शुक्रवार, 19 मई 2017

जीएसटी के दायरे में नहीं शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं

वित्तीय सेवाओं में नजर आएगी महंगाई
अनाज व दूध जैसी घरेलू वस्तुएं होंगी करमुक्त
हरिभूमि ब्यूरो.
नई दिल्ली।
देश में ऐतिहासिक कर सुधार की दिशा में आगामी एक जुलाई को लागू होने वाले प्रस्तावित जीएसटी कानून को लेकर माथापच्ची कर रही जीएसटी परिषद ने सोने सोने समेत कुछ जींसों को छोड़कर ज्यादातर सेवाओं के लिए कर दरों को अंतिम रूप दिया है। इसमें जहां शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने का फैसला किया गया, वहीं अनाज व दूध जैसी घरेलू वस्तुएं करमुक्त रहेंगी।
देश के इतिहास में सबसे बड़ा टैक्स सुधार की दिशा में एक जुलाई से वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) कानून लागू करने के प्रयास में जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में दो दिन तक चली जीएसटी परिषद की बैठक में सोने जैसी कुछ जींसों को छोड़कर बाकी 90 फीसदी से ज्यादा सेवाओं के कर निर्धारण पर सहमति बन चुकी है। अब तीन जून को फिर होने वाली परिषद की बैठक में सोने आदि के कर निर्धारण को भी अंतिम रूप दे दिया जाएगा। 14वीं बैठक में जीएसटी परिषद ने प्रस्तावित जीएसटी कानून से जुड़े 9 अहम नियमों को मंजूरी दे दी गई है। सूत्रों के अुनसार इस बैठक में जीएसटी को आम जनता की राहत का हथियार बनाने के प्रयास में परिषद ने शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल जैसी सेवाओं को जीएसटी से छूट देने का फैसला किया। अन्य सेवाओं पर चार अलग अलग दरों 5,12,18 व 28 प्रतिशत जीएसटी लगाने का फैसला पहले ही किया जा चुका है। इस बैठक में केन्द्र और राज्यों के बीच अहितकर और लक्जरी सामानों पर 28 प्रतिशत की शीर्ष दर के ऊपर उपकर लगाने पर सहमति बनी है।
अनाज व दूध करमुक्त
जीएसटी के तहत अनाज, दूध व पूजा सामग्री करमुक्त करने का फैसला किया गया है। इसी प्रकार लाटरी पर कोई कर नहीं लगाया जाएगा। वहीं चीनी, चाय और खाद्य तेल 5 फीसद टैक्स स्लैब के दायरे में होंगे। इसके अलावा घीं और ड्रॉई फ्रुट्स, फ्रीज किए हुए मांस उत्पाद, पैकिंग में आने वाले बटर, चीज, एनिमल फैट सॉसेज, फ्रूट जूस, भूटिया, नमकीन, आयुर्वेदिक दवाएं, टूथ पावडर, कलरिंग बुक्स, पिक्चर बुक्स, छाते, सिलाई मशीन और मोबाइल फोन 12 प्रतिशत टैक्स के दायरे में आ जाएंगे। इस कर के दायरे में आईस्क्रीम, रिफाइंड शक्कर, पास्ता, कॉर्नμलैक्स, पैस्ट्री और केक, प्रीजर्व की हुई सब्जियां, मिनरल वाटर, जैम, सॉस, सूप, इंस्टेंट फूड मिक्स, टिशू, लिफाफे, नोट बुक, स्टील के बर्तन, प्रिंटेज सर्किट, स्पीकर्स और मॉनिटर्स के अलावा कैमरों पर 18 प्रतिशत टैक्स लगने वाला है।
राहत के साथ हल्की होंगी जेबें
जीएसटी के लिए परिषद द्वारा तय किये गये नए नियमों के तहत रजिस्ट्रेशन, रिटर्न, रिफंड, कंपोजीशन, ट्रांजिशन, इनवॉइस, पेमेंट, वैल्युएशन और इनपुट टैक्स क्रेडिट शामिल है। दूरसंचार, वित्तीय सेवाओं पर 18 प्रतिशत की दर से जीएसटी लगेगा, तो सिनेमा हॉल, जुआघरों और घुड़ दौड़ पर 28 प्रतिशत की दर से जीएसटी लगाया जायेगा। बैठक के बाद केंद्रीय वित्त मंत्री जेटली ने कहा कि एसी सुविधा वाले और शराब परोसने का लाइसेंसयुकत रेस्त्रां पर 18 प्रतिशत, पांच सितारा होटलों पर 28 प्रतिशत और 1,000 से 2,500 रुपये की दर वाले होटलों और नॉन एसी रेस्टोरेंट पर 12 फीसद की दर से सेवा कर लगाया जाएगा। जबकि 5000 रुपए प्रति रात से ऊपर के किराए वाले होटल्स पर 28 फीसद की दर से जीएसटी लागू होगा।

गुरुवार, 18 मई 2017

‘फास्टैग’ जल्द बन सकता है विश्व ब्रांड!

सरकार ने ई-टोलिंग प्रणाली से कमाया 1051 करोड़
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
केंद्र सरकार की देश में ई-परिवहन प्रणाली लागू करने की कवायद में देशभर के सभी टोल प्लाजाओं पर ई-संग्रहण व्यवस्था लागू कर दी गई है, जिसके तहत केंद्र सरकार दो साल में 4.79 लाख फास्टैग की बिक्री करके 1051 करोड़ रुपये का राजस्व कमा चुकी है। सरकार को उम्मीद है कि ईटीसी व्यवस्था में जल्द ही भारत का फास्टैग विश्व ब्रांड बन सकता है।
देश की परिवहन व्यवस्था में बदलाव करने में जुटी केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय राजमार्गो पर टोल प्लाजाओं पर इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन (ईटीसी) प्रणाली लागू की गई है। इस व्यवस्था के तहत निजी वाहन मालिक अपनी गाड़ी पर 'फास्टैग' नामक स्मार्ट टैग लगाकर बिना रूके और भुगतान किये राष्ट्रीय राजमार्गो पर सरपट दौड़ा सकते हैंं। मसलन फास्टैग वाले वाहनों का स्वत: ही निर्धारित कैशलेस भुगतान हो जाएगा। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार भारतीय राष्टÑीय राजमार्ग प्राधिकरण के देशभर में 350 टोल प्लाजाओं में से 275 टोल प्लाजाओं पर इलेक्ट्रॉनिक्स संग्रह प्रणाली शुरू हो गई है। अन्य टोल प्लाजा भी जल्द ही यह प्रणाली से जोड़ दिये जाएंगे। सभी सरकार द्वारा वर्ष 2015 में लागू की गई रेडियो फ्रीक्वेंसी टैग की ई-टोलिंग व्यवस्था के तहत अब तक यानि गत 15 मार्च 2017 तक देशभर में 4.79 लाख फास्टैग वाहन मालिकों खरीद चुके हैं और फास्टैग के बदले सरकार को 1051 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ है। इसका मकसद राष्ट्रीय राजमार्गो पर निजी वाहनों के सफर को सुगम बनाने और टोल प्लाजाओं पर लगने वाले वाहनों के जमघट को कम करना है।
'शैडो टॉलिंग' स्कीम
मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार निजी वाहन मालिकों को फास्टैग में ठीक उसी तरह टोल टैक्स में छूट देने की दिशा में 'शैडो टॉलिंग' स्कीम शुरू की है, जिस प्रकार मेट्रो टेÑन में स्मार्ट कार्ड खरीदने वाले यात्री को किराए में छूट मिल रही है। 'शैडो टॉलिंग' स्कीम की नीति को सरकार ने ऐसे निजी वाहनों को टोल में छूट देने के इरादे से तैयार किया है, जो अपने वाहनों में 'फास्टैग' स्मार्ट टैग लगवाएंगे। फास्टैग यह एक तरह से सालाना टोल पास है, जिसमें वाहन चालकों को साल में एक बार ही भुगतान करना होगा। सूत्रों ने बताया कि इस स्कीम के तहत मासिक भुगतान करने की भी व्यवस्था लागू की गई है। एनएचएआई के अनुसार इस कैशलेस सिस्टम को 'फास्टैग' नाम दिया गया है। इस प्रणाली को प्रोत्साहन देने के लिए 10 फीसदी कैशबैक का भी आॅफर दिया जा रहा है, जिसके तहत टोल प्लाजा पर जितनी राशि कटेगी, उसका दस फीसदी राशि उसी वाहन मालिक के खाते में क्रेडिट हो जाएगी।
विश्व ब्रांड बनेगा टैग
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय का दावा है कि राजमार्गों पर इलेक्ट्रॉनिक टोलिंग व्यवस्था के तहत निजी वाहनों के आरएफआईडी टैग यानि ‘फास्टैग’ लगने के बाद भारत उन विकसित देशों में शामिल होने की राह पर है, जहां फास्टैग जैसे हाईवे टैग ब्रांड में शुमार हैं। विश्व में पहले से ही अमेरिका में ईजी पास और सन पास, आॅस्ट्रेलिया में ई-पास तथा दुबई में सालिक नाम से आरएफआईडी टैग जारी किए जाते हैं।
टोल प्लाजा पर फास्टैग लेन 
मंत्रालय के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक टोल वसूलने के लिए देशभर में राष्टÑीय राजमार्गो के प्रत्येक टोल प्लाजा पर एक विशिष्ट ‘फास्टैग’ लेन बनाना अनिवार्य किया जा चुका है, जहां से केवल इलेक्ट्रॉनिक टोलिंग के लिए स्मार्ट टैग ‘फास्टैग’ लगे वाहनों को ही आने-जाने की अनुमति होगी। टोल प्लाजा की इन्हीं लेन पर ऐसे वाहनों के फास्टैग कार्ड को भुगतान के लिए सर्च करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक टोलिंग सिस्टम होगा। ऐसे वाहनों के लेन से गुजरते ही उनके खाते से टोल की राशि का स्वत: ही भुगतान होकर पहले टोल संचालक और बाद में रोड डेवलपर के खाते में चली जाएगी।

अब आप केवल 10 दिन में निकाल सकते हैं पीएफ का पैसा

ओ.पी पाल/नई दिल्ली
केंद्र सरकार द्वारा कर्मचारियों को राहत देने की दिशा में उठाए गये कदमों के तहत कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानि ईपीएफओ ने पीएफ निकासी, पेंशन और बीमा जैसे विभिन्न दावों के निपटान की समयसीमा को घटाकर 20 दिन के बजाए 10 दिन कर दिया है।
ईपीएफ के धन का भुगतान दस दिन में मिल सकेगा। वहीं ई-कोर्ट प्रणाली में विवादों का निपटान 15 दिन में किया जाएगा। केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय के अनुसार केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रे ने ईपीएफओ के नागरिक चार्टर 2017 और ई-कोर्ट प्रबंधन प्रणाली का शुभारंभ किया है।
ऑनलाइन क्लेम सुविधा
मंत्रालय के अनुसार ईपीएफओं के करीब 4 करोड़ से अधिक अंशधारकों को बेहतर सेवा उपलब्ध कराने के लिए संगठन ने गत एक मई 2017 को ऑनलाइन क्लेम सेटलमेंट सुविधा भी शुरू की है। संगठन की योजना है कि आधार और बैंक एकाउंट से जुड़े सभी ईपीएफ खातों के दावों का निराकरण आवेदन मिलने के तीन घंटे के भीतर ही कर दिया जाए। ईपीएफओ ने एक बयान में कहा है कि क्लेम निपटान की समयावधि 10 दिन और शिकायत निवारण प्रबंधन के लिए 15 दिन कर दिया गया है। ईपीएफओ के अनुसार पीएफ अंशधारक अपने पीएफ की रकम निकालने की पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन पूरा कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें एम्पलॉयर और ईपीएफओ के फील्ड ऑफिस में जाने की जरूरत नहीं होगी। पीएफ की प्रक्रिया ऑनलाइन पूरी होने के बाद पैसा अपने आप बैंक खाते में आ जाएगा। गौरतलब है कि जुलाई 2015 में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन ने विभिन्न दावों को निपटाने की समयावधि को घटाकर 20 दिन किया था। 
नागरिक चार्टर का प्रावधान
केंद्रीय श्रम मंत्री दत्तात्रे द्वारा जारी ईपीएफओ के नागरिक चार्टर- 2017 के लिए यह नए प्रावधान के तहत ईपीएफओ में सेवा आपूर्ति तंत्र और शिकायत निवारण तंत्र को और अधिक सक्षम बनाने में सहायक होगा। जबकि ईपीएफओ की शुरू की गई ई-कोर्ट प्रबंधन प्रणाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया अभिन्न के अनुरूप है। इस परियोजना का मकसद एक पारदर्शी और इलेक्ट्रॉनिक कैश मैनेजमेंट सिस्टम बनाना है, जो सभी प्रतिभागियों की आकांक्षाओं को पूरा करेगा। यह पेपरलेस कोर्ट सिस्टम की ओर बढ़ाया गया एक कदम है, जहां ईपीएफ और एमपी एक्ट 1952 और ईपीएफएटी (ट्रिब्यूनल) की कोर्ट प्रक्रिया डिजिटल तरीके में तब्दील होगी।
18May-2017

बुधवार, 17 मई 2017

‘सागरमाला’ कार्यक्रम को अब लगेंगे पंख!

तटीय क्षेत्रों में युवाओं का होगा कौशल विकास
कार्यक्रम को मिला ग्रामीण कौशल्या योजना का साथ
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
देश के बंदरगाहों और सभी तटवर्ती शहरो को बेहतर सड़क, रेल, हवाई और समुद्री मार्ग से जोड़ने के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘सागरमाला’ कार्यक्रम से देश की आर्थिक तस्वीर बदलने के प्रयास किये जा रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सपनों से जुड़े इस कार्यक्रम को अंजाम देने की दिशा में रेल व कौशल विकास के बाद ग्रामीण मंत्रालय भी अपनी दीनदयाल उपाध्याय कौशल्या योजना के साथ आगे आ गया है।
मोदी सरकार का इस सागरमाला कार्यक्रम के जरिए देश के प्रमुख बंदरगाहों के तटीय आर्थिक क्षेत्रों की आबादी का आधुनिक विकास करना प्रमुख मकसद है। समुद्री कारोबार को प्रोत्साहन देने के लिए बंदरगाहों तक माल के तीव्र, दक्षतापूर्ण और किफायती ढंग से आवाजाही को आसान बनाना इस योजना का मकसद है। सरकार देश की 7500 किमी लंबी तटीय रेखा से जुडेÞ शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा मजबूत करने में जुटी है। इस कार्यक्रम में रेल संपर्क मार्गो की पहुंच को बंदरगाहों तक बनाने के लिए रेलवे की 21 परियोजनाएं पटरी पर आ चुकी हैं। अब एक दिन पहले ही केंद्रीय सड़क परिवहन एवं जहाजरानी मंत्रालय ने ग्रामीण विकास मंत्रालय के साथ एक करार किया है। इस करार के तहत ग्रामीण विकास मंत्रालय अपनी दीन दयाल ग्रामीण कौशल्या योजना के तहत तटीय क्षेत्रों के युवाओं का कौशल विकास करने में सहयोग देगा। इस करार का मकसद ‘दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्या योजना’ के सहारे स्थानीय युवाओं को इस महत्वाकांक्षी परियोजना ‘सागरमाला’ कार्यक्रम के तहत रोजगार मुहैया कराया जा सके। इस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर दोनों मंत्रालयों के केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और नरेन्द्र सिंह तोमर की मौजूदगी में किये गये।
परियोजना में युवाओं का योगदान
केंद्रीय जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि यह समझौता बंदरगाह और समुद्री क्षेत्र में उद्योगों की सटीक कौशल जरूरतों को पूरा करेगा। युवाओं के कौशल विकास के साथ सागरमला में तटीय समुदायों की निकट सहभागिता होने से तटीय क्षेत्र के समेकित व आर्थिक विकास को बल मिलेगा। गडकरी का कहना है कि सागरमाला कार्यक्रम में तटीय समुदाय प्रमुख हितधारकों में है, इसलिए सरकार ने इस परियोजना के तहत 100 करोड़ रुपये का बजट तटीय सामुदायिक विकास संबन्धी गतिविधियों के लिए आवंटित किया गया है।
मछुआरों को मिलेगी सुविधा
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इस परियोजना के तहत मछुआरों को मशीनीकृत ट्रॉलरों की सुविधाजनक देने की योजना का खाका तैयार करने की भी जानकारी दी। इस योजना से मछुआरों को अंतर्राष्ट्रीय समुद्र में 30-40 समुद्री मील तक मछली तक पहुंचाने की अनुमति दी जाएगी, जिसका मकसद भी तटवर्ती इलाकों में युवाओं के लिए रोजगार सृजन करना है, जहां मछली पकड़ने और उसका व्यापार एक बड़ा उद्योग के दायरे में है। सरकार की इस योजना में मछली और अन्य समुद्री उपजों की प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और निर्यात भी शामिल है। वहीं तटीय इलाकों में दीपगृहों के आसपास पर्यटन विकसित करके ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मुहैया कराने का लक्ष्य है।

मंगलवार, 16 मई 2017

कानूनों में बदलाव से बढ़ी श्रमिकों की सुरक्षा

तीन साल में हुई श्रमिकों के हित में अनेक पहल
हरिभूमि ब्यूरो.
नई दिल्ली।
केंद्र सरकार ने इन तीन सालों में 44 श्रम कानूनों को एकीकृत करके श्रमिकों की सुरक्षा को पुख्ता करने का दावा किया है। मोदी सरकार ने इन तीन सालों में श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी तय करने के अलावा अन्य सुविधाएं देने के साथ सामाजिक सुरक्षा के दायरे को भी बढ़ाया है।
केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने मोदी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में अपने मंत्रालय की
उपलब्धियों का बखान करते हुए कहा कि सरकार की प्राथमिकता रोजगार की सुरक्षा, मजदूरी सुरक्षा और समाजिक सुरक्षा सहित समावेशी विकास करना है। मंत्रालय ने देश में सभी क्षेत्रों के कामगारों के कल्याण के लिए जनधन योजना योजना के तहत 15 करोड़ से भी अधिक बैंक खाते खोले गये हैं और जीवन छत्र, पेंशन सहित समेत करीब 10 करोड़ से अधिक रुपे डेबिट कार्ड भी जारी किए गए। उनका कहना है कि श्रमिकों को रसोई गैस में सब्सिडी और उज्जवला योजना के तहत श्रमिकों की महिलाओं को गैस सिलेंडर भी दिये गये हैं।
प्राथमिकता में रोजगार सृजन 
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने रोजगार सृजन को प्राथमिकता में रखते हुए लगभग 3.78 करोड़ उम्मीदवारों, 14.8 लाख स्थापनाओं से अधिक एनसीएस पोर्टल पर पंजीकृत कराए है, जिसके जरिए 4.65 लाख रिक्तियां भी भरी गई हैं। रोजगार सृजन की दिशा में केंद्र सरकार ने हाल ही में सरकारी रिक्तियों का एनसीएस पोर्टल पर डाला जाना अनिवार्य किया है। इस परियोजना में स्तरीय रोजगार मुहैया कराने हेतु 100 मॉडल कैरियर केन्द्रों तक गठन का प्रावधान है और ये केन्द्र राज्यों और संस्थानों के सहयोग से गठित किए जा रह हैं। वहीं पिछले वर्ष के दौरान देशभर में 540 रोजगार मेलों का आयोजन किया गया।

सोमवार, 15 मई 2017

पैकटबंद खाद्य पदार्थो पर होगा स्पष्ट ब्यौरा!


पेय पदार्थो की बोतलों से लेबल हटाने की तैयारी
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
केंद्र सरकार ने ऐलान किया कि पेय पदार्थो की बोतलों खासकर प्लास्टिक बोतल से लेबल हटाए जाएंगे और बोतलों पर ही आईएसआई मार्का, एमआरपी, एक्सपायरी तिथि जैसे विवरण गोदने की योजना है। वहीं खाद्य पदार्थो के बंद पैकेटों पर इस प्रकार के ब्यौरे बड़े-बड़े अक्षरों में प्रकाशित करने के दिशा निर्देश जारी कर दिये गये हैं।
केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामले मंत्री राम विलास पासवान ने सोमवार को यहां मोदी सरकार के तीन साल में अपने मंत्रालय की उपलब्धियों का बखान करते हुए इस ऐलान करने की वजह भी बताई। उनका कहना है कि खाद्य पदार्थो के पैकेटों पर शुद्धता की पहचान आईएसआई, उसकी कीमत, मात्रा, एक्सपायरी तिथि जैसे सभी विवरण बड़े-बड़े अक्षरों में छापने के दिशा निर्देश दिये जा चुके हैं, क्योंकि बहुत ही महीन अक्षरों में उपभोक्ता उन्हें पढ़ नहीं सकता है। जहां तक शीतल पेय पदार्थो या पानी की प्लास्टिक की बोतलों से लेबल हटाने की योजना का सवाल है उसमें लेबल बदलने की आशंका को खत्म करना है, क्योंकि प्लास्टिक की बोतल एक ही बार उपयोग होनी है। उन्होंने कहा कि सरकार ने पिछले साल 230 लाख टन गेंहू की खरीद की थी और मौजूदा सीजन में अब तक 270 लाख टन की खरीद की जा चुकी है, जिसका लक्ष्य 300 लाख टन गेंहू खरीद करने का है। उन्होंने कहा कि छत्तसीगढ़ और उड़ीसा में खरीद व्यवस्था पहले से ही पुख्ता हैं।
नियंत्रण में हैं खाद्य पदार्थों की कीमतें
केंद्रीय मंत्री पासवान ने संवाददाता सम्मेलन में एक सवाल के जवाब में दावा किया है कि खाद्य पदार्थों की कीमतें बिल्कुल नियंत्रण लगातार नियंत्रण में हैं और पिछले साल की तुलना में करीब 22 जरूरी खाद्य पदार्थ सस्ते हुए हैं। उन्होंने कहा कि इसके अलावा गेहूं, चावल और तेलों के दाम भी नियंत्रण में हैं। चीनी मिलों का अस्तित्व बचाए रखने के लिए चीनी की कीमत जरूर घटती-बढ़ती रही है। कीमतों के बारे में उन्होंने एक मई 2014 से तुलना करते हुए खाद्य पदार्थो के दामों की कीमतों को जिक्र करते हुए दावा किया कि केंद्र सरकार ने खाद्य पदार्थो पर लगतार नियंत्रण बनाए रखा है।
गन्ना बकाया का भुगतान
सरकार का दावा है कि पिछले पांच चीनी मौसमों के दौरान चीनी की घरेलू खपत की तुलना में निरंतर सरप्लस उत्पादन के कारण चीनी की कीमतें कम रहीं, जिसके चलते पूरे देश में चीनी उद्योग में वित्तीय प्रवाह कम रहा और गन्ना बकाया बढ़ गया। इसकी वजह से चीनी मौसम 2014-15 में अखिल भारतीय स्तर पर गन्ना मूल्य बकाया 15 अप्रैल 2015 की स्थिति के अनुसार सर्वाधिक 21,837 करोड़ रुपए तक पहुंच गया था। इस स्थिति पर काबू पाने के उद्देश्य से सरकार ने कई उपाय किए। इन उपायों के फलस्वरूप चीनी मौसम 2014-15 के लिए किसानों को देय बकाया का 99.33 फीसदी और चीनी मौसम 2015-16 के लिए 98.21 फीसदी भुगतान किया जा चुका है।
भारतीय खाद्य निगम में सुधार
उन्होंने कहा कि गेहूं और चावल के भंडारण के लिए भारतीय खाद्य निगम और राज्य सरकारों सहित अन्य एजेंसियों द्वारा जन-निजी-भागीदारी पद्धति पर स्टील साइलो के रूप में 100 लाख टन भंडारण क्षमता बनाने की योजना शुरू की है। यह निर्माण 2019-20 तक तीन चरणों में किए जाने की योजना है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2016-17 में 36.25 लाख टन अनाज के भंडारण के लिए साइलो आॅपरेटरों के चयन के लक्ष्य के सापेक्ष 37.50 लाख टन अनाज के लिए आॅपरेटरों को चिह्नित किया गया है।
आॅनलाइन हुए एफसीआई डिपो
भारतीय खाद्य निगम के गोदामों के सभी प्रचालनों को आॅनलाइन करने तथा डिपो स्तर पर लीकेज को रोकने और कार्यों को स्वचलित करने के उद्देश्य से मार्च 2016 में 27 राज्यों में पायलट आधार पर 31 डिपुओं में डिपो
आॅनलाइन प्रणाली शुरू की गई थी। वर्तमान में भारतीय खाद्य निगम के 510 डिपुओं में आॅनलाइन प्रणाली लागू कर दी गई है।

आपदा खतरे की जद में देश की आधी आबादी


राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की बैठक में बोले राजनाथ
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
भारत आपदा के खतरे के लिहाज से दुनिया में सर्वाधिक संवेदनशील देशों में शामिल है, जिसके कारण देश की करीब आधी आबादी आपदा के खतरों से घिरे इलाकों में रहती है।
यह बात सोमवार को यहां ‘सतत विकास के लिए आपदा जोखिम न्यूनीकरण: 2030 तक भारत को सुदृढ़ बनाना’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की बैठक का उद्घाटन करते हुए कही। उन्होंने कहा कि सरकार ने देश भर में आपदा के खतरे को कम करने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर साझा मंच के रूप में आपदा जोखिम न्यूनीकरण (एनपीडीआरआर) का गठन किया है। एनपीडीआरआर आपदा प्रबंधन से जुड़े अनुभवों को साझा करने और आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए सामूहिक प्रयास करने वाला राष्ट्रीय प्लेटफॉर्म है। इसके लिए उन्होंने देश के विभिन्न इलाकों में आपदा के खतरे को कम करने के लिये केन्द्र और राज्य सरकारों के समन्वय से साझा रणनीति बनाना है। जिसके लिए उन्होंने आपदा जोखिम से जुड़े नुकसान को कम करने में रोकथाम और न्यूनीकरण की भूमिका पर विशेष बल दिया। राजनाथ सिंह ने क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने के लिए भारत सरकार द्वारा हाल ही में किए गए अनेक पहलों को भी साझा किया, जिनमें दक्षिण एशियाई देशों के लिए समर्पित उपग्रह का प्रक्षेपण, आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर एशियाई मंत्रिस्तरीय सम्मेलन-2016 और सार्क आपदा प्रबंधन केंद्र की स्थापना प्रमुख हैं। उन्होंने आपदा जोखिम में कमी के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क, सतत विकास लक्ष्य और जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते (सीओपी21) जैसे वैश्विक समझौतों को स्मरण किया। उन्होंने आपदा जोखिम में कमी के लिए सरकारों द्वारा किए जा रहे विभिन्न प्रयासों जैसे कि आपदा प्रबंधन योजना और नीति तैयार करने, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का विकास करने, चक्रवात से बचाव के लिए आश्रयों एवं उपयुक्त तटबंधों का निर्माण किए जाने, राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरों पर आपदा राहत बलों का गठन करने और सतत प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम के जरिए समुदायों का क्षमता निर्माण करने पर प्रकाश डाला।
कैसी-कैसी आपदा
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ ने कहा कि प्राकृतिक एवं अन्य प्रकार की आपदाओं के लिहाज से भारत दुनिया में सर्वाधिक खतरों से घिरा देश इसलिए कहा जा सकता है कि देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी भूकंप, बाढ़, चक्रवाती तूफान, सूखा और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के खतरों से घिरे इलाकों में रहती है और बड़ी-बड़ी आपदाओं का सामना भी करना पड़ा है। उन्होंने देश में कई आपदाओं का जिक्र भी किया। वहीं उन्होंने देश के दूसरे स्वरूप का भी जिक्र करते हुए कहा कि भारत दुनिया का पहला देश है जिसने आपदा के दौरान खाद्यान्न के भंडारण और इसके संरक्षण का प्रबंधन किया है। इसके अलावा भारत ने आपदा के खतरे को कम करने के लिये दक्षिण एशियाई देशों के साथ भी आपसी सहयोग को बढ़ावा दिया है। उन्होंने बताया कि आपदा से निपटने की तैयारी और न्यूनीकरण पर एक अतिरिक्त रुपया खर्च करने से आपदा हानि में 10 रुपये की बचत की जा सकती है।

रविवार, 14 मई 2017

चीन की जद में तैयार हुआ देश का सबसे लंबा पुल

26 मई को पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
चीन की सीमा को लगभग छूते हुए भारत में ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाए गये सबसे लंबे पुल अरुणाचल और असम के सड़क संपर्क मार्ग को आसान बनाने को तैयार है। इस पुल का उद्घाटन 26 मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करेंगे।
असम में चीन की सीमा के बेहद नजदीक ब्रह्मपुत्र नदी पर देश का सबसे लंगा 9.15 किमी पुल बनकर तैयार हो चुका है, जो अरुणाचल प्रदेश और असम के सड़क संपर्क मार्ग के सफर को आसान करेगा। ब्रह्मपुत्र नदी पर 950 करोड़ रुपये लागत से तैयार सबसे लंबे ढोला-सादिया पुल को आवागमन के लिए 26 मई को शुरू कर दिया जाएगा, जिसका उद्घाटन करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी केंद्र सरकार के तीन साल के जश्न की शुरूआत भी करेंगे। खास बात यह है कि यह पुल सामरिक रूप से भी इसलिए भी महत्वपूर्ण होगा कि इस पुल के निर्माण को चीन की सीमा पर भारत की ओर से अपनी रक्षा तैयारियों की मजबूती के तौर पर भी देखा जा रहा है। यानि सैन्य साजो-सामान की सीमा तक पहुंच को आसान बनाने के लिए भी केंद्र सरकार के प्रयासों में से यह एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। इसके अलावा यह पुल अरुणाचल प्रदेश और असम के लोगों के लिए सड़क संपर्क को भी आसान बनाएगा।
पुल से होगा ये फायदा
चीन की सीमा के नजदीक असम में ढोला-सदिया पुल बनने से असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच की दूरी 4 घंटे कम हो जाएगी। यह पुल गुवाहाटी से 540 किमी दूर सदिया में स्थित है, जिसका दूसरा छोर धोला में है। धोला से अरुणाचल के ईटानगर की दूरी 300 किमी दूर है। वहीं चीनी सीमा से हवाई दूरी 100 किलोमीटर से कम रह गई है। फिलहाल दोनों राज्यों के बीच सड़क संपर्क सीमित है, जिसे अधिकांश लोग नावों के जरिए आवागमन करके पूरा करते आ रहे है और 8 से दस घंटे तक लग जाते हैं, लेकिन ब्रह्मपुत्र के पल-पल बदलते स्तर के चलते खतरे से भरे सफर से अब दोनों राज्यों के लोगों को बड़ी राहत मिलने जा रही है।
सेना की आसान पहुंच
इस पुल के बन जाने से सेना अरुणाचल प्रदेश तक जाने में सक्षम होगी, जिसकी सीमा चीन से लगती है। पुल को इस तरह बनाया गया है कि इस पुल से 60 टन वजन वाले टी-72 टैंक जैसे युद्ध टैंक भी गुजर सकते है। आमतौर पर अरुणाचल प्रदेश में सेना तिनसुखिया से प्रवेश करती है, जो असम में गुवाहाटी से 186 किमी दूर है। अब तक यहां कोई ऐसा पुल नहीं था, जिससे टैंक भी गुजर सकें। ऐसे में सेना को तेजपुर से सीमा पर पहुंचने में दो दिन लगते थे।लेकिन अब यह राह आसान होगी।
अभी तक ये था सबसे लंबा पुल
देश में अब तक मुंबई में बने बांद्रा-वर्ली सी-लिंक देश का सबसे बडा पुल था। चीन सीमा पर असम में बनाया गया यह पुल बांद्रा-वर्ली सी-लिंक से 3.55 किमी यानि 30 फीसदी ज्यादा लंबा होगा। इससे पहले बिहार के पटना में गंगा नदी पर बने 5.57 किमी लंबे महात्मा गांधी सेतु को देश के सबसे लंबे ब्रिज का दर्जा हासिल था। पुल का काम दिसंबर 2015 में पूरा हो जाना था, लेकिन समय बढ़ने से इसकी लागत भी बढ गई। पहले इसे 876 करो़ड़ में बन जाना था, लेकिन देरी के कारण इसकी लागत बढ़कर करीब 938 करोड़ रुपए हो गई।

क्या सरसों के बाद मिलेगी बीटी कपास को मंजूरी!

देश में विकसित किस्मों की बिक्री करने प्रस्ताव
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देशभर में जीएम सरसों की औपचारिक मंजूरी के बाद अब केंद्र सरकार भारत में विकसित बीटी कपास की उन तीन किस्मों को केंद्र सरकार जल्द ही मंजूरी दे सकती है, जिनका हाल ही में पेटेंट खत्म हुआ है।
भारत के जीएम फसलों के नियामक ने द्वारा पर्यावरण मंत्रालय को दी गई एक प्रस्तुति में जीन संवर्धित सरसों के वाणिज्यिक उपयोग की सिफारिश की है, जिसे केंद्र सरकार औपचारिक मंजूरी दे चुकी है। इसी तर्ज पर देश में ‘व्हाइट गोल्ड’ यानि सफेद सोने के नाम से पहचानी जाने वाली कपास को किसानों की आमदनी बढ़ाने का जरिया बनाने की तैयारी है। मसलन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने केंद्र सरकार को पीएयू-1, आर.एस-2013 और एफ-1861 प्रजाति वाले बीजों की वाणिज्यिक बिक्री शुरू करने का सुझाव दिया है। इन किस्मों को घरेलू स्तर पर बॉलगार्ड तकनीक से विकसित किया गया है और इनका पेटेंट भी खत्म हो चुका है। कपास की इन किस्मों में पीएयू-1 और एफ-1861 पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) द्वारा विकसित की गई हैं, जबकि आरएस-2013 राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय (आरएयू) बीकानेर ने विकसित की है। कृषि मंत्रालय के अनुसार इन जीन संवर्धित किस्मों की औसत कपास उत्पादकता करीब 500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जो उपलब्ध परंपरागत कपास की किस्मों से ज्यादा है और कपास की वर्तमान किस्मों की औसत उत्पादकता के काफी नजदीक है। भारतीय कपास निगम (सीसीआई) के मुताबिक भारत में फसल वर्ष 2016-17 में कपास की औसत उत्पादकता करीब 568 किलोग्राम रही है। सूत्रों के अुनसार घरेलू स्तर पर विकसित बीटी कपास की किस्में पत्ता मुरड़ रोग की थोड़ी प्रतिरोधी हैं और इसकी गुणवत्ता परंपरागत किस्मों के समान है। हालांकि बाजार में बाजार में बीटी कपास की उपलब्ध ज्यादातर किस्मों के लाइसेंस अमेरिकी कंपनी मोनसैंटो देती है।
इसलिए लिया गया फैसला
सरकार ने बीटी कपास की भारतीय किस्मों की वाणिज्यिक बिक्री शुरू करने का फैसला ऐसे समय लिया है, जब बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसैंटो ने भारत में नई बीज तकनीक लाने में अपनी रμतार कम करने का फैसला किया है। उसने यह कदम लाइसेंस फीस को लेकर कुछ लाइसेंसधारकों से विवाद के बाद यह कदम उठाया है। इस विवाद के कारण ही केंद्र सरकार को कपास के बीजों की कीमतों पर सिफारिश देने के लिए उच्च स्तरीय समिति गठित करनी पड़ी, जिसने बीटी कपास के बीजों के खुदरा दाम घटाने के साथ मोनसैंटो द्वारा वसूली जाने वाली लाइसेंस फीस में भी 74 फीसदी कमी कर दिया। वहीं समिति द्वारा कपास के बीजों के दाम घटा दिये और वर्ष 2017-18 में भी घटाई गई कीमत रखी गई। इस कदम से किसानों को आर्थिक फायदा मिलेगा।
नीति आयोग का भी समर्थन
नीति आयोग के संचालन परिषद में जारी तीन वर्षीय (2017-18 से 2019-20) प्रारूप कार्रवाई एजेंडा में घरेलू
संस्थानों और कंपनियों द्वारा विकसित जीन संवर्धित बीजों का समर्थन किया है। कपास की इन तीन किस्मों में पीएयू-1 और एफ-1861 पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) द्वारा विकसित की गई हैं, जबकि आरएस-2013 राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय (आरएयू) बीकानेर ने विकसित की है। हालांकि कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में खतरनाक पिंक बॉलवॉर्म एक बड़ी समस्या है।

शुक्रवार, 12 मई 2017

दुनिया के छह नदी क्रूजों में शामिल हुई गंगा!

वाराणसी से कोलकाता जलमार्ग से मिली जगह
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
देश में चल रहे गंगा और सहायक नदियों के लिए स्वच्छता अभियान और राष्ट्रीय जलमार्ग परियोजना में वाराणसी से कोलकाता के हल्दिया तक शुरू किये गये अंतर्देशीय जलमार्ग का निर्माण किया जा रहा है। इस परियोजना के कारण गंगा नदी को दुनिया के छह नदी क्रूजों में शामिल कर लिया गया है।
दरअसल केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय जलमार्ग परियोजना के पहले चरण में यूपी के वाराणसी से पश्चिम बंगाल के हल्दिया तक 1390 किलोमीटर जलमार्ग विकास परियोजना के तहत 5369 करोड़ रुपये की लागत से गंगा नदी को जलमार्ग के रूप में विकसित कर रही है। इसे विकसित करने की दिशा में हाल ही में वश्वबैंक द्वारा हाल ही में 375 मिलियन डॉलर की धनराशि को मंजूरी मिली है। अंतर्राष्ट्रीय नदी कू्रज में शामिल किये गये इस जलमार्ग वाली गंगा नदी के बारे में केंद्रीय जहारानी मंत्रालय के सूत्रों ने बातया कि अमरीका के एक प्रतिष्ठित संस्था ने अपने प्रकाशन ‘कोंडे नैस्ट ट्रैवलर’ में गंगा पदी पर तैयार किए जा रहे गंगा क्रूज (पोत विहार) को वर्ष 2017 में बन कर तैयार होने वाले छह नदी क्रूजों की सूची में शामिल किया है। इस संस्था ने लग्जरी क्रूज पोत गंगा वॉयजर-2 को इस सूची में रखा है, जो वाराणसी और हल्दिया (कोलकाता) के बीच गंगा में राष्ट्रीय जलमार्ग के पहले चरण को विकसित करने कर काम तेजी से चल रहा है। इस अंतर्राष्ट्रीय नदी क्रूज में गंगा नदी के अलावा अन्य पोत विहारों में चीन में मेकांग और यांग्त्जे नदियों पर संचालित लीग आफ क्रूज शामिल है। जबकि दक्षिण अफ्रीका में अमेजन, रूस में वोल्गा और म्यामांर में इरावड्डी नदी इस क्रूज यानि पोत विहार भी पहले से शुमार हैं। मंत्रालय का मानना है कि ‘कोंडे नैस्ट ट्रैवलर’ द्वारा गंगा नदी को क्रूज मार्गों की सूची में रखने से भारत में नदी पर्यटन को किये जा रहे प्रयासों को भी बल मिलेगा।
जारी है वाटर-वे का निर्माण
इस जलमार्ग का ट्रायल केंद्र सरकार पिछले साल अगस्त में दो मालवाहक जहाजों को वाराणसी से रवाना करके हल्दिया तक के सफर में पूरा कर चुकी है। वहीं भारतीय अंतदेर्शीय जलमार्ग प्राधिकरण यानि की पहले चरण के जल मार्ग (गंगा नदी) पर प्राइवेट क्रूज आपरेटरों के सहयोग से वाराणसी से कोलकाता तक क्रूज के प्रचालन की सुविधाएं प्रदान की जा रही है। प्राधिकरण द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं में रात्रि नौवहन सुविधा भी शामिल है। इस जल मार्ग विकास परियोजना के तहत वाराणसी से हल्दिया तक जारी योजना के तहत भारत में गंगा नदी पर प्रमुख माल ढुलाई मार्गों में से एक प्रमुख जलमार्ग तैयार किया जा रहा है।