एक जमाना था जब लोग अपने घरों के बाहर लिखते थे-अतिथि देवो भव: फिर शुरू किया-शुभ लाभ और बाद में लिखा जाने लगा-यूं आर वेलकम अब शुरू हो गया-......से सावधान!
सोमवार, 3 मई 2021
आजकल: विनिवेश का रणनीतिक फैसल उचित नहीं
--अश्वनी महाजन,
राष्ट्रीय सह-संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच-----------
देश में जब से निजीकरण का दौर शुरु हुआ है जब से माना जा रहा है कि आर्थिक सुधरों में विनिवेश एक पक्ष है। स्वदेशी जागरण मंच सरकार के विनिवेश और निजीकरण का विरोधी नहीं है, लेकिन विनिवेश को लक्षित करने का सरकार ने जो खाका तैयार किया है उसका तरीका सही नहीं है, बल्कि इसके बजाए इक्विटी के रूप में विनिवेश को कमाई का जरिया बनाया जाना चाहिए। आमतौर पर विनिवेश में 26 या 51 फीसद हिस्सा सरकारी कंपनी के पास रखा जाता है और शेष रणनीतिक भागीदार को हस्तांतरित कर दिया जाता है। हालांकि सरकार ने निर्णय लिया है कि वह कई सार्वजनिक उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी को 51 प्रतिशत से कम करेगी। भारत में वर्ष 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय विनिवेश का सफर शुरू हुआ था। इसके बाद दस साल यूपीए शासन काल में विनिवेश थमी सी रही। इसके बाद वर्ष 2014 में भाजपा की अगुवाई में मोदी सरकार ने माना कि कारोबार चलाना सरकार का काम नहीं है के साथ ही विनिवेश के इस सफर को आगे बढ़ाना शुरू किया।
इसी विनिवेश नीति के तहत मोदी सरकार ने वित्त वर्ष 2021-22 के लिए बजट में विनिवेश के जरिए 1.75 लाख करोड़ रुपये की कमाई का लक्ष्य रखा है। इसके लिए सैद्धांतिक रूप से आगे बढ़ना जरुरी है और मूलत: व्यवसाय निजी हाथों में लाने के लिए निजी उद्यमशिलता बढ़े। यह हमारा मानना है कि यदि सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों में कोई इंसेटिव नहीं होता और वह व्यवसाय को विस्तार नहीं दे सकते। मसलन विनिवेश लक्षित होने के बजाय शेयर यानि इक्विटी के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए, जिससे व्यवसाय का विकास भी होगा और प्रेरणा भी मिलेगी। हालांकि सरकार की सैद्धांतिक सोच पर हमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन पब्लिक सेक्टर एक प्रमुख विषय है जिसकी वास्तविक्ता को स्वीकार करते हुए पब्लिक सेक्टर में भारी विनिवेश हो। लेकिन यदि किसी संस्थान को बेचते हैं तो ब्यूरोक्रेट का अधिकार नहीं होना चाहिए। जब जनता विनिवेश करेगी तो अच्छे दामों पर बेचने की नीति होनी चाहिए।
सरकार के विनिवेश को लक्षित करने का तरीका सही नहीं है। स्वदेशी जागरण मंच का मानना है कि इस तरीके पर सरकार पर सवाल खड़े हो सकते हैं और अटल सरकार के समय में भी संतूर होटल को लेकर इस प्रकार का बखेडा हो चुका है। मौजूदा सरकार सैद्धांतिक रूप से विनिवेश के लिए सही कदम उठा रही हो, लेकिन वह रणनीतिक नहीं होना चाहिए। शेयर यानि इक्विटी के रूप में विनिवेश को हम इसलिए सही मान रहे हैं कि यदि शेयर मार्केट में बेचते हैं तो शेयर किसी के भी हाथ में हो, लेकिन अपने देश के लोगों में शेयर लेकर बांटने से कोई अंतर नहीं होगा। माना कि संस्थान की सहेत सही नहीं है और सरकार उसे बचने की बात करती है तो उसमें सरकारी नियंत्रण नहीं होना चाहिए, बल्कि शेयर के दाम बढ़ने पर उसे बेचा जा सकता है। हालांकि सारे शेयर बेचना भी उचित नहीं है। इसलिए विनिवेश को लक्षित करने और बजट घाटे का सौदा बनाने के बजाए दीर्घकालीन नीति के तहत होना जरूरी है। बजट के दौरान ही सरकारी सेक्टर की जीवन बीमा कंपनी एलआईसी का आईपीओ लाने का भी ऐलान किया गया है। इसके अलावा सरकार ने बीपीसीएल, एयर इंडिया, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया, कंटेनर कॉरपोरेशन, आईडीबीआई बैंक, बीईएमएल जैसी कंपनियों में स्ट्रैटेजिक डिसइनवेस्टमेंट को भी 2021-22 के दौरान पूरा कर लेने पर जोर दिया गया है। सरकार इस रणनीतिक विनिवेश के पहले चरण में भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड और शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया सहित पाँच पीएसयू के कुछ भाग की बिक्री करने की योजना है। इसके अलावा सरकार की देश में बेकार पड़ी सरकारी संपत्तियों को बेचकर 2.5 लाख करोड़ रुपये जुटाने की योजना पर भी काम कर रही है, जिसमें सरकार का मानना है कि जनता के पैसे का सदोपयोग हो। सरकार का एयर इंडिया के विनिवेश का फैसला भी उचित नहीं है, सभी ने देखा है कि कोविड-19 के दौरान खाड़ी देशों में फंसे भारतीयों को स्वदेश लाने में एयर इंडिया ने अपनी अहम भूमिका निभाई है। सरकार निजीकरण और विनिवेश की नीति के जरिए देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए बेहतर कदम उठा रही है, लेकिन देश में कई निजी क्षेत्र के उद्यम बेहतर काम कर सकते है बेशर्ते उन पर सरकारी अंकुश न हो। इसलिए हर उद्यम या संस्थान केा उद्यमशिलता की प्राथमिकता होना जरुरी है।
-----(ओ.पी. पाल से बातचीत पर आधारित)----
04Apr-2021
सर्वेक्षण: रहने लायक शहरों में हरियाण के गुरुग्राम समेत तीन शहर शामिल
देश में ईज ऑफ लिविंग व नगर निगम कार्य निष्पादन सूचकांक जारी
हरियाण के गुरुग्राम समेत तीन शहर शामिल
गुरुग्राम ने टॉप टेन शहरों में बनाई जगह
ओ.पी. पाल.रोहतक।
केंद्र सरकार ने गुरुवार को एक ऑनलाइन सर्वेक्षण के आधार पर दस लाख और उससे कम आबादी वाले 111 प्रमुख शहरों के लिए ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स (ईओएलआई) 2020 और 114 शहरों के लिए नगर पालिका परिषद या नगर निगम कार्य निष्पादन सूचकांक (एमपीआई) 2020 की रैंकिंग जारी की है। इसमें हरियाणा राज्य के गुरुग्राम, करनाल और फरीदाबाद शहर भी शामिल किये गये हैं, जिनमें गुरुग्राम देश के टॉप टेन शहरों में शामिल है, जबकि नगर निगम के सूचकांक में करनाल ने देश में चौथे स्थान पर जगह बनाई है।
देश में ईज ऑफ लिविंग यानि जीवन जीने की सुगमता के सूचकांक में हरियाणा का गुरुग्राम आठवीं रैंकिंग के साथ टॉप टेन में शामिल है, जिसे 56 अंक मिले हैं। जबकि नगर पालिका कार्य निष्पादन सूचकांक में गुरुग्राम 45.84 अंक लेकर 15वीं रैंकिंग लेने में कामयाब रहा। राज्य के करनाल शहर ने भी ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स में 15वीं रैंकिंग हासिल की है, तो नगर पालिका कार्य निष्पादन सूचकांक में करनाल देश में चौथी रैंकिंग हासिल करने में सफल रहा। हरियाणा के तीसरे शहर के रूप में फरीदाबाद शहर को 51.26 अंक के साथ ईज ऑफ लिविंग और 41.45 अंक के साथ नगर पालिका कार्य निष्पादन यानि दोनों सूचकांक में 40वीं रैंकिंग दी गई हैं।
गुरुग्राम: जीवन जीने की सुगमता के लिए गुरुग्राम के सर्वे में शामिल प्रमुख मानकों के तहत 53.30 अंक के साथ जीवन की गुणवत्ता में 21वीं, 32.50 अंकों के साथ आर्थिक क्षमता में 2वी, स्थिरता में 57.34 अंकों के साथ 14वीं, सिटीजन पर्सेप्शन में 70 अंकों के साथ 51वीं रैंकिंग मिली है। जबकि नगर पालिका परिषद कार्य निष्पादन सूचकांक के मानकों के तहत गुरुग्राम नगर निगम को सर्विस में 57.07 अंकों के साथ 22, फाइनेंस में 58.05 के साथ 7, प्लानिंग में 29.34 के साथ 30, टेक्नोलॉली में 19.61 के साथ 32 और गवर्नेस में 48.83 के साथ 12वीं रैंकिंग मिली है।
करनाल: हरियाणा के करनाल शहर को जीवन जीने की सुगमता के लिए प्रमुख मानकों के तहत 51.73 अंक के साथ जीवन की गुणवत्ता में 30, आर्थिक क्षमता में 3.88 अंकों के साथ आर्थिक क्षमता में 44, स्थिरता में 70.65 अंकों के साथ एक और सिटीजन पर्सेप्शन में 72.20 अंकों के साथ 45वीं रैंकिंग हासिल हुई है। जबकि नगर पालिका परिषद कार्य निष्पादन सूचकांक के मानकों के तहत करनाल नगर निगम को सर्विस में 61.91 अंकों के साथ 6वीं, फाइनेंस में 50.24 के साथ 37, प्लानिंग में 39.51 अंक के साथ 16, टेक्नोलॉली में 34.33 के साथ चौथी और गवर्नेस में 58.48 अंक के साथ दूसरी रैंकिंग मिली है।
फरीदाबाद: राज्य के फरीदाबाद शहर को जीवन जीने की सुगमता के लिए प्रमुख मानकों के तहत 45.57 अंक के साथ जीवन की गुणवत्ता में 45, आर्थिक क्षमता में 14.10 अंकों के साथ आर्थिक क्षमता में 22, स्थिरता में 53.18 अंकों के साथ 36 और सिटीजन पर्सेप्शन में 75.20 अंकों के साथ 30वीं रैंकिंग मिली है। जबकि नगर पालिका परिषद कार्य निष्पादन सूचकांक के मानकों के तहत फरीदाबाद नगर निगम को सर्विस में 47.01 अंकों के साथ 44वीं, फाइनेंस में 48.07 अंक के साथ 39वीं, प्लानिंग में 47.22 अंक के साथ 16वीं, टेक्नोलॉली में 19.96 के साथ 41वीं और गवर्नेस में 38.25 अंक के साथ 40वीं रैंकिंग हासिल हुई है।
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हरियाणा: तीन शहरों में 5 पिलरों और 100 संकेतकों पर युवा वर्ग ने लिया सर्वे में हिस्सा
पहली बार हुआ नगर निगमों के प्रदर्शन पर सर्वेक्षण
हरिभूमि न्यूज.रोहतक।
केंद्र सरकार द्वारा जारी ईज ऑफ लिविंग और नगरपालिका कार्य निष्पादन सूचकांक में हरियाणा के गुरुग्राम, करनाल और फरीदाबाद शहर भी शामिल किये गये हैं। इस सर्वेक्षण के लिए पूरे देश में दोनों सूचकांक शहरी जीवन के विभिन्न मापदंडों के बारे में शहरों के कार्य प्रदर्शन का पता लगाने के प्रयास में हरियाणा में युवा वर्ग को शामिल किया गया गया।
खासकर इन दोनों सूचकांक में प्रदर्शन रैकिंग के लिए हरियाणा के इन तीन शहरों में 5 पिलरों और 100 संकेतकों में 18 से 35 आयुवर्ग और उससे ऊपर के साथ की गई बातचीत के आधार को शामिल किया गया है। हरियाणा के गुरुग्राम में ईओएलाई के लिए सिटीजन परपेक्शन में युवा पुरुषों ने 74.94 और महिलाओं ने 72.28 अंक दिये, जबकि इससे अधिक आयु वर्ग के पुरुषों ने 73.96 तथा महिलाओं ने 72.69 अंक दिये। जबकि करनाल में 18 से 35 आयु वाले पुरुषों ने 71.13 व महिलाओं ने 73.99 अंक दिये, जबकि इससे अधिक आयु वाले पुरषों ने 70.81 और महिलाओं ने 73.04 अंक तक का आंकड़ा पहुंचाया। इसी प्रकार फरीदाबाद शहर की बात की जाए तो से 35 आयु वर्ग के पुरुषों ने 73.68 और महिलाओं ने 72.83 अंक दिये। जबकि इससे ऊपर आयु वर्ग के पुरषों ने 74.94 और 73.45 महिलाओं ने अंक देते हुए इन संकेतकों में सकारात्मक भूमिका निभाई जिनकी बदौलत राज्य के तीनों शहर इन दोनों संकेतकों की रैंकिंग में शामिल हुए।
------------------ऐसे किया गया तकनीक पिलरों का इस्तेमाल------------------
इस मूल्यांकन में सिटीजन पर्सेप्शन सर्वे (सीपीएस) के माध्यम से नगर के प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराई गई सेवाओं के बारे में नागरिकों के दृष्टिकोण भी शामिल किये गये हैं। इसमें तकनीक पिलर में कैसे तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, प्लानिंग में कैसे शहर कि विकास के लिए प्लानिंग करके काम किया जा रहा है। वहीं प्रशासन कैसा है जिससे लोगों को फायदा हो रहा है। इनके तहत ही साफ-सफाई, स्वास्थ्य, रजिसट्रेशन और परमिट जैसे नगर निगमों के कामों को शामिल किया गया है। इन तीनों शहरों में ईज ऑफ लिविंग के पाचं पिलरों में लोग जीवन की गुणवत्ता से 35 फीसदी, सिटीजन परपेक्शन में 30 स्थिरता में और आर्थिक क्षमता में 15 फीसदी हिस्से में विभाजित किया गया। इन सबके अंक देकर उनकी समीक्षा करने के बाद इन नगर निगमों की रैंकिंग की गई। हालांकि 5 पिलरों में नगर निगमों की सेवाएं, आर्थिक स्थिति, पॉलिसी, तकनीक और प्रशासन कैसा है को भी खासतौर से शामिल किया गया। रैंकिंग करते वक्त नगर निगमों की सेवाओं में लोगों को साफ पानी, शहर का इंफ्रास्ट्रेक्चर, शिक्षा जैसी कैटगरी शामिल की गई है जिसमें वित्तीय स्थिति में रेवेन्यू की स्थिति के साथ ही बजट का प्रबंधन कैसे किया जा रहा है, जैसे बिंदुओं को सर्वे का हिस्सा बनाया गया।
----------------ऐसे किया गया प्रदर्शन का मूल्यांकन----------------
सरकार के ईओएलआई इंडेक्स की तरह एमपीआई 2020 के तहत मूल्यांकन ढांचे में जनसंख्या के आधार पर तीनों जिलों के नगर निगमों को दस लाख से अधिक जनसंख्या वाली नगरपालिका और 10 लाख से कम आबादी के आधार पर श्रेणीबद्ध किया गया है। एमपीआई द्वारा तीनों नगर निगमों के लिए इस मूल्यांकन सेवाएँ, वित्त, नीति, प्रौद्योगिकी और शासन पाँच वर्टिकलों में क्षेत्रवार किए गए प्रदर्शन की जांच की गई। हालांकि ईओएलआई के दायरे को बढाकर इसे अधिक मजबूत बनाने के लिए देश में पहली बार नगर निगम या नगरपालिका कार्य प्रदर्शन सूचकांक मूल्यांकन किया गया है। जिसमें हरियाणा के करनाल नगर निगम का बेहतर प्रदर्शन सामने आया।इसके सर्वेक्षण के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, जल और अपशिष्ट जल, एसडब्ल्यूएम और स्वच्छता, पंजीकरण और परमिट, बुनियादी ढांचा, राजस्व प्रबंधन, व्यय प्रबंधन, राजकोषीय जिम्मेदारी, राजकोषीय विकेंद्रीकरण, डिजिटल प्रशासन, डिजिटल पहुंच, डिजिटल साक्षरता, योजना तैयार करना, योजना लागू करना, योजना प्रवर्तन, पारदर्शिता और जवाबदेही, मानव संसाधन, भागीदारी और प्रभावशीलता जैसे 20 विभिन्न क्षेत्र को चुना गया। इसी प्रकार ईओएलआई का मूल्यांकन जीवन की गुणवत्ता और शहरी विकास के लिए विभिन्न पहलों यानि जीवन की गुणवत्ता, शहर की आर्थिक क्षमता, स्थिरता और लचीलापन के आधार पर किया गया। इस मूल्यांकन में सिटीजन पर्सेप्शन सर्वे (सीपीएस) के माध्यम से नगर के प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराई गई सेवाओं के बारे में नागरिकों के दृष्टिकोण भी शामिल किये गये हैं। नगर निगम के कार्य प्रदर्शन सूचकांक का मकसद उनकी कार्यक्षमता और उनकी विकास क्षमताओं की सीमा के बारे में सक्षम जानकारी को पारदर्शी बनाना है।
05Mar-2021
भारत और बांग्लादेश के रिश्तों का नया अध्याय की शुरूआत
-डा. स्वर्ण सिंह, प्रोफेसर जेएनयूू
गत सप्ताह बांग्लादेश की स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगाँठ के उत्सव के समापन समारोह को लेकर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दो दिवसीय यात्रा ऐतिहासिक रही। यह प्रधानमंत्री मोदी की कोविड-19 सर्वव्यापी महामारी के चलते पहली विदेश यात्रा थी और इसमें दोनो देशों में व्यापार, तकनीक, प्राकृतिक वापदायों, खेल और युवाओं को लेकर कुल पाँच संधियों पर हस्ताक्षर हुए।
दोनो राजनेतायों ने सभी प्रकार के आतंक से लड़ने और शांति बनाए रखने प्रतिवधता दोहरायी और कई नयी परियोजनाओं का उद्घाटन भी किया जिसमें भारत-बांग्लादेश सीमा पर तीन नई हाट और ढाका से भारत के जलपायदुड्डी के बीच ‘मितली इक्स्प्रेस’ रेल सेवा शुरू करना था। पहले से ही ढाका-कोलकाता ‘मैत्री रेल’ और खुलना-कोलकाता ‘बंधन रेल’ दोनो देशों में यातायात का सफल परीक्षण रही हैं। प्रधान मंत्री मोदी ने भारत की और से 109 आधुनिक रोगी वाहन, 1.2 करोड़ वेक्सिन खुराक भेंट के रूप में दिए और आशुगंज में 1971 के बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय शहीदों के स्मारक और रविंद्र भवन कूठीवरी के विकास की नींव भी रखी और लड़कियों के लिए एक स्कूल और इश्वरिपूर के जेशोरेश्वरी काली मंदिर में कम्यूनिटी हॉल बनाने का प्रस्ताव किया। हालांकि मोदी की यात्रा से पहले दक्षिण एशियाई देशों के चार और राष्ट्र अध्यक्षों ने भी इस उत्सव में शिरकत की, लेकिन बांग्लादेश की आजादी में भूमिका को लेकर कृ और खासकर भारत-बांग्लादेश के गहरे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषा को लेकर गहन रिश्तों के चलते कृ भारत का बंगलादेश के स्वतंत्रता संग्राम और तबसे इन पिछले ५० वर्षों के इतिहास में योगदान और भी अहम हो जाता है।
आज के संदर्भ में देखें तो भारत दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी आर्थिक व्यवस्था और बांग्लादेश की सबसे समृद्ध व तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था के चलते इनका आपसी तालमेल बढ़ना स्वाभाविक है। बांग्लादेश को आज विकास का उदाहरण माना जाता है। वह अपनी स्वतंत्रता के 50वें उत्सव में यह दर्शाता है कि बांग्लादेश के लिए राजनेताओं का पाकिस्तान से अलग होने का निर्णय कितना सटीक और ठीक था। आज ज्यादातर मापदंडो में पाकिस्तान से बांग्लादेश बहुत आगे निकल चुका है। खासकर जब पाकिस्तान आतंक और भारी कर्ज से जूझ रहा हैं तो बांग्लादेश अपने महिलाओं को रोजगार मुहाय्या करने, बड़े पायमाने पर कपड़ों के निर्यात करने, और गरीबी से लोगों को उबारने के लिए पूरे विश्व को अपनी सफलता का अहसास कर चुका है। बांग्लादेश की यह कामयाबी और भी आकर्षित करती है, जब हम उसके 1971 के स्वतंत्रता संग्राम में वहां के लाखों लोगों की शहादत, 1975 में शेख मुजीबुर्रहमान के साथ साथ सैकड़ो राजनेताओं की सेना द्वारा हत्या और उसके बाद कई सालों तक सैन्य शासन और फिर यहां के लोगों को लगातार प्राकृतिक आपदाओं को झेलते देखते हैं। यह सब इस ५०वीं वर्षगाँठ को बहुत गौरतलब बना देता है।
दूसरी ओर कोरोना सर्वव्यापी महामारी में भारत मैं विश्व के 60 फीसदी वैक्सीन का उत्पादन कर ‘फार्मसी ओफ द वर्ल्ड’ बनकर उभरा हैं और पूरे विश्व को इस चुनौती से लड़ने में सहायक सिद्ध हो रह है। इसका सीधा फायदा बांग्लादेश को मिल भी रहा है। इसलिए बांग्लादेश आज भारत का बहुत अच्छा आर्थिक हिस्सेदार हो सकता हैं।। यह शायद अकेला पड़ोसी देश है यहाँ प्रधान मंत्री शेख हसीना की अगवाई में सामाजिक और राजनैतिक स्थिरता के साथ साथ बांग्लादेश ने अपनी विदेश नीति में भी संतुलन बनाये रखा है। इसलिए आपसी हिस्सेदारी से बंगलादेश आज भारत का की ‘पहले पडोस’, ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘हिंद प्रशांत’ की नितीयों में भी मूल्यावान साझेदार साबित हो सकता हैं। याद रहे कि दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन, यानी सार्क कृ जिसकी शुरुआत बांग्लादेश ने की थी कृ पिछले पांच साल से निष्क्रिय है।
2015 में हुए इसके काठमांडू शिखर सम्मेलन के बाद इसका कोई शिखर सम्मेलन नहीं हो पाया। इन पाँच सालों मैं क्षेत्रिये समीकरण बनाए रखने मैं एक दूसरा क्षेत्रिये संगठन जो उभर कर सामने आया हैं वो सात देशों का बंगाल की खाड़ी का बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग संगठन, यानि बिम्सटेक, है। बिमसटेक का सचिवालय भी ढाका, बांग्लादेश में है। खासबात यह है कि इस संगठन में दक्षिण और दक्षिण पूर्व ऐसा के बांग्लादेश, भूटान, भारत, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका तथा थाईलैंड शामिल है। यानी बिमसटेक एक तो दक्षिण और दक्षिणपूर्व क्षेत्रों को जोड़ता हैं और फिर भारत के लिए ‘सार्क’ की तरह इसमें चीन व पाकिस्तान नहीं है। जिस तरह से भारत की कवायद में यह बिमसटेक प्लेटफार्म मजबूत होता जा रहा है तो यह भी भारत-बांग्लारदेश का आपसी तालमेल को बनाए रखने को और भी महत्वपूर्ण बना देता है।
हालांकि भारत और बांग्लादेश के बीच कुछ जटिल मुद्दे भी है, जिन पर सहमति बनाना जरुरी है। इनमें तीस्ता नदी जल बंटवारा प्रधान मंत्री मोदी की 2015 यात्रा से लंबित है। इसके बाद व्यापार और निवेश को लेकर ‘व्यापक आर्थिक हिस्सेदारी’ पर संधि की वातचीत भी 2018 से चल रही है। इसके चलते, भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय व्यापार, जो पिछले एक दशक में लगातार बढ़कर 2018 तक ११ अरब डॉलर तक पहुँच गया था, उसमें पिछले दो सालों में गिरावट आयी है। इसमें गत वर्ष में आयी गिरावट का कारण कोरोना महामारी भी रहा।
इसके अलावा यह आपसी व्यापार पूरी तरह से एकतरफा हो चुका है और उसमें संतुलन लाकर ही उसे आगे बढ़ाया जा सकता हैं। इसलिए बांग्लादेश आज भारत से उसके सब निर्यात पर शून्य टेरिफ चाहता है और वह सभी ‘नॉन -टेरिफ’ नियंत्रणो को समाप्त करने की भी माँग करता हैं। महामारी के चलते भारत ने जो पड़ोसी देशों से आवागमन और निवेश पर खास अंकुश लगाए थे वह उनको हटाने की माँग करता है। ई-वीजा की माँग करता हैं। तीस्ता नदी के जल प्रवाह में दिसम्बर-मार्च में 50 फीसदी हिस्से का दावा करता है जबकि यह नदी सिक्किम और पश्चिम बंगाल से हो कर गुजरती है और वहाँ इसके पानी कि खपत होती है। इसके अलावा बंगलादेश की माँगो को मान में जाहिर हैं कि भारत को अपनी कुशल श्रमशक्ति, छोटे और लघु उद्योगों और दूसरे राष्ट्रहितों को ध्यान में रखना होगा। आज भारत-बांग्लादेश के राजनेताओं में बढ़ते तालमेल, दोनो की आपस में और अपने क्षेत्र और विश्व मैं बढ़ती हुई साख के साथ साथ अपने जमीन पर सड़क, रेल, वायु और जल मार्गों में लगातार बढ़ती संयोगिकता से यह उम्मीद बनती है कि दोनो सरकारें अपने लोगों की बढ़ती हुई क्षमता, उद्यमिता, और उत्साह को सही दर्शन और दिशा निर्देशन देने में कामयाब होंगे।
-----(ओ.पी. पाल से बातचीत पर आधारित)---
02Apr-2021
चौपाल: हरियाणावी होली की परंपरा में में मिठास विलुप्त: मलिक
----आधुनिकता के प्रभाव ने खत्म की भाईचारे की भावनाएं
ओ.पी. पाल----
होली केवल रंगों का त्योहार ही नहीं है, बल्कि सामाजिक सद्भावना और भाईचारे का पर्व है। सदियों ने नए साल का आगाज होने से पहले फागुन महीना शुरू होते ही गीतों के माध्यम से देवी-देवताओं का सुमिरन का दौर शुरू हो जाता था। बुजुर्ग, युवा व बच्चे एक अपनी संस्कृति और पंरपरा के अनुसार बिना किसी भेदभाव के होली के लिए मिलकर सहयोग करते थे। लेकिन आज इस आधुनिक और भौतिकवाद युग ने पुरानी परंपरा और संस्कृति के साथ मनाए जाने वाले होली पर्व की इन परंपराओं और रिती रिवाज को गुजरे जमाने के इतिहास में बंद कर दिया।
हरियाणा के कलाकार रघुवेन्द्र मलिक ने होली के रंगो के बदरंग होने का कारण हरियाणवी संस्कृति भाईचारे की भावनाएं विलुप्त होना बताया। हरिभूमि संवाददाता से विशेष बातचीत के दौरान मलिक ने आज के जमाने की होलिका दहन और होली रंग में बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे अपने नेक रिश्तों के अनुसार होली का रंग लगाकर परंपराओं को निभाते थे और प्राकृतिक रंगों में अबीर-गुलाल लगाकर एक दूसरे को होली पर्व की बधाई देते थे। युवा और बच्चें इस पर्व पर बुजुर्गों के पैरों पर अबीर लगाकर आशीर्वाद लेते थे और एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर पर्व की बधाई भी देते थे। उस वक्त लोगों के बीच आपसी भाईचारा दिखता था, लेकिन आज के दौर में होली पर्व पर लोग आपसी दुश्मनी का बदला लेने में जुटे हैं। जिसके कारण सभ्य लोग घर से बाहर भी निकलना नहीं चाहते हैं। और लोगों के बीच आपसी भाईचारा समाप्त होता दिख रहा है। कहने का तात्पर्य है कि आज फूहड़ गीत लोगों के सामने परोसे जा रहे हैं। इससे मारपीट और अपराधिक घटनाएं बढ़ने की वजह से सभ्य परिवार के लोग होली खेलने से परहेज करने लगे हैं।
होली के गीतों में भी मिठास लुप्त
इस आधुनिक युग में होली पर्व मनाने की हरियाणवी संस्कृति और परंपरा के साथ हरियाणवी होली गीतों का स्वरुप भी बदल रहा है। मसलन आज के दौर में फिल्मी गीतों पर आधारित बोल सुनाई देते हैं। जबकि हरियाणा में होली के त्योहार मनाने के लिए बुजुर्ग, युवा व बच्चों के साथ महिलाएं भी एक साथ पुरानी संस्कृति में समाए रहते थे और देवी-देवताओं पर आधारित होली गीत गाए जाते थे। हालांकि कुछ ग्रामीण इलाकों में आज भी परंपरागत गीत की धुन सुनाई पड़ती है। होली के गीतों के बारे में मलिक का कहना है कि हरियाणवी होली गीत 'गजबण होली खेलण आई' के बोल की आज धुन भी बदल गई है और वीडियों में तब्दील हो गया है एसे ही कई सारे गीत हैं जो होली के मौके पर भी हरियाणवी भाषा और लोकगीत के बदले सुर में सुनाई देते हैं।-----------------
रघुवेन्द्र मलिक का संक्षिप्त परिचय
-बदलते परिवेश में पुरानी रोहतक निवासी रघुवेन्द्र मलिक वर्ष 1988 से हरियाणवी संस्कृति और परंपराओं जुड़ी पौराणिक वस्तुओं का देशभर के विभिन्न राज्यों से संकलन करते आ रहे हैं। उनका मकसद हरियाणवी संस्कृति को बचाए रखना है। हालांकि इससे पहले 1970 से ही उन्होने थियेटर और 1979 से नाटक और उसके बाद फिल्मों में अभिनय करना शुरू किया। सबसे पहले श्याम बेनेगल के साथ फिल्म में अभिनेता के रूप में काम शुरू किया,जिसके बाद हरियाणवी भाषा, संस्कृति, परंपरा, सामाजिक रीति रिवाज को प्रोत्साहन देने वाली दर्जनों फिल्मों में प्रमुख अभिनेता के रूप में भूमिका निभाई है।
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हुडदंग में बदल गई होली की मस्ती-----मीनू हुड्डा, कलाकार
होली का नाम आते ही रंगों में सराबोर होकर मस्ती में ढोल नगाड़ों की धुन पर थिरकते हुए लोगों का एक परिदृश्य बनता है। गुजिया की मिठास लिए हुए, मर्यादाओं को सहेजे हुए, सब प्रकार की दुर्भावनाओं से इतर मन से जुड़े सम्बंध त्योहार की आभा में चार चाँद लगा देते हैं। लेकिन बदलते वक्त के साथ ये परिदृश्य भी काफी हद तक बदल गया है। आज होली के नाम पर नशे में धुत्त होकर युवा गलियों में हुड दंग मचाते फिरते हैं। ग्रामीण परिवेश में भी लोग होली के मौके को खुन्दक निकालने का जरिया बना लेते हैं। रंगों की जगह कीचड़ या गोबर का प्रयोग करते हैं। लेकिन ये इच्छित बदलाव नहीं हैं और निसंदेह इन्हें समाज और संस्कृति के लिए हितकारी नहीं कहा जा सकता। त्योहार का असल मजा तब है जब भीतर पनपी हुई दुर्भावनाओं का दहन कर मूल सच्चाई से खुद को अवगत कराया जाए और सौहार्द पूर्ण तरीके से जीवन जिया जाए।
29Mar-2021
मंडे स्पेशल: हरियाणा के सिर पर सजा है ‘बेरोजगारी’ ताज
बड़ा सवाल: निजी क्षेत्र में 75 प्रतिशत कैसे मिलेगा युवाओं को रोजगार!
उच्च शिक्षित बेरोजगारों में छोरों से ज्यादा छोरियां शामिल
राज्य में बढ़ती बेरोजगारी बनी युवा वर्ग के सिरदर्द का सबब!
ओ.पी. पाल. रोहतक।
हरियाणा में बेरोजगारी की समस्या कितनी विकराल है, उसका गवाह राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा राज्य के सर पर रखा ‘बेरोजगार’ दर का ताज है। देश में शीर्ष बेरोजगार दर वाले हरियाणा में राज्य सरकार ने युवाओं को ज्यादा से ज्यादा रोजगार मुहैया कराने के लिए निजी क्षेत्र में जो 75 फीसदी आरक्षण भी लागू किया है। ऐसे हालातों में एक बड़ा सवाल नजर आ रहा है कि राज्य शिक्षित बेरोजगार युवाओं को रोजगार कैसे मिलेगा? वो भी जब राज्य सरकार ने मौजूदा वर्ष 2021-22 में हरियाणा के युवाओं को निजी क्षेत्र में न्यूजनतम 50 हजार नौकरियों से जोड़ने का लक्ष्य तय किया हो। रोजगार विभाग हरियाणा की सक्षम युवा के तहत रोजगार कार्यालयों के जरिये 3.58 लाख से ज्यादा ऐसे शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार की दरकार है, जिन्होंने पोस्ट ग्रेज्युएट, ग्रेज्युएट और 10+2 हायर सेंकेंडरी की शैक्षिक योग्यता के आधार पर 3 अपना पंजीकरण कराया हुआ है। खासबात ये है कि युवा वर्ग के इस पंजीकरण के आधार पर उच्च शिक्षा में छोरों से ज्यादा छोरियां रोजगार की तलाश में नजर आ रही हैं। यही नहीं छह थर्डजेंडर भी रोजगार की तलाश में रोजगार कार्यालय में पंजीकृत हैं।
देश में बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए हरियाणा सरकार ने केंद्रीय रोजगार सृजन की योजनाओं के अलावा हरियाणा के युवाओं के लिए कई योजनाएं शुरू की है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा रोजगार सृजन के मकसद से हरियाणा युवा नौकरी प्रोत्साहन योजना के जिला स्तर पर रोजगार मेले आयोजित करने के कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। राज्य सरकार की बेरोजगारी की दर को कम से कम लाने की दिशा में कई योजनाओं को सक्षम युवा के तहत पंजीकृत युवाओं को योग्यता के आधार पर रोजगार मुहैया कराने की प्रक्रिया भी अपनाई जा रही है। हालांकि इसके अलवा राज्य में सब्सिडीयुक्त प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत प्रधानमंत्री रोजगार योजना (पीएमआरवाई) और ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम यानि पीएमईजीपी के अलावा मनरेगा में भी रोजगार मुहैया कराया जा रहा है।
----------शिक्षित युवाओं को उम्मीदों की दरकार------------
हरियाणा में रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत 3,58,244 युवा-युवतियों में सबसे ज्यादा 1,84,351 युवा 10+2/हायरसेकेंडरी, 1,10,833 ग्रेज्युएट तथा 63,053 पोस्टग्रेज्युएट स्तर की शिक्षा ग्रहण करने वाले हैं। पोस्ट ग्रेज्युएट करने वालों में 18,195 युवा और 44,858 युवतियां, ग्रेज्युएट स्तर पर 53483 युवक और 57350 युवतियों के अलावा 10+2/हायरसेकेंडरी की शैक्षिक योग्यता के आधार पर रोजगार की तलाश में पंजीकृत सर्वाधिक 1,84,351 बेरोजगारों में 1,15,168 युवक और 69,183 युवतियां शामिल हैं। इनके अलावा सात थर्डजेंडर बेरोजगार भी शामिल हैं।
-----------यहां छोरियों ने छोरों को पछाड़ा ---------------
राज्य में हायर एजुकेशन के आधार पर युवकों से ज्यादा युवतियां बेरोजगारों में शामिल हैं। मसलन 9431 एमए युवकों के मुकाबले 26010, 1875 एमकॉम के सामने 7476, तो 2446 एमएससी युवाओं की तुलना में 6521 युवतियों को रोजगार चाहिए। यही नहीं एमसीए, एमफिल,एलएलएम, एमफार्मेसी, लाइब्रेरी साइंस की शिक्षा में भी युवक पीछें हैं। इसी प्रकार ग्रेज्युएट बेरोजगारों में भी बीए,बीकॉम,बीएसएससी जैसी शैक्षिक योग्यता में युवितयां बहुत आगे हैं।
---------सात र्थडजेंडरों को भी चाहिए रोजगार----------
हरियाणा में रोजगार की तलाश में युवा वर्ग ही नहीं, बल्कि शिक्षित थर्डजेंडर भी पीछे नहीं हैं। ऐसे बेरोजगारों में यमुनानगर से चार थर्डजेडरों ने रोजगार कार्यालय में पंजीकरण कराया है, जिनमें बीकॉम की योग्यता के आधार पर महक गर्ग और बी.फार्मेसी के आधार पर विकास शर्मा को रोजगार की तलाश है। जबकि एमएससी की योग्यता के साथ निधि गोयल और हायर सेकेंडरी के आधार पर प्रिंस सैनी ने अपना पंजीकरण कराया है। इसके अलावा हिसार रोजगार कार्यालय में एमए की योग्यता के आधार पर मुकेश कुमार, कैथल जिले में बीएससी योग्यता के आधार पर सपना तथा पानीपत में एमए की शैक्षित योग्यता पर जेजेकेके का पंजीकरण हुआ है।
----------कैथल जिले में सर्वाधिक बेरोजगार----------
हरियाणा के 22 जिलों में बेरोजगारों की संख्या में सर्वाधिक 40,784 बेरोजगार कैथल जिले में पंजीकृत हैं। इनमें 4936 पोस्ट ग्रेज्युएट, 10368 ग्रेज्युएट व 25480 हायरसेकेंडरी के बेरोजगार हैं। इन बेरोजगारों में 22,500 युवक, 18,283 युवतियां व एक थर्डजेंडर शामिल है। पंजीकृत बेरोजगार युवकों के मामले में जींद जिला दूसरे पायदान पर है, जहां 33463 बेरोजगारों में 19034 युवक व 14429 युवतियां शामिल हैं। इसके बाद यमुनानगर में 31686, हिसार में 31431 करनाल में 29172, रोहतक में 26472, भिवानी में 26462, कुरुक्षेत्र में 22575, सिरसा में 18023, फतेहाबाद में 17370, महेन्द्रगढ़ में 14588, अंबाला में 13837, सोनीपत में 11265 बेरोजगारों को रोजगार की तलाश है। राज्य में पंजीकृत बेरोजगारों में सबसे कम 1038 युवा वर्ग फरीदाबाद में हैं।
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लगातार बढ़ रही बेरोजगारी दर--------
सीएमआईई के आंकड़ों पर गौर करें तो दिसंबर 2020 के दौरान देश में हरियाणा की बेरोजगार की दर सबसे अधिक 32.5 प्रतिशत रही। अब पिछले महीने फरवरी 2021 के दौरान राज्य के आंकड़े में सुधार के बाद बेरोजगारी में 26.4 प्रतिशत होने के बावजूद हरियाणा बेरोजगारी के मामले में देशभर में शीर्ष पर ही बना हुआ है। हालांकि जनवरी 2021 में राज्य की यह बेरोजगारी दर घटकर 17.7 आ गई थी और हरियाणा देश में बेरोजगारी के मामले में तीसरे पायदान पर आ गया था। राज्य में सबसे ज्यादा 43.2 प्रतिशत बेरोजगारी दर पिछले साल अप्रैल में कोरोना काल में दर्ज की गई थी। इसका तात्पर्य यह भी है कि वर्कफोर्स में हो रही वृद्धि की तुलना में नौकरी या रोजगार के अवसर उतने नहीं बढ़ रहे हैं। यानी या तो औद्योगिक, व्यावसायिक औऱ अन्य नौकरी प्रदाता संस्थान बढ़ नहीं रहे हैं या उनकी क्षमता कम हो रही है। ऐसी स्थिति में बेरोजगारी का दर बढ़ना लाज़िमी ही होगा।
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क्या है सरकार का लक्ष्य-----------
हरियाणा के बजट सत्र में मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने वर्ष 2021-22 में हरियाणा के युवाओं को निजी क्षेत्र में न्यू नतम 50 हजार नौकरियों से जोड़ने का लक्ष्य तय किया है। इस लक्ष्य में सक्षम युवा योजना के तहत हरियाणा कौशल विकास मिशन प्लेकसमेंट सेल के जरिए से 14,710 सक्षम युवाओं को कौशल प्रशिक्षण दिये जाने का दावा है। वहीं सरकार ने अगले एक वर्ष के अंदर 1.5 लाख सक्षम युवाओं को इसका लाभ देने की घोषणा भी की है। सरकार ने तो पिछले पांच वर्ष में देश में 80 हजार युवाओं को नौकरियां देने का दावा करने के साथ ऐलान किया है कि मौजूदा पांच साल के कार्यकाल में पांच लाख युवाओं को नौकरी देने का लक्ष्य है। इसके लिए राज्य में एक लाख करोड़ का निवेश आकर्षित करने की योजना है।
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---हरियाणा युवा नौकरी प्रोत्साहन योजना------
हरियाणा सरकार ने शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने के लिए हाल ही में केंद्रीय रोजगार योजनाओं के साथ ही हरियाणा युवा नौकरी प्रोत्साहन योजना की शुरूआत की है। यह योजना प्रदेश में रोज़गार को बढ़ावा देगी। इस योजना में सूक्ष्म और लघु विभाग के लिए युवाओं को रोज़गार मुहैया कराने की योजना है, क्योंकि हरियाणा में 1.20 लाख लघु व सूक्ष्म उद्योग के अलावा 2415 बड़े और मध्यम उद्योग भी है। इन उद्योगों का सालाना एक्सपोर्ट भी 89006.17 करोड़ रूपए आंका गया है। मनोहर सरकार चाहती है कि बड़े उद्योगों में तो रोज़गार सृजन हो, वहीं निजी सेक्टर में भी रोज़गार की समस्याएं दूर करके ज़्यादा से ज़्यादा युवाओं को लाभ मिले। इसी मकसद से हरियाणा सरकार ने निजी क्षेत्र में युवाओं के लिए 75 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की अधिसूचना जारी की है। युवा नौकरी प्रोत्साहन योजना का अहम उद्देश्य बेरोज़गार युवाओं को रोज़गार प्रदान करना है। इस योजना में 3 साल तक सभी हरियाणा के उद्योग या इंडस्ट्री को प्रति युवा को रोज़गार देने के लिए प्रतिमाह रुपये तीन हजार रूपए प्रोत्साहन राशि के रूप में अवतरित करने का प्रावधान है। यह योजना के तहत तीन साल में उद्योगों की प्रोत्साहन राशि बढ़कर 1.08 लाख रूपए तक कर दी जायेगी।
-----हरियाणा रोज़गार मेला-----
हरियाणा में बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए राज्य सरकार ने रोजगार मेला कार्यक्रम भी शुरू किया है, इसके लिए पंजीकृत युवा बरोजगारों को जिला स्तर पर आयोजित होने वाले रोजगार मेलों में बेरोजगार युवाओ को उनकी शैक्षित योग्यता के आधार पर निजी और प्राइवेट कम्पनियो में रिक्त पदों पर नौकरी उपलब्ध करायी जाएगी, जहां देश विदेश की कंपनियां पहुंचकर प्लेसमेंट प्रक्रिया शुरू करेंगी। इस कार्यक्रम के जरिए सरकार रोजगार कार्यालयों में 10वी, 12वी,बीए, बीएससी, बीकॉम, एमए, डिप्लोमा आदि शैक्षिक योग्यता के तहत पंजीकृत शिक्षित बेरोजगार युवाओं को निजी और प्राइवेट कम्पनियो में रिक्त पदों पर नौकरी के अवसर देने की कवायद कर रही है।
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-लॉकडाउन के बाद बढ़ी समस्या----
दरअसल पिछले साल मार्च में कोरोना आपदा के कारण लॉकडाउन के बाद तमाम औद्योगिक और व्यावसायिक गतिविधियां लगभग ठप हो गई थी, तो ऐसे में बेरोजगारी दर में बढ़ोतरी होना लाजिमी था। लेकिन जुलाई से औद्योगिक और व्यायसायिक गतिविधियां धीरे धीरे बहाल होने लगी तो इसके बावजूद भी बेरोजगारी की दर में उतार चढ़ाव जारी है। इसका कारण साफ है कि अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने का इंतजार है। वैसे भी हमारी आर्थिकी, लॉक डाउन और कोरोना आपदा के बाद सामान्य होती हुई परिस्थितियों में भी नौकरी या रोजगार के उतने अवसर नहीं पैदा कर सकी, जितनी की उसे करना चाहिए था। अगर शहरी और ग्रामीण सेक्टरों में बांट कर अलग अलग इस दर को देखें तो, बेरोजगारी की दर, ग्रामीण क्षेत्र में अधिक भयावह और चिंताजनक है।
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बेरोजगारी का बढ़ने का क्या अर्थ है?-------------
किसी भी देश या राज्य में बेरोजगारी का बढ़ना, महज कुछ आंकड़ों का फेरबदल नहीं है, बल्कि समाज में व्याप्त अंसन्तोष, आक्रोश और अवसाद का भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। मसलन देश में बढ़ती हुई बेरोजगार युवाओं की संख्या समाज के तानेबाने को छिन्नभिन्न कर सकती है और इसका सीधा असर अपराध की स्थिति को भी पर पड़ता है। यह जब जनअसंतोष का रूप ले लेता है, तो बेरोजगारी की समस्या तो अलग छूट जाती है और अन्य नयी समस्यायें पैदा होने लगती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती बेरोजगारी का कारण सूक्ष्म, लघु और मध्यम इकाइयों पर सरकार की आर्थिक नीतियों का असर पड़ना है।
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दस फीसदी आत्महत्या का कारण बेरोजगारी---------
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की कुछ महीने पहले जारी रिपोर्ट पर गौर करें तो साल 2019 में आत्महत्या करने वाले कुल 1,39,123 लोगों में से दस फीसद ऐसे थे, जिन्होंने बेरोजगारी से तंग आकर यह कदम उठाया था। यानी यदि साल 2019 की बात करें तो हर रोज करीब 38 बेरोजगारों ने खुदकुशी की। बेरोजगार लोगों की आत्महत्या का यह आंकड़ा पिछले 25 साल में सबसे ज्यादा रहा। पिछले कोविड संक्रमण की वजह से मार्च में शुरू हुए लॉकडाउन के बाद यह संख्या और भी ज्यादा हुई है। बेरोजगार युवकों की आत्महत्या का यह आंकड़ा किसानों की आत्महत्या से भी ज्यादा है। आत्महत्या करने वालों में ज्यादातर वे छात्र हैं जो किसी परीक्षा में फेल हो जाते हैं या फिर प्रतियोगी परीक्षा में असफल रह जाते हैं और अवसादग्रस्त होकर खुदकुशी जैसा कदम उठाते हैं।
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हरियाणा में पिछले 14 माह की बेरोजगारी दर----------
जनवरी 2020 20.3%
फरवरी 2020 25.8 %
मार्च 2020 25.1%
अप्रैल 2020 43.2%
मई 2020 29.0 %
जून 2020 26.7%
जुलाई 2020 24.2%
अगस्त 2020 33.5%
सितंबर 2020 19.3 %
अक्टूबर 2020 27.3%
नवंबर 2020 25.6%
दिसंबर 2020 32.5%
जनवरी 2021 17.7%
फरवरी 2021 26.4%
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हरियाणा(पंजीकृत बेरोजगार 3,58,244)-----
पोस्ट ग्रेज्युएट=63053
--पुरुष-18195/महिला-44858/थर्डजेंडर-3--
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ग्रेज्युएट=1,10,833--
--पुरुष-53483/महिला-57350/थर्डजेंडर-3--
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हायर सेकेंडरी 10+2=1,84,351---
पुरुष-115168/महिला-69183/थर्डजेंडर 1----
29Mar-2021
भाजपा अध्यक्ष नड्डा से मिले सीएम मनोहर लाल
किसानों के आंदोलन व कोरोना की स्थिति पर हुई चर्चा
पांच राज्यों के चुनाव में प्रचार के लिए हरियाणा भाजपाई भी जाएंगे
हरिभूमि न्यूज.रोहतक।
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने गुरुवार को नई दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश नड्डा से मुलाकात की, जिसमें हरियाणा के बजट सत्र में हरियाणा की जनता के हित में लिए गये निर्णयों और योजनाओं के अलावा राज्य में कोरोना की स्थिति से निपटने और किसान आंदोलन की मौजूदा स्थिति को लेकर चर्चा हुई।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से हुई मुलाकात के बाद नई दिल्ली स्थित हरियाणा भवन पहुंचे हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने संवाददाताओं से बातचीत करते हुए इसकी पुष्टि की। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से हरियाणा प्रदेश से संबंधित विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा कि इस मुलाकात के दौरान हरियाणा से जुड़े कई विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई। हरियाणा के बजट सत्र में राज्य के लिए की गई घोषणाओं और नई योजनाओं के बारे में राष्ट्रीय अध्यक्ष को जानकारी दी गई, जिसमें किसानों, बुजुर्गो और गरीबों के हित में लिए गये निर्णय भी शामिल है। राज्य सरकार के फैसले और बजट की नड्डा ने सराहना की। कांग्रेस द्वारा अविश्वास प्रस्ताव के सवाल पर मुख्यमंत्री ने कहा था कि वह उनकी सरकार के लिए फायदेमंद साबित हुआ और सभी तरह की शंकाएं दूर हुई, जिसमें विपक्ष को भी हर बात और सवाल का जवाब मिल गया। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि भाजपा अध्यक्ष नड्डा ने इस चर्चा के दौरान पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए हरियाणा के भाजपा कार्यकर्ताओं को भी भेजने का आव्हान किया, जिसके लिए राज्य संगठन में रणनीति तैयार करके भाजपा कार्यकर्ताओं को चुनावी राज्य में भेजने की योजना होगी।
-----------------कोरोना को लेकर व्यापक प्रबंध------------
मुख्यमंत्री ने कहा कि कोरोना के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए चर्चा हुई, जिसको लेकर राज्य में कोविड दिशानिर्देशों का अनुपालन सख्ती से अनुपालन कराने के लिए कई ठोस प्रबंध किये जाने की जानकारी भी नड्डा को दी गई। वहीं किसानों के आंदोलन के बारे में भी नड्डा के साथ हुई और बताया गया कि राज्य के किसानों के लिए हरियाणा सरकार ने बजट के दौरान कई महत्वपूर्ण फैसले लेने के साथ दो नई योजनाएं शुरू की, जिसमें किसानों की आय दोगुना करने का लक्ष्य तय किया गया है।
-------------जल्द स्थापित होगी फिल्म सिटी---------------
हरियाणा में फिल्म सिटी का निर्माण किए जाने के बारे में मुख्यमंत्री ने कहा कि पिंजौर में एचएमटी की भूमि से कुछ भूमि फिल्म सिटी के लिए चिन्हित की गई है। बाकी सरकार के संबन्धित विभाग को जल्द से कार्ययोजना बनाने के लिए आदेश दे दिये गये हैं। उन्होंने कहा कि यह फिल्म सिटी एक प्रकार से बेस कैंप प्रकार की होगी। यह फिल्म सिटी आगामी 4-6 माह में स्थापित कर दी जाएगी। उन्होंने कहा किएचएमटी की जो जमीन थी, वह हमें मिल गई है और उसी जमीन में से कुछ हिस्से पर फिल्म सिटी का निर्माण होगा।
-------------धर्मांतरण पर आएगा कानून-------------
धर्मांतरण के संबंध में कानून लाए जाने के संदर्भ में मिडिया द्वारा किए गए एक प्रश्न पर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा कि इस संबन्ध में विधेयक का मसौदा तैयार किया गया था, लेकिन एलआर ने उस पर कुछ आपत्तियां उठाई थी, उन सबको अब रिजॉल्व कर लिया गया है। अब जल्द ही इस संबन्ध में या तो अध्यादेश लाया जाएगा या फिर अगले विधानसभा सत्र में यह कानून पेश करके उसे पारित कराया जाएगा। एक अन्य प्रश्न पर हरियाणा के मुख्यमंत्री ने कहा कि जिस प्रकार फरीदाबाद के निकिता हत्याकांड मामले में फैसला फास्ट ट्रैक कोर्ट में जाने की वजह से जल्दी आया है, वह संतुष्ट हैं। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार 12 वर्ष आयु तक की बच्चियों के साथ हुए आपराधिक मामलों की सुनवाई को फास्ट ट्रैक कोर्ट के अंतर्गत लाया गया था, उसी प्रकार इसी भांति के अन्य मामलों को भी फास्ट ट्रैक कोर्ट के अंतर्गत लाया जाएगा।
---------सांसद शर्मा के दिवंगत पिता को दी पुष्पांजलि------------
नई दिल्ली में रोहतक(हरियाणा) लोकसभा क्षेत्र के सांसद डा. अरविंद कुमार शर्मा के सरकारी आवास पर पहुंचकर मुख्यमंत्री मनोहर लान ने उनके दिवंगत पिता सतगुरु शर्मा के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की।
26Mar-2021
सोमवार, 26 अप्रैल 2021
मंडे स्पेशल: हरियाणा में अजीबो गरीब तरीके से बढ़ रही हैं महिला हिंसा
कोरोना काल में लॉकडाउन के बाद बढ़ी घरेलू हिंसाएं
हर दो घंटे मे दहेज प्रताड़ता की शिकार महिलाएं
रोजाना सात महिलाओं का अपहरण और छह से छेड़खानी
ओ.पी. पाल, रोहतक।
हरियाणा में महिलाओं के खिलाफ अपराधों का रिकार्ड अच्छा नहीं कहा जा सकता, जहां अजीब तरह के मामलों यानि जरा सी बात पर महिलाओं को हिंसा और अपराधों को शिकार होना पड़ है। खासकर कोरोना काल में लॉकडाउन और उसके बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों ने ज्यादा गति पकड़ी है,उसकी गवाही आंकड़ दे रहे हैं। शायद यही वजह है कि प्रदेश में बढ़ते महिला हिंसा के मामलों में सबसे ज्यादा महिलाओं को दहेज की खातिर प्रताड़ना का शिकार बनाया गया है। मसलन यानि हर दो घंटे में एक महिला दहेज प्रताड़ना की शिकार हो रही है। यही नहीं राज्य में हर दिन सात महिलाओं का अपहरण और छह के साथ छेड़छाड़ की वारदात हो रही हैं। जबकि कम से कम हर दिन चार महिलाओं को बलात्कार का शिकार बनाया जा रहा है। महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों की वजह से न जाने राज्य में कितने रिश्ते बिखरकर तार तार हुए और और कितनों का विश्वास टूटा है?
हरियाणा राज्य में किसी खास वजह से नहीं, बल्कि बिना किसी आधार के जरा सी बात पर कलह के चलते महिलाओं को हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है। जैसे सब्जी में नमक मिर्च का कम या ज्यादा होना, बासमती चावल न बनाना, प्याज-लहुसन का सेवन न करना, ससुराल से शगुन में दस रुपये न मिलना, सास ससुर का कहना न मानना, मोबाइल पर बातें करना, पति का पत्नी और पत्नी का पति पर अन्य के साथ अवैध संबन्धों का शक करना, शराब या नशा करने का विरोध करना, प्रेम प्रसंग में धोखा देना, वीडियो बनाकर यौन शोषण करने जैसे अजीबो गरीब महिला अपराध दर्ज हो रहे हैं। राज्य में बलात्कार और यौन शोषण के मामलों में बच्चों से लेकर बुजुर्गो तक शिकार बनाया गया है। जबकि आंकड़ो के मुताबिक राज्य में ऐसे मामलों से बढ़ते गृह कलेस में दहेज उत्पीड़न के मामलों ने ज्यादा रफ्तार पकड़ी है।
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लॉकडाउन बना मुसीबत का सबब
देशभर में कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन के दौरान 'वर्क फ्राम होम' के तहत नौकरी पेशे वालों के घरों में कैद रहे, तो इस दौरान महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसाओं में हुई बढ़ोतरी की पुष्टि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने शिकायतों के आधार पर की थी। मसलन वर्ष 2020 के पहले छह महीने में आयोग को महिालाओं के प्रति घरेलू हिंसा की 23,722 शिकायतों में हरियाणा भी अछूता नहीं रहा और महिलाओं के प्रति अपराधों के 10,978 मामलों के साथ हरियाणा देश में तीसरे स्थान पर नजर आया। हरियाणा पुलिस ने राज्य में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों पर अंकुश लगाने का दावा किया और वर्ष 2020 में महिला अपराधों से संबंधित मामलों को सुलझाने सक्रीयता दिखाई है। पुलिस के जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में दुष्कर्म, छेड़छाड़ व दहेज हत्या के 96-96 प्रतिशत तो महिला अपहरण के 87 प्रतिशत केस सुलझाने का दावा किया है। हरियाण में वर्ष 2020 के दौरान महिलाओं के प्रति अपराधों के 10,978 मामले सामने आए हैं, जो अपराधों में गत वर्ष के मुकाबले बहुत कम हैं।
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ऐसे मामलों ने चौंकाया
हिसार जिले में दर्ज मामलों में ससुराल से शगुन के दस रुपये न देने और बासमती चावल नहीं बनाने पर तलाक मांगा गया। वहीं प्याज लहुसन खाने का एक मामला अदालत तक तक जा पहुंचा। वहीं पत्नी की हत्या में मासूम बच्चे ने सिपाही पिता के खिलाफ चश्मदीद गवाह बनने का मामला भी सामने आया। भिवानी जिले में एक घर में दोनों बहनों में एक से बिगड़ी, तो दूसरी से भी तलाक की नौबत आई, कांउसलिंग के बाद बाममुश्किल बसे दोनों घर। अंबाला जिले में तो हद हो गई, जहां एक मामला 85 साल की बुजुर्ग महिला से बलात्कार का दर्ज हुआ।
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दहेज उत्पीड़न के रिकार्ड मामले
हरियाणा पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2020 के दौरान महिलाओं के प्रति अपराध के दर्ज मामलो में बलात्कार के 1511, महिला अपहरण के 2697, छेड़छाड़ के 2396, दहेज हत्या के 252 और दहेज उत्पीड़न के 4122 सामने आए हैं। जबकि इससे पहले हरियाणा में वर्ष 2019 में महिलाओं के प्रति अपराध के 14683 मामले दर्ज हुए थे। इसके अलावा एक मामला अनुसूचित जाति के तहत दर्ज हुआ था।
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दलित महिलाओं के दुष्कर्म
राज्य में वर्ष 2019 में 120 बलात्कार के दर्ज ऐसे मामले सामने आए, जो अनुसूचित जाति की महिलाओं से संबन्धित थे, जो वर्ष 2018 में 99 मामलों की तुलना में ज्यादा हैं। अनुसूचित जाति की नाबालिग लड़कियों यानि 18 साल से कम बच्चों के बलात्कार के मामले वर्ष 2019 में 101 और 2018 में 72 मामले सामने आए। इन मामलों को पॉस्को अधिनियम की धारा 4 व 6 की आईपीसी की धारा 376 के तहत दर्ज किया गया है।
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महिला सुरक्षा के लिए केंद्रीय वित्तीय मदद
केंद्रीय गृहमंत्रालय से महिलाओं की सुरक्षा संबन्धी परियोजनाओं के लिए लिए निर्भया कोष का इस्तेमाल करने के लिए हरियाणा के लिए वर्ष 2015-16 में 22.23 करोड़ रुपये की धनराशि का अनुमोदन किया गया था। इसमें वर्ष 2019-20 में 5.52 करोड़ दी गई। जबिक वर्ष 2018-19 में इस मद में कोई राशि नहीं दी गई। हालांकि इससे पहले राज्य को वर्ष 2017-18 में 2.53 करोड़ और वर्ष 2016-17 के दौरान 14.19 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई है। इसी प्रकार महिला सशक्तिकरण के लिए चलाई जा रही प्रधानमंत्री महिला शक्ति केंद्र योजना के लिए भी राज्य सरकार को धनराशि का आवंटन किया गया है, जिसमें वर्ष 2020-21 में 13.39 लाख रुपये, वर्ष 2019-20 में 94.57 लाख रुपये तथा वर्ष 2018-19 में 6.91 लाख रुपये केंद्र सरकार से जारी किये गये।
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हरियाणा में पिछले सात साल में महिला अपराध के मामले
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वर्ष दर्ज मामले लंबित मामले दोषसिद्ध दर
2014 9010 ------ ------
2015 9511 15197 18.1%
2016 9839 16440 13.4%
2017 11370 18148 15.4%
2018 14326 20580 17.1%
2019 14683 23456 16.1%
2020 10,978 ------ ------
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उपहास का शिकार को मजबूर बलात्कार पीडि़ताएं
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ज्यादातर मामले ऐसे हैं जहां पीड़ितों ने किसी बड़ी घटना से पहले ही पुलिस से संपर्क किया जाता है और छेड़छाड़ या पीछा करने की शिकायत दर्ज कराई जाती है, लेकिन अक्सर इन शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है और फिर यही आगे चलकर किसी बड़े अपराध का रूप ले लेता है। बलात्कार के मामलों में तो ऐसी स्थिति बहुत ही ज्यादा खराब है। मसलन जब वे पहली सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करने के लिए पुलिस से संपर्क करते हैं, तो उन्हें उपहास और अपमान का सामना करना पड़ता है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के 2019 में आए आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पता चलता है कि बलात्कार के मामलों के लिए सजा की दर 27.8 फीसदी है। दूसरे शब्दों में प्रत्येक 100 आरोपियों में से केवल 28 ही दोषी पाए जाते हैं। पुलिस द्वारा बलात्कार के मामलों में महत्वपूर्ण फोरेंसिक सबूतों का संग्रह, परिवहन और भंडारण अक्सर खराब तरीके से संचालित किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप कुछ अपराधी भी बचकर निकल जाते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट के निर्देश नजरअंदाज
राष्ट्रमंडल मानवाधिकार पहल 2020 की रिपोर्ट के अनुसार एक भी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश ऐसा नहीं है, जो शीर्ष अदालत के निर्देशों का पूरी तरह से पालन कर रहा हो। यानी अधिकांश राज्य ऐसे हैं जो इनमें से ज्यादातर निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। विशेषज्ञों की माने तो ये सुधार बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये पुलिस की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करते हैं, बोर्ड को स्थानांतरण और पोस्टिंग तय करने का अधिकार देते हैं, और वहीं ये उचित प्रशिक्षण मॉड्यूल परिवर्तन को भी सुनिश्चित करते हैं। अगर हम वास्तविक बदलाव चाहते हैं तो हमें सुधारों के साथ-साथ मानसिकता को भी बदलना होगा।
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पुलिस में पर्याप्त नहीं महिलाओं की भागीदारी
स्टेटस ऑफ़ पोलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट-2019 के मुताबिक भारत के पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी केवल 7.28 प्रतिशत है। इन महिलाओं में से 90 फीसदी कांस्टेबल हैं, जबकि एक फीसदी से कम ही पर्यवेक्षी जैसे उच्च पदों पर हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर महिला पुलिसकर्मी रजिस्टरों को मेंटेन करने, एफआईआर दर्ज करने और अन्य छोटे काम करते हैं, जबकि उनके समकक्ष के पुरुष पुलिसकर्मी इनवेस्टिगेशन करने, गश्त करने व वीआईपी सुरक्षा प्रदान करने जैसा कार्य करते हैं। इस प्रकार की कार्यप्रणाली खासतौर पर महिलाओं से संबंधित अपराधों के प्रति भी ऐसे अपराधों को नियंत्रित करने में उचित नहीं है।
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पुलिस बल की कमी
गृह मंत्रालय से संबद्ध ब्यूरो पुलिस अनुसंधान एवं विकास के अनुसार साल 2019 में देश में प्रति लाख आबादी पर 198 पुलिस अधिकारी हैं, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा अनुशंसित 222 पुलिस अधिकारी प्रति लाख जनसंख्या के पैमाने के मुकाबले काफी कम है। इसके परिणामस्वरूप पुलिस कर्मियों पर काम का बोझ बढ़ने के कारण उनकी दक्षता में कमी देखी गई है और इसका मनोवैज्ञानिक दबाव भी होता है। इसलिए पुलिस संगठन के प्रभावी कामकाज के लिए एक अच्छा विश्वसनीय संचार प्रणाली महत्वपूर्ण है।
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महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराधों की रोकथाम
केंद्रीय गृह मंत्रालय का महिलाओं और बच्चों के खिलाफ साइबर अपराध रोकथाम पर मुख्य जोर है। इस पहले के तहत हरियाणा समेत 14 राज्यों ने साइबर फॉरेंसिक ट्रेनिंग लैबोरेटरी की स्थापना कर ली है। इन राज्यों में 13295 पुलिस कर्मचारियों, अधिवक्ताओं और न्यायिक अधिकारियों को महिलाओं और बच्चों के खिलाफ साइबर अपराधों की पहचान, पता लगाने और समाधान में प्रशिक्षण दिया गया है। वहीं गृह मंत्रालय द्वारा शुरू किये गये पोर्टल www.cybercrime.gov.in पर नागरिक अश्लील कंटेंट की सूचना देने की सुविधा शुरू की गई है, जिसे 72 घंटों के भीतर ब्लॉक कराया जा सकता है।
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बलात्कार के मामले में सख्त प्रावधान
केंद्र सरकार ने बीते 7 साल के दौरान महिलाओं के सशक्तिकरण और उनकी सुरक्षा की दिशा में कई कदम उठाने का दावा किया है। यौन हमलों के घृणित मामलों के खिलाफ आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम-2018 के जरिए बलात्कार की सजा को ज्यादा कठोर बनाया गया है। कानून में संशोधन को प्रभावी रूप से जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए राज्यों में यौन अपराधों के लिए जांच निगरानी प्रणाली, यौन अपराधियों का राष्ट्रीय डाटाबेस, सीआरआई-एमएसी (क्राइम मल्टी-एजेंसी केन्द्र) और नई नागरिक सेवाएं शुरू की गई हैं। आईटी से जुड़ी इन पहलों से समयबद्ध और प्रभावी जांच में सहायता मिलती है। केंद्र सरकार ने सभी राज्यों व संघ शासित क्षेत्रों से इन ऑनलाइन टूल्स के प्रभावी उपयोग के लिए बलपूर्वक सिफारिश की है। वहीं पुलिस थानों में महिला सहायता डेस्क की स्थापना और देश के सभी जिलों में मानव तस्करी रोधी इकाइयों की स्थापना के मजबूती के उद्देश्य से राज्यों के लिए 200 करोड़ रुपए की स्वीकृति दी है।
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लंबित मामलों का ग्राफ बढ़ा
हरियाणा में महिला अपराधों के निपटान न होने के कारण लंबित मामलों का अंबार खड़ा होता जा रहा है। वर्ष 2019 में प्रदेश में 23456 मामले लंबित थे, जबकि वर्ष 2018 में विचारण के लिए ऐसे लंबित मामलों की संख्या 20580 थी। इससे पहले 2017 में 11370, 2016 में 9839, 2015 में 9511 और 2014 में 9010 मामले लंबित थे।
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आरोप सिद्ध की दर बेहद कम
हरियाणा में महिला अपराधों के आरोपियों में 20 फीसदी से कम ही दोषी करार दिये जाते हैं। यानि पिछले पांच साल के आंकड़ों पर गौर की जाए तो वर्ष 2019 में 16.1 प्रतिशत, 2018 में 17.1 प्रतिशत, 2017 में 15.4 प्रतिशत, 2016 में 13.4 प्रतिशत और 2015 प्रतिशत 18.1 आरोपियों पर ही अपराध सिद्ध हुआ है। मसलन ज्यादात आरोपी साक्ष्य या अन्य सबूतों के अभाव मामलों से बाहर निकल जाते हैं।
22Mar-2021
साक्षात्कार: रोजगार सृजन से पुनर्जीवित होगी साहित्य और संस्कृति : रामफल चहल
लोक साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में एक बड़ा नाम
व्यक्तिगत परिचय
नाम: रामफल चहल
जन्म: एक दिसम्बर 1946
जन्म स्थान: गांव निमणी, जिला भिवानी
शिक्षा: विद्या वाचस्पति (पीएचडी) और विद्यासागर (डी.लिट्)
संप्रत्ति:सेवानिवृत्त अधीक्षक, आकाशवाणी केंद्र रोहतक
साक्षात्कार-ओ.पी. पाल
हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा पंडित माधव प्रसाद मिश्र पुरस्कार के लिए रोहतक शहर के विकास नगर निवासी प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. रामफल चहल का चयन किया गया है। डॉ. चहल लोक साहित्य, लोक संस्कृति, लोकगीत, लोकनाट्य, काव्य, सांग, कथाओं, कहानियों के लेखन, मंचन और कलाओं के जरिए अपने हुनर रुपी अध्ययन में तेजी से विलुप्त होती हरियाणावी सभ्यता, संस्कृति, बोली (भाषा), सामाजिक रीति रिवाज और परंपराओं को पुनर्जीवित करने के लिए लोक साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में एक बड़ा नाम अर्जित कर चुके हैं। इस साहित्यक मुहिम का फल ही है कि उन्हें इससे पहले 2004 में साहित्य के लिए पं. लखमी चंद और 2010 में कला साहित्य के लिए देवीशंकर प्रभाकर सम्मान के अलावा उन्हें राज्य स्तर पर कृषि क्षेत्र के लिए भी पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। यही नहीं डॉ. चहल को साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थाओं द्वारा 150 से भी ज्यादा पुरस्कार से सम्मानित कर चुकी हैं। इस वैज्ञानिक और भौतिकवादी युग के बढ़ते प्रभाव से विलुप्त हो रही हरियाणवी साहित्य, सभ्यता और संस्कृति को पुनर्जीवित खासतौर से युवा पीढ़ी में किस प्रकार से प्रासांगिक और प्रेरणा दायक मुहाने पर लाया जाए, ऐसे अनुछुए पहलुओं को लेकर हरिभूमि संवाददाता से खास बातचीत में डा. रामफल चहल ने कहा कि प्रकृति के बजाए मशीनीकरण के साए में जाते समाज को आर्थिक रुप से मजबूत करने के लिए साहित्य और संस्कृति क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा रोजगार के अवसर बढ़ाने की जरुरत है। वेशभूषा, बोली, खानपान, आचार विचार सभ्यता के विकास का द्योतक है, जिसके कारण संस्कार और संवेदनाए खत्म होती जा रही हैं, तो ऐसे में साहित्य और संस्कृति के ह्रास होना सबसे बड़ा कारण है।
विभिन्न विधाओं के साहित्यकार
चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्याय हिसार के सामुदायिक रेडियों में सलाहकार के पद पर तैनात प्रख्यात साहित्यकार डॉ. रामफल चहल एक ऐसी पहचान हैं जिन्होंने साहित्य और संस्कृति जगत में पद्य और गद्य में ही नहीं, बल्कि एक मीडियाकर्मी और एक मंजे हुए अभिनेता के रूप में भी हरियाणवी लोकसाहित्य व संस्कृति में अपना अहम योगदान दिया हैं। साहित्य व संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों के लिए विक्रमशिला विद्यापीठ द्वारा विद्या वाचस्पति (पीएचडी) और विद्यासागर (डी.लिट्) की उपाधि से सम्मानित डॉ. रामफल चहल अब तक हरियाणवी संस्कृति पर 20 पुस्तकें लिख चुके हैं। संस्कृति के क्षेत्र में उन्हें हरियाणा सरकार द्वारा श्री देवी शंकर प्रभाकर पुरस्कार तथा पंजाब साहित्य एवं कला विशेष पुरस्कार दिया जा चुका है। यही नहीं आकाशवाणी के हरियाणवी श्रेष्ठ कृति अवार्ड समेत बाजे भगत व फौजी मेहर समेत उनकी तीन पुस्तकों को हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है। डॉ. रामफल चहल लम्बे समय तक आकाशवाणी रोहतक तथा कुरूक्षेत्र से किशन भाई के रूप में कार्यक्रमों का प्रसारण करते रहे हैं। हरियाणा सांस्कृतिक अकादमी के सबसे पहले निदेशक रह चुके हैं डॉ. चहल वर्ष 2016 में आकाशवाणी के रोहतक केंद्र के अधीक्षक पद से सेवानिृत्त हुए। काव्य मंचों के अलावा नाटक मंचन करते आ रहे डा. चहल हरियाणवी फिल्मों पनघट व खानदानी सरपंच में मुख्य अभिनेता के तौर पर अभिनय कर चुके हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा उन्हें एक प्रतिष्ठित कवि के रूप में आमंत्रित किया जाता रहा है।
प्राचीन संस्कृति की जीवंत परंपरा उकेरी
साहित्यकार डॉ. रामफल चहल की इस क्षेत्र में हरफनमौला भूमिकाओं की अनेक उपलब्धियां हासिल करना उनकी विशेषताओं में शामिल है, जिन्होंने घर-घर जाकर हरियाणवी संस्कृति की जीवंत परंपराओं को बटोरा है। यानि महिलाओं के 600 से ज्यादा लोक और सांस्कारिक गीतों का संकलन करके उन्हें हिंदी और अंग्रेजी भाषा में अनुवादित करने के साथ उनका म्यूजिकल नोटेशन तैयार कराया है। इनकी एक विशेषता यह भी रही कि राज्य में वंचित समाज की हस्तियों को चुनकर उन्हें भी साहित्य और संस्कृति के पन्नों में स्थान दिया है। इन सबसे हटके डा. चहल ने जिस प्रकार इतिहासिक धरोहर के रूप में लोक संस्कृति से जुड़े प्राचीन वस्त्राभूषण संकलन करने पर भी अहम भूमिका निभाई है। वहीं 150 साल पुरानी हस्तलिखित पौथी का हिंदी अनुवाद करने में जुटे जिला दादरी के गांव नीमड़ी गांव के मूल निवासी डा़ चहल विभिन्न विधाओं में यहां साहित्य लेखन करने में माहिर हैं, जो बोलचाल में मिट्टी की खुशबू के साथ-साथ अपनी मूल जड़ो से भी दूर नहीं है और खुद प्रकृति की गोद में अजमेर के निकट पहाड़ी वादियों के बीच खेती कर रहे हैं।
प्रमुख पुस्तकें
भिवानी जिले के निमणी गांव निवासी रामफल वर्ष 1983 से आकाशवाणी में कार्यरत हैं। अब तक हरियाणवी लोक साहित्य में प्रकाशित 20 पुस्तकों में स्वतंत्रता सेनानी एवं लोककवि फौजी मेहर सिंह, व्यक्तित्व व कृतित्व, शेष रचनावली, बाजे भगत व्यक्तित्व व कृतित्व, बाजे भगत ग्रंथावली व बाजे भगत रचनावली, रामकृष्ण व्यास व्यक्तित्व व कृतित्व, नौ नाटकों का संग्रह, विघ्न की जड़, हास्य व्यंग्य लोक विनोद, हरियाणवी संस्कृति की जीवंत परंपराएं, कृष्णचंद नादान ग्रंथावली जैसी उत्कृष्ट रचनाएं लोक साहित्य की धरोहर हैं।
रचना संग्रह
प्रमुख रचना संग्रह पलपोट्ण के अलावा डा. चहल की रचनाओं में हरियाणवी कुण्डलियां, हरियाणा नाटक-साझा सीर, जहर का प्याला, फागण आग्या, कृषि व संस्कृति, आया सै बसंत, गर्भस्थ कन्या की पुकार, हरियाणवी बारा-कड़ी,अचूक निशाना, ऋृतु राज बसंत, कित टोहूं, कव्वाली, दर्पण कुछ ना बौल्लै, आदमी नाम ना धरियो और गाम सांझला कुआ शामिल हैं।
22Mar-2021
आजकल: ममता के सामने भाजपा की चुनौती
-नीरजा चौधरी, राजनीतिक विशेषज्ञ
देश के पांच राज्यों असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल व पुडुचेरी में में विधानसभा चुनावों में तमाम सियासी दल रणभूमि में हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल के चुनाव सबसे महत्वपूर्ण हैं, जहां तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने लंबे सियासी संघर्ष करने के बाद 2011 में वाममोर्चा की 34 साल की सत्ता से बेदखल कर जनादेश हासिल किया। लगातार दस साल के शासन में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने सत्ता की तिगड़ी बनाने की चुनौती है। इसलिए वह यहां वर्चस्व की लड़ाई में एक तरह से अकेली हैं, लेकिन लगातार दो बार से शासन करने वाली तृणमूल कांग्रेस की सत्ता परिवर्तन करने के इरादे को लेकर भाजपा की चुनावी जंग में जो चुनौती है उसे मामूली या सामान्य नहीं कहा जा सकता। इसका कारण साफ है कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की राजनीतक में एक सबसे पुराना और संघर्षशील चेहरा है, जिसका बंगाल की मानष माटी से जो नाता है उसके सामने भाजपा की तुलना करना बेमाने होगा। वैसे भी कांग्रेस की नेता के रूप में अपना सियासी जीवन शुरू करने के बाद ममता बनर्जी से बहुत संघर्ष किये और कांग्रेस से अलग होने के अपनी अलग पार्टी बनाकर इस मुकाम तक पहुंची की आज पश्चिम बंगाल में शासक के रूप में काबिज है। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस की सियासी जमीन पर किसी अन्य दल को काबिज होने से रोकने की ताकत भी ममता जैसी नेता में है। हालांकि पश्चिम बंगाल में ममता की इस सियासी ताकत और राजनीतिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए ही भाजपा भी सभी संसाधनों के साथ चुनावी संग्राम में उतरी है। ममता को चुनौती देना भाजपा या अन्य किसी दल के लिए इतना आसान भी नहीं है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में सत्ता परिवर्तन की लड़ाई में भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस में सेधमारी करके ममता के बेहद विश्वसनीय और कदावर नेताओं को तोड़ा है और फिर चुनाव में पूरी ताकत झौंक रही भाजपा का मकसद है कि किसी तरह से पश्चिम बंगाल में भाजपा की सत्ता हासिल की जाए। इसी उम्मीद में राज्य के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 20 और भाजपा के राजनीतिक व रणनीतिक चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह की 30 के अलावा पार्टी के तमाम बड़े नेताओं की रैलियां इस बात का संकेत है कि भाजपा पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करने के लिए साम दंड रही हैं। भाजपा के खिलाफ समूचा विपक्ष हमेशा एकजुट होने का दम भरता रहा है और मौजूदा पश्चिम बंगाल के चुनाव में जब ममता के करीबी लोग उनका साथ छोड़ गये हों। भाजपा के सत्ता में आने के इरादों को रोकने के लिए वे सभी विपक्षी दल आप, सपा और अन्य राज्य में क्षेत्रीय दल ममता को ऐसे समय भी समर्थन दे रहे हैं, जिनकी पश्चिम बंगाल में कोई हैसियत नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि पांच चुनावी राज्यों में पश्चिम बंगाल के चुनाव में जिस प्रकार की सियासत चल रही है उससे पश्चिम बंगाल की सियासत में नया अध्याय की शुरूआत नजर आ रही है, जहां विपक्षीदलों की एकजुटता के बावजू बिखराव की राजनीति भी है। मसलन कांग्रेस, वामदल और अन्य छोटे दल अलग अलग चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन मुख्य चुनावी जंग में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक तस्वीर सामने है। यदि ये कहा जाए कि इस चुनाव का केंद्र बिंदु ममता बनर्जी है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। ममता ने अपने करीबियों का साथ छुटने के बावजूद हौंसला नहीं खोया और उसी तरह अपने प्रतिद्वंद्वियों पर गरजने की राजनीति कर रही है यानि अपने राजनीतिक वर्चस्व को बचाने का चुनाव मानकर धुआंधार तरीके से चुनाव लड़ रही हैं। हालांकि विभिन्न चुनावी सर्वेक्षणों में भी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी व भाजपा के बीच ही चुनाव मुकाबला बताया जा रहा है। राज्य की सियासत का रुख भविष्य के गर्भ में हैं है जो चुनावी नतीजो के बाद सामने आए, लेकिन यदि तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की तो वह उनकी भविष्य की राजनीति को तय करेगी। दूसरी ओर भाजपा सत्ता परिवर्तन कर सत्ता हासिल करती है तो भाजपा का मनोबल बढ़ेगा और उसकी राष्ट्रीय राजनीतिक वजूद बढ़ेगा।
-(ओ.पी. पाल से बातचीत के आधार पर)
21Mar-2021
आजकल: पश्चिम बंगाल: ममता और मोदी के बीच वर्चस्व का संघर्ष
-धीरेन्द्र पुंडीर, राजनीतिक विश्लेषक
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की शतरंज पर मुख्य मुकाबले में पीएम मोदी और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी है, बाकी सियासी दल या नेता तो इस सियासी शतरंज की मोहरे हैं। मसलन बंगाल चुनाव में मां माटी मानुष के नारे के साथ बंगाली लोगों में लोकप्रिय रहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए वर्चस्व के लिए संघर्ष कर रही है। जबकि पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों से भाजपा राज्य में सत्ता हासिल करने के इरादे से सभी दांवपेंच के साथ पूरी ताकत झोंकें हुए है। तृणमूल कांग्रेस के वे ज्यादातर नेता ममता को अकेले छोड़कर भाजपा के साथ चले गये हैं, जिन्हें ममता ने सियासी ताकत देने का काम किया। इससे ममता को अपना सियासी किला दरकता तो नजर आ रहा है, लेकिन वह भाजपा के हिंदुत्व की राजनीति का अनुसरण करने के साथ मंचों पर कलमा भी पढ़ने से पीछे नहीं है। इसका कारण यह भी है कि ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टिकरण जैसे आरोप भी लगते रहे हैं। बंगाल के चढ़ते चुनावी पारे में जिस प्रकार के आरोप प्रत्यारोपों का दौर चल रहा है उसमें ममता जिस प्रकार भाजपा के खिलाफ दंगा कराने, झूठे वायदे करने और महंगाई जैसे मुद्दों को जनता के सामने ले जा रही है। ममता बनर्जी ने अपने आपको बंगाल की बेटी बताते हुए भाजपा को बाहरी करार देकर भाषाई और हिंदुत्व के मुद्दे को भी छूने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पश्चिम बंगाल के लिए इस समय ममता एक बड़ा चेहरा है, जिसने अपने सियासी संघर्ष के सहारे 34 साल के वाममोर्चा के शासन को ध्वस्त करके दस साल तक अपना शासन चलया, जो इस समय अपनी सत्ता की हैट्रिक बनाने के लिए हर सियासी मोहरे व रणनीति का सहारा ले रही हैं। लोकसभा में जिन नतीजों से भाजपा उत्साहित है उसमें कांग्रेस और वामदलों के हिंदुत्व वोट के सहारे भाजपा का ही नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के वोट बैंक में अच्छा इजाफा हुआ था। हालांकि भाजपा ने भी बंगाल में जनमानस में तेजी से अपनी पैठ बनाई। इसी पैठ का नतीजा है कि सियासी हवा के रूख को देख तृणमूल कांग्रेस के ज्यादातर बड़े नेताओं ने पाला बदल कर भाजपा का दामन थामा है, जिसे ममता के लिए किसी झटकों से कम नहीं है। लेकिन ममता भी सियासत की बड़ी खिलाड़ी हैं, जिसके अनुभव से घायल होने के बावजूद चुनावी रण में पार्टी की कमजोर नब्ज को मजबूती देकर किसी तरह सत्ता में वापसी के लिए संघर्ष करने में धुंआधार तरीके से आगे बढ़ रही हैं। फिलहाल पश्चिम बंगाल के चुनावी सुर्खियों में ममता बनर्जी की तृणमूल और भाजपा ही केंद्र बिंदु हैं। बाकी कांग्रेस के आईएसएफ गठबंधन से हिंदुत्व वोट झिटक रहा है तो वहीं वामदलों की भी कमोबेस ऐसी ही स्थिति कही जा सकती है। इसलिए माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच ही चुनावी संघर्ष होने की संभावना है। राज्य में कांग्रेस या वामदलों के झंडे व बैनर और जनसभाओं में भीड़ का भी टोटा है। जहां तक पश्चिम बंगाल के चुनाव में किसान आंदोलन भाजपा के लिए कोई मुश्किल पैदा करेगा ऐसा कहीं दूर तक भी नहीं है। इस चुनाव में पीएम मोदी राज्य की महिलाओं को ज्यादा कनेक्ट कर रहे हैं जिस प्रकार से उनकी सभा में उमड़ी भीड़ में महिलाओं की तादाद नजर आई, उससे ममता बनर्जी के सामने अपने किले को बचाने की चुनौती जरुर होगी। हालांकि राज्य में ममता के वजूद के सामने भाजपा के सामने भी पश्चिम बंगाल को फतेह करना इतना आसान नहीं कहा जा सकता।
--(ओ.पी. पाल से बातचीत पर आधारित)
21Mar-2021
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