सोमवार, 12 जून 2017

जीएसटी में 66 वस्तुओं की दरें घटाई

जीएसटी परिषद में समीक्षा के बाद हुआ फैसला
सैनिटरी नैपकिन्स पर बरकरार रहेगा जीएसटी
हरिभूमि ब्यूरो.
नई दिल्ली।
देश में सबसे बड़े सुधार की दिशा में एक जुलाई से जीएसटी कानून लागू करने की तैयारी में जुटी केंद्र सरकार की जीएसटी परिषद ने उद्योग जगत की मांग पर 66 वस्तुओं की जीएसटी दरों को घटाने का निर्णय लिया है, लेकिन महिला संगठनों की मांग के बावजूद सैनिटरी नेपकिन्स की तय दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
जीएसटी परिषद की रविवार को यहां हुई बैठक में उद्योग जगत और अन्य संगठनों के ज्ञापनों में 133 वस्तुओं की तय की गई गई जीएसटी दरों की समीक्षा की गई। परिषद ने इनमें से 66 वस्तुओं की दरों में संशोधन करने का निर्णय लिया। परिषद के समीक्षा बैठक में महिला संगठनों की सैनिटरी नैपकिन्स पर तय की गई कर की दर को हटाने की मांग भी शामिल थी, लेकिन परिषद ने इसकी दरों में कोई संशोधन नहीं किया। जबकि परिषद ने कई अन्य वस्तुओं और सामानों पर लगने वाली कर की दरों में व्यापक भी बदलाव को मंजूरी दी गई।
छोटे व्यापार को राहत
बैठक के बाद केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने परिषद द्वारा 66 तरह की वस्तुओं की कर दरों में संशोधन करते हुए घटाने का निर्णय की जानकादी देते हुए बताया कि जीएसटी परिषद ने कंपोजिशन की सीमा बढ़ाकर 75 लाख कर दी है, जिसमी सीमा पहले 50 लाख रुपये थी। मसदलन अब 50 लाख की बजाय 75 लाख के टर्नओवर वाला व्यापार जीएसटी के दायरे से बाहर हो जाएगा। इस फैसले से तीन तरह के कारोबारियों को फायदा होगा। यानि ट्रेडर एक फीसदी टैक्स देगा। वहीं विनिर्माता पर दो फीसदी और होटल कारोबारियों को 5 फीसदी कर देकर जीएसटी के दायरे से बाहर रह सकते हैं।
इन वस्तुओं के कर घटे
जीएसटी परिषद की बैठक में 133 तरह की चीजों पर कर घटाने को लेकर तय दरों की समीक्षा की गई। बैठक में स्कूल बैग की पहले से तय की गई 28 फीसदी दर को संशोधित कर 18 फीसदी किया गया है। जबकि स्कूली बच्चों के कलर और ड्राइंग बुक पर तय 12 प्रतिशत को जीरो करते हुए समाप्त कर दिया गया है। शुगर के मरीजों को राहत देते हुए इंसुलिन के साथ ही अगरबत्ती की दर घटाकर आठ फीसदी की गई। इसी प्रकार कंप्यूटर प्रिंटर पर 28 फीसदी जीएसटी दर को 18 प्रतिशत, काजू पर 12 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर तय करने के साथ अचार, चटनी, सॉस और डिब्बाबंद फूड, छुरी-कांटे की दर को भी 18 प्रतिशत से घटाकर 12 किया गया है। किसानों के साधन ट्रैक्टर के कुछ सामानों पर तय कर की दर 28 फीसदी को घटाकर 18 फीसदी कर दिया गया है।

रविवार, 11 जून 2017

ब्लैक स्पॉटों पर दुर्घटनाएं रोकने की कवायद


देशभर में तकनीकी यंत्रों का इस्तेमाल की योजना तैयार
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
देश में सड़क हादसों को रोकने के लिए की जा रही कवायद में जहां सड़क परियोजनाओं को सुरक्षित मानकों के तहत चलाया जा रहा है, वहीं दुर्घटनाग्रस्त इलाकों को ब्लैक स्पॉट के रूप में चिन्हित करके उनके डिजाइन को बदलने और खतरनाक मोड़ खासतौर पर पहाड़ी मार्गो पर तकनीकी यंत्रो के इस्तेमाल को लागू करने की तैयारी की जा रही है।
दुनियाभर में सड़क हादसों के रूप में शुमार भारत में सड़क सुरक्षा की प्राथमिकता भी सिरे चढ़ते नजर नहीं आ रही है, जहां चलाई जा रही सड़क परियोजनाओं में अंतर्राष्ट्रीय मानकों को अनिवार्य करके इंजीनियरों व निर्माण कंपनियों की जवाबदेही तय की गई है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय पहले ही देशभर में उन स्थानों को ब्लैक स्पॉट के रूप में चिन्हित करा चुका है, जहां अक्सर सड़क हादसे होते रहे हैं। देशभर में 786 ब्लैक स्पॉट चिन्हित करने के बाद केंद्र सरकार ने 900 करोड़ रुपये की योजना के तहत राज्यों की सरकारों से ऐसी सड़कों के डिजाइन में सुरक्षित करने का अनुरोध किया है। गौरतलब है कि सरकार के इन तमाम उपायों के बाद वर्ष 2015 के सड़क हादसों और उनमें हुई मौतों का आंकड़ा बढ़ने से सकते में आई केंद्र सरकार ने तकनीक का इस्तेमाल करने की योजना का खाका तैयार किया है।
स्मार्ट पोल योजना की तैयारी
केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी पहले से ही हर हालत में 2020 तक सड़क हादसों को 50 फीसदी कम करने का लक्ष्य तय कर चुके हैं, जिसके लिए ऐसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने की योजनाओं का अध्ययन करा रहे हैं। स्मार्ट पोल्स प्रणाली को और अधिक बेहतर बनाने की दिशा में डिवाइस कंपनियों अब इस प्रणाली का बारीकी से अध्ययन कर रही हैं, ताकि देश्भर में पहाड़ी इलाकों के साथ ही अन्य खतरनाक जगहों पर यातयात को सुरक्षित बनाने और सड़क हादसों को रोका जा सके। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के अनुसार इस प्रणाली को देशभर में लागू करने की दिशा में राष्ट्रीय राजमार्गो के अलावा पहाड़ी इलाकों के राजमार्गो पर तीखे मोड़ पर स्मार्ट पोल लगाने की योजना तैयार की जा रही है। ऐसे खतरनाक मोड और ब्लैक स्पॉट पर सड़क हादसों को कम करने और राजमार्गो पर सुरक्षा बढ़ाने के लिए एचपी लुब्रिकैंट्स और लियो बर्निट द्वारा तैयार की गई एक तकनीकी प्रणाली के इस्तेमाल का निर्णय लिया गया है। मंत्रालय के अनुसार ऐसी डिवाइस का इससे पहले परीक्षण जम्मू और श्रीनगर को जोड़ने वाले और सड़क हादसों के लिहाज से सबसे खतरनाक माने जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-1 पर किये गये परीक्षण में यह प्रणाली खरी पाई गई है। इसलिए सरकार प्रणाली के इस्तेमाल को देशभर में पहाड़ी इलाकों के साथ अन्य खतरनाक मोड़ के आसपास लागू करेगी।

विकास में गेम चेंजर बनेगी ‘सागरमाला’




राज्यों की साझीदारी में चलेगा सागरमाला कार्यक्रमओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश के बंदगाहों की क्षमता बढ़ाने की दिशा में उनके आधुनिक विकास के लिए महत्वाकांक्षी परियोजना ‘सागरमाला’ कार्यक्रम में तेजी लाने के लिए तटीय राज्यों की साझेदारी को बढ़ाने पर सहमति बनाई गई है।
केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय के सचिव राजीव कुमार की अध्यक्षता में यहां नई दिल्ली में ‘सागरमाला’ परियोजना पर तटीय राज्यों के साथ आयोजित एक कार्यशाला में मुख्य संबोधन के दौरान नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने कहा कि बंदरगाह आर्थिक विकास के उत्प्रेरक साबित हो सकते हैं, जिसके साथ ही वे देश में निरन्तर 10 फीसदी की आर्थिक विकास दर हासिल करने का सबब बनेगी और निश्चित रूप से देश के विकास में सागरमाला कार्यक्रम गेम चेंजर साबित होगा। अमिताभ कांत ने चीन, कोरिया, जापान, और सिंगापुर के समुद्री कारोबार का जिक्र करते हुए कहा कि समुचित ढंग से क्रियान्वयन के लिए समस्त हितधारकों का समूह बनाने और इसके निर्यात पर केन्द्रित रणनीति बनाने की भी आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि चीन, कोरिया, जापान, और सिंगापुर में बंदरगाहों की अगुवाई में देश का तेजी से विकास हुआ है। भारत की आर्थिक विकास दर को बढ़ाकर 7.6 फीसदी के स्तर पर ले जाने के लिए वैश्विक बाजारों में पैठ बनाना आवश्यक है, जिसमें केवल बंदरगाह ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय वस्तुओं को वैश्विक बाजारों में उपलब्ध वस्तुओं के समकक्ष बनाने के लिए लॉजिस्टिक्स लागत को घटाना अत्यन्त जरूरी है और यह तभी संभव हो पाएगा जब बंदरगाह आगे चलकर विनिर्माण केन्द्रों (हब) में तब्दील हो जाएंगे। कांत ने भारत में क्रूज पर्यटन की असीम संभावना होने की बात दोहराते हुए सभी तटीय राज्यों से अपील की है कि वे इसे बढ़ावा देने की दिशा में ठोस कार्य योजना बनाकर आगे आएं।

गंगा के कायाकल्प में प्रदूषण बड़ी चुनौती


 उमा ने मांगा आध्यात्मिक संस्थानों से सहयोग
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘नमामि गंगे’ मिशन की चलाई जा रही परियोजनाओं में प्रदूषण को बड़ी चुनौती करार देते हुए केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती ने गंगा के कायाकल्प के लिए आध्यात्मिक संस्थानोंऔर संगठनों का सहयोग मांगा है।
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार नमामि गंगे परियोजनाओं के लिए गंगा सागर से गंगोत्री तक चल रही परियोजनाओं की प्रगति का जायजा लेने के लिए गंगा निरीक्षण अभियान की यात्रा के तहत उमा भारती उत्तराखंड पहुंची हैं, जहां ने ऋषिकेश में परमार्थ निकेतन में हितधारकों के साथ एक सम्मेलन में कहा कि गंगा की धारा को अविरल करनके कलए घाटों को साफ रखने के प्रति जागरूकता जरूरी है। चूंकि गंगा सागर से लेकर हरिद्वार तक गंगा नदी का जल जीवन रेखा से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि लोगों की सहभागिता के बिना इस अभियान के लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि उन्होंने नमामि गंगे को जनांदोलन के रूप मे आगे बढ़ाते हुए गंगा किनारे गांवों और पंचायतों को भी हितधारकों में शामिल किया है। गंगा प्रदूषण पर चिंता जाहिर करते हुए सुश्री भारती ने आग्रह किया कि गंगा नदी के किनारे कपड़े धोने और ठोस या तरल कचरे को डंप करने जैसी प्रथाओं को समाप्त करने के लिए लोगों को अपनी सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
दस साल में आएगा नतीजा
केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने कहा कि नमामि गंगे के तहत गंगा स्वच्छता के लिए किए जा रहे कार्यों का असर वर्ष 2018 तक नजर आने लगेगा। उन्होंने कहा कि पहले नमामि गंगे का पंजीकरण एक सोसाइटी के रूप में किया गया था, जो अब अथॉरिटी बना दी गई है। इससे नमामि गंगे को निर्णय लेने के साथ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम की शक्ति भी मिल गई है। निर्मल गंगा के लिए औद्योगिक इकाइयों के अवशिष्ट को रोकना सबसे बड़ी चुनौती है। इसके लिए चार हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाने हैं। उन्होंने कहा कि पहले पुराने ट्रीटमेंट प्लांटों को दुरुस्त कर उनकी क्षमता बढ़ाई जा रही है। इसके साथ ही नए ट्रीटमेंट प्लांट के निर्माण व गंगा में मिलने वाले दूषित नालों को टेप करने का रोडमैप भी तैयार किया जा चुका है।

शुक्रवार, 9 जून 2017

कृषि क्षेत्र में शुरू हुई कचरा निपटान तकनीक

मंत्रालय के स्वच्छता पखवाड़े में दिखाए गए परिणाम
हरिभूमि ब्यूरो.
नई दिल्ली।
कृषि क्षेत्र में किसानों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने के लिए शुरू की गई कचरा निपटान तकनीक के विकास को बढ़ावा देने का देश के किसानों को फायदा मिलने लगा है, जिसमें जैविक खेती को दिये जा रहे प्रोत्साहन से किसानों की आय बढ़ाने का प्रयास भी शामिल है।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा देशभर में किसानों को सफाई के प्रति जागरूक करने के लिए चलाए गये स्वच्छता पखवाड़े के दौरान इसके सकारात्मक असर होने का दावा किया गया है। मंत्रालय के अनुसार इस दौरान मंत्रालय के परिसर में चलाए जाने वाले स्वच्छता अभियान से बाहर निकलकर कृषि मंडियों, मछली बाजारों तथा कृषि विज्ञान केंद्रों के आसपास स्थित गांवों में जागरूकता कार्यक्रम एवं सफाई अभियान चलाया गया। मंत्रालय के अनुसार स्वच्छ भारत मिशन के तहत गांवों को स्वच्छ रखने एवं किसानों की आय में वृद्धि करने के लिए राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र द्वारा एक कचरा निपटान तकनीक (वेस्ट डी-कम्पोजर तकनीक) का विकास किया गया है, जिसमें किसानों को जैविक खेती के प्रति भी जागरूक किया जा रहा है। इस तकनीक में जानवरों के गोबर एवं गांवों के जैविक कचरे को बहुत कम लागत में एक अच्छी गुणवत्ता वाली जैविक खाद में बदला जा सकता है। पखवाड़े के दौरान एनसीओएफ द्वारा 142 गांवों और कृषि मंडियों में इस तकनीक का प्रदर्शन किया गया। देश में इस तकनीक के बारे में जानकारी किसानों तक पहुंचाने के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।
केंद्र ने जारी की धनराशि
कृषि क्षेत्र में ऐसी तकनीक के लिए वर्ष 2017-18 के दौरान कम्पोस्ट वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट स्थापित करने के लिए
आरकेवीवाई के तहत राज्यों को 36 करोड़ रुपये की निधि एवं 250 ई-नेम एपीएमसी को 12.5 करोड़ रुपये जारी करने का निर्णय भी लिया गया। इसी प्रकार विभाग में वर्ष 2017-18 के दौरान स्वच्छता कार्य योजना के तहत स्वच्छता संबंधी बुनियादी कार्यकलापों यथा वर्मी कम्पोस्ट इकाइयों की स्थापना, जैव बायोगैस संयंत्रों को स्थापित करने, अपशिष्ट पुनर्चक्रण पर राज्य स्तर की कार्यशालाओं के आयोजन और वाटर टैंकों आदि को स्थापित करने के लिए 5.32 करोड़ आबंटित किए गए हैं।

गुरुवार, 8 जून 2017

बंदरगाहों की ‘सागरमाला’ की बढ़ेगी रफ़्तार!

तटीय राज्यों के साथ आज कार्याशाला में होगी चर्चा
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
केंद्र सरकार की देश के बंदरगाहों को आधुनिक तकनीक के आधार पर विकसित करने के लिए चल रही ‘सागरमाला’ परियोजना में तेजी लाने की कवायद की जा रही है। इसके लिए कल शुक्रवार को होने वाली कार्याशाला में तटीय राज्यों के साथ चर्चा की जाएगी।
देश में समुद्री कारोबार को प्रोत्साहन देने के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘सागरमाला’ परियोजना से बंदरगाहों की क्षमता बढ़ाने वाली नीति में सकारात्मक नतीजे सामने आ रहे हैं, जिसमें माल ढुलाई क्षमता में भी व्यापक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यानि वर्ष 2012-13 में यह 745 मिलियन टन से बढ़कर 2016-17 में 1065 मिलियन टन हो गई है। केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय के अनुसार मुख्य परियोजना ‘सागरमाला’ सरकार की संकल्पना और योजना से आगे बढ़कर फिलहाल क्रियान्यन स्तर पर है। मंत्रालय के अनुसार ‘सागरमाला’ कार्यक्रम के तहत बंदरगाह आधुनिकीकरण और नवीन बंदरगाह विकास, संपर्क विस्तार, बंदहगाह से जुड़ा औद्योगीकरण और तटीय सामुदायिक विकास के क्षेत्र में चार सौ से भी ज्यादा परियोजनाओ की पहचान की गई है। जबकि 1.37 लाख करोड़ रुपये की लागत वाली 239 परियोजनाएं पहले से ही विकास और कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं। परियोजनाओं में तेजी से लागू करने की दिशा में ‘सागरमाला’ कार्यक्रम की रμतार बढ़ाने की दिशा में राज्यों के अलावा हितधारको के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए आगामी 6 से 8 माह की अवधि के दौरान मंत्रालय कार्यशालाओ की एक श्रंखला आयोजित करेगा।
पहली बार कार्याशाला आज
जहाजरानी मंत्रालय के अनुसार जहाजरानी सचिव राजीव कुमार की अध्यक्षता में 9 जून शुक्रवार को नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में इस संबंध में प्रथम कार्यशाला आयोजित की गई है। जिसमें ‘सागरमाला’ परियोजना के क्रियान्वयन को त्वरित करने के लिए तटीय राज्यों के साथ विभिन्न पहलुओं को लेकर चर्चा की जाएगी और परियोजना की गतिविधियों में विस्तार करने के लिए सुझावों का आदान प्रदान होगा। इस कार्यशाला का मकसद ‘सागरमाला’ कार्यक्रम के लिए जहाजरानी मंत्रालय के साथ रेलवे और कौशल विकास जैसे अन्य संबधित मंत्रालय के साथ विभिन्न तटीय राज्यो की भागीदारी सुनिश्चित की जाए, ताकि केंद्र व राज्यों के बीच समन्वय के बीच परियोजनाओं की गतिविधियों का विस्तार और परियोजना का तेजी से कार्यान्वयन हो सके। कार्यशाला में नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत मुख्य अतिथि के रूप में अपना संबोधन करेंगे। कार्यशाला में तटीय राज्यो के प्रधान सचिवो, बंदरगाहो के अध्यक्षों और संबधित मंत्रालयों के अधिकारी भी हिस्सा लेंगे।

बुधवार, 7 जून 2017

सत्रह जुलाई को होगा राष्ट्रपति चुनाव, 20 को नतीजे

24 जुलाई को समाप्त हो रहा है प्रणव दा का कार्यकाल
ओ.पी. पाल,
नई दिल्ली।
देश के 15वें राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनावों की तारीखों का ऐलान कर दिया गया है। केंद्रीय चुनाव आयोग ने इन चुनावों का ऐलान करते हुए कहा कि 17 जुलाई को संसद और विधानसभा परिसरों में स्थापित 32 मतदान केंद्रों पर वोट डाले जाएंगे, जिनकी गिनती 20 जुलाई को नई दिल्ली में कराई जाएगी।
बुधवार को यहां निर्वाचन सदन में मुख्य निवार्चन आयुक्त नसीम जैदी ने राष्ट्रपति चुनाव की तारीखों का ऐलान करते हुए कहा कि राष्ट्रपति चुनाव के लिए 17 जुलाई को संसद और 31 विधानसभा परिसरों में सुबह 10 बजे से शाम पांच बजे तक वोटिंग कराई जाएगी। इसके लिए 14 जून को अधिसूचना जारी होते ही नामांकन प्रक्रिया शुरू हो जाएगी और नामांकन भरने की अंतिम तारीख 28 जून होगी। राष्ट्रपति चुनाव की वोटों की गिनती 20 जुलाई को नई दिल्ली में होगी। गौरतलब है कि 24 जुलाई को राष्टÑपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल समाप्त होने जा रहा है और उससे पहले नए राष्टÑपति पद के लिए चुनाव कराया जाना है।
सिक्रेट बैलट पेपर से होगा चुनाव
मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने कहा कि राष्ट्रपति चुनाव सिक्रेट बैलेट पेपर के जरिए होंगे और वोटिंग के लिए चुनाव आयोग बैलेट पर टिक करने के लिए एक विशेष पेन का प्रबन्ध करेगा। किसी अन्य पेन का उपयोग करने पर वोट अवैध हो जाएगा। उन्होंने कहा कि राजनैतिक दल इस दौरान व्हिप जारी नहीं कर सकेंगे। संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह गोपनीय है, इसी भी स्थिति में मतपत्र किसी और को दिखाना संविधान के विरुद्ध हैं। चुनाव आयुक्त ने बताया कि राष्ट्रपति पद का नामांकन भरने के लिए 50 प्रतिनिधियों के प्रस्ताव होना जरूरी हैं और एक नामांकन के लिए 15 हजार रुपये की जमानत राशि जमा करानी होगी। इस चुनाव में निर्वाचित सांसद या विधायक को ही मत देने का अधिकार होगा यानि मनोनीत सदस्य वोटिंग नहीं कर सकेंगे। चुनाव आयुक्त जैदी ने कहा कि भारत के राष्ट्रपति निर्वाचन में संसद के निर्वाचित सदस्यों के अलावा दिल्ली और पुडुचेरी विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों के साथ ही सभी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य मतदान करते हैं।
क्या है राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया
भारत के राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचन अप्रत्यक्ष मतदान के जरिए किया जाता है। इसमें जनता की जगह जनता द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि राष्ट्रपति को चुनते हैं। राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचन मंडल या इलेक्टोरल कॉलेज करता है। इसमें संसद के दोनों सदनों तथा राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। भारत में राष्ट्रपति चुनाव अप्रत्यक्ष मतदान से होता है। इसमें संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) और राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। इसमें राज्यसभा में राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य मतदान में हिस्सा नहीं लेते हैं। दो केंद्रशासित प्रदेशों, दिल्ली और पुडुचेरी के विधायक भी चुनाव में हिस्सा लेते हैं जिनकी अपनी विधानसभाएं हैं। राष्ट्रपति चुनाव जिस विधि से होता है उसे ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली’ के रुप में जाना जाता है जिसके आधार पर एकल हस्तांतरणीय मत द्वारा चुनाव होता है। राष्ट्रपति चुनाव की वर्तमान व्यवस्था 1974 से चली आ रही है और ये 2026 तक लागू रहेगी। इसमें 1971 की जनसंख्या को आधार माना गया है।
क्या है सांसदों और विधायकों की वोटों का मूल्य
राष्ट्रपति चुनाव में अपनाई जानेवाली आनुपातिक प्रतनिधित्व प्रणाली की विधि के हिसाब से प्रत्येक वोट का अपना मूल्य होता है। सांसदों के वोट का मूल्य निश्चित है मगर विधायकों के वोट का मूल्य अलग-अलग राज्यों की जनसंख्या पर निर्भर करता है। 1971 की जनगणना के अनुसार राज्य की जनसंख्या को वहां की विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या से भाग दिया जाए, परिणाम में जो भी संख्या आए, उसे फिर से 1000 से भाग दिया जाए। इसके बाद जो परिणाम निकलेगा, वह उस राज्य के एक विधायक के वोट का मूल्य होगा। जैसे देश में सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश के एक विधायक के वोट का मूल्य 208 है तो सबसे कम जनसंख्या वाले प्रदेश सिक्किम के वोट का मूल्य मात्र सात। दूसरी ओर प्रत्येक सांसद के वोट का मूल्य 708 है। देशभर के 4120 विधायकों और 776 सांसदों को मिलाकर चुनाव मंडल बनता है। उनके मतों का कुल मूल्य 10, 98, 882 बनता है और जीतने के लिए 5,49,442 मत की जरूरत है।

मंगलवार, 6 जून 2017

भू-जल की समस्या से ऐसे निपटेगी सरकार

मास्टर प्लान का अध्ययन करेगी सचिवों की समिति
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
देश में भूजल के गिरते स्तर तथा आधे से ज्यादा राज्यों में भूजल में घुले जहर से संदूषित पानी पीने को मजबूर लोगों में फैलती बीमारी को लेकर केंद्र सरकार ने की मेगा योजना तैयार की है, जिसमें भूजल तथा वर्षा जल संचय को कृत्रिम रूप से रि-चार्ज कराने जैसे कार्यो को किया जाएगा। इस योजना के तहत तैयार किये गये मास्टर प्लान का अध्ययन करने के लिए जल्द ही सचिवों की एक समिति का गठन किया जाएगा।
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार देश में भूजल में सुधार और भूजल में घुले जहर की समस्या से निपटने के लिए बनाई गई योजना के मास्टर प्लान का अध्ययन करने के लिए जल्द ही सचिव स्तर की एक समति का गठन किया जाएगा। इस समस्या को लेकर मंगलवार को गंगा निरीक्षण अभियान पर निकली केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती ने नरोरा में चौपाल को संबोधित करते हुए इसे एक बड़ी चुनौती बताया और कहा कि इसके लिए लोगों से अधिक से अधिक पलाश और अशोक जैसे पेड़ों को लगाने का आव्हान किया। उनका मानना है कि ये पेड़ भू-जल को रिचार्ज करते हैं। उन्होंने कहा कि पेड़ लगाने से जहां भू-जल के स्तर में सुधार करने में मदद मिलती है। वहीं आर्थिक और पर्यावरण संगत तरीकों से जल प्रदूषित जल की समस्या का भी हल निकाला जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस समस्या के लिए मंत्रालय की योजना के अध्ययन के लिए ग्रामीण विकास सचिव, जल संसाधन सचिव तथा पर्यावरण सचिव की एक समिति शीघ्र ही गठित की जाएगी।
सरकार की ये है योजना
सुश्री उमा भारती ने भूजल के स्तर को सुधारने और भूजल में संदूषित तत्वों से निपटने के लिए भूजल को रिसाईकिलंग करने की योजना का जिक्र करते हुए कहा कि केंद्रीय जल आयोग ने भू-जल विज्ञानिकों और विशेषज्ञों के साथ मिलकर भारत में भू-जल को कृत्रिम रूप से रिचार्ज करने के लिए ‘मास्टर प्लान’ का प्रारूप तैयार किया है। इस मास्टर प्लान में देश में 79,178 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत आंकी गई है, जिससे वर्षा जल संचय तथा कृत्रिम रिचार्ज की अवसंरचना सुविधा तैयार करने का प्रावधान किया गया है, ताकि 85 बिलियन क्यूबिक मीटर जल का उपयोग हो सके। सुदृढ किए गए भू-जल संसाधनों से पेयजल, घरेलू, औद्योगिक तथा सिंचाई के लिए जल की उपलब्धता बढ़ेगी।
प्लास्टिक प्रदूषण का कारण
केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने कहा कि गंगा नदी के प्रदूषण का प्रमुख कारण प्लास्टिक सामग्री का इस्तेमाल है और इसे रोका जाना चाहिए। सुश्री भारती ने कहा कि वह जल संरक्षण, वर्षा जल संचय तथा घाटों को स्वच्छ रखने के लिए एक जन आंदोलन शुरू करने की योजना का भी जिक्र किया ,जिसमें सेवा निवृत्त वरिष्ठ नागरिक, छात्र,तथा गृहणियां की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया।
भूजल के दिये आंकड़े
उन्होंने जानकारी दी कि गंगा बेसिन में कुल पुन:पूर्ति योग्य भू-जल संसाधन 170.99 बिलियन क्यूबिक मीटर है। गंगा बेसिन में 433 बीसीएम के साथ देश के कुल पुन:पूर्ति योग्य भू-जल का 40 प्रतिशत है। वास्तविक भू-जल उपलब्धता 398 बीसीएम हैं। 31 मार्च 2017 के वार्षिक भू-जल ड्राμट 245 बीसीएम और कुल 6607 मूल्यांकित इकाइयों और 107 इकाइयां अत्यधिक दोहन वाली इकाइयां हैं। 217 गंभीर इकाइयां, 697 अर्द्धगंभीर ईकाइयां तथा 4530 सुरक्षित ईकाइयां हैं। इसके अतिरिक्त 92 ईकाइयां लवणयुक्त यानि संदूषित जल से ग्रस्त हैं।
मानवजनित संदूषण जल
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार सामान्यत: भू-जल को स्वच्छ माना जाता है, लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों में के भूजल में भुजनित (प्राकृतिक) तथा मानवजनित (मनुष्यों द्वारा)संदूषित होने की पुष्टि हो चुकी है। मसलन एक आकलन के अनुसार दस राज्यों के 89 जिलों के कुछ हिस्सों में भूजल में आर्सेनिक पाया गया है। वहीं 20 राज्यों के 317 जिलों में μलोराड, 21 राज्यों के 387 जिलों में नाइट्रेट तथा 26 राज्यों के 302 जिलों में आयरन पाया गया है। भूजल में घुले इन जहरीले तत्वों वाले पानी पीने के कारण मनुष्यों में कई तरह की घातक बीमारी भी सामने आ चुकी है।
आर्सेनिक व μलोराइड बड़ी चुनौती
देश के दस राज्यों के 89 जिलों के 282 ब्लाकों के भूजल में आर्सेनिक एवं μलोराइड की उच्च मात्रा पाया जाना मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। इनमें छत्तीसगढ़ के 27 ब्लॉक, हरियाणा के 21 ब्लॉक, पंजाब के 22 ब्लॉक, असम के 27 ब्लॉक,बिहार के 28 ब्लॉक,झारखंड के 24 ब्लॉक, कर्नाटक के 30 ब्लॉक, मणिपुर के नौ ब्लॉक, उत्तर प्रदेश के 76 ब्लॉक तथा पश्चिम बांगल के 19 ब्लॉकों में आर्सेनिक की उच्च मात्रा के कारण भूजल बेहद संदूषित है।
कानून बनाने पर जोर
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार भू-जल संसाधनों में आ रही गिरावट को रोकने में महत्वपूर्ण प्रबंध के लिए भू-जल तथा वर्षा जल संचय को कृत्रिम रूप से रि-चार्ज कराना जरूरी है। इसके लिए केन्द्र सरकार ने देश के विभिन्न हिस्सों में वर्षा जल संचय उपायों को प्रोत्साहन के लिए उठाए गये कदमों की जानकारी देते हुए कहा सभी राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों को मॉडल बिल भेजा है, ताकि राज्य भू-जल के नियमन और विकास के बारे में उचित कानून बना सके। इनमें वर्षा जल संचय का प्रावधान शामिल है।

वाराणसी में बनेगा देश का पहला फ्रेट विलेज!


गंगा नदी से दुबई पोर्ट तक पहुंचेगा सामान
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को देश का ऐसा पहला ‘फ्रेट विलेज’ बनाने की तैयारी है, जिसमें भारत दुनियाभर के बंदरगाहों तक सामानों का आवाजाही करने वाले देशों के दायरे आ सके। इसके लिए केंद्र सरकार ने वाराणसी में एक हजार करोड़ रुपये की फ्रेट विलेज बनाने की परियोजना तैयार की है।
केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय के अनुसार इस परियोजना के पूरा होते ही यूपी का वाराणसी शहर देश का पहला फ्रेट विलेज के रूप में विकसित होगा, जहां गंगा नदी के किनारे बनाए जा रहे मल्टी मॉडल टर्मिनल से दुनिया के कई बड़े बंदरगाहों तक सामानों की आवाजाही शुरू हो सकेगी, जिसमें विश्वविख्यात दुबई पोर्ट भी शामिल है। वाराणसी को पूरी दुनिया से जोड़ने वाली मंत्रालय की इस परियोजना के लिए 100 एकड़ भूमि का इस्तेमाल होगा, जहां सभी प्रकार की सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। मंत्रालय के अनुसार भारत की इस परियोजना में शिपिंग इंडस्ट्री में दुनियाभर में लॉजिस्टिक और आपूर्ति श्रंखला में अपनी बड़ी भूमिका निभाते आ रहे आबुधाबी के शराफ ग्रुप अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जिसके लिए भारत की बातचीत शुरू हो चुकी है। वहीं केंद्र सरकार की इस परियोजना को विश्व बैंक की वित्तीय मदद दे रहा है, जो इससे पहले वाराणसी से हल्दिया तक अंतर्देशीय जल मार्ग में ऋण देकर आगे कई योजनाओं में आगे आ रहा है।
निवेश व रोजगार बढ़ेगा
मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि सरकार का 2020 तक प्रमुख बंदरगाहों की क्षमता 3130 मेट्रिक टन करने की है, जिसमेें सरकार को इस दौरान करीब 27738 करोड़ निवेश की भी उम्मीद है। वहीं ऐसी परियोजनाओं को लागू करने और हर प्रकार की सुविधाएं देने से रोजगार सृजन में भी इजाफा होगा। यही नहीं गंगा नदी किनारे बनाए जा रहे मल्टी मॉडल टर्मिनल के करीब फ्रेट विलेज की परियोजना को एक विशेष औद्योगिक संपदा से जोड़कर देखा जा रहा है, जो रसद सेवाओं की जरूरत वाली कंपनियों को जल मार्ग के जरिए अपना सामान भेजने और उनकी लॉजिस्टिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से हर तरफ विकास होगा।
क्या है परियोजना
वाराणसी में गंगा नदी किनारे मल्टी मॉडल टर्मिनल के निकट फ्रेट विलेज तैयार करने के साथ अंतर मॉडल टर्मिनल भी बनाने की योजना है, जहां सभी प्रकार की परिवहन सेवा उपलब्ध होगी। इस फ्रेट विलेज परियोजना के तहत खुदरा क्षेत्र को स्थापित करना होगा और सामान भंडारण के लिए वेयर हाउस को आधुनिक तकनीक के साथ बनाने होंगे, ताकि अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार में सामानों की आपूर्ति को बेहतर बनाया जा सके। यही नहीं वहां से ट्रकों आवागमन की राह को भी आसान बनाया जाएगा, जो आसानी के साथ सामान को पोर्ट तक पहुंंचा सके। इसके अलावा रेल और छोटे जल मार्ग के इस्तेमाल को भी प्रमुखता दी जाएगी। मंत्रालय के अनुसार विश्व बैंक का मानना है कि इस फ्रेट विलेज को ईस्टर्न डेडीकेटेट फ्रेट कॉरिडोर से जोड़ा जा सकता है, जिसके बाद यह देश का सबसे बड़ा जल मार्ग बन सकता है, वहीं राष्टÑीय राजमार्गो के तौर पर इसका बड़ा योगदान मिलने की उम्मीद बढ़ जाएगी।

शुक्रवार, 2 जून 2017

विश्व स्तरीय बनेंगे देश के प्रमुख बंदरगाह!

जेएनपीटी पर शुरू की गई आठ परियोजनाएं
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
देश के प्रमुख 12 बंदरगाहों को विश्व स्तरीय बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने जवाहर लाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट की 1117.03 करोड़ रुपये की लागत वाली 8 परियोजनाओं को शुरू कर दिया है। सरकार का दावा है कि सागरमाला जैसे कार्यक्रम के कारण देश के सभी बंदरगाहों पर माल ढुलाई क्षमता में रिकार्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय के अनुसार समुद्री कारोबार और देश के प्रमुख एक दर्जन बंदरगाहों को आधुनिक तकनीक से विकसित कर विश्व स्तरीय बनाने की की तैयारी में कई परियोजनाएं पटरी पर हैं। बंदरगाहों के सड़क, रेल और हवाई संपर्क मार्गो को विकसित करने के लिए केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी परियोजनाओं में सागरमाल कार्यक्रम के तहत परियोजनाएं चल रही हैं। मंत्रालय के अनुसार सागरमाला कार्यक्रम के तहत बड़े निवेश को आकर्षित किया जा रहा है, जो बंदरगाहों के विकास में आधारभूत ढांचे को बेहतर बनान के साथ समुद्री कारोबार में भी बढ़ोतरी होगी और रोजगार के सृजन करने के साथ भारतीय निर्यात को बढ़ावा मिल सकेगा। इस दिशा में मुंबई के तटीय बंदरगाह जवाहर लाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट(जेएनपीटी) की सम्पर्क सुविधा में इजाफा करने के लिए 1117.03 करोड़ रुपये की लागत से आठ परियोजनाओं को शुरू किया गया है।
इन परियोजनाओं पर काम शुरू
जेएनपीटी के संपर्क सुविधाओं को मजबूत करने वाली शुरू हुई इन आठ परियोजनाओं में बंदरगाह पर समेकित रेल यार्ड सुविधा के लिए 250 करोड़ रुपये, जेएनपीटी के चौथे टर्मिनल को रेल से जोड़ने के लिए 100 करोड़ रुपये, जसई-जेएनपीटी तीसरी रेलवे लाइन तैयार करने के लिए 150 करोड़ रुपये की लागत वाली योजनाएं शमिल हैं। इसके अलावा बंदरगाह के उत्तरी उत्तरी गेट पर 127.45 करोड़ रुपये की लागत से उपरिगामी पुल, 149.31 करोड़ रुपये की लागत से ट्रेक्टर-ट्रेलर के लिए समेकित केन्द्रीय पार्किंग के साथ ही समुद्र तटीय जहाज ठहरने के स्थान के निर्माण पर 142.32 करोड़ रुपये खर्च किये जा रहे हैं। इसी प्रकार जेएनपीटी पर वाई जंक्शन पर उपरिगामी सेतु के निर्माण के लिए 82.95 करोड़ रुपये की परियोजना शुरू की गई है। वहीं बंदरगाह पर 115 करोड़ रुपये की परियोजना के तहत जहाज ठहरने के स्थान के पीछे यार्ड की पुनर्संरचना की जाएगी। इस बंदरगाह पर शुरू हुई ये सभी परियोजनाएं सागरमाला कार्यक्रम के चार प्रमुख स्तम्भों में से एक है, जो जेएनपीटी को सुदुर ग्रामीण क्षेत्रों से जोड़ने में मदद करेंगी।
प्रशिक्षितों को ऐसे मिलेगा रोजगार
मंत्रालय के अनुसार बंदरगाहों के आधारभूत ढांचे को मजबूत करने के लिए शुरू की जा रही परियोजनाअ‍ें में अनेक कम्पनियों ने जीएनपीटी-एसईजैड क्षेत्र में कारखाने की स्थापना के लिए जमीन की मांग की है, जिससे प्रशिक्षित युवाओं के रोजगार की संभावनाएं बढ़ेगी। मंत्रालय ने इस प्रस्तावित योजना के लिए एक संयोजक की नियुक्ति करने का निर्णय लिया है, जो कारखाने लगाने की इच्छुक कम्पनियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए रायगढ व कोंकण क्षेत्रों के स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित करने की व्यवस्था करेगा। इसके लिए सरकार का लक्ष्य भी कार्यकुशलता बढ़ाना तथा बंदरगाह के समीपवर्ती क्षेत्र का विकास करना है।