बुधवार, 4 अगस्त 2021

साक्षात्कार: संस्कृति व सभ्यता में लघुकथा साहित्य की भूमिका महत्वपूर्ण: डा. देवगुण

व्यक्तिगत परिचय 

नाम: डा. रूप देवगुण

जन्म: एक नवम्बर 1943 

जन्म स्थान: नरवड़ (लाहौर) पाकिस्तान

शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी और पंजाबी), बीएड., पीएचडी(मानद). 

कार्यक्षेत्र: हिंदी प्राध्यापक, राजकीय नेशनल महाविद्यालय सिरसा(हरियाणा)   

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हरियाणा में लघु कथा का इतिहास रचने वालों में शुमार सिरसा के प्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार डा. रूप देवगुण को हरियाणा साहित्य अकादमी ने बाबू बालमुंकुंद गुप्त सम्मान-2018 से सम्मानित किया है। साहित्य के क्षेत्र में लघुकथाकार के रूप में समाज को दिशा देने की भूमिका निभाने वाले डा. देवगुण द्वारा लिखित कहानी संग्रह, काव्य संग्रह, गजल संग्रह और निबंध संग्रह में हरियाणा की संस्कृति, सभ्यता और सामाजिक रीति रिवाजों को भी अपने शब्दों में वर्णित किया है। डा. देवगुण का मानना है कि आज के इस आधुनिक युग में गुमनाम होती भारतीय संस्कृति और समाज को दिशा देने के लिए साहित्य की भूमिका अहम है, जिसकी प्रासांगिकता को कभी खत्म नहीं किया जा सकता। हरियाणा में लघुकथा साहित्य को ऐतिहासिक स्वरूप देने में अग्रणी साहित्यकारों में शामिल रहे साहित्यकार डा. रूप देवगुण ने हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत के दौरान कई पहलुओं के साथ अपने अनुभव साझा किये हैं।

साहित्यकार डा. देवगुण का हरियाणा में लघुकथा साहित्य में विशेष स्थान है, जिन्होंने वर्ष 2016 में हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच की स्थापना करके 15 जिलों में इस मंच की शाखाएं खोल कर लघुकथा साहित्य में एक ऐसा मील का पत्थर स्थापित कर दिया है, जो भविष्य में समाज, खासकर युवा पीढ़ी के लिए एक इतिहास बनकर उभरेगी। हरियाणा का लघुकथा संसार व हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथाएं के संपादन के बाद रूप देवगुण ने समीक्षा-संग्रह 'हरियाणा के इक्कीस काव्य-संग्रह समीक्षात्मक अध्ययन' लिखा, जो राज्य के 21 रचनाकारों को लेकर रहा। यह संग्रह बेहद सुर्खियों में रहा है। हरियाणा में लघुकथा का इतिहास बनाने की दिशा में साहित्य को आगे बढ़ा रहे डा. रूप देवगुण का कहना है कि आज के इस आधुनिक युग में जिस प्रकार से अपनी भाषा, संस्कृति, रीति रिवाज और सामाजिक दायित्व गौण होते जा रहे हैं, उसका कारण बच्चों पर बढ़ते बैग का बोझ भी है, जिसमें अंग्रेजी और साइंस तथा तकनीकी शिक्षा का भी हावी है। पहले बच्चे और बड़े सभी पुस्तकालयों से साहित्य लेकर पढ़ते थे, जिसका प्रचलन भी कम हो रहा है। जबकि साहित्य ही एक ऐसा माध्यम है, जो समाज को दिशा दे सकता है। अपने साहित्य क्षेत्र के कैरियर के बारे में डा. देवगुण का कहना है कि वर्ष 1962-63 में उन्होंने साहित्य लेखन का कार्य शुरू किया था। वर्ष 1969 में नौकरी मिलने और गृहस्थी की जिम्मेदारी बढ़ने से कुछ अंतराल आया, लेकिन वर्ष 1981 से वे लगातार कविता संग्रह और कहानी संग्रह लिखने का काम कर रहे हैं। इसमें लघुकथाओं के जरिए हरियाणा की संस्कृति और सभ्यता तथा सामाजिक गतिविधियों पर आधारित कविताएं और कहानियां लिखकर समाज सेवा के दायित्व निभा रहे हैं। लघुकथा साहित्य को पढ़ने वाला आज भी बहुत बड़ा पाठक वर्ग है, जिसके विस्तार की प्रबल संभावनाएं रहती हैं।

प्रमुख पुस्तकें

डा. रूप देवगुण की लघुकथाओं, कहानी संग्रह, काव्य संग्रह और गजल संग्रह के रूप में लिखी और संपादित की गई 80 से ज्यादा पुस्तके प्रकाशित हो चुकी है। प्रमुख रूप से काव्य संग्रह में ‘मिलन को दूर से देखो, जब तुम चुप रहती हो, आप सब है मेरे आसपास, गुलमोहर मेरे आँगन में, तुम झूठ मत बोला करो, खिड़की खोल कर तो देखो, नदी की तैरती सी आवाज़, धूप मुझे है बुला रही, पत्तों से छन कर आई चाँदनी आदमी शामिल हैं। कहानी संग्रह में छतें बिन मुंडरे की, कब सोता है यह शहर, अनजान हाथ की इबारत, मेरी प्रिय कहानियाँ आदि। एकल लघुकथाओं में संग्रह दूसरा सच, यह मत पूछो, मेरी प्रिय लघुकथाएँ, तो दिशु ऐसे कहता, आदि सुर्खियों में रही। जबकि ग़ज़ल संग्रह में ‘ये कभी सोचा न था, लघुकथा निबन्ध संग्रह हिन्दी लघुकथा: उलझते-सुलझते प्रश्न, समीक्षा पुस्तक हरियाणा के इक्कीस काव्य-संग्रह, आधुनिक हिन्दी लघुकथा:आधार एवं विश्लेषण आदि पंजाबी कहानी संग्रह सभ नूं चाही दै सहारा आदि पुस्तकें  प्रकाशित हुई है। साहित्यकार डा. देवगुण जी के साहित्य पर विभिन्न विश्वविद्यालय से एक दर्जन से भी ज्यादा एमफिल और पीएचडी हासिल कर चुके हैं। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय व विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ के अलग अलग पाठ्यक्रम में उनकी रचनाओं को शमिल किया गया है।

पुरस्कार और सम्मान -

हरियाणा साहित्य अकादमी सिरसा के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ.रुप देवगुण को दो लाख रुपये के बाबू बालमुकुंद गुप्त सम्मान-2018 पुरस्कार से सम्मानित किया है। इससे पहले अकादमी वर्ष 2013 में विशेष साहित्यसेवी सम्मान से नवाज चुका है। यही नहीं हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला से उनकी आधा दर्जन से ज्यादा पुस्तकों के प्रकाशन पर अनुदान भी दिया है। देशभर के विभिन्न राज्यों में आयोजित कवि सम्मेलनों और समारोह में भ्रमण करने वाले इस साहित्यकार को विभिन्न संस्थाओं द्वारा भी चार दर्जन से अधिक पुरस्कार व सम्मान से नवाजा जा चुका है।

26July-2021


 

ओलंपिक: सुमित टेनिस और राहुल पैदल चाल में जौहर दिखाने को तैयार

हरियाणा के झज्जर जिले के हैं दोनों खिलाड़ी

ओ.पी. पाल.रोहतक।  

टोक्यो ओलंपिक के लिए पिछले सप्ताह ही अंतिम क्षणों में चुने गये लॉन टेनिस के खिलाड़ी सुमित नागल का सपना अपने रैकेट से तकनीकी प्रदर्शन करके देश के लिए पदक लाने का लक्ष्य होगा। वहीं भारतीय एथेलीट टीम में पैदल चाल के लिए बहादुरगढ़ के राहुल रोहिल्ला के लिए भी ओलंपिक में अपनी क्षमता का प्रदर्शन करने का मौका है।

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सुमित नागल

विश्वभर में अंतर्राष्ट्रीय लॉन टेनिस खिलाड़ी सुमित नागल का जन्म 16 अगस्त 1997 को हरियाणा में झज्जर जिले के छोटे से गांव जैतपुर में एक शिक्षक सुरेश नागल के घर में हुआ था। आठ साल की उम्र में गांव में बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने वाले सुमित से बल्ला लेकर उसके हाथ में टेनिस का रैकेट थमा दिया। इस रैकेट के प्रदर्शन की बदौलत सुमित नागल की आज विश्वभर में धूम मची हुई है। टेनिस खेल के शौकीन सुमित के पिता सुरेश ने टेनिस के खेल में अपने बेटे को आगे बढ़ाने का जो सपना देखा था, वह सपना टोक्यो ओलंपिक में लॉन टेनिस स्पर्धा के लिए अंतिम क्षणों में चुने जाने पर पूरा होता नजर आया। अब ओलंपिक में परिवार को ही नहीं, बल्कि हरियाणा और पूरे देश को सुमित से देश का झंडा बुलंद करने की उम्मीद लगी हुई है। बेटे को अंतर्राष्ट्रीय टेनिस खिलाड़ी बनाने के मकसद से पिता बेटे को दिल्ली टेनिस अकादमी में ले जाते थे, तो वहीं एक बार टेनिस की सनसनी रहे प्रसिद्ध खिलाड़ी महेश भूपति की नजर उस पर पड़ी और भूपति की बदौलत सुमित को जूनियर खिलाड़ी के रूप में सफर तय करने का मौका मिला। इस सफर को जारी रखते हुए सुमित वर्ष 2015 में उस समय सुर्खियां बनकर उभरे, जब उसने इंग्लैंड में हुए जूनियर विंबलडन कप के डबल मुकाबले में देश के लिए पहली बार ग्रैंड स्लेम की ट्राफी जीती। सुमित ने अपने प्रदर्शन की बदौलत वर्ष 2019 विश्व के नंबर एक टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर को पहले ही सेट में हराकर हलचल पैदा करके अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ी। टेनिस के रैकेट से सुमित ने 2017 और 2019 में नौ बार आईटीएफ फ्यूचर्स टूर्नामेंट सिंगल का खिताब जीतने के अलावा दो बार एटीपी चैलेंजर कप अपने नाम करके बड़ी उपलब्धियों में अपना नाम दर्ज कराया।

रोबिन बोपन्ना के साथ बनेगी युगल जोड़ी

ओलंपिक में एकल मुकाबले के अलावा सुमित नागल को सानिया मिर्जा या अंकिता रैना का पार्टनर बनकर डबल मुकाबले में खिलाने की चर्चा है। जबकि अंतर्राष्ट्रीय टेनिस महासंघ और अखिल भारतीय टेनिस संघ ने युगल खिलाड़ी रोहन बोपन्ना के साथ नागल की जोड़ी को मंजूरी दी है।

वर्ष 2016 में डेविस कप में शुरूआत

सुमित नागल ने साल 2016 में डेविस कप टीम में डेब्यू किया और दिल्ली में हुए वर्ल्ड ग्रुप प्लेऑफ मैच स्पेन के खिलाफ मैच खेलाइसके एक साल बाद ही वह विवादों से घिर गए और उन्हें अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत डेविस कप टीम से हटा दिया गया। भारतीय टेनिस खिलाड़ी सुमित नागल पिछले 7 वर्षों में किसी यूएस ओपन ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट में एकल मैच जीतने वाले पहले भारतीय बन गए हैं, इससे पहले यह कारनामा 2013 में सोमदेव देववर्मन ने किया था।

उपलब्धियां

2020-ग्रैंड स्लैम यूएस ओपन जीता

2019- यूएस ओपन में नंबर वन खिलाड़ी फेडरर को हराया

2018-क्वार्टर फाइनल लिस्ट एशियन टूर्नामेंट जकार्ता

2017-गोल्ड मेडेलिस्ट 5वां गेम किर्गिस्तान

2015-जूनियर विंबलडन कप के डबल मुकाबला जीता

2015-आईटीएफ वर्ल्ड जूनियर टेनिस अवार्ड

2011-लॉन टेनिस में आईटीएफ वर्ल्ड जूनियर टेनिस अवार्ड

2011-जूनियर डेविस कप प्लेयर अवार्ड

2011-राष्ट्रपति से मिला नेशनल चाइल्ड अवार्ड

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पैदल चाल में राहुल का लक्ष्य पदक जीतना

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे बहादुरगढ़ के एक गरीब परिवार में पांच जुलाई 1996 में जन्मे राहुल रोहिल्ला का फरवरी में पैदल चाल की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में बेहतर क्षमता के साथ दूसरा स्थान आने पर टोक्यो ओलंपिक में हिस्सा ले रही भारतीय एथेलीट टीम में हो गया था। राहुल के सामने ओलंपिक में देश के लिए खेलने का मौका तो मिला, लेकिन परिवार की माली हालत और दूसरी ओर उसके माता पिता का बीमार रहना उसकी तैयारी में बाधक बनता दिख रहा था। लेकिन माता पिता ने बेटे के सपने को पूरा करने के लिए अपनी दवाईयों के खर्चे में कमी करके बेटे के लिए जूते दिलवाए। वहीं नेशनल जूनियर पैदल चाल में रिकार्ड बना चुके उसके ताऊ के बेटो आशु और आशीष ने भी चेचेरे भाई की मदद के लिए उसका हौंसला बढ़ाया, जिन्हें देखकर ही राहुल ने भी 2013 से पैदल चाल प्रतियोगिता के लिए अभ्यास करना शुरू किया था। एक कहावत है कि जिसे सिर पर मां-बाप का हाथ हो, वह कभी हारता नहीं है। ऐसा ही राहुल रोहिल्ला की जिंदगी की सफलता की इबादत लिखी जा रही है। पिता इलेक्ट्रिशियन का काम करते हैं और मां घर में ही रहती है। किसी तरह परिवार का पालन पोषण हो रहा था, कि राहुल को खेल  कोटे से सेना में सिपाही सिपाही की नौकरी मिल गई। गरीबी और मुश्किलों में घिरे रहने वाले राहुल रोहिल्ला के संघर्ष का ही नतीजा है कि वह आज अंतर्राष्ट्रीय एथेलीट की बुलंदियों पर है। राहुल को उम्मीद है कि वह पैदल चाल में भारत के लिए पदक हासिल करेगा।

हरियाणा के झज्जर जिले के हैं दोनों खिलाड़ी

ओ.पी. पाल.रोहतक।  

टोक्यो ओलंपिक के लिए पिछले सप्ताह ही अंतिम क्षणों में चुने गये लॉन टेनिस के खिलाड़ी सुमित नागल का सपना अपने रैकेट से तकनीकी प्रदर्शन करके देश के लिए पदक लाने का लक्ष्य होगा। वहीं भारतीय एथेलीट टीम में पैदल चाल के लिए बहादुरगढ़ के राहुल रोहिल्ला के लिए भी ओलंपिक में अपनी क्षमता का प्रदर्शन करने का मौका है।

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सुमित नागल

विश्वभर में अंतर्राष्ट्रीय लॉन टेनिस खिलाड़ी सुमित नागल का जन्म 16 अगस्त 1997 को हरियाणा में झज्जर जिले के छोटे से गांव जैतपुर में एक शिक्षक सुरेश नागल के घर में हुआ था। आठ साल की उम्र में गांव में बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने वाले सुमित से बल्ला लेकर उसके हाथ में टेनिस का रैकेट थमा दिया। इस रैकेट के प्रदर्शन की बदौलत सुमित नागल की आज विश्वभर में धूम मची हुई है। टेनिस खेल के शौकीन सुमित के पिता सुरेश ने टेनिस के खेल में अपने बेटे को आगे बढ़ाने का जो सपना देखा था, वह सपना टोक्यो ओलंपिक में लॉन टेनिस स्पर्धा के लिए अंतिम क्षणों में चुने जाने पर पूरा होता नजर आया। अब ओलंपिक में परिवार को ही नहीं, बल्कि हरियाणा और पूरे देश को सुमित से देश का झंडा बुलंद करने की उम्मीद लगी हुई है। बेटे को अंतर्राष्ट्रीय टेनिस खिलाड़ी बनाने के मकसद से पिता बेटे को दिल्ली टेनिस अकादमी में ले जाते थे, तो वहीं एक बार टेनिस की सनसनी रहे प्रसिद्ध खिलाड़ी महेश भूपति की नजर उस पर पड़ी और भूपति की बदौलत सुमित को जूनियर खिलाड़ी के रूप में सफर तय करने का मौका मिला। इस सफर को जारी रखते हुए सुमित वर्ष 2015 में उस समय सुर्खियां बनकर उभरे, जब उसने इंग्लैंड में हुए जूनियर विंबलडन कप के डबल मुकाबले में देश के लिए पहली बार ग्रैंड स्लेम की ट्राफी जीती। सुमित ने अपने प्रदर्शन की बदौलत वर्ष 2019 विश्व के नंबर एक टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर को पहले ही सेट में हराकर हलचल पैदा करके अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ी। टेनिस के रैकेट से सुमित ने 2017 और 2019 में नौ बार आईटीएफ फ्यूचर्स टूर्नामेंट सिंगल का खिताब जीतने के अलावा दो बार एटीपी चैलेंजर कप अपने नाम करके बड़ी उपलब्धियों में अपना नाम दर्ज कराया।

रोबिन बोपन्ना के साथ बनेगी युगल जोड़ी

ओलंपिक में एकल मुकाबले के अलावा सुमित नागल को सानिया मिर्जा या अंकिता रैना का पार्टनर बनकर डबल मुकाबले में खिलाने की चर्चा है। जबकि अंतर्राष्ट्रीय टेनिस महासंघ और अखिल भारतीय टेनिस संघ ने युगल खिलाड़ी रोहन बोपन्ना के साथ नागल की जोड़ी को मंजूरी दी है।

वर्ष 2016 में डेविस कप में शुरूआत

सुमित नागल ने साल 2016 में डेविस कप टीम में डेब्यू किया और दिल्ली में हुए वर्ल्ड ग्रुप प्लेऑफ मैच स्पेन के खिलाफ मैच खेलाइसके एक साल बाद ही वह विवादों से घिर गए और उन्हें अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत डेविस कप टीम से हटा दिया गया। भारतीय टेनिस खिलाड़ी सुमित नागल पिछले 7 वर्षों में किसी यूएस ओपन ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट में एकल मैच जीतने वाले पहले भारतीय बन गए हैं, इससे पहले यह कारनामा 2013 में सोमदेव देववर्मन ने किया था।

उपलब्धियां

2020-ग्रैंड स्लैम यूएस ओपन जीता

2019- यूएस ओपन में नंबर वन खिलाड़ी फेडरर को हराया

2018-क्वार्टर फाइनल लिस्ट एशियन टूर्नामेंट जकार्ता

2017-गोल्ड मेडेलिस्ट 5वां गेम किर्गिस्तान

2015-जूनियर विंबलडन कप के डबल मुकाबला जीता

2015-आईटीएफ वर्ल्ड जूनियर टेनिस अवार्ड

2011-लॉन टेनिस में आईटीएफ वर्ल्ड जूनियर टेनिस अवार्ड

2011-जूनियर डेविस कप प्लेयर अवार्ड

2011-राष्ट्रपति से मिला नेशनल चाइल्ड अवार्ड

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पैदल चाल में राहुल का लक्ष्य पदक जीतना

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे बहादुरगढ़ के एक गरीब परिवार में पांच जुलाई 1996 में जन्मे राहुल रोहिल्ला का फरवरी में पैदल चाल की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में बेहतर क्षमता के साथ दूसरा स्थान आने पर टोक्यो ओलंपिक में हिस्सा ले रही भारतीय एथेलीट टीम में हो गया था। राहुल के सामने ओलंपिक में देश के लिए खेलने का मौका तो मिला, लेकिन परिवार की माली हालत और दूसरी ओर उसके माता पिता का बीमार रहना उसकी तैयारी में बाधक बनता दिख रहा था। लेकिन माता पिता ने बेटे के सपने को पूरा करने के लिए अपनी दवाईयों के खर्चे में कमी करके बेटे के लिए जूते दिलवाए। वहीं नेशनल जूनियर पैदल चाल में रिकार्ड बना चुके उसके ताऊ के बेटो आशु और आशीष ने भी चेचेरे भाई की मदद के लिए उसका हौंसला बढ़ाया, जिन्हें देखकर ही राहुल ने भी 2013 से पैदल चाल प्रतियोगिता के लिए अभ्यास करना शुरू किया था। एक कहावत है कि जिसे सिर पर मां-बाप का हाथ हो, वह कभी हारता नहीं है। ऐसा ही राहुल रोहिल्ला की जिंदगी की सफलता की इबादत लिखी जा रही है। पिता इलेक्ट्रिशियन का काम करते हैं और मां घर में ही रहती है। किसी तरह परिवार का पालन पोषण हो रहा था, कि राहुल को खेल  कोटे से सेना में सिपाही सिपाही की नौकरी मिल गई। गरीबी और मुश्किलों में घिरे रहने वाले राहुल रोहिल्ला के संघर्ष का ही नतीजा है कि वह आज अंतर्राष्ट्रीय एथेलीट की बुलंदियों पर है। राहुल को उम्मीद है कि वह पैदल चाल में भारत के लिए पदक हासिल करेगा।

23July-2021

 

ओलंपिक: हरियाणा के जांबाज शूटरों का गोल्ड के लक्ष्य पर होगा निशाना

अर्जुन अवार्डी भारतीय निशानेबाजों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बजाया है डंका

ओ.पी. पाल.रोहतक।

भारतीय निशानेबाजों के दल में हरियाणा की दो महिला समेत ऐसे चार अर्जुन अवार्डी एवं अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाज शामिल है, यदि टोक्यो ओलंपिक में उनके सटीक निशाने लगे, तो देश के लिए वे पदकों की झड़ी लगा सकते हैं। इसी लक्ष्य के साथ संजीव राजपूत, अभिषेक वर्मा और यशस्विनी देसवाल निशानेबाजी में अलग-अलग वर्ग की एक से ज्यादा प्रतिस्पर्धाओं अपनी अर्जुन नजरे लगाएंगे।

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संजीव राजपूत

हरियाणा के इन भारतीय स्टार शूटरों में नौसेना से सेवानिवृत्त जूनियर कमिशन्ड ऑफिसर 40 वर्षीय संजीव राजपूत भी शामिल है। संजीव राजपूत एक मात्र ऐसे भारतीय राइफल शूटर हैं जो 50 मीटर राइफल 3 पोजीशन कैटेगरी में प्रतिस्पर्धाओं की चुनौती का सामना करते हैं। हरियाणा के यमुनानगर में 5 जनवरी 1981 को जन्में संजीव एक बेहद साधारण परिवार से आते हैं, जिनके पिता रेहड़ी पटरी लगाकर खाना बेचकर बेटे का नौसेना में अफसर बनने का सपना पूरा किया है। नौसेना में सेवा देते हुए उन्होंने वहां शूटिंग रेंज देखी तो उन्हें निशानेबाजी करना शुरू कर दिया। संजीव ने पहली बार 2004 के दक्षिण एशियाई खेलों में तीन स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी। 2010 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2011 के आईएसएसएफ विश्व कप में भारत के लिए रिकार्ड कायम करते हुए स्वर्ण पदक जीतकर कामयाबी की जो इबादद लिखी, वह वर्ष 2014 में नौसेना से सेवानिवृत्ति के बाद भी बादस्तूर जारी है, जिनका लक्ष्य अब टोक्यो ओलंपिक में 10 मीटर एयर पिस्टल और 50 मीटर की तीन पोजिशन की स्पर्धाओं में भारत को पदकों से रोशन करना है। इससे पहले वे बिजिंग और लंदन ओलंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। भले ही वे पदक न ला पाए हो, लेकिन इस अनुभव को हवा देने के इरादे से तीसरी बार ओलिंपक के लिए क्रोएशिया में प्रशिक्षण के दौरान बेहतरीन तकनीक के साथ अभ्यास किया है। राजपूत मानते  हैं कि पिछले ओलंपिक के प्रदर्शन को भुलाकर वे इस बार देश के लिए पदक हासिल करने के लिए अपने इवेंट पर फोकस किये हुए हैं। उनका मानना है कि आज की बदलती तकनीक के बावजूद भारतीय निशानेबाज दुनिया में किसी से कम नहीं और उनमें सटीक निशाने लगाने की क्षमताएं भी बरकरार हैं।

एक दशक में हुए बदलाव

राजपूत का मानना है कि जब उन्होंने पहली बार शूटिंग शुरू की थी, तब से लेकर अब तक खासकर आज की नई तकनीकों के मुताबिक भारत में शूटिंग में कई बदलाव हुए हैं। मसलन 2012 से पहले कोई दशमलव स्कोर नहीं था। उस समय 50 मीटर प्रोन इवेंट बेहद लोकप्रिय था जिसे समाप्त कर दिया गया है और अब मिश्रित टीम स्पर्धाएं भी शुरू हो गई हैं।

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उपलब्धियां(50 मीटर थ्री पोजिशन)

2006- राष्ट्रमंडल खेल में कांस्य पदक

2010-विश्व कप में रजत पदक

2011-विश्व कप में स्वर्ण पदक

2014- राष्ट्रमंडल खेल में रजत पदक

2016- विश्व कप में रजत पदक

2018- राष्ट्रमंडल खेल में स्वर्ण पदक

2018- एशियन गेम्स  में रजत पदक

2019- विश्व कप में रजत पदक

2021- विश्व कप में स्वर्ण पदक

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यशस्विनी सिंह देसवाल

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कमाल की निशानेबाजी करने वाली भारतीय महिला निशानेबाज यशस्विनी सिंह देसवाल का जन्म 30 मार्च 1999 को नई दिल्ली में  हुआ। हालांकि वह पटियाला की रहने वाली है। उसके पिता एक पुलिस अधिकारी हैं। परिवारिक जानकारी के अनुसार 2012 में महज 13 साल की उम्र में उसने निशानेबाजी की शुरूआत की। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए पदक लाने के लिए अपनी बेटी के सपने को पूरा करने की खातिर उसके माता-पिता ने हरियाणा के पंचकूला स्थित अपने घर में ही एक शूटिंग रेंज बनवाया, जहां वह 10 मीटर एयर पिस्टल में निशानेबाजी का अभ्यास करती है। अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाज रहे सेवानिवृत्त पुलिस महानिरीक्षक टीएस ढिल्लन ने देसवाल को कोच के रूप में प्रशिक्षण दिया। इसी प्रशिक्षण का नतीजा है कि वह आज ओलंपिक के सफर पर है। हालांकि निशानेबाजी की शुरूआत करने के बाद से ही यशस्विनी हर साल राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करती रही। पिता के प्रोत्साहन के चलते उसने जिस प्रकार अपने प्रदर्शन को तकनीकी दिशा दी है। ओलंपिक का सपना पूरा करने के लिए जिस प्रकार से उसने मेहनत की, उसे देखते हुए यशस्विनी से पूरे देश को टोक्यो ओलिंपक में पदक लाने की उम्मीद है। ओलंपिक में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना खुद यशस्विनी देसवाल का भी सपना रहा है, जिसको वह पूरा करना चाहती है। देसवाल ने ओलंपिक के क्वालिफाई मुकाबलों में अंक तालिका में मनु भाकर को पीछे छोड़ा। खुद देसवाल का कहना था कि उसका फोकस ओलंपिक के लिए जगह बनाने पर था, इसलिए उसने उसी मानसिक स्वभाव व तकनीक से निशानेबाजी की। ओलंपिक में यह खबर भी चौंकाने वाली हो सकती है कि यदि 10 मीटर एयर पिस्टल में मनु भाकर और यशस्विनी सिंह देसवाल के बीच ही मुकाबला हुआ।

प्रमुख उपलब्धियां

2014 58वीं राष्ट्रीय शूटिंग चैम्पियनशिप में 3 स्वर्ण पदक

2016 आईएसएसएफ जूनियर विश्व कप स्वर्ण पदक

2017 आइएसएसएफ़ जूनियर विश्व चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक

2019-आईएसएसएफ विश्व कप में स्वर्ण पदक

2020-पाँचवें इंटरनैशनल ऑनलाइन शूटिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक

2021-आईएसएसएफ विश्व कप में स्वर्ण पदक से ओलंपिक के लिए क्वालिफाई

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अभिषेक वर्मा

टोक्यो ओलिंपिक के लिए भारतीय निशानेबाजी टीम में 31 साल पिस्टल शूटर अभिषेक वर्मा भी शामिल हैं, जो हरियाणा के पलवल जिले के हैं, उनका जन्म एक अगस्त 1989 को एके वर्मा के परिवार में हुआ, जिनकी मां कुसुम वर्मा और एक बड़ा भाई आयुष वर्मा है। निशानेबाजी को जब अभिषेक ने शौक के तौर पर शुरू किया तो उसके पिता हिसार में तैनात थे। स्कूली पढ़ाई के बाद अभिषेक ने बीटैक और फिर लॉ किया। पेशे से इंजीनियर व वकील वर्मा के निशानेबाजी के शौंक ने आज उसे अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाज बना दिया, जो उसने सपने में भी नहीं सोचा था। टोक्यो ओलंपिक के लिए 10 मीटर एयर पिस्टल प्रतिस्पर्धा के लिए क्वालिफाई करने वाले अभिषेक ने ओलंपिक की तैयारी के लिए पूर्व निशानेबाज ओमेंद्र सिंह से तकनीकी प्रशिक्षण लिया और उसकी नजरे अब ओलंपिक में भारत के लिए पदक हासिल करने पर होगी। दरअसल, भारतीय शूटर अभिषेक ने बचपन से खेल में रुचि रखते हुए स्वीमिंग, स्केटिंग और बैडमिंटन खेलता था, जिसने राज्य स्तर पर बैडमिंटन में अच्छा प्रदर्शन किया है, लेकिन जब वह कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से लॉ कर रहा था, तो शूटिंग रेंज देखकर निशानेबाजी के शौंक ने जकड़ लिया और शूटिंक का अभ्यास करने लगा। अभिषेक की वर्ष 2015 में शुरू की गई निशानेबाजी आज उसे बुलंदियों पर ले गई हैं। उसने देश में पहली बार अभिषेक ने ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स में शूटिंग करते हुए 5वां स्थान हिसल किया, जिसके बाद वर्ष 2015 और 2016 में नेशनल शूटिंग में हिस्सा लेने का मौका मिला और केरियर का पहला पदक केरला शूटिंग नेशनल्स में जीता। उसकी मेहनत से आईएसएसएफ रैंकिंग के आधार पर जर्मनी के म्यूनिक में हुए विश्वकप चैंपियनशिप में खेलने का मौका मिला और 10 मीटर एयर पिस्टल इवेंट में कांस्य पदक जीता, तो 2019 में बिजिंग के विश्वकप में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने अपने आपको एक अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाज साबित किया। ओलंपिक की तैयारी के लिए अभिषेक ने पूर्व निशानेबाज ओमेंद्र सिंह से तकनीकी प्रशिक्षण लिया और उसकी नजरे अब ओलंपिक में भारत के लिए पदक हासिल करने पर होगी।

उपलब्धियां

2018-विश्व चैंपियनशिप में रजत पदक

2018-एशियन गेम्स में कांस्य पदक

2019-विश्वकप बिजिंग में स्वर्ण पदक

--22July-2021

 

टोक्यो ओलंपिक: अमित पंघाल व विकास कृष्ण के मुक्के में है गोल्ड पर

निशाना लगाने का दम विश्व मुक्केबाजी रैंकिंग में की टॉप टेन में दोनों ही पहले व छठे नंबर के बॉक्सर 
ओ.पी. पाल.रोहतक। 
 दुनिया में अपने पंच की धूम मचाने वाले हरियाणा के अमित पंघाल और विकास कृष्ण यादव ऐसे अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजों में शुमार है, जिनके पास देश और प्रदेश का नाम रोशन करने के लिए टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतने की क्षमता है। अमित पंघाल विश्व मुक्केबाजी रैंकिंग में पहले नंबर तथा विकास कृष्ण छठे नंबर के मुक्केबाज हैं। अमित पंघाल 
विश्व के नंबर एक मुक्केबाज अमित पंघाल को भारत के लिए स्वर्ण पदक का दावेदार माना जा रहा है। रोहतक जिले के मायना गांव में किसान विजेन्दर सिंह के परिवार में 16 अक्तूबर 1995 को जन्मे अमित पंघाल ने महज 22 साल की उम्र में ही ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट को हराकर इतिहास रचा और अंतर्राष्ट्रीय नक्शे पर आए। अमित पंघाल मार्च 2018 में भारतीय सेना में जेसीओ के पद पर नियुक्ति मिली, जिसके बड़े भाई अजय भी भारतीय सेना में तैनात हैं।एक सेना के जवान में जो नियंत्रित आक्रामकता और रणनीतिक कौशल का अच्छा मिश्रण माना जाता है, उसी के तहत पंघाल ने टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक के लक्ष्य तक पहुंचने के मकसद से पूर्व अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाज एवं अपने गुरु अनिल धनखड़ की निगरानी में पिछले कई साल से कमजोरियों को दूर करने के लिए लगातार पसीना बहाया है। भारत के इस दिग्गज मुक्केबाज ने टोक्यों ओलंपिक के लिए अपने 49 किग्रा को 52 किग्रा भार वर्ग में बदलकर मुक्के का ज्यादा दम दिखाने के लिए तैयार है। समूचे भारत की निगाहें उस पर इस उम्मीद से टिकी हुई है कि वह अपनी क्षमता का बेहतर प्रदर्शन करते हुए भारत को स्वर्ण पदक दिलाएगा।
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22 साल की उम्र में बटोरी सुर्खिंया-----
वर्ष 2017 में राष्ट्रीय मुक्केबाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल करने के बाद पंघाल उसी साल में एशियन चैंपियनशिप का कांस्य पदक जीतते ही सुर्खियों में आया, जिसके कारण उसे विश्व चैंपियनशिप में पहली बार जगह मिली। भले ही वह अंतिम चार के मुकाबले में बाहर हो गये हो, लेकिन इस हार से पंघाल को मजबूती करने की सीख मिली। मसलन वर्ष 2018 राष्ट्रमंडल खेल में मुक्के का दम दिखाने का जुनून था और उसने फाइनल में जगह बनाई, लेकिन उसे रजत पदक पर संतोष करना पड़ा। उसी साल एशियाई खेलों में अमित पंघाल ने इस हार का बदला चुकता करते हुए 49 किलोग्राम भार वर्ग में रियो ओलंपिक के गोल्ड मेडलिस्ट उजबेकिस्तान के दुश्मातोव जमकर धुनाई करके भारत के लिए स्वर्ण पदक हासिल करके इतिहास रच डाला। इससे पहले भारतीय मुक्केबाज को इस प्रतियोगिता में कांस्य पदक ही मिलते रहे, लेकिन उसने पदक के रंग को सोने में बदला। इसके अलावा वह स्ट्रांदजा मेमोरियल में लगातार दो बार स्वर्ण पदक हासिल कर चुका है। 
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अमित की उपलब्धियां------ 
2017-राष्ट्रीय मुक्केबाजी चैंपियनशिप मे स्वर्ण पदक 
2017-एशियन चैंपियनशिप में कांस्य पदक 
2018-राष्ट्रमंडल खेल में रजत पदक 
2019-एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक 
 2019-एशियन चैंपियनशिप में रजत पदक 
 2019-विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में रजत पदक 
2021-एशियन चैंपियनशिप में रजत पदक
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विकास कृष्ण यादव 
अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी में देश का नाम रोशन करते आ रहे विकास कृष्ण यादव का जन्म 10 फरवरी 1992 को हरियाणा के भिवानी जिले में हुआ था। विकास की माता दर्शना देवी के अनुसार विकास बचपन में वह अक्सर बीमार रहता था। खेल में बेहद रुचि रखने वाले विकास ने स्वास्थ्य रहने के लिए बैडमिंटन खेलना शुरू किया, लेकिन भिवानी मुक्केबाजी का गढ़ माना जाता है और उसके साथ मुक्केबाजी करते हैं तो उसने भी बचपन में ही नौ साल की उम्र में मुक्केबाजी में पंच के दांव पेंच आजमाने शुरू कर दिये थे। उस समय उसने सोचा भी नहीं होगा कि वह अंतर्राष्ट्रीय पटल पर मुक्केबाजी का परचम लहराएगा। जब उसने पहली बार 18 साल की उम्र में 2010 के एशियाई खेलों में अपना पहला स्वर्ण पदक जीतकर महाद्वीपीय प्रतियोगिता में भारत के लिए 12 साल के स्वर्ण पदक के सूखे को खत्म किया था। विकास कृष्ण के पिता कृष्ण यादव ने उम्मीद जताई कि उनका बेटा इस बार ओलंपिक में देश के लिए स्वर्ण पदक हासिल करने अपने सपने को पूरा करेगा। परिवार या उसके गांव को ही नहीं सूबे और देश को भी विकास से स्वर्ण पदक लेकर आने की इसलिए भी उम्मीद है, क्योंकि उसके पास अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ओलंपिक, विश्व चैंपियनशिप, राष्ट्रमंडल खेल, युवा ओलंपिक खेल, एशियन चैंपियनशिप, युवा विश्व चैंपियनशिप में मुक्केबाजी का अनुभव और पंच में दांव पेंच की तकनीक भी है। 
  ----छठें नंबर के बॉक्सर---- 
विश्व में छठे नंबर की रैंकिंग में शामिल मुक्केबाज विकास कृष्ण अपने शानदार प्रदर्शन की बदौलत प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार से नवाजे जा चुके हैं। विकास यादव हरियाणा के हिसार में डीएसपी के पद पर तैनात है। ओलंपिक के लिए तीसरी बार मुक्केबाजी टीम का हिस्सा बन रहे विकास का सपना देश के लिए पदक हासिल करना है। इससे पहले 2012 में लंदन ओलंपिक में पहले दौर में ही बाहर हो गये, लेकिन 2016 के रियो ओलंपिक में उन्होंन अंतिम चार यानि क्वार्टर फाइनल तक का सफर किया। अपने पिछले दो ओलंपिक में पदक न जीतने के मलाल को भूल जाने के मकसद से टोक्यो ओलंपिक में 69 किलोग्राम भार वर्ग में विकास को अपने मुक्के के पंच से पदक निकलने की उम्मीद है। विकास कृष्ण यादव भारत के विजेन्दर सिंह के बाद ऐसे दूसरे मुक्केबाज है, जिन्होंने तीन बार ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया है। 
  ----उपलब्धियां----- 
2010-एशियाई यूथ चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक। 
2011-विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में कांस्य पदक। 
2015-एशियाई मुक्केबाजी चैंपियनशिप में रजत पदक। 
2018-राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक। 
2018-एशियाई खेलों में कांस्य पदक। 
2020- एशियाई मुक्केबाजी में ओलंपिक क्वालीफायर। 
2015-एशियाई मुक्केबाजी चैंपियनशिप में रजत।
 -------------21July-2021

ओलंपिक में युवा महिला निशानेबाज मनु भाकर से दो पदकों की उम्मीद

--- उम्र से ज्यादा पदकधारी मनु देश की सबसे युवा महिला निशानेबाज ओ.पी. पाल.रोहतक।-- टोक्यो ओलंपिक में भारतीय निशानेबाजों की टीम में शामिल मनु भाकर एक ऐसी निशानेबाज है, जिसने निशानेबाजी के कैरियर में भारत का नाम रोशन करने के लिए अब तक जितने पदक जीते हैं, उतनी उसकी उम्र भी नहीं है। सबसे कम उम्र की इस महिला निशानेबाज से देश को ओलंपिक में एक नहीं, बल्कि दो पदक जीतने की उम्मीद लगी है। मनु भाकर एयर पिस्टल के दो वर्ग की प्रतिस्पर्धा में मुकाबला करेगी। हरियाणा के झज्जर ज़िले के गोरिया गाँव में 18 फ़रवरी 2002 को जन्मी मनु भाकर के पिता मरीन इंजीनियर और माता एक स्कूल में प्राचार्य हैं। बचपन से ही मनु को निशानेबाजी के साथ मुक्केबाज़ी, एथलेटिक्स, स्केटिंग और जूडो कराटे में भी खूब हाथ आजमाए। इसी कारण स्कूल में स्कूल में उनके साथी 'ऑलराउंडर' कहकर पुकारते थे। मनु ने साल 2016 में निशानेबाजी को कैरियर बनाकर देश का नाम रोशन करने का सपना देखा। इसके लिए उसके माता-पिता ने उसे उम्मीद से बढ़कर प्रोत्साहन भी दिया। इसके लिए उसके पिता ने बेटी के कैरियर की खातिर अपनी नौकरी छोड़ दी और अपनी लाइसेंसी पिस्टल से बेटी को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। हालांकि उससे पहले ही मनु भाकर को 2012 ओलंपिक के बाद गठित हुए राष्ट्रीय राइफल एसोसिएशन और भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) से मदद मिलना शुरू हो गई थी। यहां से ही भारत के जानेमाने प्रतिष्ठित निशानेबाज जसपाल राणा से उसे प्रशिक्षण मिला। अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक दर पदक हासिल करने वाली सबसे कम उम्र की निशानेबाज मनु भाकर को पिछले साल अर्जुन पुरस्कार से नवाजा गया है। -----------16 साल की उम्र में बनी अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाज-------------- अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाज का दर्जा मनु भाकर ने महज 16 साल की उम्र में ही हासिल कर लिया था, जब वह वर्ष 2018 के आईएसएसएफ जूनियर विश्व कप में एयर पिस्टल दो स्वर्ण पदक जीतकर भारत की सबसे कम उम्र की महिला निशानेबाज बनी। इसी साल राष्ट्रमंडल खेलों में एयर पिस्टल स्पर्धा में फिर दो स्वर्ण पदक जीतकर उसने सनसनी फैला दी। इससे पहले वर्ष 2017 में मनु ने केरल में नैशनल चैंपियनशिप में नौ स्वर्ण पदक जीतकर नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाकर सुर्खियां बटोरी, जबकि इसी वर्ष फिर एशियाई जूनियर चैंपियनशिप में मनु ने रजत पदक जीता। इसके बाद उसने पीछे मुडकर नहीं देखा। देश का नाम रोशन करने के लिए लगातार शानदार प्रदर्शन करते हुए विभिन्न निशानेबाजी स्पर्धाओं में डेढ़ दर्जन स्वर्ण पदकों समेत दो दर्जन से भी ज्यादा पदक अपने नाम किये हैं। टोक्यो ओलंपिक की स्पर्धा में मनु भाकर महिलाओं की 10 मीटर एयर पिस्टल के अलावा 25 मीटर पिस्टल की मिश्रित स्पर्धा में भी हिस्सा लेगी। मनु के साथ इस जोड़ी में युवा निशानेबाज़ सौरभ चौधरी हिस्सा लेंगे। इसलिए उसे ओलंपिक से कम से कम दो पदक भारत लाने की उम्मीद है। मई 2019 में मनु भाकर ने म्यूनिख आईएसएसएफ़ विश्व कप में चौथे स्थान पर रहने के बाद 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर लिया था। ------------राष्ट्रमंडल खलों में बनाया नया रिकार्ड---------- मनु भाकर ऐसी सबसे कम उम्र की महिला निशानेबाज है जिसने 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर अपने शानदार स्कोर के जरिए एक नया रिकार्ड बनाया था। हालांकि उसके पास अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पदकों का इतना अंबार है जितनी उसकी उम्र भी नहीं है। ---------- उपलब्धियां--------- 2021- 10 मीटर एयर पिस्टल मिश्रित टीम में स्वर्ण पदक व रजत पदक। 2021- 10 मीटर एयर पिस्टल मिश्रित रजत पदक। 2019- आइएसएसएफ विश्व कप में दो स्वर्ण। 2019-देश विदेश में मिश्रित पांच स्वर्ण पदक। 2019-दोहा एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक। 2019-दोहा एशियाई चैंपियनशिप में मिश्रित स्वर्ण पदक। 2019- एशियाई एयरगन चैंपियनशिप में दो स्वर्ण पदक। 2018- गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेल में स्वर्ण पदक। 2018-यूथ ओलंपिक गेम्स में स्वर्ण पदक। 2018-यूथ ओलंपिक गेम्स में मिश्रित रजत पदक। 2018-आइएसएसएफ जूनियर विश्व कप में तीन स्वर्ण व एक रजत पदक। --20July-2021

टोक्यो ओलंपिक में पदक का प्रबल दावेदार है नीरज चोपड़ा

------ भाला फेंक में युवा एथेलीट के नाम दर्ज हैं अनोखे रिकार्ड ओ.पी. पाल.रोहतक।------ टोक्यो ओलंपिक में हिस्सा ले रही भारतीय एथेलीट टीम में भाला फेंक स्पर्धा यानि जेवलिन थ्रो के युवा खिलाड़ी नीरज चोपड़ा से देश को पदक की इसलिए भी उम्मीद है कि तीन माह पहले ही पटियाला में उसने तीसरी भारतीय ग्रां प्री में 88.07 मीटर के थ्रो के साथ अपने ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड को ध्वस्त कर नया रिकार्ड बनाया है। अपने कंधे पर आए इसी उम्मीद के बोझ को उतारने के लिए हरियाणा के इस युवा ने भाला फेंकने का जमकर अभ्यास किया। नीरज चोपड़ा एथेलीट अंजू बॉबी जार्ज के बाद ऐसे दूसरे भारतीय एथेलीट हैं जिसने विश्व चैम्पियनशिप स्तर पर स्वर्ण पदक जीता है। हरियाणा के पानीपत जिले के एक छोटे से खंडरा गांव में मध्यम वर्ग के किसान सतीश चोपड़ा के परिवार में 24 दिसंबर 1997 को जन्मे नीरज चोपड़ा अपने परिवार में सबसे लाड़ले थे। नीरज अपने पांच भाई बहनों में सबसे बड़े हैं। परिवार के लोगों का कहना है कि बचपन में नीरज का वजन काफी बढ़ रहा है था और परिजनों को इस बात की चिंता थी उसकी लंबाई नहीं बढ़ेगी। इसका आभास होते ही नीरज ने व्यायाम करना शुरू कर दिया और उसकी खेलों के प्रति रुचि बढ़ी। गांव में वह कबड्डी में दांव आजमाने लगा, लेकिन गांव में न तो व्यायामशाला ही थी और नही कोई स्टेडियम जहां वह अभ्यास कर सके। इसलिए अभ्यास के लिए वह गांव से रोजाना करीब 17 किमी सफर करके पानीपत के शिवाजी नगर स्टेडियम में अभ्यास करने लगा। इसी स्टेडियम में जयवीर नामक युवक से उसकी मुलाकात दोस्ती में बदली। दोस्त जयवीर ने नीरज की लंबाई को देखते हुए उसे भाला फेंकने के अभ्यास के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि जेवलिन थ्रो में वह बहुत आगे जा सकता है। दोस्त की सलाह पर उसने जेवलिन थ्रो यानि भाला फेंकने का अभ्यास करना शुरू कर दिया। इसके लिए आर्थिक तंगी के बावजूद नीरज ने जीतोड़ मेहनत की, जो उसके लिए वरदान साबित हुई। आज नीरज चोपड़ा भालाफेंक में बेहतर रिकार्डो के साथ अंतर्राष्ट्रीय एथेलीट के रूप में दुनिया के नक्शे पर देश का नाम रोशन कर रहा है। कंधे की चोट की वजह से वह 2019 के दोहा में हुए विश्व चैंपियनशिप से भी बाहर रहें। -----------संघर्ष करके कमाया नाम---------- नीरज चोपडा की अभी महज 15 की उम्र थी, जब उसने कबड्डी से जेवलिन थ्रो में कैरियर तो बनाने की ठान ली, लेकिन उसके लिए पहली समस्या अपने 80 किग्रा वजन को कम करने और दूसरी बेहतर क्वालिटी की जेवलिन किट खरीदना परिवार की माली हालत को देखते हुए असंभव लग रहा था। इसके बावजूद उसके कैरियर को बनाने के लिए पिता सुरेश चोपड़ा और माता सरोज देवी ने बेटे के कैरियर की खातिर उसे शुरुआती अभ्यास के लिए छह-सात हजार की जेवलिन मुहैया कराई, जबकि बढ़िया गुणवत्ता वाली की कीमत एक लाख से कम नहीं थी। वहीं उसने देश का नाम रोशन करने के लिए जो सपना संजोया, उसके लिए उसने कड़ी मेहनत करके महज दो माह में ही अपना बीस किग्रा वजन भी कम करने मे कामयाबी हासिल की। इस स्पर्धा में तय लक्ष्य को हासिल करने के मकसद से वह दिन में छह-सात घंटे अभ्यास करके पसीना बहाता रहा है। इसी कड़ी मेहनत ने रंग दिखाना शुरू किया, जब उसने अपनी पहली अंतर्राष्ट्रीय स्तर की की प्रतियोगिता वर्ष 2016 की जूनियर विश्व चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन करके स्वर्ण पदक हासिल किया। यही नहीं इसी प्रदर्शन की बदौलत उसे भारतीय सेना में नायब सूबेदार पर भी नियुक्ति मिल गई। नीरज चोपड़ा के लिए गौरव का क्षण तो उस समय आया, जब वर्ष 2018 के जकार्ता एशियन गेम्स में उसे भारतीय दल की सेंड ऑफ सेरेमनी के समय ध्वजवाहक भी बनाया गया। --------- राष्ट्रीय रिकार्डधारक बने नीरज-------- देश में भाला फेंक स्पर्धाओं में नीरज चोपड़ा के नाम ऐसे रिकार्ड हैं, जो अभी तक कायम हैं। 15 साल की उम्र में ही उसने अपनी पहली ही स्पर्धा में नया रिकार्ड बनाकर स्वर्ण पदक हासिल किया था। वहीं से उसके अंतर्राष्ट्रीय कैरियर का मार्ग प्रशस्त हुआ। जूनियर और फिर सीनियर चैँपियनशिपों में उसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी नए कीर्तिमान स्थापित किये हैं। एशियन गेम्स में तो स्वर्ण पदक जीतने वाले वह पहले भारतीय जेवलिन थ्रोअर साबित हैं। इससे पहला ऐसा रिकार्ड 1958 में मिल्खा सिंह ने बनाया था। ---------- उपलब्धियां---- 2012- अंडर-16 नेशनल जूनियर चैंपियनशिप में 68.46 मीटर रिकार्ड, स्वर्ण पदक। 2013-नेशनल यूथ चैंपियनशिप में दूसरा स्थान लेकर आईएएएफ वर्ल्ड यूथ चैंपियनशिप मिली जगह। 2015-इंटर-यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में 81.04 मीटर का रिकॉर्ड। 2016-जूनियर विश्व चैंपियनशिप में 86.48 मीटर का नया विश्व रिकार्ड, स्वर्ण पदक। 2017-दक्षिण एशियाई खेलों में पहले राउंड में 82.23 मीटर थ्रो के साथ स्वर्ण पदक। 2018-गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों 86.47 मीटर थ्रो से स्वर्ण पदक। 2018-जकार्ता एशियन गेम्स में 88.06 मीटर भाला फेंककर स्वर्ण पदक। 19July-2021

मंडे स्पेशल:पानी को लेकर दोहरे संकट के मुहाने पर खड़ा प्रदेश

पानी नहीं, मीठा जहर पी रहे हैं हम---- प्रदेश के 21 जिलों के अधिकांश इलाकों के भूजल में खुला नाइट्रेट--- ओ.पी. पाल.रोहतक।--- भूजल को लेकर प्रदेश दोहरी तलवार पर खड़ा है। एक और तो भूजल पाताल में जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जो भूजल मिल रहा है वह मीठे जहर से कम नहीं है। राज्य के 22 से 21 जिलों के भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाईट्रेट, लोहा, कैडमियम, क्रोमियम, तांबा, निकल, सीसा, जस्ता व पारा जैसी भारी धातु का मिश्रण मिलना अपने आप में बड़े खतरे का संकेत देता है। उम्मीद से ज्यादा फ्लोराइड ने तो हाल बेहाल कर रखा है। हालांकि जल जीवन मिशन के तहत सरकार ब्लॉक स्तर पर जल जांच के लिए विशेष अभियान चला रही है। इसके लिए अलग-अलग मोबाल टीमें भी गठित की गई हैं। इसके चलते हालात सुधरने की उम्मीद तो जगी है, लेकिन विकट स्थिति उन लोगों की है जो नहरी पानी न पीकर ट्यूबवैल का पानी पीना पसंद करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कुएं के पानी को ही बेहतर माना जाता है। ग्रामीण यह नहीं जानते कि वे पानी नहीं, बल्कि मीठे जहर का सेवन कर रहे हैं। ------ हरियाणा सरकार प्रदेश में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘जल जीवन मिशन’के तहत गिरते भूजल और भूजल की जांच कराने के लिए विशेष अभियान चला रही है। सरकार का तो यह भी दावा है कि जल जीवन मिशन के 2024 तक के राष्ट्रीय लक्ष्य से पहले ही 2022 तक हरियाणा में सभी घरो तक जल कनेक्शन से पीने का शुद्ध पानी मुहैया हो जाएगा। राज्य में मिशन के तहत भिवानी, सोनीपत और चरखी दादरी जिलों को ‘हर घर जल’ का दर्जा मिलने के बाद 12 जिलों में इस मिशन का लक्ष्य पूरा हो चुका है। ऐसे नौ जिलों में अंबाला, फरीदाबाद, गुरुग्राम, कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, पंचकूला, पानीपत और रोहतक शामिल हैं। बाकी 10 जिलों में से 6 जिलों में 98 प्रतिशत से अधिक का लक्ष्य पूरा हो चुका है। हरियाणा राज्य में 31.03 लाख ग्रामीण परिवार हैं, जिनमें से 26.93 लाख यानि 86.8 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को 31 मार्च 2021 तक नल से जल के कनेक्शन प्रदान किए जा चुके हैं। राज्य सरकार की वर्ष 2021-22 में राज्य में 4.09 लाख नल से जल के कनेक्शन प्रदान करने की योजना है। इसी योजना के तहत गिरते भूजल और भूजल की गुणवत्ता की जांच प्रणाली को लागू करने के लिए मोबाइल टीमों का गठन किया है। राज्य में सबसे बड़ी समस्या बचे हुए भूजल में घुले जहरील रसायन तत्व हैं, जिनके कारण लोगों को जलजनित गंभीर बीमारियों का खतरा बना हुआ है। वैसे तो सभी तत्व मानव के स्वास्थ्य के लिए खतरा हैं, लेकिन फ्लोराइड और आर्सेनिक ऐसे रसायनिक तत्व हैं जो मानव को ही नहीं, पशुधन को भी बीमार बनाने में सक्षम हैं। --------------- फ्लोराड ने बिगाड़े ज्यादा हालात------------ केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर जलशक्ति मंत्रालय के पिछले दिनों जारी आंकड़ो पर गौर करें तो हरियाणा के 21 जिलों के भूजल में नाइट्रेट और 20 जिलों में फ्लोराइड, आयरन व लेड जैसे जहरीले तत्वों की सांद्रता निर्धारित मानकता से कहीं ज्यादा पाई गई है। इसके अलावा 15 जिलों के 43 प्रतिशत हिस्से के भूजल में आर्सेनिक जैसे विशाक्त तत्वों का मिश्रण भूजल में घुला हुआ है। प्रदेश के सात जिलों में कैडियम और एक जिले में क्रोमियम तत्व का मिश्रण पाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ साल में दक्षिणी और पश्चिमी हरियाणा के 11 जिलों के अधिकांश इलाकों में भूजल का स्वाद विषैला है। यहां कस्बों गांवों के कुओं और नलकूपों का पानी फ्लोराइड, लौह तत्व या नाईट्रेट की अधिकता के कारण अनुपयोगी हो चुका है। हालात यहां तक बिगडे हैं कि कई जगह पानी खेती लायक नहीं बचा है। --------------------- इन जिलों में पीने लायक नहीं पानी---------------- रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा प्रभावित भिवानी, झज्जर, मेवात और सिरसा जिले में पानी को लेकर हालात खराब हैं। मसलन इन जिलों में कुओं और हैंड पंपों से लिए गए 70 प्रतिशत नमूने टेस्ट में फेल हुए हैं, जिसमें जहरीले तत्व रासायनिक पैरामीटर औसतन सीमा से अधिक मिले। सीजीडब्ल्यूबी की रिपोर्ट के अनुसार हालात इतने बद से बदतर हैं कि इन जिलों में भूजल केवल पीने के लिए बल्कि सिंचाई के लिए भी बेहतर नहीं है। भारतीय मानक ब्यूरो के मानक अनुसार पांच अन्य जिलों में फरीदाबाद, गुड़गांव , हिसार, महेंद्रगढ़ और रेवाड़ी में 30 से 50 प्रतिशत तक पानी की गुणवत्ता पर असर पड़ा है। जबकि अंबाला, जींद, कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, पलवल, पानीपत, पंचकुला, रोहतक, सोनीपत और यमुनानगर के भूजल में ही 50 प्रतिशत से अधिक सैंपल में जल की गुणवत्ता पीने लायक पायी गई है। ----------- किस जिले के भूजल में खुला कौन सा जहर------------- हरियाणा के अंबाला और पलवल जिले के भूजल में भी फ्लोराइड की मात्रा पाई गई है। यानि फिलहाल राज्य के 20 जिलों के भूजल में फ्लोराइड, 19 जिलों में नाईट्रेट, 15 जिलों में आर्सेनिक, 17 जिलों में लौह व शीशा तथा सात जिलों में कैडमियम जैसे जहरीले तत्वों की सांद्रता निर्धारित मानकता से कहीं ज्यादा पाई गई है। जिन जिलों के भूजल में फ्लोराइड जैसा जहर मिला है उनमें अंबाला, भिवानी, फरीदाबाद, फतेहाबाद, गुडगांव, हिसार, झज्जर, जींद, कैथल, महेन्द्रगढ़, पंचकूला, पानीपत, रेवाड़ी, रोहतक, सिरसा, सोनीपत व यमुनानगर शामिल हैं। जबकि पलवल, फरीदाबाद व महेंद्रगढ़ को छोड़कर 14 जिलों में नाईट्रेट की मात्रा भी ज्यादा पायी गई है। जबकि 15 जिलों अंबाला, भिवानी, फरीदाबाद, फतेहाबाद, हिसार, झज्जर, जींद, करनाल, पानीपत, रोहतक, सिरसा, सोनीपत, यमुनानगर, महेन्द्रगढ़ व पलवल के भूजल में आर्सेनिक की ज्यादा मात्रा पाई गई है। हरियाणा के 17 जिलों अंबाला, भिवानी, फरीदाबाद, फतेहाबाद, गुडगांव, हिसार, झज्जर, जिंद, कैथल, करनाल, महेन्द्रगढ़, पानीपत, रोहतक, सिरसा, सोनीपत व यमुनानगर के भूजल में लोह शीशे जैसे तत्वों की मात्रा भी स्वास्थ्य के लिहाज से खतरनाक बताई गई है। --------------------- मानव के स्वास्थ्य के लिये बड़ा खतरा-------- विशेषज्ञों के अनुसार भूजल में फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक, आयरन, क्रोमियम, लेड, कैडमियम और लवणता अधिकतम निर्धारित मात्रा मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकानदायक है। फ्लोराइड ऐसा रसायन है जो हड्डियों और दांतों को कमजोर करता है और जोड़ों में दर्द के साथ थाइराइड की ग्रंथियों को क्षति पहुंचाता है। जबकि नाइट्रेट से मेथेमोग्लोबिनेमिया की स्थिति उत्पन्न होने से खून से शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाता है। आयरन की कमी से दिल, लीवर और पेनक्रियाज को नुकसान पहुंचता है। आयरन की मात्रा बढ़ने से मधुमेह होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। आर्सेनिक की मात्रा का बढ़ना भी काफी खतरनाक होता है। आर्सेनिक की अधिक मात्रा से त्वचा रोग, आंखों के रोग, कैंसर, फेंफड़ों और किडनी से संबंधित आदि बीमारियों के होने का खतरा रहता है। इसी प्रकार क्रोमियम से पेट में अल्सर, कैंसर, किडनी और लीवर की गंभीर बीमारियां हो सकती हैं, तो लेड की मात्रा बढ़ने से दिमाग का विकास कम हो जाता है और तंत्रिका तंत्र कमजोर पड़ने लगता है। कैडमियम की अधिकता बढ़ने से लीवर का नुकसान पहुंचता है। गुर्दे खराब होने लगते हैं और शरीर में ऐंठन और खबराहट महसूस होने लगती है। लवणता बढ़ने से ब्लड प्रेशर बढ़ता है। इसलिए देश में पानी जैसे जैसे पानी प्रदूषित हो रहा है, उसी के कारण ये बीमारियां भी तेजी से बढ़ रही हैं। 19July-2021

आजकल: राजद्रोह कानून में धारा 124ए की जरुरत नहीं

--------रंजन कुमार, वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट----------- दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों पर अनुचित प्रतिबंध लगाने वाले अंग्रेजी हुकूमत के राजद्रोह कानून की प्रासांगिकता को अभी तक कायम रखने पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सरकार से सवाल करना वाजिब है। सुप्रीम कोर्ट ने मेजर जनरल एसजी वोम्बटकेरे की आईपीसी की राजद्रोह कानून की धारा 124ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कई तरह की टिप्पणियां भी की। जिसमें उन्होंने । ब्रिटिशकाल में 1870 में लाए गए राजद्रोह कानून के मकसद को भी स्पष्ट किया। ब्रिटिश सरकार इस कानून को भारत की स्वतंत्रता के कट्टर समर्थक बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी जैसे समर्थकों को चुप करने के लिए लेकर आई थी, जिसका मकसद स्वतंत्रता संग्राम को दबाना था। मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमण की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस तथ्य का जिक्र करते हुए इसे एक औपनिवेशिक कानून बताया, लेकिन सरकार से पूछा कि क्या आजादी के 75 साल बाद भी इस कानून की जरुरत है? सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी कानून को लेकर नहीं, बल्कि इसके दुरुपयोग की लगातार बढ़ती रफ्तार को लेकर चिंता जाहिर की गई। केंद्र सरकार अंग्रेजी हुकूमत के हजारों अप्रासांगिक हुए कानूनों को खत्म कर चुकी है, फिर इस कानून को समाप्त क्यों नहीं कर रही? खासकर वर्ष 2014 के बाद राजद्रोह कानून की आईपीसी की धारा 24ए का दुरुपयोग दोगुना से भी ज्यादा हुआ है। इस कानून का ब्रिटिशकाल में भी विरोध हुआ। हालांकि देश में बढ़ रहे राजद्रोह कानून के दुरुपयोग का मामला पिछले संसद के बजट सत्र में भी उठाया गया था। इसके बाद सरकार ने इस कानून में संशोधन करने के लिए एक समिति का भी गठन किया है, जिसके लिए राज्यों की सरकारों से भी सुझाव मांगे जाने रहे हैं। केंद्र सरकार कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद संसद में चर्चा कराकर इसमें संशोधन करने का भरोसा दे रही है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई में इस कानून के दुरुपयोग रोकने के लिए जो टिप्पणी की है। आजाद भारत में वर्ष 1962 में केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य राजद्रोह का किसी अदालत में पहला मामला सामने आया था और पहली बार ही देश में राजद्रोह के इस कानून की संवैधानिकता को चुनौती दी गई और मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने देश और देश की सरकार के मध्य के अंतर को भी स्पष्ट किया। उस समय भी अदालत ने स्पष्ट कहा था कि किसी भी परिस्थिति में सरकार की आलोचना करना राजद्रोह के तहत नहीं गिना जाएगा। केंद्र सरकार को चाहिए कि इस कानून के दुरुपयोग को रोका जाना चाहिए। देश में इस कानून का दुरुपयोग हमेशा होता रहा है, लेकिन पिछले छह साल में देश में भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए यानि राजद्रोह कानून के दुरुपयोग कहीं ज्यादा ही देखा गया है। आंकड़ो पर गौर किया जाए तो तीन सौ से ज्यादा दर्ज मामलों में पांच सौ से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसके दुरुपयोग को महसूस करते हुए ही सुप्रीम कोर्ट में राजद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिकाएं विचाराधीन है। बहरहाल अब राजद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर निर्णय सुप्रीम कोर्ट के पाले में है। शीर्ष अदालत सरकार के जवाब के बाद इस कानून को समाप्त करने या संतुलित करने का आदेश देती है। जहां तक आजाद भारत में सभी को अपनी बात कहने का मौलिक अधिकार मिला हुआ है, उसमें अभिव्यक्त की स्वतंत्रता को नियंत्रित नहीं किया जा सकता? फिर भी यदि देशद्रोह के दायरे में आने वाले भाषणों और टिप्पणियों के लिए देश में अन्य कानून बने हैं जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है और भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए की जरुरत नहीं है और आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी संभव है। खासबात है कि ब्रिटेन में राजद्रोह को खत्म कभी का खत्म किया जा चुका है, जो सरकार के राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए राजद्रोह का संभावित दुरुपयोग भी राजद्रोह को खत्म करने का एक कारण बना। इसलिए भारत में भी राजद्रोह कानून में धारा 124ए को समाप्त किया जाना चाहिए। -(ओ.पी. पाल से बातचीत पर आधारित) 18July-2021