मंगलवार, 13 सितंबर 2016

कर प्रणाली को आसान करेगा जीएसटी कानून

जीएसटी परिषद के गठन को मंजूरी
देश में तीन भागों में काम करेगा जीएसटी
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में समान कर व्यवस्था के लिए जीएसटी काननू लागू करने की कवायद में सोमवार को केंद्रीय कैबिनट ने संविधान के तहत जीएसटी परिषद के गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। देश में एक समान कर की व्यवस्था कायम करने वाले जीएसटी कानून कर प्रणाली को आसान करेगा, यह सुर चौतरफा सुनने को मिल रहे हैं। मसलन मोदी सरकार के लिए जीएसटी परिषद के गठन की मंजूरी होने के बाद अगले साल एक अप्रैल से देशभर में जीएसटी कानून लागू करने का रास्ता लगभग साफ हो गया है। हालांकि इस कवायद में चुनौतियां भी बाकी हैं।
केंद्र सरकार के देश में एक अप्रैल 2017 से जीएसटी कानून लागू करने की समय सीमा तय होने में एक कदम सोमवार को केंद्रीय कैबिनेट ने जीएसटी परिषद के गठन की प्रक्रिया को मिली मंजूरी ने आगे बढ़ा दिया है। आर्थिक विशेषज्ञों की माने तो यदि सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पारित कराने की तैयारी में जुटी केंद्र सरकार जीएसटी विधेयक के मसौदे को अंतिम रूप देने की चुनौती को भी पार कर लेगी। दरअसल यह परिषद ही देश में जीएसटी की दरें तय करेगी और जीएसटी कानून लागू करने के लिए तैयार किये जा रहे तीन अलग विधेयकों के मसौदे को अंतिम रूप देगी। जीएसटी परिषद के लिए सरकार से मिली मंजूरी के साथ ही वित्त मंत्रालय ने संविधान संशोधन के तहत जीएसटी परिषद की प्रक्रिया शुरू करने की अधिसूचना भी जारी कर दी है।
अभी चुनौती नहीं हुई कम
आर्थिक विशेषज्ञों की माने तो जीएसटी संबन्धी संविधान संशोधन विधेयक राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की मंजूरी मिलने के बाद ही सरकार का जीएसटी को लागू करने का मुख्य कार्य शुरू हुआ है, जिसमें केंद्र और राज्यों को जीएसटी की दरों को तय करना कम चुनौती नहीं होगी। इसका कारण है कि ये दरे ऐसे तय करनी होंगी, जिसमें केंद्र या राज्यों को राजस्व की हानि न हो। वहीं ऐसे फैसलों में जनता को महंगाई से राहत दिलाने की चुनौती भी कायम रहेगी।
तीन भागों में होगा जीएसटी
जीएसटी कानून बनान के लिए तीन प्रकार के विधेयक तैयार किये जाएंगे, जिसमें एक केंद्रीय जीएसटी, दूसरा राज्य जीएसटी और तीसरा अंतर्राज्यीय जीएसटी शामिल होंगे। परिषद इन तीनों जीएसटी कानून के मसौदे में शामिल किये जाने वाले प्रावधानों को पर सहमति बनाएगी। संविधान संशोधन अधिनियम के तहत केंद्रीय जीएसटी यानि सीजीएसटी को केंद्र सरकार वसूल करेगी। जबकि राज्य जीएसटी यानि एसजीएसटी को राज्य सरकारें वसूल करेंगी। तीसरा इंटीग्रेटेड जीएसटी यानि आईजीएसटी वसूलने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होगा, लेकिन यह दो राज्यों के बीच होने वाले कारोबार पर लागू होगा, इसलिए केंद्र सरकार इस कर को वसूल कर उसे दोनों राज्यों में बराबर बांटेंगी।
जीएसटी परिषद का गठन अधिसूचना जारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में वित्त्त मंत्रालय के जीएसटी परिषद और इसके अलग से सचिवालय गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। संविधान संशोधन अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक अनुच्छेद 278-ए के तहत जीएसटी परिषद का गठन अधिसूचना जारी होने के 60 दिनों के भीतर होना जरूरी है। यानि वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में इस परिषद का गठन 11 नवंबर तक होना है। जीएसटी परिषद में सभी 29 राज्यों और 2 संघशासित प्रदेशों के वित्त राज्य मंत्री प्रतिनिधियों के रूप में शामिल होंगे। कैबिनेट द्वारा मंजूर किये गये प्रस्तावों में जीएसटी परिषद का एक सचिवालय का गठन होगा, जो नई दिल्ली में स्थापित किया जाएगा। वहीं संविधान संशोधन अधिनियम की अधिसूचना जारी होने के बाद जीएसटी पर बनी राज्यों के वित्त्त मंत्रियों की समिति की पहली बैठक 22 सितंबर और 23 सितंबर को होगी। यह समिति जीएसटी बिल के मॉडल, टैक्स की दरें और संसाधनों के दोहरे नियंत्रण जैसे मुद्दों पर अपनी सिफारिशें देगी।
जीएसटी परिषद के अधिकार
जीएसटी परिषद का प्रमुख अधिकार जीएसटी दरों का निर्धारण करना है। मसलन जीएसटी के दायरे और इससे बाहर रखे जाने वाले उत्पादों व सेवाओं के करों, कराधान की दरें, नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली के लिए कर की दर, उसमें दी जाने वाली छूट जैसे करो की सीमा पर फैसला करेगी। वहीं करों की वसूली की सीमा पर भी फैसला लेने का अधिकार परिषद को होगा। परिषद के अधिकार क्षेत्र में करों की वसूली की सीमा पर भी फैसला करना भी शामिल है।
देश में बनेगा एकल बाजार
केंद्र सरकार का देश में जीएसटी कानून लागू करने का मकसद है कि सभी राज्यों में लगभग सभी उत्पाद एक ही कीमत पर मिलेंगे। अभी एक ही उत्पाद के लिए दो राज्यों में अलग-अलग कीमत चुकानी पड़ती है। दरअसल इसकी वजह अलग-अलग राज्यों में लगने वाले कर भी हैं। इसके लागू होने के बाद देश बहुत हद तक एकल बाजार बन जाएगा।
ऐसा होगा परिषद का स्वरूप
जीएसटी परिषद में केंद्रीय वित्त मंत्री अध्यक्ष, केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री (राजस्व) और सभी राज्यों के वित्त मंत्री इसके सदस्य होंगे। राजस्व सचिव जीएसटी परिषद के पदेन सचिव होंगे। इसमें केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड के अध्यक्ष को स्थायी आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया जाएगा, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होगा। इन फैसलों को अंतिम रूप देने के लिए केंद्र का एक तिहाई मत होगा, जबकि राज्यों का इसमें दो-तिहाई दखल होगा। प्रस्ताव मंजूर होने के लिए तीन-चौथाई बहुमत होने का प्रावधान तय किया गया है।
दायरे में होंगे कौन से उत्पाद
मंत्रालय के अनुसार जीएसटी कानून लागू करने के लिए चल रही मशक्कत के बीच सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम की अध्यक्षता वाली समिति ने 'मेरिट गुड्स' की श्रेणी में कुछ वस्तुओं को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने या उन पर बहुत कम टैक्स लगाने के संबंध में सिफारिशें दी हैं। इन वस्तुओं में अधिकांशत: अनाज, खाद्य तेल, सब्जियां और ईधन जैसी रोजमर्रा की वस्तुएं शामिल हैं। सूत्रों का कहना है कि जीएसटी समिति आगामी दो दिन की बैठक में इन सिफारिशों पर भी गौर करके फैसला लेगी।
13Sep-2016

कर प्रणाली को आसान करेगा जीएसटी कानून

जीएसटी परिषद के गठन को मंजूरी
देश में तीन भागों में काम करेगा जीएसटी
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में समान कर व्यवस्था के लिए जीएसटी काननू लागू करने की कवायद में सोमवार को केंद्रीय कैबिनट ने संविधान के तहत जीएसटी परिषद के गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। देश में एक समान कर की व्यवस्था कायम करने वाले जीएसटी कानून कर प्रणाली को आसान करेगा, यह सुर चौतरफा सुनने को मिल रहे हैं। मसलन मोदी सरकार के लिए जीएसटी परिषद के गठन की मंजूरी होने के बाद अगले साल एक अप्रैल से देशभर में जीएसटी कानून लागू करने का रास्ता लगभग साफ हो गया है। हालांकि इस कवायद में चुनौतियां भी बाकी हैं।
केंद्र सरकार के देश में एक अप्रैल 2017 से जीएसटी कानून लागू करने की समय सीमा तय होने में एक कदम सोमवार को केंद्रीय कैबिनेट ने जीएसटी परिषद के गठन की प्रक्रिया को मिली मंजूरी ने आगे बढ़ा दिया है। आर्थिक विशेषज्ञों की माने तो यदि सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पारित कराने की तैयारी में जुटी केंद्र सरकार जीएसटी विधेयक के मसौदे को अंतिम रूप देने की चुनौती को भी पार कर लेगी। दरअसल यह परिषद ही देश में जीएसटी की दरें तय करेगी और जीएसटी कानून लागू करने के लिए तैयार किये जा रहे तीन अलग विधेयकों के मसौदे को अंतिम रूप देगी। जीएसटी परिषद के लिए सरकार से मिली मंजूरी के साथ ही वित्त मंत्रालय ने संविधान संशोधन के तहत जीएसटी परिषद की प्रक्रिया शुरू करने की अधिसूचना भी जारी कर दी है।
अभी चुनौती नहीं हुई कम
आर्थिक विशेषज्ञों की माने तो जीएसटी संबन्धी संविधान संशोधन विधेयक राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की मंजूरी मिलने के बाद ही सरकार का जीएसटी को लागू करने का मुख्य कार्य शुरू हुआ है, जिसमें केंद्र और राज्यों को जीएसटी की दरों को तय करना कम चुनौती नहीं होगी। इसका कारण है कि ये दरे ऐसे तय करनी होंगी, जिसमें केंद्र या राज्यों को राजस्व की हानि न हो। वहीं ऐसे फैसलों में जनता को महंगाई से राहत दिलाने की चुनौती भी कायम रहेगी।
तीन भागों में होगा जीएसटी
जीएसटी कानून बनान के लिए तीन प्रकार के विधेयक तैयार किये जाएंगे, जिसमें एक केंद्रीय जीएसटी, दूसरा राज्य जीएसटी और तीसरा अंतर्राज्यीय जीएसटी शामिल होंगे। परिषद इन तीनों जीएसटी कानून के मसौदे में शामिल किये जाने वाले प्रावधानों को पर सहमति बनाएगी। संविधान संशोधन अधिनियम के तहत केंद्रीय जीएसटी यानि सीजीएसटी को केंद्र सरकार वसूल करेगी। जबकि राज्य जीएसटी यानि एसजीएसटी को राज्य सरकारें वसूल करेंगी। तीसरा इंटीग्रेटेड जीएसटी यानि आईजीएसटी वसूलने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होगा, लेकिन यह दो राज्यों के बीच होने वाले कारोबार पर लागू होगा, इसलिए केंद्र सरकार इस कर को वसूल कर उसे दोनों राज्यों में बराबर बांटेंगी।
जीएसटी परिषद का गठन अधिसूचना जारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में वित्त्त मंत्रालय के जीएसटी परिषद और इसके अलग से सचिवालय गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। संविधान संशोधन अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक अनुच्छेद 278-ए के तहत जीएसटी परिषद का गठन अधिसूचना जारी होने के 60 दिनों के भीतर होना जरूरी है। यानि वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में इस परिषद का गठन 11 नवंबर तक होना है। जीएसटी परिषद में सभी 29 राज्यों और 2 संघशासित प्रदेशों के वित्त राज्य मंत्री प्रतिनिधियों के रूप में शामिल होंगे। कैबिनेट द्वारा मंजूर किये गये प्रस्तावों में जीएसटी परिषद का एक सचिवालय का गठन होगा, जो नई दिल्ली में स्थापित किया जाएगा। वहीं संविधान संशोधन अधिनियम की अधिसूचना जारी होने के बाद जीएसटी पर बनी राज्यों के वित्त्त मंत्रियों की समिति की पहली बैठक 22 सितंबर और 23 सितंबर को होगी। यह समिति जीएसटी बिल के मॉडल, टैक्स की दरें और संसाधनों के दोहरे नियंत्रण जैसे मुद्दों पर अपनी सिफारिशें देगी।
जीएसटी परिषद के अधिकार
जीएसटी परिषद का प्रमुख अधिकार जीएसटी दरों का निर्धारण करना है। मसलन जीएसटी के दायरे और इससे बाहर रखे जाने वाले उत्पादों व सेवाओं के करों, कराधान की दरें, नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली के लिए कर की दर, उसमें दी जाने वाली छूट जैसे करो की सीमा पर फैसला करेगी। वहीं करों की वसूली की सीमा पर भी फैसला लेने का अधिकार परिषद को होगा। परिषद के अधिकार क्षेत्र में करों की वसूली की सीमा पर भी फैसला करना भी शामिल है।
देश में बनेगा एकल बाजार
केंद्र सरकार का देश में जीएसटी कानून लागू करने का मकसद है कि सभी राज्यों में लगभग सभी उत्पाद एक ही कीमत पर मिलेंगे। अभी एक ही उत्पाद के लिए दो राज्यों में अलग-अलग कीमत चुकानी पड़ती है। दरअसल इसकी वजह अलग-अलग राज्यों में लगने वाले कर भी हैं। इसके लागू होने के बाद देश बहुत हद तक एकल बाजार बन जाएगा।
ऐसा होगा परिषद का स्वरूप
जीएसटी परिषद में केंद्रीय वित्त मंत्री अध्यक्ष, केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री (राजस्व) और सभी राज्यों के वित्त मंत्री इसके सदस्य होंगे। राजस्व सचिव जीएसटी परिषद के पदेन सचिव होंगे। इसमें केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड के अध्यक्ष को स्थायी आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया जाएगा, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होगा। इन फैसलों को अंतिम रूप देने के लिए केंद्र का एक तिहाई मत होगा, जबकि राज्यों का इसमें दो-तिहाई दखल होगा। प्रस्ताव मंजूर होने के लिए तीन-चौथाई बहुमत होने का प्रावधान तय किया गया है।
दायरे में होंगे कौन से उत्पाद
मंत्रालय के अनुसार जीएसटी कानून लागू करने के लिए चल रही मशक्कत के बीच सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम की अध्यक्षता वाली समिति ने 'मेरिट गुड्स' की श्रेणी में कुछ वस्तुओं को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने या उन पर बहुत कम टैक्स लगाने के संबंध में सिफारिशें दी हैं। इन वस्तुओं में अधिकांशत: अनाज, खाद्य तेल, सब्जियां और ईधन जैसी रोजमर्रा की वस्तुएं शामिल हैं। सूत्रों का कहना है कि जीएसटी समिति आगामी दो दिन की बैठक में इन सिफारिशों पर भी गौर करके फैसला लेगी।
13Sep-2016

कर प्रणाली को आसान करेगा जीएसटी कानून

जीएसटी परिषद के गठन को मंजूरी
देश में तीन भागों में काम करेगा जीएसटी
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में समान कर व्यवस्था के लिए जीएसटी काननू लागू करने की कवायद में सोमवार को केंद्रीय कैबिनट ने संविधान के तहत जीएसटी परिषद के गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। देश में एक समान कर की व्यवस्था कायम करने वाले जीएसटी कानून कर प्रणाली को आसान करेगा, यह सुर चौतरफा सुनने को मिल रहे हैं। मसलन मोदी सरकार के लिए जीएसटी परिषद के गठन की मंजूरी होने के बाद अगले साल एक अप्रैल से देशभर में जीएसटी कानून लागू करने का रास्ता लगभग साफ हो गया है। हालांकि इस कवायद में चुनौतियां भी बाकी हैं।
केंद्र सरकार के देश में एक अप्रैल 2017 से जीएसटी कानून लागू करने की समय सीमा तय होने में एक कदम सोमवार को केंद्रीय कैबिनेट ने जीएसटी परिषद के गठन की प्रक्रिया को मिली मंजूरी ने आगे बढ़ा दिया है। आर्थिक विशेषज्ञों की माने तो यदि सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पारित कराने की तैयारी में जुटी केंद्र सरकार जीएसटी विधेयक के मसौदे को अंतिम रूप देने की चुनौती को भी पार कर लेगी। दरअसल यह परिषद ही देश में जीएसटी की दरें तय करेगी और जीएसटी कानून लागू करने के लिए तैयार किये जा रहे तीन अलग विधेयकों के मसौदे को अंतिम रूप देगी। जीएसटी परिषद के लिए सरकार से मिली मंजूरी के साथ ही वित्त मंत्रालय ने संविधान संशोधन के तहत जीएसटी परिषद की प्रक्रिया शुरू करने की अधिसूचना भी जारी कर दी है।
अभी चुनौती नहीं हुई कम
आर्थिक विशेषज्ञों की माने तो जीएसटी संबन्धी संविधान संशोधन विधेयक राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की मंजूरी मिलने के बाद ही सरकार का जीएसटी को लागू करने का मुख्य कार्य शुरू हुआ है, जिसमें केंद्र और राज्यों को जीएसटी की दरों को तय करना कम चुनौती नहीं होगी। इसका कारण है कि ये दरे ऐसे तय करनी होंगी, जिसमें केंद्र या राज्यों को राजस्व की हानि न हो। वहीं ऐसे फैसलों में जनता को महंगाई से राहत दिलाने की चुनौती भी कायम रहेगी।
तीन भागों में होगा जीएसटी
जीएसटी कानून बनान के लिए तीन प्रकार के विधेयक तैयार किये जाएंगे, जिसमें एक केंद्रीय जीएसटी, दूसरा राज्य जीएसटी और तीसरा अंतर्राज्यीय जीएसटी शामिल होंगे। परिषद इन तीनों जीएसटी कानून के मसौदे में शामिल किये जाने वाले प्रावधानों को पर सहमति बनाएगी। संविधान संशोधन अधिनियम के तहत केंद्रीय जीएसटी यानि सीजीएसटी को केंद्र सरकार वसूल करेगी। जबकि राज्य जीएसटी यानि एसजीएसटी को राज्य सरकारें वसूल करेंगी। तीसरा इंटीग्रेटेड जीएसटी यानि आईजीएसटी वसूलने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होगा, लेकिन यह दो राज्यों के बीच होने वाले कारोबार पर लागू होगा, इसलिए केंद्र सरकार इस कर को वसूल कर उसे दोनों राज्यों में बराबर बांटेंगी।
जीएसटी परिषद का गठन अधिसूचना जारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में वित्त्त मंत्रालय के जीएसटी परिषद और इसके अलग से सचिवालय गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। संविधान संशोधन अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक अनुच्छेद 278-ए के तहत जीएसटी परिषद का गठन अधिसूचना जारी होने के 60 दिनों के भीतर होना जरूरी है। यानि वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में इस परिषद का गठन 11 नवंबर तक होना है। जीएसटी परिषद में सभी 29 राज्यों और 2 संघशासित प्रदेशों के वित्त राज्य मंत्री प्रतिनिधियों के रूप में शामिल होंगे। कैबिनेट द्वारा मंजूर किये गये प्रस्तावों में जीएसटी परिषद का एक सचिवालय का गठन होगा, जो नई दिल्ली में स्थापित किया जाएगा। वहीं संविधान संशोधन अधिनियम की अधिसूचना जारी होने के बाद जीएसटी पर बनी राज्यों के वित्त्त मंत्रियों की समिति की पहली बैठक 22 सितंबर और 23 सितंबर को होगी। यह समिति जीएसटी बिल के मॉडल, टैक्स की दरें और संसाधनों के दोहरे नियंत्रण जैसे मुद्दों पर अपनी सिफारिशें देगी।
जीएसटी परिषद के अधिकार
जीएसटी परिषद का प्रमुख अधिकार जीएसटी दरों का निर्धारण करना है। मसलन जीएसटी के दायरे और इससे बाहर रखे जाने वाले उत्पादों व सेवाओं के करों, कराधान की दरें, नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली के लिए कर की दर, उसमें दी जाने वाली छूट जैसे करो की सीमा पर फैसला करेगी। वहीं करों की वसूली की सीमा पर भी फैसला लेने का अधिकार परिषद को होगा। परिषद के अधिकार क्षेत्र में करों की वसूली की सीमा पर भी फैसला करना भी शामिल है।
देश में बनेगा एकल बाजार
केंद्र सरकार का देश में जीएसटी कानून लागू करने का मकसद है कि सभी राज्यों में लगभग सभी उत्पाद एक ही कीमत पर मिलेंगे। अभी एक ही उत्पाद के लिए दो राज्यों में अलग-अलग कीमत चुकानी पड़ती है। दरअसल इसकी वजह अलग-अलग राज्यों में लगने वाले कर भी हैं। इसके लागू होने के बाद देश बहुत हद तक एकल बाजार बन जाएगा।
ऐसा होगा परिषद का स्वरूप
जीएसटी परिषद में केंद्रीय वित्त मंत्री अध्यक्ष, केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री (राजस्व) और सभी राज्यों के वित्त मंत्री इसके सदस्य होंगे। राजस्व सचिव जीएसटी परिषद के पदेन सचिव होंगे। इसमें केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड के अध्यक्ष को स्थायी आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया जाएगा, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होगा। इन फैसलों को अंतिम रूप देने के लिए केंद्र का एक तिहाई मत होगा, जबकि राज्यों का इसमें दो-तिहाई दखल होगा। प्रस्ताव मंजूर होने के लिए तीन-चौथाई बहुमत होने का प्रावधान तय किया गया है।
दायरे में होंगे कौन से उत्पाद
मंत्रालय के अनुसार जीएसटी कानून लागू करने के लिए चल रही मशक्कत के बीच सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम की अध्यक्षता वाली समिति ने 'मेरिट गुड्स' की श्रेणी में कुछ वस्तुओं को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने या उन पर बहुत कम टैक्स लगाने के संबंध में सिफारिशें दी हैं। इन वस्तुओं में अधिकांशत: अनाज, खाद्य तेल, सब्जियां और ईधन जैसी रोजमर्रा की वस्तुएं शामिल हैं। सूत्रों का कहना है कि जीएसटी समिति आगामी दो दिन की बैठक में इन सिफारिशों पर भी गौर करके फैसला लेगी।
13Sep-2016

सौर ऊर्जा से रोशन होंगे देश के आश्रम

सरकार का देश के धर्म गुरुओं से मदद लेने का फैसला
हरिभूमि ब्यूरो. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार की देश में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए देशभर में बने आश्रमों को सोलर ऊर्जा से रोशन करने की तैयारी में है।मसलन यह फैसला सरकार ने पेरिस जलवायु सम्मेलन में शुरू किये गये इंटरनेशनल सोलर अलायंस के तहत लिया गया है।
केंद्रीय नवीन व नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि पिछले साल पेरिस जलवायु सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने
इंटरनेशनल सोलर अलायंस लांच किया था। देश में ऊर्जा बचत के लिए सौर ऊर्जा को दिये जा रहे बढावा के तहत केंद्र सरकार छतों पर लगाए गए सौर ऊर्जा के 40 हजार मेगावाट क्षमता के लक्ष्य को पूरा करने के लिए देश के धार्मिक गुरुओं का मदद लेने में जुटी हुई है, जिन्हें अपने आश्रमों को सौर ऊर्जा से लैस करने को प्रोत्साहित भी कर रही है। इस बारे में नवीन व नवीकरणीय ऊर्जा सचिव उपेंद्र त्रिपाठी का कहना है कि सरकार की इस योजना में अब धार्मिक गुरु अंतर्राष्ट्रीय सोलर अलायंस के आध्यात्मिक सहयोगियों के तौर पर काम करेंगे। उन्होंने बताया कि इंटरनेशनल सोलर अलायंस में 100 ऐसे देश शामिल हैं जो उष्णकटिबंधीय हैं। उन्होंने कहा कि अध्यात्मिक गुरुओं के मानने वाले देश के अलावा विदेशों में भी हैं, जो बड़ी संख्या में उनके आश्रमों और योग शिविरों में आते रहते हैं। इसलिए उम्मीद हे कि इस पहल से सौर उर्जा के महत्व व फायदे को आसानी से दुनिया में फैलाया जा सकता है। सरकार ने 2022 तक 175 गीगा वाट सौर ऊर्जा बनाने का लक्ष्य रखा है जिसमें 40,000 मेगावाट रूफटॉप सोलर पावर भी शामिल होगा।
भारत में सबसे बड़ा सोलर एनर्जी सिस्टम
मंत्रालय के अनुसार गत मई में ही दुनिया का सबसे बड़ा सोलर एनर्जी सिस्टम अमृतसर स्थित राधा स्वामी डेरा पर लगाया जा चुका है, जो दुनिया में ऐसा इकलौता ऐसा स्थान बन गया, जहां सोलर पावर सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। इस डेरा के 140 करोड़ वाला सोलर एनर्जी सिस्टम 80 एकड़ में फैला है और यह 19 मेगावाट ऊर्जा दे सकता है। इसी लिहाज से देश में सभी आश्रम इतने बड़े नहीं है, लेकिन कुछ एकड़ वाले छोटे आश्रमों में भी इस सोलर एनर्जी एप्लीकेशन का उपयोग किया जा सकता है। इसके अलावा सोलर पावर प्रोजेक्ट को बड़ी जगह इसलिए भी चाहिए ताकि व फोटो वोल्टाइक पैनल का बेहतर उपयोग कर सके जहां से सूर्य की रोशनी बिजली में बदल जाएगी।
ऊर्जा की बचत में मदद
मंत्रालय के अधिकारी त्रिपाठी की माने तो यदि एक आश्रम से भी हमें एक मेगावाट सौर ऊर्जा के लिए यह प्रणाली लागू की जाए तो यह दूसरों को प्रोत्साहित करने के लिए काफी होगा। वहीं सोलर प्रोजेक्ट आश्रमों की भी मदद करेगा। इससे वहां बिजली के बिल में कमी आएगी और वे ग्रिड को भी बिजली बेच सकेंगे। गौरतलब है कि गत मार्च के महीने में दिल्ली में श्री श्री रविशंकर के आर्ट आॅफ लिविंग द्वारा आयोजित वर्ल्ड कल्चरल फेस्टिवल के दौरान एक इंटरनेशनल इंटरफेथ सोलर अलायंस शुरू किया गया था, जिसने दुनियाभर के अन्य इंटरफेथ संस्थानों से सौर उर्जा को अपने संस्थान में प्रमोट कर आगे बढ़ाने का आग्रह किया व नवीकरणीय ऊर्जा के बारे में जागरुकता फैलाने पर भी बल दिया गया।
13Sep-2016

सोमवार, 12 सितंबर 2016

बंदरगाहों पर दिखने लगा सकारात्मक असर!

सरकार ने समुद्री कारोबार व कामकाज का शुरू किया आकलन
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार द्वारा देश के प्रमुख बंदरगाहों के आधुनिक विकास और समुद्री कारोबार को बढ़ाने के लिए केई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं शुरू की गई है, जिनके नतीजे भी सकारात्मक आने लगे हैं। इसके लिए जहारानी मंत्रालय ने बंदरगाहों का निरीक्षण करने और सभी पोर्टो पर कामकाज की समीक्षा करने का सिलसिला शुरू कर दिया है, ताकि जरूरी संसाधनों को समय रहते पूरा किया जा सके।
केंद्रीय जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी ने मंत्रालय में राज्यमंत्रियों को बंदरगाहों के कामकाज और परियोजनाओं के नतीजों का आकलन करने के लिए सक्रिय कर दिया है। हाल ही में जहाजरानी राज्यमंत्री मनसुख एल मंडाविया ने मुंबई पोर्ट का अवलोकन करके कामकाज की समीक्षा की थी। इसी तर्ज पर दूसरे जहाजरानी राज्य मंत्री पॉन. राधाकृष्णन ने कोचीन पोर्ट ट्रस्ट के अवलोकन के लिए कोचिन पहुंचे और विकास कार्यो और कामकाज का अवलोकन करके जायजा लिया। कोचिन बंदरगाह पर समुद्री कारोबार के प्रोत्साहन की परियोजनाओं के नतीजो और वहां के कामकाज की समीक्षा बैठक भी की गई। सरकार द्वारा बंदरगाहों पर शुरू की गई इस समीक्षा बैठकों का मकसद बंदरगाहों के विकास के लिए चल रही योजनाओें और उनके नतीजों का आकलन करना है, ताकि सरकार समुद्री कारोबार से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था को और मजबूत किया जा सके। इसीलिए बंदरगाह के ट्रस्टों को अपने औद्योगिक उत्पादन और विशाल भूमि क्षेत्र में संबंधित गतिविधियों को बढ़ावा देने की जरूरत पर बल दिया जा रहा है, जिसके लिए कोचीन पोर्ट ट्रस्ट को भविष्य की 10 वर्ष की ऐसी योजना तैयार करने को कहा गया है।
समीक्षा बैठक में मंथन
मंत्रालय के अनुसार कोचिन बंदरगाह पर जहाजरानी राज्यमंत्री राधाकृष्णन ने समुद्री कारोबार के प्रोत्साहन की परियोजनाओं के नतीजो और वहां के कामकाज की समीक्षा के लिए बैठक भी की। बैठक में जहाजरानी मंत्रालय के संयुक्त सचिव (बंदरगाह) प्रवीण कृष्ण,कोचीन पोर्ट ट्रस्ट के उपाध्यक्ष एवी रमण और विभागों के अन्य प्रमुखों के साथ बंदरगाहों के विकास और कारोबार को मजबूत करने पर विचार विमर्श हुआ। मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि राज्यमंत्री राधाकृष्णन ने इस मौके पर समुद्री व्यापार को सुविधाजनक बनाने और उसकी दक्षता बढ़ाने की दिशा में आरएफआईडी आधारित गेट एक्सेस सिस्टम और लागू की गई आॅनलाइन बर्थ आबंटन प्रणाली को सरकार की प्रतिबद्धता के अनुरूप बताया। राज्यमंत्री ने कहा कि दंडात्मक ब्याज में छूट के साथ कोचीन पोर्ट ने तेजी से नई परियोजनाओं को आगे बढ़ाने को स्वीकृति देते हुए अपनी साख में वृद्धि की है। इस मौके पर संयुक्त सचिव (बंदरगाह) प्रवीण कृष्ण ने पोर्ट के सामने आने वाली अल्पावधि समस्याओं का उल्लेख भी किया।
क्रूज पर्यटन को बढ़ावा
मंत्रालय के अनुसार सरकार की परियोजनाओं के तहत कोचीन पोर्ट पर क्रूज पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा मिलता नजर आ रहा है। इस पोर्ट पर अधिक पेशेवर तरीके से अंतर्राष्ट्रीय मानकों के समान क्रूज जहाजों को समायोजित करने हेतु एनार्कुलम घाट पर बनाई गई नई क्रूज टर्मिनल परियोजना का सरकार विस्तार करने में मदद करेगी। मंत्रालय का मानना है कि कोच्चि में क्रूज जहाजों की घरेलु पोर्टिंग के साथ भारत में घरेलू क्रूज पर्यटन की उच्च संभावनाएं हैं।
स्वच्छता अभियान पर बल
सरकार के स्वच्छ भारत अभियान का भी बंदरगाहों पर असर नजर आ रहा है। कोचीन पोर्ट के प्रयासों के तहत यहां के कर्मचारियों,व्यापार और समुदाय सहित सभी हितधारकों को इसमें शामिल करने के पहले से निर्देश दिये जा चुके हैं। पोर्ट के अधिकारियों के साथ कर्मचारियों द्वारा बंदरगाह पर स्वच्छ भारत अभियान के प्रभावी प्रदर्शन करने की दिशा में किए गये प्रयासों को भी केंद्रीय राज्यमंत्री ने सराहा और कहा कि इसे और प्रलेखित किया जा सकता है।
12Sep-2016

पीएफ की ब्याज दरों पर चलेगी कैंची!

सीबीटी के फैसले पर सहमत नहीं सरकार
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार जहां कर्मचारियों को सातवें वेतनमान का तोहफा दे चुकी है, वहीं पिछले साल पीएफ की रकम पर दी गई ब्याज दरों में भी कटौती करने पर विचार कर रही है। इसका कारण माना जा रहा है कि केंद्र सरकार ईपीएफओ के केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) के पीएफ ब्याज दर बढ़ाने के फैसले से सहमत नहीं है।
सूत्रों के अनुसार कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने वित्त मंत्रालय द्वारा 8.7 प्रतिशत ब्याजदर की पुष्टि करने के बावजूद पिछले साल यानि 2015-16 में ईपीएफ पर 8.8 फीसदी के हिसाब से ब्याज दिया है। सरकार का कहना है कि ईपीएफओ ने मौजूदा वित्त वर्ष में होने वाली आय का अब तक कोई अनुमान नहीं लगाया है। शायद इसलिए सरकार अब मौजूदा वित्तीय वर्ष में पीएफ की इन ब्याज दरों पर कैंची चलाने की तैयारी में है। बताया जा रहा है कि वित्त मंत्रालय और श्रम मंत्रालय दोनों ही पीएफ की रकम पर दी गई 8.8 प्रतिशत के बजाए 8.6 प्रतिशत की दर रखने पर सहमति बना चुके हैं। यानि अब ईपीएफओ के चार करोड़ से भी ज्यादा भविष्य निधि के अंशधारकों की पीएफ जमाओं पर 8.6 प्रतिशत की दर का ब्याज लागू किया जा सकता है।
वित्त एवं श्रम मंत्रालय में बनी सहमति
सूत्रों की माने तो वित्त मंत्रालय की ओर से श्रम मंत्रालय से कहा गया है कि वह ईपीएफ की ब्याज दर को उसके द्वारा संचालित अन्य बचत योजनाओं के समकक्ष ही रखे। दोनों मंत्रालयों के बीच इस साल पीएफ की ब्याज दर को कम करते हुए 8.6 प्रतिशत रखने पर सहमति बनी है। वित्त मंत्रालय चाहता है कि श्रम मंत्रालय ईपीएफ पर ब्याज दर को अपने अधीन आने वाली अन्य लघु बचत योजनाओं के हिसाब से रखे। सूत्रों के अनुसार ईपीएफओ का केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) आय अनुमान के आधार पर ही ब्याज दर के बारे में फैसला करता है, जिसे बोर्ड की वित्त, आॅडिट व निवेश समिति की मंजूरी होना जरूरी है। सीबीटी द्वारा तय ब्याज दर पर ही वित्त मंत्रालय अपनी स्वीकृति देकर एक अधिसूचना जारी करता है।
श्रमिक संगठनों का विरोध
सूत्रों के अनुसार वित्त मंत्रालय चाहता है कि पीपीएफ जैसी उसकी लघु बचत योजनाओं के लिए ब्याज दर को घटाकर 8.6 प्रतिशत पर लाया जाए, क्योंकि सरकारी प्रतिभूतियों व अन्य बचत पत्रों पर आय घट रही है। दूसरी ओर श्रमिक संगठनों की राय है कि वित्त मंत्रालय को सीबीटी के फैसले का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए, क्योंकि ईपीएफ कमर्चारियों का पैसा है और उन्हें अपने कोष के निवेश से अर्जित आय से ही ब्याज मिलता है।
सरकार का तर्क
केंद्रीय वित्त मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि वित्त मंत्रालय की इस बात पर सहमति है कि यह ब्याज दर ईपीएफओ की आय से अधिक नहीं होनी चाहिए। ईपीएफओ को यह ब्याज अपने ही संसाधनों से अदा करने में सक्षम होना चाहिए। ब्याज दर में कमी करने का फैसला कर्मचारी संगठनों को एक बार फिर से नाराज कर सकता है।
अब तक ऐसी रही ईपीएफ पर ब्याज दरें
वर्ष 2015-16 में 8.8 प्रतिशत।
वर्ष 2014-15 में 8.75 प्रतिशत।
वर्ष 2013-14 में 8.75 प्रतिशत।
वर्ष 2012-13 में 8.5 प्रतिशत।
वर्ष 2011-12 में 8.25प्रतिशत।
@12Sep-2016

रविवार, 11 सितंबर 2016

जल्द होगा जीएसटी परिषद का गठन!

शीतकालीन सत्र में जीएसटी पारित कराने की कवायद
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार अगले साल एक अप्रैल से जीएसटी कानून लागू करने की समय सीमा तय करने के बाद इससे जुड़े संविधान संशोधन के पड़ाव को पूरा कराने के बाद जीएसटी परिषद के गठन की तैयारी में जुट गई है, जिसकी जल्द ही अधिसूचना जारी हो सकती है। सरकार का मकसद जीएसटी कानून को संसद के आगामी शीतकालीन में पारित कराना है, ताकि अन्य औपचारिकताओं को तय समय सीमा से पहले पूरा किया जा सके।
देश में अर्थव्यवस्था के सुधार की दिशा में केंद्र सरकार अगले साल एक अप्रैल से जीएसटी कानून लागू करने की समय सीमा तय कर चुकी है, जिसके लिए सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से संबन्धि संविधान संशोधन विधेयक संसद और करीब 20 राज्यों से पारित कराने के बाद राष्ट्रपति की भी मंजूरी हासिल कर ली। इससे सरकार के लिए एक अप्रैल 2017 को देश में जीएसटी कानून लागू करने का रास्ता साफ होने लगा है, जिसके लिए सरकार विस्तृत खाका पहले ही सार्वजनिक कर चुकी है। जीएसटी के जरिए सरकार का लक्ष्य काराधान की उपयुक्त दर तय करना है। हालांकि जीएसटी दर के बारे में अंतिम फैसला जीएसटी परिषद का होगा, जिसके गठन का प्रावधान अंजाम हासिल कर चुके जीएसटी संबन्धी संविधान (122वें संशोधन) विधेयक में शामिल है। सूत्रों के अनुसार सरकार जीएसटी परिषद के गठन की तैयारी में सरकार जुट गई है, वहीं केन्द्रीय जीएसटी और राज्य जीएसटी के साथ ही एकीकृत जीएसटी कानूनों का खाका तैयार करने के लिये केन्द्र और राज्य सरकारें रात-दिन काम कर रही हैं। सरकार का मकसद है कि जीएसटी कानून को संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पारित कराया जा सके। केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली पहले ही कह चुके हैं कि जीएसटी कानून लागू होने से देश भर में अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन होना तय है, जिसके लागू होने पर उत्पाद शुल्क, बिक्री कर, सेवा शुल्क, चुंगी और अन्य तरह के कर इसमें समाहित हो जाएंगे और कर संग्रह को केंद्र तथा राज्यों के बीच बांटा जाएगा।
जीएसटी परिषद पर मंथन
दरअसल जीएसटी दर के बारे में फैसला करने वाली जीएसटी परिषद में केंद्र के अलावा राज्यों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाएगा। केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में गठित होने वाली जीएसटी परिषद में केंद्र के राजस्व के प्रभारी वित्त राज्यमंत्री और राज्यों के वित्त मंत्रियों के अलावा आर्थिक विशेषज्ञों को भी शामिल किया जा सकता है। दरअसल जीएसटी परिषद अन्य बातों के अलावा कर ढांचे, कर दरों, रियायतों और आवश्यक नियमों के बारे में भी सुझाव देगी। वहीं यह परिषद को जीएसटी काननू में राजस्व अनिवार्यताओं तथा कर की दर कम करने की जरूरत जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर संतुलन कायम करने का प्रावधान करना होगा। इसी परिषद को लेकर इस समय माथापच्ची चल रही है।
बन सकती है निपटान प्रणाली
आर्थिक विशेषज्ञों की माने तो जीएसटी परिषद के सुझाव केंद्र और राज्यों के बीच विवाद खड़ा कर सकते हैं। इस आशंका को देखते हुए यह जरूरी है कि जीएसटी कानूनों को सहिष्णुपूर्ण माहौल में क्रियान्वित कराने के लिए संभावना है कि एक समुचित विवाद निपटान प्रणाली का भी गठन होगा। ऐसे विवादों के समाधान के लिए जीएसटी विधेयक की धारा 279ए (11) में जीएसटी परिषद को यह अधिकार मिला है कि वह कोई विवाद होने पर उससे निपटने के लिए एक प्रणाली का गठन कर सकती है। मसलन जीएसटी संबंधी विधेयक की धारा 279ए (11) के मौजूदा प्रावधान कई गंभीर संवैधानिक और कानूनी सवाल भी खड़े करते हैं।
क्या कहता है मंत्रालय
जीएसटी लागू करने के लिए वित्त मंत्रालय में राजस्व सचिव हसमुख अधिया का कहना है कि जीएसटी के संविधान संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने से सरकार की समय सीमा में जीएसटी कानून लागू करने का रास्ता साफ हो गया है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली का एक अहम मकसद पूरे देश के लिए एकसमान कर ढांचा तैयार करना है, जिससे समूचा भारत एकल बाजार बन जाएगा। हालांकि भारतीय संघीय व्यवस्था के तहत इस तरह की राजस्व सुसंगतता को अक्सर संविधान में वर्णित वित्तीय स्वायत्तता के सिद्धांतों के प्रतिकूल माना जाता है।
11Sep-2016

राग दरबार: कांग्रेस को रास नहीं आई खाट...

कांग्रेस के पहले ही मजमे में खड़ी हो गयी खाट
देश की सियासत में पीके का आइडिया कांग्रेस के सिर चढ़कर बोल रहा है, जिसके आइडिया ने नरेन्द्र मोदी को पीएम की कुर्सी पर बैठा दिया। अब उत्तर प्रदेश में खोई हुई सियासी जमीन को पाने के लिए कांग्रेस पीके के आइडिया पर सवार है। लेकिन किसी ने सच ही कहा है कि नकल करने के लिए अकल की ज्यादा जरूरत होती है। यह कहावत पीके के आडिया पर मोदी की लोकसभा चुनाव में चाय पर चर्चा का जवाब देने के लिए राहुल की खाट पंचायत पर सटीक बैठती है। लेकिन यह कया पीके? ऐसा आइडिया कि कांग्रेस के पहले ही मजमे में खाट खड़ी हो गयी और देखते-देखते यह खाट आदमी के सिर पर ही सवार नहीं हुई, बल्कि कांग्रेस युवराज के साथ खटिया लूट सोशल मीडिया और खबरिया चैनलो के बुद्धू बक्से पर छा गई। दरअसल पीके के इस आइडिया की स्क्रिप्ट के मुताबिक पदयात्रा पर निकले कांगे्रस युवराज राहुल के पॉव में छाले पड़ने और मुखमंडल पर श्रमबिंदु झलकने की भावुक कथा का जिक्र होना था, लेकिन ऐसा हो न पाया और राहुल की पहली ही खाट पंचायत में खाट की किस्मत कांग्रेस पर भारी पड़ती नजर आई। वैसे खाट होती ही है हरजाई। दुनियाभर की यही दास्तां यही है कि विधाता भी नहीं जान पाते कि कब किसकी खाट खडी हो जाए। क्योंकि राजनीति से हट कर भी खाट कथा अनंत है। राजनीतिक गलियारों में इस खटिया लूट को लेकर चर्चाओं का सामना करें तो किसी बड़े नेता के खाट पर खडे होकर भाषण देते देखना बहुतों की जिंदगी में नया अनुभव हो सकता है, लेकिन गांव की चौपालों व पंचायतों में खाटों पर बैठकर बौद्धिक और न्याय के फैसले होते रहे हैं। ग्रामीण परंपरा के इतर राहुल मजबूर नहीं थे और न ही खाट की आदत है। फिर भी अभी वक्त का इंतजार है कि किसकी खाट सरकेगी और किसका खटोला कहां बिछेगा..?
बदली दाता-पाता की परिभाषा
मोदी सरकार ने देश की व्यवस्था में ऐसा बदलाव करने के इरादे से योजनाओं को अमलीजामा पहनाने का इरादा किया हुआ है,जिससे भारत विश्वगुरु के रूप में विकसित हो और दुनिया की नजरे इस लोकतांत्रिक देश की ओर आकर्षित हो। देश में कई योजनाओं से दुनिया मोदी की नीतियों की कायल होती भी नजर आ रही है। ऐसी ही योजनाओं में नमामि गंगे मिशन और देश में जल संकट को दूर करके खासकर किसानों के हितों को साधने वाली सिंचाई परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने में दिलचस्पी रख रही केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती ने हाल ही में नाबार्ड के साथ महत्वपूर्ण करार किया है, जिसके सहारे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना समेत तमाम सिंचाई योजनाओं को अमलीजामा पहनाया जाना शुरू हो गया है। इस मौके पर सुश्री उमा भारती ने मीडिया से रूबरू होते हुए कहा कि वे उनसे ऐसा सवाल न पूछे कि इन परियोजनाओं के लिए पैसा कहां से आ रहा है, क्योंकि मोदी सरकार ने पुराने जमाने में राजा तथा प्रजा की परिभाषा बदलना शुरू कर दिया है, जिसमें राजा को दाता और प्रजा को पाता के रूप में जाना जाता था। उन्होंने कहा कि इस बदलते देश में सरकार पाता और जनता दाता बनने लगी है, जिसमें सरकार जनता के साथ हाथ फैलाकर मदद मांग रही है और जनांदोलन के साथ ही योजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है। उमा का मत है कि देश बदल रहा है,जिसमें बदला है दाता-पाता...?
सुचिता की परिभाषा माने कौन...
राजनीति और इसमें उतरने वाले राजनेता शुरूआत में इसमें शामिल होने पर जनता के सामने ईमानदारी, नैतिकता, ऊंचे आदर्शों और सुचिता का किसी भी कीमत पर पालन करने की दुहाई देते हुए नजर आते हैं। लेकिन एक बार राजनैतिक पद पर पहुंचने के बाद वो कभी उनके द्वारा बेशकीमती कहे जाने वाले इन्हीं शब्दों को भूल जाते हैं या यूं कहें कि उसे जानबूझकर भुला देना चाहते हैं। लेकिन जैसे ही इन्हें मौका मिलता है, सुचिता के नाम पर दूसरे को घेरने में देर नहीं लगाते। ऐसे महानुभावकेंद्र व राज्य स्तर पर चारों ओर देखने को मिल जाते हैं। लेकिन इसमें बड़ा सवाल यही है कि जिस सुचिता की इतनी चर्चा-परिचर्चा होती है, उसे हकीकत में मानने वाला कोई नहीं है।
-ओ.पी. पाल व कविता जोशी
11Sep-2016

शनिवार, 10 सितंबर 2016

पेंशनरों को राहत देने में जुटी सरकार!

पेंशन निधि विनियामक ने शुरू की नई पहल

ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार की देश के पेंशनरों को राहत देने के लिए पेंशन निधि और विकास प्राधिकरण ने पेंशनरों के एनपीएस खातों के लिए एक नई पहल को दिशा दी है, जिसमें सरकार की अटल पेंशन योजना जैसी तमाम पेंशन योजनाओं में उपभोक्ताओं को अपने विकल्पों का चुनाव करने की स्वतंत्रता मिलेगी।
मोदी सरकार ने उपभोक्ताओं की वृद्धावस्था में आय की सुरक्षा के लिए पेंशन क्षेत्र के विनियमन और विकास के लिए एक पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए)की स्थापना की थी। पीएफआरडीए नेशनल पेंशन सिस्टम को सरल बनाने और परिचालन संबंधी मामलों को बेहतर बनाने के लिए समय-समय पर कई उपाय किये हैं। राष्टÑीय पेंशन प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए अब प्राधिकरण ऐसी योजना बनाने की तैयारी में हैं, जिसमें शामिल विकल्पों को चुनने की स्वतंत्रता मिल सकेगी। पीएफआरडीए ने खासतौर पर एनपीएस उपभोक्ताओं के लिए कुछ नई विषेशताएं पेश करने की योजना बनाई है। इनमें एसेट क्लास फॉर अल्टरनेट इंवेस्टमेंट फंड्स भी शामिल हेै। मसलन सरकार की इस योजनाओं के तहत प्राधिकरण की इस पहल में पेंशन फंड के विकल्प से सार्वजनिक क्षेत्र के पीएफ के लिए केंद्र सरकार के कर्मचारियों के फंड के आवंटन पर लागू प्रतिबंध खत्म हो जाएंगे और इससे उन्हें निजी क्षेत्र के एनपीएस उपभोक्ताओं से बराबरी करने का मौका मिलेगा और वे सभी पेंशन फंडों में से पेंशन फंड का चयन करने का मौका मिलेगा। इससे उन्हें न सिर्फ उपभोक्ताओं की पसंद के मुताबिक पीएफ चुनने का मंच मिलेगा, बल्कि इससे पीएफआरडीए अधिनियम का उद्देश्य भी पूरा होगा, जो धारा 20 (20) के अंतर्गत पेंशन फंडों का विकल्प मुहैया कराएगा। निवेश पैटर्न के विकल्प के साथ जहां कर्मचारियों को विभिन्न परिसंपत्ति श्रेणियों में निवेश का विकल्प मिलेगा, उपभोक्ता निर्देशित निवेश प्रणाली से पसंद के मुताबिक निवेश प्रणाली की ओर बढ़ने का मौका मिलेगा।
दायरे में असंगठित क्षेत्र
सूत्रों के अनुसार इसमें असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों व कर्मचारियों को वृद्धावस्था आय सुरक्षा व पेंशन के दायरे में लाने के लिए सरलीकरण किया गया है, जिसे आमतौर पर निजी क्षेत्र, सरकारी, अर्द्ध सरकारी संगठनों जैसे सूक्ष्म उद्योगों, एसएसआई यूनिट, आंगनवाड़ी, आशा कार्यकर्ता, निर्माण बोर्ड, ग्राम पंचायत, एनजीओ, एसएचजी के कर्मचारियों और कामगारों के लिए स्वचालित पंजीकरण के तौर पर जाना जाता है। योजना के तहत उपभोक्ता द्वारा व्यक्तिगत विवेकाधिकार के अनुसार चुनिंदा एसेट क्लास या नई परिसंपत्ति श्रेणी का चुनाव किया जा सकता है। प्राधिकरण के सूत्रों के अनुसार इस योजना में नई परिसंपत्ति श्रेणी में कॉमर्शियल मॉर्टगेज आधारित प्रतिभूतियां या रेजिडेंशियल मॉर्टगेज आधारित प्रतिभूतियां, रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट्स द्वारा जारी यूनिट, एसेट बैक्ड प्रतिभूतियां, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड द्वारा विनियमित इन्फ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट ट्रस्ट्स की यूनिट, सेबी में पंजीकृत अल्टरनेटिव इंवेस्टमेंट फंड्स भी शामिल होंगे। गौरतलब है कि मौजूदा लाइफ साइकिल फंड (डिफॉल्ट मोड के अंतर्गत उपलब्ध) के अलावा एनपीएस निजी क्षेत्र के उपभोक्ताओं के लिए दो अतिरिक्त लाइफ साइकिल फंड की पेशकश की प्रक्रिया जारी है। 35 वर्ष की उम्र में 75 फीसदी इक्विटी आवंटन के साथ इन फंडों को ‘एग्रेसिव लाइफ साइकिल फंड’ और 35 वर्ष की उम्र में 25 फीसदी इक्विटी आवंटन के साथ ‘कंजरवेटिव लाइफ साइकिल फंड’ के रूप में है।
सरकारी कर्मचारियों को भी राहत
प्राधिकरण के अनुसार इस योजना में शामिल प्रस्ताव में एलसी-50 ‘मॉडरेट लाइफ साइकिल फंड’ और एलसी-25 ‘कंजरवेटिव लाइफ साइकिल फंड’ अन्य विकल्पों के साथ सरकारी कर्मचारियों को भी उपलब्ध कराया जाएगा। इस मुद्दे पर विभिन्न मंत्रालयों से सुझाव लेने की प्रक्रिया चल रही है। प्रधाधिकरण ने सरकारी कर्मचारियों को चार योजनाओं के जरिए आसान विकल्प मुहैया कराने का प्रस्ताव रखा है। इन योजनाओं में अधिकतम 50 फीसदी इक्विटी आवंटन के साथ मॉडरेट लाइफ साइकिल फंड एलसी-50,अधिकतम 25 फीसदी इक्विटी आवंटन के साथ कंजरवेटिव लाइफ साइकिल फंड शामिल है। वहीं स्कीम-जी, जहां 100 फीसदी फंड का निवेश सरकारी प्रतिभूतियों में किया जाएगा। इसके अलावा मौजूदा और नए उपभोक्ताओं के लिए डिफॉल्ट स्कीम होने के नाते सीजी या एसजी स्कीम के मौजूदा विकल्प का प्रस्ताव है। सरकारी उपभोक्ताओं को सभी पेंशन फंडों के विकल्प चुनने की अनुमति होगी, जिसमें निजी क्षेत्र के पेंशन फंड शामिल होंगे। हालांकि नई चयन प्रक्रिया में हुए चुनाव के आधार पर सार्वजनिक क्षेत्र के पेंशन फंडों का एक समूह मौजूदा और नए उपभोक्ताओं के लिए डिफॉल्ट विकल्प के तौर पर उपलब्ध होगा।
10Sep-2016

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

डिजीलॉकर से मिलेगी करोड़ो को राहत

पुलिस चैंकिंग में भ्रष्टाचार पर भी लगेगा अंकुश
हरिभूमि ब्यूरो. नई दिल्ली।
आखिर केंद्र सरकार ने वाहन चलाने वालों को पुलिस चैंकिंग के दौरान कागज साथ लेकर चलने के झंझट से निजात दिला दी है। इसके लिए देशभर के लिए ‘डिजीटल इंडिया’ मिशन के तहत ‘डिजीलॉकर’ सेवा शुरू कर दी है। इस प्रणाली के जरिए सरकार का भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के साथ यातायात नियमों में पारदर्शिता लाना चाहती है।
यहां परिवहन भवन में आयोजित एक समारोह में प्रधानमंत्री के ‘डिजीटल इंडिया’ मिशन को आगे बढ़ाते हुए केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर ने संयुक्त रूप से ‘डिजीलॉकर’ सेवा के रूप में डिजीटल मोबाइल एप की शुरूआत की। इस प्रणाली के तहत कार, स्कूटर, मोटर साइकिल या किसी अन्य वाहन को चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस (डीएल) और वाहन पंजीकरण प्रमाणपत्र (आरसी) जैसे कागजातों की जरूरत खत्म हो गई है। इस योजना की शुरूआत करते हुए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि इसकी शुरूआत से प्रशासनिक जटिलता कम होगी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि इस योजना से कागज रहित प्रशासनिक व्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा। वहीं चैकिंग के दौरान वाहन चालाकों को गाड़ी के कागजात न होने पर कानूनी दावपेंच का भी सामना नहीं करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि लाइसेंस और डीएल के इलैक्ट्रोनिक स्वरुप से फजीर्वाड़ा रोका जा सकेगा और कागजातों की जांच आसानी से हो सकेगी। इससे नकली और असली कागजातों का भी पता चल सकेगा।
करोड़ो को मिलेगा फायदा
गडकरी कहा कि देश में 19 करोड़ 60 लाख 72 हजार 380 वाहन पंजीकृत हैं। डिजिटल मोबाइल प्रारुप के लिए नौ करोड़ वाहनों और चालकों का डाटाबेस तैयार कर लिया गया है। देशभर के 1000 से अधिक क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों को डिजिटल किया जा सकेगा। इस डिजिटल मोबाइल ऐप को डिजीटलॉकरडाटकामडाट इन से डाउनलोड किया जा सकेगा। इस ऐप के जरिए लाइसेंस और आर.सी मोबाइल फोन में रखी जा सकेगी।
ऐप में मिलेंगी 20 से 30 सर्विस
इस सुविधा की शुरूआत करते हुए गडकरी ने संकेत दिये कि सरकार जल्द ही एम-परिवहन एप की भी शुरूआत करेगी, जिसमें
परिवहन से जुड़ी सभी जानकारियां उपलब्ध होंगी। वहीं इसकी मदद से यूजर्स लाइसेंस रिन्युअल जैसी 20 से 30 अलग अलग सर्विस का भी फायदा उठाया जा सकेगा। खासबात है कि इस एप से जुड़ी सबसे बड़ी सुविधा यह होगी कि हर किसी के दस्तावेज सुरक्षित रहेंगे।
08Sep-2016