मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

नये कानून से होगी जजों की नियुक्तियां !

न्यायिक नियुक्ति आयोग लागू
हरिभूमि ब्यूरो
. नई दिल्ली
सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति के लिए अब तक चली आ रही कॉलेजियम प्रणाली समाप्त कर दी गयी है। राष्ट्रपति से मंजूरी के बाद केंद्र सरकार ने सोमवार को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की अधिसूचना जारी कर दी। आयोग के अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश होंगे। इस बीत आयोग को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय में 15 अप्रैल को सुनवाई भी होगी।
सरकार ने उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की मौजूदा प्रणाली में बदलाव लाने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014 और 121वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2014 को अधिसूचित किया। ये विधेयक 13 अगस्त, 2014 को लोकसभा में और 14 अगस्त 2014 को राज्यसभा में पारित हो गए थे। इसके बाद इन विधेयकों का अनुमोदन निर्धारित संख्या में राज्य विधानसभाओं ने कर दिया और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी इन्हें मिल गई। इसके बाद सोमवार, 13 अप्रैल से केंद्र सरकार ने इस अधिनियम को प्रभावी घोषित करते हुए अधिसूचना जारी कर दी। उपयरुक्त अधिनियम में ह्यराष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोगह्य द्वारा उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के चयन के लिए एक पारदर्शी एवं व्यापक आधार वाली प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है। पूर्ववर्ती कॉलेजियम प्रणाली की तरह ही ह्यराष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोगह्य के अध्यक्ष भी भारत के मुख्य न्यायाधीश ही होंगे। आयोग के सदस्यों में उच्चतम न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री, भारत के प्रधानमंत्री की कमेटी द्वारा मनोनीत दो जाने-माने व्यक्ति, भारत के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष के नेता अथवा विपक्ष का नेता न होने की स्थिति में लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता शामिल होंगे। आयोग की संरचना को समावेशी बनाने के मकसद से इस अधिनियम में यह कहा गया है कि एक जाने-माने व्यक्ति को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्गों, अलपसंख्यकों अथवा महिलाओं के वर्ग से मनोनीत किया जाएगा। आयोग अपने नियम खुद ही तैयार करेगा। इस बीच इस आयोग के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिकाओं पर सुनवाई 15 अप्रैल को सुनिश्चित की गयी है। वकीलों के कई संगठनों ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की थी। इस पर 7 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मामले को संविधान पीठ को भेज दिया था। पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ 15 अप्रैल को मामले की सुनवाई करेगी।
14Apr-2015

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

सात समंदर पार अपनो का है इंतजार!



विदेशी जलों में बंद हैं साढ़े छह हजार भारतीय 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार ने युद्धबंदी में फंसे भारतीयों को भले ही सुरक्षित निकाल लिया हो, लेकिन इससे भी कहीं ज्यादा रोजगार की गरज से दुनिया के विभिन्न देशों में पैसा कमाने की गरज से कानूनी शिकंजे में फंसे हुए हैं। ऐसे विदेशी जेलों में बंद करीब साढ़े छह हजार भारतीयों के परिवारों को उनकी रिहाई का इंतजार है।
केंद्र सरकार के विदेश मंत्रालय और प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्रालय द्वारा विदेशों में रोजगार के लिए रहने वाले भारतीयों के लिए कानूनी मदद या अन्य मुसीबत के लिए हाल ही में ई-योजना के तहत ‘मदद’ नामक वेबसाईट शुरू की, जिसके जरिए परदेश में मुसीबत में घिरने वाले भारतीय अपनी भारतीय सरकार से सीधे मदद की गुहार कर सकते हैं। इसके अलावा प्रवासी मामलों के तहत भारत खासकर भारतीय श्रमिकों को कानूनी सहायता देने की योजना भी चला रहा है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक विदेशों में जेलों में बंद किसी भी भारतीय को को सहायता प्रदान करने के लिए संबन्धित देश में भारतीय मिशनों और दूतावासों के जरिए हर संभव प्रयास किये जाते हैं। वहीं सजायाμता लोगों के लिए भारत का पाक, बांग्लादेश, श्रीलंका और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों समेत 30 देशों के साथ एक-दूसरे देश के कैदियों के आदान-प्रदान करने के लिए संधि भी विद्यमान है और भारत सरकार विदेशी सरकारों से भारतीयों को क्षमा देने का अनुरोध भी करती है। इसके बावजूद इन संधियों का भारतीय कैदियों को रिहा कराने में कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। मंत्रालय के अनुसार ऐसे करारों के तहत अमेरिकी राज्यों के संगठन की बहुपक्षीय कन्वेंशन से भी सहमति जताई गई है, जहां अभी तक 54 बंदियों को लाभ मिला है, जिनमें से मौजूदा बंदियों के अलावा 45 कैदियों की भारत वापसी कराई जा चुकी है। केंद्र सरकार ने जिस तरह यमन की युद्धबंदी के चलते वहां रह रहे करीब पांच हजार भारतीयों को सुरक्षित भारत लाकर एक बड़ा काम किया है। उसी तरह सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 72 देशों की जेलों में बंद 6443 भारतीयों की रिहाई के लिए यहां उनके परिवार सरकार पर भरोसा कर रहे हैं, जो विदेशी जेलों में सजा काट रहे भारतीयों को छुड़ाने के लिए दूतावासों और भारतीय विदेश मंत्रालय के चक्कर काटने में अभी इसी उम्मीद के साथ थके नहीं हैं कि एक दिन उनके अपने घर लौट आएंगे।
क्यों फंसे हैं भारतीय
दरअसल विदेश में पैसा कमाने की ललक में विदेश जाने वाले भारतीयों के काम करने की प्रक्रिया इतनी कठिन है कि उसकी औपचारकिता पूरी कर पाने में ही लोग हथियार डाल देते हैं। यूरोप और अमेरिका में काम के लिए वीजा पाना टेढ़ी खीर है, लेकिन खाड़ी देशों में दक्षिण एशियाई देशों के लोगों को काम तो मिल जाता है, लेकिन ऐसे प्रवासी श्रमिकों पर मुसीबत का पहाड़ उस समय टूटता है जब वे किसी इस्लामिक कानून के उल्लंघन में जकड़ जाते हैं। एक तो वहां का सख्त इस्लामिक कानून और दूसरा गैर कानूनी तरीके से वहां काम करना या रहना कानून के उल्लंघन का कारण बन जाता है। यही कारण है कि खाड़ी देशों में कानून की मार झेलने वाले भारतीय कैदियों की खाड़ी देशों में संख्या ज्यादा है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत से बाहर विदेशों में रहने वाले 2 करोड़ 21 लाख प्रवासी भारतीयों में से 27 फीसदी खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं। दुनिया के करीब 80 देशों की जेलों में बंद भारतीयों में से 45 फीसदी भारतीय आठ खाड़ी देशों की जेलों में ही बंद हैं और इन भारतीयों के खिलाफ इस्लामिक कानून के उल्लघंन, चोरी, धोखाधड़ी और गैरकानूनी तरीके से काम करने या गैरकानूनी तरीके से प्रवास करने जैसे आरोप ही ज्यादा हैं। सरकारी आंकड़े के अनुसार यमन में भी चार भारतीय कैदी हैं, लेकिन सूत्र बताते हैं कि यमन की जेलों में भी भी दो हजार से ज्यादा भारतीय बंद हैं।
खाड़ी देशों में सर्वाधिक कैदी
विदेशी दलों में बंद भारतीयों में सर्वाधिक 1534 नागरिक सऊदी अरब में, उसके बाद 833 संयुक्त अरब अमीरात में बंद हैं। नेपाल में 614, ब्रिटेन में 437, अमेरिका में 391, पाकिस्तान में 352, मलेशिया में 319, कुवैत में 290, बांग्लादेश में 257, सिंगापुर में 158,इटली में 145, चीन में 117, बहरीन में 106, कतर में 96, ओमान में 85, म्यांमार व थाईलैंड में 76-76,श्रीलंका में 73, स्पेन में 60 और ईरान में 52 भारतीय कैदी के रूप में बंद हैं। अन्य जेलों में भी इसी प्रकार कैदी बंद हैं। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है वहां की जेलों में सुरक्षा से जुड़े कर्मियों में 54 लोग 1971 की जंग में पाकिस्तानी जेलों में युद्धबंदी हैं। पाकिस्तान की जेलों में बंद ये भारतीय उन 172 मछुआरों से अलग है जिन्हें फरवरी में ही पाक द्वारा रिहा किया गया है। 
13Apr-2015


बसपा की सियासी जमीन पर संकट

चुनाव आयोग भी झटका देने की तैयारी मे
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
सोलहवीं लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय पार्टियों के रूप में चुनाव लड़ने वाली जिन तीन दलों के राष्ट्रीय दर्जा छीनने के कगार पर है उसमें बहुजन समाजवादी पार्टी भी शमिल है। जहां तक उत्तर प्रदेश की राजनीति का सवाल है उसमें बसपा की सियासी जमीन पर भी खतरा मंडराने लगा है।
उत्तर प्रदेश समेत पूरे भारत में बसपा अपना जनाधार बनाने की कवायद में जुटी मायावती को वर्ष 2012 के यूपी चुनाव में सत्ता से हटने के बाद झटके पर झटके लग रहे हैं। बसपा सोलहवीं लोकसभा चुनाव में अपना खाता तक नहीं खोल पाई। उत्तर प्रदेश में ही नहीं बसपा का हर राज्य में जनाधार घटता जा रहा है। खासकर इसका सबसे ज्यादा राजनीतिक लाभ उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी समाजवादी पार्टी को होगा। इसका कारण यह भी माना जा रहा है कि वर्ष 1984 में जिस बसपा की स्थापना कांशीराम ने करते हुए मायावती को फर्श से अर्श तक पहुंचाया था। उसी कांशीराम के भाई दलबारा सिंह ने बसपा को चुनौती देने के लिए एक अलग से नई पार्टी बहुजन संघर्ष पार्टी (कांशीराम) बनाकर उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा लड़ने का ऐलान भी कर दिया है। इसी पार्टी के बैनर तले कांशीराम की जयंती पर पिछले महीने दलित सम्मेलन में मायावती पर आरोप ही नहीं लगाए थे, बल्कि मायावती द्वारा निकाले गये पूर्व मंत्रियों और पूर्व सांसदों व विधायकों को इस पार्टी में जगह देना शुरू कर दिया है। इस सम्मेलन में कांशीराम के दलितों के उत्थान के अधूरे मिशन को पूरा करने के साथ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक मुक्ति आन्दोलन को पूरे देश में फैलाने का सकंल्प भी लिया गया। यूपी में समानांतर नए राजनीतिक समीकरण में इस सियासत को राजनीतिक गलियारे में मायावती के घटते जनाधार के रूप में देखा जा रहा है।
जल्द छीनेगा राष्टÑीय दल का दर्जा
16वीं लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय दलों में शुमार होने के बावजूद बसपा को 4.1 प्रतिशत वोट मिले, जो राष्ट्रीय दल को बरकरार रखने के लिए नाकाफी साबित हुए। लोकसभा चुनाव के दौरा पूरे भारत में बसपा के प्रदर्शन को लेकर चुनाव आयोग भी बसपा को उसकी राष्टÑीय दर्जे के दल की मान्यता खत्म करने की तैयारी में है। इसका कारण है कि लोकसभा चुनाव में बसपा राष्टÑीय दर्जा बरकरार रखने वाले नियमों के तहत वोट बैंक नहीं जुटा पायी यानि उसके जनाधार में भारी कमी आई। राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो चुनावी आंकड़ों के लिहाज से भी ऐसे संकेत मिलने लगे हैं कि देश भर मे बहुजन समाज पार्टी की लोकप्रियत मे तेजी से कमी आ रही है और इसका कारण सिर्फ मायावती की रणनीति और खुद के निर्णय लेने जैसे अडियल रवैये को माना जा रहा है। वर्ष 1986 मे पहली बार बहुजन समाज पार्टी ने लोकसभा चुनावों मे 86 सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद मात्र एक सीट जीतकर 2.07 प्रतिशत मत हासिल किये थे। लोकसभा चुनावों मे बसपा का सबसे अच्छा प्रदर्शन वर्ष 2004 के आम चुनावों मे रहा, जिसमे उसने 435 सीटों पर चुनाव लड़कर 19 सीटें हासिल की थी और जबकि बसपा की सियासी जमीन खिसकने के लिए मायावतती को सबसे बड़ा झटका 16 वी लोकसभा मे लगा, जब सबसे ज्यादा 503 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद बसपा एक भी सीट नहीं जीत सकी। अभी तक अभी तक छह राष्ट्रीय राजनीतिक दल और 51 क्षेत्रीय दल हैं। चुनाव आयोग का निर्णय आते ही राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की संख्या पांच और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की संख्या 52 हो जायेगी।
ऐसे चला झटकों का दौर
लोकसभा चुनाव के बाद से मायावती को लगातार झटके लगते आ रहे हैं। वैसे तो लोकसभा चुनाव से पहले ही प्रो. एसपी सिंह बघेल ने पार्टी छोड़ी और चुनावों के बाद बसपा के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व राज्य सभा सांसद अखिलेश दास गुप्ता, राज्य सभा सांसद जुगल किशोर भी अपनी नेता पर हमला बोलने में पीछे नहीं रहे। ऐसे में उनका पार्टी से नाता टूटना तो तय ही था। वैसे भी मायावती ने इन्हें ही नहीं कई कद्दावर नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया, जिनमें पूर्व सांसद दारा सिंह चैहान व कादिर राणा कि अलावा शाहिद अखलाक और हाल ही में विधायक बाला प्रसाद अवस्थी भी शामिल है।
13Apr-2015

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

अंतर्राष्ट्रीय मानकों से होगी सड़क सुरक्षा

जल्द पारित होगा सड़क परिवहन एवं सुरक्षा विधेयक
केंद्र ने किया राज्यों के साथ विचार विमर्श
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
देश में सड़कों पर दुर्घटनाओं में इंसान की जिंदगी बचाने की कवायद में जुटी केंद्र सरकार सख्त कानून बनाने की दिशा में अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा मानकों पर मंथन कर रही है। राज्यों के साथ विचार विमर्श करके सरकार ने सड़क परिवहन व सुरक्षा विधेयक के मसौदे को अंतिम रूप देने का निर्णय लिया है। सरकार का इरादा संसद के मौजूदा बजट सत्र में ही इस विधेयक को पारित कराने का है।
केंद्र सरकार ने पुराने मोटर वाहन कानून की जगह नया सड़क परिवहन व सुरक्षा कानून लागू करने की कवायद को संसद के मौजूदा सत्र में ही अंजाम तक पहुंचाने का इरादा किया है। सरकार का लक्ष्य है कि संयुक्त राष्ट्र के कार्य दशक में वर्ष 2020 तक देश में सड़क दुर्घटनाओं में 50 प्रतिशत कमी लाई जाए। इसके लिए इस लक्ष्य में राज्यों के साथ समन्वय करके नये कानून को लागू किया जाना जरूरी है। गौरतलब है कि दुनियाभर में सबसे ज्यादा सड़कों पर दुर्घटनाओं में होने वाली मौत के मामले में भारत पहले पायदान पर है। सरकार इन मौतों को कम से कम करने के लिए यातायात के सख्त कानूनों को लागू करने के इरादे से सड़क सुरक्षा विधेयक का मसौदा तैयार करने में जुटी हुई है। इस विधेयक में केंद्र सरकार ने छह विकसित देशों अमेरिका, कनाडा, सिंगापुर, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन के अंतर्राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा मानकों को शामिल करने का निर्णय लिया है। सड़क परिवहन और राजमार्ग सचिव विजय छिब्बर के अनुसार राज्यों में तभी वास्तविक कार्य होगा जब संयुक्त राष्ट्र के कार्य दशक के अंतर्गत तय लक्ष्यों को हासिल करने और सड़क दुर्घटनाओं को कम करने का एजेंडा तेजी से आगे बढ़ेगा।
राज्यों के साथ विचार विमर्श
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय में सचिव विजय छिब्बर ने शुक्रवार को राज्य सरकारों की अखिल भारतीय सड़क सुरक्षा और राज्यों के परिवहन विभाग के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। उन्होंने कहा कि सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय और अंतर्राष्ट्रीय सड़क फेडरेशन द्वारा संयुक्त रूप से मंथन करने का मकसद सड़क सुरक्षा के संबंध में राज्य सरकारों द्वारा किए गए विभिन्न उपायों के मूल्यांकन और उन्हें मंत्रालय से संभावित सहायता की प्रकृति को समझना। उन्होंने राज्य सरकार के प्रतिनिधियों से कहा कि वे लोगों की जान बचाने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए सड़क अभियांत्रिकी की शिक्षा की दिशा में कदम उठाएं। उन्होंने कहा कि सड़क सुरक्षा से जुड़ी प्रमुख समस्याओं को दूर करने के लिए सिविल सोसाइटी को शामिल किया जाना चाहिए। बैठक के दौरान राज्यों में वर्तमान सड़क सुरक्षा परिदृश्य, कमियों को देखने वाले तथा इन समस्याओं का हल ढूंढने का प्रयास कर रहे प्रतिनिधियों ने भी अपनी प्रस्तुतियां दी।
अंतिम चरण में है मसौदा
राज्यों के परिवहन प्रतिनिधियों को सड़क परिवहन और राजमार्ग सचिव विजय छिब्बर ने बैठक के दौरान का कि केन्द्र सरकार का प्रस्तावित सड़क सुरक्षा विधेयक का मसौदा अंतिम चरण में है, जो कानूनी प्रावधान की जांच पड़ताल के लए विधि मंत्रालय के विधायी विभाग के पास है। यह भी उम्मीद है कि जल्द ही इस प्रस्तावित मसौदे को केंद्रीय मंत्रिमंडल को मंजूरी के लिए भेजा जाएगा, ताकि 20 अप्रैल से शुरू होने वाले संसद में बजट सत्र के अगले चरण में इसे पेश करके संसद की मंजूरी हासिल की जा सके। यह विधेयक मौजूदा मोटर वाहन कानून का स्थान लेगा।
11Apr

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

भारतीय विमानन सेवा की ऊंची उड़ान!

-डीजीसीए को मिला प्रथम श्रेणी का दर्जा
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संघीय विमानन प्रशासन ने भारतीय विमानन क्षेत्र में विकास की गति को बेहतर करार दिया। संघीय विमानन प्रशासन ने भारतीय नागर विमानन क्षेत्र में नियामक संगठन के रूप में नागर विमानन महानिदेशालय को प्रथम श्रेणी में सूचीबद्ध कर लिया है।
नागर विमानन मंत्रालय के अनुसार मंगलवार को भारत के दौरे पर आये अमेरिकी परिवहन विभाग में मंत्री एंथनी फॉक्स के नेतृत्व में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने यहां नागर विमानन मंत्री पशुपति अशोक गजपति राजू से मुलाकात की। इस दौरान अमेरिकी परिवहन विभाग के मंत्री एंथनी फॉक्स राजू को जानकारी दी कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संघीय विमानन प्रशासन द्वारा नागर विमानन महा निदेशालय यानि डीजीसीए का ग्रेड़ बढ़ाकर प्रथम श्रेणी का दर्जा दे दिया है। फॉक्स के नेतृत्व में इस अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ भारतीय नागर विमानन मंत्री राजू के अलावा डीजीसीए डा. प्रभात कुमार और मंत्रालय के प्रमुख अधिकारियों के साथ बैठक में विमानन सेवाओं से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा भी हुई। बैठक के दौरान भारत में नागर विमानन क्षेत्र के विकास के बारे में एक प्रस्तुति पेश की गई, जिसमें उन क्षेत्रों की पहचान को इंगित किया गया, जिनमें साझेदारी, तकनीकी सहयोग और 'मेक इन इंडिया' की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। बैठक में बुनियादी ढांचा विकास, वायु सुरक्षा, विमानन सुरक्षा, कौशल विकास, एमआरओ, राष्ट्रीय विमानन विश्वविद्यालय और विमानों के निर्माण में सहयोग के अवसरों के बारे में विचार विमर्श किया गया। दोनों पक्षों ने भारत व अमेरिका के बीच संयुक्त कार्यदल की स्थापना करके लाभकारी संबंध स्थापित करने पर सहमति बनाई। अमरीकी प्रतिनिधिमंडल में विमानन और अंतर्राष्ट्रीय मामलों की सहायक मंत्री सुश्री सूसन कुरलैंड और अमरीकी व्यापार और विकास एजेंसी यानि यूएसटीडीए की निदेशक सुश्री लिओकेडिया जाक भी शामिल रही।
क्या है डीजीसीए
भारत में नागर विमानन क्षेत्र में विमानों के परिचालन के नियमों को लागू करने के लिए एक प्रमुख नियामक संगठन के रूप में नागर विमानन महानिदेशालय यानि डीजीसीए अपनी जिम्मेदारी निभाता आ रहा है। यह संगठन विमान अधिनियम-1937 के प्रावधानों के तहत देश के भीतर और देश से बाहर विमान यातायात सेवाओं का नियमन तय करता है। डीजीसीए को देश से बाहर हवाई यातायाता के निर्धारण के लिए अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय समझौते करने की शक्ति भी प्रदान है। विमान चालकों, विमान रखरखाव इंजीनियरों और उड़ान इंजीनियरों के अलावा हवाई अड्डों और विमान वाहकों को लाइसेंस भी डीजीसीए से ही जारी होते हैं। वहीं यह संगठन नागरिक विमानों का पंजीकरण करने और भारत में विमानों के पंजीकरण में उड़ान योग्य आवश्यकताओं के बाद उपयुक्त विमानों को प्रमाणपत्र जारी करने की जिम्मेदारी भी निभाता है। अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों के लिए डीजीसीए की जिम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय नागरिक विमानन संगठनों से संबद्ध कार्यों में समन्वय स्थापित करना भी है। उड़ान तथा ग्लाइडिंग क्लबों की प्रशिक्षण गतिविधियों पर निगरानी रखने के साथ डीजीसीए उड़ान के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं की जांच और सरकार द्वारा नियुक्त न्यायालय या जांच समितियों को तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने का काम भी करता है। इसके अलावा डीजीसीए का काम शिकागो संघि और उसके अन्य प्रावधानों तथा विमानन संबंधी अन्य अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को देश में लागू करने की दिशा में विमानन संबंधी अन्य कानूनों में संशोधन करना है।
मोदी की कवायद
नागर विमानन मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच अमेरिका और भारत में हुई अनेक बैठÞकों के दौरान विमानन क्षेत्र में विकास को बढ़ाने के लिए कई मुद्दों पर चर्चा हुई थी। मोदी व ओबामा के बीच विमानन सेवा के क्षेत्र में डीजीसीए की भूमिका को भी सराहया गया था। उन्होंने विमानन क्षेत्र में 49 प्रतिशत एफडीआई लागू करने के साथ भारतीय विमानन सेवा को विश्वस्तरीय बनाने का संकल्प किया था। मेक इन इंडिया जैसे मिशन पर विमानन क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के संघीय विमानन प्रशासन ने भारत में बढ़ते विमानन विकास को देखते हुए डीजीसीए को प्रथम श्रेणी का दर्जा दिया है, जिसे प्रधानमंत्री मोदी की कवायद का नतीजा माना जा रहा है।
09Apr-2015

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

छग समेत आठ राज्यों की जेलों को 609 करोड़

जेल सुधार में होगा मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों पर विचार
ओ.पी. पाल
. नई दिल्ली।
जेल प्रशासनिक सुधार की दिशा में केंद्रीय सहायता के अलावा छत्तीसगढ़ समेत आठ राज्यों को तेरहवें वित्तीय आयोग द्वारा 609 करोड़ जारी किये गये हैं। मसलन पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से जेलों के सुधार की कवायद में जुटी केंद्र सरकार देश में विभिन्न राज्यों की शिथिलता को लेकर ज्यादा चिंतित है। इसके अलावा सरकार के पास जेलो में सुधार के लिए राष्टÑीय मानवाधिकार आयोग की 52 सिफारिश लंबित है जिन पर केंद्र सरकार विचार कर रही है।
केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद दिसंबर में जेल सुधार के लिए राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा एक राष्‍ट्रीय सम्मेलन के दौरान सभी राज्यों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में केंद्र सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी गई थी, जिसमें आयोग द्वारा जेल प्रशासनिक सुधार की दिशा में 52 सिफारिशें की थी। इन सिफारिशों में मॉडल जेल मैनुअल-2003 को समुचित रूप से संशोधित करना भी शामिल था, जिसके लिए केंद्र सरकार पहले से ही एक समिति गठित कर चुकी है। गृहमंत्रालय के मुताबिक 2002-09 की सात वर्षीय योजना के तहत देश के 27 राज्यों को 1347.17 करोड़ की निधियां जारी कर चुकी है। इसके अलावा तेरहवें वित्तीय आयोग ने भी आठ राज्यों को अलग से 609 करोड़ की धनराशि जारी की है, जिसमें छत्तीसगढ़ को 150 करोड़, आंध्र प्रदेश को 90 करोड़, अरुणाचल को दस करोड़, केरल को 154 करोड़, महाराष्टÑ को 60 करोड़, मिजोरम को 30 करोड़, ओडिसा को 100 करोड़ तथा त्रिपुरा को 15 करोड़ रुपये की निधि शमिल है। इसके बावजूद केंद्र सरकार की चिंता इसलिए भी बढ़ जाती है कि अरुणाचल प्रदेश, अंडमान एवं निकोबार, बिहार, गोवा,केरल और सिक्किम राज्यों के अलावा किसी अन्य राज्य ने केंद्र सरकार के मॉडल जेल मैनुअल-2003 को अंगीकार करने का प्रयास ही नहीं किया। सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार निरंतर राज्यों को अपने-अपने जेल मैनुअल में सुधार करने के लिए दिशा निर्देश व सुझाव भी जारी करती आ रही है।
जेल सुधार के कारक
चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के मुताबिक जेलों के आधुनिकीकरण और जेल प्रशासनिक सुधार के लिए राज्यों के पास प्रयाप्त निधियां हैं, जिनसे सुधार किया जा सकता है। केंद्र सरकार के मुताबिक केंद्र से जारी राज्यों को सात वर्षीय योजना के तहत जारी निधियों से अभी तक राज्य सरकारों द्वारा 127 नए कारागार, मौजूदा कारागारों में 1579 अतिरिक्त बैरकों और 8658 स्टाफ क्वार्टरों का निर्माण किया गया है। जबकि राष्टÑीय मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों में जेल सुधार के लिए प्रमुख रूप से अवधारणा, समीक्षा, विधायी कार्रवाई, भीड़भाड, विदेशी राष्टÑीयता वाले कैदी, महिला कैदी, जेल प्रशासन, कौशल का विकास तथा क्षमता संवर्धन, कैदियों के स्वास्थ्य की देखभाल, स्वच्छता और शुद्ध पेयजल, पर्यावरणीय मुद्दे, पुनर्वास, गैर सरकरी संगठन और सामाजिक कार्यकर्ताओं से संबन्धित 52 सिफारिशें की गई हैं।
08Apr-2015


रविवार, 5 अप्रैल 2015

पानी में जहर को पीने को मजबूर हैं हम!

-भू-जल में घुलता आर्सेनिक बन रहा बड़ी चुनौती
-गंगा किनारे बस्तियों के करोड़ो लोग प्रभावित

-हरियाणा के 17 जिले पी रहे जहरीला पानी
 -छत्तीसगढ़ के राजनन्दगांव का पेयजल भी खराब
ओ.पी. पाल
.नई दिल्ली।
अध्यात्म और मानव जीवन की दृष्टि से यह एक अच्छी पहल है कि मोदी सरकार गंगा स्वच्छता अभियान के तहत ‘नमामि गंगे’ मिशन को अंजाम तक पहुंचाना चाहती है। इसके बावजूद विश्व बैंक, विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य एजेंसियों की वह रिपोर्ट केंद्र सरकार के लिए चुनौती से कम नहीं है, जिसमें गंगा के किनारे बसी शहरों व बस्तियों के लोग पानी के साथ जहर पीने को मजबूर हैं।
केंद्र सरकार ने ‘नमामि गंगे’ नाम से गंगा व अन्य नदियों के जल को प्रदूषण रहित बनाकर उसके जल को निर्मल बनाने का संकल्प बार-बार दोहराया ही नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार ने गंगा स्वच्छता अभियान के लिए 2727 करोड़ रुपये का बजट भी मंजूर कर दिया है। हालांकि सरकार देश में जल प्रबंधन और हर इंसान को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने की योजनाओं पर भी काम कर रही है, लेकिन गंगा के किनारे ही बसे करोड़ों लोग भूजल के आर्सेनिकयुक्त पानी को पीने के लिए मजबूर हैं और सरकार उन अध्ययन रिपोर्टो से भी वाकिफ है कि गंगा तेरा पानी अमृत की मान्यता अब वेद-पुराणों के पन्नों में ही सिमट गई है। मसलन बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिक विषैले कचरे और अन्य प्रदूषणयुक्त तत्वों ने अन्य नदियों के साथ पवित्र गंगा के जल में भी आर्सेनिक जैसा जहर घुला हुआ है। वैज्ञानिकों और डब्ल्यूटीओ की ताजा रिपोर्ट ही नहीं, संसदीय स्थायी रिपोर्ट में भी इसका जिक्र आ चुका है कि अकेले गंगा के किनारे बसे कम से कम दस शहरों के करोड़ो लोग भूजल में आर्सेनिक युक्त पानी व ऐसे जहर से बुझे भोजन का उपयोग करने को मजबूर हैं। नतीजन आर्सेनिक जैसे धीमे जहर से जलजनित बीमारियों का प्रकोप इंसान के शरीर को खोकला कर रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक गंगा के पानी के सेवन से आर्सेनिक से दांतों का पीला होना, दृष्टि कमजोर पड़ना, बाल जल्दी पकने लगना, कमर टेड़ी होना, त्वचा संबंधी बीमारियां प्रमुख हैं। आर्सेनिक पर हुए शोध इसे कैंसर, मधुमेह, फेफड़ों जैसे भयानक बीमारियों का कारण भी बता रहे हैं। हालांकि गंगा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल से होकर गुजरती है, लेकिन ताजा अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक इनके अलावा हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, कर्नाटक, असम और मणिपुर राज्यों के भूजल में आर्सेनिक की मात्रा पाई गई है।
क्या कहती हैं रिपोर्ट
कृषि मंत्रालय से संबन्धित संसदीय स्थायी समिति ने तो जल प्रदूषण और जलप्रबंधन पर अपनी रिपोर्ट में अंतर्राष्टÑीय रिपोर्टो को भी पीछे छोड़ दिया है। मसलन शीतकालीन सत्र में पेश की गई डा. मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में गंगा किनारे ही नहीं, बल्कि देश के सात राज्यों बिहार, कर्नाटक, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम और मणिपुर की 1991 बस्तियों के भूजल को पूरी तरह से आर्सेनिक की गिरμत में बता दिया। इनमें सबसे अधिक 1124 बस्तियां पश्चिम बंगाल, 424 असम और 357 बस्तियां बिहार की शामिल है। इसके साथ ही रिपोर्ट में देश के 13 राज्यों के 98 जिलों के भूजल में आर्सेनिक की अत्यधिक मात्रा होने का जिक्र किया गया है, जिसमें दस राज्यों के 86 जिले तो ऐसे हैं जहां आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित मानकों की सीमा लांघ चुकी है। समिति की रिपोर्ट में आर्सेनिक जल पीने से सफेद दाग, रक्त की कमी, पैर में सूजन, यकृत, फेफडे और नस संबंधी बीमारियां, गैंगरीन और कैंसर जैसी घातक बीमारियों का जिक्र है। उत्तर प्रदेश, बिहार तथा पश्चिम बंगाल में गंगा के किनार बसे लोगों में भारी संख्या में आर्सेनिक से जुड़ी बीमारियां हो रही हैं।
हरियाणा व छत्तीसगढ़ में भी असर
हरियाणा राज्य के अंबाला, भिवानी, फरीदाबाद, फतेहाबाद, हिसार, झज्जर, जींद, करनाल, पानीपत, रोहतक, सिरसा, सोनीपत व यमुनानगर के भूजल में आर्सेनिक की मात्रा भी मानकता से कहीं अधिक है। जबकि इन जिलों में गुडगांव, कैथल, कुरूक्षेत्र, महेन्द्रगढ़ के अलावा आर्सेनिक की मात्रा के साथ इन जिलों में लौह की सांद्रता भी अधिक पाई गई है। दूसरी और छत्तीसगढ़ का राजनन्दगांव मात्र एक ऐसा जिला है जिसके भूजल में निर्धारित 0.01 मिग्रा/लीटर की मानकता से अधिक भूजल में आर्सेनिक की मात्रा मौजूद है।
05Apr-2015

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

..तो एयर इंडिया के बेड़े से हटेंगे पुराने विमान!

-अगले साल तक आ जाएंगे सात और ड्रीमलाइनर
-विश्वस्तरीय सेवाओं के लिए जुड़ रहे 111 जहाज
ओ.पी. पाल
. नई दिल्ली
निजी विमानन सेवाओं से मुकाबला करने के लिए एयर इंडिया अब अपने बेड़े से पुराने विमान हटाने की तैयारी कर रही है। यात्रियों को विशिष्ट अनुभव प्रदान करने के लिए खरीदे गए सात और ड्रीमलाइन अगले साल तक आ जाएंगे। हालांकि शुरूआती दिनों में बोइंग ड्रीमलाइनर 787 भारत के लिए कुछ सुखद अनुभूति नहीं लेकर आया था। ड्रीमलाइनर के एयरफ्रेम, सॉμटवेयर और विंडशील्ड में क्रैक की लगातार आ रही लगातार आ रही शिकायतों ने एयर-एक्सपसर्टस की नींदें उड़ा दी थीं। भारत सरकार से करार के विपरीत ड्रीमलाइनर का कुल वजन सात टन ज्यादा पाकर 2008-06 में दिए गए 27 विमानों का सौदा विवादों में घिर गया था। बाद में करार के अनुरूप ड्रीमलाइनर की आपूर्ति सुनिश्चित करने के भरोसे के बाद इसी श्रृंखला में पहला विमान सितंबर 2012 में भारतीय एयरस्ट्रिप पर नमूदार हुआ था।
नागर विमानन मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2005-06 में इंडियन एयर लाइंस का एयर इंडिया में विलय करने के बाद भारतीय विमान सेवाओं को विश्वस्तरीय बनाने की कवायद में 27 ड्रीमलाइनर समेत कुल 111 अत्याधुनिक विमानों की खरीद के लिए आर्डर दिये थे, जिनमें 27 बी-787 बोइंग विमान ड्रीमलाइनर भी शामिल थे। फिलहाल एयर इंडिया के बेड़े में 20 ड्रीमलाइनर विमानों समेत 101 विमानों को शामिल किया जा चुका है। ड्रीमलाइनर विमानों के अलावा एयर इंडिया ने आठ बी-777-200एलआर, 15 बी-777-300ईआर, 18 बी-737, चार ए-320, 19 ए-319 तथा 20 ए-321 विमानों की खरीद के लिए आर्डर दिया था। इनमें से अभी सात बी-787 ड्रीमलाइनर तथा तीन बी-777-300 ईआर विमानों को एयर इंडिया के बेड़े में आना बाकी है। एयर इंडिया के प्रबंध निदेशक रोहित नंदन बीसवें ड्रीमलाइनर मिलने के दौरान कह चुके हैं कि बाकी विमानों को अगले वर्ष यानि 2016 तक कंपनी अपने बेड़े में शामिल कर लेगी। नागर विमानन मंत्रालय का दावा है कि बोइंग 787 ड्रीमलाइनर विमान एयर इंडिया को हो रहे घाटे को पाटने में भी किफायदी साबित हो रहे हैं। खासकर र्इंधन और लम्बे सफर के लिये ज्यादा उपयुक्त नजर आ रहे हैं। जबकि बी-777-200एलआर विमानों से एयर इंडिया को र्इंधन व लंबे मार्गो के परिचालन में किफायती साबित नहीं हो पा रहे हैं। इसलिए बेड़े में शामिल आठ में से पांच को हटाकर उनकी बिक्री कर चुकी है।
तीन साल में पूरी होगी प्रक्रिया
नागर विमानन मंत्रालय के मुताबिक एयर इंडिया को आर्थिक रूप से मजबूत करने और सुरक्षित हवाई सेवा को विश्वसनीय बनाने की दिशा में नए और अत्याधुनिक विमानों को शामिल करने के सिलसिले के साथ ही बेड़े में शामिल पुराने यानि अप्रयोज्य विमानों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की नीति पर भी कार्य किया जा रहा है। हालांकि ऐसे पुराने विमानों को हटाने के लिए कोई समय-सीमा डीजीसीए ने अभी निर्धारित नहीं की है। डीजीसीए डा. प्रभात कुमार के अनुसार एयर इंडिया ही नहीं अन्य भारतीय विमानन कंपनियों के विमानों की प्रचालन क्षमता को भी सुरक्षित बनाने के लिए यह प्रावधान अपनाया जा रहा है। डीजीसीए के सूत्रों के अनुसार देश में विमानों के आयात करने के लिए उनकी आयु के लिए एक प्रावधान लागू किया गया है, जिसमें 15 वर्ष से अधिक आयु वाले दबावयुक्त तथा 20 वर्ष से ज्यादा दबाव रहित विमानों को अनुसूचित, गैर-अनुसूचित तथा सामान्य विमानन उद्देश्यों के लिए आयात करने की अनुमति नहीं दी जा रही है। डीजीसीए से स्पष्ट कर दिया है कि नियमानुसार उड़ान प्रशिक्षण संगठनों के लिए विनिर्माण वर्ष से लेकर 30 वर्ष से अधिक आयु वाले विमानों का उड़ान प्रशिक्षण गतिविधियों के लिए किसी भी कीमत पर उपयोग नहीं किया जाएगा। इसलिए निर्देश जारी किये जा चुके हैं कि तीन साल के भीतर या 31 जनवरी 2018 तक चरणबद्ध रूप से विमानों को बेड़े से हटाना होगा।
खरीद सौदों पर कैग सख्त
देश में नागर विमानन क्षेत्र के इस कार्य के निष्पादन पर आठ सितंबर 2011को संसद में पेश हुई कैग रिपोर्ट में एयर इंडिया में खरीद के आर्डर के बावजूद विमानों की आमद में विलंब का मुद्दा प्रमुख रूप से शामिल रहा था। कैग की रिपोर्ट की जांच में संसद की लोकलेखा समिति यानि पीएसी ने नागर विमानन के निष्पादन पर हुई कार्रवाही की रिपोर्ट तलब की, जिसे नागर विमानन मंत्रालय ने इसी साल आठ जनवरी को पीएसी के सुपुर्द किया। इसलिए यह मामला अभी पीएसी के पास विचाराधीन है। दरअसल नए बोइंग विमानों की खरीद के लिए एयर इंडिया ने अमेरिकी कंपनी से सौदा किया था, जिसमें विलंब के कारण एयर इंडिया को ड्रीमलाइनर और अन्य विमानों पर ऊंची वित्तीय लागत चुकानी पड़ी है और कैग रिपोर्ट के अनुसार एयर इंडिया को आर्थिक नुकसान को सहना पड़ा है, इन्हीं कारणों पर पीएसी ने नागर विमानन मंत्रालय की कार्रवाही की रिपोर्ट तलब करके कैग रिपोर्ट की जांच की है। मंत्रालय के अनुसार इस जांच रिपोर्ट का विमानों की खरीद और उनकी आमद या बिक्री प्रभावित नहीं होगी।
04Apr-2015

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

जनता परिवार के विलय की राह नहीं होगी आसान!



-समाजवादी जनता दल के नाम से सामने आ सकती नयी पार्टी
-संयुक्त दल के चुनाव चिन्ह को लेकर बना हुआ है असमंजस
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
भले ही जनता परिवार के बिछड़े दल फिर से एक छतरी के नीचे एकजुट होने का दावा करते हुए राजग और संप्रग के मुकाबले तीसरे विकल्प के रूप में संयुक्त राजनीतिक दल का गठन करने का दावा ठोक रहे हों, लेकिन इस कवायद को अंतिम रूप देने जा रहे इन छह दलों के विलय की राह आसान नहीं है। विलय के बाद समाजवादी जनता दल के नाम से नयी पार्टी सामने आने की उम्मीद है कि इस संयुक्त राजनीतिक दल के चुनाव चिन्ह को लेकर असमंजस बना हुआ है।
केंद्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में राजग सरकार बनने के बाद जनता परिवार के बिछड़े दलों समाजवादी पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल-एस, इंडियन नेशनल लोकदल और समाजवादी जनता पार्टी ने एकजुटता की हुंकार भरी थी। इस एकजुटता को मूर्त रूप देने के लिए सभी दलों का विलय करने का निर्णय लिया गया था। जदयू के महासचिव के.सी. त्यागी ने बताया कि ‘समाजवादी जनता दल’ नाम पर सभी दलों की सहमति बन रही है और बहुत ही जल्दी विलय को अंतिम रूप दे दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह गठजोड़ संसद में एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने के दायित्व को पूरा करेगा और जनहित के मुद्दों को उठाएगा। इस संयुक्त दल में अभी तक शामिल दलों के लोकसभा में 15 और राज्यसभा में 25 सांसद हैं। जबकि गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी दलों के इस कुनबे को बढ़ाने के लिए अन्य दलों को भी शामिल करने के लिए बातचीत करने का भी दावा किया जा रहा है। संयुक्त राजनीतिक दल के नामकरण को लेकर मैराथन मंथन के बाद पहले से ही सुझाव गये ‘समाजवादी जनता दल’ पर सहमति होने का दावा किया गया है।
दरअसल संयुक्त दल के नाम और इस गठजोड़ में अन्य छोटे और क्षत्रपों को जोड़ने की बागडौल सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को सौंपी गई थी। हाल में विलय के मुद्दे पर गत 27 मार्च को राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव एवं समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के साथ मैराथन विचार विमर्श हुआ और जल्द से जल्द सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को विलय की प्रक्रिया पूरी करने के लिए अधिकृत किया गया है। हालांकि त्यागी के अनुसार विलय पर अभी जद-एस प्रमुख एचडी देवगौड़ा एवं इनेलो प्रमुख ओम प्रकाश चौटाला से बातचीत करना बाकी है, जिसके लिए जल्द ही बैठक करके इस महाविलय को अंजाम दे दिया जाएगा। जनता परिवार का दावा है कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह की रालोद प्रमुख अजित सिंह से बातचीत हो चुकी है। जबकि ओडीसा में सत्तारूढ़ बीजू जनता दल व पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को भी इस मुहिम में साथ जोड़ने के प्रयास जारी हैं, जबकि वामदलो ने इस सियासी कवायद का पहले ही समर्थन किया है।
क्या होंगी मुश्किलें
राजनीतिक जानकारों की माने तो जनता परिवार का संयुक्त दल का गठन होने के बाद उसे नया चुनाव चिन्ह भी मिलना तय है। उस स्थिति में इस गठजोड में शामिल इन दलों के सामने चुनावों के दौरान नए चुनाव चिन्ह को जनता की कसौटी पर खरा उतारने की चुनौती का सामने होगी। मसलन यूपी में सपा की साइकिल, बिहार में लालू की लालटेन और जदयू का तीर और हरियाणा में इनेलो का चश्मा के अलावा अन्य दलों के चुनाव चिन्ह उनके अलग-अलग राज्यों के वोटरों में सिर चढ़कर बोलता रहा है। ऐसे में क्या इस महागठजोड़ के तले इसमें शामिल दल नये झंडे और चुनाव चिन्ह पर अपनी सियासी बिसात बिछाने में सफल हो सकेंगे? यह भी माना जा रहा है कि इसी मुद्दे पर भी विलय में विलंब हो रहा है और हो सकता है कि तीसरी ताकत खड़ी करने के बाद सभी दल अपने-अपने राज्यों में अपने दलों के झंडो व चुनाव चिन्ह पर ही चुनाव लड़ने पर सहमति बना सकते हैं।
बिहार पर नजर
लोकसभा चुनाव से सबक लेते हुए भाजपा व कांग्रेस से अलग एक अलग विकल्प तैयार करने में जुटे इन दलो की नजरे अगले साल बिहार और 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों पर है। इस महाविलय का मकसद इन राज्यों में मोदी व भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए सियासी जमीन मजबूत करना है।
चुनाव चिन्ह साइकिल हो: मुलायम
सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने जनता परिवार के दलों को एकजुट कर नई पार्टी को शक्ल देने में जुट गए हैं। इसके लिए उन्होंने पार्टी के पदाधिकारियों को नई पार्टी की जरूरत बताते हुए उनसे राय मांगी। मुलायम ने कहा है कि उनकी कोशिश है कि राष्ट्रीय स्तर पर सपा का चुनाव चिन्ह साइकिल ही रखने पर सभी दलों में सहमति बन जाए। पार्टी के तमाम पदाधिकारियों व नेताओं ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि वह इस पर पूरी तरह नेताजी के साथ हैं और वह कोई भी फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं। मुलायम ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर जब चुनाव होंगे तो नई पार्टी के झंडे, बैनर के साथ चुनाव में उतरा जा सकता है और राज्यों में चुनाव होने पर सबसे ताकतवर दल के झंडे व चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा जाएगा। ऐसी व्यवस्था नई पार्टी के लिए की जा रही है। मुलायम सिंह यादव ने बुधवार को इस मुद्दे पर पार्टी कार्यालय में जिलाध्यक्षों, शहर अध्यक्षों व दूसरे पदाधिकारियों की बैठक में यह बात की। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह यादव खासतौर पर मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि फिरकापरस्त ताकतों से निपटने के लिए जनता परिवार से जुड़े रहे धर्मनिरपेक्ष दलों को अब एक होने की जरूरत है। इसलिए सपा, जनता दल यू, राष्ट्रीय जनता दल, इनेलो व जनता दल सेकुलर व अन्य दलों राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पार्टी बनाएंगे। उन्होंने कहा कि कोशिश हो रही कि राष्ट्रीय स्तर पर साइकिल चुनाव चिन्ह पर सहमति बन जाए। उन्होंने स्पष्ट किया विधानसभा चुनाव में राज्यों में जो दल सबसे ज्यादा ताकतवर होगा, उसी का चुनाव चिन्ह व झंडा उस राज्य में प्रभावी होगा। ऐसी व्यवस्था करने की कोशिश हो रही है। कि सी भी वक्त इन दलों का विलय हो सकता है।
02Apr-2015






लोकसभा व राज्य विधानसभा चुनाव कराने की तैयारी!

अप्रैल में संसद में पेश होगी संसदीय समिति की रिपोर्ट
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्रीय चुनाव आयोग की चुनाव सुधार की जारी कवायद में चुनावी खर्च को नियंत्रित करने पर नजरें हैं। इसके लिए पिछले कई अरसे से उठाई जा रही मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने भी राज्य विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा के साथ ही कराने की तैयारी को शुरू कर दिया है, जिसके लिए 20 अप्रैल से शुरू होने वाले संसद सत्र के दौरान ऐसी संभावनाओं की जांच पड़ताल कर रही संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट पेश होने की उम्मीद है।
देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में राजनीतिक दलों की चुनाव में बेशुमार खर्च को नियंत्रित करने के लिए चुनाव आयोग लगातार राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों पर शिकंजा कसता आ रहा है, लेकिन इसके बावजूद राजनीतिक दलों को मिलने वाले बेनामी  चंदे पर नियंत्रण करने हेतु विधि आयोग की सिफारिशों के आधार पर चुनाव आयोग एक मजबूत कानून की वकालत भी कर रहा है। देश पर चुनाव के कारण पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करने के लिए पिछले कई सालों से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक-साथ कराने की मांग पर समय-समय पर विचार-विमर्श भी किया जाता रहा है। इस दिशा में लोकसभा व राज्य विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने के एक मसौदा प्रस्ताव को मोदी सरकार ने शीतकालीन सत्र के दौरान संसद में पेश किया था।
राज्य विधानसभा और लोकसभा के चुनावों को साथ-साथ कराने की संभावना को तलाशने के लिए सरकार द्वारा लाए गये ऐसे प्रस्ताव को राज्यसभा की विभाग संबन्धित कार्मिक, लोक शिकायत विधि और न्याय संबन्धी संसदीय स्थायी समिति को सौंपा गया था। राज्यसभा सदस्य डा. ई.एम. सुदर्शन नाच्चीयप्पन की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने राज्य विधानसभा चुनावों को लोकसभा चुनाव के साथ कराने की संभावना के लिए राजनीतिक दलों, राज्यों की संस्थाओं और विशेषज्ञों के साथ विचार विमर्श किया है। वहीं समिति ने इस दिशा में ऐसे लोगों को सुझाव और सकारात्मक विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया है। इसके लिए समिति ने 20 अप्रैल तक का समय दिया है। इन सुझावों और विचारों पर संसदीय समिति विचार करके ऐसी संभावनाओं को अंतिम रूप देकर समीक्षा करेगी और अपनी रिपोर्ट संभवत: 20 अप्रैल से 8 मई तक चलने वाले संसद के सत्र के दौरान दोनों सदनों में पेश करेगी। सरकार को उम्मीद है कि इस रिपोर्ट की सिफारिशों और टिप्पणियों की समीक्षा के बाद सरकार समुचित एक विधेयक का मसौदा तैयार करके उसे संसद में पेश करेगी।
चौथी लोकसभा के बाद टूटा चक्र
लोकसभा के साथ इससे पहले भी एक साथ चुनाव कराए जा चुके हैं। मसलन देश में पहले चार चुनाव यानि 1951-52, 1957, 1962 और 1967 के दौरान लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए गये थे। हालांकि 1968 और 1969 में कुछ विधान सभाओं के भंग होने और 1970 में लोकसभा के समय पूर्व भंग होने से यह चक्र टूट गया था, जिसने आज तक पूर्व स्थिति में आने का नाम नहीं लिया। यह भी नहीं उसके बाद कुछ राज्य में ऐसी स्थिति बनी जिसमें लोकसभा के साथ चुनाव कराये गये। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के साथ ही आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, ओडिसा और सिक्किम की विधानसभा के चुनाव भी हुए हैं।
01Apr-2015