतकार सविता गर्ग सावी को अनेक पुरस्कार व सम्मानों से नवाजा जा चुका है। इनमें अंतर्राष्ट्रीय पद्म शौर्य सम्मान, भारत गौरव सम्मान, मैथिली शरण गुप्त सम्मान, हरियाणा भूषण सम्मान, नारी शक्ति सम्मान, कोकिला रत्न सम्मान, युवा शताब्दी साहित्यकार सम्मान, निर्भया अवार्ड, मधुशाला गौरव सम्मान, अमृत महोत्सव काव्य गौरव सम्मान, हरियाणा गौरव काव्य दर्पण सम्मान, अग्र गौरव सम्मान, वूमेन वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा वूमेन इंस्पिरेशनल अवार्ड के सम्मान प्रमुख हैं। उन्हें बिहार की संस्था विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा विद्यावाचस्पति की मानद उपाधि से सम्मानित किया जा चुका है। कविता, गजल, लघुकथा, गीत, संगीत, भजन गायन जैसे साहित्यिक कार्यक्रमों के कुशल संचालन का अनुभव रखने वाली सविता गर्ग सावी राष्ट्रीय चैनल डीडी उर्दू, हिसार दूरदर्शन, चंडीगढ़ दूरदर्शन, डीडी पंजाबी और अन्य चैनलों पर समय समय पर काव्य पाठ भी करती आ रही हैं। 
15July-2024

सोमवार, 1 जुलाई 2024

साक्षात्कार: सामाजिक संस्कारों में साहित्य की अहम भूमिका: राजश्री

सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर किया साहित्य सृजन
 व्यक्तिगत परिचय 
नाम: राजश्री गौड़ 
जन्मतिथि: 24 नवम्बर, 1956 
जन्म स्थान: हथीन, जिला पलवल(हरियाणा) 
शिक्षा: बीए, बीएड़ (हिन्दू गर्ल्स कॉलेज सोनीपत) सम्प्रति: समाज सेवा, स्वतंत्र लेखन 
संपर्क:: सैक्टर-15, सोनीपत हरियाणा। मोबा. 8208627957 
BY--ओ.पी. पाल 
साहित्य जगत में साहित्यकार और रचनाकार अपनी विभिन्न विधाओं में समाज को नई दिशा देने में ‘साहित्य समाज का दर्पण’ प्रसांगिकता को सुदृढ़ करने में अपना योगदान करते आ रहे हैं। गद्य व पद्य दोनों ही शैलियों में साहित्य सृजन करने वाले साहित्यकारों में हर किसी लेखक का ध्येय यही है कि उनकी रचनाएं समाजिक बुराईयों का उजागर करके समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करे। सामाजिक रिति रिवाज और संस्कृति के साथ संस्कारों को संजोने वाले ऐसे साहित्यकार और लेखकों में हरियाणा की महिला रचनाकार भी पीछे नहीं हैं। ऐसी ही महिला साहित्यकार राजश्री गौड़ ने भी सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर अपने रचना संसार को आगे बढ़ाने में जुटी है। समाज सेवा कार्य में सक्रीय रचनाकार और कवियत्रि राजश्री गौड़ ने अपने साहित्यिक सफर को लेकर हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत के दौरान कई ऐसे पहलुओं का जिक्र किया है, जिससे साहित्य के बिना समाजिक संरचना अधूरी है।
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हरियाणा की महिला साहित्यकार राजश्री का जन्म हरियाणा के पलवल जिले के तहसील हथीन में 24नवम्बर, 1956 को एक शिक्षित और समृद्ध परिवार में पं. चिन्तामणि पाराशर व जय देवी के घर में हुआ। उनके बाल्यकाल के दौरान ही उनका संयुक्त परिवार सोनीपत (हरियाणा) में आकर बस गया। इसलिए उनकी पूरी शिक्षी दीक्षा सोनीपत में ही हुई। उनके पिता कुश्ती कबड्डी व वालीबॉल के खिलाड़ी थे, लेकिन दादा के देहावसान के कारण उन्हें पैतृक काम ज्वैलरी और जवाहरात का बिजनेस संभालना पड़ा। राजश्री की प्रारंभिक शिक्षा आर्या गर्ल्स स्कूल में हुई और उन्होंने हिन्दू गर्ल्स कॉलेज, सोनीपत से बी.ए. और बी एड़ किया। इसके बाद एम.ए. प्रीवियस (हिन्दी) में दाखिला लिया, लेकिन किन्हीं कारणों से पूरी नहीं हो सकी। अपने शिक्षित परिवार में उन्होंने दादी को गीता और रामायण तथा माँ को भजन गुनगुनाते घर के काम करते देखा, तो वहीं उनके पिता का साहित्य से बहुत लगाव था, जो हमेशा सोने से पहले शरतचंद्र, बिमल मित्र व मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास पढ़ते थे। वहीं घर में पत्र पत्रिकाएं भी आती थी, जिनमें से पिताजी उन्हें कविताओं को कंठस्थ कराते थे और शनिवार को स्कूल में होने वाली बालसभाओं में वह कविताएं सुनाती थी। ऐसे में साहित्य के प्रति अभिरुचि होना स्वाभाविक ही था। मसलन बचपन में ही उन्होंने रचनाओं के रुप में लेखन कार्य शुरु कर दिया था। हालांकि वास्तविक रुप से उनका लेखन कार्य कालेज की शिक्षा के दौरान साल 1972 से शुरु हुआ और कालेज की मैगज़ीन में उनकी कविता छपी। जबकि से भोपाल से प्रकाशित एक अखबार में 20 जनवरी 1984 को गणतंत्र दिवस परिशिष्ट में उनकी छपी तो उनका आत्मविश्वास बढ़ना स्वाभाविक था। लेकिन नवंबर 1978 में विवाह के बाद परिवार की जिम्मेदारी सर्वोपरि रही और लेखन कार्य नगण्य सा हो गया। बाद में बच्चों की शादी के बाद अकेलापन में उनके पति व बच्चों के प्रोत्साहित करने पर फिर लेखन कार्य ही शुरु नहीं किया, बल्कि कुछ सामाजिक संस्थाओं से भी जुड़ गई। साहित्यिक सफर में उतार चढ़ाव भी जीवन का अंग है और उनके सामने में भी इस दौरान कई ऐसे दिलचस्प व परेशानी भरे मोड़ आए, जिन्हें सोच कर वह आज भी चेहरे पर मुस्कान या कभी मन दुखी होता है। वह कभी कभार जब समाज में घटित किसी घटना से मन उद्वेलित हो जाता, तो अपने भावों को काव्य रूप में डायरी में कलम-बद्ध कर लेती थी। राजश्री ने बताया कि उनकी रचनाएं प्रेम, भाईचारा व सामाजिक सरोकार को लेकर होती, जिसमें सामाजिक बुराईयों को उजाकर कर समाज को नई दिशा देने पर कलम चलना लाजिमी था। 
साहित्य की महत्ता कायम 
हरियाणा की महिला साहित्यकार राजश्री गौड़ का आधुनिक युग में हिन्दी साहित्य के महत्त्व और उपयोगिता को लेकर कहना है कि आरंभ में जहां पद्यात्मक शैली में साहित्य की रचनाएँ की गई, जिसके बाद बदलते समय-काल के अनुसार काव्य, गद्य में कहानी, एकांकी, लेख, उपन्यास लघुकथा और राष्ट्रवादी रचनाओं में राजनीतिक प्रभाव नजर आने लगा है। इसके बावजूद आज भी स्वस्थ साहित्य का विशेष स्थान है और रहेगा। इसका कारण है कि साहित्य की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि साहित्य समाज का दर्पण और पथ-प्रदर्शक भी है। बेशक आज साहित्यक पुस्तकें कम पढ़ी जाती हैं, लेकिन पाठक कम नहीं हैं। इस इंटनेट और सोशल मीडिया के युग में अपनी पसंद से पाठक ऑनलाइन साहित्य पढ़ते हैं, जो सामाजिक दृष्टि से सकरात्मक पहलु है। वहीं यह भी सच है कि सोशल मीडिया मोबाइल के कारण फेसबुक, इंट्राग्राम व कई अन्य साइट्स पर साहित्य के अलावा देश दुनिया की बहुत सारी चीजें, यूट्यूब पर बहुत कुछ मिल जाता है। इस आधुनिकीकरण की दौड़ में समाजिक विकास तो हो रहा है, लेकिन संस्कृति और संस्कारों में कमी होती नजर आ रही है। इसलिए आज की युवा पीढ़ी को साहित्य के प्रति स्कूल व कालेज स्तर पर भी प्रेरित करने की ज्यादा जरुरत है। वहीं कवि, शायरों और लेखकों को स्तरहीन रचनाओं की अपेक्षा ज्यादा अच्छे साहित्य सृजन करने की जरुरत है। 
प्रकाशित पुस्तकें 
महिला साहित्यकार राजश्री गौड़ की प्रकाशित 15 पुस्तकों में 12 साझा संग्रह और 3 एकल काव्य-संग्रह शामिल हैं। उनके काव्य संग्रह में 'धनक', ग़ज़ल-संग्रह 'तुमको भुलाया कहाँ है' और 'मत कहो ज़िन्दगी थमी है' शामिल है। हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशन हेतू पांडुलिपि तैयार है। इसके अलावा उन्होंने कोरोना काल में ई काव्य संकलन भी लिखा, वहीं ई-लघुकथा संकलन में हरियाणा के प्रमुख लघुकथा कार भी शामिल है। इसके अलावा उनकी पुस्तकों की लेखन विधा में कविता, ग़ज़ल, लेख, व्यंग्य लेख, लघुकथा, कहानी, बाल कविताएं भी शामिल हैं। कविता-कोश, साहित्य-पीडिया, क़ागज-दिल.कॉम पर भी उनकी रचनाएं उपलब्ध हैं।
पुरस्कार व सम्मान 
साहित्य क्षेत्र में विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट योगदान देती आ रही साहित्यकार, कवियत्री एवं गजलकार राजश्री गौड़ को हिन्दी प्रचार प्रसार साहित्य अकादमी, भोपाल द्वारा तीन बार सम्मानित किया जा चुका है। प्रमुख रुप से उन्हें नारी गौरव सम्मान, श्रेष्ठ हिन्दी रचनाकार सम्मान, प्रेम-काव्य सम्मान, भारत के प्रतिभाशाली रचनाकार सम्मान, साहित्य-शिरोमणि सम्मान, सिद्धी साहित्य सम्मान, जैमिनी अकादमी सम्मान, भारत गौरव सम्मान के अलावा अंतरराष्ट्रीय ब्राह्मण मंच, जिया साहित्य मंच बैंगलोर, हिन्दी प्रचार प्रसार साहित्य अकादमी भोपाल, कागज-दिल साहित्य संस्था और जैमिनी साहित्य अकादमी पानीपत आदि साहित्यिक मंचों से पुरस्कार के साथ सम्मानित किया जा चुका है। वहीं अंतरराष्ट्रीय क्राईम रिफोर्म समिति द्वारा सम्मान भी उनकी उपलब्धियों का हिस्सा है। उनकी अन्य उपलब्धियों में दो ग्रेट वूमेन ऑफ द ईयर और एक लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड भी शामिल है। 
01July-2024

सोमवार, 24 जून 2024

चौपाल: सामाजिक सरोकार से जुड़ी रागनी गायक सुमित सातरोड की कला

इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ लोक कला के क्षेत्र में बनाई पहचान 
      व्यक्तिगत परिचय 
नाम: सुमित सातरोड 
जन्मतिथि: 01 जनवरी 1974 
जन्म स्थान: गांव सात रोड, हिसार 
शिक्षा:जू. इंजीनियर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन 
संप्रत्ति: ‍लोक गायक 
संपर्क: गांव सातरोड, हिसार, मोबा. 9812459261 
By--ओ.पी. पाल 
हरियाणवी लोक कला एवं संस्कृति में रसी बसी सांग और रागनियों की गूंज सात समंदर पार तक सुनाई देती है। इसका श्रेय सूबे के लोक कलाकारों को है, जिसमें हरियाणवी लोक संस्कृति की अलख जगाने के लिए अलग विधाओं में हरियाणा को पहचान दी है। ऐसे ही लोक कलाकारों में हिसार के सुमित सातरोड ऐसे रागनी गायक हैं, जिन्होंने सामाजिक, आध्यात्मिक, वीर रस की गाथाओं की विधाओं में अपनी अलग पहचान बनाई है। वहीं सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों को रागनी गायन के जरिए समाज के सामने परोसते हैं। सुमित ने समाज को सकारात्मक दिशा देने के लिए इंजीनियर की नौकरी को त्यागकर रागनी गायन शैली को अपनाया है। लोक कला के क्षेत्र में गायन शैली के दो दशक से ज्यादा के सफर को लेकर बुलंदिया छूते सुमित सातरोड ने हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में कई ऐसे अनुछुए पहलुओं को उजागर किया है, कि लोक कला के जरिए समाज में फैली कुरितियों को दूर करके सामाजिक समरसता की अलख जगाई जा सकती है। 
हरियाणा की गायन शैली की परंपरा को आगे बढ़ाते आ रहे लोक गायक सुमित सातरोड का जन्म 01 जनवरी 1974 को हिसार में गांव सातरोड में एक सामान्य परिवार में शिवकुमार शर्मा व संतोष देवी के घर में हुआ। जब वह तेरह साल के थे तो 1987 में उनके पिता का निधन हो गया था, जो एक सरकारी नौकरी में थे। पिता के निधन से पूर्व हमारी माता जी को नौकरी मिली, जिन्होंने हमारे लालन पालन और पढ़ाई का पूरा ध्यान रखा और इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन में इंजीनियरिंग भी कराई। बकौल सुमित उन्हें बचपन से ही संगीत का बहुत शौंक था, परंतु परिवार में किसी प्रकार का कोई संगीत या कला का माहौल नहीं था और परिवार में उनके अलावा किसी अन्य सदस्य की इस क्षेत्र रुचि थी। सुमित को बचपन से नृत्य का अधिक शौंक रहा। उनके गांव में हर छह महीने में गायन के लिए हरियाणा के सुप्रसिद्ध लोकगायक मास्टर सतबीर सिंह भैंसवाल आते थे। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जब अपने गांव में मास्टर सतबीर सिंह भैंसवाल का गाना सुना, तो उन्हें पहली बार यह अहसास हुआ कि इस लोक गायकी से अच्छा कुछ नहीं है और तभी से उन्होंने भी अपना सारा ध्यान इसी लोक गायन संस्कृति पर केंद्रित करना शुरु कर दिया। उनके गायन शैली की शुरुआत साल 2000 भजन से की, जिसके बाद इतिहास और गाथाओं से जुड़े किस्सों पर रागनी गायन शुरु किया। हालांकि इसके लिए उन्हें घर परिवार और अपने संघी साथियों के विरोध का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने सब बातों को नजरअंदाज करते हुए अपने लक्ष्य की तरफ ध्यान केंद्रित रखा और अपनी राह पर आगे बढ़ता रहा। वैसे भी हरियाणवी कवियों में से पंडित लखमी चंद मुख्य रुप से उनका आदर्श रहे, वहीं लोक गायन शैली में पं. लखमी के शिष्य पंडित मांगेराम और शहीद कवि जाट मेहर सिंह की गायन शैली से भी वह बहुत प्रभावित हैं। हरियाणा की लोक संस्कृति और समाजिक सरोकारों के मुद्दों पर उनकी रागनी गायकी का फोकस रहा है। सुमित सातरोड की गायन शैली में आध्यात्मिक व सामाजिक शास्त्र और श्रृंगार रस का समावेश भी रहा है। 
सम्मान व पुरस्कार 
रागनी गायक शैली के लोक कलाकार सुमित सातरोड ने विभिन्न विधाओं में अपनी कला के हुनर से हरियाणा ही नहीं, देश के कई राज्यों में सांस्कृतिक मंचों पर सम्मान पाया है। इसमें बाबा रामदेव की बायोपिक में गौ माता के भजन के ही करीब 15 सांस्कृतिक रत्न के रुप में पतंजलि योगपीठ से सांस्कृतिक अवार्ड शामिल हैं। इसके अलावा रागनी प्रतियोगिताओं और गांवों के मंच पर सैकड़ो पुरस्कार सम्मान उनके नाम दर्ज हैं।
संस्कृति की खातिर छोड़ी नौकरी 
लोक गायक सुमित सातरोड ने सामाजिक, अध्यात्म और लोक संस्कृति को अपनी कला से आगे बढ़ाने के लिए दस साल की इंजीनियरिंग की नौकरी को छोड़ दिया था। उनका कहना है कि नौकरी से ज्यादा अच्छा लोक गायकी के क्षेत्र में बेहतर करियर दिखा और उन्होंने अपनी कला के माध्यम से समाज और संस्कृति को सामयिक मुद्दों पर आधारित गायन शैली में उजागर करके सम्मान पाया है, उससे उनकी लोक गायक के रुप में बढ़ती मांग से लोकप्रियता भी बढ़ी है। सुमित का कहना है कि हरियाणा में पहले पहले नाट्य स्वांग का प्रचलन शुरू हुआ था, इसके बाद फिर सन 1920 के आसपास पंडित लखमी चंद ने रागनी गायन के दौर की शुरुआत की, जिसमें इसमें मटका, बेंजो, हारमोनियम सब बजाए जाते हैं। जो आज हम जैसे लोक गायक भी गाते हैं, उसमें पैसा भले ही कम हो। पर इज्जत बहुत है। 
सोशल मीडिया का प्रभाव चिंतनीय 
आज के इस आधुनिक युग में साहित्य, लोककला और लोक गीतों की स्थिति बहुत ही दयनीय है। आज के इस सोशल मीडिया युग में हमारे मूल गीतों को दबाया जा रहा है, क्योंकि नाबालिग बच्चों के हाथों में मोबाइल फोन है और वह इस आकर्षण में फंसते जा रहे हैं। यही कारण है कि हमारे बच्चों का हमारी मूल संस्कृति के प्रति कम रुझान है और इससे समाज पर दृष्ट प्रभाव पड़ रहा है। उदाहरण के तौर पर शादी विवाह के अवसर पर पिता पुत्र भाई बहन और परिवार के सभी सदस्य ऐसे गीतों पर नृत्य करते हैं, जिनका कोई ओचित्य नहीं है। हमें अपनी मूल संस्कृति की तरह आकर्षित करें, इसके लिए सोशल मीडिया बहुत बड़ा प्लेटफार्म है, जो हमारे पुराने कवियों ने हर संदर्भ में जो कविताएं लिखी हैं उनको आज के दौर के द्विअर्थी गीतों के साथ काई तुलना नहीं हो सकती। इसलिए हम सबको मिलकर अपना ध्यान सकारात्मक और सामाजिक रिति रिवाज तथा संस्कृति पर भी केंद्रित करने की ज्यादा जरुरत है। 
24June-2024