सोमवार, 8 अप्रैल 2024

साक्षात्कार: शिक्षा व साहित्य के जरिए महिला सशक्तिकरण करने में जुटी डा. डेजी

लेखिका शिक्षाविद् डा. डेजी ‘मुदिता’ ने द्विभाषी कवयित्री के रुप में बनाई पहचान
     व्यक्तिगत परिचय 
नाम: डॉ. डेजी 'मुदिता' 
जन्मतिथि: 28 दिसंबर 1970 
जन्म स्थान: सोनीपत (हरियाणा) 
शिक्षा: बी.एस.सी. (नॉन मेडिकल), एमए, एम.फिल(ईएलटी), पीएच.डी। 
संप्रत्ति: एसोसिएट प्रॉफ़ेसर (अंग्रेजी), स्वतंत्री काव्य व कथा लेखन। 
संपर्क:मोबा: 9416441965, ईमेल: daisynehra@gmail.com 
-ओ.पी. पाल 
साहित्य जगत में हरेक लेखक, साहित्यकार, कवि और लोक कलाकार अपनी संस्कृति एवं परंपरा को जीवंत रखने के लिए साहित्य संवर्धन करता आ रहा है। ऐसे ही साहित्यकारों में महिला साहित्यकार डा. डेजी ‘मुदिता’ ने एक शिक्षाविद् होने के बावजूद काव्य और लोक साहित्य लेखन के माध्यम से समाजिक जीवन में अनसुलझी पहेलियों और समस्याओं को उजागर किया है। यही नहीं अंग्रेजी भाषा शिक्षण और महिला अध्ययन में उन्हें महारत हासिल है, जिसमें उनके राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शोधपत्र भी प्रस्तुत हो चुके हैं। भारत-एशिया अध्ययन केंद्र और शिक्षण संस्थान केंद्र में लंबे समय तक सेवारत रही द्विभाषी कवयित्री, लेखिका और अनुवादिका एवं गर्ल्स कॉलेज, भगत फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय खानपुर (सोनीपत) में अंग्रेजी विभागाध्यक्ष एसोसिएट प्रॉफ़ेसर डा. डेजी ‘मुदिता’ ने अपने शिक्षा, साहित्यिक और लेखन के क्षेत्र के सफर को लेकर हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत के दौरान जिन अनछुए पहलुओं को उजागर किये हैं, उससे उनकी शिक्षा और साहित्य लेखन के माध्यम से वह महिला सशक्तिकरण के प्रति समर्पित हैं। 
हरियाणा की साहित्यकार डेजी का जन्म 28 दिसंबर 1970 को सोनपत में एक शिक्षित परिवार में धर्मवीर सिंह व श्रीमती शांति देवी के घर में हुआ। उनके पिता सीआरए कॉलेज सोनीपत में रसायन विभागाध्यक्ष और सेवानिवृत्ति से पहले दो साल प्रिंसिपल भी रहे। वहीं उनकी माता भी सरकारी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षिका रही। उनके दादा भी उस जमाने के गणित शिक्षक रहे। शिक्षा जगत में खुद एसोसिसिएट प्रोफेसर डा. डेजी मुदिता तीसरी पीढ़ी है। खासबात ये रही कि उनके परिवार के सदस्य विभिन्न सरकारी विभागों में कार्यरत है। यहां तक कि उनकी बड़ी बहन और बहनोई भी शिक्षक की भूमिका में हैं। भाई खेल जगत से बीसीसीआई के साथ जुड़े रहते निजी व्यवसाय में है तो बेटा रैप गायकी व ऑनलाइन स्टार्ट-अप की तैयारी में है। इसलिए उनके परिवार में शिक्षा को सर्वोपरि रखा गया। बकौल डा. डेजी, उनके घर में अखबार और विभिन्न पत्रिकाएं आती थी, जिन्हें पढ़कर उनकी किशोर अवस्था में उपन्यास पढ़ने में अभिरुचि हो गई। साहित्यिक क्षेत्र के अलावा उन्हें चित्रकारी का भी शौंक लगा। वहीं कविता का संचार उनके भीतर बचपन से ही था। किशोरावस्था में उनकी मुलाका सहेली योगिता से हुई, जिनकी एक कविता अखबार में छपी थी, तो उसके मन में भी परिवार से छुपकर कुछ कविताएं लिखी, जिन्हें उसने अपनी सहेली के अलावा किसी अन्य से साझा नहीं की। जब वह नौंवी कक्षा की परीक्षाओं की तैयारी करते हुए जब उनका ध्यान चींटियों पर गया तो वह चंद कविताएं लिखने का उतावली हुई। बारहवीं कक्षा में अध्ययन के दौरान उनकी पहली कविता 'पल भर की आशा' कॉलजे की मैगजीन में छपी। हालांकि उनका असली साहित्यिक सफर तो उसी समय गतिमान हुआ जब वह चालीसवें बंसत में पहुंची। उस समय उनके मित्र व सहकर्मी रवि भूषण ने कहा था कि 'इंसान जिस भी विधा में स्वयं को बेहतर अभिव्यक्त कर सके, उसी में करना चाहिए। साहित्य लेखन के क्षेत्र में उनका पहला काव्य-संकलन ‘आस’ साल 2009 में प्रकाशित हुआ, उन्होंने कृति की पहली प्रति अपने माता-पिता को को देकर सरप्राइज दिया, जिसे देखकर वे बेहद खुश हुए। इसके बाद ‘करवटें मौसम की’ और कथा संग्रह 'कटघरे' साल 2017 में पाठकों के समक्ष आए। यह उनके लिए बेहद खुशी का पल ही कहा जा सकता है कि जो माता पिता अन्य परिजन उनकी साहित्य रुचि से खुश नहीं थे, उन्होंने उनके कथा संग्रह और अन्य पुस्तकों को पूरा पढ़ा और आज भी वे उनसे पुस्तकालय से साहित्यक पुस्तकें मंगवाकर पढ़ते हैं। डा. डेजी ने बताया कि उनके साहित्य लेखन में मानव जीवन की उहापोह, सांसारिक निराशा और हर-क़दम पर बारम्बार उपजती आशा ने ज्यादा 'प्रेरित' किया। वहीं सामाजिक सरोकार तथा समाजिक जीवन के परिदृश्य भी उन्हें कविता लिखने को विवश करते रहे हैं। उनकी रचनाओं जारी रहे सिलसिले में में अनंत सम्भावनाएं लिये 'जीवन', अद्भुत-असीमित ज्ञान समेटे 'प्रकृति' और शाश्वत 'प्रेम' ने अन्य कवियों की तरह उन्हें भी हमेशा अभिभूत किया है, जो उनकी कृतियों में स्पष्ट झलकता है। भगत सिंह विश्वविद्यालय गर्ल्स कालेज में अंग्रेजी की सहायक प्रोफेसर डा. डेजी ‘मुदिता’ विश्वविद्यालय के सुभाषिणी पीठ की निदेशिका भी हैं। उनके करीब 28 शोधपत्र विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। डा. डेजी के पति वीरेन्द्र सिंह, जो कर विभाग में अधिकारी थे का 1997 में एक हादसे में निधन हो गया था। उनके बेटे पार्थ सिंह एमबीए के छात्र हैं। 
युवाओं को प्रोत्साहित करना जरुरी 
आधुनिक युग में साहित्य या लोककला की चुनौतियों पर डा. डेजी का कहना है कि यदि 'साहित्य' को आप केवल प्रकाशित साहित्य की दृष्टि से देखेंगे तो ऐसा साहित्य के प्रति रुचि कम हो रही है। लेकिन इस परिवर्तनशील संसार में आज सत्य पर माध्यम हावी हो चुका है यानी अधिकतर लोग दृश्य-श्रव्य माध्यम से ही जीवन को भी आंकने लगे हैं। खासकर युवा पीढ़ी के लिए वही सच है, जो दिखाया जा रहा है। आज का युवा 'सत्य' जानना नहीं चाहता, लेकिन उसे जानने के लिए उसके माध्यमों में मौलिक स्त्रोत कम ही हैं। आजकल की युवा पीढ़ी में साहित्य और लोक कला व संगीत में रुचि नहीं है, ऐसा भी नहीं लगता, बल्कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर अभियक्तियों और प्रदर्शनों की आई बाढ़ की वजह से उनमें संयम की कमी नज़र आती है। ऐसे में हमारे पौराणिक ग्रंथों की ग्रहण करने वाली बातों को यदि रुचिकर माध्यम से युवाओं तक पहुँचाया जाए, तो सुधार की संभावना है। वहीं आज के व्यवसायीकरण के दौर में लिखित और प्रकाशित साहित्य व लोक-कलाओं को लेकर स्कूलों में इस प्रकार की कलात्मक/ लेखन की गतिविधियों को प्रोत्साहन देकर युवाओं को प्रोत्साहित करने की जरुरत है। इस दिशा में कुरुक्षेत्र वि.वि. में रत्नावली कार्यक्रम में हरियाणवी सांग को शामिल करना और हरियाणा में तो पंडित लख्मीचंद वि.वि. की स्थापना करना भी लोक कलाओं को बढ़ावा देने के लिए अच्छा कदम है। 
प्रकाशित पुस्तकें 
हरियाणा की द्विभाषी कवयित्री डा. डेजी ‘मुदिता’ की अभी तक प्रकाशित 14 पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है, जिसमें शोध पत्रिकोओं में लेख, कथाएं, कविताएं भी शामिल हैं। उनकी प्रमुख पुस्तकों में भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण की पुस्तक ‘हरियाणा की भाषाएं’ नवीनतम कृति है। इसके अलावा उनके काव्य संग्रह-‘आस’ और ‘करवटें मौसम की’ के अलावा कथा संग्रह 'कटघरे' भी सुर्खियों में हैं। उन्होंने आधा दर्जन से ज्यादा साहित्य पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में भी लिखी हैं। इसके अलावा उनका पिछले दिनों ही दक्षिण भारत की सशक्त स्त्रियों की गाथाएं नाम लेख भी खासकर महिला जगत में चर्चा के केंद्र में रहा। पिछले दिनों ही हरियाणा की कवयित्रियों की श्रेष्ठ कविताओं एक एक काव्य संकलन ‘घूप में चाँदनी’ उनकी दस कवितायें प्रकाशित हुई थी। 
सम्मान व पुरस्कार 
महिला साहित्यकार एवं कवयित्री डा. डेजी ‘मुदिता’ को ग्लोबल सोसाइटी ऑफ एजुकेशनल ग्रोथ की ओर से ‘भारत शिक्षा रत्न’ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। शिवयुवा शक्ति संघ के शिक्षक सम्मान के अलावा हरियाणा सरकार भी उन्हें गणतंत्र दिवस और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सम्मानित कर चुकी है। वहीं कवयित्री के रुप में महिला काव्य मंच उन्हें काव्यात्मक प्रतिभा सम्मान से भी अलंकृत कर चुकी है। इसके अलावा विभिन्न साहित्य एवं सामाजिक मंच पर भी उन्हें अनेक पुरस्कार पाने का सौभाग्य मिला है। 
08Apr-2024

रविवार, 7 अप्रैल 2024

प. बंगाल: हिंसा की जमीन पर बिछी लोकसभा चुनाव की बिसात

ममता के गढ़ को भेदना भाजपा के लिए आसान नहीं सियासी डगर 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। देश में पश्चमी बंगाल एक ऐसा राज्य है, जहां का चुनावी हिंसा का इतिहास हिंसा के ईर्दगिर्द रहा है। ऐसे में राज्य की 42 लोकसभा सीटों पर सात चरणों में कराये जा रहे आम चुनाव में जहां चुनाव आयोग और सुरक्षा एजेंसियों के सामने भी निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराने की बड़ी चुनौती होगी। वहीं अपनी मजबूत रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतरी भाजपा को अपने विकास के मुद्दों के साथ राज्य की पंगु कानून व्यवस्था को लेकर भी जनता में विश्वास की भावना पैदा करने का प्रयास कर रही है। इन सबके बावजूद भाजपा के लिए तृणमूल कांग्रेस के गढ़ को भेदना आसान भी नहीं है। पश्चिम बंगाल में लंबे समय से वामदलों की सत्ता को बेदखल करने के बाद साल 2011 में राज्य की सत्ता संभालने के बाद तृणमूल कांग्रेस ने ‘प्रतिशोध की राजनीति बंद करो’ का वादा किया था, लेकिन इसके बावजूद अभी तक के चुनाव में चुनावी हिंसा का यह इतिहास करवटे बदलते हुए खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले दिनों संदेशखाली और उससे पहले नंदीग्राम की अत्याचार रुपी हिंसा इन चुनावों का मुद्दा गैर तृणमूल दलों के चुनाव प्रचार का हिस्सा बनकर ममता बनर्जी को परेशान कर रहा है। लोकसभा चुनाव से पहले ही हिंसाओं की जांच करने वाली एनएआई और ईडी जैसी एजेंसियों के अलावा सुरक्षा बलों पर हमले और राजनीतिक दलों की हत्या हमलों की सियासत तृणमूल की प्रतिशोध की राजनीति को उजागर करती नजर आ रही है। ऐसे में लोकसभा चुनाव में भाजपा को पिछले चुनाव की 18 सीटों की तुलना में अधिक से अधिक सीटों पर जीत की उम्मीद है, लेकिन पिछले चुनाव में खाता खोलने से वंचित वामदल भी भाजपा और तृणमूल के मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने के इरादे से चुनावी जंग में हैं। 
महिला मतदाताओं की अहम भूमिका 
पश्चिम बंगाल में 42 लोकसभा के चुनाव में कुल सात करोड़ 7 करोड 58 लाख 37 हजार वोटर हैं। खासबात है कि इनमें तीन करोड़ 73 लाख 4 हजार यानी करीब आधी महिला मतदाता हैं। जबकि 3 करोड़ 85 लाख 30 हजार पुरुष मतदाता हैं। पिछले पांच साल में राज्य में महिला मतदाताओं की 9.8 प्रतिशत वोट बढ़ी हैं। वहीं बंगाल में 20.1 लाख मतदाता पहली बार मतदान करेंगे। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में फिलहाल प्रति 1,000 पुरुष मतदाताओं पर 968 महिला मतदाता हैं। यह भी दिलचस्प पहलू है कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में पहली बार पुरुषों की तुलना में महिलाओं ने महिलाओं ने 81.79 प्रतिशत मतदान किया था। पिछले चुनाव में 42 लोकसभा सीटों में से टीएमसी को 22, भाजपा को 18 और कांग्रेस को 2 सीटे मिली थी। 
कड़ी सुरक्षा के साये में होगा चुनाव 
चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में हिंसा रोकर निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान कराने की दृष्टि से केंद्रीय सशस्त्र सुरक्षा बलों की 920 कंपनियां तैनात करके अन्य सुरक्षा चक्र तैयार करने की योजना बनाई है। इन सुरक्षा बलों को चरणवार होने वाले संसदीय क्षेत्रों और मतदान केंद्रों पर तैनात किया जाएगा। आयोग ने बंगाल के दार्जीलिंग, मालदा उत्तर, मालदा दक्षिण, आसनसोल, बनगांव और कोलकाता उत्तर लोकसभा क्षेत्र को आर्थिक रूप से संवेदनशील घोषित किया है, जहां पिछले चुनाव में धनबल के सर्वाधिक मामले सामने आए थे। 
यहां आमने सामने भाजपा-टीएमसी 
पश्चिम बंगाल में इस बार लोकसभा की 42 में डायमंड हार्बर, आसनसोल, कोलकता दक्षिण, मालदा दक्षिण, मुर्शिदाबाद, हावड़ा, बोलपुर और दार्जिलिंग को हॉट सीटे माना जा रहा है, जहां भाजपा और तृणमूल के सीधे मुकाबलों की संभावनाएं जताई जा रही हैं। तृणमूल कांग्रेस ने इन सीटों पर अभिषेक बनर्जी, दिलीप घोष, महुआ मोइत्रा, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे दिग्गजों पर दांव खेला है। 
ऐसे बढ़ा भाजपा का जनाधार 
पश्चिम बंगाल में साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 40.30 फीसदी वोट शेयर के साथ 42 में से 17 लोकसभा सीटे जीती, नतीजन भाजपा ने इसके बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में 38.1 फीसदी वोट लेकर 294 सीटों में से भाजपा ने में से 77 सीटों पर जीत हासिल की और पश्चिम बंगाल विधानसभा में भाजपा का विपक्ष की राजनीति के लिए ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ, जिसकी वजह से इस इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा की चुनावी रणनीति से तृणमूल कांग्रेस असमंजस की स्थिति में है, लेकिन बंगाल में भाजपा ने विकास के मुद्दे के विपरीत तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी आक्रामक अंदाज में थोड़ी नरमी लाकर जवाब देने की रणनीति बनाई है। 
मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र मुर्शीदाबाद 
पश्चिम बंगाल का बांग्लादेश की सीमा से सटे जिलों मुर्शीदाबाद 66.8 प्रतिशत और मालदा में 51.27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। जबकि चार अन्य जिलों, उत्तर दिनाजपुर में 49.92 प्रतिशत, बीरभूम में 37.06 प्रतिशत, दक्षिण 24 परगना में 35.57 प्रतिशत और उत्तर 24 परगना में 30 प्रतिशत से अधिक आबादी मुस्लिम है। दरअसल इन जिलों में घुसपैठियों की वजह से मुस्लिमों का दबदबा है। भाजपा के तृणमूल कांग्रेस पर बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण देने का आरोप तो बंगाल सरकार ने पिछले साल केंद्रीय ओबीसी सूची में जिन 83 जातियों को शामिल करने की सिफारिश की थी, उसमें 73 अकेले मुस्लिम समुदाय की थी। 
भाजपा का भरोसेमंद समुदाय 
पश्चिम बंगाल में एक समय इन मतुआ लोगों के ज़्यादातर वोटवैंक वामपंथी पार्टियों या तृणमूल कांग्रेस के खेमे था, लेकिन 2019 के चुनाव के समय बदली सियासत में अन्य देशों से प्रताड़ित होकर मतुआ समुयाद इन हिंदू शरणार्थियों को भाजपा के सीएए का आश्वासन भरोसे में ले आया। इसलिए खासतौर से बंगाल के दक्षिणी हिस्से में मतुआ जाति समूह और उत्तर में राजबंशी जाति समूह भाजपा के खेमे में जाता नजर आ रहा है। वहीं पश्चिम बंगाल में सर्वाधिक वोटबैंक मुस्लिम समुदाय का है, जो तृणमूल का वोट बैंक माना जाता है। राज्य में 125 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 फीसदी या उससे अधिक है। इसमें उत्तर और दक्षिण 24 परगना, नदिया, कोलकाता, बीरभूम और बर्धमान में 75-80 सीटें हैं। जबकि दक्षिण और उत्तर 24 परगना जिलों में 64 सीटें हैं और वहां मुसलमानों की बड़ी आबादी क्रमश: 35 और 26 फीसदी है। 
पिछले चुनाव में इन राज्यों में हुई हिंसा 
 राज्य               घटना
पश्चिम बंगाल 365 
जम्मू कश्मीर  250 
उत्तर प्रदेश    100 
पंजाब           100 
असम           100 
बिहार           80 
त्रिपुरा           80 
केरल           60 
छत्तीसगढ़  30 
पश्चिम बंगाल में कब कब होगा मतदान: 
चरण 1 (19 अप्रैल): कूचबिहार, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी। 
चरण 2 (26 अप्रैल): दार्जिलिंग, रायगंज, बालुरघाट। 
चरण 3 (7 मई): मालदाहा उत्तर, मालदाहा दक्षिण, जंगीपुर, मुर्शिदाबादप् 
चरण 4 (13 मई): बहरामपुर, कृष्णानगर, राणाघाट, बर्धमान पुरबा, बर्धमान-दुर्गापुर, आसनसोल, बोलपुर, बीरभूम। 
चरण 5 (20 मई): बनगांव, बैरकपुर, हावड़ा, उलुबेरिया, श्रीरामपुर, हुगली, आरामबाग। 
चरण 6 (25 मई): तमलुक, कांथी, घाटल, झाड़ग्राम, मेदिनीपुर, पुरुलिया, बांकुरा, बिष्णुपुर। 
चरण 7 (1 जून): दम दम, बारासात, बशीरहाट, जयनगर, मथुरापुर, डायमंड हार्बर, जादवपुर, कोलकाता दक्षिण, कोलकाता उत्तर।
07Apr-2024

शनिवार, 6 अप्रैल 2024

महाराष्ट्र: बदले सियासी समीकरण से दिलचस्प मोड़ पर लोकसभा चुनाव

भाजपा समर्थित महायुति गठबंधन और कांग्रेस समर्थित महाविकास अघाड़ी गठबंधन के बीच मुकाबला 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र की राजनीति के बदले समीकरणों ने इस बार लोकसभा चुनाव को दिलचस्प मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन और महाविकास अघाड़ी गठबंधन के बीच मुकाबला चुनावी मुकाबला माना जा रहा है। प्रमुख दलों राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना में फूट के बाद महाराष्ट्र की 48 सीटों पर पहली बार हो रहे लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के ढांचागत गणित में भी बदलाव की बयार बह रही है। मसलन इन दोनों प्रमुख दलों का वास्तविक धड़ा महायुति के खेमे में है और कई अन्य दलों के शामिल होने से यह गठबंधन पहले से कहीं ज्यादा मजबूत नजर आ रहा है। इस चुनाव की संभावनाओं को यूं भी कहा जा सकता है कि राजग के मुकाबले, कांग्रेस नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन की राह पहले से भी ज्यादा मुश्किल नजर आ रही है। महाराष्ट्र की सियासत कभी कुछ परिवारों के ईर्दगिर्द घूमती रही है और लोकसभा की 48 तथा विधानसभा की 288 सीटों सियासत का गणित तय करने में ऐसे सियासी परिवारों की भूमिका रही है। लेकिन पिछले चुनाव के बाद जिस प्रकार राज्य के प्रमुख दलों में शरद पवार की राकांपा और उद्धव ठाकरे की शिवसेना में बिखराव के बाद अपने चुनाव चिन्ह गंवाने के बाद वैकल्पिक चिन्ह के साथ साथ चुनाव मैदान में हैं। जबकि शिवसेना के वास्तविक नाम व चुनाव चिन्ह को लेकर एकनाथ शिंदे राजग का हिस्सा बनकर राज्य में सरकार चला रहे हैं, जिसमें अजित पंवार गुट की राकांपा भी शामिल है। पिछले पांच साल के भीतर बदले महायुति और महाविकास अघाड़ी गठबंधन के रुप में बदले सियासी गणित को लेकर महाराष्ट्र में इस बार लोकसभा चुनावों पर राजनीतिक विशेषज्ञों की विशेष नजरें लगी हुई है। हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा व शिवसेना ने 48 में से 41 सीटे जीतकर महागबंधन को धाराशायी किया था, जिसमें भाजपा सबसे ज्यादा सीट लेकर बड़े दल के रुप में उभरी थी। 
ऐसे बिछी सियासत की बिसात 
 महाराष्ट्र की सियासत में अंचल या क्षेत्रवार भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। इनमें कोंकण क्षेत्र में आर्थिक राजधानी मुंबई समेत छह लोकसभा सीटें आती है। जबकि पश्चिमी महाराष्ट्र में जहां राकांपा व शिवसेना का दबदबा माना जाता है, वहां इस बदले समीकरण में राजग मजबू रणनीति के साथ चुनाव मैदान में है। इसी प्रकार उत्तरी महाराष्ट्र को आदिवासियों और पिछड़े वर्गों की बड़ी आबादी के हिसाब से राजनीति होती है, तो वहीं मराठवाड़ा क्षेत्र, विदर्भ जैसे क्षेत्रों में भी अलग अलग सियासत की बिसात बिछती रही हैं। 
पांच साल में बढ़े 34.69 लाख वोटर 
महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 लोकसभा सीटों के लिए 9,23,56,251 मतदाताओं का जाल बुना हुआ है। इसमें 4,80,12,139 पुरुष, 4,43,38,525 महिला और 5,587 थर्डजेंडर मतदाता शामिल हैं। इस बार के लोकसभा चुनाव में पिछले साल 2019 के चुनाव के मुकाबले 34,69,534 मतदाताओं की संख्या बढ़ी है, जिसमें अब 18 से 29 वर्ष तक के आयु के 1,78,84,862 मतदाता हो गये हैं। राज्य में 85 वर्ष से अधिक आयु के 13,15,166 मतदाताओं में सौ साल की आयु से अधिक की आयु पार कर चुके मतदाताओं की संख्या भी 52,908 है। लोकसभा चुनाव के लिए राज्य में 97,325 मतदान केंद्र बनाए गये हैं। 
पिछले चुनाव अव्वल रही भाजपा 
लोकसभा के पिछले 2019 के चुनाव में 48 सीटों में से भाजपा ने सबसे ज्यादा 23 सीटों पर जीत हासिल की थी। जबकि उसके सहयोगी दल शिवसेना के 18 प्रत्याशी सांसद बने थे। यानी राजग गठबंधन ने 41 सीटों पर कब्जा किया था। जबकि राकांपा को चार सीटें मिली और एक-एक सीट पर पर कांग्रेस, एआईएमआईएम तथा निर्दलीय प्रत्याशी को मिली थी। राज्य की 48 सीटों में पांच सीटें अनुसूचित जाति के लिए और 4 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। 
ये दल लडेंगे चुनाव 
राजग-भारतीय जनता पार्टी, महायुति (शिव सेना, राकांपा, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, राष्ट्रीय समाज पक्ष महादेव जानकर)  
इंडिया गठबंधन- कांग्रेस, महाविकास अघाड़ी(शिव सेना (यूबीटी), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(सुप्रिया सुले) 
अन्य दल-ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन, वंचित बहुजन आघाडी, स्वाभिमानी पक्ष, बहुजन समाज पार्टी, बहुजन विकास अघाड़ी, प्रहार जनशक्ति पार्टी, जन सुराज्य शक्ति, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी।
पांच चरणों में होगा चुनाव 
पहला चरण(19 अप्रैल)- रामटेक, नागपुर, बांद्रा-गोंडिया, गढ़चिरौली-चिमूर और चंद्रपुर। 
दूसरा चरण(26 अप्रैल)- बुल्ढाना, अकोला, अमरावती, वर्धा, यावतमाल-वसीम, हिंगोली, नांदेड़ और परभानी। 
तीसरा चरण(07 मई)- रायगढ़ बारामती, ओसमानाबाद, लातूर, शोलापुर, मधा, सांगली, सतारा, रत्नागिरि, कोल्हापुर और हत्कांगले। 
चौथा चरण(13 मई)- नंदुबार, जलगांव, रावर, जलना, औरंगाबाद, अहमदनगर, सिरडी, बीड़, मावल, पुणे और शिरुर। 
पांचवा चरण(20 मई)-धुले, डिंडौरी, नासिक, पालघर, कल्याण, थाने, मुंबई नॉर्थ, मुंबई नॉर्थ वेस्ट, मुंबई नॉर्थ इस्ट, मुंबई नॉर्थ सेंट्रल, मुंबई साउथ सेंट्रल और मुंबई साउथ। 
06Apr-2024

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

मणिपुर: सबसे मुश्किल चुनाव में होगी सत्तारूढ दल की अग्नि परीक्षा!

कांग्रेस की भारत न्याय यात्रा भी कसौटी पर कसेंगे मतदाता 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। देश की 18वीं लोकसभा के लिए मणिपुर की दो लोकसभा सीटों पर ऐसे समय चुनाव हो रहे हैं, जब इस सूबे में जातीय हिंसा के जख्म अभी भरे नहीं हैं। इसी वजह से सुरक्षा की दृष्टि से इन दोनों सीटों पर मतदान कराने के लिए दो चरण में एक विशेष व्यवस्था की गई है, जिसमें 19 अप्रैल को पहले चरण में दोनों ही सीटों पर चुनाव होगा, लेकिन बाहरी मणिपुर सीट के अंतर्गत असुरक्षित श्रेणी में निर्धारित तेरह सीटों पर दूसरे चरण में 26 अप्रैल को चुनाव होगा। इसलिए माना जा रहा है कि पिछले दिनों हिंसा से ग्रस्त रहे मणिपुर की दोनों सीटों पर जहां सत्तारुढ़ दल की अग्नि परीक्षा होगी। वहीं हिंसा को लेकर सत्ता के खिलाफ मोर्चा खोलते रहे विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस के सामने भी भारत न्याय यात्रा की कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती होगी। पूर्वोत्तर में 16 जिले वाले मणिपुर में दो लोकसभा सीट भीतरी मणिपुर और बाहरी मणिपुर पर पिछले साल मई में शुरु हुई जातीय हिंसा लंबे समय तक राज्य और केंद्र सरकार के लिए सिरदर्द बनी रही है। हालांकि केंद्र सरकार ने राज्य की सरकार के साथ मिलकर प्रदेश में शांति बनाने के लिए कई पहल की। वहीं विपक्षी दलों ने इस हिंसा पर सियासत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हिंसा के बाद मणिपुर में पहली बार चुनाव हो रहे हैं। इससे पहले राज्य में लोकसभा चुनाव कराने की संभावनाएं तलाशने के लिए केंद्र सरकार के साथ-साथ सुरक्षा एजेंसियों के अलावा केंद्रीय चुनाव आयोग ने भी समीक्षा करके नई व्यवस्था को अमल में लाने का फैसला किया। राजनीतिक विशेषज्ञ भी ऐसे माहौल में चुनाव कराने का चुनौती मान रहे हैं, लेकिन फिलहाल मणिपुर में भी चुनावी माहौल बनने लगा है और दोनों सीटों पर लगभग राजनीतिक दलों ने अपने उम्मीदवार भी तय कर दिये हैं। अब देखना है कि मणिपुर की इन दोनों सीटों का चुनावी ऊंट किस करवट बैठता है, यह चुनाव नतीजों के बाद तय होगा। हालांकि राज्य में मतदान के दौरान सुरक्षा व्यवस्था कायम रखने की भी सरकार के सामने चुनौती कम नहीं होगी? 
मतदाताओं का चक्रव्यूह 
मणिपुर की दोनों लोकसभा सीटों पर इस बार कुल 20,26,623 मतदाताओं का चक्रव्यूह है, जिसमें 9,79,678 पुरुष और 10,46,706 महिला मतदाता हैं, जबकि 239 थर्डजेंडर मतदाता भी पंजीकृत हैं। इनमें नए युवा मतदाताओं की संख्या 19,095 महिलाओं और नौ थर्डजेंडर समेत 34,700 है, जो पहली बार मतदान करेंगे। वहीं दिव्यांगों की 14,264 तथा सर्विस मतदाताअें की संख्या 21,815 है। राज्य में 32 विधानसभाओं वाली भीतरी मणिपुर सीट पर 10,10,618 तथा बाहरी मणिपुर सीट, जिसमें 28 विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं, पर 10,16,005 मतदाता वोटिंग करेंगे। इस सीट की सात विधानसभा थोउबल जिले में हैं, जिसका अधिकांश हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र में शामिल है। आयोग की सूची के मुताबिक इस संसदीय सीट पर 3,176 निर्बल मतदाता भी शामिल है। 2019 में चुनाव आयोग ने पहली बार मूक-बधिर और नेत्रहीन मतदाताओं की सुविधा के लिए मुफ्त में पिक एंड ड्रॉप की सुविधा प्रदान किया था। 
बाहरी मणिपुर सीट पर दो चरणों में चुनाव 
मणिपुर में लोकसभा चुनाव के पहले चरण में 19 अप्रैल को भीतरी मणिपुर सीट में शामिल सभी 32 सीटों के साथ बाहरी मणिपुर सीट की 28 में से केवल 15 विधानसभा सीटों पर लोकसभा के लिए चुनाव कराया जाएगा। बाकी 13 विधानसभा सीटों पर लोकसभा के लिए दूसरे चरण में 26 अप्रैल को मतदान होगा। इसलिए बाहरी मणिपुर लोकसभा सीट पर दो चरणों में मतदान कराने का निर्णय भी लिया गया है। 
1058 को ‘संवेदनशील’ मतदान केंद्र 
हिंसाग्रस्त मणिपुर में लोकसभा चुनावों के सुचारू संचालन के मकसद से चुनाव आयोग द्वारा एक मजबूत प्रणाली तैयार की है। जिसमें 197 उड़न दस्ते, 194 स्थैतिक निगरानी टीमें, 92 वीडियो निगरानी टीमें, 60 वीडियो देखने वाली टीमें और 60 लेखा टीमें शामिल हैं। वहीं लोकसभा चुनाव के लिए 2955 मतदान केंद्रों की स्थापना की गई है, जिनमें से 1058 को ‘संवेदनशील’ के तौर पर चिन्ह्रित किया गया। अतिसंवेदशील और संवेदनशील मतदान केंद्रों को माइक्रो पर्यवेक्षकों की तैनाती और सीएपीएफ की अतिरिक्त तैनाती के साथ वेबकास्टिंग और वीडियोग्राफी के दायरे में शामिल किया गया है। ज्यादातर संवेदनशील मतदान केंद्रों दूसरे चरण में 26 अप्रैल को मतदान होगा। 
शिविर से मतदान की इजाजत 
मणिपुर में हिंसा से प्रभावित शिविरों में रहने वाले लोगों को उनके शिविर से मतदान की इजाजत दी गई है। इसलिए चुनाव आयोग ने मणिपुर के विस्थापित मतदाताओं को लेकर गहन मंथन के बाद राज्य के आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्तियों के लिए राहत शिविरों में मतदान करने की एक योजना तैयार की है। चुनाव की इस योजना के अनुसार ऐसे मतदाताओं को उस स्थान का सामान्य निवासी माना जाएगा, जहां से वे विस्थापित हुए हैं और इसलिए उन्हें मूल स्थान का मतदाता माना जाएगा। 
एक सीट पर भाजपा का कब्जा
पिछले लोकसभा चुनाव में बाहरी मणिपुर सीट पर नगा पीपुल्स फ्रंट के लोर्हो एस फोज ने जीत हासिल की थी, जिसने भाजपा प्रत्याशी एच शोखोपाओ मैट को पराजित किया था। जबकि सामान्य श्रेणी की भीतरी मणिपुर सीट पर भाजपा के प्रत्याशी डॉ. राजकुमार रंजन सिंह जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। इन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी ओइनम नाबाकिशोर सिंह को पराजित किया था। भतीरी मणिपुर लोकसभा क्षेत्र से भाजपा ने इस बार थौनाओजम बसंत कुमार सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया है। 
क्या है राज्य का परिदृश्य 
 मणिपुर की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 2,855,794 है। 22 हजार तीन सौ 27 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले मणिपुर की आधिकारिक भाषा मैतेयी और अंग्रेजी है। मणिपुर की 60 विधानसभा सीटों में से 40 सीटों पर मैतेई समुदाय का दबदबा है। क्योंकि उनकी जनसंख्या कुल आबादी की 53 फीसदी है। फिलहाल राज्य में भाजपा के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह भी मैतई समुदाय से ही आते हैं। 
इसलिए हिंसा पर मणिपुर 
म्यांमार की सीमा से सटे मणिपुर में आधे से अधिक मैतेई समुदाय के लोग तथा करीब 43 फीसदी कुकी और नगा समुदाय की आबादी है, जो जनजातियां मानी जाती हैं। मणिपुर में पिछले साल 3 मई से हिंसा की शुरुआत मैतेई (घाटी बहुल समुदाय) और कुकी जनजाति (पहाड़ी बहुल समुदाय) के बीच हिंसा से हुई। दरअसल मणिपुर में मैतेई समाज की मांग है कि उसको कुकी की तरह राज्य में शेड्यूल ट्राइब (जनजाति) का दर्जा दिया जाए, जिसका कुकी समुदाय ने जमकर विरोध किया। इसी हिंसा ने उस समय उग्र रुप ले लिया था जब मैतेई समुदाय द्वारा कुकी समुदाय की दो महिलाओं को नग्न अवस्था में परेड कराने के मामला सोशल मीडिया पर सुर्खियां बना। 
05Apr-2024

गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

अरुणाचल प्रदेश: लोकसभा व विधानसभा में सियासी वर्चस्व की जंग में भाजपा व कांग्रेस

विधानसभा में फिर सरकार बनाने की रणनीति के साथ राजग 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। अरुणाचल प्रदेश की दो लोकसभा और 60 विधानसभा सीटों के लिए एक साथ 19 अप्रैल को होने वाले चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है। दोनों लोकसभा सीटों के साथ विधानसभा में पिछले एक दशक से अरुणाचल प्रदेश में बही सियासी हवा में भाजपा ने अपना वर्चस्व कायम किया है। चीन से सटे देश के सबसे छोटे अरुणाचल प्रदेश में इससे पहले कांग्रेस की राजनीति हावी रही है। इस बार के चुनाव में अरुणाचल में सियासी वर्चस्व की जंग में जहां भाजपा के लिए अपने जनाधार को कायम रखने की चुनौती है, वहीं वहीं कांग्रेस अपने पुराने सियासी किले को फतेह करने का प्रयास होगा। 
चीन की दखलंदाजी के केंद्र में शुमार अरुणाचल प्रदेश आबादी घनत्व के लिहाज से देश का सबसे छोटा राज्य है। अरुणाचल में केवल दो लोकसभा सीटें हैं, जिनमें अरुणाचल ईस्ट और दूसरा अरुणाचल वेस्ट हैं और दोनों सीटों पर जहां पहले कांग्रेस का दबदबा रहता था। लेकिन पिछले दो चुनाव में भाजपा ने जनाधार कायम करके जिस प्रकार उलट फेर किया है उससे इन दोनों लोकसभा सीटों पर भाजपा ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया। इस बार के चुनाव में भाजपा इन दोनों सीटों पर हैट्रिक बनाने की चुनावी रणनीति के साथ चुनाव मैदान में है। कांग्रेस इस बार इंडिया गठबंधन के साथ चुनाव में नई रणनीति के साथ चुनाव मैदान में है, लेकिन चीन के हस्तक्षेप को कूटनीतिक तरीके भाजपानीत केंद्र सरकार की रणनीतियों के सामने विपक्षी गठबंधन को चुनावी वैतरणी को पार करना एक कठिन डगर नजर आ रही है। फिर भी यहां राजग व महागठबंधन में वर्चस्व की चुनावी जंग होने से इंकार नहीं किया जा सकता। 
सबसे ज्यादा महिला मतदाता 
पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में होने वाले लोकसभा व विधानसभा चुनाव में 8,82,816 मतदाता अपने सांसदों व विधायकों को चुनेंगे। खासबात ये है कि राज्य में कुल वोटरों में 4,49,050 महिला मतदाता हैं, जबकि 4,33,760 तथा छह ट्रांसजेंटर मतदाता भी पंजीकृत हैं। राज्य में इस बार 46,144 नए मतदाता पहली बार अपना वोट डालेंगे। जबकि साल 2019 के पिछले चुनाव में 8,56,187 में 4,20,954 और 4,35,228 महिला वोटर थी। अरुणाचल पश्चिम लोकसभा में 33 तथा अरुणाचल पूर्व लोकसभा क्षेत्र में 27 विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। 
देश का सबसे ऊंजा मतदान केंद्र 
अरुणाचल प्रदेश में दो लोकसभा और 60 विधानसभा सीटों के लिए 19 अप्रैल को होने वाले चुनाव के लिए 2,226 मतदान केंद्र बनाएं गये हैं। राज्य में मुक्तो विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत मतदान केंद्र संख्या 18-लुगुथांग लगभग 13,383 फीट की ऊंचाई पर स्थित देश का सबसे ऊंचा मतदान केंद्र है। 1462 मतदाताओं वाले लोंगडिंग विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत मतदान केंद्र संख्या 2(पुमाओ प्राथमिक विद्यालय) में राज्य में मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है। जबकि सबसे कम मतदाताओं वाला मतदान केंद्र ह्युलियांग विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के तहत मालोगम गांव में बनाए गये मतदान केंद्र पर सबसे कम एकेवल एक महिला ही मतदाता है। 
पिछले चुनाव के नतीजे 
पूर्वोत्तर राज्य की अरुणाचल प्रदेश वेस्ट लोकसभा सीट पर 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी किरण रिजिजू ने सबसे ज्यादा 62 फीसदी वोट लेकर लगातार दूसरी जीत दर्ज की थी। जबकि अरुणाचल प्रदेश ईस्ट लोकसभा सीट पर सर्वाधिक 52 फीसदी मत के साथ भाजपा के ही तापिर गाओ ने भी अपनी जीत को दोहराया था। अरुणाचल में भाजपा व कांग्रेस के अलावा क्षेत्रीय दल पीपीए, एनपीपी, एनपीईपी के अलावा जदयू, एनसीपी जैसे दल भी अपनी किस्मत आजमाते रहे हैं, लेकिन चुनाव मुकाबले में ज्यादातर भाजपा व कांग्रेस ही रही है। 
देश का सबसे छोटा राज्य 
देश में अरुणाचल प्रदेश जनसंख्या घनत्व के लिहाज से सबसे छोटा राज्य है, जिसका घनत्व महज 17 है। इस राज्य की आबादी 2011 की जनसंख्या के अनुसार 13,83,727 है। यहां पर पुरुषों की संख्या 713912 है, जबकि महिलाओं की संख्या 669815 है। यहां पर लिंगानुपा के लिहाज से 1000 लड़कों में लड़कियों की आबादी 938 है। यहां की ज्यादातर आबादी शहरों में निवास करती है। जनसंख्या के लिहाज से देखें तो 11 लाख से ज्यादा लोग शहरों में निवास करते हैं, जबकि ढाई लाख के करीब जनसंख्या ग्रामीण इलाको में रहती है। अरुणाचल में साक्षरता का प्रतिशत 65.38 प्रतिशत के करीब है। 
क्या जातीय समीकरण 
अरुणाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा 30.26 फीसदी ईसाई धर्म की आबादी है। जबकि हिंदू आबादी करीब 29 प्रतिशत है, जिसमें 26 फीसदी डोनी-पोलो को मानते हैं। इस राज्य में 12 प्रतिशत के करीब बौद्ध धर्म से जुड़े लोग रहते हैं। जबकि पूर्वोत्तर के इस राज्य में मुस्लिम आबादी महज 2 फीसदी के करीब है। इसके अलावा इस राज्य में भाषाएं भी अलग अलग बोली जाती हैं, जिसमें 9 फीसदी बंगाली और करीब 8 फीसदी नेपाली और 6 फीसदी हिंदी भाषा बोली जाती है। जबकि आमतौर पर यहां 17.57 फीसदी लोग अदि भाषा बोलते हैं। 
विधानसभा चुनाव: दस विधायक निर्विरोध निर्वाचित 
अरुणाचल प्रदेश में लोकसभा की दो सीटों के साथ 60 विधानसभा सीटों के लिए भी 19 अप्रैल को चुनाव होना था, लेकिन मुख्यमंत्री पेमा खांडू समेत दस विधायकों के सामने कोई प्रत्याशी न होने के कारण उन्हें निर्विरोध चुन लिया गया है। अरुणाचल प्रदेश में एकमात्र अनारक्षित विधानसभा सीट बोरदुमसा-दियुन है, जहां 19,756 मतदाता हैं। अब अरुणाचल प्रदेश की 50 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव होना है। इससे पहले 2014 के चुनाव में कांग्रेस के 11 सीटों पर बिना वोट डाले और गिनती के निर्विरोध निर्वाचित घोषित किये जा चुके हैं। साल 2019 में अरुणाचल प्रदेश की 60 सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा को 41, जदयू को 7, एनपीपी को 5, कांग्रेस को 4, पीपीए को एक तथा दो निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की थी।
04Apr-2024

बुधवार, 3 अप्रैल 2024

मध्य प्रदेश: अंचलवार चुनावी रणनीति के साथ आमने सामने भाजपा-कांग्रेस


लोकसभा चुनाव 16 लाख से अधिक नए वोटर हो सकते हैं निर्णायक 

ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश को फतेह करने के लक्ष्य को लेकर प्रमुख रुप से भाजपा और कांग्रेस अंचलवार अलग अलग चुनावी रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतरी है। राज्य की 29 सीटों पर चार चरणों में मतदान होगा, जिसमें पहले चरण का चुनाव 19 अप्रैल को होगा। जहां कांग्रेस के सामने पिछले चुनाव की हार से सबक लेकर बाजी पलटने की चुनौती होगी, वहीं भाजपा के सामने इस तमाम लोकसभा सीटों पर परचम लहराने मौका है। लेकिन माना जा रहा है कांग्रेस की तैयार की गई नई रणनीति के सामने भाजपा के लिए मध्य प्रदेश को फतेह करना आसान भी नहीं होगा। 

मध्य प्रदेश में भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से लोकसभा या फिर विधानसभा के चुनाव में अलग अलग समीकरण सामने आते रहे हैं। इसलिए राज्य के अलग अलग जोन यानि मालवा-निमाड, महाकौशल, विंध्य, चंबल, बुंदेलखंड, मध्य भारत में जहां भाजपा ने पिछले चुनाव में जीत का आधार बने वोट बैंक को और ज्यादा बढ़ाने के लक्ष्य के साथ नई रणनीति तैयार की है। भाजपा इस सभी सीटों पर जीत हासिल करके मध्य प्रदेश को फतेह करना चाहती है, ताकि उसके 400 पार के नारे को साकार किया जा सके। वहीं दूसरी ओर इंडिया गठबंधन के साथ चुनाव मैदान में उतरी कांग्रेस पार्टी ने भाजपा से एक कदम आगे बढ़कर मध्य प्रदेश की लोकसभा सीटों को आठ जोन भोपाल जोन, चंबल जोन, बुंदेलखंड जोन, विंध्य जोन, नर्मदापुरम जोन, महाकौशल जोन, उज्जैन जोन और मालवा-निमाड जोन में विभाजित करके हर लोकसभा सीट पर एक प्रभारी नियुक्त किया है। दरअसल प्रदेश में जातिगत समीकरण भी किसी भी प्रत्याशी की हार जीत का फैसला करने में समक्ष है, इसीलिए भाजपा व कांग्रेस ने जाति व धर्म के आधार पर कई प्रत्याशियों को टिकट दिये हैं। 

तू डाल-डाल, मै पात-पात: लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की 29 सीटों पर काबिज होने के इरादे के साथ भाजपा ही नहीं, बल्कि कांग्रेस भी अपनी ठोस रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतरते हुए ‘तू डाल-डाल, मै पात-पात’ की कहावत को चरितार्थ करती नजर आ रही है। मसलन भाजपा ने पिछले विधानसभा में राज्य संगठन के चुनाव प्रबंधन की सफलता के फार्मूले के आधार पर लोकसभा सीटों को सात जोन में बांटकर अपनी रणनीति तैयार की है। यही नहीं भाजपा अन्य राज्यों में भी एमपी फार्मूले को अमल लाकर चुनावी रणनीति को हवा दे रही है। दूसरी ओर भाजपा के इस एमपी फार्मूले को टक्कर देने के इरादे से कांग्रेस ने भी राज्य की सभी लोकसभा सीटों को आठ जोन में बांटकर हर लोकसभा क्षेत्र में ‘वार रुम’ स्थापित किये हैं, जहां हर सीट पर एक प्रभारी की नियुक्ति की है, जो कांग्रेस प्रत्याशी, लोकसभा क्षेत्र, जिला प्रभारी एंव संगठन से जुड़े सभी पदाधिकारियों और कांग्रेस संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करेंगे। 

एमपी में 5.64 करोड़ मतदाता चुनेंगे सांसद: मध्य प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों पर इस बार चुनाव में 5,63,40,064 मतदाता प्रत्याशियों के लोकसभा जाने का रास्ता तय करेंगे। इनमें 2,89,51,705 पुरुष तथा 2,73,87,122 महिला मतदाता है। इस बार 18-19 साल आयु वाले 16,02,647 नए युवा मतदाता पहली बार मतदान करेंगे। प्रदेश में 75,246 सर्विस मतदाता भी हैं। 70 साल से अधिक आयु के बुजुर्ग मतदाताओं की संख्या 28 लाख से अधिक हैं। यहां जबकि नवंबर 2023 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में 5.60 करोड़ मतदाता थे। यानी पिछले 4 महीने में 3 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज किये गये हैं। 

दो सीटों पर पुरुषों के आगे महिला वोटर: पहले चरण में 19 अप्रैल को जिन छह लोकसभा सीटों पर चुनाव में एक करोड़ 1.12 करोड 71 हजार मतदाता वोटिंग करेंगे, जिसमें सर्वाधिक 20.97 लाख मंडला और सबसे कम 16.28 लाख मतदाता छिंदवाड़ा लोकसभा क्षेत्र में हैं। खासबात ये है कि इस चरण में मंडला और बालाघाट ऐसी हैं, जहां महिला मतदाता की संख्या पुरुषों से ज्यादा है। यानी मांडला सीट पर 20,97,051 मतदाताओं में 10,48,930 और बालाघाट सीट पर 18,71,270 मतदाताओं में महिला मतदाताओं की संख्या 941821 है। 

भाजपा ने ऐसे जीती थी 28 सीटें: लोकसभा 2019 को हुए पिछले चुनाव में मध्य प्रदेश की 29 सीटों में से भाजपा ने 28 सीटों पर जीत हासिल की थी। जहां तक जोनों के आधार पर राजनीतिक दलों द्वारा विभाजित लोकसभा सीटों का सवाल है, उसमें भाजपा को सबसे ज्यादा भोपाल जोन यानी मध्य भारत में सर्वाधिक 64.6 फीसदी वोट मिले थे। जबकि बुंदेलखंड जोन की सीटों पर 62.18, मालवा-निमाड जोन में 58.44, विंध्य जोन में 56.32, महाकौशल जोन में 52.69 तथा ग्वालियर-चंबल जोन में 51.50 फीसदी वोट हासिल कर जीत हासिल की थी। जबकि कांग्रेस को चंबल जोन में सबसे ज्यादा 38.53 फीसदी और बुंदेलखंड जोन में सबसे कम 39.28 फीसदी वोट ही मिल सके थे और चुनावी नतीजे भाजपा की झोली में चले गये। 

इस सीट पर फिर भाजपा की चुनौती: मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा लोकसभा सीट ऐसी है, जिसे भाजपा मोदी लहर में भी नहीं जीत पाई। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेता कमलनाथ का गढ़ कही जाने वाली इस सीट को छोड़कर भाजपा ने बाकी सभी 28 सीटों पर जीत का परचम लहराया था। इस बार भाजपा ने इस सीट के लिए अपनी नई रणनीति बनाकर ज्यादा फोकस किया है। कांग्रेस ने इस बार पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ को प्रत्याशी बनाया है, जिसे चुनौती देने के लिए भाजपा ने बंटी कुमार साहू को ठोस रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतारा है। 

चुनाव मैदान ये प्रमुख दल: मध्य प्रदेश में जहां भाजपा सभी सीटों पर अकेले दम पर चुनाव लड़ रही है, तो वहीं कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन के सपा व अन्य दलों के साथ चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है। राज्य में भाजपा के प्रमुख प्रत्याशियों में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, फग्गन सिंह कुलस्ते, महेन्द्र सोलंकी, संध्या राय, आशीष दुबे, अनिता नागर, लता वानखेड़े व बंटी कुमार साहू जैसे प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा है, वहीं कांग्रेस ने हाईब्रांड दिग्वजय सिंह, पूर्वमंत्री कांतिलाल भूरिया, कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ, महेश परमार, नीलम मिश्रा और अरुण श्रीवास्तव जैसे उम्मीदवरों पर दांव खेला है। इनके अलावा बसपा और भारत आदिवासी पार्टी भी मध्य प्रदेश में ताल ठोक रही है। 

मप्र में कब कहां होंगे चुनाव: 

पहला चरण(19 अप्रैल)-सीधी, शहडोल, जबलपुर, मंडला, बालाघाट, छिंदवाड़ा। दूसरा चरण(26 अप्रैल)-टीकमगढ़, दमोह, खजुराहो, सतना, रीवा, होशंगाबाद, बैतूल। तीसरा चरण(07 मई)-मुरैना, भिंड, ग्वालियर, गुना, सागर, विदिशा, भोपाल, राजगढ़। चौथा चरण(13 मई)-देवास, उज्जैन, मंदसौर, रतलाम, धार, इंदौर, खरगोन, खंडवा। 03Apr-2024

उत्तर प्रदेश: नए चुनावी समीकरण बनाकर साधने में जुटे तमाम दल

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पहले दो चरणों में भाजपा की अग्नि परीक्षा 

ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों पर सात चरणों में होने वाले चुनाव पर सभी की नजरे टिकी हैं। भाजपा ने इस बार यूपी के चुनाव मिशन में जहां पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल और पूर्वांचल में अपना दल सुभासपा के साथ चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है, जहां पिछले चुनाव में भाजपा कमजोर साबित हुई थी। दरअसल यूपी में अलग अलग क्षेत्रों में अलग चुनावी समीकरण की संभावना को लेकर राजग और महागठबंधन ने जनाधार के आधार पर उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं। हालांकि यूपी के लोकसभा चुनाव का दंगल किस करवट जाएगा, इसका फैसला तो चार जून को आने वाले नतीजे ही तय करेंगे, लेकिन देशभर के राजनीतिक दलों व विश्लेषकों की नजरे सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश पर टिकी हुई हैं।

उत्तर प्रदेश देश का ऐसा सबसे बड़ा राज्य है, जहां 75 जिलों में सर्वाधिक 80 लोकसभा सीट होने के साथ सर्वाधिक जनसंख्या के साथ सबसे ज्यादा मतदाताओं का जाल बिछा हुआ है। यही अकेले यूपी से पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के अलावा विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, इंदिरागांधी और चौधरी चरण से लेकर नरेन्द्र मोदी तक कई प्रधानमंत्री भी बने हैं। प्रदेश की राजनीति के समीकरण पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वांचल, बुंदेलखंड और अवध जैसे क्षेत्रों के हिसाब से आंककर राजनीतिक दल चुनावी जंग में उतरते हैं। मसलन राजनीतिक भाषा में कहा जाए तो केंद्र की सत्ता का रास्ता यूपी से ही होकर जाता है। इसलिए जाहिर सी बात है कि खासकर लोकसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों की निगाहें उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव पर रहती है। आजादी से अब तक अलग अलग क्षेत्रों में अपने अलग ही तरह के मुद्दों पर सियासी समीकरण बदलते रहे हैं। फिलहाल की राजनीति में यूपी के पूर्वी इलाके की वाराणसी सीट से पिछले दो लोकसभा चुनाव में चुनाव जीतकर पीएम नरेन्द्र मोदी के कारण भाजपा की पैठ मजबूत हुई है, तो दूसरी सीएम योगी का गढ़ रहे गोरखपुर भी पूर्वांचल भी भाजपा मजबूत मानकर चल रही है। पहले दो चरणों में पश्चमी उत्तर प्रदेश की आठ-आठ सीटों पर जाट लैंड या गन्ना बैल्ट के रुप में पहचाने जा रहे पश्चमी उत्तर प्रदेश की आठ-आठ सीटों यानी 16 सीटों पर पहले व दूसरे चरण में 19 और 26 अप्रैल को मतदान होना है। यह क्षेत्र हमेशा किसान आंदोलन को लेकर राजनीतिक नक्शे पर देखा जा रहा है। इसलिए पिछले चुनाव से सबक लेते हुए भाजपा ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल, तो पूर्वांचल में सुभासपा को सहयोगी बनाकर चुनाव लड़न का फैसला किया है। 

सबसे ज्यादा मतदाता वाला राज्य: लोकसभा चुनाव 2024 में प्रदेश की 80 सीटों पर 15.29 करोड़ मतदाओं को जाल फैला हुआ है, जिसमें 8.14 करोड़ पुरुष, 7.15 करोड़ महिला मतदाता शामिल हैं। प्रदेश में 7,705 ट्रांसजेंडर, 10.50 लाख दिव्यांग और 2.97 लाख सर्विस मतदाता वोटिंग करेंगे। जबकि प्रदेश में बुजुर्ग मतदाताओं की संख्या 24.30 लाख है, जिनमें से 31,774 मतदाता सौ वर्ष की उम्र से ज्यादा के हैं। प्रदेश में इस बार जहां 18-19 वर्ष की आयु के 20.41 लाख युवा पहली बार मतदान करेंगे। वहीं मतदाता सूची में 20 से 29 वर्ष के करीब 30 लाख युवा मतदाताओं के नाम भी शामिल किये गये हैं। 

सर्वाधिक मतदान केंद्र: देशभर में हो रहे लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश अकेला ऐसा राज्य है, जहां सबसे ज्यादा 1.62 लाख मतदान केंद्र बनाएं गये हैं, जिनमें 38,959 मतदान केंद्र शहरी क्षेत्रों तथा 1.23 लाख मतदान केंद्र ग्रामीण क्षेत्रों में बनाए गये हैं। दिव्यांगजनों व बुजुर्ग मतदाताओं के लिए घर से मतदान कराने की व्यवस्था की गई है। 

पहले व दूसरे चरण में दांव पर प्रतिष्ठा: लोकसभा चुनाव के पहले दो चरणों पश्चमी उत्तर प्रदेश की 16 सीटों पर भाजपा ही नहीं गठबंधन के दलों की प्रतिष्ठा दांव पर होगी। पहले चरण में 19 अप्रैल को 7693 मतदान केंद्रों पर आठ सीटों-सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, नगीना, मुरादाबाद, पीलीभीत, रामपुर को चुनाव होगा। जहां सात महिलाओं समेत 80 प्रत्याशियों के सामने 1.43 करोड़ मतदाताओं के चक्रव्यूह को भेदने की चुनौती होगी, इसमें 76.23 लाख पुरुष, 67.14 लाख महिला तथा 824 थर्डजेंडर मतदाता शामिल है। जबकि दूसरे चरण में 26 अप्रैल को आठ सीटों- अमरोहा, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा के लिए चुनाव होगा। इस चरण में 7797 मतदान केंद्रों पर 1.67 करोड़ मतदाता मतदान में हिस्सा लेंगे, जिनमें 90.11 लाख पुरुष, 77.38 महिलाएं और 787 थर्डजेंडर शामिल हैं। 

क्या जातीय समीकरण: उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी जातीय आधारित सियासत कम नहीं है, जहां ओबीसी किसी भी चुनाव अहम किरदार निभाती आ रही है। हालांकि अलग अलग चुनाव और सीटों पर जातीय समीकरण अलग होता आया है। पिछले दिनो केंद्र की एक समिति की रिपोर्ट मे यूपी में पिछड़ी जातियों की आबादी 7.56 करोड़ आंकी गई है यानी राज्य की कुल आबादी का 50 फिसदी से भी ज्यादा हिस्सा है, जिसमें सर्वाधिक 19.4 प्रतिशत यादव आबादी है। कुर्मी व पटेल की 7.4 प्रतिशत हिस्सेदारी दूसरे पायदान पर हैं। जबकि ओबीसी की कुल संख्या में निषाद, मल्लाह और केवट 4.3 प्रतिशत, भर और राजभर 2.4 प्रतिशत, लोध 4.8 प्रतिशत और जाट 3.6 प्रतिशत हैं। 

यूपी में किस चरण में कहां कहां होगी वोटिंग

पहला चरण(19 अप्रैल)-सहारनपुर, कैराना, मुज्जफनगर, बिजनौर, नगीना, मुरादाबाद, पीलीभीत, रामपुर। दूसरा चरण(26 अप्रैल)- अमरोहा, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा। तीसरा चरण-(07 मई )- संभल, हाथरस, आगरा, फतेहपुर सिकरी, फिरोजाबाद, मैनपुरी, एटा, बदायूं, ओनला, बरेली। चौथा चरण(13 मई)- शाहजहांपुर, फेरी, दौरा, सीतापुर, हरदोई, मिसरिख, उन्नाव, फर्रुखाबाद, इटावा, कन्नौज, कानपुर, अकबरपुर, बहराइच। पांचवां चरण(20 मई)- मोहनलालगंज, लखनऊ, राय बरेली, अमेठी, जालौन, झांसी, हमीरपुर, बांदा, फतेहपुर, कौशांबी, बाराबंकी, फैजाबाद, कैसरगंज, गोंडा। छठा चरण(25 मई)- सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, फूलपुर, प्रयागराज, अंबेडकरनगर, श्ववस्ती, डुमरियांगंज, बस्ती, संत कबीरनगर, लालगंज, आजमगढ़, जौनपुर, मछली शहर, भदोही में मतदान कराया जाएगा। सातवां चरण(01 जून)-महाराजगंज, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, वंशगांव, घोसी, सलेमपुर, बलिया, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी, मीरजापुर, रॉर्बट्सगंज सीट पर चुनाव होगा। 02Apr-2024


सोमवार, 1 अप्रैल 2024

बिहार: ‘क्लीन स्वीप’ की सियासी रणनीति के साथ चुनाव मैदान में राजग

परंपरागत वोट बैंक के विभाजन रोकने के प्रयास में महागठबंधन 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। देश की सियासत के लिहाज से बिहार उन राज्यों में शुमार है, जहां से 40 सदस्य निर्वाचित होकर लोकसभा पहुंचते हैं। इन सीटों पर सात चरणों में होने वाले लोकसभा चुनावों में प्रमुख रुप से राजग और इंडिया गठबंधन के बीच दिलचस्प सियासी जंग होने की संभावना है। इसका प्रमुख कारण लोकसभा चुनाव से पहले महागठबंधन में हुए बिखराव के कारण बदले सियासी समीकरण ने बिहार में लोकसभा चुनाव को नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जिसमें राज्य की सत्ताधारी पार्टी जदयू ने राजग गठबंधन को जो सियासी ताकत दी है, उसमें लोकसभा चुनाव के नतीजों पर नजरें टिकी होंगी? बिहार की सियासत में दशकों से जातीय आधार पर वोट बैंक की राजनीति हावी रही है। ओबीसी और दलित वोट बैंक, जो पहले कांग्रेस को मिलता रहा है, उसमें पिछले एक दशक से तेजी से गठबंधन की राजनीति के कारण विभाजन होता देखा गया है। खासतौर से ओबीसी बाहुल्य राज्य बिहार में बदलते राजनीतिक समीकरणों ने राजनीतिक दलों की दशा और दिशा भी मुद्दों के आधार पर बदलकर रख दी है। ऐसे में सियासी दल चुनावी फायदे को लेकर अपनी रणनीति तैयार करते आ रहे हैं। ऐसी ही रणनीति के तहत पिछले चुनाव की तुलना में इस बार राजग के कुनबे में जदयू व लोजपा के साथ हम और आरएलएमपी भी शामिल हुआ है। शायद इस बार भाजपा व जदयू ने 50:50 के सीट बंटवारे फार्मूले को ताक पर भाजपा के लिए 17 सीट छोड़ी है, जबकि खुद 16 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। राजग गठबंधन में लोजपा पांच के अलावा हम और आरएलएमपी एक-एक सीट पर चुनाव लड़ रही है। राजग के मुकाबले इंडिया गठबंधन में लालू यादव की राजद ने सबसे ज्यादा 26 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है, जबकि कांग्रेस को केवल नौ तथा वामदलों को पांच सीटे दी हैं। यह भी गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव से कुछ माह पहले ही जदयू ने इंडिया गठबंधन का साथ छोड़कर फिर से राजग कुनबे में शामिल होकर बिहार के राजनीतिक समीकरण बदलने का प्रयास किया। मसलन इस बार के लोकसभा चुनाव में बिहार बिहार के सियासत में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अहम भूमिका होगी, जदयू और केंद्र की राजग सरकार के विकास कार्यों के साथ नीतीश कुमार के विकास कार्य को लेकर ही जनता के बीच जाने की तैयारी में है। 
बिहार में क्या है राजग की रणनीति 
बिहार की 40 लोकसभा सीटों पर पिछले 2019 के चुनाव में राजग गठबंधन को 39 सीटो पर जीत मिली थी, जिसमें भाजपा व जदयू ने सभी 17-16 एक लोजपा ने 6 सीटों पर परचम लहराया था, जिसमें भाजपा ने सबसे ज्यादा 23.58 फीसदी वोट के साथ अव्वल थी। उस चुनाव में बाकी एक सीट पर कांग्रेस काबिज हुई थी। राज्य में लंबे समय तक राज करने वाली लालू यादव की राजद को शायद पहली बार हाथ मलते देखा गया। मौजदा चुनाव में राजग ने बिहार की सभी 40 लोकसभा सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया है। ऐसी ही चुनावी रणनीति के साथ राजग गठबंधन इसलिए इस बार चुनाव मैदान में है। 
राजग इन सीटों पर लड़ेगा चुनाव 
बिहार की 40 में से गठबंधन फार्मूले के मुताबिक बंटवारे में आई 17 लोकसभा सीटों पर चुनाव मैदान में होगी, उनमें पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण,औरंगाबाद, मधुबनी, अररिया, दरभंगा, मुज़फ्फरपुर, महाराजगंज, सारण, उजियारपुर, बेगूसराय, नवादा, पटना साहिब, पाटलिपुत्र, आरा, बक्सर और सासाराम सीटों पर चुनावी जंग में होगी। जबकि जदयू के खाते में आई 16 सीटों में वाल्मिकी नगर, सीतामढ़ी, झंझारपुर, सुपौल, किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया, मधेपुरा, गोपालगंज, सीवान, भागलपुर, बांका, मुंगेर, नालंदा, जहानाबाद, शिवहर सीटों पर चुनावी जंग में होगी। इसके अलावा लोक जनशक्ति पार्टी (आर) को वैशाली, हाजीपुर, समस्तीपुर, खगड़िया, जमुई सीट मिली है, तो हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा को गया सीट और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी काराकाट सीट पर लोकसभा चुनाव लड़ेगी। दरअसल भाजपा इस बार नवादा एक अतिरिक्त अतिरिक्त सीट मिली है, जहां लोजपा की सीट पर भाजपा का कब्जा है। 
चुनाव में 9.26 लाख पहली बार करेंगे वोटिंग 
बिहार में इस बार लोकसभा चुनाव में 7.64 करोड़ मतदाताओं का चक्रव्यूह तैयार है, जिसमें चार करोड़ से ज्यादा पुरुष, 3.64 करोड़ महिला हैं। बिहार में 2,290 थर्ड जेंडर और 6. 30 लाख दिव्यांग मतदाता भी हैं। जबकि राज्य में 14.50 लाख बुजुर्ग मतदाता है, जिनमें 21,680 मतदाता 100 या उससे ज्यादा आयु के हैं। निर्वाचन आयोग के ताजा आंकड़ो के मुताबिक राज्य में 1.68 लाख सर्विस मतदाता पंजीकृत हैं। पिछले चुनाव की तुलना में इस बार महिला मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। लोकसभा चुनाव 2024 में 9.26 लाख ऐसे युवा मतदाता हैं, जो पहली बार मतदान में हिस्सा लेंगे। 
क्या जातिगत समीकरण 
बिहार की नीतीश सरकार के जारी राज्य में जाति आधारित जनगणना के आंकड़ो के मुताबिक बिहार में ओबीसी, दलित और आदिवासी समुदाय 84.48 फीसदी हैं, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग 63.13 फीसदी, अनुसूचित जाति 19.65 फीसदी, एससी-एसटी का प्रतिशत 21.39 में अनुसूचित जनजाति 1.68 फीसदी है। जबकि सवर्ण समाज की आबादी महज 15.52 फीसदी हैं। ओबीसी में सबसे ज्यादा आबादी यादव की है, जिसके बाद रविदास, कोइरी, ब्राह्मण और राजपूत समुदाय के लोग हैं। यदि धार्मिक आधार पर देखा जाए तो हिंदू आबादी 81.99 फीसदी है, तो मुस्लिम आबादी 17.70 फीसदी है। जबकि ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन समाज मिलकर भी आधा फीसदी भी नहीं है। 
किस सीट पर कब होगा मतदान 
चरण 1: 19 अप्रैल- औरंगाबाद, गया, नवादा,जमुई 
चरण 2: 26 अप्रैल- किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया,भागलपुर,बांका 
चरण 3: 07 मई- झंझारपुर, सुपौल, अररिया, मधेपुरा, खगरिया 
चरण 4: 13 मई- दरभंगा, उजियारपुर, समस्तीपुर, बेगूसराय, मुंगेर 
चरण 5: 20 मई- उत्सव प्रस्ताव सीतामढ़ी, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, सारण, हाजीपुर 
चरण 6: 25 मई- वाल्मिकीनगर,पश्चिम चंपारण,पूर्वी चंपारण, शिवहर, वैशाली, गोपालगंज, सिवान, महाराजगंज 
चरण 7: 01 जून- नालन्दा, पटना साहिब, पाटलिपुत्र, आरा, बक्सर, सासाराम, काराकाट, जहानाबाद
01Apr-2024

चौपाल: युवाओं को अभिनय के गुरु सीखाकर पहचान दिलाते कलाकार डा. हरिकेश पंघाल

साहित्य एवं कला के बेजोड़ लेखक व कलाकार के रुप में बनाई बड़ी पहचान 
व्यक्तिगत परिचय 
नाम: डॉ. हरिकेश पंघाल 
जन्मतिथि: 03 जुलाई 1974 
जन्म स्थान: गांव खरखड़ी माखवान तहसील तोशाम जिला भिवानी 
शिक्षा: मनोविज्ञान, हिन्दी एवं जनसंचार में एम.ए, एल.एल.बी. पीएच.डी 
संप्रत्ति: सहायक प्रोफेसर (मनोविज्ञान) वैश्य कॉलेज,भिवानी, रंगमंचकार, कवि एवं लेखक 
सम्पर्क : मो> 9253592534 
--ओ.पी. पाल 
हरियाणा की लोककला एवं संस्कृति के क्षेत्र एक से बढ़कर एक कलाकार दिये हैं। ऐसे ही कलाकारों में डा. हरिकेश पंघाल ऐसे कलाकार हैं, जिन्होंने नाटक, कविता और लघु फिल्मों की पटकथा लिखने के साथ ही अभिनय के क्षेत्र में भी एक अभिनेता और रंगकर्मी में अपनी कला का प्रदर्शन किया है। वहीं उन्होंने कला के क्षेत्र में अनेक प्रतिभाशाली कलाकारों को प्रशिक्षण देकर उन्हें मंच पर अभिनेता जैसे कलाकारों की पहचान दिलाई है। थिएटर डांस और साहित्यिक क्षेत्र में पिछले तीन दशक से संस्कृति का संवर्धन करते आ रहे पंघाल अभी तक 50 से अधिक नाटकों का निर्देशन कर चुके हैं। प्रसिद्ध रंगकर्मी, अभिनेता, कवि एवं लेखक डा. हरिकेश पंघाल ने अपने साहित्यिक एवं कला के सफर को लेकर हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में कई ऐसे अनुछुए पहलुओं को साझा किया है, जिससे कहा जा सकता है कि वह अपनी कला के माध्यम से समाज को सकारात्मक विचारधारा से जोड़कर संस्कृति और युवाओं को संस्कार की राह दिखाने में जुटे हैं। 
हरियाणा के भिवानी जिले के गांव खरखड़ी माखवान में चौधरी जगबीर सिंह व श्रीमती वीना रानी के घर में 03 जुलाई 1974 को जन्में कलाकार हरिकेश पंघाल के परिवार की पृष्ठभूमि राजनीतिक रही है। उनके पिता चौधरी जंगबीर सिंह भिवानी संसदीय क्षेत्र से 1991 से 1996 तक सांसद रहे। उन्होंने हरियाणा निर्माण के बाद हुए पहले चुनाव में तोशाम विधानसभा से चौ. बंसीलाल के खिलाफ चार बार चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई। उनके बड़े भाई कमल सिंह प्रधान भी राजनीति में सक्रिय रहे। इसके बावजूद हरिकेश पंघाल का रुझान बचपन से ही कला क्षेत्र में रहा। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा के दौरान भिवानी पब्लिक स्कूल में विद्यालय के कार्यक्रमों में लघु नाटिका कविताएं और भाषण में हिस्सा लिया। इसके वे वैश्य महाविद्यालय भिवानी से स्नातक करने के दौरान रंगमंच की कला से जुड़ गये, जिसका नतीजा ये रहा कि वे युवा समारोहों में 6 बार सर्वोत्तम अभिनेता चुने गये। उनकी इस कला का आरंभ में परिजनों का विरोध भी झेलना पड़ा, लेकिन उनकी अभिरुचि परिवारिक माहौल से अलग पहचान बनाती गई, तो परिवार ने भी उन्हें प्रोत्साहन देना शुरु कर दिया। बकौल डा. हरिकेश पंघाल उनकी पत्नी भी उनकी कला के प्रसार में उनकी प्रेरणा साबित हुई। उन्होंने मनोविज्ञान और हिन्दी एवं जनसंचार में एमए, एलएलबी के अलावा पीएच.डी की उच्च शिक्षा हासिल की है। वर्तमान में वैश्य महाविद्यालय में मनोविज्ञान प्राध्यापक के रुप में कार्यरत डा. हरिकेश पंघाल ने बताया कि 1997 में जब हरियाणवी कविता को भी युवा समारोह में शामिल किया गया तो उन्होंने भी स्वरचित कविता सुनाई, जिसे प्रथम स्थान मिला। इससे उनका आत्मविश्वास ऐसा बढ़ा कि कई सालों तक उनकी वह कविता युवा समारोह में अव्वल रही। इसके बाद उन्होंने कविताएं लिखना शुरु कर दिया, जिसमें कई ऐसी कविताएं रही जो बड़े बड़े मंच पर प्रसिद्ध हुई। कला जगत में शुरुआती दौर में दर्शकों को उनकी रचनाएं बहुत पसंद आई, लेकिन उन्होंने ऐसी रचनाओं को अश्लीता की परिधि में महसूस किया तो उसके बाद उन्होंने संकल्प लिया किया कि वे ऐसी रचना और नाटकों की प्रस्तुति करेंगे, जिन्हें परिवार के लोग एक साथ देख या सुन सकें। कई बार ओटीटी एप के कार्यक्रमों और हरियाणवी एल्बम और फिल्मों के लिए भी गाने लिखने का ऑफर मिला, लेकिन हरबार उन्होंने वह सबकुछ लिखने से इंकार कर दिया, जो उसके संकल्प के बाहर था। इसलिए उन्होंने अपनी कला के फोकस में हमेशा सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों और समाज में फैली कुरीतियों को उजागर किया है, जिसमें नाटक लेखन व मंचन में प्रमुख रुप से कन्या भ्रूण हत्या, जल संरक्षण, लिंग समानता, नशाखोरी और दहेज प्रथा, भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार, धर्म और राजनीति के कुरूप चेहरे जैसे अनेक ज्वलंत मुद्दों पर चोट करके समाज को सकारात्मक विचारधारा से जोड़ने का प्रयास किया है। डा. हरिकेश दो भक्ति शब्दों पुस्तके भी लिखी और उन्होंने 15 हरियाणवी नाटकों के अलावा हरियाणवी और हिंदी में 100 से अधिक कविताओं के लेखन किया, जिनमें उनकी कई हरियाणवी कविताओं को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है। हिसार दूरदर्शन द्वारा प्रसारित सबरंग कार्यक्रम के सूत्रधार रहे डा. हरिकेश ने हरियाणवी फिल्म जनेती में भी काम किया और दूरदर्शन ज्ञान केंद्र द्वारा प्रसारित धारावाहिक में भी अभिनय की भूमिका भी निभाई है। वे अपनी सफलता का सम्पूर्ण श्रेय माता पिता, परिवार, आध्यात्मिक गुरु परमसंत कंवर साहब तथा रंगमंच के गुरु कौशल भारद्वाज तथा फिल्म अभिनेता राजू पंडित को दिया है। 
गुरु मंत्र से अनेक युवा बने कलाकार 
प्रसिद्ध कलाकार डा. हरिकेश पंघाल का ध्येय कभी फिल्म जगत के परदे पर आना या प्रसिद्ध अभिनेता कभी नहीं रहा। इसका मकसद यही था कि वह अपनी कला में कविताओं और साहित्य लेखन के माध्यम से हमेशा पथभ्रष्ट होते समाज खासकर युवा पीढ़ी को सही राह की और आकर्षित किया जाए। यही नहीं उन्होंने कला के क्षेत्र में अभिरुचि रखने वाले युवाओं को जोड़कर गुरु-शिष्य परंपरा को भी गति देने पर बल दिया। इसका सकारात्मक परिणाम ये है कि आज उनसे जुड़े अनेक युवा एक कलाकार के रुप मंचों पर बेहतरीन कला का प्रदर्शन करके सामाजिक उत्थान में अपना योगदान देकर अपने परिवार, राज्य व देश का नाम रोशन कर रहे हैं। इनमें कमल आनंद, नवीन कुमार, अनूप कुमार, शीतल, राज सिंह, जनार्धन, सोनल शर्मा, दिशिका, राजेश राठौर, साहिल अपूर्व और अमिता आदि ऐसे शिष्य कलाकार हैं, जिन्होंने कई दर्जन सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के खिताब हासिल कर लिये हैं। जबकि डा. हरिकेश से अभिनय के गुर सीखकर एकता जागड़ा, उमा शैखावत, भावना, निशा, सुनीता, प्रदीप कुमार, प्रशांत, पवन कुमार, अमित कुमार आदि ने कला के क्षेत्र में नाम कमा रहे हैं। इसके अलावा उनके निर्देशित नाटकों में अब तक 80 विद्यार्थी सर्वोत्तम अभिनेता या अभिनेत्री का खिताब जीत चुके हैं। 
कला के क्षेत्र में गुणवत्ता जरुरी 
इस आधुनिक युग में आज कला के क्षेत्र में इतना बहुत ज्यादा काम हो रहा है, कि यदि थोड़ी भी प्रतिभा किसी में है तो वह घर बैठकर कला या अभिनय के माध्यम से जीवन यापन कर सकता है, लेकिन गुणवत्ता के दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस इंटरनेट व सोशल मीडिया के युग में जिस प्रकार के ओटीटी जैसे प्लेटफार्म पर अश्लीलता के मंच समाज को दिशाहीन करने का काम कर रहे हैं। साहित्य व लोककला को समाज का दर्पण माना गया है, जिसकी मर्यादाओं व परंपरा को जीवंत रखने के लिए खासकर युवाओं को साहित्य, लोक कला, संगीत व संस्कृति के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है। अगर कला को सकारात्मक दृष्टिकोण पर कायम रखा जाए तो निसंदेह संस्कृति अपने चरमोत्कर्ष को अवश्य छूने लगेगी। इसके लिए रंगमंच में गिरावट का कारण बन रहे द्विअर्थी रचनाओं व नाटकों को प्रस्तुत करने वालों को सर्वहित सुखाय की धारणा से सकारात्मक लेखन, मंचन और प्रस्तुति करने पर बल देना होगा। 
सम्मान व पुरस्कार 
सुप्रसिद्ध कलाकार, कवि व लेखक डा. हरिकेश पंघाल को साहित्य, कला और अभिनय के क्षेत्र में दिये गये योगदान के लिए हिमाचल के राज्यपाल, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, त्रिवेणी, नटराज कला मंच सहित कई संस्थाओं व मंचो द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा हिंदी और संस्कृत एकांकी नाटकों में 80 शिष्यों को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिल चुका है। उनके कई छात्र बॉलीवुड और ओटीटी प्लेटफॉर्म की विभिन्न फिल्मों में काम कर रहे हैं, जो उनके लिए किसी सम्मान से कम नहीं है। 
01Apr-2024

उत्तराखंड: पांचो लोकसभा सीटों पर भाजपा व कांग्रेस के बीच वर्चस्व की जंग

 दोनों दलों ने पांचों सीटो पर छह नए चेहरों पर खेला बड़ा दांव 


बसपा ने त्रिकोणीय मुकाबला बनाने के मकसद से सभी सीटों पर उतारे प्रत्याशी 

ओ.पी. पाल. नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के पहले चरण में 19 अप्रैल को देवभूमि उत्तराखंड की सभी पांच सीटों पर होने वाले चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही वर्चस्व के संघर्ष करती नजर आ रही हैं। फिलहाल पांचों सीटों पर भाजपा का कब्जा है। शायद यही कारण है कि इस दिलचस्प राजनीति के चलते इस बार इन पांचों लोकसभा सीटों पर भाजपा ने दो और कांग्रेस ने चार नए चेहरों पर दांव खेला है। हालांकि बसपा भी अपना वोट बैंक बरकरार रखने के लिए सभी सीटों पर चुनावी जंग में है। उत्तराखंड की पांचों सीटों पर नामांकन जांच और वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद 55 प्रत्याशी चुनावी जंग में अपनी किस्मत आजमाएंगे। इनमें सबसे ज्यादा 14 प्रत्याशी हरिद्वार लोकसभा सीट पर हैं, जबकि सबसे कम सात प्रत्याशी अल्मोड़ा सीट पर चुनाव मैदान में होंगे। इसके अलावा गढ़वाल में 13, टिहरी में 11, नैनीताल में 10 प्रत्याशी लोकसभा चुनाव के महाकुंभ में जनता के बीच जाएंगे। भाजपा ने पौडी गढ़वाल सीट पर नए चेहरे के रुप में राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी को उतारकर मुकाबला दिलस्प कर दिया है। इसी प्रकार हरिद्वार सीट से भाजपा ने पहली बार पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत तो कांग्रेस ने पूर्व सीएम हरीश रावत के बेटे वीरेन्द्र रावत पर दांव खेलकर वर्चस्व की लड़ाई बना दिया। वहीं हरिद्वार जिले के कदावर नेता खानपुर के विधायक उमेश कुमार ने भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप हरिद्वार सीट के चुनाव को दिलचस्प मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। कांग्रेस नैनीताल व टिहरी सीट पर भी नए चेहरे उतारे हैं। इन लोकभा चुनाव में खासबात ये भी है कि भाजपा और कांग्रेस के मुकाबले को त्रिकोणीय चुनावी संघर्ष बनाने के इरादे से बहुजन समाज पार्टी ने भी पांचों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। हालांकि कांग्रेस का दावा है कि बसपा को चुनाव मैदान में आने के पीछे कांग्रेस के वोटबैंक में सेंधमारी के मकसद से भाजपा की सियासी साजिश काम कर रही है। राज्य के राजनीतिक विशेषज्ञ भी कांग्रेस के इस दावे को पुख्ता करते नजर आ रहे हैं, जिसमें बसपा प्रत्याशियों को पड़ने वाले वोट से भाजपा को राजनीतिक लाभ मिलने वाला है। जबकि बसपा पिछले चुनाव में भी अपने उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा था और वह अपने वोट प्रतिशत को बढ़ाने की फिराक में है। 

83.38 लाख मतदाता चुनेंगे पांच सांसद 

उत्तराखंड में इस बार लोकसभा चुनाव की पांच सीटों पर 83,37,914 मतदाता मतदान करेंगे। इनमें 43,17,579 पुरुष और 40,20,038 महिला मतदाता हैं। जब कि 297 थर्ड जेंडर मतदाता है। राज्य में सर्विस मतदाताओं की संख्या 93,187 है, जिसमें 90,554 पुरुष और 2633 महिला सर्विस वोटर हैं। 1,45,220 युवा वोटर पहली बार वोटिंग करेंगे। इनमें 1363 ऐसे बुजुर्ग मतदाता भी शामिल है जो 100 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हैं, जिनमें सबसे ज्यादा महिलाएं शामिल है। ऐसे मतदाताओं को पोस्टल बैलेट का विकल्प लेने की सुविधा दी गई है। हरिद्वार सीट पर सबसे ज्यादा 20,31,632 और अल्मोड़ा सीट पर सबसे कम 13,37,648 मतदाता हैं। 

मतदान केंद्रों की ये व्यवस्था 

राज्य में कुल 11,729 पोलिंग स्टेशन बनाए गए हैं। इसमें 12 पोलिंग पार्टियां मतदान से तीन दिन पूर्व पोलिंग स्टेशन के लिए प्रस्थान करेंगी। इसमें 11 पोलिंग स्टेशन उत्तरकाशी में और एक पोलिंग स्टेशन पिथौरागढ़ में चिह्नित किया गया है। 705 पोलिंग पार्टियां मतदान से दो दिन पूर्व पोलिंग स्टेशन के लिए प्रस्थान करेंगी और 11012 पोलिंग पार्टियां मतदान से एक दिन पूर्व पोलिंग स्टेशन के लिए प्रस्थान करेंगी। मतदान से दो दिन पूर्व प्रस्थान करने वाली सर्वाधिक पौड़ी में 181 और अल्मोड़ा में 136 पोलिंग पार्टियां हैं।

प्रवासी भी करेंगे मतदान 

उत्तराखंड में रहने वाले जम्मू-कश्मीर के प्रवासी भी अब डाक मतपत्रों के जरिये मतदान कर सकेंगे। यह सुविधा केवल बारामूला श्रीनगर और अनंतनाग-राजौरी लोकसभा सीट के उन मतदाताओं के लिए है, जो परिस्थितिवश पलायन कर गए थे। वहीं प्रदेश में अब सर्विस मतदाताओं से प्राप्त आवेदनों के बाद राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने इनकी संख्या तय कर दी है। 

किस सीट पर कितने प्रत्याशी 

उत्तराखंड की पांचों सीटों पर नामांकन जांच और वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद 55 प्रत्याशी चुनावी जंग में अपनी किस्मत आजमाएंगे। इनमें सबसे ज्यादा 14 प्रत्याशी हरिद्वार लोकसभा सीट पर हैं, जबकि सबसे कम सात प्रत्याशी अल्मोड़ा सीट पर चुनाव मैदान में होंगे। इसके अलावा गढ़वाल में 13, टिहरी में 11, नैनीताल में 10 प्रत्याशी लोकसभा चुनाव के महाकुंभ में जनता के बीच जाएंगे। 

इनके बीच मुख्य चुनावी जंग 

उत्तराखंड की पांच सीटों पर भाजपा, कांग्रेस और बसपा ने मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने के मकसद से सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किये हैं। राज्य की टिहरी से मालाराज्य लक्ष्मीा शाह, कांग्रेस ने जोत सिंह गुनसोला और बसपा ने नीम चंद्र छुरियाल को प्रत्याशी बनाया है। जबकि गढ़वाल सीट पर भाजपा के अनिल बलूनी, कांग्रेस के गणेश गोदियाल व बसपा के धीर सिंह बिष्ट चुनाव मैदान में हैं। कुमायूं की दो सीटों में अल्मोड़ा (सुरक्षित) से भाजपा के अजय टम्टाी, कांग्रेस के प्रदीप टम्टा के बीच बसपा से नरायण राम ताल ठोक रहे हैं, तो नैनीताल-उधमसिंह नगर सीट पर भाजपा के अजय भट्ट, कांग्रेस के प्रकाश जोशी और बसपा के अख्तर अली माहीगिर के बीच मुकाबला होगा। जबकि हरिद्वार लोकसभा सीट पर भाजपा ने त्रिवेंद्र सिंह रावत, कांग्रेस ने वीरेंद्र रावत तथा बसपा ने जमील अहमद को उम्मीदवार बनाया है। 31Mar-2024