एक जमाना था जब लोग अपने घरों के बाहर लिखते थे-अतिथि देवो भव: फिर शुरू किया-शुभ लाभ और बाद में लिखा जाने लगा-यूं आर वेलकम अब शुरू हो गया-......से सावधान!
बुधवार, 4 अगस्त 2021
ओलंपिक में हॉकी का जादू बिखरेने का तैयार हैं हरियाणा की बेटियां
हरेक खिलाड़ी अपनी अपनी तकनीकी खेल में हैं माहिर
ओ.पी. पाल.रोहतक।
हरियाणा में लड़कियों का 1000 पुरुषों पर सिर्फ 877 महिला यानि लैंगिक अनुपात भले ही आज देश में सबसे खराब हो। बावजूद इसके हरियाणा की बेटियां खेल जगत में खूब नाम कमा रही हैं। बात हो रही है टोक्यो आंलंपिक में हरियाणा की लाड़ली रानी रामपाल की कप्तानी में हिस्सा लेने वाली 16 सदस्यीय भारतीय महिला हॉकी टीम की, जिसमें हरियाणा की नौ ऐसी खिलाड़ी शामिल हैं, जिनके हाथों में हॉकी स्टीक का जादू ओलंपिक में पूरी दुनिया देखेगी। खास बात ये है कि हरीयाणवी खिलाड़ी अपनी अपनी अलग तकनीक से खेल के मैदान में बेहतर से बेहतर आलराउंडर प्रदर्शन करने में माहिर हैं।
------सविता पूनिया:-----
भारतीय महिला हॉकी टीम में सविता पूनिया सबसे बहतरीन गोलकीपर है, जिसके नाम दुनिया की नंबर-1 गोलकीपर का खिताब है और अर्जुन अवार्ड से सम्मान भी मिल चुका है। रियो ओलांपिक के बाद लगातार टोक्यो ओलंपिक की टीम में शामिल सविता पूनिया सिरसा जिले के जोधका गांव में महेंद्र पूनिया के परिवार में 11 जुलाई 1990 को जन्मी। परिवार में दादा रंजीत पूनिया ने अपनी पोती सविता पूनिया को छह साल की उम्र में हॉकी के लिए प्रोत्साहित किया। परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी, जिसके कारण गोलकीपिंग की किट भी रिश्तेदार से पैसे लेकर खरीदनी पड़ी। जब वह 18 साल की थी तो उसे नेशनल टीम में जगह मिली और 2009 में उसने जूनियर एशिया कप में टीम को कांस्य पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उसके कोच सुंदर सिंह ने उसकी प्रतिभा को पहचानते हुए उसे गोलकीपिंग का प्रशिक्षण दिया, जिसमें उसने दुनिया में महारथ हासिल की। परिवार में मां लीलावती, और भाई ही नहीं पूरे गांव को उम्मीद है कि वह टीम को विजयी बनाकर लौटेगी।
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नवनीत कौर:------
भारतीय हॉकी टीम में अग्रिम पंक्ति की खिलाड़ी नवनीत कौर का जन्म कुरुक्षेत्र जिले में शाहबाद मारकंडा में 26 जवरी 1996 को सरदार बूटा सिंह के परिवार में हुआ। जिसने पांच साल की उम्र में हॉकी स्टीक पकड़ी और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अब तक 79 मैच खेले। उसकी स्कोरिंग पावर अच्छी होने के साथ डी के भीतर बेहतर प्रदर्शन रहा है। नवनीत फारवर्ड हॉकी खिलाड़ी हैं और उनके खेल में हॉकी की कलात्मकता का भरपूर समावेश है। डी के पास उसे गेंद मिली, तो मानों वह उसे विपक्षी गोल में तब्दील करने की क्षमता रखती है। वर्ष 2013 में जूनियर विश्वकप में उसके प्रदर्शन ने उसे 2014 में सीनियर टीम में जगह दिलाई। वर्ष 2018 में भी वह महिला विश्वकप में भारतीय टीम में रही, इसी दौरान एशिया कप, एशियाई खेलों और एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी में शानदार प्रदर्शन करने वाली नवनीत का सपना विश्व का सर्वश्रेष्ट स्ट्राइकर बनना है। ओलंपिक में पहली बार खेलने जा रही नवनीत का लक्ष्य बेहतर प्रदर्शन कर भारत को स्वरर्ण पदक दिलाना है।
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उदिता:-----
टोक्यो ओलंपिक के लिए भारतीय महिला हॉकी टीम में शामिल उदिता का जन्म 4 जनवरी 1998 को हिसार में जसबीर सिंह के परिवार में हुआ। वह सातवीं कक्षा से ही हॉकी खेलना शुरू कर दिया था। पहले उन्होंने स्कूल में हैंडबाल खेलना शुरू किया, लेकिन कोच नहीं था। इसके बाद एक दिन उन्होंने स्कूल मैदान में लड़कियों को हॉकी खेलते देखा तो हॉकी खेलने की ठान ली। हॉकी कैरियर में वर्ष 2015 में उसके परिवार पिता के बीमारी के कारण निधन से मुश्किल में था, लेकिन उदिता माता गीता देवी ने उसे हौंसला दिया। सीनियर टीम के लिए 2017 में पदार्पण करने वाली उदिता 2018 एशियाई खेलों में रजत पदक विजेता टीम का हिस्सा थीं। अब बेहतर प्रदर्शन की बदौलत ओलंपिक में उसकी निगाहें टीम को गोल्ड मेडल दिलाने पर है। उदिता रक्षा पंक्ति में अग्रेसिव खेल में काफी बेहतर खेलने में माहिर है। बेटी से उसकी मां और कोच आजाद मलिक को भी ओलंपिक में गोल्ड मेडल मिलने की उम्मीद है।
------शर्मिला गोदारा:-----
महिला हॉकी टीम में हिसार के कैमरी गांव में किसान सुरेश गोदारा के परिवार में जन्मी शर्मिला गोदारा पहली बार ओलंपिक में खेलेंगी। उसकी मां संतोष गृहणी है। आठ साल की उम्र में गांव के ही राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के हॉकी ग्राउंड से अपने करियर की शुरुआत करने वाली शर्मिला ने 2009 से 2012 तक राज्य स्तर पर मैच खेले। 2012 से 2016 तक चंडीगढ़ हॉकी एकेडमी में शर्मिला का चयन हो गया। शर्मिला का का कैरियर संघर्ष भरा रहा है, लेकिन उसने अपने प्रदर्शन की बदौलत राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर अनेक पदक जीते हैं। 2016 से अब तक पूर्व भारतीय कप्तान, कोच व अर्जुन अवार्डी प्रीतम व उनके पति अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी कुलदीप सिवाच की देखरेख में शर्मिला खेली। शर्मिला पिछले दो-तीन साल से सोनीपत हॉकी एकेडमी में रहकर सोनीपत से ही खेल रही थी। ओलंपिक के लिए टीम के साथ शर्मिला ने जमकर पसीना बहाया। शर्मिला अग्रिम पंक्ति में खेलती है और स्पीड के साथ गेंद को आगे ले जाने में माहिर है।
------मोनिका मलिक:-----
टोक्यो ओलंपिक के लिए चयनित भारतीय महिला हॉकी टीम की प्रमुख खिलाड़ी मोनिका मलिक का जन्म 5 नवंबर 1993 को सोनीपत जिले के गांव गामडी में तकदीर सिंह मलिक के परिवार में हुआ। मोनिका मलिक ने बचपन में गांव की गलियों में खेलते हुए पहली बार हॉकी पकड़ी थी। तब उनकी दादी चंद्रपति ने पहली ही नजर में पोती की प्रतिभा को परख लिया था। मोनिका के पिता उसे चंडीगढ़ ले गये, जहां वे चंडीगढ़ पुलिस में हैं। उसके बाद मोनिका ने लगातार मेहनत करके सीनियर टीम में जगह बनाई। इससे पहले उसने जिला व राज्य स्तर की जूनियर टीमों में खेलते हुए शानदार प्रदर्शन किया। वर्ष 2013 में जर्मनी में हुए जूनियर महिला हाकी विश्व कप में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा रही। मोनिका को मिड फील्डर के तौर पर लंबा अनुभव है और वह अटैकिंग खेल में बेहतर प्रदर्शन करने में माहिर है।---
18July-2021
मंगलवार, 27 जुलाई 2021
ओलंपिक में भारत को गोल्ड दिलाएगी गुड़िया
सोनम मलिक मिट्टी व सड़क पर अभ्यास करके बनी इंटरनेशल पहलवान
ओ.पी. पाल.रोहतक।
भारतीय कुश्ती की टीम में सोनम मिलक सबसे युवा महिला पहलवान है। अपने दांव-पेंच से विरोधी पहलवान को चित करने की तकनीक, जज्बे और जुनून ने उसे देश के लिए ओलंपिक में 62 किलोग्राम वर्ग में अपना जौहर दिखाने का मौका मिला है। गुडिया के नाम से पुकारी जाने वाली भारतीय महिला पहलवान सोनक से देश को पदक की उम्मीद है, जिसके लिए वह लगातार अभ्यास करके पसीना बहा रही है।
सोनीपत जिले में गोहाना तहसील के छोटे से गांव में जन्म 15 अप्रैल 2002 को जन्मी सोनम मलिक में इतनी गजब की फुर्ती और ताकत है, जिसके सामने प्रतिद्वंदी के हौसले पस्त हो जाते हैं। पांच बार भारत केसरी का खिताब जीतने वाली सोनम ने अपने इस सफर से पहले अपनी रोल मॉडल और रियो ओलंपिक में कांस्य पदक लाने वाली साक्षी मलिक को भी चार बार पटखनी देककर हराया है। इसी ताकत और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ती युवा पहलवान सोनम मलिक, उसके परिजनों के साथ पूरे देश को भरोसा है कि गुड़िया टोक्यो ओलंपिक से गोल्ड लेकर स्वदेश लौटेगी। उसे गुरुमंत्र देने वाले कोच अजमेर मलिक को भी उम्मीद है कि जिस प्रकार से गुड़िया की तैयारी अच्छी चल रही है, उससे पदक की उम्मीदों को नकारा नहीं जा सकता। सोनम ऐसी पहलवान है जिसे मिट्टी पर ही प्रशिक्षित करना पड़ता था। बारिश के दिनों में कीचड़ होने पर पहलवानों को सड़कों पर तक अभ्यास करना पड़ा है। इसी जुनून ने सोनम को एक अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई। गुड़िया ने लड़कों के साथ कुश्ती करके उन्हें भी चित किया है।
-----दस साल की उम्र में शुरू की पहलवानी-----
भारतीय महिला पहलवान सोनम मलिक ने महज दस साल की उम्र यानि वर्ष 2012 में ही पहलवानी शुरू कर दी थी। गांव मदीना के नेताजी सुभाष चन्द्र बोस स्पोर्ट्स अकादमी में शुरू से ही अभ्यास करती आ रही सोनम मलिक ने अकादमी के संचालक और कोच अजमेर मलिक से पहलवानी के तकनीकी गुर सीखे। कोच अजमेर मलिक ने हरिभूमि से बातचीत करते हुए बताया कि सोनम मिलिक का दृढ़ संकल्प और जुनून ही रहा है कि इस युवा महिला पहलवान ने वर्ष 2016 में पहली बार राष्ट्रीय स्तर की नेशनल स्कूल गेम्स में स्वर्ण हासिल कर कैरियर की शुरूआत की थी। सेना में सूबेदार रहे रिटायर्ड कोच अजमेर मलिक ने बताया कि सोनम मलिक को गुडिया के नाम से पुकारते हैं, जिसका ओलंपिक तक सफर करने और देश का नाम रोशन करने का सपना संजोया था। टोक्यों ओलंपिक के लिए भारतीय कुश्ती टीम में गुडिया का के चयन का श्रेय उसके राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में तकनीकी दांव पेंच के साथ शानदार प्रदर्शन को है। उन्होंने बताया कि पिछले दिनों कजाखस्तान में एशियन ओलंपिक क्वालिफिकेशन मैच में जीत हासिल कर सोनम मलिक ने ओलंपिक में जगह बनाई, लेकिन उसी दौरान उसके घुटने में चोट लग गई थी, जिसके कारण पौलेंड में लगे शिविर के बजाए वह गांव के इसी स्टेडियम में चिकित्सकों की निगरानी और उनकी देखरेख में अभ्यास करके पसीना बहा रही है।
----विरासत में मिली पहलवानी----
भारतीय महिला पहलवान के पिता राजेन्द्र मलिक और चचेरा भाई नेशनल स्तर के पहलवान रहे हैं। परिवार की इस विरासत को चार चांद लगाने के लिए सोनम उर्फ गुड़िया ने ओलंपिक तक की मंजिल हासिल की। सोनम की इस काबलियत को लेकर उसके गांव और परिवार में खुशी का माहौल है। कोच भी गुड़िया के ओलंपिक में कुश्ती के लिए चुने जाने से बेहद प्रफुल्लित हैं, जिनकी शिष्या सबसे बड़ी प्रतियोगिता ओलंपिक में देश के लिए पदक लाने का लक्ष्य साधे हुए है। सोनम मलिक को भी पूरी उम्मीद है कि वह देश, प्रदेश और अपने गांव को रोशन करने के लिए पूरी ताकत झौंक देगी। उसके प्रदर्शन को देखते हुए पूरे देश की निगाहें भी उसके ओलंपिक में होने वाले मुकाबले पर टिकी होंगी।
----जब मुश्किलों ने घेरा----
कोच अजमेर बताते हैं कि सोनम के सामने एक वक्त ऐसा आया जब वर्ष 2017 में एक टूर्नामेंट के दौरान वह चोटिल हो गईं। यह चोट इतनी ज़बरदस्त थी कि उसका लिंब पैरालिसिस की स्थिति में पहुंच गया। ऐसी हालत में वह हाथ तक भी नहीं हिला पा रही थीं। यही नहीं इजाल कर रहे डॉक्टरों को भी उससे कोई उम्मीद नहीं बची थी और शुगर मिल में गाड़ी चालक पिता महंगा इलाज कराने की हालत में नहीं थी। यह उसकी किस्मत थी कि वह आयुर्वेदिक दवाईयों से छह महीने बाद फिर मैट पर लौट आईं।
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कुश्ती में प्रमुख उपलब्धियां---------
2019- कैडेट वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक
2019-कैडेट एशियन चैंपियनशिप में रजत पदक
2018-कैडेट एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में कांस्य पदक
2018-कैडेट वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में कांस्य पदक
2017- कैडेट वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक
2017-वर्ल्ड स्कूल गेम्स में स्वर्ण पदक
2017-कैडेट एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में कांस्य पदक।
17July-2021
टोक्यो ओलंपिक: पदक का सूखा खत्म करने उतरेगी सीमा पूनिया
चौथी बार ओलंपिक का सफर करने वाली इकलौती एथेलीट
ओ.पी. पाल.रोहतक।
जब तक जीतो नहीं तब तक लड़ना मत छोड़ो और ना हार मानो..यही लक्ष्य लेकर चक्का फेंक में भारतीय एथेलीट टीम में शामिल सीमा अंतिल टोक्यो ओलंपिक जा रही है। चौथी बार ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही राजीव पुरस्कार से सम्मानित सीमा से पिछले तीन ओलंपिक में पदक के सूखे को खत्म करने की उम्मीद है।
भारतीय एथेलीट टीम में चक्का फेंक में नए मीट रिकार्ड के साथ टोक्यो ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाली सीमा अंतिल का जन्म 1983 में सोनीपत जिले के खेवड़ा गांव निवासी विजय पाल के परिवार में हुआ। टोक्यों ओलंपिक में वह लगातार चौथी बार ओलंपिक में हिस्सा ले रही है। पिछले तीन वर्ष 2004 के एथेंस ओलिंपिक, 2012 के लंदन ओलिंपिक और 2016 के रियो ओलिंपिक में सीमा के हाथ निराश लगी थी, लेकिन इस बार जिस प्रकार से वह तैयारी कर रही है, उसे देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि इस बार वह ओलंपिक से खाली हाथ नहीं लौटेगी। मसलन वह पिछले तीन साल से देश व विदेश में लगन से प्रशिक्षण ले रही हैं। चक्का फेंक में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए पदक हासिल करके देश व हरियाणा का नाम रोशन करने वाली सीमा अंतिल को 2010 में पुलिस सब इंस्पेक्टर की नौकरी मिली, जो आज डीएसपी पद पर तैनात है। परिजनों के अनुसार स्टेडियम में पहली बार डिस्कस देखा और आजमाने के लिए फेंका तो 22 मीटर की दूरी तय की। जब वर्ष 1995 में अंडर-14 जूनियर नेशनल में 28.28 मीटर की दूरी नाप कर नया रिकार्ड बनाकर स्वर्ण पदक जीता, तो उसने पीछे मुडकर नहीं देखा।
-----उम्मीदों पर टिकी हैं निगाहें-----
हरियाणा के खेवड़ा गांव निवासी सीमा अंतिल के पिता विजय पाल सिंह बेटी सीमा के ओलंपिक में हिस्सेदार बनाए जाने से परिवार समेत खुश है। पिता को पूरी उम्मीद है कि उनकी बेटी इस बार देश के लिए मेडल जरूर लेकर आएगी। सीमा की मां प्रकाशी देवी और भाई अमित का कहना है कि देश का झंडा बुलंद करने के लिए वह लगातार जीतोड़ मेहनत कर रही है। सीमा के लगातार मेहनत करके पसीना बहाने के साथ उसके प्रदर्शन को देखते हुए कोच अमित को भी भरोसा है की टोक्यो ओलंपिक में सीमा अंतिल उम्दा प्रदर्शन करके पदक हासिल करेगी। कोच की माने तो उसने जिस प्रकार चुनौतियों का सामना किया है और साल 2000 में डोपिंग विवाद के बाद उसके कैरियर थम सा गया था। इसके बावजूद उसने हार नहीं मानी और दो साल बाद फिर से उम्मीदों को ऐसा जगाया कि दो साल बाद हुई चैंपियनशिप में कांस्य पदक लिया। टोक्यो ओलंपिक के लिए सीमा दो साल मास्कों में प्रशिक्षण लेने के बाद पटियाला में ट्रेनिंग ले रही है।
------खेल से परिवार का गहरा नाता-----
सीमा अंतिल के परिवार में उसके बड़े भाई आनंद पाल अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान तो दूसरे भाई अमित पाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हॉकी में स्वर्ण पदक में हिस्सेदार रहे। दोनों भाइयों की इन उपलब्धियों ने ही सीमा को खेल के लिए प्रेरित किया और स्टेडियम जाना शुरू किया। स्कूल स्तर पर सीमा ने नेशनल में लंबी कूद, शाटपुट और ऊंची कूद में पदक जीते हैं। इसके बावजूद उसने चक्का फेंक स्पर्धा को अपने कैरियर का हिस्सा बनाया। डिस्कस थ्रो करने की तकनीक का इस्तेमाल करने में माहिर सीमा ने इंटर-स्टेट नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 63.72 मीटर तक की दूरी तय की। साल 2006 में हरियाणा राज्य सरकार ने सीमा अंतिल को भीम अवार्ड से सम्मानित किया था।
-----विवादित हुआ वैवाहिक जीवन-----
अंतरराष्ट्रीय एथलीट सीमा अंतिल अब मेरठ की बहू नहीं कहलाएंगी? लेकिन पिछले तीन सालों से पति अंकुश पुनिया व सीमा अंतिल के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है। सीमा ने फेसबुक पर अपने नाम के आगे से पुनिया सर नेम हटा लिया है। तलाक प्रक्रिया कोर्ट में चल रही है, लेकिन अभी हुई नहीं है। इसकी पुष्टि खुद सीमा ने फेसबुक आईडी की डिटेल में खुद की है।
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अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां----
2002- विश्व जूनियर चैंपियनशिप मेंकांस्य पदक
2006-कामनवेल्थ गेम्स मेलबर्न में रजत पदक
2010-कामनवेल्थ गेम्स दिल्ली में कांस्य पदक
2014-एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक
2014-कामनवेल्थ गेम्स ग्लास्गो में रजत पदक
2014-एशियन गेम्स इंचियोन में रजत पदक
2018-कामनवेल्थ गेम्स गोल्ड कोस्ट में रजत पदक
2018-एशियन गेम्स जकार्ता में कांस्य पदक
2021-बेलारूस नेशनल चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक।
16July-2021
संतोष यूनिवर्सिटी ग़ाज़ियाबाद के संस्थापक चेयरमैन डॉ. पी महालिंगम, पुत्र सन्तोष की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज
फ़र्ज़ी दस्तावेजों के आधार पर करोड़ों का ऋण लेकर वापस नहीं करने का मामला
पहले भी ऋण लेकर न देने के रहे हैं मामले
हरिभूमि न्यूज : गुरुग्राम
अपर सत्र न्यायालय गुरुग्राम ने बुधवार को फ़र्ज़ी दस्तावेजों के आधार पर करोड़ों का ऋण लेकर डकारने के मामले में संतोष यूनिवर्सिटी ग़ाज़ियाबाद के संस्थापक चेयरमैन डॉ. पी. महालिंगम,उनके पुत्र डॉ. सन्तोष महालिंगम तथा एक अन्य आरोपित पुधुर मनिकोम की अग्रिम जमानत अर्जी को खारिज कर दिया है। अदालत से जमानत अर्जी खारिज होने को डॉ. महालिंगम परिवार के लिए झटका माना जा रहा है।
ज्ञात हो कि पीएम फिनकैप लिमिटेड के निदेशक राजेश गुलाटी ने 2 जुलाई को डीएलएफ थर्ड थाने में संतोष यूनिवर्सिटी के पदाधिकारियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471, 120बी, 34 और 506 के अंतर्गत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें संतोष यूनिवर्सिटी के फाउंडर चेयरमैन डॉ. पी. (परमशिवम) महालिंगम, उनके पुत्र व निदेशक डॉ. सन्तोष महालिंगम, संतोष ट्रस्ट तथा महाराज जी एजुकेशनल ट्रस्ट बोर्ड के सदस्य डॉ. पुधुर मनिक्कम के अलावा शर्मिला आनंद को नामजद करते हुए संतोष ट्रस्ट तथा महाराज जी एजुकेशनल ट्रस्ट बोर्ड को आरोपी बनाया। गुलाटी ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि आरोपियों ने उक्त नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनी से मार्च 2015 में रसूकदारी का प्रमाण देते हुए राजनैतिक और अन्य प्रसिद्ध हस्तियों के साथ फोटो दिखाकर तथा अन्य साजिशों के तहत उनकी कम्पनी से 35 करोड़ रुपये का ऋण लिया था। इस कर्ज की एवज में उन्होंने अकबरपुर, बेहरामपुर, मिर्जापुर की कृषि भूमि तथा प्रताप विहार के 272 फ्लैट के दस्तावेज सिक्योरिटी के रूप में कम्पनी के पास रखे थे। आरोपियों ने एग्रीमेंट में 30 सितंबर 2015 तक ब्याज सहित ऋण चुकता करने का भरोसा दिलाया था, लेकिन आरोपियों ने निर्धारित समय से ऋण चुकता नहीं किया। इसके विपरीत ऋण की अदायगी की मांग करने पर विभिन्न आपराधिक तरीकों से दबाव बनाने की कोशिश की गई। इतना ही नहीं आरोपी विभिन्न राजनीतिक हस्तियों के नाम पर धमकाने में लग गये।
----महालिंगम परिवार को बड़ा झटका-----
पुलिस में पंजीकृत शिकायत के आधार पर एसीपी ने आरोपियों को 5 जुलाई को पूछताछ के लिए तलब भी किया था। इसके बजाए संतोष यूनिवर्सिटी के संस्थापक चेयरमैन डॉ. पी. महालिंगम,उनके पुत्र डॉ. सन्तोष महालिंगम तथा अन्य अन्य आरोपित पुधुर मनिक्कम की अग्रिम जमानत के लिए गुरुग्राम अपर सत्र न्यायाधीश माननीया शशि चौहान के न्यायालय में अर्जी दायर की। बुधवार को इस याचिका पर सुनवाई करने के बाद सत्र न्यायालय ने तीनों आरोपियों की अग्रिम जमानत अर्जी को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने छह पेज के आर्डर में कहा है कि आरोपियों पर जो आरोप लगाए गए हैं, वह गम्भीर अपराध प्रवृत्ति के हैं। आईपीसी की धारा 467 में आजीवन कारावास का प्रावधान है। इसलिए मामला आरोपियों को अग्रिम जमानत योग्य नहीं है। यह टिप्पणी करते हुए अदालत ने अग्रिम अर्जी को खारिज कर दिया। अदालत के इस आदेश से महालिंगम परिवार को बड़ा झटका लगा है।
----मेडिकल कालेज व अस्पताल पर नीलामी की तलवार---
गौरतलब है कि इसी प्रकार की साजिश के तहत संतोष ग्रुप ने हाउसिंग व अरबन डवलपमेंट कॉरपोरेशन यानि हुडको से भी वर्ष 1995 में 75 करोड़ रुपये का ऋण लिया था। जिसकी राशि चुकता न करने पर संतोष ट्रस्ट तथा महाराज जी एजुकेशनल ट्रस्ट की सिद्धार्थ विहार स्थित 63 एकड़ भूमि समेत पांच अन्य संपत्तियों पर हुडको अपने कब्जे में ले चुकी है। अब हुडको संतोष मेडिकल कालेज व अस्पताल को भी नीलामी करने की कार्यवाही शुरू की है। इसी प्रकार संतोष ट्रस्ट ने हुडको के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील भी की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उल्टे मई 2015 में 455 करोड़ रुपये की वसूली करने के आदेश दे दिये थे।
यह बात भी जग ज़ाहिर है कि संतोष विश्वविद्यालय गज़ियाबाद की स्वामी वाली कम्पनी सालों से देनदारी के अनेक मुक़द्दमों में बुरी तरह से फँसी हुई है। देनदारी के एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने तो यहाँ तक भी टिप्पणी कर दी कि महालिंगम तो आदतन क़ानून का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति है। यह भी ज्ञात हो कि संतोष अस्पताल चेन्नई क़र्ज़ की देनदारी न करने के कारण दिवालिया घोषित होने की प्रक्रिया में है। इस अस्पताल को क़र्ज़ देने वाली कम्पनी मुथूत फ़ाइनैन्स ने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया है। संतोष अस्पताल चेन्नई की डीसीबी बैंक की भी बड़ी देनदारियाँ हैं।
16July-2021
टोक्यो ओलंपिक: युवा पहलवान दीपक पूनिया पदक का प्रबल दावेदार
अब तक किसी बड़ी प्रतियोगिता से नहीं लौटा खाली हाथ
ओ.पी. पाल.रोहतक।
भारतीय फ्रीस्टाइल पहलवान दीपक पूनिया से देश को उसके दांव-पेंच की बेहतरीन तकनीक वाली क्षमता को देखते हुए 29वें टोक्यो ओलंपिक में पदक की उम्मीद है। भारतीय कुश्ती टीम के सदस्यों में दीपक पूनिया 86 किग्रा भार वर्ग में इसलिए पदक का प्रबल दावेदार माना जा रहा है कि वह आज तक किसी भी बड़ी प्रतियोगिता से खाली हाथ नहीं लौटा।
हरियाणा के झज्जर जिले 19 मई 1999 को डेयरी किसान सुभाष पूनिया के परिवार में जन्मे दीपक पूनिया पांच साल की उम्र से ही गांव के अखाड़े में कुश्ती के दांव-पेंच आजमाने लगा था। घर-घर दूध बेचने का काम करने वाले पिता सुभाष बेटे दीपक को दंगल दिखाने जाते थे। पिता का बेटे को एक रेसलर बनाने के लिए लगातार दिया जाने वाला प्रोत्साहन और बेटे की मेहनत का ही नतीजा है कि आज दीपक पूनिया ओलंपिक खेलों में भारत के झंडे को ऊंचा करने की तैयारी कर रहा है। वर्ष 2015 से दीपक के पिता हर दिन 60 किलोमीटर की यात्रा करके अपने बेटे को दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में दूध और फल देने जाने लगे। बाकी दीपक को कुश्ती के गुर सिखाने का काम उनके कोच वीरेन्द्र पहलवान ने किया, जिसकी वजह से दीपक पूनिया आज अंतर्राष्ट्रीय पहलवानों की फेहरिस्त में सुर्खियों के साथ शामिल है। पहलवान दीपक पूनिया ने जब कुश्ती की शुरूआत की, तो उन्होंने यह कभी नहीं सोचा था वह एक दिन वर्ल्ड मेडलिस्ट बन झज्जर का नाम रोशन करता। दीपक का तो केवल इतना सपना था कि वह पहलवानी के जरिए नौकरी हासिल कर परिवार को आर्थिक रूप से मजबूती दे सके।
------------पहले ही अंतर्राष्ट्रीय कुश्ती में बने चैंपियन---------
भारतीय पहलवान दीपक पूनिया के कोच वीरेन्द्र पहलवान ने हरिभूमि से बातचीत में बताया कि विश्व कुश्ती रैंकिंग में नंबर दो के पहलवान दीपक पूनिया एक अनुशासित पहलवान है, जिसमें बड़े बड़े सूरमाओं को पटखनी देने की क्षमता है। दीपक को इस मुकाम तक लेजाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कोच वीरेन्द्र ने कहा कि कुश्ती के खेल में दिमाग, ताकत, किस्मत और मैट पर शरीर का लचीलापन जरुरी है और दीपक के पास यह सबकुछ है। यही वजह रही कि वर्ष 2016 में अपनी पहली अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व कैडेट चैंपियनशिप में चैंपियन बनकर लौटे 17 साल के दीपक ने फिर जूनियर विश्व चैम्पियन बनते ही अपने इरादे जाहिर कर दिये थे। इसके बाद दीपक ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। कोच ने बताया कि इसी प्रकार वर्ष 2019 में अपनी पहली सीनियर विश्व कुश्ती चैम्पियनशिप में 86 किग्रा वर्ग में दीपक पूनिया ने रजत पदक प्राप्त किया। यहां से ही उसे ओलपिंक कुश्ती टीम का टिकट मिला। उनका कहना है कि यदि टखने की चोट के कारण वह फाइनल में ईरान के महान पहलवान हसन याजदानी के खिलाफ हटते तो वह स्वर्ण पदक लेकर वह विजेता भी बन सकते थे। इसीउन्होंने बताया कि खास बात ये है कि अभी तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी बड़ी कुश्ती प्रतियोगिता से दीपक पूनिया खाली हाथ वापस नहीं लौटा। इसलिए ओलंपिक में दीपक पूनिया को पदक का प्रबल दावेदार माना जा रहा है।
---------छत्रसाल स्टेडियम में बनाया कैरियर-------
कोच वीरेन्द्र सिंह का कहन है कि वर्ष 2014 पहलवानी का जज्बा लेकर हरियाणा के झज्जर दीपक पूनिया छत्रसाल स्टेडियम में आया था। वहां अन्य पहलवानों की तरह उसने भी ओलंपियन बनने का सपना संजोया, जो मुकाम हासिल करना इतना आसान नहीं होता। इसके बावजूद उनके संपर्क में दीपक में उन्होंने अन्य पहलवानों से कुछ अलग ही देखा। तभी से उन्होंने इसे कुश्ती के लिए आगे बढ़ाने के प्रयास किया और यह भी दिलचस्प पहलू है कि इस युवा पहलवान ने कहीं आगे जाकर मेहनत की। दीपक ने कुश्ती और प्रशिक्षण को जिस प्रकार अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाया, उसी का नतीजा है कि आज दीपक पूनिया विश्व के पहलवानों की फेहरिस्त में विशेष स्थान बना चुका है।
---दीपक पूनिया की उपलब्धियां----
2020 नई दिल्ली एशियाई चैंपियनशिप में कांस्य
2019 नूर-सुल्तान विश्व चैंपियनशिप में रजत
2019 तेलिन विश्व जूनियर कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण
2019 शीआन एशियाई चैम्पियनशिप में कांस्य
2018 ट्रनावा विश्व जूनियर कुश्ती चैंपियनशिप में रजत
2018 नई दिल्ली एशियाई जूनियर चैम्पियनशिप में स्वर्ण
2016 त्बिलिसी विश्व कैडेट चैंपियनशिप में स्वर्ण।
15July-2021
मंडे स्पेशल: पाताल में पहुंचा भू-जल स्तर, प्रदेश के 14 जिलों में तो हो गए हालात बद से बदतर
असर नहीं दिखा पा रही जल सुधार की योजनाएं
पिछले पांच दशक से लगातार गिर रहा है भूजल स्तर
पानी पर नही संभले तो बूंद बूंद को तरसेंगे हरियाणावासी
ओ.पी. पाल.रोहतक।
भू-जल को लेकर प्रदेश के हालात बद से बदतर हो गए हैं। राज्य के 14 जिलों में पानी पाताल में चला गया है। कुल 141 ब्लाक में से 85 ब्लाक की हालत ये है कि उन्हें रेड जोन में रखा गया है। सबसे ज्यादा बुरा हाल अंबाला, करनाल, कुरुक्षेत्र, कैथल, हिसार, झज्जर, भिवानी, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, सिरसा, सोनीपत, पानीपत और जींद जिलों में है, जिनके 64 ब्लॉक डार्क जोन श्रेणी रखे गए हैं। सरकार ने भूमिगत जल स्तर की कई योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन हालात में सुधार की बजाए बदहाली ज्यादा हो रही है। न तो जल दोहन से आमजन बाज आ रहे और न ही अफसर इस पर काबू पा रहे हैं।
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हरियाणा में वैसे तो पिछले पांच दशक से भूजल का स्तर लगातार गिर रहा है। दोहन होने की वजह से भूजल स्तर की स्थिति चिंताजनक हालातों में पहुंच गई र्है। इसके नियंत्रण के लिए राज्य सरकार जल सरंक्षण को लेकर विभिन्न योजनाएं भी चला रही है, लेकिन करोड़ो रुपये बहाने के बावजूद भूजल को धार नहीं दी जा सकी। केंद्र सरकार द्वारा देश में शुरू की गई अटल भूजल योजना को कार्यान्वित करने में प्रदेश में करोड़ो की रकम खर्च कर रही है। हाल ही सरकार ने अटल भूजल योजना में अटल पाइप लाइन स्कीम के तहत 725 करोड़ रुपये की योजना तैयार की है, जिसमें रेड जोन में शामिल जिलों के फिलहाल 36 ब्लाकों की 12.55 लाख हैक्टेयर भूमि को कवर करने की शुरूआत कर दी गई है। इस योजना के कार्यान्वयन में इन ब्लाकों की 1669 ग्राम पंचायतों को शामिल किया गया है। इस गिरते भूजल स्तर में सुधार और जल संरक्षण को लेकर अब सरकार प्रदेश के हर ब्लॉक स्तर पर अलग से वाटर प्लान तैयार करने में जुट गई है। ऐसी योजना के इसके तहत वहां पीने के पानी और सिंचाई के लिए पानी का प्रबंध किया जाएगा।
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13 जिलों के 64 ब्लॉक डार्क जोन में--------
प्रदेश में भूजल स्तर के अत्याधिक दोहन की वजह से सर्वे के आधार पर 13 जिलों के 64 ब्लॉक को डार्क जोन घोषित किया जा चुका है। इन जिलों में अंबाला, करनाल, कुरुक्षेत्र, कैथल, हिसार, झज्जर, भिवानी, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, सिरसा, सोनीपत, पानीपत और जींद शामिल हैं। इन जिलों के ब्लॉकों में भिवानी के बाढड़ा, बहल, कैरू, लोहारू, तोशाम, फतेहाबाद का टोहाना, कैथल का गुहला, राजौंद, कुरुक्षेत्र के लाडवा, पिहोवा, शाहाबाद, पानीपत के बापौली, समालखा, फरीदाबाद, बल्लभगढ़, करनाल, असंध, महेंद्रगढ़ में नांगल चौधरी, अटेली, कनीना, रेवाड़ी में खोल, सिरसा में ऐलनाबाद, गुरुग्राम व फरूखनगर, पटौदी, सोहना, यमुनानगर में जगाधरी, मुस्तफाबाद, रादौर, साढौ़रा, पलवल में हसनपुर, हथीन, होडल समेत 64 ब्लॉक डार्क जोन घोषित किए गए हैं।
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तेजी से गिर रहा भूजल स्तर----------
जल विशेषज्ञों के अनुसार प्रदेश में बीते 42 साल में भूजल का स्तर 60 फुट नीचे जा पहुंचा है। राज्य में जहां वर्ष 2000 में भूजल औसतन 31 फीट पर था। वहीं अब खासकर गुरुग्राम, फतेहाबाद, फरीदाबाद, कैथल, रेवाड़ी जिले में भूजल स्तर औसतन 88 फीट से नीचे गिर चुका है। यही नहीं इन जिलों के शहरी क्षेत्र में तो हालात और भी बद से बदतर है, जहां भूजल 120 फीट से नीचे दर्ज किया गया है। सूबे का 60 फीसदी इलाका डार्क जोन में शामिल हो गया है। गुरुग्राम और महेंद्रगढ़ जिलों में ट्यूबवेल का कनेक्शन जारी करने में विशेष सावधानी बरती जा रही है। सबसे बुरा हाल कुरुक्षेत्र, गुरुग्राम और महेंद्रगढ़ का है। यहां भूजल स्तर 90 फुट के करीब है।
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ऐसे गिर रहा है भूजल स्तर---------
प्रदेश के सात जिले ऐसे हैं, जहां जल भराव तथा जलीय लवणता की समस्या है। प्रदेश में लोगों द्वारा अंधाधुंध भूजल का इस्तेमाल के चलते वर्ष 2004 में राज्य के 114 ब्लाक में से 55 ब्लाक यानि 48 फीसदी रेड जोन में आ चुके थे। जिसके हालात इतने बद से बदतर हो गये कि फिलहाल प्रदेश के 141 ब्लाक में से 85 ब्लाक रेड जोन में पहुंच गए, जो कि राज्य का 60 प्रतिशत हिस्सा है।
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धान की खेती पर संकट-----
भूजल पर सर्वे रिपोर्ट की माने तो कम होते भूजल की सबसे बड़ी वजह ट्यूबवेल से फसलों की सिंचाई मानी जा रही है। धान की खेती में पानी सबसे ज्यादा लगता है। एक एकड़ धान में करीब 26 बार पानी लगाने की जरूरत पड़ती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक एक किलोग्राम चावल पैदा करने के लिए करीब 5389 लीटर पानी की खपत होती है। हरियाणा गठन के समय प्रदेश में धान का रकबा 1.92 लाख हेक्टेयर था जो, बढ़कर 14 लाख हेक्टेयर को पार कर गया है। इसे देखते हुए राज्य सरकार मक्का और अरहर की खेती को बढ़ावा दे रही है। हरियाणा तालाब प्राधिकरण की योजना के तहत प्रदेश में करीब 14 हजार तालाबों का पानी इस्तेमाल करने पर बल दे रहा है।
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ढाकला गांव ने पेश की मिसाल-----
प्रदेश में गिरते भूजल से बढ़तेक संकट को देखते हुए झज्जर जिले के गांव ढाकला के किसानों ने इस बार सामूहिक रूप से 3445 एकड़ भूमि में धान की खेती न करने का निर्णय लिया है। दरअसल जिन 36 ब्लॉकों को डार्क जोन घोषित किया गया था, उनमें यह गांव भी शामिल है। इस गांव के किसानों के निर्णय पर मुख्यमंत्री ने राज्य में जल संरक्षण व फसल विविधीकरण के लिए चलाई जा रही ‘मेरा पानी-मेरी विरासत’ के तहत सात हजार रुपए प्रति एकड़ प्रोत्साहन दिया जाएगा।
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अटल भूजल योजना से होगा सुधार-----
देश में भूजल संसाधनों की कमी को दूर करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही अटल भूजल योजना के तहत राज्य सरकार ने इन 14 जिलों को कवर करने का निर्णय लिया है। इस योजना में इन जिलों की 1669 ग्राम पंचायतें शामिल किया हैं। इस योजना में सामुदायिक भागीदारी के साथ ऐसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में भूजल प्रबंधन में सुधार करने का प्रयास है। हरियाणा में योजना के तहत भूजल संसाधनों का हाइड्रोजियोलॉजिकल डाटा नेटवर्क तैयार किया जाएगा।
-देवेंद्र सिंह, अतिरिक्त मुख्य सचिव, जल संसाधन विभाग हरियाणा।
साक्षात्कार: सामाजिक समरसता की अलख जगाने में साहित्य की अहम भूमिका: बड़गूजर
हरियाणा के लोक कवियों को गुमनामी से बाहर लेकर आए
व्यक्तिगत परिचय
नाम: प्रो. राजेन्द्र बड़गूजर
जन्म: 20 मई 1971
जन्म स्थान: गांव मलिकपुर, जिला सोनीपत (हरियाणा)
शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी), एम.फिल. (हिन्दी), एमएएमसी, पीजीडीटी, पीएच.डी., डी.लिट.
सम्प्रति: प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिंदी विभाग, अधिष्ठाता मानविकी एवं भाषा संकाय, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतीहारी (बिहार)
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हरियाणा में प्रो. राजेन्द्र बड़गूजर साहित्य के क्षेत्र में सामाजिक समानता की अलख जगाने वाले इकलौते साहित्यकार हैं, जिन्होंने हरियाणा की लोक संस्कृति एवं लोक साहित्य के माध्यम से लोक-चेतना जगाने का काम किया है। हरियाणा साहित्य अकादमी ने प्रो. राजेन्द्र बड़गूजर को साहित्य जगत में उत्कृष्ट भूमिका के लिए वर्ष 2019 के दो लाख रुपये के पुरस्कार से सम्मानित किया है। उन्होंने दलित चेतना के लिए साहित्य और हरियाणवी लोक साहित्य पर कुल 31 पुस्तकें लिखी हैं। जिनमें वे हरियाणा के अनेक लोक कवियों को गुमनामी से निकालकर प्रकाश में लेकर आए है। प्रो. राजेन्द्र बड़गूजर ने सन 2011 में ‘महाशय दयाचंद मायना ग्रंथावली’ का सम्पादन किया था, जो हरियाणा ग्रंथ अकादमी से प्रकाशित है। राज्य सरकार ने हाल ही में उनकी देशप्रेम और समाज सुधार की रागणियों को देखते हुए हरियाणा साहित्य अकादमी के पुरस्कारों में महाशय दयाचंद मायना पुरस्कार को भी मान्यता दी है। लोक चेतना जागृत करने के लिए साहित्य के क्षेत्र में की गई समाज सेवा को लेकर हरिभूमि संवाददाता से हुई बातचीत में प्रो. राजेन्द्र बड़गूजर ने कई महत्वपूर्ण पहलुओं को साझा किया है। खासकर इस आधुनिक युग में हरियाणा में घुले जातिवाद की मानसिकता को त्यागकर भेदभाव के बजाए योग्यता के आधार पर सामाजिक समानता का संदेश दिया है।
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प्रख्यात साहित्यकार प्रो. राजेन्द्र बड़गूजर ने हिंदी साहित्य में सामाजिक समता को महत्व देने का प्रयास किया। दरअसल हरियाणा में दलित समाज के खिलाफ घृणा और नफरत की लहर बरसों से देखी जाती रही है। हरियाणा की इसी जमीन से जुड़कर उन्होंने साहित्य लेखन में अपनी एक ऐसी पहचान बनाई है कि सर्वसमाज में दलितों का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित हुआ है। इस समाजसेवा के कार्यक्षेत्र में बड़गूजर ने राज्य में दलितों की बस्तियों में जाकर दलित बच्चों और युवाओं में शिक्षा की अलख जगाई और उन्हें स्कूलों में दाखिले भी दिलाने का कार्य किया। कैथल में एस.आर.डी. पब्लिक स्कूल के शुभारम्भ में भी प्रो. बडगूजर का विशेष योगदान रहा है। प्रो. बड़गूजर के साहित्य में दलित लेखन, कहानियों और कविताओं को लेकर उन्हें देशभर से चौतरफा साहित्यकारों, कवियों, रचनाकारों और बुद्धिजीवियों, उच्च शिक्षण संस्थाओं से दलित चेतना के कार्य के लिए सराहना मिल रही हैं।
शोध पत्र लेखन व प्रस्तुतीकरण
साहित्यकार डा. बडगूजर ने 21 पुस्तकों का संपादन किया है, जिसमें हरियाणवी ग्रंथावली, रचनावली और रागनियों की ऐसी पुस्तकें भी शामिल है जिसमें समाज सुधार के लिए हरियाणवी संस्कृति व सभ्यता को वर्णित किया गया है। उनके साहित्य पर अनेक शोधपत्र प्रकाशित हुए हैं। सामाजिक चेतना पर दलित साहित्य का लेखन करने वाले डा. बड़गूजर ने देशभर के लेखकों, कवियों और रचनाकारों व उनकी पुस्तकों पर पीएच.डी. और एम.फिल. उपाधि के लिए किये गये शोध का निर्देशन भी किया है। ‘राजेंद्र बडगूजर के साहित्य में दलित यथार्थ’ विषय पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में एम.फिल. पर लघु शोध प्रबंध, ‘कैथल जनपद का हिंदी साहित्य को योगदान’ विषय पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पीएचडी के शोध प्रबंध में इनकी रचनाएं शामिल हुई हैं। इसी प्रकार यूजीसी की अनुदान राशि से सम्पन्न डॉ. संजय जैन द्वारा लिखित शोध ग्रंथ ‘समकालीन कविता के मूल्य चेतना’ में ‘दलित चेतना के प्रतिबद्ध युवा हस्ताक्षर: राजेन्द्र बडगूजर’ उप विषय में ‘मनु का पाप’ कविता संग्रह को शामिल किया गया है। इसी प्रकार मेरठ विश्वविद्यालय में डॉ. सुशील कुमार शीलू द्वारा सम्पन्न शोध प्रबंध ‘हिंदी दलित कविता का आलोचनात्मक अध्ययन’ विषय के तहत इनकी रचनाएं शामिल हुई। यही नहीं साहित्य में दलित लेखन्, कहानी व कविताओं का प्रकाशन विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैँ। प्रो. राजेन्द्र बड़गूजर के साहित्य पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में पीएच.डी. तथा एम.फिल. के शोध कार्य सम्पन्न हुए हैं। हरियाणवी लोक सहित्य पर इनके द्वारा सम्पादित पुस्तकों पर नए विमर्शो की शुरूआत हुई है। विशेष रूप से रागणी गायकी के क्षेत्र में छाप के मसले को इन्होने उजागर किया है।
प्रमुख पुस्तकें
प्रो. राजेन्द्र बड़गूजर की हरियाणवी लोक साहित्य पर सम्पादित 21 प्रमुख पुस्तकों के अलावा तीन कविता संग्रह-‘भीड़ी गलियां तंग मकान’, ‘कुछ मत कह देना!’ तथा ‘मनु का पाप’ शामिल है। जबकि दो कहानी संग्रह – ‘कसक: एक दलित टीस’ और ‘हमारी जमीन हम बोएंगे’ लिखी हैं। उनकी आलोचना पुस्तकों में ‘दलित साहित्य और विचारधारा’, ‘चिन्तन का परिपेक्ष्य और दलित साहित्य’, ‘हिन्दी दलित आत्मकथाओं में बचपन’, ‘हिंदी दलित आत्मकथाएं : एक सांस्कृतिक विश्लेषण’ और ‘दलित चेतना में गुरु रविदास का योगदान’ और ‘छापकटैया’ शामिल हैं।
पुरस्कार और सम्मान
हरियाणा साहित्य अकादमी ने प्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. राजेन्द्र बड़गूजर को दो लाख रुपये के सम्मान - 2019 पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। इससे पहले अकादमी द्वारा उनके कविता संकलन ‘भीड़ी गलियां तंग मकान’ के प्रकाशन के लिए दस हजार रुपये की अनुदान राशि और कहानी ‘हमारी जमीन हम बोएंगे’ को प्रतियोगिता में नकद द्वितीय पुरस्कार दिया जा चुका है। प्रो. राजेन्द्र बड़गूजर को भारतीय दलित साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा 2003-04 में डा. अम्बेड़कर फैलोशिप अवार्ड से नवाजा जा चुका है। साहित्य सभा कैथल से वर्ष 2011 में ‘श्री अर्जुन दास मलिक स्मृति साहित्य सम्मान’ के अलावा उन्हें नेहरु युवा केंद्र सोनीपत द्वारा दो बार समाज सेवा के लिए सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा बजरंग मंडल हरियाणा द्वारा राष्ट्रीय अंधता निवारण कार्य में सम्मानित किया जा चुका है। जबकि विभिन्न संस्थाओं में उन्हें अनेक सम्मान मिल चुके हैं।
12July-2021
टोक्यों ओलंपिक में मुक्के का दम दिखाने को तैयार मनीष कौशिक
अर्जुन अवार्डी मुक्केबाज को तिरंगा ऊंचा करने की है पूरी उम्मीद
ओ.पी. पाल.रोहतक।
29वें टोक्यो ओलंपिक में हरियाणा के चार मुक्केबाजों में तीन भिवानी जिले के हैं, जिनमें जिले के एक छोटे से गांव में किसान का बेटा मनीष कौशिक भी 63 किलोग्राम भार वर्ग में भारत का प्रतिनिधित्व करेगा। इसी साल स्पेन में राष्ट्रमंडल खेलों धुरंधर मुक्केबाजों को धूल चटाकर स्वर्ण पदक हासिल करने वाले मनीष को पूरा भरोसा है कि वह देश का झंडा ऊंचा करके स्वर्ण पदक लेकर आएगा।
भिवानी जिले के देवसर गांव में किसान सोमदत्त कौशिक के 25 वर्षीय बेटा और अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाज मनीष कौशिक टोक्यो ओलंपिक में 63 किग्रा भार वर्ग का खिताब अपने नाम करने के लक्ष्य को लेकर जापान रवाना होने से पहले इटली में जमकर पसीना बहा रहा है। मनीष कौशिक के नाम मुक्केबाजी में कई ऐसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक ऐसे बेहतरीन रिकार्ड है, जिसमें उसने अच्छे नामी गरामी मुक्केबाजों को अपना दम दिखाकर धूल चटाई है। मनीष के पिता सोमदत्त का कहना है कि मनीष का ताकत और तकनीक पर फोकस रखता है, जिसके लिए वह लगातार अभ्यास करके पूरी तैयारी के बाद ही रिंग में उतरता है। उन्हें उम्मीद है कि मनीष टोक्यों ओलंपिक में गोल्ड लेकर अपने देश का झंडा ऊंचा रखेगा।
-----बारह साल की उम्र में संजोया था सपना----
भिवानी के छोटे से गांव देवसर में एक साधारण किसान के परिवार में 11 जनवरी 1996 को जन्मे मनीष कौशिक ने अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाज बनकर देश का झंडा बुलंद करने का सपना उस समय संजोया, जब वर्ष 2008 के ओलंपिक में उन्हीं के गांव मुक्ककेबाज जितेन्द्र और जिले के बिजेंद्र सिंह व अखिल का अपने घरों में लौटने पर शानदार स्वागत होते देखा। उसके परिजनों की माने तो उसने तभी से मुक्केबाजी को कैरियर बनाने का संकल्प कर लिया। यही संकल्प आज उसके परिवार, गांव, जिले, प्रदेश और राष्ट्र के लिए बुलंदियों पर देखा जा रहा। पिछले महीने जून में ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी मन की बात में ओलंपिक जाने वाले खिलाड़ियों में खासतौर से मनीष कौशिक का जिक्र किया था। मनीष कौशिक ने मुक्केबाजी के कैरियर की असल इबादत वर्ष 2015 में कतर के दोहा अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी में स्वर्ण पदक लेकर लिखना शुरू कर दिया था, जो आज ओलंपिक का सफर करा रही है। इन्हीं बुलंदियों ने उन्हें वर्ष 2016 में भारतीय सेना में सहायक सूबेदार बना दिया। मनीष ने जब बाल्यावस्था में ही 32 किग्रा भार वर्ग में मनीष ने पहला पदक जीता, तो उसने फिर कभी पीछे मुडकर नहीं देखा और जिला व राज्य स्तर पर पदकों का घर में अंबार लगा दिया।
---प्रदर्शन ने दिखाई ओलंपिक की राह---
अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाज मनीष कौशिक को मुक्केबाजी के वरिष्ठ कोच नरेंद्र राणा ने एक नजर में पहचान कर माना कि यदि ऐसे बेहतरीन मुक्केबाज भारत के पास होंगे तो ओलंपिक में स्वर्ण पदक दिला सकता है। जिसने वर्ष 2016 में सीनियर कैंप के फाइनल में अनुभवी मुक्केबाज़ शिवा थापा को हराकर चैंपियन का खिताब हासिल किया। इस पर कोच ने उसे प्रोत्साहित किया, तो वर्ष 2016 में इस होनहार भारतीय मुक्केबाज़ ने कजाखिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज़ी टूर्नामेंट में रजत पदक हासिल कर सबको चौंका दिया। मनीष के मौजूदा कोच कोच मनजीत सिंह का कहना है कि ऐसे एक नहीं, कई मौके आए जब मनीष ने अपने मुक्के के पंच से उम्मीद से ज्यादा दम दिखाया। कोच की माने तो पिछले शानदार प्रदर्शनों ने मनीष कौशिक के लिए ओलंपिक की राह को बेहद आसान बनाया।
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मुक्केबाजी में उपलब्धियां---
2008-मुक्केबाजी का शुरू हुआ सफर।
2009-नेशनल कप ठाणे में 32 किग्रा में पहला स्वर्ण पदक।
2015-पहली बार सीनियर नेशनल बॉक्सिंग में रजत पदक।
2015-दोहा अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक
2015-प्रेजीडेंट कप में कांस्य पदक।
2016-सेना में नायब सूबेदार के पद पर भर्ती हुए।
2018-ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में रजत।
2019-नेपाल में साउथ एशियन गेम्स में रजत।
2019-विश्व मुक्केबाजी में कांस्य पदक।
2020-उपलब्धियों के लिए मिला अर्जुन अवार्ड।
2020-ओलंपिक क्वालिफाई मुकाबलों में हासिल किया टोक्यो ओलंपिक का कोटा।
2021-स्पेन में राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।
11July-2021
टोक्यो ओलंपिक: देश के लिए स्वर्ण पदक लेना ही महिला हॉकी टीम का लक्ष्य:नवजोत
तकनीकी तौर पर मैदान में सामंजस्य बनाने में माहिर है नवजोत कौर
खेल इंडिया ने अर्जुन पुरस्कार के लिए किया नामित
ओ.पी. पाल.रोहतक।
भारतीय महिला हॉकी टीम की तेजतर्रार खिलाड़ी नवजोत कौर किसी पहचान की मोहताज नहीं है, जिसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल के मैदान में बेहतरीन तकनीकी और रक्षात्मक तौर पर बेहतर सामंजस्य, लंबे समय तक गेंद होल्ड करने में माहरत हासिल करते हुए भारतीय टीम की जीत में अहम योगदान दिया है। टोक्यो ओलंपिक में रानी रामपाल की अगुवाई में भारतीय महिला हॉकी टीम में मिडफिल्डर की भूमिका के लिए शामिल नवजोत को पूरा भरोसा है कि टोक्यो ओलंपिक में उनकी टीम भारत के लिए स्वर्ण पदक लेकर आएगी।
29वें टोक्यो ओलंपिक में भारत के लिए स्वर्ण पदक दिलाने के मकसद से भारतीय महिला हाकी टीम पिछले कई माह से बंगलूरू में हरेक खिलाड़ी पिछले अनुभवों के आधार पर सामने आई कमियों में सुधार करके रक्षात्मक तकनीकी के साथ अभ्यास करने में जुटी हुई हैं। हाल ही में अर्जुन पुरस्कार के लिए नामित हुई टीम इंडिया की मिडफिल्डर नवजोत कौर ने हरिभूमि से बात करते हुए कहा कि पूरी टीम की खिलाड़ी शारीरिक रूप से फिट है, क्योंकि अच्छा प्रदर्शन करने के लिए फिटनेस पहली कड़ी होनी चाहिए। अब तक 172 अंतर्राष्ट्रीय मैच खेल चुकी नवजोत कौर ने टीम इंडिया की जीत में हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसके प्रदर्शन के आधार पर उसे दूसरी बार ओलंपिक में क्वालिफाई करने वाली टीम में शामिल किया गया।
-----------पहले ही अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट में लोहा मनवाया-----------
हरियाणा के कुरुक्षेत्र के शाहबाद में सात मार्च 1995 को जन्मी नवजोत कौर को बचपन से ही हॉकी के खेल में रुचि थी और आठ साल की उम्र में वर्ष 2003 में उसने शाहबाद में मारकंडा अकादमी में कोच बलदेव से कोचिंग लेना शुरू किया। नवजोत ने अपनी प्रतिभा के सहारे स्कूल, स्टेट और नेशनल स्तर के हॉकी टूर्नामेंटों में अपने प्रदर्शन से भविष्य के इरादे जाहिर कर दिये। बहराल वर्ष 2011 में नवजोत राष्ट्रीय जूनियर अंडर-18 की टीम में चुनी गई और बैंकांक में हुए एशिया कप यानि पहले ही अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट में 10 गोल दागकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया, इस टूर्नामेंट में भारतीय जूनियर टीम कांस्य पदक लेकर स्वदेश लौटी। नवजोत को इस टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ स्कोरर का खिताब मिला। वर्ष 2013 में जापान एशिया कप के फाइनल मैच में चीन को हराकर भारतीय टीम ने स्वर्ण पदक हासिल किया, जिसमें विजयी गोल उसी के नाम रहा।
---------जब कैरियर में आई मुश्किल----------
टीम इंडिया की सदस्य नवजोत ने बताया कि उसके पिता स. सतनाम सिंह एक मैकेनिक और माता मंजीत कौर ग्रहणी हैं। उसके छोटे भाई बलकार सिंह आस्ट्रेलिया में पढ़ रहा है और छोटी बहन सिमरनजीत कौर ने नर्सिंग कोर्स किया है। नवजोत ने बताया कि वर्ष 2012 में उसका चयन भारत की सीनियर महिला हॉकी टीम में हो गया, लेकिन इसी दौरान उसके पैर में आई चोट(इंजरी) ने उसकी मुश्किलें बढा दी। ऐसे मुश्किल दौर में घर पर माता-पिता के साथ मैदान में कोच बलदेव सिंह ने उसका हौंसला बढ़ाया। इस दौर से निकलने के बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार भारतीय टीम में कड़ी मेहनत और खेल पर फोकस कर रही हैं। नवजोत कौर ने बताया कि वर्ष 2018 में एशिया कप के फाइनल मैच में चीन को शूटआउट में 5-4 से मात देकर स्वर्ण पदक हासिल किया, जिसमें विजयी गोल उसी के नाम रहा। यह जीत भारत को विश्व कप के लिए क्वालिफाई करने में कारगर साबित हुआ।
----------पिता के साथ कोच को बड़ा श्रेय-----------
खेल जगत में हॉकी के रूप में बुलंदिया छू रही नवजोत ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सफलता तक पहुंचने का श्रेय माता-पिता विशेषकर पिता को है जिन्होंने उन्हें हमेशा सहयोग दिया है। वहीं कोच बलदेव की वजह से आज वह ओलंपिक खेल रही हैं, जिन्होंने अकादमी में हमेशा खेल की तकनीकियों और विपक्षी टीम की जरा सी कमजोरी का लाभ उठाने के गुर दिये। इन्हीं की बदौलत वह वर्ष 2015 में हुए महिला हॉकी विश्व लीग सेमीफाइनल में भी टीम का हिस्सा रहीं। वहीं उन्होंने 17वें एशियाई खेलों, 2016 रियो ओलंपिक, चौथे महिला एशियन चैपियंस ट्रॉफी में भी भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया है। महिला विश्व हॉकी लीग राउंड-2 में भी वह शामिल थी।
--------टीम इंडिया में उपलब्धियां----------
2013-जूनियर वर्ल्ड कप में कांस्य पदक।
2014-में एशियाई गेम्स में कांस्य पदक।
2016-रियो ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन।
2016-एशिया ट्राफी में रजत पदक।
2017-एशिया कप हॉकी में स्वर्ण पदक।
2018-एशियाई गेम्स में रजत पदक।
10July-2021
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से बढ़ी पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा की मुश्किलें
रोहतक में डेवलपर को जारी की जमीन की होगी सीबीआई जांच
हरिभूमि न्यूज.रोहतक।
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा में कांग्रेस शासनकाल के दौरान रोहतक में एक प्रोजेक्ट के लिए एक प्रॉपर्टी लिमिटेड कंपनी को अधिग्रहित जमीन के मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिये हैं। सुप्रीम कोट के इस निर्णय से भूमि आवंटन मामले में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की मुश्किलें बढ़ गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इस मामले में सुनवाई करते हुए कांग्रेस शासनकाल में हुई इस जमीन मामले की जांच सीबीआई से कराने का आदेश दिया है। पहले से ही राज्य में भूमि आवंटन के मामले में अदालतों में चल रहे मामलों का सामना कर रहे हरियाणा के पूर्व सीएम भूपिंदर सिंह हुड्डा की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। गौरतलब है कि हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार वर्ष 2002 रोहतक में सेक्टर-27 व 28 पर आवासीय व वाणिज्यिक क्षेत्र के लिए 850.88 एकड़ भूमि के अधिग्रहण का प्रस्ताव किया था। इसके बाद हुडा ने 8 अप्रैल 2003 को 444.11 एकड़ भूमि के अधिग्रहण के लिए अंतिम अधिसूचना जारी की, लेकिन अप्रैल 2005 में 422.44 एकड़ भूमि के लिए अवार्ड घोषित किया गया। अभी जमीन अधिग्रहण प्रक्रिया चल ही रही थी कि इसी बीच रियल एस्टेट कंपनी उदार गगन प्रॉपर्टी ने अधिग्रहण प्रक्रिया से गुजर रहे कुछ किसानों से समझौता करके एग्रीमेंट कर लिया। 21 मार्च 2006 को उदार गगन प्रॉपर्टी ने हरियाणा के नगर योजनाकार विभाग के डायरेक्टर के पास लाइसेंस के लिए आवेदन कर दिया। उदार गगन प्रॉपटी को 280 एकड़ भूमि पर कालोनीनी विकसित करने के लिए लाइसेंस मिल गया और इस जमीन को अधिग्रहण प्रक्रिया से अलग कर दिया गया। इस पर किसानों ने आवाज उठाई तो यह यह मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चला गया। जिसके बाद अवैध रूप से भूमि के अधिग्रहण और खरीद का यह मामला सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा। इस मामले में 13 मई 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए रियल एस्टेट कंपनी के पक्ष में जारी की गई सभी सेल डीड एग्रीमेंट रद्द कर दिए और इस प्रोजक्ट को भी रद्द कर दिया। उच्च न्यायालय के आदेश पर इस प्रोजेक्ट के लिए जारी जमीन को जमीन को हरियाणा अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी ने अपने कब्जे में ले लिया था। राज्य की मनोहर सरकार ने 13 मार्च 2018 को इस मामले को विधानसभा के पटल पर लाकर उद्दार गगन के जमीन मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का फैसला किया। लेकिन इसके बजाए इसकी जांच एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा कराने के आदेश दिये। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने 13 मई 2016 को अपने आदेश में राज्य सरकार को बिल्डर के अवैध रूप से दिये गये आवेदनों और उसे जमीन जारी करने के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की कार्रवाई की वैधता और प्रामाणिकता की जांच करने के लिए भी कहा था। जिसमें धारा 4 के तहत अधिसूचना जारी करने की तिथि पर भूमि पर कानूनी तौर पर किसी का हक नहीं था। इस मामले में शामिल लोगों के खिलाफ जांच करने के भी उस समय सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिये थे।
08July-2021
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