बुधवार, 28 फ़रवरी 2024

चौपाल: परंपरागत नृत्य संगीत कला की शिक्षा को आगे बढ़ाती शुभ्रा मिश्रा

हरियाणवी लोक कला को नया आयाम देने के लिए शास्त्रीय संगीत कला को आगे बढ़ाने मुहिम 
BY-ओ.पी. पाल 
हरियाणवी लोक कला एवं संस्कृति में लोक नृत्य, गीत, संगीत, रागनी, सांग जैसी विधाओं में भले ही अपनी अपनी शैलियों में कलाकार व संगीतकार लोक संस्कृति के संवर्धन करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन हरियाणा की लोक कला एवं संस्कृति में भारतीय संस्कृति की विधाओं का समावेश करती प्रसिद्ध भारतनाट्यम शास्त्रीय और ओडिसी लोक नृत्यांगना श्रीमती शुभ्रा मिश्रा खासकर भावी पीढ़ी को इस क्षेत्र में नित नए आयाम देने में जुटी हुई है। हाल ही में एलिगेंस वूमेन अवार्ड से सम्मानिन श्रीमती शुभ्रा मिश्रा हरियाणा में नृत्य संगीत के क्षेत्र में चुनौतियों के बावजूद प्रतिभाओं को तराशकर उन्हें राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के जरिए सम्मान दिला रही है, ताकि भारतीय संस्कृति में निहित नृत्य संगीत की परंपरा को आज की पीढ़ी इस क्षेत्र में अपना करियर सुरक्षित कर सके। एक इंजीनियर बनने के बजाए नृत्य संगीत को अपना करियर बना चुकी भारतीय शास्त्रीय संगीत की नृत्य विशेषज्ञ शुभ्रा मिश्रा ने हरिभूमि संवाददाता से बातचीत करते हुए स्पष्ट किया कि नये आयाम गढ़ती हरियाणवी लोक संस्कृति एवं कला बुलंदियों पर होगी।
---- 
हरियाणा की लोक संस्कृति एवं कला में रमती जा रही भारतनाट्यम शास्त्रीय नृत्य और ओडिसी लोक नृत्य विशेषज्ञ श्रीमती शुभ्रा मिश्रा का जन्म अक्टूबर 1980 को कोलकाता(पश्चिम बंगाल) में गोपाल जी पांडे और श्रीमती सत्यभामा पांडेय के घर में हुआ था। उन्हें बचपन से ही संगीत कला व नृत्य में अभिरुचि थी। उनकी इस अभिरूचि को उनके पिता गोपाल जी पांडे और माता स्वर्गीय श्रीमती सत्यभामा पांडेय ने भी प्रोत्साहित किया और भारतीय संस्कृति की विभिन्न विधाओं में समृद्ध करके बेटी के हित में उनकी कला को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई, जिसमें समकालीन नृत्य कला प्रमुख रही। परिजनों के सहयोग से उन्होंने निरंतर भारतीय नृत्यों का प्रशिक्षण लिया और और प्रतिष्ठित मंचो पर अपनी कला का प्रदर्शन किया। बकौल शुभ्रा मिश्रा, उनका विवाह बिहार के मूल निवासी डा. रंजन कुमार के साथ हुआ, जो दिल्ली में बिजनेस करते हैं। यह उनका सौभाग्य था कि ससुराल और पति ने भी उनके नृत्य की कला का भरपूर समर्थन करके प्रोत्साहित किया। पिछले करीब डेढ़ दशक से वह पति के साथ फरीदाबाद में रह रही हैं। अपने नृत्य संगीत के प्रति प्रेम को भगवान और गुरुओं के प्रति समर्पण मानते हुए वह निरंतर नृत्य संगीत की शिक्षा को आगे बढ़ाने में जुटी हुई हैं। उन्होंने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक से एमटेक किया है, तो यूपी के प्रयागराज से बीटेक की शिक्षा हासिल की। उन्होंने श्रीमती शर्मिष्ठा मलिक और श्रीमती लक्ष्मी के अधीन भरतनाट्यम नृत्य प्रशिक्षण हासिल किया। जबकि ओडिसी लोक नृत्य के लिए उन्हें सुश्री मधुमिता राउत और मायाधर राउत ने प्रशिक्षण दिया। सुप्रसिद्ध ओडिसी नतृक और शोध विद्वान महापात्र को अपना गुरु मानकर शिष्या के रूप में नृत्यांगना को अपने जीवन का अहम हिस्सा बनाया। भारतीय नाट्यम में मोहिनीअट्टम के लिए सुश्री कीर्थना से उन्होंने बहुत कुछ सीखा। शुभ्रा मिश्रा ने बताया कि फरीदाबाद आने के बाद उन्होंने बतौर लोक संगीत व नृत्यांगना उन्होंने हरियाणवी लोक संस्कृति व कला का अध्ययन करना शुरू किया, जिसमें उन्होंने हरियाणा को लोक कला और संगीत के हब के रुप में पहचाना। लेकिन यह बात भी सामने आई कि पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव में हरियाणवी संस्कृति, परंपराएं और लोक कला लुप्त होने के कगार पर हैं, खासकर युवा पीढ़ी के अपनी संस्कृति व परंपराओं से भंग के होते मोह चिंता का विषय के साथ चुनौती भी है। इसलिए उन्होंने हरियाणा की लोक कला व संगीत को भारतीय संस्कृति से जोड़ने की मुहिम शुरु की। खुद भी उन्होंने पिछले दो साल में अपने भारतनाट्यम शास्त्रीय और ओडिसी लोक नृत्य के साथ कुचीपुडी नृत्य संगीत को जोड़कर इस परंपरागत नृत्य की शिक्षा को विस्तार देने का प्रयास किया। पिछले करीब 12 सालों से वह हरियाणवी लोक कला संस्कृति के साथ जुड़ते हुए हरियाणा की युवा पीढ़ी को नृत्य संगीत-कला के साथ भारतीय शास्त्रीय, ओडिसी व कुचीपुडी नृत्य संगीत की कला के गुर भी सिखा रही हैं। शुभ्रा मिश्रा फरीदाबाद में ही भारतीय शास्त्रीय नृत्य और लोक संगीत कला सिखाने के लिए एक इंस्टीटयूट का संचालन कर रही हैं। वहीं वे फरीदाबाद के वाईएमसीए तथा एसओएस स्कूल के अलावा कई संस्थाओं में भी अतिथि नृत्य शिक्षिका की भूमिका निभा रही हैं। भारतीय संस्कृति में गुरु व शिष्य की पंरपरा की शैली वाले भरतनाट्यम नृत्य के साथ ओडिसी नृत्य में डेढ़ दशक तक प्रशिक्षण के बाद उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों में नृत्य के रूप में कार्याशालाओं में हिस्सा लिया। 
भारतीय संगीत कला को प्रोत्साहन 
एक नृत्य संगीत की कलाकार के रुप में शुभ्रा मिश्रा ने अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और राज्य स्तर के मंचों पर नृत्य कला प्रदर्शन शास्त्रीय संगीत के साथ भारतीय लोक संस्कृति की झलक भी पेश की है। भारतीय संस्कृति में परंपरागत नृत्य संगीत को महत्व देते हुए शुभ्रा मिश्रा ने पिछले साल जनवरी में काशी में काशी में घाट संध्या के आयोजन में अपनी कला का प्रदर्शन कर देश विदेश के पर्यटकों को आकर्षित किया, तो वहीं उन्होंने पिछले महीने रक्षा विभाग के हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के शास्त्रीय संगीत को लेकर आयोजित समारोह में भी हिस्सेदारी की है। उन्होंने बताया कि पिछले साल सितंबर में नई दिल्ली स्थित आंध्रभवन में आयोजित शास्त्रीय संगीत समारोह में उन्होंने कुचीपुडी नृत्य को भी अपनी कला का हिस्सा बनाया, जो आंध्र प्रदेश का क्लासिक डांस है। उन्होंने कालिदास की कविता मेघदूतम् और चित्रांगधा पर नृत्य नाटकों का प्रदर्शन करके भारतीय संगीत कला को प्रोत्साहित करने की पहल भी की है। यही कारण है कि फरीदाबाद निवासी श्रीमती शुभ्रा मिश्रा की भारतीय शास्त्रीय संगीत कला और लोक संस्कृति की छाप देश के अलावा अन्य देशों तक भी दस्तक देने लगी है। 
नृत्य संगीत को नई दिशा 
प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत की नृत्य विशेषज्ञ शुभ्रा मिश्रा इस क्षेत्र की चुनौतियों के बारे में मानती हैं कि यह एक विड़ंबना ही है कि पिछले दिनों लुप्त होने के कगार पर भारत का शास्त्रीय और लोग संगीत की कला पर विदेशी संस्कृति हावी रही है। ऐसे में हम जैसे कलाकारों को अपनी परंपरागत नृत्य संगीत को शिक्षा और जागरुकता के जरिए जीवंत करने की चुनौती है। इसी मकसद से वह नृत्य शिक्षा को बढ़ाने की मुहिम में जुटी हुई है। उनका मानना है कि अभी यह शिक्षा अपने बचपन में है, लेकिन बच्चों को शुरु में ही अपनी परंपरागत संस्कृति की शिक्षा के प्रति समर्पित बनाने की जरुरत है। इसके लिए स्कूलों में नृत्य संगीत को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाकर अनिवार्य करना होगा, तभी जाकर भारतीय संस्कृति का उदय संभव है। वहीं उन्होंने भारत और राज्य सरकारों के नृत्य संगीत के प्रति उदासीनता पर सवाल उठाते हुए हरियाणा सरकार से अपेक्षा की है कि वह कम से कम कलाकारों को आर्थिक रुप से प्रोत्साहित करें। 
सम्मान व पुरस्कार 
भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ लोक नृत्य को प्रोत्साहन देती आ रही शुभ्रा मिश्रा को संगीत कला के क्षेत्र में अनेक पुरस्कार और सम्मान मिले हैं, जिसमें राष्ट्रीय लोक नृत्य पुरस्कार भी प्रमुख रुप से शामिल है। वहीं पिछले दिनों उन्हें एलिगेंस वूमेन अवार्ड से नवाजा गया। राष्ट्रीय लोक नृत्य प्रतियोगिता में उनके निर्देशन में हरियाणा और राजस्थान नृत्य छात्र-छात्राओं को राष्ट्रीय लोक नृत्य पुरस्कार मिलना उनकी उपलब्धियों का हिस्सा है। 
26Feb-2024

सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

साक्षात्कार: काव्य विधाओं से संस्कृति और नैतिकता का संदेश देते चरणजीत ‘चरण’

हरियाणा साहित्य संवर्धन के लिए लेखन एवं गायन के साथ कार्यशालाओं में की हिस्सेदारी 
             व्यक्तिगत परिचय 
नाम: चरण जीत 'चरण' 
जन्मतिथि: 13 जून 1972 
जन्म स्थान: रन्हेरा (जी.बी. नगर) यू.पी 
शिक्षा: डबल एम.ए, एल.एल.बी 
संप्रत्ति: अध्यापन, साहित्य लेखन एवं काव्यपाठ
संपर्क: 818 संजय एनक्लेव, सरूरपुर मोड़, सोहना रोड, फरीदाबाद (हरियाणा)
 ---- 
BY-ओ.पी. पाल 
हरियाणा के लोक साहित्य एवं संस्कृति के संवर्धन में में जुटे लेखकों, साहित्यकारों, लोक कलाकारों, कवियों, गीतकारों में कई विद्वान ऐसे हैं, जिन्होंने साहित्य जगत को नया आयाम देने के लिए असाधारण रुप से साधना की है। ऐसे साहित्यकारों में से एक चरणजीत 'चरण' हिन्दी काव्य मंचों के सुप्रसिद्ध कवि हैं, जिन्होंने विभिन्न विषयों पर अपनी कविताओं से श्रोताओं को आकर्षित किया है। उन्होंने गीत, ग़ज़ल, घनाक्षरी, नज़्म और दोहा जैसी काव्य विधाओं को नया आयाम देते हुए देशप्रेम और प्रेम को फोकस में रखने का ही प्रयास किया है। अपनी कविताओं में बुने विचारों के माध्यम से दर्शकों को रोमांचित करने की क्षमता रखने वाले चरणजीत चरण ने हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में अपने साहित्यिक सफर को लेकर कई ऐसे अनछुए पहलुओं को उजागर किया है, जिसमें अपनी संस्कृति, नैतिकता के सामाजिक-राजनीतिक मामलों के सामयिक परिदृश्य के महत्वपूर्ण मुद्दों को छूने की क्षमता है। 
-- 
हरियाणा साहित्य संवर्धन के लिए काव्य की विभिन्न विधाओं में लेखन एवं गायन करने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार चरणजीत 'चरण' का जन्म 13 जून 1972 को एक साधारण संयुक्त किसान परिवार में हुआ है। उनके पिता राम सिंह एक आर.एम.पी, डाक्टर होने के साथ खेती किसानी का काम भी देखते थे और उनकी माता श्रीमती जीत कौर घर के साथ पिताजी का हाथ बंटाने में व्यस्त रही। उनके ताऊ जी सरदार रतन सिंह रतन हिंदी कवि सम्मेलन के बहुत ही सफल कवि रहे हैं, जिन्होंने हज़ारों की संख्या में कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ किया। बकौल चरणजीत एक-दो बार बचपन में ताऊ जी को पढ़ते हुए सुना, तो उनके मन में भी लिखने की ललक पैदा होने लगी। जब वह उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज में पहुँचे, तो कविता लिखना कब शुरू हो हुआ पता ही नहीं चल सका। एल.एल.बी के छात्र रहते हुए उन्होंने विश्वविद्यालय स्तर पर एक काव्य प्रतियोगिता में अपने विद्यालय का प्रतिनिधित्व किया, तो तीन बार सर्वश्रेष्ठ कवि की ट्राफी जीती और उन्हें विश्वास हुआ कि वह भी कविता लिख-पढ़ सकते हैं। एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में शायरों की महफिल नाम के प्रकाशित कॉलम से शायरी पढ़ने का शौक पैदा हुआ और उन्होंने भी धीरे-धीरे दो-दो पंक्तियों की तुकबंदी करना शुरु कर दिया। बेरोज़गारी के चलते उन्होंने फुटपाथ से कुछ सस्ते कविता और ग़ज़ल संग्रह खरीदे। चूंकि पढ़ने का जूनून इस कदर सवार था कि जो दस-बीस रूपये इधर उधर से मिलते थे, उन्हें वे किताबें खरीदने पर खर्च करने लगे और फिर टूटी-फूटी ग़ज़लें लिखना शुरू किया। उन्हीं में से उनकी एक ग़ज़ल उसी समाचार पत्र में प्रकाशित हुई, जिसके कालम से उन्हें ग़ज़लें लिखने का जुनून पैदा हुआ था। ऐसे में उनका आत्मविश्वास बढ़ना स्वाभाविक था और वह क्षण उनके लिए खुशी देने वाला व रोमांचित करने वाला था। उनका कहना है कि किसी भी कला के साथ जुड़ा हुआ सबसे नकारात्मक पहलू ये भी है कि आपका परिवार आपको सहयोग नहीं करता। वह रात को दो-तीन बजे तक बैठकर कविताएं लिखते-पढते थे। माता-पिता को लगता था कि बेटा हाथ से निकल गया है। कोई माता-पिता नहीं चाहता कि उनका बच्चा कवि, चित्रकार या संगीतकार बने। वो डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, एडवोकेट, आईएएस ,पीसीएस से आगे नहीं सोचते। उनका सोचना इसलिए भी ठीक है, क्योंकि कविता लिखना आसान है, लेकिन कविता से रोटी कमाना बहुत मुश्किल। वह खुद उन्नतीस की उम्र तक बेरोज़गार रहे हैं तो समझा जा सकता है कि ज़िंदगी में कितना संघर्ष और कितनी परेशानियाँ रही होंगी। चरणजीत 'चरण' ने वैसे तो लगभग हर विषय पर कविताएं लिखी और मंच पर सुनाई हैं। लेकिन उनका प्रिय विषय श्रृंगार और देशप्रेम रहा है। अब चूँकि वह मंच के कवि हैं और कविता-पाठ करके सामने बैठे श्रोताओं को प्रभावित करने के लिए ज़रूरी है कि विषय समसामायिक, शब्दावली आम बोलचाल जैसी और प्रस्तुतिकरण अच्छा हो। यह एक मंच के कवि की बुनियादी ज़रूरतें भी हैं। 
हाशिए पर साहित्य की गुणवत्ता 
इस आधुनिक युग में साहित्य की स्थिति को लेकर चरणजीत चरण का कहना है कि कभी-कभी लगता है कि लिखने वाले अधिक है और पढ़ने वाले कम और उसका एक बड़ा कारण ये है कि अब साहित्य में न कोई बंदिशें हैं न कोई पैमाना। साहित्य के नाम पर क्या और कैसा लिखा जा रहा है इसका लेखा-जोखा किसी के पास नहीं है। हर साल गद्य और पद्य की हज़ारों किताबें प्रकाशित होती हैं, उनमें से कुछ पाठकों तक पहुँचती हैं कुछ बुक रैक की शोभा बढ़ाने के काम आती हैं और बाकी रद्दी में चली जाती हैं। पहले लोग लिखते थे तो अपने गुरु, उस्ताद को दिखाते थे, सलाह करते थे। यह परम्परा हिंदी कविता में लगभग खत्म होने के कगार पर है। इसलिए आप गुणवत्ता तो भूल ही जाइये, क्योंकि अब साहित्य की गुणवत्ता हाशिए पर जाती नजर आ रही हैं। साहित्य के पाठकों और श्रोताओं में कमी आना इसलिए भी स्वाभाविक लगता है कि लेखक और पाठक दोनों के समर्पण में कमी आई है यानी लिखने वाला भी जल्दी में है और पढ़ने वाला तो है ही। फ़ास्ट फ़ूड के इस दौर में धीमी आँच पर मिट्टी की हाँडी में पकी हुई दाल का स्वाद जिसने कभी चखा ही नहीं वो उसकी ख़्वाहिश और फ़रमाइश करे भी तो कैसे? हमने इस पीढ़ी के कन्धों पर कैरियर का बोझ इतना बढ़ा दिया है कि अब उनमें कुछ और उठाने का न साहस है न समय। हमने अपने बच्चों को कभी न ख़त्म होने वाली दौड़ में खड़ा कर दिया है, जबकि साहित्य ठहराव माँगता है। खासतौर से युवा पीढ़ी को पाठ्यक्रम की किताबों से जो थोड़ा बहुत समय बचता है, उसे टीवी और मोबाइल ने निगल रहा है, तो ऐसे में इस पीढ़ी से साहित्य पढ़ने की उम्मीद करना थोड़ा सा बेमानी लगता है। 
लेखन में गिरावट पर चिंता 
इस युग में साहित्य की चुनौतियों को लेकर चरणजीत का कहना है कि जो अपने स्तर से गिर जाए उसे आप साहित्य कैसे कह सकते है? साहित्य को आप अच्छे और बुरे की श्रेणी में भी नहीं रख सकते। जो बुरा है वह साहित्य नहीं है और जो साहित्य है वो बुरा नहीं हो सकता। साहित्य के साथ अश्लील जैसा शब्द जोड़ना भी ग़लत है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि साहित्य लिखा नहीं जाता, बल्कि साहित्य बुना और गढ़ा जाता है। अगर हम गुणवत्ता पूर्ण साहित्य की बात करें तो उसके लिए चार विन्दुओं से गुज़ारना आवश्यक है पहला है भाषा की अच्छी समझ, दूसरा व्याकरण का बेहतर ज्ञान, तीसरा लिखने से पहले भरपूर चिंतन और चौथा लिखते समय एक-एक पंक्ति पर गहरा मनन। कोई भी लेखन जो इन चार मानकों से होकर नहीं गुज़रा वह गुणवत्ता की कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता। 
प्रकाशित पुस्तकें 
प्रसिद्ध साहित्यकार चरणजीत चरण की प्रमुख कृतियों में गजल संग्रह हसरतों के आईने, सरगोशियाँ, मुनासिब और कश्मकश शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने फिल्म ये मेरा इंडिया, माई फ्रेंड पिंटो और वेलकम टू न्यूयॉर्क जैसी बड़े बैनर की फिल्मों में गीत लेखन का कार्य भी किया है। वहीं उनकी प्राइवेट एलबम तेरी चाहत (जी म्यूजिक) भी सुर्खियों में है। 
पुरस्कार व सम्मान 
हरियाणा साहित्य अकादमी के कवि सम्मेलनों में प्रतिभागिता करते आ रहे चरणजीत 'चरण' ने हरियाणा में साहित्य संवर्धन के लिए अनेक कार्यशालाओं का आयोजन किया है, जिन्हें साहित्य सभा कैथल द्वारा साहित्य सेवा के लिए सम्मान भी मिल चुका है। वहीं उन्हें फरीदाबाद में गौरव सम्मान, सोनीपत में कवि कुल सिरोमणि सम्मान के अलावा भारतीय प्रवासी परिषद के साहित्य गौरव सम्मान तथा भारतीय संस्कृति एवं विरासत सम्मान बीकानेर से भी नवाजा जा चुका है। उन्होंने साहित्य संवर्धन की दिशा में यूके की विदेश यात्रा भी की है। देश के सबसे प्रतिष्ठित मंच लालकिला के साथ देशभर के लगभग हर प्रान्त के महत्वपूर्ण मंचों, संसद भवन के सभागार से सड़कों, चौराहों पर सजने वाली कविता की महफ़िलों, लगभग सभी टीवी चैनल न्यूज़ चैनल्स सहित करीब डेढ हजार से ज्यादा कवि सम्मेलनों में प्रतिभाग करना उनके लिए साहित्य जगत में एक बड़ी उपलब्धि है। 19Feb-2024

सोमवार, 5 फ़रवरी 2024

चौपाल: रंगशिल्पी के बिना अधूरी है कलाकारों व रंगकर्मियों की कला

वॉलीवुड से लेकर हरियाणवी फिल्मों व नाटकों में मेकअप मैन अनिल शर्मा ने बनाई अपनी पहचान                  व्यक्तिगत परिचय 
नाम: अनिल शर्मा 
जन्मतिथि: 12 दिसंबर 1978 
जन्म स्थान: ‍गोहाना, जिला सोनीपत 
शिक्षा: इंटरमीडिएट, अंडर प्रभाकर गॉड कॉलेज रोहतक।
संप्रत्ति: मेकअप मैन, अभिनय ,संगीत 
BY--ओ.पी. पाल 
साहित्य, लोक कला संस्कृति के क्षेत्र में फिल्म या नाटक की पटकथा लिखे जाने से लेकर पर्दे या रंगमंच पर प्रस्तुति के बीच की विभिन्न चरणों की प्रक्रिया में शामिल पात्रों की भी भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता, जिनके बिना किसी फिल्म एवं नाटकों के मंचन की प्रस्तुतियों को सफल बनाना असंभव है। ऐसे पात्रा में शामिल रंगकर्मियों या कलाकारों की पटकथा में किरदार के अनुरुप साज सज्जा करने की रंगशिल्प कला भी इसी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हो जाती है। वॉलीवुड व हरियाणा फिल्मों, नाटकों और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों में अनिल कुमार शर्मा की साज सज्जा की कला भी किसी से छिपी हुई नहीं हैं। यही नहीं वह फिल्मों और नाटकों में अभिनय यानी एक रंगकर्मी की भूमिका निभाने में निपुण हैं। ऐसे ही साज सज्जा के शिल्पकार और रंगकर्मी के रुप में अनिल शर्मा ने हरिभूमि संवाददाता से बातचीत के दौरान पिछले दो दशकों से अपनी कला के सफर को लेकर कई ऐसे पहलुओं को उजागर किया, जिसमें साज सज्जा के बिना किसी भी फिल्म या नाटक का रंगमंच अधूरा है। -- हरियाणा के रोहतक निवासी कलाकार एवं मैकअप मैन के रुप में पहचान बनाने वाले अनिल शर्मा का जन्म 12 दिसंबर 1978 को सोनीपत जिले के गोहाना शहर में श्रीराम राजेंद्र शर्मा और सावित्री देवी के यहां हुआ। उनका परिवार सामान्य रहा, हां किसी प्रकार की साहित्य या लोककला का कोई माहौल नहीं थी। अनिल की प्राथमिक शिक्षा गोहाना में हुई करीब तीन दशक पहले उनका परिवार रोहतक आकर बस गया, जहां उन्होंने इंटरमिडिएड और वैश्य कॉलेज से अंडर प्रभाकर किया। उन्होंने बताया कि उन्हें बचपन से ही डांस और एक्टिंग का शौंक था, लेकिन परिवार के तंगहाल को देखते हुए उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी कि वे कभी फिल्म या अन्य किसी लोक कला का हिस्सा बन पाएंगे। इसका कारण स्पष्ट इसलिए था कि परिवार या कोई अन्य उसे मदद या प्रोत्साहन देने वाला नहीं था। इसलिए उन्होंने ताई क्वांडो सीखना शुरु किया। इसमें उन्होंने जिला स्तर और पिऊर राज्य स्तर तथा फिर राष्ट्रीय स्तर पर भी द्वितीय पोस्ट तक पहुंचने के सफलता हासिल की। जब इसमें भी परिजनों का कोई सहयोग नहीं मिला तो उसे इसे छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा और छोटे मोटे काम करना शुरु किया। कहते हैं किस्मत कब करवट ले लें यह किसी को भी पता नहीं होता और उसके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक दिन उसे एक व्यक्ति ऐसा मिला, जो उसे मुंबई ले गया, जहां बहुत दिनों तक भी कोई काम नहीं मिला, लेकिन उसी व्यक्ति की वजह से उसे किसी फिल्म की शूटिंग में लाइट मैन सहायक ब्वाय काम मिला। इसके बाद चाचा चौधरी के सेट पर उसे मेकअप सहायक का काम दिया गया। यानी साल 1994 से उसकी फिल्म क्षेत्र में रंगशिल्प का काम करने की शुरुआत हो गई। वे मेकअप के साथ अभिनय करने में भी निपुण है, इसलिए जहां कहीं कलाकारों के मेकअप के साथ किसी किरदार की जरुरत पड़ी तो उन्होंने उसे भी बखूबी निभाया है। बकौल अनिल शर्मा यह उनकी कठिनाई या परेशानी का दौर भी कहा जा सकता है, जब फिल्म लाइन में शुरुआत करने के समय उसके परिवार वाले भी उसके साथ नहीं थे। इसका कारण यह था कि लोग परिजनों को यह कहकर उकसाते थे कि उनका बेटा फिल्म लाइन में गया तो इतना बिगड़ जाएगा कि एक दिन वह घर वालों को भी दिन में तारे दिखाएगा? इसे लेकर अनिल का मानना है कि यदि नीयत साफ हो और मंजिल तक पहुंचने का जज्बा हो तो कोई भी कामयाबी हासिल कर सकता है। आज उनके इसी जज्बे और मेहनत का नतीजा है कि वह भजन सम्राट मुकेश शर्मा के सहयोग व प्रोत्साहन से अपना धार्मिक भजनों का जेबीके म्यूजिक यूट्यूब चैनल भी चला रहे हैं। 
यहां से मिली मंजिल 
फिल्मों या सीरियल अथवा नाटकों के पात्रों के लिए मेकअप मैन के रुप में हुई शुरुआत मे बाद हरियाणवी फिल्म पीहर की चुंदडी में उसे मुख्य मेकअप मैन का काम मिला, जिसकी शूटिंग के दौरान उनकी मुलाकात शशिभूषण शर्मा से हुई, जो सुविख्यात मेकअप आर्टिस्ट थे और उनको गुरु मानते हुए उसने फिल्म जगत के क्षेत्र में एक मैकअप मैन की सभी विधाओं का ज्ञान हासिल किया। उसके बाद फिल्म निर्देशक विश्व दीपक त्रिखा की हरियाणवी हास्य फिल्म गधे की बारात में मेकअप के साथ अभिनय भी किया। उन्होंने बताया कि हरियाणा कला परिषद की उषा शर्मा और लीला सैनी तथा बंजारा ग्रुप के विजय भटोटिया के सहयोग से उन्होंने हरियाणा सरकार के संस्कृति विभाग के सांस्कृतिक कार्यक्रमों व मुख्य साज सज्जा कार्यशालाओं में दस साल तक मेकअप तथा अभिनय की भूमिका भी निभाई। पिछले दो दशक से बॉलीवुड, हिंदी और हरियाणवी फिल्मों के अलावा थियेटर पात्रों के मेकअप करने वाले अनिल शर्मा ने इसे अपना कैरियर बनाया है। अनिल शर्मा ने हाल ही में रिलीज हुई बंजारा ग्रुप की लघु फिल्म ‘चन्दा’ के अलावा हरियाणवी फिल्मों पीहर की चुंदड़ी, कुनबा, माटी कहे पुकार, चन्द्रावल-2, भली करेंगे राम और वो चांद फिर निकला जैसी फिल्मों में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया है। वहीं उन्होंने गधे की बारात, अंधेरी नगरी चौपट राजा, सैया भैया कोतवाल, भोंदू बन के रह और संक्रमण जैसे थियेटर के कलाकारों का मेकअप करने के साथ अपने अभिनय किरदार को भी निभाया। उन्होंने गुरु गोरखनाथ का इतिहास, गोगा पीर का इतिहास, बावरियों का इतिहास, शीश के दानी खाटू श्याम जैसी फिल्मों में निर्देशक कुलदीप वत्स के साथ भी कई सालों तक मेकअप मैन के अलावा अभिनय की भूमिका में भी काम किया। यहीं नहीं उन्होंने लघु फिल्मों, एलबम सांग, सोनोटक, फाइन डिजिटल, सुपर टोन, सुपर लाइन, दहिया फिल्म्स के सीरियलों एवं वेबसीरिज में भी अपनी कला को रंग दिये। 
इन प्रमुख कलाकारों का किया मेकअप 
हरियाणवी कलाकार एवं मैकअप मैन अनिल शर्मा ने प्रमुख रुप से महाभारत के भीम प्रवीण कुमार के अलावा संगीतकार मिक्का महेंदी, वॉलीवुड के खलनायक की भूमिका निभाने वाले मोहन जोशी, अभिनेता महेन्द्र कपूर व विजय भटोटिया, हरियाणवी अभिनेत्री उषा शर्मा और सुप्रसिद्ध लोक कलाकार व नृत्यांगना लीला सैनी, सपना चौधरी, कालेखां, भजन सम्राट मुकेश शर्मा व नरेन्द्र कौशिक के अलवा नरेन्द्र बल्हारा, राजेश सिंहपुरिया, कर्मवीर फौजी, महेन्द्र सिंह(झंडू) जैसे सैकड़ो किरदारों का मेकअप करके अपनी पहचान बनाई। अनिल का कहना है कि रंगशिल्प के तहत वेशभूषा, श्रंगार जैसे कार्यो को केवल अधिक चमक-दमक दिखाने तथा दर्शकों को रोमांचित कर आकर्षित करने के लिए नहीं किया जाता, बल्कि उससे फिल्मी पटकथा या नाटक की भावदशा के अनुरूप किया जाता है। 
पुरस्कार व सम्मान 
लोक संस्कृति में रंग भरते मेकअप कलाकार अनिल शर्मा को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए नेशनल इंटीग्रेटिड फोरम और आर्टिस्ट एंड एक्टिविस्ट से विशेष सम्मान मिल चुका है। इसके अलावा उन्हें बंजारा ग्रुप के नाटक संक्रमण में रंगशिल्पी और अभिनय के लिए सम्मान मिला, तो रंगमंच मेला में उन्हें रंगकर्मी का पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। इसके अलावा अनेक सांस्कृतिक एवं अन्य मंचों से उन्हें सम्मानित होने का सौभाग्य हासिल है। 
05Feb-2024

सोमवार, 29 जनवरी 2024

साक्षात्कार: समाज और व्यक्तिगत विकास में साहित्य की अहम भूमिका: डॉ. रमाकांता

लोक साहित्य, लोक कला व संस्कृति के संवर्धन से समाज को दी नई दिशा 
             व्यक्तिगत परिचय 
नाम: डॉ. रमाकांता शर्मा
जन्मतिथि: 15 जुलाई 1948 
जन्म स्थान: घरौंडा (करनाल), हरियाणा 
शिक्षा: एमए, पीएचडी (हिन्दी), पीएचडी(संगीत), बीएड (गोल्डमैडल),एलएलबी। 
संप्रत्ति: सेवानिवृत्त खंड शिक्षा अधिकारी, सेवानिवृत्त सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग बीएमयू, रोहतक। 
संपर्क: 1014/20, दुर्गा कॉलोनी, रोहतक, मोबा-9896213549, ईमेल-ramapro28@gmail.com 
 By—ओ.पी. पाल 
साहित्य जगत में सामाजिक सभ्यता एवं संस्कृति को लेकर साहित्य साधना में जुटे ऐसे साहित्यकारों, कवियों और लेखकों में ऐसे चुनिंदा ही विद्वान है, जिन्होंने हरियाणा की संस्कृति और सभ्यता को नई दिशा देने साहित्य साधना के साथ लोक साहित्य और लोक कला व संस्कृति के संवर्धन के लिए योगदान दिया है। उनमें हरियाणा की सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार एवं आकाशवाणी की ग्रेडिड लोक गायिका डा. रमाकांता पिछले चार दशकों से समाज को एक सकारात्मक रुप से नई दिशा देने का प्रयास में गुणवत्ता के आधार पर साहित्य सृजन करती आ रही हैं। लोक साहित्य में समाहित संगीत, नाट्य, नृत्य तथा लोक गीतों के संकलन और शोध कार्य में जुटी काव्य एवं गीत लेखक डा. रमाकांता ने अपने लोक साहित्य एवं काव्य लेखन के सफर को लेकर हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में कई ऐसे तथ्यों का जिक्र किया है, जिससे कहा जा सकता है कि समाज और व्यक्तिगत विकास में साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका है। 
---- 
हरियाणा की महिला साहित्यकार डॉ. रमाकांता का जन्म 15 जुलाई 1948 को करनाल जिले के घरौंडा में डा. जयदेव प्रसाद और शांति देवी प्रभाकर के घर में हुआ। उनका परिवार में पूरी तरह से साहित्यिक माहौल था, जहां उनकी माता ग्रामीण क्षेत्र की पढ़ी लिखी महिला थी और बड़ी बहन उर्मिलकांता शर्मा उस समय पंजाब भाषा विभाग की प्रसिद्ध कवयित्री थी, जो विभाग में सभी प्रतियोगिता में हिंदी कविताओं में पुरस्कार हासिल करती रही है। साल 1956 में जब रमाकांता कक्षा तीन में थी, तो उन्होंने खुद लिखी एक कविता स्वतंत्रता दिवस पर पढ़ी तो उसे विद्यालय के मुख्याध्यापक ने पुरस्कार के रुप में एक चांदी का रुपया ईनाम में दिया, जो आज भी जीवन की सबसे अमूल्य सम्मान को उन्होंने अभी तक धरोहर के रुप में सुरक्षित रखा हुआ है। इसके बाद वह स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर काव्य प्रतियोगिताएं जीती और स्वरचित कविताएं तत्कालीक कॉलेज मैग्जीन तथा पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई तो उनका आत्मविश्वास बढ़ना स्वाभाविक था। रमाकांता ने बताया कि उन्होंने हिंदी, पंजाबी और उर्दू भाषाओं में काव्यपाठ किया। नौकरी में आने के बाद उन्होंने कला(फाइन आर्ट) तथा संगीत विषय का अध्यापन किया, वैसे भी विरासत में मिले साहित्यिक माहौल के कारण बचपन से कला, संगीत व साहित्य से रहे संबन्ध के कारण उन्होंने असंख्य गीत व कविताएं लिखी, जो आज भी सुने जाते हैं। उनके साहित्यिक विद्या काव्य सृजन है, लेकिन उन्होंने प्राय: गद्य व पद्य सभी विधाओं में साहित्य सृजन किया है। उनके विस्तृत लेखन क्षेत्र में कहानी, कविता, लघुकथा, नाटक, आलोचना, समीक्षा अनुवाद तथा संपादन जैसी विधाएं शामिल हैं, जिसकी बदौलत उनकी हरियाणवी भाषा, हरियाणवी संस्कृति (लोक साहित्य) तथा हिंदी गद्य व पद्य में करीब तीन दर्जन पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है। वे इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि लेखन के गुण जन्मजात भी होते हैं, जिन्हें बाद में परिमार्जित कर आकार दिया जाता है। ऐसे ही जन्मजात गुण उचित वातावरण में उनके लिए भी वरिष्ठ साहित्यकारों के सानिध्य तथा मार्ग दर्शन में पुस्फुटित हुए। आजादी के अमृत महोत्सव काल में उन्होंने कुछ नाटक, निबंध, कहानियां और रचनाएं लिखी, जिनमें हरियाणवी कहानियां भी शामिल हैं। इसी बीच एक लघुकविता संग्रह अन्तत: का प्रकाशन भी हुआ और दूसरा भी तैयार है। आजकल वे साहित्य सृजन के अधूरे कार्यो को पूरा करने में व्यस्त हैं। उनका कहना है कि अपनी रचनाओं में से किसी एक को अपनी प्रिय रचना कहना कठिन है। उन्होंने प्रत्येक काव्य सृजन पर लेखक की प्रसूत पीडा को अनुभव किया है। कई कागजों पर शब्द उकेरे, काटे, फाडे, व्यथित भी हुई। तब कहीं जाकर सृजन फलीभूत हुआ, इसलिए उन्हें अपने सभी रचनाएं प्रिय हैं। डा. रमाकांता न प्रसिद्ध साहित्यकारों की लघुकथा तथा कहानियों की पुस्तकों का हरियाणवी में अनुवाद भी किया है। वहीं उन्होंने स्वयं अपनी कुछ हिंदी लघुकथाओं का मैथिली, पंजाबी तथा बुंदेली में अनुवाद किया है। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी में अनुवाद का संपादन भी किया। उन्होंने 250 लघुकथाओं, 50 कहानियों, करीब 20 नाटक तथा करीब 500 कविताओं का सृजन कर पाठकों को नई दिश देने का प्रयास किया है। उन्होंने कत्थक नृत्य, संगीत प्रकार सितार, संगीत प्रभाकर तबला आदि में संगीत प्रभाकर भी किया है। 
दूरदर्शन व आकाशवाणी पर कला का प्रदर्शन 
साहित्यकार एवं लोक कलकार के रुप में डा. रमाकांता ने हरियाणवी संस्कृति संवर्धन की दिशा में लोक पर्व, ऋतुमास उत्सवों की वीडियोग्राफी एवं वृत्तचित्र में भी लोकगीत लेखन, संकलन, गायन और संगीत निर्देशन की भूमिका भी निभाई है। इनमें हरियाणा सरकार की योजनाओं के प्रचार व प्रसार के लिए तैयार वृत्तचित्रों में नृत्य, अभिनय और गायन से संस्कृति के क्षेत्र में अपना योगदान देने वाली रमाकांता ने दूरदर्शन पर प्रयोजित ‘बोल हमारे गीत तुम्हारे’ तथा ‘अजब-अजुबे’ शीर्षक से प्रयोजित कार्यकमों के 13-13 एपीसोड में गीत लेखन और गायन की कला की छटाएं भी बिखेरी हैं। वहीं हरियाणवी संस्कृति पर आधारित सुरंग, द गैस्ट तथा थाल जैसी वेबसीरिज तथा लघुफिल्मों में अभिनय की भूमिका भी निभाई है। यही नहीं उन्होंने क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र पटियाला के सहयोग से लोकनृत्यों की प्रस्तुति में तीन दशक तक गायिका तथा कोरियोग्राफर के रुप में अपनी भूमिका निभाई है। उनके हरियाणवी लोकगीतों का साल 1980 से प्रसारण हो रहा है। 
आधुनिक युग में साहित्य सुखद 
इस आधुनिक युग में साहित्य की चुनौतियों को लेकर डा. रमाकांता का मानना है कि समकालीन साहित्य में वर्तमान सृजन श्रंखला में कुछ नई उपलब्धयाँ लेखकों के नाम दर्ज हुई है। वहीं लोककथाओं का प्रचार-प्रसार तथा प्रकाशन खूब हुआ है और अनुवाद तथा संपादन के कार्य में भी वृद्धि र्हु। दूसरी ओर आजकल लेखक अपनी रचनाओं की समीक्षा तथा आलोचना को महत्व दे रहे हैं। सांझा संग्रह प्रकाश का प्रचलन भी बढ़ा है। हाल ही में लघुकविता के क्षेत्र में भी सराहनीय कार्य हुआ है। साहित्य के क्षेत्र में यह कार्य साहित्यकारों के लिए सुखद ही माना जाएगा। लेखक और पाठक संबन्धों के बारे में डा. रमाकांता का मानना है कि आज के कुछ लेखक, विशेषकर कवि, अपने साथ पांच सात गुर्गे रखते हैं, जो गोष्ठियों में उनकी कविताओं या गजल की प्रत्येक पंक्ति पर वाह वाह कर तालियां बजाते हैं। यही कारण है कि पाठक ही श्रोता हैं, इससे पाठकों को रुष्ठ होना स्वाभाविक है। लेकिन उनके लेखन की पोल शीघ्र ही खुल जाती है। पाठक है जब जानता है और समझता है। इसलिए लेखक और उसके व्यक्तिगत जीवन में अंतर नहीं होना चाहिए अर्थात करनी और कथनी समान होना जरुरी है। लेखक का व्यक्तित्व ही तो सृजन में काफी सीमा तक प्रतिबिंबित होता है। यही अंतर ही लेखक की सफलता को निर्धारित करता है। यानी उत्कृष्ट साहित्य पाठक के जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन ला सकता है। रमाकांता का नवोदित लेखकों को संदेश है कि सोना तपकर कुंदन बनता है। इसलिए अच्छा साहित्य पढ़े और रचनाएं लिखें। लेखकर कभी पूर्ण नहीं हो। इसके लिए वरिष्ठ लेखकों का मार्गदर्शन उन्हें उनकी रुचिकर विद्या में निपुण बना सकता है। 
सामाजिक सरोकारों में निहित है साहित्य 
साहित्य समाज का दर्पण भी है तथा ज्योति अर्थात मार्गदर्शक भी है। साहित्य समाज के सरोकारों को ही अपना विषय बनाता है। सामाजिक अनियमितताओं का पाठकों से परिचय करवाता है तथा उसके मूल कारणों पर प्रकाश डालता हुआ समाधान का भी संकेत देता है। समाज विहीन साहित्य की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। समाज और व्यक्तिगत विकास में साहित्य की महत्वपूर्ण सहभागिता है। समाज में उस क्षेत्र विशेष की संस्कृति फलती फूलती है। संस्कृति समाज के लोगों के लिए नैतिक मूल्यों को निर्धारित करता है, जिसका निर्वहन करना प्रत्येक मनुष्य के लिए अनिवार्य है। सुसंस्कृत समाज के लोगों का व्यक्तित्व उस समाज के अनुसार ही निर्मित होता है। समाज, परिवार और व्यक्ति तीन मुख्य स्तंभ हैं, जो अनन्यो आश्रित हैँ। साहित्य में जीवन बिंबो को ही दर्शाया जाता है। जीवन से इतर साहित्य नीरस होता है। डा. रमाकांता का मानना है कि साहित्य के विषय तो वही है, किंतु उनका विस्तार सिमट गया है। उपन्यास से लघुकथा, महाकाव्य से लघुकविता की यात्रा इस का उदाहरण है। विमर्श में विषय को पतेर के समान पतला कर दिया जाता है। विमर्श लेखन में लेखक अपने लेखन से न्याय नहीं कर पाता। अतिवादी होने के कारण साहित्य की समृद्धि प्रभावित होती है। निसंदेह यह सामयिक प्रवाह है, समाज की अनिवार्यता नहीं। 
पुस्तक प्रकाशन 
हरियाणा की महिला साहित्यकार डॉ. रमाकांता ने अपने लेखन क्षेत्र में कहानी, कविता, लघुकथा, नाटक, आलोचना, समीक्षा अनुवाद, सम्पादन जैसी विधाओं का दिशा दी है। हिंदी साहित्य क्षेत्र में उन्होंने हिन्दी उपन्यासों में असामान्य पात्र, मधुकांत की एकादश शैक्षिक कहानियाँ, नाथ संप्रदाय का अध्ययन, मधुकांत की व्यंग्यात्मक कहानियों की समीक्षा, लघु कथा संग्रह कथा मंजरी, कविता संग्रह काव्य-कुंज, कविताएं बालगीत, काव्य संग्रह वन्दन माटी का, बाल एवं किशोर साहित्य,• सांझा कहानी संग्रह और महक रिश्तों की जैसी कृतियां पाठकों के सामने पेश की हैं। हरियाणवी संस्कृति को लेकर उनके लोक साहित्य में म्हारी रीत, म्हारे गीत, जकड़ी के रंग जीवन के संग, भारतीय लोक गीतों में हरियाणा का योगदान, हरियाणवी लोक गीतों का पारम्परिक सम्बन्ध, रीत तथा गीत, लघुकथा संग्रह माल्लक दैक्खै सै, नाटक संग्रह कोथली, हरियाणा प्रदेश के पर्वोत्सव एवं ऋतुमास गीत, हरियाणा प्रदेश के जन्म तथा विवाह संस्कार, कल और आज, हरियाणा प्रदेश के लोक नृत्य, एकांकी संग्रह हौंसला, काव्य संग्रह बटुआ बाँर हरियाणवी षोडश संस्कार पुस्तकें शामिल हैं। डा. रमाकांता ने नृत्य सरोवर (सुमन पांचाल) हरियाणा कला एवं सांस्कृति विभाग,पंचकूला, पौराणिक सांग सरिता (सांग संग्रह) रलदू राम, अजायब निवासी रोहतक तथा लोकगीतों में सांस्कृति एवं सौंदर्यात्मक तत्व, डॉ० ज्योत्सना की पुस्तकों का संपादन भी किया। जबकि मेरी छँटवा कहानियाँ, मधुदीप, दिल्ली और अलबेड्ढे कहानियाँ, डा. मधुकांत, रोहतक का अनुवाद भी किया है। 
सम्मान एवं पुरस्कार 
हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठकृति पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ महिला साहित्यकार एवं लेखक डा. रमाकांता शर्मा को कई दर्जन पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्हें प्रमुख रुप से भारत भूषण सम्मान, महादेवी वर्मा कविता गौरव सम्मान, काव्य पाठ सम्मान, हिन्दी साहित्य श्री सम्मान, हिन्दी साहित्यरत्न सम्मान, अमूल्य वृद्ध सम्मान, साहित्य सोम सम्मान पत्र, विवेकानन्द शिक्षारत्न सम्मान, डॉ० राधाकृष्णन सम्मान, रक्तदान सृजन सेवा सम्मान, वूमैन पॉवर अवार्ड, ‘श्रमिका श्री‘ सम्मान, प्रज्ञा साहित्यिक सम्मान, प्रज्ञा साहित्य सृजन सम्मान, साहित्य चेतना यात्रा सम्मान, निर्मला स्मृति हिन्दी साहित्य रत्न सम्मान, सरतीदेवी मित्तल स्मृति सम्मान, लाजवन्ती चावला स्मृति साहित्य रत्न सम्मान, अवन्तिक शाकुन्तलम् सम्मान, कमन्डेशन सर्टि फिकेट, प्रशंसा-पत्र (अध्यापक दिवस तथा शिक्षक दिवस सम्मान पत्र से नवाजा जा चुका है। इसके अलावा हरियाणा के तत्कालिक राज्यपाल द्वारा उन्हें रैडक्रास में समाजसेवा के उत्कृष्ट कार्यों के लिए सेवाकल में तीन बार तथा स्काऊट एंड गर्लगाइडज को राष्ट्रपति गाइडज बनाने सहयोग हेतु सम्मानित किया जा चुका है। 
29Jan-2024

सोमवार, 22 जनवरी 2024

चौपाल: हरियाणवी संस्कृति को संजोते हरियाणवी हास्य अभिनेता राजकुमार

कविता लेखक एवं हास्य कवि के रुप में भी बनी पहचान          व्यक्तिगत परिचय 
नाम: राजकुमार धनखड़ 
जन्मतिथि: 01 जनवरी 1978 
जन्म स्थान: गांव कासनी, जिला झज्जर(हरियाणा)
शिक्षा: एमए(संगीत), बीए, 
संप्रत्ति: कविता लेखन, गायन और अभिनय 
संपर्क: गांव कासनी, जिला झज्जर, मोबा. 9416178925
By-ओ.पी. पाल 
हरियाणा की लोककला और संस्कृति की पहचान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जीवंत रखने के मकसद से हरियाणवी लेखक, लोक कलाकार विभिन्न विधाओं में अपनी संस्कृति और परंपराओं के संवर्धन करने में जुटे हैं। ऐसे ही हरियाणवी फिल्मों व नाटकों में अभिनय, स्टेज संचालक और प्रसिद्ध हास्य कलाकार राजकुमार धनखड़ ने हरियाणवी संस्कृति को संजोने के लिए एक हास्य अभिनेता के रुप में लोकप्रियता हासिल की है। कविता लेखन के अलावा उन्होंने सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं को हास्य शैली में अपनी कला के माध्यम से प्रस्तुत करके समाज को सकारात्मक रुप से अपनी संस्कृति से जुड़े रहने का संदेश दिया है। हरियाणवी फिल्मों में हास्य अभिनेता के किरदार और कविता लेखन के सफर को लेकर हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में राजकुमार धनखड़ ने कई ऐसे अनुछुए पहलुओं का जिक्र किया है, जिसमें उनकी कला की अलग अलग विधाओं में हरियाणवी संस्कृति का समावेश सर्वोपरि रहा है। 
---- 
हरियाणवी हास्य अभिनेता राजकुमार धनखड़ का जन्म 01 जनवरी 1978 को झज्जर जिले के गांव कासनी में आजाद सिंह और श्रीमती शिलवती देवी के घर में हुआ। उनके साधारण परिवार में किसी प्रकार के लेखन, साहत्य या संस्कृति का कोई माहौल नहीं रहा। वहीं राजकुमार की प्राथमिक शिक्षा भी गांव के सरकारी स्कूल में हुई तथा वे दसवीं कक्षा तक गांव में पढ़े हैं। गांव के सरकारी स्कूल में ही कभी कभार होने वाले किसी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उन्हें थोड़ा बहुत बोलने का मौका मिलता रहा। बकौल राजकुमार जब वह पांचवी या छठी कक्षा में थे तो उन्होंने एक दो कविताएं लिखी थी और उन्होंने एक हास्य नाटिका में भी हिस्सा लिया, जिसमें उनका अभिनय सभी को भा गया। स्कूल के छात्र जीवन में ही उनके लेखन और अभिनय की एक प्रकार से शुरुआत हो गई। परिवार में उसकी साहित्य या संस्कृति का किसी ने कोई हस्तक्षेप भी नहीं किया, बल्कि हौंसला अफजाई ही की। दसंवी उत्तीर्ण करने के बाद वह उन्होंने नेहरू कॉलेज झज्जर में 11वीं कक्षा में प्लस वन और प्लस टू विज्ञान संकाय के छात्र के रुप दाखिला ले लिया, इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि क्योंकि देहात के बच्चे होने के कारण साइंस साइड होने की वजह से प्लस टू में वह फेल हो गए, हालांकि एक्टिंग व संगीत का शौंक तो उन्हें था ही और उनके विज्ञान विभाग के पास ही स्कूल में संगीत विभाग भी था, इसलिए खाली समय में वह संगीत विभाग के दरवाजे पर खड़ा होकर बहुत कुछ समझने लगा था। इसके बाद उन्होंने जाट कालेज रोहतक से आर्ट साइड में इंटरमिडिएट पास की और उच्च शिक्षा के लिए वह फिर से नेहरू कॉलेज झज्जर में प्रवेश कर गये, जहां से उन्होंने म्यूजिक के साथ बीए पास किया। फिर महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक में म्यूजिक विषय से एमएए पास की। इसलिए उनका गायन का भी क्षेत्र बढ़ गया। हालांकि इससे पहले प्लस वन और प्लस टू विज्ञान संकाय की शिक्षा के दौरान उन्होंने कॉलेज में यूथ फेस्टिवल आदि गतिविधियों के तहत टैलेंट शो में भाग लेते रहे और हरियाणवी स्किट में भी भागीदारी की। इसके बाद उन्होंने इंटर कॉलेज की विभिन्न प्रतियोगिताओं में भी हिस्सेदारी की। मसलन छात्र जीवन में ही राजकुमार की लेखन, अभिनय और हास्य गायन में अभिरुचि हो गई। वह गीत व कविताएं लिखने के साथ विभिन्न कंपटीशन में हिस्सेदारी करके इस क्षेत्र में आगे बढ़ते गये। उनकी गोधू का ब्याह, गोधू की ससुराल और गोधू की फैमिली जैसी सभी कविताएं या गीत हंसी मजाक से भरी होती थी। उनके अभिनय का प्रमुख फोकस हास्य के साथ ज्यादातर चरित्र सामाजिक सरोकार, हरियाणवी लोक कला, संस्कृति और हरियाणवी भाषा के संवर्धन पर रहा है। 
इन फिल्मों में अभिनय से जीता दिल 
फिल्म और थियेटर के क्षेत्र में हास्य अभिनेता के रुप में करीब 25 साल का अनुभव रखने वाले हरियाणवी अभिनेता राजकुमार को हिंदी, हरियाणवी, अंग्रेजी और पंजाबी भाषा का ज्ञान है। इस दौरान उन्होंने फिल्म शहीद-ए-हरियाणा, तेरा मेरा वादा, सेल्यूट, हंसा, कर्म जैसी फिल्मों में अभिनय करके लोकप्रियता हासिल की। उन्होंने उन्होंने वेब सीरीज शिविर बनवास, मेरे यार की शादी 1 और 2, देसी थाना, हरियाणा में लंदन, दिल हो गया लापता, कॉलेज कांड, बवाल, विदेशी बहू और गुलाब चूरमा जैसे में भी हास्य अभिनय से दर्शकों पर राज किया है। दो वेब सीरीज में उनके साथ फिल्म निर्देशक यशपाल शर्मा भी शामिल रहे हैं। यही उन्हें कवि सम्मेलन में भी भाग लेने का मौका मिला, जिसके बाद राष्ट्रीय युथ फेस्टिवल में एक कवि के तौर पर हास्य कविताओं को सुनाने का मौका मिलने से उनका संपर्क अंतरराष्ट्रीय स्तर के कवि सुरेंद्र शर्मा, प्रताप फौजदार, शैलेश लोढ़ा जैसे कवियों से हुआ, जिनसे सराहना भी मिली। हरियाणवी फिल्मों के निर्देशक अरविंद स्वामी, हरियाणवी फिल्मों के संगीतकार भाल सिंह बल्हारा जैसे कलाकारों संगीतकारों से मुलाकात भी उसके क्षेत्र में प्रोत्साहन का सबब बना। 
यहां से मिली मंजिल 
हरियाणवी हास्य अभिनेता और गीतकार राजकुमार धनखड़ ने बताया कि कॉलेज पास आउट होते ही उन्हें पहली बार हरियाणवी स्किट में भाग लेने का मौका मिला, यह स्किट कॉलेज पास आउट होते ही निर्देशक के रुप में राजेश फौगाट करवाते थे। इसलिए इस क्षेत्र में उनके गुरु फौगाट ही रहे, लेकिन अफसोस है कि दुर्भाग्यवश वह आज इस दुनिया में नहीं हैं। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक में संगीत विषय में एमए की शिक्षा के दौरान वहां जनार्दन शर्मा, जगबीर राठी, आनंद शर्मा जैसे लोगो के संपर्क में आया तो उनसे इस क्षेत्र में बहुत कुछ सीखने को मिला। इसका परिणाम यह रहा कि वह इंटर यूनिवर्सिटी तक गए और राष्ट्रीय स्तर तक हमारी हरियाणवी स्किट द्वितीय स्थान पर रहे। इसका कारण भी भाषा रही, जहां हरियाणवी को हिंदी में कन्वर्ट कर लिया गया था। उन्होंने बताया कि फिर भी उसके लिए यह पहली उपलब्धि से कम नहीं थी, जहां राष्ट्रीय स्तर पुरस्कार हासिल हुआ। जगबीर राठी के प्रोत्साहन से यहां इस क्षेत्र में कई तरह के अनुभव हुए, जिनकी बदौलत अलग अलग स्थानों पर राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में चुटकला और हास्य प्रतियोगिताओं में उन्हें एक हास्य अभिनेता और कलाकार के रुप में पहचान मिली। 
सम्मान व पुरस्कार 
हरियाणा की समृद्ध लोककला एवं संस्कृति के क्षेत्र में लेखन की विधा में कलाकार राजकुमार धनखड़ को तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा और राज्यपाल जगन्नाथ पहाड़िया ने साल 2012 में फौजी जाट मेहर सिंह अवार्ड से सम्मानित किया। गीत, कविता और रागनी लेखन विद्या में उत्कृष्ट योगदान के लिए इस पुरस्कार में इक्यावन हजार रुपये, प्रशस्ति पत्र तथा अंग वस्त्र प्रदान किया जाता है। इसके अलावा उन्हें वर्ष 1997 में राज्य स्तरीय चुटकुला प्रतियोगिता में चुटकुला सम्राट सम्मान, वर्ष 1998 में जिला रोहतक रेड क्रॉस की तरफ से प्रशस्ति पत्र, वर्ष 2001 में अंतर विश्वविद्यालय युवा महोत्सव राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय पुरस्कार तथा वर्ष 2015 में ओस्का समिति दिल्ली द्वारा युवा कवि सम्मान से नवाजा गया है। वहीं विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यक मंचों से उन्हें बहुत से पुरस्कार मिल चुके हैं। 
22Jan-2024

सोमवार, 8 जनवरी 2024

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने रखी पतंजलि गुरुकुलम की आधारशिला

 नई शिक्षा नीति में वैदिक शिक्षा व नैतिक मूल्यों का समावेश: रक्षामंत्री 
बदलते भारत में गुरु शिष्य परंपरा गुरुकुल शिक्षा पद्धति से संभव: रामदेव 
गुरुकुल पुनः अपने अतीत के गौरव को प्राप्त करेगा: आचार्य बालकृष्ण 
ओ.पी. पाल, हरिद्वार। पतंजलि योगपीठ के 29वें स्थापना दिवस, महर्षि दयानन्द सरस्वती की 200वीं जयन्ती एवं गुरुकुल ज्वालापुर के संस्थापक पूज्य स्वामी दर्शनानन्द की जयन्ती पर देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शनिवार को ज्वालापुर में ‘पतंजलि गुरुकुलम्’ व आचार्यकुलम् का शिलान्यास किया। राजनाथ ने लुप्त होती देवभाषा संस्कृत के संवर्धन पर बल देते हुए कहा कि गुरुकुल इस बदलते भारत के लिए ऐसी शिक्षा पद्धति में अहम भूमिका निभाएंगें। 
समारोह में राजनाथ ने कहा कि गुरुकुलों में शिक्षा के साथ-साथ समाज में शुचिता व नैतिकता का पाठ भी पढ़ाया जाता था। उन्होंने कहा कि मैकाले ने एक षड्यंत्र के तहत ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित की जिसने हमारी गुरुकुलीय परम्परा को लगभग समाप्त ही कर दिया था। किन्तु योगगुरु स्वामी रामदेव जैसे तपस्वी महापुरुष ने गुरुकुल की परम्परा को पुनः गौरव प्रदान करते हुए पतंजलि गुरुकुलम् की आधारशिला रखी। उन्होंने उम्मीद जताई कि स्वामी रामदेव के दिशानिर्देशन में संचालित पतंजलि गुरुकुलम् भारतीय संस्कृति व सनातन की ध्वजवाहक बनेगा। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति सनातन को जीवंत रखने इस देश के गुरुओं का बहुत बड़ा योगदान है। 1500 वर्ष पूर्व नालंदा व तक्षशिला विश्वविद्यालय उसी गुरुकुलीय परम्परा के श्रेष्ठ उदाहरण हैं जहाँ से पूरा विश्व शिक्षा के क्षेत्र में दीप्तमान होता था। स्वामी जी भी उसी दिशा में कार्य कर रहे हैं तथा गुरुकुलों की स्थापना कर महर्षि दयानंद के स्वप्न को साकार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पतंजलि ने योग जैसा ग्रंथ संस्कृत में लिखा है, संस्कृत भाषा हमारी देव भाषा होने के साथ वैज्ञानिक भाषा भी है, इसलिए संसकृति के साथ लुप्त होती संस्कृत भाषा के संवर्धन में गुरुकुल अहम भूमिका निभा सकते हैं। राजनाथ सिंह ने कहा कि गुरुकुल शिक्षा प।ति के साथ ही हमें आधुनिक शिक्षा की जरुरत है, इसलिए गुरुकुल शिक्षा में वैदिक शिक्षा के साथ नैतिक शिक्षा की आवश्यकता है। इसी लिए नई शिक्षा नीति को नैतिक मूल्यों के समावेश के साथ लागू किया गया है। 
मानव सेवा को समर्पित अर्थ साम्राज्य 
इस अवसर पर स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि हमने गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त कर मानव सेवा के लिए विशाल अर्थ साम्राज्य स्थापित किया। अभी 500 करोड़ की लागत से पतंजलि गुरुकुलम् तथा आचार्यकुलम् तैयार करने की योजना है तथा साथ ही अगले 5 सालों में 5 से 10 हजार करोड़ रुपए शिक्षा के अनुष्ठान में खर्च करने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि जो देश से पाया, उसे इस देश को वापस लौटाना है। हमने महर्षि दयानंद के पदचिन्हों पर चलकर योगधर्म से राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि रखा है। महर्षि दयानंद ने एक ओर वेद धर्म, सनातन धर्म की बात की तो वहीं दूसरी ओर राष्ट्र धर्म के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले बलिदानी तैयार किए। पतंजलि गुरुकुल सनातन के ध्वजवाहक तैयार करेगा जो पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार करेंगे। 
नए कीतिमान स्थापित करेगा गुरुकुल 
पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण जी ने कहा कि पूज्य स्वामी दर्शनानंद जी ने अल्प संसाधनों से यह संस्था प्रारंभ कर एक स्वप्न देखा था जिसे श्रद्धेय स्वामी रामदेव जी महाराज साकार कर रहे हैं। इस संस्था ने अपनी युवावस्था के गौरव को देखा है। कहीं न कहीं यह संस्था अपनी वृद्धावस्था की तरफ जा रही थी किन्तु श्रद्धेय स्वामी जी के तप व पुरुषार्थ से यह पुनः अपने अतीत के गौरव को समेटे हुए वैभव प्राप्त करेगी। अतीत में देखें तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, राष्ट्रपति तथा पाँच प्रधानमंत्रियों ने भी गुरुकुल ज्वालापुर की भूमि को प्रणाम किया है, भविष्य में इस भूमि से नए-नए कीर्तिमान स्थापित किए जाएँगे जिसके साक्षी दुनिया के प्रतिष्ठित लोग होंगे। 
एमपी में गुरुकुल स्थापित करने की पेशकश 
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि त्रेता में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम तथा द्वापर में योगेश्वर कृष्ण ने गुरुकुलों में शिक्षा ग्रहण की। स्वामी रामदेव जी उसी गौरवशाली गुरुकुलीय परम्परा के संवाहक बन गुरुकुलीय परम्परा को गौरव प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमने नई शिक्षा नीति के माध्यम से भविष्य की पीढ़ी को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का प्रण लिया है। हमारा लक्ष्य विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास है। हमें मानवीयता के उत्कृष्ट मापदण्ड स्थापित करने हैं। उन्होंने स्वामी जी को मध्य प्रदेश के उज्जैन में गुरुकुल स्थापित करने तथा मध्य प्रदेश से पतंजलि के सभी प्रकल्पों को संचालित करने के लिए आमंत्रित किया। 
देश में बहेगी संस्कृति की गंगा 
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि गुरुकुल एक विशिष्ट शब्द है जहाँ गुरु शिष्य को कुलवाहक मानकर शिक्षित कर उसका मार्ग प्रशस्त करता है। स्वामी रामदेव जी महाराज महर्षि दधिचि के समान अपना सर्वस्व देश व समाज की सेवा में न्यौछावर कर रहे हैं। यह गुरुकुल बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी प्रदान करेगा जिससे वे आदर्श नागरिक बनकर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में योगदान देंगे। यह गुरुकुल व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना साकार करेगा। पतंजलि की गंगोत्री से भारतीय संस्कृति की गंगा बहेगी। 
ये भी रहे शामिल 
समारोह में केन्द्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी, एमिटी ग्रुप के चेयरमैन डॉ. अशोक चौहान, बाबा बालकनाथ महाराज, लक्ष्मण गुरु जी, अखाड़ा परिषद अध्यक्ष स्वामी रविन्द्रपुरी जी महाराज, महामण्डलेश्वर स्वामी हरिचेतनानंद जी महाराज, स्वामी यतीश्वरानंद, सांसद सत्यपाल सिंह, धनसिंह रावत, रमेश पौखरियाल ‘निशंक’, शोभित गर्ग, मदन कौशिक, प्रणव सिंह ‘चैम्पियन’, सुरेश चन्द्र आर्य, आचार्य स्वदेश, विनय आर्य, दयानंद चौहान, स्वामी आर्यवेश, आचार्या सुमेशा, आचार्या सुकामा, सुशील चौहान, स्वामी सम्पूर्णानंद सहित आर्य समाज के लगभग सभी विद्वान, भजनोपदेशक और संन्यासी महापुरुष, हरिद्वार के सभी पूज्य आचार्य महामण्डलेश्वर व संत महात्मा, गुरुकुल ज्वालापुर की महासभा व प्रबंधकारिणी सभा के समस्त अधिकारी व सदस्यगण तथा पतंजलि से सम्बद्ध सभी ईकाइयों के इकाई प्रमुख, अधिकारी, कर्मचारी तथा संन्यासी भाई-बहन उपस्थित रहे। 
07Jan-2024

मंगलवार, 26 दिसंबर 2023

साक्षात्कार: साहित्य में हिंदी को नया आयाम देते डॉ. विश्वबंधु शर्मा

हरियाणवी भाषा के व्याकरण लेखन ने दी खास पहचान व्यक्तिगत परिचय 
नाम: डॉ. विश्वबंधु शर्मा 
जन्मतिथि: 02 सितम्बर, 1953 
जन्म स्थान: ग्राम-पुर, तहसील-बवानी खेड़ा, जिला-भिवानी (हरियाणा) 
शिक्षा: एमए(इतिहास), एमए (हिन्दी), पीएचडी, डी.लिट् सम्प्रति: सेवानिवृत्तअध्यक्ष, हिन्दी विभाग, वैश्य कॉलेज, रोहतक (हरियाणा), पूर्व प्रो. बीएमयू, स्वतंत्र लेखन 
संपर्क: 97-98, नेहरु कॉलोनी, रोहतक(हरियाणा), मोबा. 9050998171 
BY-ओ.पी. पाल 
साहित्य जगत में साहित्यकारों, लेखकों एवं कवियों ने किसी न किसी विधा में साहित्य सृजन करते हुए सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर समाज को सकारात्मक विचारधारा के लिए नई ऊर्जा देने में अहम योगदान दिया है। वहीं अपनी संस्कृति तथा परंपराओं के संवर्धन के लिए भी साहित्य साधना के माध्यम से नई पीढ़ियों की राह प्रशस्त करने का प्रयास में जुटे साहित्यकारों में सुप्रसिद्ध लेखक एवं कवि डा. विश्वबंधु शर्मा एक ऐसे मूर्घन्य विद्वानों में शुमार हैं, जिन्होंने हरियाणा की लोक कलाओं और संस्कृति के स्वरुप व उसे पहचान दिलाने के मकसद से साहित्य सेवा करते हुए हरियाणवी, हिंदी और संस्कृत भाषा में साहित्य सृजन कर रहे हैं। उन्होंने हरियाणा भाषा का व्याकरण लिखकर हरियाणवी भाषा के साहित्यकार के रुप में तो लोकप्रियता हासिल की है, वहीं वे पिछले दस साल से हिन्दी भाषा के व्याकरण करके ‘शब्द निर्माण विज्ञान’ पर गहनता से कार्य करने में जुटे हुए हैं। उनकी यह साहित्य साधना हिंदी जगत के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी? विभिन्न विधाओं में गद्य एवं पद्य में लेखन करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विश्वबंधु शर्मा ने अपने साहित्यिक सफर के बारे में हरिभूमि संवाददाता से बातचीत में कई ऐसे महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर किया है, जिसमें उनकी साधना साहित्य जगत को नया आयाम देने में सक्षम हो सकती है। 
--- 
हरियाणा के सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा‍. विश्वबंधु शर्मा का जन्म 02 सितम्बर, 1953 को भिवानी जिले के पुर गांव में संस्कृत के प्रकांड पंडित ब्रजलाल शास्त्री और श्रीमती अंती देवी के घर में हुआ। उनके पिता ब्रजलाल उस समय के उत्तर भारत के एक मात्र अग्निहोत्री थे। मसलन उनके परिवार में दियासलाई से आग जलाना प्रतिबंधित था और परिवार में पांच कुंड से अग्नि लेकर ही चूल्हे के अलावा अन्य आग जलाई जाती थी। परिवार में साहित्य और संस्कृति के माहौल में डा. विश्वबंधु को उनके पिता ने संस्कृत श्लोक कंठस्थ करा दिये थे। डॉ. विश्वबंधु शर्मा ने बताया कि विरासत में मिली साहित्य-संस्कृति की वजह से बचपन से ही उन्हें साहित्य, कला एवं परंपरागत संस्कृति में रुचि हो गई। छात्र जीवन में स्कूल में साप्ताहिक बाल सभाओं में वे कविताएं सुनाने लगे थे और सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा भाषण प्रतियोगिताओं में जहां भी वह हिस्सा लेते थे, तो प्रथम पुरस्कार उन्हीं को मिलता था। जब वह कक्षा सात में पढ़ रहे थे, तो साल 1967 में उनके पिता का बीमारी के चलते निधन हो गया। इस वजह से स्कूल जाना कम हो गया और घर की जिम्मेदारियां बढ़ गई। किसी तरह से द्वितीय श्रेणी में मैट्रिक पास कर ली। भिवानी में उनके विज्ञान के शिक्षक रामेश्वरदास पुरी उनसे प्रेम करते थे, जो उसे अपनी ससुराल साहनेवाल (पंजाब) ले गये, जहां उनकी ससुराल में लाला छज्जूमल को काम करने वाले लड़के की जरुरत थी। दो साल तक उनके यहां काम किया और वहीं से लाला की मेहरबानी ने उन्होंने साल 1970 में प्रभाकर पास किया। लाला छज्जूमल ने उन्हें गुरुनानक हायर सेकेंडरी स्कूल प्रतापपुरा, जालंधर में हिंदी अध्यापक लगवा दिया, जहां वे प्रबंधन समिति के सदस्य थे। उसके बाद वह हिसार आ गये, जहां से ओटी की परीक्षा पास की। बकौल डा. विश्वबंधु शर्मा उन्होंने परिवार की जिम्मेदारी संभालते हुए अपने छोटे भाईयों को भी पढ़ाया, जिनमें से एक फौज में गया और कारगिल युद्ध में शहीद हुआ और दो भाई शास्त्री हो गये। उन्होंने खुद दो विषयों में एमए किया। राजस्थान यूनिवर्सिटी जयपुर से उन्होंने साठोत्तरी हिंदी में शोधकार्य कर पीएचडी की, जबकि आधुनिक हिन्दी महाकाव्यों का समाजशास्त्रीय अध्यन कर डीलिट की उपाधि हासिल की है। सितंबर 1981 में डा. शर्मा वैश्य कालेज रोहतक में हिंदी विभाग में लेक्चरार के रुप में नियुक्त हुए और 20 साल तक विभागध्यक्ष रहने के बाद सितंबर 2013 में एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद उन्होंने बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय रोहतक में प्रोफेसर तथा गुरुनानक सेंटर मीरपुर रेवाडी में निदेशक के रुप में कार्य किया। उन्होंने बताया कि साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने ज्यादा हरियाणवी में लेखन किया, जिसमें हरियाणा की लोक कलाओं पर ज्यादा अध्ययन किया और पहला ग्रंथ भी हरियाणा संस्कृति अकादमी के अनुदान से प्रकाशित हुआ। जबकि उनका आलोचानात्मक लेखन का हिंदी में हुआ। डा. शर्मा ने साहित्यकार बनाने का श्रेय रुपचंदानी खुराना और अवतार पराशर को दिया, जिन्होंने उसे आकाशवाणी रोहतक से जोड़े रखा और और हरियाणवी नाटक तथा झलकी विद्या के साथ कार्यक्रमों में मौका दिया। जबकि उनके प्रेरणा स्वरुप डा. हरीश वर्मा रहे। डा. शर्मा के एकांकी संकलन की दो एकांकियों का संस्कृत में अनुवाद भी हो चुका है। डा. विश्वबंधु शर्मा की झलकियां आकाशवाणी रोहतक केंद्र से प्रसारित हैं और उनकी कोरी हांडी की एकांकियों का मंचन कई बार एमडीयू के क्षेत्रीय युवा समारोह में भी हुआ। वहीं उनके साहित्य पर कई विद्यार्थियों ने पीएचडी के शोध कार्य भी किये हैं। डा. शर्मा के हरियाणवी लोक कलाओं पर विशेष अनुसंधन हुए और 25 से ज्यादा शोधात्मक लेख विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने विभिन्न शैक्षिक, सामाजिक, साहित्यक समितियों में रहते हुए प्रशासनिक कार्य में भी अहम भूमिका निभाई है। 
हिंदी का कोई भी शब्द अपना नहीं 
सुप्रसिद्ध लेखक एवं साहित्यकार डा. विश्वबंधु हिंदी के शब्दों के अर्थ शब्दों के व्याकरण पर कार्य करते हुए कर रहे है। उनका कहना है कि हिंदी का कोई भी शब्द अपना नहीं है, जिसमें विभिन्न राज्यों की बोली के शब्दों का मिश्रण है। इसलिए वे पिछले दस साल से हिंदी के शब्द निर्माण विज्ञान पर कार्य कर रहे हैं और अभी तक पहला खंड पूरा हुआ है, जबकि इसका कार्य अभी जारी है। इस आधुनिक युग में साहित्य के सामने आई चुनौतियों के बारे में उन्होंने कहा कि अपनी जड़ो से जुड़े रहना जरुरी है और पुरानी परंपराए समाज में रीड की हड्डी है, जिसमें आस्था और अनास्था दोनों जुड़ी हैं। लेकिन इंटरनेट और मोबाइल के इस युग में खासकर युवा पीढ़ी के दिमाग, शरीर व चरित्र तीनों भ्रष्ट हो रही है और समाज भी पथभ्रष्ट हो रहा है। युवा पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने के लिए साहित्यकारों व लेखकों को आदर्श कविता व रचना के साथ अच्छे लेखन करने की आवश्यकता है। 
प्रकाशित पुस्तकें 
वरिष्ठ साहित्कार डॉ. विश्वबंधु शर्मा की प्रकाशित 30 पुस्तकों में साठोत्तर हिन्दी-महाकाव्यों में पात्र-कल्पना, संक्षिप्त भाषा विज्ञान, हिन्दी भाषा भास्कर, चेत मछंदर गोरख आया( हरियाणवी उपन्यास), जामदग्नेय (उपन्यास), आपणा मरण जगत की हाँसी व कोरी हाण्डी (हरियाणवी झलकी संग्रह), भगत सुदामा (हरियाणवी खण्डकाव्य), दुर्गा चरित (हरियावणी महाकाव्य), चासणी (हरियाणवी कविता-संग्रह), हरियाणा के लोकगीत (संपादित), भारत का सूरज: सूरजमल (हरियाणवी ऐतिहासिक उपन्यास), लाला छज्जूमल (संस्मरण संग्रह), दीवानों का मसीहा (हरियाणवी जीवनी), साठोत्तरी हिन्दी कविता, हरियाणा की लोक कलाएँ, आधुनिक हिन्दी-महाकाव्यों का समाजशास्त्रीय अध्ययन, कामायनी का समाजशास्त्रीय विश्लेषण, संत जाभो जी:साधना पद्धति और सामाजिक अवदान, काहे कबीरा भया कबीर, हरियाणवी भाषा:स्वरूप और पहचान, हरियाणवी लोक-साहित्य की ज्ञान-गगरिया:पहेली, शुद्ध हिन्दी कैसे लिखें?, हरियाणवी भाषा का व्याकरण, हरियाणवी भाषा का भाषा वैज्ञानिक आधार, वंशावली, बणछटियाँ की चिंगारी, लोक-अनुभूति का सीसा और भीत्तरले की झाल प्रमुख रुप से शामिल हैं। इसके अलावा उनके दो उपन्यास द्रोणि और टुकड़े-टुकड़े दास्तान प्रकाशनाधीन हैं। 
पुरस्कार व सम्मान 
हरियाणा साहित्य अकादमी से झलकी संग्रह ‘अपणा मरण जगत की हांसी’ और साठोत्तरी हिंदी कविता पर प्रथम पुरस्कार हासिल करने वाले डॉ. विश्वबंधु शर्मा को अकादमी द्वारा जनकवि मेहर सिंह सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। इसके अलावा उन्हें उदयभानु हंस वरिष्ठ साहित्यकार सम्मान, रघुवीर सिंह मथाना पुरस्कार, सारस्वत सम्मान, शाश्वामृत सम्मान, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी समृति सम्मान, कलम नायक सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, विद्यासागर सम्मान, साहित्य कौस्तुभम् अलंकरण सम्मान, कबीर सम्मान के साथ ही अध्यापन सम्मान प्रशंसा प्रमाण पत्र और विद्या वारिधि की उपाधि भी दी गई है। इनके अलावा डा. शर्मा को भारत की विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा उन्हें सैकड़ो पुरस्कार हासिल हो चुके हैं। 
25Dec-2023

सोमवार, 18 दिसंबर 2023

साक्षात्कार: संस्कृत भाषा में साहित्य सृजन करते महावीर शर्मा

समाज को कंठस्थ गीता के संदेश से संस्कारों की अलख जगाने में जुटे 
 व्यक्तिगत परिचय 
नाम: डॉ. महावीर प्रसाद शर्मा 
जन्मतिथि: 21 सितम्बर 1945 
जन्म स्थान: गाँव कालवन, जिला जींद (हरियाणा) 
शिक्षा: एमए (संस्कृत), एमए (हिंदी), पीएचडी, शास्त्री, साहित्याचार्य। 
संप्रत्ति:‍ लेखक, साहित्य सृजन करना, सेवानिवृत्त संस्कृत लेक्चरार 
संपर्क: 317/7,यू.ई., करनाल(हरियाणा), मोबाइल: 9896944707 
BY--ओ.पी. पाल 
साहित्य के जगत में सुविख्यात साहित्यकार एवं संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान डॉ. महावीर प्रसाद शर्मा ऐसे लेखकों में शामिल है, जिन्होंने हिंदी, संस्कृत और हिरयाणवी भाषाओं में लेखन करके साहित्य सृजन किया है। उन्होंने विभिन्न विधाओं में अपनी रचनाओं को विस्तार देते हुए काव्य संग्रह, बाल काव्य संग्रह, महाकाव्य, खंड काव्य जैसी कृतियों को अपनी श्रेष्ठ लेखनी से समाज को नई दिशा देने का प्रयास किया। भारत की सभी भाषाओं की जननी कही जाने वाली संस्कृत भाषा तो उन्हें विरासत में मिली, जिस कारण वह संस्कृत भाषा में लेखन करने वाले शायद हरयिाणा के ऐसे पहले साहित्यकार है, जिन्होंने संस्कृत भाषा को साहित्य में सर्वोपरि रखा और संपूर्ण गीता उन्हें कंठस्थ है, जिसमें उनकी स्वलिखित गीता का संदेश पिछले दो दशक से ज्यादा समय से आकशवाणी से प्रसारण होता आ रहा है। साहित्य में श्रेष्ठ लेखनी के धनी डा. महावीर प्रसाद शर्मा ‘शास्त्री’ ने हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में अपने साहित्यिक सफर के अनुभवों को साझा किया और समाज को यह संदेश दिया कि संस्कृत के बिना संस्कार संभव नहीं हैं। 
----- 
सुविख्यात साहित्यकार एवं संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान डॉ. महावीर प्रसाद शर्मा का जन्म 21 सितम्बर 1945 को जींद जिले के गाँव कालवन पंडित जयदेव मिश्र के घर में हुआ। उनके दादा शिवदत्त बड़े विद्वान थे, तो ऋषिकुल ब्रह्मचर्य आश्रम बरनाला में आचार्य थे, जहां डा. महावीर शर्मा शिक्षा दीक्षा हुई। इसलिए उन्हें संस्कृत और साहित्य संस्कारों में मिला है। उनका परिवार संस्कृत भाषा को चार पीढ़ियों से संजोए हुए है। चूंकि उनके पिता जयदेव मिश्र भी संस्कृत के विद्वान रहे और उनके चाचा साधुराम फाजिल्का के एक संस्कृत कॉलेज में प्रधानाचार्य थे। पिता को प्रेरणास्रोत मानते हुए उन्होंने अपनी लगन, मेहनत व जुनून और संस्कृत भाषा में गहन रुचि से उनकी अपनी अपनी खुद की पहचान बनाई। उन्होंने बताया कि उस जमाने में अष्टाध्यायी, अमरकोश और भट्टीकाव्य इन तीनों को प्रमुखता से पढाया जाता था। उसी प्रणाली से में पढ़ाई की है तो जाहिर सी बात है कि पहले संस्कृत और बाद में उन्होंने हिंदी सीखी। बकौल आचार्य महावीर शर्मा उन्होंने छात्रावस्था में ही लिखना शुरू कर दिया था। जनवरी 1965 में उन्होंने अध्यापन कार्य शुरू किया और सितंबर 2003 में संस्कृत के लेक्चरर पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने बताया कि आकाशवाणी कुरुक्षेत्र के निदेशक श्रीवर्धन कपिल उनके मित्र थे, जिनका मार्ग दर्शन मिला और जिन्होंने आकाशवाणी की ओर से उज्जैन में 26 जनवरी पर आयोजित होने वाले सर्वभाषा कवि सम्मेलन के लिए उन्हें मौका दिया। इस राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन में देशभर से 22 भाषाओं के कवि भाग ले रहे थे। हरियाणा से इस मंच पर माधव कौशिक और डॉ चंद्र त्रिखा भी थे। यहीं से उन्हें अहसास हुआ कि साहित्य क्या है और साहित्य में हरियाणा कहां है। इसके बाद साहित्य क्षेत्र में सक्रिय होकर उन्होंने साल 1994 में पहला खंडकाव्य 'हरियाणा गौरवम्' लिखा, जो हरियाणा साहित्य अकादमी के अनुदान से प्रकाशित हुआ। बकौल डा. महावीर उनके पास संन्यासी सत्यानन्द सिद्धांत कौमुदी पढने आते थे, जिनसे उन्होंने बांग्ला भाषा सीखी गीताजलि पढ़ी, जिसकी 103 कविताओं का उन्होंने काव्यानुवाद संस्कृत में किया। इस दौरान उन्हें ऐसे विद्वान की कमी महसूस हुई जो संस्कृत और बांग्ला दोनों भाषा जानता हो। ऐसे विद्वान के रुप में एक मूर्धन्य साहित्यकार एवं हिमाचल के राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री का पता चला, तो उन्होंने उन्हें पत्र लिखकर पुस्तक की भूमिका लिखने का अनुरोध किया, तो उन्होंने सहमति के बाद उसकी भूमिका लिखी और उनकी संस्कृत में गीतांजलि का काव्यनुवाद पुस्तक का प्रकाशन हुआ, जिसे अकादमी ने पुरस्कृत भी किया गया। उन्होंने बताया कि झारखंड के साहबगंज में हुए एक कवि सम्मेलन में वहां पहुंचे कुछ कवियों ने हरियाणवी लेखन के बारे में जानने का प्रयास किया तो उनकी बात ऐसी घर कर गई, लेकिन प्रेरणा भी मिली, जिसकी बदौलत उन्होंने वहां से आते ही 500 पृष्ठीय ‘जै हरयाणा महाकाव्य’ लिख डाला, जिसके बाद उन्होंने हरियाणवी भाषा में चार पांच पुस्तकों की रचना कर ड़ाली। मसलन उनकी प्रकाशित चालीस पुस्तकों में 25 संस्कृत व 5 हरियाणवी बोली में हैं और इनमें से उनकी सात पुस्तकों पर शोधार्थियों द्वारा पीएचडी भी की जा चुकी है। उन्होंने सुखमणि साहब का संस्कृत में एक हजार श्लोकों का अनुवाद भी किया। उन्होंने बताया कि वह संस्कृत में भवभूति, जगन्नाथ, बाणभट्ट हिंदी में जय शंकर प्रसाद, हरिवंश राय बच्चन, रामधारी सिंह दिनकर, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला से बेहद प्रभावित हैं। पिछले बीस साल से आकाशवाणी पर शास्त्री जी का रोजाना शाम 6:10 पर गीता का संदेश भी आता है। दिल्ली संस्कृत अकादमी समेत अखिल भारतीय स्तर पर भी उनकी श्रेष्ठ लेखनी के लिए उन्हें कई बार पुरस्कृत किया गया है। उन्हें गीता कंठस्थ है और आकाशवाणी केंद्र से 15 वर्ष से स्वलिखित गीता संदेश का प्रसारण हो रहा है। 
संस्कृत साहित्य सृजन भी जरुरी 
प्रसिद्ध साहित्यकार डा. महावीर शर्मा ने इस आधुनिक युग में साहित्य के सामने पेश आ रही चुनौतियों को लेकर कहा कि जिस प्रकार आज लोग संस्कृत से दूर हो रहे हैं। इसलिए यह एक चिंता का विषय है कि संस्कृत जो हमारी प्राचीन भाषा है भी लुप्त होने के कगार पर है, जिसे बचाने की आवश्यकता है। संस्कृत नहीं बचेगी तो संस्कार भी न बचेंगे। उनका स्पष्ट मत है कि संस्कृत के बिना संस्कार नहीं है और संस्कार के बिना साहित्य अधूरा है। वैसे भी साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। ऐसे में समाज को दिशा देने वाले साहित्य जिसमें संस्कृत भाषा में भी रचनाएं लिखने की जरुरत हैं। जहां तक साहित्य के प्रति कम होती अभिरुचि का सवाल है इसका कारण है कि पहले कविताएं और कहानियां इतनी लंबी होती थी, जो आज लघु कविता और लघु कथाओं का रुप लेने लगी हैं। इस तकनीकी मोबाइल के जमाने में उपन्यास से लेकर अन्य बड़ी रचनाओं के पाठकों में आ रही कमी का भी यही कारण है। लेखन खत्म होता जा रहा है और आज साहित्य की विधाओं में कोई छंद व ताल तक नजर नहीं आता। जबकि अलंकर छंदो का ज्ञान साहित्य को विशिष्टता प्रदान करता है। 
प्रकाशित पुस्तकें 
साहित्य की विविध विधाओं में उनकी अब तक प्रकाशित 40 पुस्तकों में हिंदी भाषा में मिताक्षरा (काव्य-संग्रह), आओ कविता एक बनाए(बालसाहित्य), झरने का गीत (बाल काव्य संग्रह); हरियाणवी में जै हरियाणा, राणीभाद्री (महाकाव्य), एक रपैय्या एक ईट (सम्पूर्ण नाटक), धनी होणे का मन्तर, इसी तरह संस्कृत भाषा में हरियाणा गौरवनम्, ऋतंवदा, हरियाणा वाणी विलासः, कल्पना चावला, माया ब्रह्मस्तुतिः (खंड-काव्य), वैराग्य वीर चरितम्, मैक्स-मूलरचरितम्, लोक कवि मांगे राम चरितम्, श्री गुरु रविदास विजय चरितम् तथा भगवद् वाल्मीकि चरितम् आदि पुस्तके अल्लेखनीय हैं। गीतांजलि, मधुशाला, जपजी साहेब, सुखमनीसाहेब, शृणुराधिके का संस्कृत भाषा में अनुवाद किया। डा. शर्मा की रानी मादरी, बंदा बैरागी, मैक्समुलर, वीर सावरकर, देवर्षि नारद जैसी रचनाएं कालजयी हैं। भगवान वाल्मीकि चरित्र पर उन्होंने अपने जीवन का सातवां महाकाव्य भी लिखा है। 
पुरस्कार व सम्मान 
पंडित लख्मीचंद अवार्ड, पं. माधव प्रसाद मिश्र सम्मान, सर्वोत्तम लेखक सम्मान, महर्षि वेद व्यास सम्मान, आश्व कवि पुरस्कार, पंडित लख्मीचंद अवार्ड, महर्षि वाल्मीकि सम्मान, हरियाणा संस्कृत गौरव सम्मान, पं. माधव प्रसाद मिश्र सम्मान, हरियाणा साहित्य अकादमी और संस्कृत अकादमी के विशिष्ट लेखक सम्मान, महर्षि व्यास सम्मान, महर्षि वाल्मीकि सम्मान, पंडित लख्मीचन्द सम्मान, हरियाणा संस्कृत गौरव सम्मान, पं. माधव प्रसाद मिश्र सम्मान से सम्मानित, उत्तर प्रदेश सरकार ने भी उन्हें 'कालिदास सम्मान से सम्मानित किया है। इसके अलावा उन्हें दिल्ली संस्कृत अकादमी समेत अखिल भारतीय स्तर पर भी अनेक पुरस्कारों के साथ देशभर में विभिन्न साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं द्वारा हजारों पुरस्कार देकर सम्मानित किया जा चुका है। 
राष्ट्रीय स्तर पर हरियाणा का प्रतिनिधित्व 
पिता जयदेव मिश्र को अपना प्रेरणास्रोत मानने वाले महवीर प्रसाद शास्त्री राष्ट्रीय स्तर पर दो बार हरियाणा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उन्होंने अखिल भारतीय सर्वभाषा कवि सम्मेलन में भाग लिया। जो साल में सिर्फ एक बार ही होता है। सम्मेलन की खास बात यह है कि यह 22 भाषाओं में होता है और 22 कवि ही भाग लेते हैं। इसमें एक व्यक्ति जीवन में केवल एक बार ही हिस्सा ले सकता है, लेकिन उन्होंने इसमें दो बार भाग लेने का गौरव पाया। एक बार बतौर कवि दूसरी बार ट्रांसलेटर के तौर पर सम्मेलन में जाने का मौका मिला। 
11Dec-2023

चौपाल: सजीव फोटोग्राफी की कला को संजोते अनिल कुमार

फोटो एवं वीडियोग्राफी कला की विभिन्न विधाओं के प्रदर्शन से बनाई पहचान 
                        व्यक्तिगत परिचय
नाम: अनिल कुमार 
जन्मतिथि: 27 मार्च 1973 
जन्म स्थान: रोहतक(हरियाणा) 
शिक्षा: अंडर ग्रेज्युएट संप्रत्ति: सिनेमेटोग्राफर, फिल्म शूटिंग 
पता: 375ए, सेक्टर-2, रोहतक(हरियाणा), मोबा. 9896117058  
BY--ओ.पी. पाल 
हरियाणवी संस्कृति, लोक कला और सभ्यता को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान देने में जुटे लोक कलाकार और संस्कृतिकर्मी समाज को भी नई दिशा देने में योगदान दे रहे हैं। जहां हरियाणवी चित्रकार सामाजिक, सांस्कृतिक एवं सभ्यता के रंगों के जादू को कैनवास पर बिखरकर अपनी संस्कृति को संजोने और संवर्धन कर रहे हैं, वहीं कुछ फोटोग्राफी के माध्यम से अपनी चित्रों के माध्यम से परंपरागत से लेकर आधुनिक युग तक की संस्कृति की अलख जगाने में भी पीछे नहीं हैं। ऐसी तस्वीर को अपने कैमरे में कैद करने की कला के क्षेत्र में लोकप्रियता हासिल करने वालों में रोहतक के कैमरामैन अनिल कुमार भी शामिल है, जिन्होंने फोटोग्राफी के साथ सिनेमेटोग्राफर के रुप में फिल्मों, टेलीविजन शो, विज्ञापनों और अन्य रचनात्मक फोटो और वीडियो को जीवंत करने का प्रयास किया है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रचनात्मकता को तकनीकी क्षमताओं के साथ जोड़ने का प्रयास करने वाले सिनेमेटोग्राफर अनिल कुमार ने अपनी इस कला के सफर को लेकर हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में कई ऐसे अनुछुए पहलुओं का भी जिक्र किया है, जिसमें फोटो व वीडियोग्राफी की कला से सकारात्मक संदेश समाज को सकारात्मक ऊर्जा देने का बेहतर माध्यम हो सकता है। 
---- 
बॉलीवुड से लेकर हरियाणवी फिल्मों, टीवी शो, वेबसीरिज, मैग्जीनों के अलावा सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर होने वाले सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी का जादू बिखरने वाले अनिल कुमार का जन्म 27 मार्च 1973 को रोहतक में हरनारायण और बिमला देवी के घर में हुआ। परिवार में वैसे तो किसी प्रकार का साहित्यिक या लोक कला संस्कृति का माहौल नहीं था, लेकिन पिता को फोटोग्राफी का शोंक था, जिनके प्रोत्साहन से उसकी रुची फोटोग्राफी में होती चली गई। रोहतक में प्राइमरी स्कूली शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने साल 1995 में इंटरनेशनल स्कूल ऑफ फोटोग्राफी दिल्ली से फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी में डिप्लोमा हासिल किया। बकौल अनिल कुमार डिप्लोमा हासिल करने के बाद उन्हें देश के लोकप्रिय फोटोग्राफर का सानिध्य मिला। उनके प्रोत्साहन उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर की फैशन, फूड, इंटिरियल से जुड़ी मैग्जीनों यानी पत्रिकाओं के अलावा ट्रेवल्स, वाइल्ड लाइफ नेचर, इंडस्ट्रीज के अलावा अन्य कार्मिश्यल क्षेत्र में फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी में महारत हासिल की है। उन्होंने बताया कि फिल्मों की शूटिंग के दौरान स्टोरी और गानों को शूट करके पूरी कवरेज करने का मौका भी मिलता रहा है। यही नहीं फोटोग्राफी के जरिए फिल्मों के ब्रोशर की डिजाइनिंग करके उनको कैमरे में शूट करने का भी अनुभव हासिल किया है। उन्होंने बताया कि हरियाणा विश्वविद्यालयों के यूथ फेस्टिवल में बेस्ट फोटो और वीडियोग्राफी के चयन के लिए उन्हें ज्यूरी की जिम्मेदारी निभाने का भी मौका मिला है। वहीं वे हरियाणी कला संस्कृति पर आधारित वेब सीरिज और सीरियलों की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी के माध्यम से शूट करते आ रहे हैं। इस आधुनिक युग में फोटो और वीडियोग्राफी में बदलाव को लेकर उनका कहना है कि डिजिटलीकरण के इस युग में नई-नई तकनीकों के साथ होते विस्तार की वजह से यह कला विस्तृत तो हुई है, लेकिन इसके लिए तकनीकी प्रशिक्षण के बिना इस क्षेत्र में काम करना आसान नहीं है। खासतौर सिनेमेटोग्राफी में तो किसी भी फिल्म के विजुअल लुक को बनाने के लिए रचनात्मकता को तकनीकी क्षमताओं के साथ जोड़ना एक टेढ़ी खीर से कम नहीं है। बकौल इसका कारण एक सिनेमेटोग्राफर ऑन-शूट और ऑफ-शूट दृश्य की रचना तय करने के लिए डायरेक्टर के निर्देशन पर काम करता है। उसी के आधार पर सिनेमेटोग्राफर के काम के माध्यम से ही पूरी फिल्म या किसी भी शॉट का विज़ुअल इफेक्ट तय किया जाता है। मसलन सिनेमेटोग्राफर का काम किसी कहानी को स्क्रिप्ट से लेकर पर्दे पर जीवित करना ही इस कला की निपुणता और क्षमता तय करता है। इसलिए कैमरा, लाइटिंग और फिल्म निर्देशन के मामले में तकनीकी प्रशिक्षण आवश्यक है। जहां तक इस क्षेत्र में युवा पीढ़ी को प्रोत्साहन की जरुरत है तो उसके लिए बदलती तकनीक के साथ फोटो कला की विधाओं के लिए तकनीकी प्रशिक्षण हासिल करना आवश्यक है। 
इन फिल्म शूटिंग में दिखाई कला 
एक सिनेमेटोग्राफर के तौर पर फोटो कलाकार अनिल कुमार को बॉलीवुड फिल्म वीरे की वेडिंग, वेलापंती के अलावा केसरी बुकारिया के निर्देशन में बनी फिल्म ‘भूत अंकल तूसी ग्रेट हो’ में भी उन्हें वीडियो और फोटो कवरेज करने का मौका मिला है। वहीं हरियाणवी फिल्म ‘रोहतक कब्जा’, 48 कोस तथा स्टेज एप के लिए हरियाणा बनाम बिहार जैसी हरियाणवी फिल्म को शूट करने की जिम्मेदारी निभाई है। फोटो व वीडियो कला के क्षेत्र में अनिल कुमार ने रूबरु मिस सुपर मॉडल इंटरनेशन, मिस्टर इंटरनेशनल, मिस इंडिया और मिस्टर इंडिया के अलावा सुपर मॉडल वर्ल्डवाइज, फेस ऑफ ब्यूटी इंटरनेशनल में भी उनकी फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी की कला सुर्खियों में रही है। वहीं उन्होंने एले कॉस्मोपॉलिटन डिज़ाइन और इंटीरियर, इंडिया टुडे प्लस इंडिया टुडे, डेकोर डिस्कवर इंडिया ब्राइड एंड होम आदि के लिए कुछ मैगज़ीन के लिए भी फोटो व वीडियो शूट किये हैं। 
सम्मान व पुरस्कार 
फोटो एवं वीडियो की सजीव कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए अनिल कुमार को पिछले तीन साल में ही 15 इंडरनेशनल अवार्ड मिल चुके हैं। इनमें प्रमुख रुप से टॉप अवार्ड यूनिवर्सल कलर फोटो, बेस्ट इमेज, यूनिवर्सल ब्लैक एंड व्हाइट, कलर ऑफ यूनिवर्सल, थियेटर टॉप कलेक्शन, कलर टॉप अवार्ड के अलावा डिजाइनल इंटीरियल शामिल हैं। वहीं लोककला संस्कृति पर आधारित सरकारी और गैर सरकारी सांस्कृतिक मंचों के अलावा इंडया टूडे, इंडिया टाटा आदि संस्थाओं की कॉमर्शियल मैग्जीन के कवर फोटो और वीडियोग्राफी के लिए भी अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं।
04Dec-2023

साक्षात्कार: साहित्य में नारी विमर्श पर साधना करती कवियत्री रश्मि बजाज

महिलाओं पर अंग्रेजी के समालोचक ग्रंथ से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान 
                  व्यक्तिगत परिचय 
नाम: रश्मि बजाज 
जन्मतिथि: 5 अक्टूबर 1965 
जन्म स्थान: भिवानी (हरियाणा) 
शिक्षा: एमए (अंग्रेज़ी), पीएचडी(अंग्रेज़ी) 
संप्रत्ति: स्वैच्छिक सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष(अंग्रेज़ी),वैश्य कॉलेज भिवानी, स्वतंत्र-लेखन एवं कवियत्री।
संपर्क : भिवानी, मोबा. 9896661415,‍ rashmibajaj5@gmail.com
BY--ओ.पी. पाल 
साहित्य के क्षेत्र में हरियाणा की संस्कृति और सभ्यता के संवर्धन करने में जुटे लेखकों, साहित्यकारों एवं लोक कलाकारों ने सामाजिक सरोकार के मुद्दों को उजागर करते हुए समाज को नई दिशा देने का प्रयास किया है। ऐसे ही साहित्यिक साधकों में महिला साहित्यकार एवं प्रसिद्ध कवियत्री रश्मि बजाज ने नारी विमर्श को फोकस में रखते हुए सामाजिक विषमताओं पर अपनी बेबाक कलम चलाई है। उन्होंने कविताओं के माध्यस में महिलाओं को जागृत करते हुए यह साबित करने का प्रयास किया है कि यदि महिलाएं अपनी अंतशक्ति को पहचान लें, तो वे समाज का सकारात्मक रुप से कायाकल्प कर सकती हैं। अपने समालोचना ग्रंथ ‘विमेन इंडो एगलियन पोएट्स-ए क्रिटीक’ से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाली द्विभाषी (हिंदी व अंग्रेजी) कवियत्री, लेखक, समालोचक, साहित्यकर्मी और शिक्षाविद् रश्मि बजाज ने हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में कई ऐसे अनछुए पहलुओं का जिक्र किया, जिसमें उनके लेखन का नजरिया नारी सशक्तिकरण की दिशा में महिलाओं के प्रति अवधारणा का सकारात्मक स्वरुप का सबब बन सकता है। 
---- 
हरियाणा की प्रसिद्ध महिला साहित्यकार रश्मि बजाज का जन्म 5 अक्टूबर 1965 को छोटी काशी के नाम से पहचाने जाने वाले शहर भिवानी में रोशनलाल बजाज एवं पुष्पलता बजाज के घर में हुआ। पिता संस्कृत के विद्वान एवं प्रोफेसर थे, जबकि माता उस समय की भिवानी की पहली स्नातक महिला थी। मसलन परिवार में बचपन से ही रश्मि को शिक्षित-साहित्यिक माहौल मिला। जब घर में साहित्यिक बैठके हों और उसमें पिता के आत्मीय मित्रों, जिनमें हरियाणा के वरिष्ठ कवि उदयभानु हंस एवं उर्दू शायर सतनाम सिंह ‘खुमार’ जैसे विद्वान हों, तो भला परिवार में साहित्यिक माहौल किसी भी बच्चे में रमना स्वाभाविक है और ऐसा ही रश्मि के साथ है, जिसमें हंस जी की रुबाईयां तथा मुक्तक,खुमार साहब की गजलें और शेर उस समय उनके बचपन के साथी बनते चले गये, जिस आयु मे बच्चे चंपक, चंदा मामा और नंदन पढ़ते थे, लेकिन रश्मि को गंभीर चर्चाएं एवं रचनाएं सुनना ज्यादा अच्छा लगता था। इसी माहौल का असर रहा होगा कि उसने महज नौ साल की उम्र में ही अपनी पहली दार्शनिक कविता ‘जीवन क्या है-खेल कैरम का’ लिखी, जो भिवानी के एक स्थानीय अखबार में प्रकाशित हुई। उनका विद्यार्थी जीवन भी बेहतर रहा है, जहां उन्होंने यूनिवर्सिटी टॉपर,,गोल्ड मेडलिस्ट, ऑल राउंड बेस्ट एवार्डी बनकर अपनी साधना का परिचय दिया। कालेज में पहुंचने पर उनकी कविता के लेखन में सामाजिक सरोकार एवं स्त्री-मुद्दे विषय-वस्तु झलकने लगा और पितृसत्तात्मक, लैंगिक भेदभावपूर्ण समाज में एक लड़की के लेखन में स्त्री-चेतना एक महत्वपूर्ण बिंदु बन गई। अपने कॉलेज आदर्श महिला महाविद्यालय की अध्यापिकाओं द्वारा दिए गए प्रशिक्षण एवं उनके तथा कॉलेज गवर्निंग बॉडी द्वारा दिये गये स्नेह एवं प्रोत्साहन ने उनकी प्रतिभा के पल्लवन में बहुत योगदान दिया। उन्होंने बताया कि जब वह यूनिवर्सिटी रिफ्रेशर कोर्स में समर हिल, शिमला में ट्रेनिंग ले रही थी, तो उसी दौरान शिमला के इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ में कवि गोष्ठी में उनका पहला औपचारिक काव्य-पाठ हुआ, जिसमें प्रोफेसर चमन लाल,रमणिका गुप्ता,मोहन नैमिष राय, सुशीला टौंकभोरे एवं अन्य नामचीन साहित्यकार मौजूद थे। यह उनके लिए एक अविस्मरणीय क्षण था, जिसमें उन्होंने बड़े संकोच और धड़कते दिल से अपनी अब बहुचर्चित स्त्रीवादी कविता ‘मृत्योर्मा जीवनं गमय’को वहां पढ़ा, जिसके लिए मिली चौतरफा मिली शुभकामनाओं ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। साहित्य जगत में उनकी अंग्रेज़ी आलोचना पुस्तक ‘विमेन इंडो-एंग्लियन पोएट्स’ यूएस लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रकाशनों में चयनित हुई, जो अपने क्षेत्र का बहु-उद्धृत मील का पत्थर ग्रंथ साबित हुआ। वहीं उनके नारी विमर्श संबन्धी पांच काव्य संग्रह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित कृतियों में शामिल रहे, जिन पर अनेक शोध प्रबंधों एवं शोध पत्रों के शोध स्रोत सामने आए। उनकी कविताएं विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं। उनकी कविताओं का अनुवाद अन्तर्राष्ट्रीय संकलनों के अलावा आलेख, रचनाएं नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। शोध-पत्र एवं समालोचनात्मक लेख प्रतिष्ठित साहित्यिक शोध-पत्रिकाओं में सम्मिलित अंतर्राष्ट्रीय राष्ट्रीय गोष्ठियों का भी हिस्सा बने। उनकी आमंत्रित मुख्य वक्ता के रूप में दूरदर्शन एवं रेडियो-केंद्रों से साक्षात्कार, वार्ताएं, कविताएं, संगीत प्रसारित स्तरीय कवि सम्मेलनों में भागीदारी रही है। 2022 में प्रकाशित ‘कहत कबीरन’ संग्रह की चर्चाए वं कविता ‘सुनो तसलीमा’ का पाठ प्रतिष्ठित प्रतिष्ठित चैनल के ‘साहित्य तक’ में सम्मिलित होना भी उनकी बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा। रश्मि बजाज भारत सरकार की संयुक्त हिंदी सलाहकार समिति की सदस्या भी हैं। 
महिलाओं पर रचनाओं का फोकस 
सुप्रसिद्ध कवियत्री रश्मि बजाज की साहित्यिक रचनाओं के फोकस में स्त्री रही है। पहले चरण के काव्य-संग्रहों में स्त्री-मुद्दे एवं स्त्रीवाद ही मूल स्वर रहे हैं, जहां सारा संघर्ष स्त्री को मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठित करने का है और एक लैंगिक समता मूलक समाज बनाने का रहा, तो उन्होंने अपनी कविताओं के लेखन और काव्यपाठ के जरिए भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा, स्त्री विरोधी मानसिकता, अत्याचार, अन्याय और स्त्री व पुरुष में भेदभाव जैसी नारियों से जुड़ी समस्याओं और सामाजिक कुरीतियों तीखे प्रहार करके समाज को सकारात्मक ऊर्जा देने का प्रयास किया है। हालांकि उनके विस्तृत होते काव्य-कृतियों का फलक में सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक मुद्दों पर व्यापक चिंता एवं चिंतन,गहरा सरोकार विकसित होता नजर आता है। साहित्यिक साधना में उनका यह भी लक्ष्य है, जिसमें वे एक ऐसी सहृदय सभ्यता, संस्कृति का निर्माण करने में योगदान दें, जहां नवमनु, नव सृष्टि जन्म लें सके। उनकी हिंदी की लयात्मक मुक्त छंद कविताओं, तालबद्ध गीतिकाओं के अतिरिक्त उर्दू शेरो-शायरी में अभिव्यक्त होती है एक बेहतर इंसान, बेहतर समाज, बेहतर दुनिया बनाने की प्रबल इच्छा रही है। आज कल अध्यात्म में भी उनकी रुचि बढ़ रही है और उनका मानना है कि अध्यात्म व्यष्टि एवं समष्टि के समग्र उत्थान का एक अत्यंत सशक्त माध्यम है। संगीत एवं गायन भी उनकी रुचि के क्षेत्र हैं, लोकसंगीत एवं भक्ति संगीत के कार्यक्रमों में भी उन्होंने प्रस्तुतियां दी हैं। 
साहित्य सृजन में गिरावट 
आज के आधुनिक युग में साहित्य में सृजन के स्तर में गिरावट को लेकर रश्मि बजाज का कहना है कि आजकल लेखकों एवं पुस्तकों की सुनामी सी आई हुई है, लेकिन हर व्यक्ति या तो लेखक है या लेखक बनने को है किंतु गुणवत्ता की दृष्टि से स्थिति अधिक संतोषजनक नहीं। समकालीन हिंदी समीक्षा का फलक कुछ गिने-चुने रचनाकारों तथा चंद प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित कृतियों तक ही सीमित होकर रह गया है। इसी वजह से स्तरीय कृतियां प्रकाशित नहीं हो पा रहीं हैं और न ही कोई मौलिक साहित्यिक दृष्टि अथवा दर्शन समक्ष नहीं आ पा रहा है। उम्मीद है कि इस मंथन-काल के बाद मौलिक दृष्टि एवं सृजन अवश्य उभरकरसबके समक्ष आएगा। जहां तक युवा पीढ़ी का साहित्य से दूर होना है उसके पीछे अब इंटरनेट व संचार-तकनीक के माध्यम है, जिसके जरिए समकालीन परिदृश्य में साहित्य की पारंपरिक विधाएं नई टेक्नोलॉजी, संचार-माध्यमों द्वारा प्रस्तुति एवं संप्रेषण पा रही हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स-यू-ट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सएप, पॉडकास्ट इत्यादि एक सशक्त माध्यम के रूप में समक्ष आ रहे हैं। साहित्य-उत्सवों एवं पुस्तक-मेलों में बड़ी संख्या में युवा पाठकों की सक्रिय भागीदारी रहती है। इंटरनेट से मिली प्रारंभिक जानकारी लेकर वे पुस्तकों में अधिक सजीव रुचि लेते हैं। इसके अतिरिक्त अमेजॉन,फ्लिपकार्ट तथा प्रकाशकों से नेट के ज़रिए खरीदे जाने वाली पुस्तकों का एक बहुत बड़ा बाज़ार है एवं ई-बुक्स, ‘किंडल’ बुक्स, नॉटनल आदि पब्लिशिंग प्लेटफार्म पाठक को वैश्विक पुस्तक बाज़ार से सीधा जोड़ रहे हैं। आज के लेखक के कंधों पर बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वह अपने लेखन द्वारा नकारात्मकता ग्रस्त, मूल्यहीन, दिशाभ्रमित मानव-समाज को सकारात्मकता एवं सात्विक-मूल्यों का संदेश देने वाली रचनाओं का सृजन करें। 
प्रकाशित पुस्तकें 
महिला साहित्यकार एवं द्विभाषी कविता लेखक रश्मि बजाज की अब तक सात पुस्तकें प्रकाशित सात पुस्तकों में छह काव्य-संग्रह: मृत्योर्मा जीवनम् गमय, निर्भय हो जाओ द्रौपदी, सुरबाला की मधुशाला, स्वयंसिद्धा, जुर्रत ख्वाब देखने की, कहत कबीरन सुर्खियों में हैं। उनकी अंग्रेज़ी आलोचना पुस्तक ‘विमेन इंडो-एंग्लियन पोएट्स’ यूएस लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रकाशनों में चयनित हुई, जो अपने क्षेत्र का बहु-उद्धृत मील का पत्थर ग्रंथ साबित हुआ। वहीं जल्द ही पाठकों के बीच आने वाले अंग्रेज़ी के महत्वपूर्ण आलोचना-ग्रंथ ‘समकालीन वैश्विक साहित्य में अध्यात्म’ का संपादन जारी है। उनकी अंग्रेज़ी की कविताएं प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय काव्य-संकलनों, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा शोध-प्रपत्रों में शोध-विषय वस्तु के रूप में सम्मिलित हैं। 
सम्मान व पुरस्कार 
कवियत्री रश्मि बजाज को साहित्य सेवा में उत्कृष्ट योगदान के लिए 'पंडित माधव मिश्र साहित्य सम्मान', 'हंस राज्यस्तरीय कविता पुरस्कार', 'साहित्य शिरोमणि सम्मान', 'डॉ राजेंद्र प्रसाद साहित्य सम्मान' 'हरियाणा साहित्य सम्मान'. 'मनु मुक्त मानव अकादमी सम्मान', 'लाजवंती सीताराम साहित्य पुरस्कार', 'वुमन अचीवर्स अवार्ड', 'स्त्री रत्न', 'स्त्री शक्ति', 'आदर्श शिक्षक', 'बेस्ट कल्चरल इंचार्ज अवार्ड' तथा अन्य अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक पुरस्कारों, सम्मानों द्वारा अलंकृत किया जा चुका है। 
27Nov-2023