गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

हॉट सीट: छिंदवाड़ा लोकसभा सीट पर दावं पर लगी भाजपा की प्रतिष्ठा

कांग्रेस के सामने होगी अपने परंपारिक गढ़ को बचाने की चुनौती 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा लोकसभा सीट ऐसी है, जिसे भाजपा एक उपचुनाव को छोड़कर आज तक नहीं जीत सकी है। इसलिए भाजपा ने इस बार प्रतिष्ठा को दांव पर लगाते हुए छिंदवाड़ा लोकसभा सीट पर पूरी ताकत झोंक दी है। दरअसल पिछले चुनाव में भाजपा ने मध्य प्रदेश की 29 में से 28 सीटों पर भगवा लहराया था, लेकिन छिंदवाड़ा सीट पर कांग्रेस के चक्रव्यूह को नहीं भेद सकी थी। इसलिए इस बार भाजपा की नई रणनीति के साथ छिंदवाड़ा सीट पर सियासी घेराबंदी की वजह से लोकसभा चुनाव दिलचस्प मोड़ पर है। फिर भी कांग्रेस का गढ़ के रुप में चर्चित इस सीट पर कांग्रेस दिग्गज कमलनाथ के परिवार से छीनना भाजपा के लिए इतना आसान नहीं है, जहां पांच दशक से ज्यादा समय तक इसी परिवार का दबदबा रहा है। हालांकि इस बार कांग्रेस को भी इस सीट पर अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। 
मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनाव के पहले चरण में 19 अप्रैल को जिन छह संसदीय पर मतदान होना है। उनमें सबसे महत्वपूर्ण सीट छिंदवाड़ा है, जिस पर सब की नजर है। इसी सीट को लेकर लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस अलग अलग दावे सामने आ रहे हैं। खासतौर से छिंदवाड़ा लोकसभा सीट भाजपा के दिग्गजों और स्टार प्रचारकों के कई कई बार दौरे करने के अलावा उनके इसी सीट पर पड़ाव को देखते हुए कांग्रेस भी इस कड़े मुकाबले में अपना अस्तित्व बचाती नजर आ रही है। राज्य की यह लोकसभा सीट ऐसी है, जहां आजादी के बाद से 1997 के उपचुनाव को छोड़कर अभी तक कांग्रेस अपराजित रही है। केवल 1997 के उपचुनाव में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने भाजपा को जीत का स्वाद चखाया था। खास बात ये है कि छिंदवाड़ा लोकसभा पर पांच दशक से ज्यादा समय तक कांग्रेस दिग्गज नेता कमलनाथ के परिवार का ही राज रहा है। इसमें कमलनाथ नौ बार, उनकी पत्नी अलका नाथ और पुत्र नकुलनाथ एक-एक बार कांग्रेस के टिकट पर सांसद रहे हैं। पहले चरण में चुनाव लड़ रहे करोड़पतियों की सूची में सबसे अमीर प्रत्याशियों में शामिल एवं मौजूदा सांसद नकुलनाथ एक बार फिर इस सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी है, जिसे टक्कर देने के लिए भाजपा ने तेजतर्रार विवेक बंटी साहू को उम्मीदवार बनाया है। इस सीट पर सभी राजनैतिज्ञों की नजरें इसलिए भी टिंकी है, कि दोनों प्रत्याशियों के बीच आरोप प्रत्यारोप के दौर ने ज्यादा जोर पकड़ा हुआ है। अब देखना यह है कि भाजपा छिंदवाड़ा में कमलनाथ परिवार का तिलिस्म तोड़ने में सफल रहती है या फिर कांग्रेस प्रत्याशी नकुलनाथ परिवार की सियासी साख को बचा लेते हैं। इसका फैसला तो चुनाव के नतीजों के बाद ही सामने आएगा। 
मतदाताओं का चक्रव्यूह 
छिंदवाड़ा लोकसभा सीट पर पहले चरण के 19 अप्रैल को होने वाले चुनाव में 16,32,190 मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। इनमें 8,24,449 पुरूष, 8,07,726 महिला और 15 ट्रांसजेंडर मतदाता शामिल हैं। इस सीट पर 85 साल से अधिक आयु के 7630 बुजुर्ग और 24246 दिव्यांग मतदाताओं के अलावा 2531 सर्विस मतदाता भी पंजीकृत हैं। इस सीट के अंतर्गत सात विधानसभा क्षेत्रों में से जुन्नारदेव विधानसभा क्षेत्र में 225356, अमरवाड़ा में 257580, चौरई में 219728, सौंसर में 211081, छिंदवाड़ा में 284043, परासिया में 218999, तथा पांढुर्णा विधानसभा क्षेत्र में 215403 मतदाता वोटिंग करेंगे। छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत 85 वर्ष से अधिक आयु के और दिव्यांग मतदाताओं में से 1293 ने घर से मतदान करने का आवेदन किया था, जिनमें से 5 से 7 अप्रैल तक शुरु की गई प्रक्रिया में 1265 मतदाताओं ने वोटिंग की है। बाकी बचे मतदाताओं के लिए 14 अप्रैल को होम वोटिंग के लिए मतदान दल उनके घर पहुंचेंगे। 
मतदान केंद्रों पर सुरक्षा 
इस लोकसभा सीट पर मतदान के लिए छिंदवाड़ा और पांढुर्णा जिलों में सात विधानसभा क्षेत्रों में कुल 1939 मतदान केन्द्र बनाए गए हैं। इनमें से जुन्नारदेव में 272, अमरवाड़ा में 332, चौरई में 272, सौंसर में 253, छिंदवाड़ा में 311, परासिया में 245 तथा पांढुर्णा में 254 मतदान केंद्र स्थापित किये गये हैं। चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव के दौरान निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान कराने के लिए मतदान केंद्रों पर कड़े सुरक्षा प्रबंधों की व्यवस्था की है। 
भाजपा को अबकी बार जीत की आस 
भाजपा का दावा है कि मध्य प्रदेश में छिंदवाड़ा प्रधानमंत्री की गारंटीयों का सबसे बड़ा गढ़ बन चुका है। इसके पीछे एक कारण यह भी है कि राज्य के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बहुमत की सरकार बनाई है। वहीं छिंदवाड़ा लोकसभा सीट पर पिछले 2019 के चुनाव में कांग्रेस के नकुलनाथ केवल 37 हजार वोटों से जीते थे। जबकि कांग्रेस इस सीट पर लाखों मतों के अंतर से जीतती आई है। इसलिए भाजपा का दावा है कि भाजपा के कामकाज की वजह से कांग्रेस का जनाधार कम होता जा रहा है। वहीं प्रदेश में विधायकों समेत कमलनाथ के कई करीबी नेताओं को कांग्रेस से मोह भंग होना भी भाजपा की जीत का कारण बनेगा। इसलिए इस बार मध्य प्रदेश में भाजपा सभी सीटे जीतकर आएगी। 
सामाजिक तानाबाना 
छिंदवाड़ा लोकसभा क्षेत्र मध्य प्रदेश के दक्षिणी क्षेत्र में है, जहां करीब 76 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। इसलिए इस क्षेत्र में सर्वाधिक 37.82 फीसदी अनुसूचित जनजाति के मतदाता हैं। जबकि 12.11 फीसदी अनुसूचित जाति और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या बहुत कम है। 
17Apr-2024

हॉट सीट: बस्तर सीट पर भाजपा व कांग्रेस में सियासी वर्चस्व की जंग

भाजपा के सामने अपने विजय रथ को पटरी पर लाने की होगी चुनौती 
 ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ की नक्सलवाद से प्रभावित आदिवासी क्षेत्र की बस्तर लोकसभा सीट पर सियासी वर्चस्व के लिए भाजपा और कांग्रेस प्रत्याशी के बीच कड़ा मुकाबला माना जा रहा है। दरअसल करीब 70 फीसदी आदिवासी समुदाय वाली बस्तर लोकसभा सीट पर करीब ढ़ाई दशक तक भाजपा के टिकट पर लगतार कश्यप परिवार का कब्जा रहा है। लेकिन पिछले चुनाव में भजपा के इस विजय रथ को कांग्रेस ने रोकते हुए इस सीट पर जीत दर्ज की थी। शायद यही वजह रही कि भाजपा ने इस सीट पर वापसी करने की रणनीति के तहत आदिवासियों में पैंठ रखने वाले महेश कश्यप को अपना प्रत्याशी बनाया है। दूसरी ओर कांग्रेस ने भी एक ऐसे ही आदिवासियों में प्रभावशाली नेता कवासी लखमा को चुनाव मैदान में उतारकर भाजपा को इस सीट पर पटखनी देने की रणनीति बनाई है। हालांकि इस सीट पर 11 प्रत्याशी चुनावी जंग में हैं, लेकिन यह चुनावी नतीजे बताएंगे कि इस सीट पर बाजी किसके हाथ होगी? 
छत्तीसगढ़ के अलग राज्य के अस्तित्व में आने के बाद अभी तक हुए चार लोकसभा चुनाव में बस्तर लोकसभा सीट पर तीन आम चुनाव और एक उप चुनाव में भाजपा का ही परचम लहराया है। भाजपा और कांग्रेस के दोनों प्रत्याशियों में राजनीतिक अनुभव के लिहाज से कांग्रेस का प्रत्याशी कवासी लखमी मजबूत है, जो बस्तर लोकसभा सीट के अंतर्गत कोंटा विधानसभा सीट से लगातार छह बार विधायक चुने गये और कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार में मंत्री भी रहे। कांग्रेस के ये नेता वहीं है, जो इस सीट पर 2011 में लोकसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा के दिनेश कश्यप से हार गये थे, जिसके पास उस हार का बदला लेने का भी मौका है। जबकि पहली बार चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशी महेश कश्यप की इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी कवासी लखमा के सामने अग्नि परीक्षा होगी, लेकिन कांग्रेस के सामने भी चुनौती कम नहीं होंगी। इस सीट पर भाजपा व कांग्रेस के मुकाबले में सेंध लगाने के मकसद से भाकपा के फूल सिंह कचलाम, बसपा आयतू राम मंडावी तथा जीजीपी के टीकम नागवंशी समेत 11 प्रत्याशी चुनावी जंग में हैं। 
भाजपा को इसलिए जीत की उम्मीद 
भाजपा को बस्तर लोकसभा सीट पर इसलिए जीत की उम्मीद है कि पांच माह पहले ही छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बहुमत हासिल करके सरकार बनाई है। वहीं बस्तर लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली आठ विधानसभा सीटों में पांच सीटो पर भाजपा का कब्जा है। बस्तर लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली आठ विधासभा सीटों में कोंडागांव, नारायणपुर, बस्तर, जगदलपुर, चित्रकोट, दंतेवाड़ा, बीजापुर और कोंटा शामिल है। इनमें बस्तर, कोंटा और बीजापुर में कांग्रेस विधायक है। 
निर्णायक भूमिका में महिला वोटर 
छत्तीसगढ़ की बस्तर लोकसभा सीट पर चुनावी जंग में उतरे 11 प्रत्याशियों को 14,72,207 मतदाताओं के चक्रव्यूह को भेदने की चुनौती होगी, जहां 7 लाख 476 पुरुष मतदाताओं के मुकाबले कहीं ज्यादा 7,71,679 महिला मतदाताओं की अहम भूमिका होगी। इसके अलावा इस सीट पर 52 ट्रांसजेंडर और 12703 दिव्यांगों के अलवा 1603 सर्विस मतदाता भी मतदान करेंगे। चुनाव के लिए बस्तर सीट पर 1961 मतदान केन्द्र स्थापित किये गये हैं। यह भी गौरतलब है कि इस क्षेत्र के हर चुनाव में महिलाएं ही पुरुषों से ज्यादा वोटिंग में हिस्सा लेती आ रही हैं। यही कारण है कि सभी राजनीतिक दलों का फोकस महिलाओं पर रहता है। चुनाव आयोग ने निष्पक्ष एवं शांतिपूर्ण तथा शतप्रतिशत मतदान कराने की दिशा में व्यापक प्रबंध किये हैं, जहां कड़ी सुरक्षा के साये में मतदान कराया जाएगा। 
बस्तर का चुनावी इतिहास 
छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित बस्तर लोकसभा सीट पर साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी दीपक बैज ने भाजपा के गढ़ में सेंध लगाकर जीत हासिल की थी। इससे पहले मध्य प्रदेश के विभाजन से पहले 1998 के चुनाव से ही बस्तर सीट पर लगातार भाजपा के बलिराम कश्यम लगातार चार बार सांसद रहे, लेकिन उनके निधन के बाद 2011 में इस सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर बलिराम कश्यम के पुत्री दिनेश कश्यप लोकसभा पहुंचे, जिन्होंने कांग्रेस के कवासी लखमा को ही पराजित किया था। दिनेश कश्यप साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भी इस सीट पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचे, लेकिन पिछले यानी 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपना प्रत्याशी बैदूराम कश्यप को बनाया, जो कांग्रेस के दीपक बैज से पराजित हो गये। 
कौन हैं भाजपा व कांग्रेस प्रत्याशी 
छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्र की बस्तर लोकसभा सीट(एसटी) पर एक दूसरे को चुनावी जंग में टक्कर दे रहे भाजपा प्रत्याशी महेश कश्यप और कांग्रेस प्रत्याशी कवासी लखमा दोनों ही आदिवासियों में अपनी पैंठ रखते हैं। इसलिए भाजपा ने आदिवासी क्षेत्र की बस्तर लोकसभा सीट(एसटी) पर दोनों ही इस चुनावी जंग में एक दूसरे को टक्कर दे रहे हैं। इस क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी महेश कश्यप, कांग्रेस प्रत्याशी कवासी लखमा के मुकाबले संपत्ति और आर्थिक रूप से कमजोर हैं। भाजपा नेता महेश कश्यप इससे पहले पहले 2014 से 2019 तक सरपंच रहे हैं और अब सीधे पहली बार भाजपा के टिकट से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। कश्यप हिंदू परिषद व बजरंग दल के सक्रीय सदस्य हैं। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी कवासी लखमा इसी लोकसभा क्षेत्र के दायरे में आने वाली कोंटा विधानसभा सीट से छह बार विधायक चुने जा चुके हैं और भूपेश बघेल सरकार में मंत्री भी रहे। पिछले विधानसभा चुनाव में भी वे छठी बार विधायक बने। खास बात ये भी है कि महेश कश्यप ने दसवीं तक की शिक्षा ग्रहण की है, तो राजनीतिक अनुभव वाले कवासी लखमा कभी स्कूल ही नहीं गये। 
16Apr-2024

सोमवार, 15 अप्रैल 2024

नागपुर आरएसएस का मुख्यालय होने के कारण भाजपा के लिए अहम चुनाव 

ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। महाराष्ट्र की महत्वपूर्ण लोकसभा सीटों में शामिल नागपुर लोकसभा सीट भाजपा के लिए इसलिए भी खास है कि यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय है। इस सीट से केंद्रीय मंत्री नितिन जयराम गड़करी लगतार तीसरी बार भाजपा के टिकट से चुनावी जंग में हैं। नागपुर की इस शहरी लोकसभा सीट पर गड़करी को चुनौती देने के लि कांग्रेस ने नागपुर के कांग्रेस जिलाध्यक्ष विकास ठाकरे को चुनाव मैदान में उतारा है। आरएसएस मुख्यालय होने के बावजूद यह ऐसी सीटों में शामिल है, जहां 18 बार हुए लोकसभा चुनाव में 13 बार कांग्रेस ने अपना परचम लहराया है और भाजपा के नितिन गड़करी ने ही साल 2014 के चुनाव में जीत हासिल करके कांग्रेस के विजय रथ रोका था और पिछले लगातार दो बार से भाजपा के लिए जीत हासिल करते रहे है। इसलिए नितिन गड़करी के सामने जहां जीत की हैट्रिक बनाने की चुनौती होगी। वहीं कांग्रेस की सियासी पटरी पर वापसी लाने के लिए अग्नि परीक्षा होगी।
लोकसभा चुनाव के पहले चरण में 19 अप्रैल को महाराष्ट्र की जिन पांच लोकसभा सीटों पर मतदान होगा, उनमें महाराष्ट्र की विदर्भ क्षेत्र में दूसरी सबसे बड़ी नागपुर लोकसभा सीट पर भी मतदान होगा। महायुति गठबंधन में भाजपा ने इस सीट पर मौजूदा सांसद एवं केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को फिर से अपना प्रत्याशी बनाया है। केंद्र की सरकार में पिछले एक दशक से केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री का पद संभालते आ रहे नितिन गड़करी ऐसे राजनीतिज्ञ है कि सत्तापक्ष के साथ कांग्रेस समेत तमाम दल उनके कामकाज के तरीके मुरीद है। राजनीतिक विशेषज्ञों भी मानकर चल रहे हैं कि इसी वजह से इस हाई प्रोफाइल नागपुर संसदीय सीट से महायुति के उम्मीदवार नितिन गडकरी के हैट्रिक लगाने के पूरे आसार हैं। भाजपा प्रत्याशी गडकरी को चुनौती देने के लिए कांग्रेस ने नागपुर पश्चिम से मौजूदा सांसद एवं कांग्रेस के नागपुर जिलाध्यक्ष विकास ठाकरे पर दांव खेला है। वैसे तो इस सीट भाजपा व कांग्रेस समेत 26 प्रत्याशी हैं, जिनमें बसपा के योगेश पतिराम लांजेवार, एपीआई के विजय मानकर, एआईएफबी के संतोष रामकृष्ण लांजेवार, एसयूसीआई(सी) के नारायण तुकाराम चौधरी और बीएचएस के श्रीधर नारायण साल्वे के उम्मीदवार भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, लेकिन मुख्य चुनावी जंग भाजपा और कांग्रेस प्रत्याशियों के बीच होना तय माना जा रहा है। 
क्या है चुनावी समीकरण 
नागपुर लोकसभा सीट पर भले ही महायुति गठबंधन में भाजपा उम्मीदवार नितिन गडकरी के हैट्रिक बनाने की उम्मीद की जा रही है, लेकिन वंचित बहुजन अघाडी के अध्यक्ष प्रकाश अम्बेडकर के कांग्रेस प्रत्याशी विकास ठाकरे को समर्थन देने से उनके सामने कुछ चुनौती है, क्योंकि नागपुर में वंचित अघाड़ी के मतदाताओं की कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद भाजपा और महायुति गठबंधन को भरोसा है कि गड़करी तिसरी बार रिकार्ड मतों से चुनाव जीतेंगे।
क्या मतदाताओं का आंकड़ा 
नागपुर लोकसभा क्षेत्र में इस बार मतदान करने के लिए 21,60,232 मतदाता पंजीकृत हैं, जिनमें 10,96,329 पुरुष, 10,63,828 महिला एवं 75 ट्रांसजेंडर मतदाता शामिल हैं। इस सीट के लिए 1341 ऐसे मतदाता हैं, जिनमें 85 साल से अधिक आयु के 1204 बुजुर्गो और 37 दिव्यांगों ने घर से मतदान करने के लिए अपना पंजीकरण कराया है। पिछले चुनाव की तुलना में इस बार इस सीट पर मतदाताओं की संख्या में कमी दर्ज की गई। पिछले 2019 में इस सीट पर 864 मतदाता ज्यादा यानी कुल 21,61,096 मतदाता थे। 
यह है जातीगत समीकरण 
महाराष्ट्र की इस सीट पर सर्वाधिक अनुसूचिति जाति और अनुसूचित जनजाति के मतदाता है, जिन्हें किसी भी चुनाव में निर्णाय माना जाता है। एक आंकड़े के मुताबिक इस सीट पर 4.50 अनुसूचिति जाति दो लाख अनुसूचित जाति के अलावा 3.50 लाख मराठा, दो लाख मु्स्लिम तथा एक लाख ब्राह्मण मतदाता हैं। आबादी के लिहजा से नागपुर संसदीय क्षेत्र में 14.37 प्रतिशत बौद्ध, 0.74 प्रतिशत ईसाई, 0.53 प्रतिशत जैन, 8.8 प्रतिशत मुस्लिम, 18.6 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 9.4 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति, 0.44 प्रतिशत सिक्ख भी निवास करते हैं। 
ऐसे टूटा कांग्रेस का वर्चस्व 
नागपुर लोकसभा सीट पर आजादी के बाद पहले चुनाव से ही कांग्रेस का वर्चस्व रहा है। मसलन वह पहले पांच चुनाव में अवजित रही, लेकिन 1971 के चुनाव में यहां आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक ने जीत हासिल की, जिसके बाद 1996 में भाजपा के बनवारीलाल पुरोहित ने पहली जीत दर्ज की, लेकिन इसके बाद कांग्रेस ने फिर पलटवार करते हुए लगातार अपनी जीत का सिलसिला जारी रखा, जिसे 2014 के चुनाव में भाजपा के नितिन गडकरी ने रोका और लगातार जीत हासिल करते आ रहे हैं। साल 2019 लोकसभा चुनाव में नागपुर सीट से भाजपा के नितिन गडकरी ने कांग्रेस के नाना फाल्गुनराव पटोले को 2.16 लाख के बड़े अंतर से हराकर दूसरी बार जीत दर्ज की थी। इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार नागपुर लोकसभा सीट चुनाव लड़ते हुए कई बार के कांग्रेस सांसद विलास मुत्तेमवार को 2.50 लाख मतों के अंतर हराया ही नहीं था, बल्कि कांग्रेस का गढ़ फतेह किया था। 
15Apr-2024

रविवार, 14 अप्रैल 2024

छत्तीसगढ़: भाजपा के सियासी गढ़ में कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती!

मध्य प्रदेश से अलग हुए छत्तीसगढ़ में अभी तक चार संसदीय चुनाव हुए 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ की 11 लोकसभा सीटों के लिए तीन चरणों में मतदान कराया जा रहा है। नक्सल से प्रभावित इस राज्य में लोकसभा चुनाव के लिए राजनीतिक दलों ने अपनी सियासी बिसात नई रणनीति से बिछाई है। विधानसभा की तरह ही लोकसभा चुनाव में भी भाजपा और कांग्रेस के बीच ही चुनावी जंग होती रही है। इस बार भाजपा सभी 11 सीटों पर भगवा लहराने की रणनीति के साथ चुनाव मैदान में है। उधर कांग्रेसनीत इंडिया गठबंधन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस ने भाजपा प्रत्याशियों के खिलाफ बाजी पलटने की रणनीति के साथ उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा है। छत्तीसगढ़ की सियासत में अभी तक भाजपा और कांग्रेस के बीच ही चुनावी मुकाबले होते आ रहे हैं। भाजपा राज्य में बुनियादी विकास और आदिवासी क्षेत्रों के लोगों की मूलभूत सुविधाओं से सामाजिक विचाराधारा में लाने के दावे के साथ सभी सीटों पर जीत हासिल करना चाहती है, तो वहीं इस राज्य में पिछले कांग्रेस शासन में जन कल्याण की योजनाओं पटरी में उतारने की हुंकार भरने वाली कांग्रेस को भी बड़ी आस है। दोनों दलों की चुनावी रणनीति में छत्तीसगढ़ का लोकसभा चुनाव जहां भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है, वहीं कांग्रेस के लिए भी सियासी वैतरणी को पार करना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। 
छत्तीसगढ़ राज्य के नवंबर 2000 में अस्तित्व आने पर अब तक हुए चार लोकसभा चुनाव में भाजपा का पलड़ा भारी रहा है। मसलन 2004, 2009 और 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दस सीटों पर कब्जा किया है, जबकि कांग्रेस को एक-एक सीट पर संतोष करना पड़ा। लेकिन 20019 के चुनाव में भाजपा को नौ और कांग्रेस को दो सीटें मिल सकी। राज्य की 11 लोकसभा सीटों में चार अनुसूचित जनजाति (एसटी) और और एक अनुसूचित जाति (एससी) श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। पिछले साल के अंत में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ भाजपा ने अपना परचम लहराकर सरकार बनाई। राज्य में भाजपा को विधानसभा चुनाव की तर्ज पर लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को इसी प्रकार मतदाताओं का व्यापक समर्थन मिलने की उम्मीद है। 
पुरुषों से ज्यादा महिला मतदाता 
छत्तीसगढ़ के 33 जिलों की 90 विधानसभा क्षेत्रों से बनी 11 लोकसभा सीटों पर मतदान के लिए 2,05,13,252 मतदाता पंजीकृत हैं। इनमें जिनमें 1,03,32,115 महिला और 1,01,80,405 पुरुष, 732 ट्रांसजेंडर के अलावा 1,91,638 दिव्यांग, 85 साल से ज्यादा आयु के 82,476 मतदाताओं में 2,855 बुजुर्ग की आयु 100 साल से भी ज्यादा है। वहीं प्रदेशभर में 19,905 सर्विस और 17 एनआरई मतदाता शामिल हैं। प्रदेश में 18-19 आयु वर्ग के 5,77,184 मतदाता हैं, जो पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे। वहीं 20-29 उम्र के 4711890 मतदाताओं भी पंजीकृत हैं। खासबात ये है कि प्रदेश की 11 लोकसभा सीटों में से नौ सीटें ऐसी हैं, जहां पुरुषों से ज्यादा महिला मतदाता पंजीकृत हैं। प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव की अपेक्षा पांच साल के अंतराल में 15,14,013 यानी 7.96 फीसदी मतदाताओं की संख्या का इजाफा हुआ है। चुनाव आयोग की व्यवस्था के अनुसार 85 वर्ष से अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिक, 40 प्रतिशत से अधिक विकलांगता वाले दिव्यांग और कोविड-19 से संक्रमित लोग घर से डाक मतपत्र के माध्यम से वोट डाल सकेंगे। 
प्रदेश में 24,229 मतदान केंद्र 
छत्तीसगढ़ में तीन चरणों के चुनाव में अधिक से अधिक मतदान कराने की दिशा में 24,229 मतदान केंद्र बनाए गए हैं, इनमें 24109 मुख्य मतदान केंद्र तथा 120 सहायक मतदान केंद्र के रुप में स्थापित किये गये हैं। इनमें से पहले चरण की बस्तर सीट पर होने वाले चुनाव के लिए 1961, दूसरे चरण में तीन सीटों पर मतदान के लिए 6567 मतदान केंद्र स्थापित किये गये हैं। जबकि बाकी तीसरे चरण में सात सीटों के लिए होने वाले चुनाव के लिए बनाए गये हैं। प्रदेश में इन मतदान केंद्रों में से 3320 मतदान केन्द्र ऐसे हैं, जिनका संचालन करने की पूरी जिम्मेदारी महिला मतदान कर्मियों को सौंपी गई है। जबकि इसके अलावा इनमें 90 दिव्यांग तथा 387 युवा मतदान केंद्र भी बनाए गए हैं। इसके अलावा प्रदेश भर में 450 आदर्श मतदान केन्द्र भी स्थापित किये जा रहे हैं। 
नौ सीटों पर निर्णायक भूमिका में महिलाएं 
छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों में नौ सीटों पर महिला मतदाताएं प्रत्याशियों का सियासी भविष्य तय करने के लिए निर्णायक हो सकती हैं। दरअसल राजधानी की रायपुर के अलावा बस्तर, महासमुंद, रायगढ़, राजनांदगांव, कोरबा, सरगुजा, दुर्ग और कांकेर लोकसभा सीटों पर महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से भी ज्यादा हैं। मसलन बिलासपुर और जांजगीर लोकसभा सीट पर ही पुरुष मतदाता महिलाओं से ज्यादा हैं। इसलिए पिछले विधानसभा की तरह इस बार भी भाजपा को महिलाओं का समर्थन मिलने की उम्मीद है। यही कारण है कि प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस ने तीन-तीन महिलाओं को अपना प्रत्याशी बनाकर महिलाओं को आकर्षित करने का दावं खेला है। उधर भाजपा यह दावा करते नहीं थक रही है कि उनकी सररकार ने प्रदेश में करीब 70 लाख महिलाओं को महतारी वंदन योजना का लाभ देकर उन्हें सशक्त बनाने का काम किया है। 
पहला चरण का चुनाव बड़ी चुनौती 
पहले चरण में नक्सलवाद व माओवादी प्रभावित क्षेत्र की बस्तर लोकसभा सीट पर 19 अप्रैल को चुनाव होगा। इस लोकसभा सीट में कोंडागांव, नारायणपुर, बस्तर, जगदलपुर, चित्रकोट, दंतेवाड़ा, बीजापुर और कोंटा यानी आठ विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। इस लोकसभा सीट पर 11 प्रत्याशियों को 14,72,207 मतदाताओं के चक्रव्यूह को भेदने की चुनौती होगी, जहां 7 लाख 476 पुरुष मतदाताओं के मुकाबले कहीं ज्यादा 7,71,679 महिला मतदाताओं की अहम भूमिका होगी। वहीं इस सीट पर 52 ट्रांसजेंडर और 12703 दिव्यांगों के अलवा 1603 सर्विस मतदाता भी मतदान करेंगे। चुनाव के लिए बस्तर सीट पर 1961 मतदान केन्द्र स्थापित किये गये हैं। चुनाव आयोग ने निष्पक्ष एवं शांतिपूर्ण तथा शतप्रतिशत मतदान कराने की दिशा में व्यापक प्रबंध किये हैं, जहां कड़ी सुरक्षा के साये में मतदान कराया जाएगा। 
बस्तर में कांटे की टक्कर 
छत्तीसगढ़ के अलग राज्य के अस्तित्व में आने के बाद अभी तक हुए चार लोकसभा चुनाव में बस्तर लोकसभा सीट पर तीन बार भाजपा का परचम लहराया है, लेकिन पिछले साल 2019 के चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी, जिसकी वापसी के लिए भाजपा को उम्मीद है। पहले चरण में नक्सल से प्रभावित और आदिवासी बाहुल्य बस्तर लोकसभा सीट पर भाजपा ने महेश कश्यप को मैदान में उतारा है। भाजपा प्रत्याशी को कड़ी चुनौती देने के इरादे कांग्रेस ने भी आदिवासियों में खासी पैंठ रखने वाले कवासी लखमा को चुनावी जंग में उतारा है। जबकि यहां भाकपा के फूल सिंह कचलाम, बसपा आयतू राम मंडावी तथा जीजीपी के टीकम नागवंशी समेत 11 प्रत्याशी चुनावी जंग में हैं। इस सीट पर 1951 के पहले लोकसभा चुनाव से 1996 तक कांग्रेस का दबदबा रहा है और पहली बार 1996 के चुनाव में एक निर्दलीय प्रत्याशी ने कांग्रेस के विजय रथ को रोका था। इसके बाद 1998 के बाद इस सीट पर दो दशक तक भाजपा काबिज रही, लेकिन साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बस्तर सीट पर फिर कांग्रेस ने बाजी मारी, जिसे इस बार भाजपा पलटने की कोशिश में है। यह भी खासबात है कि इस सीट पर पिछले दो दशक से कश्यप परिवार चुनाव जीतता आ रहा है। 
छत्तीसगढ़ में तीन चरणों में होगा मतदान 
पहला चरण(19 अप्रैल)-बस्तर में मतदान होगा. 
दूसरा चरण(26 अप्रैल)- राजनांदगांव, महासमुंद और कांकेर। 
तीसरा चरण(07 मई)- सरगुजा, रायगढ़, जांजगीर-चांपा, कोरबा, बिलासपुर, दुर्ग और रायपुर। 
मुकाबले में भाजपा व कांग्रेस के उम्मीदवार 
सीट                      भाजपा                 कांग्रेस 
रायपुर-  बृजमोहन अग्रवाल        विकास उपाध्याय 
दुर्ग-       विजय बघेल                 राजेन्द्र साहू 
राजनांदगांव- संतोष पांडेय         भूपेश बघेल 
सरगुजा- चिंतामणि महाराज      शशि सिंह 
बिलासपुर- तोखन साहू             देवेन्द्र सिंह यादव 
कोरबा- सरोज पांडेय                 ज्योत्सना महंत  
महासमुंद- रूप कुमारी            ताम्रध्वज साहू
रायगढ़- राधेश्याम राठिया    डा. मेनका देवी सिंह 
बस्तर- महेश कश्यप             कवासी लखमा 
कांकेर- भोजराज नाग            बीरेश ठाकुर 
जांजगीर-चांपा- कमलेश जांगड़े-   शिवकुमार डहरिया 
14Apr-2024

शनिवार, 13 अप्रैल 2024

लक्षद्वीप: लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के दलों में होगी जंग

कांग्रेस व रांकापा के बीच अजित गुट की राकांपा से रोचक हुआ चुनाव 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप की एक मात्र लक्षद्वीप लोकसभा सीट पर 19 अप्रैल को मतदान कराया जाएगा। यह सीट कांग्रेस की परंपरागत सीट के रुप में पहचानी जाती है, जहां अब तक हुए 16 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 12 चुनावों में जीत दर्ज की है। खास बात ये है कि इस सीट पर लक्षद्वीप की राजनीति में बड़ा नाम माने जाने वाले पीएम सईद लोकसभा चुनाव जीते हैं। भाजपा को इस सीट पर अभी तक कभी जीत नसीब नहीं हुई। मोदी की लहर में कांग्रेस का विजय रथ तो थमा, लेकिन इसका श्रेय राकांपा के मोहम्मद फैसल पदीपुरा को रहा, जिन्होंने पिछले दोनों लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को धूल चटाई है। इसी वजह से इस सीट पर कांग्रेसनीत गठबंधन का हिस्सा होते हुए भी रांकापा(शरद पवार) कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव मैदान में है। जबकि राजग गठबंधन का हिस्सा बनी राकांपा (अजित) ने भी इस मुकाबले में प्रत्याशी उतारकर त्रिकोणीय मुकाबला बनाने का प्रयास किया है।, लेकिन मुख्य मुकाबला इंडिया गठबंधन के दोनों दलों के बीच ही चुनावी जंग होने की उम्मीद जताई जा रही है। 
देश के सदूर द्वीपों के समूहों वाले मुस्लिम बाहुल्य लक्षद्वीप की एक लोकसभा सीट पर इस बार चुनाव की सियासत एक उल्लेखनीय घटना के बाद चर्चाओं में हैं। दरअसल पिछले दिनों हां हाल के दिनों में जनवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लक्षद्वीप दौरे पर मालदीव को तीखी मिर्चे लगी थी, जिसमें मालद्वीप की नेताओं ने सोशल मीडिया पर पीएम मोदी के दौरे की पोस्ट की गई तस्वीरों पर पीएम मोदी को 'जोकर' और 'इजरायल की कठपुतली' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए आपत्तिजनक टिप्पणियां की थी। हालांकि मालद्वीप को भारती झंडे और पीएम मोदी के अपमान का खामियाजा भी भुगतना पड़ा है। ऐसी टिप्पणी पर मौजूदा सांसद मो. फैसल ने भी मालद्वीप की टिप्पणियों पर ऐतराज जताया। ऐसे समय हो रहे लोकसभा चुनाव को लेकर गरमाई सियासत में भी दिलचस्प मुकाबले की संभावना है। इस सीट पर कुल चार प्रत्याशियों के लिए 55 मतदान केंद्रों पर 19 अप्रैल को होने वाले मतदात में 57729 मतदाता वोटिंग करेंगे, जिनमें 29232 पुरुष और 28497 महिला मतदाता है। इस सीट पर बनाए गये 55 मतदान केंद्रों पर वहीं इस सीट पर 169 सर्विस मतदाता भी अपना वोट करेंगे। 
क्या है चुनावी इतिहास 
दरअसल लक्षद्वीप लोकसभा सीट पर साल 2019 और साल 2014 के लोकसभा चुनाव में राकांपा (शरद पवार) इस बार भी चुनाव मैदान में हैं, जिन्हें कांग्रेस का गढ़ तोड़कर इसे अपना सियासी गढ़ बनाया है। इंडिया गठबंधन के बावजूद इस सीट पर कांग्रेस ने भी पूर्व सांसद मोहम्मद हमदुल्ला सईद को अपने प्रत्याशी बनाकर विरासत बचाने की रणनीति अपनाई है। लेकिन इन दोनों प्रमुख दलों के प्रत्याशियों के बीच भाजपा समर्थित राकांपा (अजित) ने भी टीपी युसूफ को सियासी जंग में उतारकर चुनाव को रोचक बना दिया है। इस बार इस सीट पर केवल चार प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं, जिनमें चौथे प्रत्याशी कोया निर्दलीय रुप अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इससे पहले राजनीतिक इतिहास पर गौर की जाए तो यहां पहले चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज कर विजय रथ शुरु किया था, लेकिन 1967 के चुनाव में यहां पीएम सईद ने निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में शानदार जीत दर्ज कर कांग्रेस को जवाब दिया। लेकिन इसके बाद कांग्रेस ने लगातार पीएम सईद को चुनाव लड़ाया, जो निरंतर दस दस बाद लोकसभा सांसद रहे। हालांकि 2004 के चुनाव में इस सीट पर जदयू ने विजय पताका लहराया, लेकिन इसके बाद फिर 2009 तक कांग्रेस इस सीट पर कब्जा करती रही, जिस पर राकांपा के मो. फैसल ने पलटवार करके अपना विजय रथ अभियान शुरु किया। इस बार उन्हें अपनी जीत की हैट्रिक की उम्मीद है। 
क्या है लक्षद्वीप का रहस्य 
भारत के केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे छोटे यूटी लक्षद्वीप 36 द्वीपों के समूह से बना हुआ है, जहां केवल सात द्वीपों पर ही आबादी है। बाकी द्वीप पर्यटन केंद्र के रुप में विकसित हैं, लेकिन पर्यटकों को केवल छह द्वीपों पर ही जाने की अनुमति है। भौगोलिक और प्राकृतिक सुंदरता के केंद्र में शुमार लक्षद्वीप केवल 32 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। 
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अंडमान निकोबार: भाजपा को जीत की उम्मीद 
देश के सदूर आईलैंड के रुप में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की एक मात्र लोकसभा सीट के चुनावी इतिहास को देखते हुए यहां राजनीतिक समीकरणों में उलटफेर देखे गये हैं। इस सीट पर जहां 2014 के चुनाव में मोदी लहर में इस सीट पर भाजपा के विष्णु पद रे ने चुनाव जीता था, लेकिन पिछले 20219 के चुनाव में कांग्रेस के कुलदीप राय ने पलटवार करके इस सीट पर जीत दर्ज की थी। इस सीट पर भाजपा ने साल 1999 में भजापा जीती, तो 2004 में यह बाजी कांग्रेस ने पलटी। फिर अगले लोकसभा चुनाव में यहां लगातार यहां लगातार दो बार भाजपा काबिज रही। लेकिन इस बार भाजपा के प्रत्याशी विष्णु पर रे को अपनी जीत की उम्मीद है। इस सीट पर कांग्रेस के कुलदीप राय से ही उनका मुकाबला होना है। इसके अलावा इस सीट पर सीपीआई, बसपा, एडीएमके जैसे क्षेत्रीय दलों समेत कुल 14 प्रत्याशी चुनावी जंग में हैं, जिन्हें 19 अप्रैल को 412 मतदान केंद्रों पर होने वाले चुनाव में 317876 मतदाताओं के चक्रव्यूह को भेदने की चुनौती रहेगी। 
ये हैं संक्षिप्त इतिहास अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भी लक्षद्वीप की तरह ही 572 छोटे बड़े द्वीपों का गढ़ है। अंडमान और निकोबार ही वही प्रदेश हैं, आजादी की जंग में सबसे पहले अंग्रेजो से आजाद कराकर यहां पहली बार तिरंगा फहराया गया था। यहां की राजधानी पोर्ट ब्लेयर की सेल्यूलर जेल में काली पानी की सज़ा दी जाती थी। भारत के दक्षिण-पूर्वी किनारे पर स्थित अंडमान निकोबार द्वीप समूह में विभिन्न राजनीतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक घटनाओं का संगम देखते ही मनता है। 
13Apr-2024

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2024

पुडुचेरी: राजग के लिए आसान नहीं कांग्रेस का सियासी किला ढ़ाहना!

द्रविड सियासत को लेकर एडीएमके ने बनाया त्रिकोणीय मुकाबला 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। दक्षिण भारत में सियासी जमीन तलाशती भाजपा के लिए पुडुचेरी लोकसभा सीट पर इस बार त्रिकोणीय मुकाबला होने के आसार है। जबकि पुडुचेरी लोकसभा क्षेत्र को कांग्रेस का सियासी गढ़ माना जाता है। इस बार लोकसभा चुनाव में जहां पीएमके व सत्तारुढ एनआरकांग्रेस के सहयोगी दलों के साथ राजग ने भाजपा प्रत्याशी के रुप में पुडुचेरी सरकार के मंत्री ए. नमस्सिवयम को चुनावी मैदान में उतारा है, जो इस सीट कांग्रेस प्रत्याशी एवं मौजूदा सांसद वी वैथिलिंगम को चुनौती दे सकते हैं। वी वैथिलिंगम इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी हैं। जबकि तमिलनाडु की द्रविड़ सियासत के चलते एडीएमके के चुनाव मैदान में आने से इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला होने के आसार बने हुए हैं। इसके बावजूद पुडुचेरी लोकसभा पर कांग्रेस के सियासी गढ़ को फेतह करना राजग के भाजपा प्रत्याशी के लिए आसान नहीं होगा? लोकसभा चुनाव के पहले चरण में पुडुचेरी की राजनीतिक समीकरण बदलने के लिए सियासी जमीन तैयार कर रही भाजपा ने पुडुचेरी को अपने चुनावी घोषणा पत्र में पूर्ण राज्य का दर्जा देने का वादा किया है। वहीं भाजपा पुडुचेरी में किये गये विकास कार्यो को भी मुद्दा बनाकर इस बार जीत के प्रति आश्वस्त है। वहीं कांग्रेसनीत गठबंधन भाजपा के ऐसे वादों को जुमला बताकर अपने वर्चस्व को कायम रखने के प्रयास में है। राजनीति के जानकारों के मुताबिक इस सीट पर इस बार उतरे 26 प्रत्याशी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। इनमें एडीएमके के अलावा बसपा, यूआरपीआई और एनटीके जैसे इस राज्य में प्रभाव रखने वाले दल भी शामिल है। कांग्रेस प्रत्याशी को इंडिया गठबंधन में डीएमके और वामदलों का समर्थन प्राप्त है। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी मौजूदा सांसद होने के नाते भी चुनावी क्षेत्र में जनाधार रखते हैं। 
पुडुचेरी में महिलाओं की बड़ी भूमिका 
पुडुचेरी की 38 विधानसभा क्षेत्रों को मिलाकर बनी एक मात्र लोकसभा सीट पर 19 अप्रैल को मतदान होगा। हालांकि पुडुचेरी विधानसभा 33 सदस्यीय सदन है, जहां तीन विधायक मनोनीत किये जाते हैं। पुडुचेरी लोकसभा सीट पर चुनाव मैदान में उतरे 26 प्रत्याशियों को 10,23,699 मतदाताओं के बने चक्रव्यूह को भेदने की चुनौती है। खास बात ये है कि इस बार के चुनाव में 480569 पुरुष मतदाताओं के मुकाबले 542979 महिला मतदाताओं की वोट अहम भूमिका निभाएगी। इस सीट पर 151 थर्डजेंडर भी मतदान करेंगे। साल 2019 में कुल मतदाताओं की संख्या 7,90,760 थी, जिसमें 5,41,505 पुरुष व 4,79,932 महिला मतदाता थे। 
कांग्रेस का गढ़ रहा है पुडुचेरी 
केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में अब तक हुए 14 लोकसभा चुनावों में से दस बार कांग्रेस ने अपना परचम लहराया है। मोदी लहर के बावजूद पिछले 2019 के चुनाव में कांग्रेस के वैथीलिंगम ने एआईएनआरसी प्रत्याशी के. नारायणसामी को हराकर जीते थे। मसलन इस लोकसभा के पहला और पिछला अंतिम चुनाव भी कांग्रेस के नाम दर्ज हुआ। इसके अलावा यहां एडीएमके, डीएमके, एआईएनआरसी व पीएमके एक-एक बार चुनाव जीत सकी है। इस बार इस सीट पर भाजपा प्रत्याशी ए नमस्सिवायम अपनी समृद्ध राजनीतिक पृष्ठभूमि के बल पर चुनाव जीतने की जुगत में हैं। 
क्या है पुडुचेरी का इतिहास तमिलनाडु से सटे केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी की भाषा तमिल है, लेकिन यहां तेलुगु के साथ मलयालम भाषा भी बोली जाती हैं। समुद्र के किनारे होने के कारण पुडुचेरी में बड़े स्तर पर मछली पालन किया जाता हैं। 
12Apr-2024

मेघालय: सियासी वर्चस्व की चुनावी जंग में एनपीपी और कांग्रेस

पिछले अरसे स शिलांग में कांग्रेस, तो तुरा सीट पर संगमा परिवार का है कब्जा 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में पूर्वोत्तर के मेघालय की दो लोकसभा सीटों पर पहले चरण में ही 19 अप्रैल को मतदान कराया जा रहा है। राज्य की शिलांग लोकसभा सीट पर कांग्रेस का वर्चस्व रहा है, जबकि दूसरी तुरा लोकसभा सीट लंबे समय से संगमा परिवार का गढ़ रहा है। इस बार दोनों सीटों पर राज्य के सत्तारूढ़ दल भाजपा के समर्थन से शिलांग सीट पर लगातार तीन बार के सांसद एवं कांग्रेस प्रत्याशी विसेंट पाला के खिलाफ महिला उम्मीदवार को उतारा है, लेकिन तुरा सीट पर मौजूदा सांसद अगाथा संगमा के सामने भी इस बार तृणमूल कांग्रेस का प्रत्याशी आने से कड़ी चुनौती होगी। मसलन मेघालय में लोकसभा चुनाव के मुकाबले दिलचस्प होने की संभावना है। 
पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय की दोनों सीटों पर इस बार बदले सियासी समीकरण की वजह से बहुकोणीय चुनाव की संभावना है। दरअसल राज्य की शिलांग लोकसभा सीट पर पिछले तीन दशक से कांग्रेस के कब्जे में है। भाजपा ने मेघालय की किसी भी सीट पर अपना उम्ममीदवार नहीं उतारा है। इसलिए कांग्रेस के खिलाफ चुनावी रणनीति के तहत दोनो सीटों पर सत्तारूढ नेशनल पीपुल्स पार्टी यानी एनपीपी को समर्थन देने का ऐलान किया है। उसी रणनीति कके तहत शिलांग सीट पर एनपीपी प्रत्याशी के रुप में कॉनराड संगमा सरकार में मंत्री 58 वर्षीय माजेल अम्पारीन लिंगदोह को चुनाव मैदान में उतारा है। एनपीपी को चुनाव में मिल रहे भाजपा के समर्थन से उम्मीद है कि इस बार शिलांग सीट पर भी वह अपना परचम लहराएगी? उधर 1970 के दशक के मध्य से ही संगमा परिवार के पास रही तुरा लोकसभा सीट पर तीन बार से सांसद रही पूर्व केंद्र्रीय मंत्री तथा सीएम की बहन अगाथा संगमा चुनाव मैदान में हैं। लेकिन इस बार कांग्रेस ने भी संगमा परिवार के वर्चस्व को तोड़ने की रणनीति के तहत अपना प्रत्याशी सालेंग ए संगमा को बनाया तो वहीं इस बार तृणमूल कांग्रेस ने भी इस सीट पर जेनिथ संगमा को अपना प्रत्याशी बना चुनावी मुकाबले को तीन संगमा की जंग बना दी है। मसलन इस बार मेघालय लोकसभा की दोनों सीटों पर सत्तारूढ़ और विपक्ष की रणनीति एक दूसरे के परंपरागत वर्चस्व को तोड़ने की है। राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो इस बार मेघालय की शिलांग और तुरा दोनों लोकसभा सीटों पर कई मायनों में चुनावी जंग बेहद दिलचस्प होने की संभावना है। इन दोनों सीटों पर एनपीपी की दोनों महिला उम्मीदार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कॉनराड संगमा की डबल इंजन सरकार के नाम पर मतदाताओं के बीच में हैं। एनपीपी के सामने इन चुनाव में लोकसभा अध्यक्ष रहे पीए संगमा की सियासी विरासत बरकरार रखने की चुनौती है, तो कांग्रेस की भी अपने परंपरागत गढ़ को बचाने के लिए अग्नि परीक्षा होगी। 
दो सांसदों को चुनेंगे 22,26,567 मतदाता 
मेघालय में की दो लोकसभा सीटों पर होने वाले चुनाव में इस बार 22,26,567 मतदाता अपने सांसदों का चुनाव करेंगे, जिसमें 10,99,517 पुरुष, 11,27,047 महिला, 03 थर्डजेंडर मतदाता शामिल हैं। जबकि 3,884 सर्विस, 11,720 दिव्यांग, 10,180 बुजुर्ग मतदाता चुनाव में मतदान करेंगे। राज्य की दोनों सीटों पर 84,412 ऐसे युवा मतदाता हैं, जो पहली बार मतदान करने जा रहे हैं। राज्य की 36 विधानसभाओं से बनी शिलांग लोकसभा सीट पर 14,00,411 मतदाताओं के चक्रव्यूह में 6,83,766 पुरुषों से कहीं ज्यादा 7,16,643 महिला मतदाताओं की अहम भूमिका होगी। जबकि 57,673 युवा मतदाता और 8,173 बुजुर्ग और 8,515 दिव्यांग मतदाता भी वोटिंग करेंगे। इसके अलावा राज्य की तुरा लोकसभा सीट पर 8,26,156 मतदाताओं का चक्रव्यूह बना हुआ है, जिसमें 4,15,751 पुरुष, 4,10,404महिला, 3,205 दिव्यांग, 26,739 युवा और 2,007 बुजुर्ग मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। 
मतदान केंद्रों पर पर सुरक्षा 
राज्य की दोनों लोकसभा पर बनाए गये 60 आदर्श केंद्र समेत 3512 मतदान केंद्रों में शिलांग लोकसभा सीट के चुनाव के लिए 2288 तथा तुरा लोकसभा सीट के लिए 1224 केंद्र बनाए गये हैं। दोनो सीटों के लिए महिलाओं के 88 व दिव्यांगों के लिए 10 मतदान केंद्रों को चिन्हित किया गया है। चुनाव आयोग ने निष्पक्ष एवं शांतिपूर्ण मतदान कराने के लिए मतदान केंद्रों पर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किये हैं। 
चुनाव मैदान में दस प्रत्याशी 
मेघालय की दो लोकसभा सीटों पर दस उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं, जिनमें प्रमुख रुप से शिलांग लोकसभा सीट से कांग्रेस के मौजूदा सांसद विसेंट एच पाला, यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (यूडीपी) से रॉबर्टजुन खारजाह्रिन और वॉय पार्टी ऑफ इंडिया से रिकी एजे सिंगकोन चुनाव मैदान में हैं। जबकि तुरा लोकसभा सीट पर कांग्रेस के सालेंग ए. संगमा, नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) की अगाथा संगमा और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के जेनिथ संगमा चुनाव लड़ रहे हैं। 
क्या है सीटों का इतिहास 
असम से अलग होने के बाद मेघालय की शिलांग लोकसभा सीट पर पहली बार साल 1977 में चुनाव हुए थे। अब तक इस सीट पर 12 लोकसभा चुनाव हुए हैं, जिनमें आठ बार कांग्रेस ने जीत दर्ज की। जबकि साल 1984 और 1996 में निर्दलयी उम्मीीदवारों ने जीत हासिल की थी। इस सीट पर साल 1998 से अब तक लगातार कांग्रेस ही जीतती आ रही है। जबकि तुरा सीट पर लगातार संगमा परिवार का कब्जा रहा है, भले ही वह कसी भी दल से चुनाव लड़ा हो। 
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नागालैंड: तीन प्रत्याशियों में होगी लोकसभा चुनाव की जंग 
 लोकसभा चुनाव में 60 सदस्यीय विधानसभा वाले ईसाई बहुल नगालैंड राज्य की एक मात्र लोकसभा सीट पर 19 अप्रैल को होने वाले चुनाव में केवल तीन प्रत्याशियों के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होने की संभावना है। वैसे भी यहां यहां राष्ट्रीय दलों की तुलना में स्थानीय दलों का ही दबदबा रहता है। पिछला चुनाव भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन से एनडीपीपी के प्रत्याशी तोखेहो येपथोमी ने जीतकर लोकसभा में प्रवेश किया था। इस बार इस सीट पर एनडीपीपी प्रत्याशी के रुप में डॉ चुम्बेन मुरी को चुनाव मैदान में उतारा है, जिसे भाजपा का समर्थन मिल रहा है। जबकि कांग्रेस नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन से कांग्रेस की राज्य इकाई के अध्यक्ष और पूर्व विधायक एस सुपोंगमेरेन जमीर पहली बार संसदीय चुनाव की जंग में हैं। इस सीट पर तीसरे उम्मीदवार के रुप में राज्य के एक सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिज्ञ और उद्यमी हेइथुंग तुंगो लोथा निर्दलीय रुप से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, जिन्होंने पिछला चुनाव एनपीपी के टिकट पर लड़ा था। 
चुनाव में वोट डालेंगे 13,08,848 मतदाता 
नागालैंड लोकसभा सीट पर कुल 13,08,848 वोटिंग करेंगे। इनमें 6,56,043 पुरुष, 6,52,802 महिला और तीन थर्ड जेंडर शामिल हैं। कुल मतदाताओं में 109 महिलाओं समेत 7,756 सर्विस मतदाता हैं। पिछले सल नागालैंड में हुए विधानसभा चुनाव में कुल 13,01,092 ,मतदाताओं में 6,48,396 पुरुष मतदाताओं की तुलना में 6,52,693 महिला मतदाता थी। इस बार पुरुष मतदाताओं की संख्या में इजाफा हुआ है। जबकि साल 2019 के चुनाव में प्रदेश के मतदाताओं की संख्या 12,13,777 थी। 
11Apr-2024

बुधवार, 10 अप्रैल 2024

सिक्किम: लोकसभा सीट पर क्षेत्रीय दलों के बीच सियासी जंग


दांव पर होगी एक दर्जन से ज्यादा केंद्रीय मंत्रियों की प्रतिष्ठा
ओ.पी. पाल.नई दिल्ली। आम चुनाव में पूर्वोत्तर राज्य सिक्किम की एक मात्र लोकसभा सीट पर सभी की नजरें टिकीं होंगी, जहां लोकसभा के साथ राज्य की 32 विधानसभा सीटों पर भी 19 अप्रैल को पहले चरण में चुनाव होगा। इस राज्य में भाजपा और कांग्रेस समेत छह राजनैतिक दल भले ही चुनाव की जंग में हैं, लेकिन अपने अस्तिव में आने के बाद सिक्किम लोकसभा सीट पर यहां के क्षेत्रीय दलों का ही वर्चस्व रहा है। इस बार सत्तारूढ़ सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा की इस लोकसभा सीट पर एक बार फिर अपनी जीत को दोहराने के लिए अग्नि परीक्षा होगी। जबकि संसदीय सीट पर सबसे ज्यादा काबिज रहे सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के सामने कड़े चुनावी संग्राम में वापसी करने की चुनौती होगी। सबसे खास बात ये है कि एक मात्र लोकसभा सीट पर सभी दल अकेले दम पर सियासी हुंकार भर रहे हैं। अब देखना यह है कि इस बार के चुनाव के नतीजों का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में हैं। सिक्किम देश का ऐसा राज्य है, जहां लोकसभा और विधानसभा की सियासत में राज्य के क्षेत्रीय दलों का ही दबदबा रहा है। चीन, तिब्बत, नेपाल और भूटान की सीमा से सटे सिक्किम की एक मात्र लोकसभा सीट की राजनीति का इतिहास ये रहा है कि जहां कुछ अपवाद को छोड़कर सभी दल अलग चुनाव लड़ते रहे हैं, लेकिन जरुरत पड़ने पर बाद में गठबंधन कर लेते हैं। सिक्किम की सरकार सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा और भाजपा के गठबंधन के साथ चल रही है, लेकिन चुनाव से पहले ही इस गठबंधन को तोड़कर उसके बाद के विकल्प सुरक्षित रखे गये हैं। सिक्किम की राजनीति में प्रमुख रुप से सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा(एसकेएम) तथा सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट(एसडीएफ) रहे हैं। चुनावी समर में यहां राष्ट्रीय दलों में भाजपा, कांग्रेस, राकांपा, सीपीएम आरपीआई जैसे दल भी अपनी किस्मत आजमाते रहे हैं, इन दलों को यहां खास दबदबा नहीं है। सूबे में चुनावी सरगर्मियों की तेजी के बीच इस बार भाजपा राज्य में विकास के मुद्दों को लेकर अपनी रणनीति के साथ चुनाव मैदान में है। राजनीतिक विशेषज्ञ की माने तो यहां इस बार के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भी प्रमुख रुप से एसकेएम व एसडीएफ के बीच ही चुनावी मुकाबला होने की उम्मीद है। सिक्किम लोकसभा सीट पर चार जून और विधानसभा चुनाव की मतगणना दो जून को कराई जाएगी। 
लोकसभा चुनाव का इतिहास पूर्वोत्तर की सिक्किम लोकसभा चुनाव के इतिहास पर नजर डालें, तो अस्तित में आए सिक्किम में 1977 में पहली बार हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और 1980 के दूसरे चुनाव में सिक्किम जनता परिषद ने पलटवार करके क्षेत्रीय दबदबा बनाने की शुरुआत की। हालांकि बाद के दो चुनाव में इस सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी ने भी अपनी ताकत दिखाई। इस सीट पर दो बार सिक्किम संग्राम परिषद ने जीत दर्ज की। इसके बाद इस लोकसभा पर लगातार छह लोकसभा चुनाव में तीन दशक तक सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट(एसडीएफ) का कब्जा रहा है। पिछले 2019 के चुनाव में लोकसभा सीट पर पहली बार भाजपा के समर्थन से एसकेएम ने पलटवार करके जीत हासिल की, जिसने इस बार भी मौजूदा सांसद इंद्रा हांग सुब्बा को चुनावी जंग में उतारा है। पिछली बार लोकसभा में ही नहीं विधानसभा में भी एसकेएम ने सरकार बनाई। 
सांसद चुनेंगे 4.62 लाख मतदाता 
सिक्किम लोकसभा की एक सीट व 32 विधानसभा सीटों पर होने वाले चुनाव में इसबार 4,62,456 मतदाता वोटिंग करेंगें, जिनमें 2,32,117 पुरुष, 2,30,334 महिलाएं और पांच ट्रांसजेंडर मतदाता हैं। इस मतदाता सूची में 3,856 दिव्यांग तथा 1,992 सर्विस मतदाता भी शामिल हैं। पिछले चुनाव की तुलना में इस साल 4,050 (0.88 फीसदी) मतदाताओं के नामों का इजाफा हुआ है। 
  संसद पहुंचने को उतरे 14 प्रत्याशी 
लोकसभा सीट पर चुनाव मैदान में उतरे 14 प्रत्याशियों में किसी भी राजनैतिक दल ने इस बार महिला को टिकट नहीं दिया। पूर्वोत्तर की सिक्किम लोकसभा सीट पर सत्तारुढ दल एसकेएम ने इस बार भी मौजूदा सांसद इंद्रा सुब्बा को चुनाव मैदान में उतारा है। जबकि एसडीएफ प्रेम दास राय, भाजपा ने दिनेश चंद्र नेपाल, कांग्रेस ने गोपाल छेत्री, एसआरपी ने खड़गा बहादुर राय, टोपी ने भरत बासनेट पर चुनाव मैदान में हैं। इसके अलावा बीना राय, संभू छेत्री, नवीन किरण प्रधान, रवि चंद्र राय, मधुकर ढकाल, रूद्र मणि प्रधान, श्यामल पाल, लाटेन शेरिंग शेरपा निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। 
क्या है सिक्किम का इतिहास 
दरअसल सिक्किम का भारतीय संघ में विलय 1975 में हुआ था और इसे आधिकारिक तौर पर भारत का 22वां राज्य बनाया गया था। यह विलय एक जनमत संग्रह के बाद हुआ, जिसमें 97.5 प्रतिशत नागरिकों ने भारत में विलय के पक्ष में मतदान किया था। इस घटना ने सिक्किम को एक नई पहचान और दिशा प्रदान की, जिसकी वजह से यह आज भारतीय गणराज्य का एक अभिन्न अंग बना हुआ है। भारत पूर्वोत्तर भाग में स्थित सिक्किम एक पर्वतीय राज्य है, जो पश्चिम में नेपाल, उत्तर और पूर्व में चीनी तिब्बत और दक्षिण-पूर्व में भूटान की सीमा से हुआ है। हिन्दू और बज्रयान बौद्ध धर्म इस राज्य के प्रमुख धर्म हैं। गंगटोक इसकी राजधानी है। सिक्कीम में कंचनजंगा है, जो कि दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची चोटी है। सिक्किम भारत में पर्यटन का प्रमुख केन्द्र है। दिल्ली से सिक्किम की दूरी 1,602.9 किलोमीटर है। इसके दक्षिण में पश्चिम बंगाल राज्य है। 
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विधानसभा चुनाव: महिलाएं दिखाएंगी दम 
सिक्किम लोकसभा सीट के साथ 19 अप्रैल को ही सिक्किम की 32 विधानसभा सीटों के लिए भी चुनाव होगा, जिनमें 12 सीट अुनसूचित जनजाति प्रत्याशी के लिए आरक्षित हैं। इन अनुसूचित जनताति में प्रमुख रुप से भूटिया, लेप्चा (शेरपा), लिम्बु, तमांग और अन्य सिक्किमी नेपाली समुदाय जैसी जातीय शामिल है। विधानसभा चुनाव में कुल मतदाताओं में आधे से अधिक 2.31 लाख से ज्यादा महिला मतदाता इस बार वोटिंग करके अहम भूमिका निभाएंगी। फिलहाल विधानसभा में तीन महिला विधायक है। विधानसभा चुनाव में विभिन्न दलों के कुल 132 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। भाजपा ने दो महिलाओं समेत 23 प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा है। जबकि कांग्रेस ने अपने 18 प्रत्याशियों से दो सीटों पर महिलाओं पर दांव खेला है। जबकि सिक्किम के एक क्षेत्रीय दल सिटिजन एक्शन पार्टी ने चार महिला उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा है। एसडीएफ ने पिछली बार दो महिला विधायक जीतने के बावजूद इस बार महिला प्रत्याशियों से दूरी बना ली है। 
  10Apr-2024

असम: नए सियासी समीकरणों में उलझे सियासी दल

सीएए के खिलाफ आंदोलन के सामने भाजपा की अग्नि परीक्षा, विपक्ष की चुनौती भी कम नहीं 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में असम की 14 लोकसभा सीटों पर तीन चरणों में चुनाव होगा। राज्य में परिसीमन के तहत सभी लोकसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निधारण होने के बाद पहली बार हो रहे इन लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस गठबंधन तथा अन्य दलों के सामने चुनावी रणनीति तैयार करने के लिए भी मशक्कत करने को मजबूर होना पड़ रहा है। हालांकि सभी दल इस चुनावी महासंग्राम में अपनी नई रणनीतियों का ताना-बाना बुनकर अपनी सियासत की वैतरणी को पार लगाने की जुगत में हैं। भले ही भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन और कांग्रेसनीत इंडिया गठबंधन एक दूसरे के खिलाफ विभिन्न मुद्दों को लेकर वर्चस्व के लिए संघर्ष और दावे कर रहा हो, लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों को असम में लोकसभा चुनाव के इस बार चुनावी नतीजें चौंकाने वाले आने की उम्मीद है। 
पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य असम में लोकसभा चुनाव के महासमर का भी बड़ा मैदान है। लेकिन पिछले साल राज्य की लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के बाद भौगोलिक और राजनीतिक परिदृश्य बदलने के बाद पहली बार हो रहे लोकसभा चुनाव के सियासी समीकरण भी बदल गये हैं। यही कारण है कि राज्य में तमाम राजनीतक दलों को नई रणनीति के साथ चुनाव मैदान में है। जहां विपक्षी दल को देश में लागू हो चुके नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ राज्य में चल रहे आंदोलन से बहुत कुछ उम्मीद है। जहां तक भाजपा का सवाल है, उसे इस कानून से पहले से भी ज्यादा सियासी लाभ की आस लगी हुई है। इसका कारण भी साफ है कि भाजपा के इस कानून को लाने के शफुगा छोड़ने और संसद में पारित होने के खिलाफ ऐसे आंदोलन से असम में राजनीतिक लाभ मिला है यानी उसके बाद पिछले लोकसभा चुनाव में जहां उसे कहीं ज्यादा सीटों पर जीत मिली थी, तो वहीं राज्य में भी भाजपा का शासन है। ऐसे में लागू हुए सीएए के खिलाफ इस आंदोलन से भाजपा को अपने सहयोगी दलो के साथ तमाम 14 सीटों पर जीत मिलने की उम्मीद नजर आ रही है, लेकिन नागरिकता संशोधन कानून जैसे संवेदनशील मुद्दे के खिलाफ आंदोलन को विपक्ष जिस प्रकार हवा दे रहा है, उसका सामना करने की भी भाजपा के लिए कड़ी चुनौती होगी। हालांकि चुनाव नतीजों के बाद नए परिसीमन और सीएए का लाभ किस गठबंधन को मिलेगा। 
मतदाताओं की संख्या में इजाफा 
असम में राज्य में कुल 2,43,01,960 मतदाता हैं, जिनमें 1,21,79,358 पुरुष, 1,21,22,188 महिलाएं और 414 थर्डजेंडर मतदाता शामिल हैं। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में इस राज्य में 2,19,91,114 मतदाता थे, जिनमें 1,12,35,129 पुरुष, 1,07,55,492 महिलाएं और 491 थर्डजेंडर शामिल थे। इस प्रकार लोकसभा चुनाव 2024 में मतदाताओं की संख्या में 23,10,848 की वृद्धि होगी, जिसमें 13,66,696 महिला तथा 9,44,229 पुरुष मतदाता बढ़े हैं। जबकि थर्डजेंडर मतदाताओं की संख्या में 77 की कमी दर्ज की गई है। इस मतदाता सूची में नए मतदाताओं के रुप में 7,26,783 युवा मतदाता हैं, जिनमें 18-29 साल के करीब 4.5 लाख मतदाताओं के नाम जोड़े गये हैं। असम में सबसे कम 8,92,789 मतदाता दीफू लोकभा सीट और सबसे अधिक 26,43,403 मतदाता धुबरी लोकसभा सीट पर हैं। 
गठबंधन में भाजपा 11 सीटों पर लड़ेगी चुनाव 
असम पूर्वोत्तर भारत के एक प्रमुख राज्य में शुमार है, जहां 126 विधानसभा क्षेत्रों के विभाजन से बनी 14 लोकसभा सीटों में से 11 सीटें सामान्य हैं। जबकि दो अनुसूचित जनजाति (एसटी) तथा एक अनुसूचित जाति (एससी) प्रत्याशी के लिए आरक्षित श्रेणी में है। असम की 14 सीटों पर राजग गठबंधन में भाजपा 11 लोकसभा सीटों करीमगंज, कलियाबोर, लखीमपुर, डिब्रूगढ़, सिलचर, स्वायत्त जिला, गौहाटी, मंगलदोई, तेजपुर, नौगोंग और जोरहाट लोकसभा सीटों परपर चुनाव लड़ रही है, जबकि उसके सहयोगी दल असम गण परिषद(एजीपी) बारपेटा और धुबरी के अलावा यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल)कोकराझार लोकसभा सीट पर अपना प्रत्याशी उतार रही है। सभी सीटों पर एक दूसरी पार्टी अपने सहयोगी उम्मीदवार का समर्थन करेगी। असम के परिसीमन के बाद 14 लोकसभा सीटों में से 11 सीटें सामान्य सीटें हैं। जबकि दो अनुसूचित जनजाति (एसटी) और एक अनुसूचित जाति (एससी) उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है। 
पहले चरण में दांव पर 35 प्रत्याशियों की प्रतिष्ठा 
असम में पहले चरण में पांच लोकसभा सीटों काजीरंगा, जोरहाट, डिब्रूगढ़, लखीमपुर और सोनितपुर पर 19 अप्रैल को होने वाले चुनाव में 35 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। काजीरंगा सीट पर सबसे अधिक 11 और डिब्रूगढ़ में सबसे कम 3 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। इस चरण में जिनकी प्रतिष्ठा दावं पर लगी है, उनमें केंद्रीय मंत्री केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल, भाजपा सांसद टोपोन गोगोई, प्रदान बरुआ व कामाख्या प्रसाद तासा और कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई जैसे प्रत्याशी प्रमुख रुप से शामिल हैं। असम में हो रहे लोकसभा चुनाव में अपनी सियासी जमीन तैयार करने के लिए प्रमुख रुप से भाजपा, असम गण परिषद (एजीपी), यूपीपीएल, कांग्रेस एआईयूडीएफ, टीएमसी, असम जातीय परिषद, आम आदमी पार्टी (आप), रत्रिय उलेमा काउंसिल रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया जैसे दल चुनाव मैदान मे हैं। 
जातीय समीकरण साधने की तैयारी 
असम में जनगणना 2011 के अनुसार 3.11 करोड़ से अधिक की आबादी है, जिसमें 34.2 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। पिछले दो लोकसभा चुनाव की तर्ज पर इस बार भी राज्य में भाजपा असमिया राष्ट्रवाद को हिंदू राष्ट्रवाद में बदलने की रणनीति के तहत राज्य के हिंदू, बंगाली, बहिरागतों को अपना जनाधार बनाने की जुगत में है,क्योंकि इस वर्ग का मुस्लिमों से टकराव चलता आ रहा है। भाजपा के सहयोगी दल भी कुछ इसी तरह की चुनावी रणनीति के साथ चुनाव में है। दरअसल असम में भाजपा की ताकत सबसे पहले बराक घाटी में ही बनी, जहां मुस्लिम बहिरागतों की तादाद सबसे ज्यादा है। पिछड़ी जाति के हिंदुओं ने भी अब कांग्रेस से किनारा करना शुरु कर दिया है। जबकि कांग्रेस का वोटबैंक माने जाते रहे अनुसूचित जाति और आदिवासियों के छिटकने का कारण भी इस राज्य में कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। 
असम में तीन चरणों में चुनाव चरण 1 (19 अप्रैल)- काजीरंगा, सोनितपुर, लखीमपुर, डिब्रूगढ़, जोरहाट। 
चरण 2(26अप्रैल)-दरांग-उदलगुड़ी, दिफू, करीमगंज, सिलचर, नगांव।
चरण 3(07 मई )- कोकराझार, धुबरी, बारपेटा, गुवाहाटी। 
 09Apr-2024

सोमवार, 8 अप्रैल 2024

त्रिपुरा: भाजपा के सामने दोनों लोकसभा सीट बचाने की चुनौती

इंडिया गठबंधन दोनों सीटों पर लड़ेगा वर्चस्व कायम करने की जंग 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। भजापा शासित राज्य त्रिपुरा की दो लोकसभा सीटों पर दो चरणों में होने वाले लोकसभा चुनाव भी दिलचस्प होने की संभावना है। जहां भाजपा को अपनी दोनों सीटों को बचाने के लिए वर्चस्व के लिए चुनावी जंग करने की चुनौती होगी। वहीं इन दोनों सीटों पर भाजपा की चुनावी रणनीति को ध्वस्त करके इंडिया गठबंधन की जनाधार कायम करने के लिए अग्नि परीक्षा होगी। त्रिपुरा में 19 अप्रैल को पहले चरण की त्रिपुरा पश्चिम लोकसभा सीट के साथ एक विधानसभा सीट के लिए उपचुनाव भी कराया जा रहा है। 
चुनाव आयोग ने त्रिपुरा में चुनाव के लिए एक मजबूत लोकतांत्रिक भावना कायम करने का प्रयास किये हैं। इसलिए राज्य में प्रत्येक नागरिक के लिए सुचारू और समावेशी मतदान अनुभव के लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं की गई है। सुरक्षा की दृष्टि से भी आयोग ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किये हैं। वहीं राजनीतिक दलों ने भी चुनाव में अपनी अपनी रणनीति के तहत अपने प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा है। हालांकि यहां भाजपा और इंडिया गठबंधन के बीच ही मुख्य मुकाबला माना जा रहा है। इसी दृष्टि से पहले चरण में पश्चिम त्रिपुरा सीट पर 150 संवेदनशील मतदान केंद्रों को चिन्हित करके वहां केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती करने की व्यस्था की है। त्रिपुरा में कुल 3350 मतदान केंद्र बनाए गये हैं,जिनमें ब्रू बस्तियों के मतदाताओं को मतदान कराने के लिए 12 सहायक मतदान केंद्र भी शामिल हैं। जहां सुरक्षा बलों की तैनाती के साथ प्रशान की सुचारु निगरानी रहेगी। त्रिपुरा में सीएपीएफ की कम से कम सत्तर कंपनियों तैनात की जा चुकी हैं। 
मतदाओं का चक्रव्यूह भेजने को बेताब सियासी दल 
पूर्वोत्तर में 60 विधानसभा सीटों वाले त्रिुपरा राज्य की दोनों लोकसभा सीटों में 30-30 विधानसभाएं हैं। दोनों लोकसभा सीटों पर इस बार 28,60,287 मतदाता मतदान करेंगे, जिनमें 14,36,644 पुरुष, 14,23,574 महिला तथा 69 थर्डजेंडर मतदाता भी शामिल हैं। इस 69,782 युवा वर्ग के नए मतदाता पहली बार मतदान करेंगे। वहीं राज्य में 85 वर्ष से अधिक आयु के 11,101 महिला समेत 18,538 मतदाता हैं। जबक राज्य में दिव्यांग मतदाताओं की संख्या 7,454 समेत 9,225 है। इसमें से पहले चरण में त्रिपुरा पश्चिम लोकसभा सीट पर 14,63,526 है, जिनमें 7,34,133 पुरुष, 7,29,337 महिला और 56 थर्ड जेंडर मतदाता शामिल हैं। इस चरण में रामनगर विधानसभा सीट पर होने वाले उप चुनाव के लिए 23,629 महिलाओं और 22,040 पुरुष समेत कुल 45,669 मतदाता मतदान करेंगे। जबकि दूसरे चरण 26 अप्रैल को त्रिपुरा पूर्व लोकसभा सीट पर होने वाले मतदान में 14,61,836 मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। 7,33,645 पुरुष तथा 7,28,315 महिला, 58 ट्रांसजेंडर, 7,818 दिव्यांग तथा 5,920 सर्विस मतदाता हैं। 
मिजोरम के 17 हजार लोग भी डालेंगे वोट 
मिजोरम के लगभग 17 हजार ब्रू निवासी त्रिपुरा के इन लोकसभा चुनाव में दोनों सीटों पर मतदान करेंगे। दरअसल साल 2020 में हुए एक चौगुने समझौते के बाद त्रिपुरा के दस स्थानों से पुनर्वासित ब्रू भी शामिल हैं, जो 22 साल से ज्यादा समय से उत्तरी त्रिपुरा के छह शिविरों में रह रहे थे। हालांकि वे मिजोरम के मतदाता हैं। 
दो सीटों पर 18 प्रत्याशी 
त्रिपुरा पश्चिम लोकसभा सीट पर पहले चरण में 19 अप्रैल को होने वाले चुनाव में भाजपा के बिपल्व कुमार देब समेतत नौ प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमाएंगे। जबकि कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष असिश कुमार साहा इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी शामिल हैं। जबकि त्रिपुरा पूर्वी लोकसभा सीट पर 26 अप्रैल को दूसरे चरण के चुनाव में दो महिला समेत नौ प्रत्याशी मैदान में हैं। जहां भाजपा के कृति देवी देबबर्मा और सीपीआई-एम के राजेंद्र रेनग के बीच चुनावी जंग होने की उम्मीद है। भाजपा और इंडिया ब्लॉक सहित 18 उम्मीदवारों में से अधिकांश पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। 
पहले चरण में कड़ा इम्तिहान 
पश्चिम त्रिपुरा लोकसभा क्षेत्र में 793 मतदान केंद्र स्थापित किए जाएंगे, जिनमें से 150 की पहचान ‘असुरक्षित’ के रूप में की गई है। इस सीट के हरेक विधानसभा क्षेत्र में एक या दो मतदान केंद्र आदर्श मतदान केंद्र, एक या दो महिला आधारित और एक या दो युवा पुरुष आधारित मतदान केंद्र स्थापित किये जा रहे हैं। सुरक्षा की समीक्षा के बाद आयोग ने इस लोकसभा क्षेत्र में सुरक्षा बलों की 14 कंपनियां तैनात कर दी है, जिन्हें जरुरत पड़ने पर दोगुना करने की व्यवस्था भी की गई है। 
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मिजोरम: भाजपा के लिए खाता खोलने की चुनौती 
लोकसभा की एक सीट के लिए मिजोरम में 19 अप्रैल को चुनाव होगा। 40 विधानसभा क्षेत्रों वाले मिजोरम की एक मात्र लोकसभा सीट पर इस बार 4.41 लाख महिलाओं समेत कुल 8,61,277 मतदाताओं में से 4,14,777 पुरुष, 4,41,520 महिला,; और 4,980 सेवा मतदाता हैं। वहीं 36,214 युवा मतदाता पहली बार मतदान करेंगे, जबकि यहां 4,758 85 वर्ष और अधिक बुजुर्ग और 3,399 दिव्यांग मतदाता भी अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। पहले चरण में 19 अप्रैल को मतदान में 36214 नए मतदाता पहली बार वोटिंग करेंगे। आयोग ने इस सीट पर 1276 मतदान केंद्र स्थापित किये हैं। इस सीट पर अब तक हुए 11 लोकसभा चुनाव में अब तक भाजपा अपना खाता नहीं खोल पाई है, जहां पांच बार निर्दलीय प्रत्याशियों ने अपना वर्चस्व कायम किया और कांग्रेस भी जीत का स्वाद चख चुकी है। साल 2019 के चुनाव में मिजो नेशनल फ्रंट ने इस सीट पर जीत हासिल की थी। 
बिना हिंसा के होता है सर्वाधिक मतदान 
पूर्वात्तर का मिजोरम ऐसा राज्य है, जहां चुनावी हिंसा रहित सर्वाधिक मतदान भी होता रहा है। चुनाव आयोग के अनुसार राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के लिए तीन हजार से अधिक राज्य पुलिसकर्मियों और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) की 15 कंपनियों (लगभग 1,000 कर्मी) को तैनात किया जा रहा है। हालांकि मिजोरम उन राज्यों में से एक है जहां चुनाव संबंधी हिंसा और घटनाएं हमेशा लगभग शून्य होती हैं और वोटिंग प्रतिशत देश में सबसे ज्यादा होता है। 
08Apr-2024