शीतकालीन सत्र में पारित होगा वेतन बढ़ोतरी संबन्धी विधेयक
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद से संसद में लगातार उठाई जा रही सांसदों के वेतन एवं भत्तों में बढ़ोतरी की मांग पर सरकार गंभीर है। सरकार संसद के शीतकालीन में सांसदों के वेतन-भत्तों में बढ़ोतरी की सिफारिशें लागू करते हुए संबन्धित विधेयक पारित कराने की तैयारी में है।
संसद का शीतकालीन सत्र 16 नवंबर से शुरू हो रहा है और इस सत्र में सरकार के सामने जहां जीएसटी जैसे कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने की प्राथमिकता होगी, वहीं भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली सांसदों के वेतन-भत्ते संबन्धी संसद की समिति द्वारा संसद सदस्यों के मूल वेतन में 100 फीसदी वृद्धि करने की लंबित सिफारिशों को लागू करने का अहम फैसला ले सकती है। सरकार की ओर से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करके उनके वेतन-भत्तों में की गई वृद्धि के बाद सांसदों की वेतन-भत्ते बढ़ाने की मांग को पूरा किया जाए। पिछले सप्ताह ही इसी मकसद को देखते हुए केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और राज्यपालों के वेतन वृद्धि करने का फैसला किया है। सरकार के इस फैसले के बाद ऐसी संभावनाएं प्रबल हो गई हैं कि संसद के शीतकालीन सत्र में वेतनमान में बढ़ोतरी की सांसदों को सौगात मिल जाएगी। सूत्रों के अनुसार शीत सत्र के दौरान सांसदों के वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाओं में इजाफे के प्रस्ताव को एक विधेयक के रूप में मंजूरी दिये जाने के संकेत है। सूत्रों के अनुसार संसदीय समिति की सिफारिशों में सांसदों के मौजूदा वेतन 50 हजार से बढ़ाकर एक लाख रुपये करने का प्रस्ताव है। गौरतलब है कि संसद के पिछले मानसून सत्र के दौरान दोनों सदनों में कई बार सांसदों ने सातवें वेतन आयोग का हवाला देते हुए सांसदों के वेतनमान में बढ़ोतरी करने के लिए संसदीय समिति की सिफारिशों को लागू करने की मांग की थी, जिस पर सरकार ने जल्द ही फैसला लेने का भरोसा दिया था।
कैबिनेट में होगा फैसला
सूत्रोें के अनुसार इन सिफारिशों पर कैबिनेट की मंजूरी के लिए संसदीय कार्य मंत्रालय द्वारा एक कैबिनेट नोट तैयार किया जा चुका है,जिसे मंजूरी के लिए जल्द ही केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में रखा जाएगा और अंतिम फैसला पीएम नरेन्द्र मोदी लेंगे। कैबिनेट की मंजूरी मिलते ही सरकार सांसदों के वेतन-भत्तों में बढ़ोतरी संबन्धी एक विधेयक संसद के शीतकालीन सत्र में पेश करेगी, जिसका पारित होना तय है। सूत्रों का कहना है कि संसद से मंजूरी मिलने के बाद सांसदों के वेतन-भत्तों में इस वृद्धि को गत अप्रैल 2016 से लागू किया जाएगा और वेतन बढ़ोतरी होने के साथ अप्रैल से सांसदों को एरियर का भुगतान भी किया जाएगा।
ये थी संसदीय समिति की सिफारिशें
भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने सांसदों को हर महीने मिलने वाले 50 हजार रुपए वेतन को बढ़ाकर एक लाख रुपये यानि दोगुना करने की सिफारिश की है। इसी प्रकार अभी तक मिलने वाले संसदीय क्षेत्र भत्ता और कार्यालय भत्ते के 45-45 हजार रुपये, संसद सत्र के दौरान हर रोज दो हजार रुपए दैनिक भत्ते को भी बढ़ाने की सिफारिश की हुई है। समिति की वेतन और भत्तों को बढ़ाने वाली सिफारिशों का अध्ययन कराने के लिए सरकार द्वारा गठित की गई एक संयुक्त समिति ने भी मानसून सत्र के दौरान ही अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी, जिसमें संसदीय समिति के अनुरूप ही वेतन बढ़ाने की सिफारिश की गई है। सूत्रों के अनुसार पीएमओ भी संयुक्त समिति की सिफारिशों पर सहमति है। इसलिए शीतकालीन सत्र में सांसदों के अच्छे दिन सामने आने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
एक साल से जारी तर्क-वितर्क
भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट पिछले साल ही केंद्र सरकार को सौंप दी थी, जिसमें सांसदों के वेतन एवं भत्तों में दोगुना बढ़ोतरी करने की सिफारिश की गई थी। इसके लिए सरकार द्वारा इन सिफारिशों का अध्ययन करने के लिए गठित की गई सांसदों की एक अन्य समिति ने भी सांसदों के नये वेतनमान तय करने संबन्धी अपनी रिपोर्ट गत जुलाई में केंद्र सरकार को सौंप दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इन सिफारिशों पर उठाए गए कुछ सैद्धांतिक सवालों के कारण वेतन-भत्ते में इजाफे का यह मामला अभी तक लंबित है। सांसदों संविधान के अनुच्छेद 106 का हवाला देते हुए यह तर्क देते आ रहे हैं कि संसद सदस्य सरकार के मोहताज नहीं हैं। इसलिये संसद सदस्यों का वेतन एक कैबिनेट सचिव से एक हजार रुपये अधिक होना चाहिए।
03Nov-2016
एक जमाना था जब लोग अपने घरों के बाहर लिखते थे-अतिथि देवो भव: फिर शुरू किया-शुभ लाभ और बाद में लिखा जाने लगा-यूं आर वेलकम अब शुरू हो गया-......से सावधान!
गुरुवार, 3 नवंबर 2016
बुधवार, 2 नवंबर 2016
झूठे चुनावी वादे करने वाले सियासी दलों की खैर नहीं!
आगामी पांच राज्यों के चुनाव में ही लागू होगा नियम
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत चुनाव सुधार की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाते आ रहे केंद्रीय चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों पर पहली बार ऐसा शिकंजा कसने की तैयारी कर ली है, जिसमें चुनावी घोषणा पत्र में किये जाने वाले वादों पर खरा न उतरने वाले राजनीतिक दलों को बहुत भारी पड़ना तय है।
देश में चुनाव में मतदाताओं को रिझाने के लिए हरेक दल अपने अधिकृत चुनावी घोषणा पत्र में जनता के लिए चांद-सितारे तोड़ने तक के वादे कर देते हैं और सत्ता में आते ही ऐसे वादे ताक पर टांग दिये जाते हैं। केंद्रीय चुनाव आयोग ने पिछले लोकसभा चुनाव में नई व्यवस्था लागू करके राजनीतिक दलों पर लोकलुभावने वादों पर प्रतिबंध लगाया था। चुनाव सुधार की दिशा में चुनाव आयोग ने ऐसे समय जब उत्त्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, मणिपुर समेत पांच राज्यों में होने वाले चुनाव में सभी राजनीतिक दल अपने-अपने चुनावी घोषणा पत्र तैयार करने में जुटे हुए हैं और उसी के अनुसार चुनावी सभाओं में अपनी सियासी जमीन तलाशने में जुटे हुए हैं। सभी राजनीतिक दलों की रैलियों और चुनावी गतिविधियों पर पैनी नजर जमाए केंद्रीय चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों पर चुनावी वादो को लेकर एक और सख्त कदम उठाने का फैसला किया है। मसलन अब चुनावी घोषणा पत्र में जनता से बड़े-बड़े वादे कर उन्हें भूल जाना तमाम राजनीतिक दलों को भारी पड़ सकता है। अब आगामी चुनाव के लिए चुनाव आयोग ऐसे नियम लागू करने का फैसला कर चुका है कि झूठे चुनावी घोषणा पत्र जारी करने वाले सियासी दल के खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई अमल में लाई जाएगी कि कोई भी दल भविष्य में झूठे वादे करने भूल जाएगा।
घोषणा पत्रों की होगी जांच
केंद्रीय चुनाव आयोग ने पिछले महीने एक बैठक में राजनीतिक दलों के झूठे घोषणा पत्रों पर लगाम कसने के लिए मंथन किया है, जिसके बारे में चुनाव आयोग की टीमें सभी चुनावी राज्यों में रातजनीतिक दलों के जारी किये जा रहे घोषणा पत्रों की जांच करेगी। इन घोषणा पत्रों में लोक लुभावन मुद्दों के साथ ऐसे वादों को भी चिन्हित करेगी, तो सत्ता में आने पर भी संभव नहीं हो सकते। इस प्रकार के नियमों को चुनाव आयोग की टीमें चुनावी राज्यों का दौरा करके राजनीतिक दलों को भी इस बात से आगाह करने का काम करने जा रही है, कि वे अपने घोषणा पत्र में कोई झूठे वादे को प्रकाशित न करें और जनसभाओं में दोहराएं। माना जा रहा है कि ऐसे नियम को लागू करके झूठे वादे करके मतदाताओं को आकर्षित करने वाले राजनीतिक दलों पर शिकंजा कसना तय है। चुनाव आयोग के एक अधिकारी की माने तो मतदाताओं को 'विश्वास नहीं तोड़ा जा सकता है। इसलिए आयोग के नियम मसौदे में स्पष्ट किया गया है कि घोषणापत्रों से निपटने के लिए एक समिति सुझाव देने के लिए गठित की जाएगी।
क्या होगा नया नियम
चुनाव आयोग के सूत्रों की माने तो वर्ष 2017 के यूपी समेत पांच राज्यों में हिस्सा लेने वाले राजनीतिक दल यदि अपने घोषणा पत्र में जनता के सामने 'चांद-सितारे तोड़कर' या अन्य कोई चमत्कार करने का वादा करती है, तो उन दलों को स्टांप पेपर पर एक शपथ-पत्र चुनाव आयोग के समक्ष दाखिल करना होगा। इस शपथ पत्र में दलों को यह भी बताना होगा कि उसे पूरा किस तरीके से किया जाएगा और उसके लिए पैसा कहां से आएगा। वोटरों से उन्हीं वादों के आधार पर वोट मांगा जाना चाहिए जो पूरे किए जा सकें। इस शपथ-पत्र पर खरा न उतरने वाले राजनीतिक दल के खिलाफ कार्यवाही ही नहीं की जाएगी, बल्कि उस दल के चुनाव चिन्ह को रद्द तक किया जा सकता है। ऐसा नियम का मसौदा चुनाव आयोग गत 23 सितंबर को आयोग में हुई एक बैठक में ही तैयार कर चुकी है। इसलिए सभी राजनीतिक दलों से चुनाव आयोग को ऐसी उम्मीद है कि वह अपने चुनावी घोषणापत्र में तर्क आधारित ही वादे करेंगे।
फरवरी-मार्च में संभव चुनाव
देश के पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, उत्तराखंड और मणिपुर ने अगले साल होने वाले विधान सभा चुनाव की को लेकर सभी राजनीतिक दल प्रचार करने में व्यवस्त हैं, जहां चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की तारीखें ऐलान करने का इंतजार है। आयोग की और से ऐसे संकेत हैं कि फरवरी-मार्च में इन राज्यों के विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं। राजनीतिक दलों की गतिविधियों के इतर चुनाव आयोग भी चुनाव कराने की तारीखों के लिए अपना कार्यक्रम और उससे पहले की तैयारियों में जुटा हुआ है। चुनाव आयोग इन राज्यों में मौजूदा सरकार का शासनकाल खत्म होने के साथ ही नई सरकार का गठन वक्त पर कराना चाहता है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश विधान सभा का कार्यकाल 27 मई, 2017, तो उत्तराखंड विधान सभा का कार्यकाल 27 मार्च और गोवा, मणिपुर और पंजाब का कार्यकाल 15 मार्च को खत्म हो जाएगा। इसलिए इससे पहले ही चुनाव प्रक्रिया पूरी करने की दरकार होगी।
02Nov-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत चुनाव सुधार की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाते आ रहे केंद्रीय चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों पर पहली बार ऐसा शिकंजा कसने की तैयारी कर ली है, जिसमें चुनावी घोषणा पत्र में किये जाने वाले वादों पर खरा न उतरने वाले राजनीतिक दलों को बहुत भारी पड़ना तय है।
देश में चुनाव में मतदाताओं को रिझाने के लिए हरेक दल अपने अधिकृत चुनावी घोषणा पत्र में जनता के लिए चांद-सितारे तोड़ने तक के वादे कर देते हैं और सत्ता में आते ही ऐसे वादे ताक पर टांग दिये जाते हैं। केंद्रीय चुनाव आयोग ने पिछले लोकसभा चुनाव में नई व्यवस्था लागू करके राजनीतिक दलों पर लोकलुभावने वादों पर प्रतिबंध लगाया था। चुनाव सुधार की दिशा में चुनाव आयोग ने ऐसे समय जब उत्त्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, मणिपुर समेत पांच राज्यों में होने वाले चुनाव में सभी राजनीतिक दल अपने-अपने चुनावी घोषणा पत्र तैयार करने में जुटे हुए हैं और उसी के अनुसार चुनावी सभाओं में अपनी सियासी जमीन तलाशने में जुटे हुए हैं। सभी राजनीतिक दलों की रैलियों और चुनावी गतिविधियों पर पैनी नजर जमाए केंद्रीय चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों पर चुनावी वादो को लेकर एक और सख्त कदम उठाने का फैसला किया है। मसलन अब चुनावी घोषणा पत्र में जनता से बड़े-बड़े वादे कर उन्हें भूल जाना तमाम राजनीतिक दलों को भारी पड़ सकता है। अब आगामी चुनाव के लिए चुनाव आयोग ऐसे नियम लागू करने का फैसला कर चुका है कि झूठे चुनावी घोषणा पत्र जारी करने वाले सियासी दल के खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई अमल में लाई जाएगी कि कोई भी दल भविष्य में झूठे वादे करने भूल जाएगा।
घोषणा पत्रों की होगी जांच
केंद्रीय चुनाव आयोग ने पिछले महीने एक बैठक में राजनीतिक दलों के झूठे घोषणा पत्रों पर लगाम कसने के लिए मंथन किया है, जिसके बारे में चुनाव आयोग की टीमें सभी चुनावी राज्यों में रातजनीतिक दलों के जारी किये जा रहे घोषणा पत्रों की जांच करेगी। इन घोषणा पत्रों में लोक लुभावन मुद्दों के साथ ऐसे वादों को भी चिन्हित करेगी, तो सत्ता में आने पर भी संभव नहीं हो सकते। इस प्रकार के नियमों को चुनाव आयोग की टीमें चुनावी राज्यों का दौरा करके राजनीतिक दलों को भी इस बात से आगाह करने का काम करने जा रही है, कि वे अपने घोषणा पत्र में कोई झूठे वादे को प्रकाशित न करें और जनसभाओं में दोहराएं। माना जा रहा है कि ऐसे नियम को लागू करके झूठे वादे करके मतदाताओं को आकर्षित करने वाले राजनीतिक दलों पर शिकंजा कसना तय है। चुनाव आयोग के एक अधिकारी की माने तो मतदाताओं को 'विश्वास नहीं तोड़ा जा सकता है। इसलिए आयोग के नियम मसौदे में स्पष्ट किया गया है कि घोषणापत्रों से निपटने के लिए एक समिति सुझाव देने के लिए गठित की जाएगी।
क्या होगा नया नियम
चुनाव आयोग के सूत्रों की माने तो वर्ष 2017 के यूपी समेत पांच राज्यों में हिस्सा लेने वाले राजनीतिक दल यदि अपने घोषणा पत्र में जनता के सामने 'चांद-सितारे तोड़कर' या अन्य कोई चमत्कार करने का वादा करती है, तो उन दलों को स्टांप पेपर पर एक शपथ-पत्र चुनाव आयोग के समक्ष दाखिल करना होगा। इस शपथ पत्र में दलों को यह भी बताना होगा कि उसे पूरा किस तरीके से किया जाएगा और उसके लिए पैसा कहां से आएगा। वोटरों से उन्हीं वादों के आधार पर वोट मांगा जाना चाहिए जो पूरे किए जा सकें। इस शपथ-पत्र पर खरा न उतरने वाले राजनीतिक दल के खिलाफ कार्यवाही ही नहीं की जाएगी, बल्कि उस दल के चुनाव चिन्ह को रद्द तक किया जा सकता है। ऐसा नियम का मसौदा चुनाव आयोग गत 23 सितंबर को आयोग में हुई एक बैठक में ही तैयार कर चुकी है। इसलिए सभी राजनीतिक दलों से चुनाव आयोग को ऐसी उम्मीद है कि वह अपने चुनावी घोषणापत्र में तर्क आधारित ही वादे करेंगे।
फरवरी-मार्च में संभव चुनाव
देश के पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, उत्तराखंड और मणिपुर ने अगले साल होने वाले विधान सभा चुनाव की को लेकर सभी राजनीतिक दल प्रचार करने में व्यवस्त हैं, जहां चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की तारीखें ऐलान करने का इंतजार है। आयोग की और से ऐसे संकेत हैं कि फरवरी-मार्च में इन राज्यों के विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं। राजनीतिक दलों की गतिविधियों के इतर चुनाव आयोग भी चुनाव कराने की तारीखों के लिए अपना कार्यक्रम और उससे पहले की तैयारियों में जुटा हुआ है। चुनाव आयोग इन राज्यों में मौजूदा सरकार का शासनकाल खत्म होने के साथ ही नई सरकार का गठन वक्त पर कराना चाहता है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश विधान सभा का कार्यकाल 27 मई, 2017, तो उत्तराखंड विधान सभा का कार्यकाल 27 मार्च और गोवा, मणिपुर और पंजाब का कार्यकाल 15 मार्च को खत्म हो जाएगा। इसलिए इससे पहले ही चुनाव प्रक्रिया पूरी करने की दरकार होगी।
02Nov-2016
मंजूरी के लिए राष्ट्रपति को भेजे दस जजो के नाम
हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति का मामला
हरिभूमि ब्यूरो. नई दिल्ली
देश में उच्च न्यायालयों में जजो की कमी को पूरा करने के लिए जजो की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार व सुप्रीम कोर्ट के बीच तकरार अभी खत्म नहीं हुआ है। हाल ही में इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट और गुवाहाटी हाई कोर्ट में जजो की भर्ती के लिए दस नामों को मंजूरी के लिए राष्ट्रपति को भेजे हैं।
सुप्रीम कोर्ट समेत देश के सभी उच्च न्यायालयों में जजों के पदों की रिक्तियां बढ़ती जा रही हैं, जिनका असर अदालतों में लंबित विवादों के निपटान की देरी के रूप में सामने आ रहा है। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन को सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल असंवैधानिक करार करके खारिज कर दिया था और कॉलेजियम प्रणाली को बहाल करके जजों की निुयक्तियां करने की प्रक्रिया करने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट समेत देश के उच्च न्यायालयों में जजों की रिक्तियों को भरने के लिए नियुक्तियों को लेकर केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के आयोग गठन के प्रस्ताव को खारिज करके पुरानी प्रणाली कॉलेजियम को ही पारदर्शी और सुदृढ़ बनाने पर बल दिया था, लेकिन इसके बावजूद हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति को लेकर कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं, इसलिए हाईकोर्ट में जजों की नियुक्तियों में देरी हो रही है। पिछले सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी, जिसके बाद केंद्र सरकार ने गुवाहाटी और दिल्ली और गुवाहाटी हाईकोर्ट में जजों की भर्ती के लिए 10 नामों को हरी झंडी दिखाई और उन नामों की मंजूरी हासिल करने के लिए इन दस जजों के नाम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भेजे हैं। विधि मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार दिल्ली हाइकोर्ट में पांच जजों की नियुक्ति न्यायिक सेवा परीक्षा के तहत होनी है, जबकि गुवाहाटी हाइकोर्ट के पांच जजों की नियुक्ति बार और राज्य न्यायिक सेवा के तहत की जाएगी।
केंद्र सरकार जजों की नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया में न्यायालय की स्क्रुटनी अथॉरिटी के अतिरिक्त एक बाहरी एजेंसी द्वारा भी जजों के नाम पर विचार करने के पक्ष में है, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने साफ कर दिया कि केंद्र सरकार का ये प्रस्ताव न्यायिक व्यवस्था में दखल है। पिछले सप्ताह ही भारत के मुख्य न्यायाधीश टाएस ठाकुर ने केंद्र सरकार के प्रति टिप्पणी की थी और उसके बाद एक समारोह में न्यायापालिका के मुद्दे पर विभिन्न वक्ताओं ने जजों की नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार इलाहाबाद हाइकोर्ट के लिए भी 35 जजों की नियुक्ति पर विचार कर रही है, जहां गत जनवरी से 8 जजों की रिक्त हुई जगह नियुक्तियों की बाट जोह रही है।
02Nov-2016
हरिभूमि ब्यूरो. नई दिल्ली
देश में उच्च न्यायालयों में जजो की कमी को पूरा करने के लिए जजो की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार व सुप्रीम कोर्ट के बीच तकरार अभी खत्म नहीं हुआ है। हाल ही में इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट और गुवाहाटी हाई कोर्ट में जजो की भर्ती के लिए दस नामों को मंजूरी के लिए राष्ट्रपति को भेजे हैं।
सुप्रीम कोर्ट समेत देश के सभी उच्च न्यायालयों में जजों के पदों की रिक्तियां बढ़ती जा रही हैं, जिनका असर अदालतों में लंबित विवादों के निपटान की देरी के रूप में सामने आ रहा है। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन को सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल असंवैधानिक करार करके खारिज कर दिया था और कॉलेजियम प्रणाली को बहाल करके जजों की निुयक्तियां करने की प्रक्रिया करने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट समेत देश के उच्च न्यायालयों में जजों की रिक्तियों को भरने के लिए नियुक्तियों को लेकर केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के आयोग गठन के प्रस्ताव को खारिज करके पुरानी प्रणाली कॉलेजियम को ही पारदर्शी और सुदृढ़ बनाने पर बल दिया था, लेकिन इसके बावजूद हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति को लेकर कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं, इसलिए हाईकोर्ट में जजों की नियुक्तियों में देरी हो रही है। पिछले सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी, जिसके बाद केंद्र सरकार ने गुवाहाटी और दिल्ली और गुवाहाटी हाईकोर्ट में जजों की भर्ती के लिए 10 नामों को हरी झंडी दिखाई और उन नामों की मंजूरी हासिल करने के लिए इन दस जजों के नाम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भेजे हैं। विधि मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार दिल्ली हाइकोर्ट में पांच जजों की नियुक्ति न्यायिक सेवा परीक्षा के तहत होनी है, जबकि गुवाहाटी हाइकोर्ट के पांच जजों की नियुक्ति बार और राज्य न्यायिक सेवा के तहत की जाएगी।
केंद्र सरकार जजों की नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया में न्यायालय की स्क्रुटनी अथॉरिटी के अतिरिक्त एक बाहरी एजेंसी द्वारा भी जजों के नाम पर विचार करने के पक्ष में है, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने साफ कर दिया कि केंद्र सरकार का ये प्रस्ताव न्यायिक व्यवस्था में दखल है। पिछले सप्ताह ही भारत के मुख्य न्यायाधीश टाएस ठाकुर ने केंद्र सरकार के प्रति टिप्पणी की थी और उसके बाद एक समारोह में न्यायापालिका के मुद्दे पर विभिन्न वक्ताओं ने जजों की नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार इलाहाबाद हाइकोर्ट के लिए भी 35 जजों की नियुक्ति पर विचार कर रही है, जहां गत जनवरी से 8 जजों की रिक्त हुई जगह नियुक्तियों की बाट जोह रही है।
02Nov-2016
रविवार, 30 अक्टूबर 2016
समुद्री कारोबार में चीन से आगे भारत!
घाटे के दौर से गुजर रहे हैं दुनियाभर के बंदरगाह
भारत ने कमाया छह हजार करोड़ रुपये का मुनाफा
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश के समुद्री कारोबार की सेहत सुधारने की दिशा में बंदरगाहों के अत्याधुनिक विकास की परियोजनाओं का नतीजा सामने आने लगा है। मसलन जहां दुनियाभर के बंदरगाह घाटे के दौर से गुजर रहे है, वहीं भारत के बंदरगाहों से भारत को छह हजार करोड़ का मुनाफा हुआ है। भारत ने चीन जैसे देश को भी बंदरगाह के विकास और कारोबार में पीछे छोड़ दिया है।
केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय भारत के बंदरगाहों को मुनाफे में आने की उपलब्धि के मद्देनजर देश में बंदरगाहों के विस्तार की योजना बना रहा है। मसलन देश में प्रमुख 12 बंदरगाहों के अत्याधुनिक विकास और उनकी समुद्री कारोबार क्षमता बढ़ाने के साथ ही छह और बंदरगाह बनाने की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। मंत्रालय के अनुसार मौजूदा दौर में जहां दुनियाभर के बंदरगाह घाटे के दौर से गुजर रहे हैं, वहीं भारत के बंदरगाहों ने छह हजार करोड़क का मुनाफा कमाते हुए इस क्षेत्र में 2.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है, जो केंद्र सरकार की परियोजनाओं का नतीजा माना जा रहा है। मंत्रालय के अनुसार सागरमाल कार्यक्रम के जरिए बंदरगाहों के विकास और उसके कारोबार में भारत ने सकल घरेलू उत्पाद के मामले में चीन को भी पीछे धकेल दिया है। इस मामले में इस क्षेत्र में भारत का जीडीपी 19 प्रतिशत है, तो चीन 12.5 प्रतिशत जीडीपी दर पर सिमट गया। यही नहीं बंदरगाह के जीडीपी योगदान में इंडोनेशिया 15.72 प्रतिशत और ब्रिटेन 13.43 प्रतिशत की दर से चीन से आगे हैं। मसलन दुनियाभर के बंदरगाहों की जीडीपी में भारत सबसे ऊपर आ चुका है।
वरदान बनी सागरमाला
मंत्रालय के अनुसार बंदरगाहों के विकास में चलाई जा रही सागरमाला परियोजना जैसे महत्वकांक्षी कार्यक्रम ने भारत के माल ढुलाई के मॉडल को ही बदलना शुरू कर दिया है, जिसमें बंदरगाहों और उनके संपर्क मार्ग जैसे बुनियादी ढांचों के लिए सागरमाला कार्यक्रम ने सस्ती माल ढुलाई और समुद्री कारोबार के आर्थिक घाटे को मुनाफे में बदलने के संकेत सामने आने लगे हैं। सागरमाला कार्यक्रम के तहत भारत का वर्ष 2025 तक 35 से 40 हजार करोड़ रुपये तक माल ढुलाई की बचत करके बंदरगाहों का मुनाफा बढ़ाने का लक्ष्य है। मंत्रालय के अनुसार सागरमाल कार्यक्रम के तहत तटीय मार्ग के माध्यम से कोयले की आवाजाही 2025 तक 129 मिलियन टन प्रतिवर्ष करने का लक्ष्य है, जो मौजूदा वित्तीय वर्ष 2016 में 27 लाख टन प्रतिवर्ष से बढ़कर और मोडल मिश्रण में अंतदेर्शीय जलमार्ग और तटीय शिपिंग की हिस्सेदारी बढ़ाने के 6 से 12 प्रतिशत तक बढने का अनुमान है। मंत्रालय इस कार्यक्रम के तहत हुए एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि तटीय शिपिंग और अंतदेर्शीय जलमार्ग सड़क और रेल परिवहन की तुलना में करीब 70 प्रतिशत सस्ता है। जलमार्ग का उपयोग कच्चे माल और तैयार उत्पादों हिल के लिए एक महत्वपूर्ण क्षमता निहित है। इस दिशा में तटीय शिपिंग के जरिए इस्पात, सीमेंट, उर्वरक, पीओएल और खाद्यान्न के रूप में अन्य वस्तुओं की भी ढुलाई की जा रही है, जिसकी क्षमता वर्ष 2025 तक अतिरिक्त 80-85 बारे करोड़ टन की सीमा तक बढ़ाने का लक्ष्य है।
बेहतर विकल्प होगा जलमार्ग
देश में सड़क और रेल मार्ग के अलावा राष्ट्रीय जल परिवहन परियोजना माल ढुलाई की क्षमता बढ़ाएगी, जिसके लिए केंद्र सरकार ने देश में 111 नदियों को जलमार्ग में तब्दील करके जल परिवहन के रूप में एक किफायती विकल्प पर काम करना शुरू किया है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जल मार्ग को देश के परिवहन व्यवस्था में एक बेहतर कदम करार देते हुए कहते आ रहे हैं कि इस कदम से देश विदेश में माल भेजने के मद में होने वाले खर्च में भारी कमी आएगी और माल ढुलाई क्षमता में इजाफा होगा। हालांकि फिलहाल देश में पांच अंतर्राज्यीय जलमार्ग है, जिनके विस्तार के लिए 106 नए जलमार्ग शुरू करने की योजना को आगे बढ़ाया गया है। इसका मकसद सड़क व रेल मार्ग पर बढ़ते यातायात के बोझ को कम करना भी है। सरकार ने देश में 2000 वाटर पोर्ट्स बनाने की योजना तैयार की है।
30Oct-2016
भारत ने कमाया छह हजार करोड़ रुपये का मुनाफा
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश के समुद्री कारोबार की सेहत सुधारने की दिशा में बंदरगाहों के अत्याधुनिक विकास की परियोजनाओं का नतीजा सामने आने लगा है। मसलन जहां दुनियाभर के बंदरगाह घाटे के दौर से गुजर रहे है, वहीं भारत के बंदरगाहों से भारत को छह हजार करोड़ का मुनाफा हुआ है। भारत ने चीन जैसे देश को भी बंदरगाह के विकास और कारोबार में पीछे छोड़ दिया है।
केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय भारत के बंदरगाहों को मुनाफे में आने की उपलब्धि के मद्देनजर देश में बंदरगाहों के विस्तार की योजना बना रहा है। मसलन देश में प्रमुख 12 बंदरगाहों के अत्याधुनिक विकास और उनकी समुद्री कारोबार क्षमता बढ़ाने के साथ ही छह और बंदरगाह बनाने की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। मंत्रालय के अनुसार मौजूदा दौर में जहां दुनियाभर के बंदरगाह घाटे के दौर से गुजर रहे हैं, वहीं भारत के बंदरगाहों ने छह हजार करोड़क का मुनाफा कमाते हुए इस क्षेत्र में 2.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है, जो केंद्र सरकार की परियोजनाओं का नतीजा माना जा रहा है। मंत्रालय के अनुसार सागरमाल कार्यक्रम के जरिए बंदरगाहों के विकास और उसके कारोबार में भारत ने सकल घरेलू उत्पाद के मामले में चीन को भी पीछे धकेल दिया है। इस मामले में इस क्षेत्र में भारत का जीडीपी 19 प्रतिशत है, तो चीन 12.5 प्रतिशत जीडीपी दर पर सिमट गया। यही नहीं बंदरगाह के जीडीपी योगदान में इंडोनेशिया 15.72 प्रतिशत और ब्रिटेन 13.43 प्रतिशत की दर से चीन से आगे हैं। मसलन दुनियाभर के बंदरगाहों की जीडीपी में भारत सबसे ऊपर आ चुका है।
वरदान बनी सागरमाला
मंत्रालय के अनुसार बंदरगाहों के विकास में चलाई जा रही सागरमाला परियोजना जैसे महत्वकांक्षी कार्यक्रम ने भारत के माल ढुलाई के मॉडल को ही बदलना शुरू कर दिया है, जिसमें बंदरगाहों और उनके संपर्क मार्ग जैसे बुनियादी ढांचों के लिए सागरमाला कार्यक्रम ने सस्ती माल ढुलाई और समुद्री कारोबार के आर्थिक घाटे को मुनाफे में बदलने के संकेत सामने आने लगे हैं। सागरमाला कार्यक्रम के तहत भारत का वर्ष 2025 तक 35 से 40 हजार करोड़ रुपये तक माल ढुलाई की बचत करके बंदरगाहों का मुनाफा बढ़ाने का लक्ष्य है। मंत्रालय के अनुसार सागरमाल कार्यक्रम के तहत तटीय मार्ग के माध्यम से कोयले की आवाजाही 2025 तक 129 मिलियन टन प्रतिवर्ष करने का लक्ष्य है, जो मौजूदा वित्तीय वर्ष 2016 में 27 लाख टन प्रतिवर्ष से बढ़कर और मोडल मिश्रण में अंतदेर्शीय जलमार्ग और तटीय शिपिंग की हिस्सेदारी बढ़ाने के 6 से 12 प्रतिशत तक बढने का अनुमान है। मंत्रालय इस कार्यक्रम के तहत हुए एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि तटीय शिपिंग और अंतदेर्शीय जलमार्ग सड़क और रेल परिवहन की तुलना में करीब 70 प्रतिशत सस्ता है। जलमार्ग का उपयोग कच्चे माल और तैयार उत्पादों हिल के लिए एक महत्वपूर्ण क्षमता निहित है। इस दिशा में तटीय शिपिंग के जरिए इस्पात, सीमेंट, उर्वरक, पीओएल और खाद्यान्न के रूप में अन्य वस्तुओं की भी ढुलाई की जा रही है, जिसकी क्षमता वर्ष 2025 तक अतिरिक्त 80-85 बारे करोड़ टन की सीमा तक बढ़ाने का लक्ष्य है।
बेहतर विकल्प होगा जलमार्ग
देश में सड़क और रेल मार्ग के अलावा राष्ट्रीय जल परिवहन परियोजना माल ढुलाई की क्षमता बढ़ाएगी, जिसके लिए केंद्र सरकार ने देश में 111 नदियों को जलमार्ग में तब्दील करके जल परिवहन के रूप में एक किफायती विकल्प पर काम करना शुरू किया है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जल मार्ग को देश के परिवहन व्यवस्था में एक बेहतर कदम करार देते हुए कहते आ रहे हैं कि इस कदम से देश विदेश में माल भेजने के मद में होने वाले खर्च में भारी कमी आएगी और माल ढुलाई क्षमता में इजाफा होगा। हालांकि फिलहाल देश में पांच अंतर्राज्यीय जलमार्ग है, जिनके विस्तार के लिए 106 नए जलमार्ग शुरू करने की योजना को आगे बढ़ाया गया है। इसका मकसद सड़क व रेल मार्ग पर बढ़ते यातायात के बोझ को कम करना भी है। सरकार ने देश में 2000 वाटर पोर्ट्स बनाने की योजना तैयार की है।
30Oct-2016
राग दरबार: उल्टा चोर कोतवाल को डांटे..
संघर्ष विराम का उल्लंघन
भारत के खिलाफ आतंकवाद और फिर संघर्ष विराम का उल्लंघन कर आए दिन सीमा पर गोलाबारी, फायरिंग करने की हरकत से बाज आने को तैयार नहीं पाकिस्तान के लिए ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली कहावत सटीक बैठती है। मसलन अंतर्राष्टÑीय स्तर पर आतंकवाद का हिमायती के रूप में पहचाने जा रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का भारत को संघर्ष विराम का उल्लंघन करने का आरोप लगाकर दी जा रही चेतावनी इसी बात को साबित करती है। पाकिस्तान की ओर से अरसे से भारतीय सीमा पर निरंतर होते आ रहे ‘संघर्ष विराम’ उल्लंघन की जिस बात को दुनिया जान चुकी है, अब उसका ठींकरा पाकिस्तान अपने आपको ‘एक शांतिप्रिय देश’ साबित करने के प्रयास में भारत के सिर फोड़ने का प्रयास कर रहा है। मसलन चोरी और ऊपर से सीना जोरी पर उतारी पाकिस्तान यहां तक हिमाकत करने से नहीं चूका कि पाक के धैर्य की भी कोई सीमा है। विदेश और रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का पाकिस्तान के इस पैंतरे पर यही कहना है कि दुनियाभर के नक्शे पर आतंकवाद के पनाहगार के रूप में पहचाने जा चुके पाक के इस पैंतरे पर कोई विश्वास करने वाला नहीं है, भले ही वह भारत को संघर्ष विराम का उल्लंघन करने के आरोप पर सजा दिलाने की गीदड़ भभगी देता रहे। कश्मीर राग अलापने वाले पाकिस्तान की नीयत इतनी ही पाक साफ होती तो पहले वह आतंकवादियों के खिलाफ कार्यवाही करने की हिम्मत दिखाए, जो उसी के घर में आग लगाने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। विशेषज्ञ तो यही मान रहे है कि सीमा पर तनाव के बीच संघर्ष विराम के उल्लंघन और आतंकवादी घुसपैठ की कौशिशों को भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा मुहंतोड़ जवाब देने से अपने भारी नुकसान से हतप्रभ पाक पीएम शरीफ जो दावं अजमाने का प्रयास कर रहा है उसमें उसे अपनो से ही उल्टे मुहं की ही खाना पड़ेगी, जो भारत के खिलाफ अपनी नापाक हरकते करने की आदत में शुमार हो चुके पाक को भारी पड़ना तय है, इसलिए पाक की ऐसी धमकी इसी कहावत का पर्याय है कि ‘उल्टे चोर कोतवाल को डांटे..!
तो आज भी जावड़ेकर हैं पर्यावरण मंत्री...
मोदी कैबिनेट में फेरबदल को गुजरे करीब पांच महीने हो चुके हैं। सभी मंत्रियों ने अपने-अपने विभाग की जिम्मेदारी भी संभाल ली है। लेकिन बावजूद इसके सरकार में कई मंत्री ऐसे हैं जिन्हें उनके पुराने विभागों के नाम से ही आज भी जाना-पहचाना जा रहा है। यह वाकया बीते दिनों म्यांमार की लोकतंत्र समर्थित नेता आंग सान सू की के भारत दौरे के वक्त सामने आया। पड़ोसी मेहमान का राष्टÑपति भवन में औपचारिक स्वागत किया जाना था। इसके लिए राष्टÑपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर मौजूद थे। मेहमान के आगमन के साथ ही उनका परिचय मंत्रियों के करवाते वक्त प्रोटोकाल अधिकारी ने जावड़ेकर को एचआरडी के बजाय केंद्रीय पर्यावरण मंत्री बताकर परिचय करवा दिया। इसे जावड़ेकर ने तुरंत ठीक कर अपना नया परिचय उनके सामने रखा। परिचय की इस भूलचूक में और कुछ हुआ हो या नहीं लेकिन पर्यावरण के रूप में काम करने को लेकर जावड़ेकर की बनी पहचान तो जरूर उजागर हो गई।
नेता का सबसे बड़ा धर्मसंकट
उत्तर प्रदेश की सियासत में देश के राजनितिक पहलवान माने जाने वाले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव परिवारिक कलह को लेकर शायद पहली बार सबसे बड़े धर्मसंकट के दौर में हैं। कारण साफ है कि एक ओर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पिता होने के नाते मुलायम सिंह यादव ने बेटे को कुनबे के कई दूसरे लोगों को पार करके मुख्यमंत्री पद पर बैठाया। तो दूसरी ओर नेताजी की परछाई कहे जाने वाले शिवपाल यादव ने अपना जीवन मुलायम सिंह का हनुमान बनकर काट दिया है। या कुछ यूं कहिए कि झगडालू सियासी जमात में अभी भी पुराने संस्कार कुछ हद तक हैं। फिलहाल समाजवादी पार्टी का चेहरा अखिलेश हैं और मोहरा शिवपाल। इस सियासी संकट में देखा जाए तो समाजवादी विचारधारा से भले डिग गये पर व्यवहार बिल्कुल पुराना। एका, आरोप-प्रत्यारोप, टूट और फिर मिलन सब कुछ पहले जैसा। फिर भी फिलहाल यह कलह सुलझती नजर नहीं आई, लेकिन इसके प्रयास में ढकी-छिपी बातें जरूर सामने आ रही हैं। फिर भी देखा जाए तो विधायक दल का संख्या बल अखिलेश यादव के साथ है और इसी वजह से मुलायम सिंह कोई कठोर फैसला लेने के बजाए धर्मसंकट में फंसे हुए हैं, जिनकी राजनीतिक सूझबूझ का आकलन करना हर किसी की समझ से परे है। राजनीतिकारों की माने तो ऐसे राजनीतिक संकट में शिवपाल यादव ने आगामी चुनाव में गठजोड़ की सुगबुगहाट तेज करके संकेत दिये हैं, तो अखिलेश अलग रहा पकड़ सकते हैं। यही तो है नेता का सबसे बड़ा धर्मसंकट..।
-ओ.पी. पाल व कविता जोशी
30Oct-2016
भारत के खिलाफ आतंकवाद और फिर संघर्ष विराम का उल्लंघन कर आए दिन सीमा पर गोलाबारी, फायरिंग करने की हरकत से बाज आने को तैयार नहीं पाकिस्तान के लिए ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली कहावत सटीक बैठती है। मसलन अंतर्राष्टÑीय स्तर पर आतंकवाद का हिमायती के रूप में पहचाने जा रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का भारत को संघर्ष विराम का उल्लंघन करने का आरोप लगाकर दी जा रही चेतावनी इसी बात को साबित करती है। पाकिस्तान की ओर से अरसे से भारतीय सीमा पर निरंतर होते आ रहे ‘संघर्ष विराम’ उल्लंघन की जिस बात को दुनिया जान चुकी है, अब उसका ठींकरा पाकिस्तान अपने आपको ‘एक शांतिप्रिय देश’ साबित करने के प्रयास में भारत के सिर फोड़ने का प्रयास कर रहा है। मसलन चोरी और ऊपर से सीना जोरी पर उतारी पाकिस्तान यहां तक हिमाकत करने से नहीं चूका कि पाक के धैर्य की भी कोई सीमा है। विदेश और रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का पाकिस्तान के इस पैंतरे पर यही कहना है कि दुनियाभर के नक्शे पर आतंकवाद के पनाहगार के रूप में पहचाने जा चुके पाक के इस पैंतरे पर कोई विश्वास करने वाला नहीं है, भले ही वह भारत को संघर्ष विराम का उल्लंघन करने के आरोप पर सजा दिलाने की गीदड़ भभगी देता रहे। कश्मीर राग अलापने वाले पाकिस्तान की नीयत इतनी ही पाक साफ होती तो पहले वह आतंकवादियों के खिलाफ कार्यवाही करने की हिम्मत दिखाए, जो उसी के घर में आग लगाने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। विशेषज्ञ तो यही मान रहे है कि सीमा पर तनाव के बीच संघर्ष विराम के उल्लंघन और आतंकवादी घुसपैठ की कौशिशों को भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा मुहंतोड़ जवाब देने से अपने भारी नुकसान से हतप्रभ पाक पीएम शरीफ जो दावं अजमाने का प्रयास कर रहा है उसमें उसे अपनो से ही उल्टे मुहं की ही खाना पड़ेगी, जो भारत के खिलाफ अपनी नापाक हरकते करने की आदत में शुमार हो चुके पाक को भारी पड़ना तय है, इसलिए पाक की ऐसी धमकी इसी कहावत का पर्याय है कि ‘उल्टे चोर कोतवाल को डांटे..!
तो आज भी जावड़ेकर हैं पर्यावरण मंत्री...
मोदी कैबिनेट में फेरबदल को गुजरे करीब पांच महीने हो चुके हैं। सभी मंत्रियों ने अपने-अपने विभाग की जिम्मेदारी भी संभाल ली है। लेकिन बावजूद इसके सरकार में कई मंत्री ऐसे हैं जिन्हें उनके पुराने विभागों के नाम से ही आज भी जाना-पहचाना जा रहा है। यह वाकया बीते दिनों म्यांमार की लोकतंत्र समर्थित नेता आंग सान सू की के भारत दौरे के वक्त सामने आया। पड़ोसी मेहमान का राष्टÑपति भवन में औपचारिक स्वागत किया जाना था। इसके लिए राष्टÑपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर मौजूद थे। मेहमान के आगमन के साथ ही उनका परिचय मंत्रियों के करवाते वक्त प्रोटोकाल अधिकारी ने जावड़ेकर को एचआरडी के बजाय केंद्रीय पर्यावरण मंत्री बताकर परिचय करवा दिया। इसे जावड़ेकर ने तुरंत ठीक कर अपना नया परिचय उनके सामने रखा। परिचय की इस भूलचूक में और कुछ हुआ हो या नहीं लेकिन पर्यावरण के रूप में काम करने को लेकर जावड़ेकर की बनी पहचान तो जरूर उजागर हो गई।
नेता का सबसे बड़ा धर्मसंकट
उत्तर प्रदेश की सियासत में देश के राजनितिक पहलवान माने जाने वाले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव परिवारिक कलह को लेकर शायद पहली बार सबसे बड़े धर्मसंकट के दौर में हैं। कारण साफ है कि एक ओर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पिता होने के नाते मुलायम सिंह यादव ने बेटे को कुनबे के कई दूसरे लोगों को पार करके मुख्यमंत्री पद पर बैठाया। तो दूसरी ओर नेताजी की परछाई कहे जाने वाले शिवपाल यादव ने अपना जीवन मुलायम सिंह का हनुमान बनकर काट दिया है। या कुछ यूं कहिए कि झगडालू सियासी जमात में अभी भी पुराने संस्कार कुछ हद तक हैं। फिलहाल समाजवादी पार्टी का चेहरा अखिलेश हैं और मोहरा शिवपाल। इस सियासी संकट में देखा जाए तो समाजवादी विचारधारा से भले डिग गये पर व्यवहार बिल्कुल पुराना। एका, आरोप-प्रत्यारोप, टूट और फिर मिलन सब कुछ पहले जैसा। फिर भी फिलहाल यह कलह सुलझती नजर नहीं आई, लेकिन इसके प्रयास में ढकी-छिपी बातें जरूर सामने आ रही हैं। फिर भी देखा जाए तो विधायक दल का संख्या बल अखिलेश यादव के साथ है और इसी वजह से मुलायम सिंह कोई कठोर फैसला लेने के बजाए धर्मसंकट में फंसे हुए हैं, जिनकी राजनीतिक सूझबूझ का आकलन करना हर किसी की समझ से परे है। राजनीतिकारों की माने तो ऐसे राजनीतिक संकट में शिवपाल यादव ने आगामी चुनाव में गठजोड़ की सुगबुगहाट तेज करके संकेत दिये हैं, तो अखिलेश अलग रहा पकड़ सकते हैं। यही तो है नेता का सबसे बड़ा धर्मसंकट..।
-ओ.पी. पाल व कविता जोशी
30Oct-2016
शनिवार, 29 अक्टूबर 2016
अब एक कदम दूर केन-बेतवा परियोजना!
पर्यावरणीय मंजूरी मिलते ही शुरू होगा काम
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में सूखे और बाढ़ तथा जल संकट जैसी समस्या की चुनौती से निपटने के इरादे से अटल बिहारी वाजपेयी की नदियों को आपस में जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के तहत केन-बेतवा लिंक परियोजना इतिहास रचने के मुहाने पर है, जिसे वन्यजीव से हरी झंडी मिलने के बाद अब पर्यावरणीय मंजूरी का इंतजार बाकी है।
दरअसल मोदी सरकार ने देश में नदियों को आपस में जोड़ने की 30 परियोजनाओं को रडार पर रखा हुआ है, जिसमें इस परियोजना को फास्ट्र टेÑक पर लाने के बाद मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के लिए वरदान बनने जा रही करीब 9393 करोड़ की केन-बेतवा लिंक परियोजना देश की ऐसी पहली परियोजना होगी, जिससे देश में सूखे और बाढ़ की समस्या के साथ जल संकट को दूर करने में मदद मिलेगी। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना की दोनों राज्यों की सरकारों द्वारा सभी औपचारिकताएं पिछले साल ही पूरी हो चुकी हैं और डीपीआर के अनुसार परियोजना शुरू करने का पूरा खाका भी पहले से ही तैयार है। परियोजना की मंजूरी देने में वन्य एवं पर्यावरण मंत्रालय की वन्यजीव समिति रोड़ा बनी रही, जिससे खफा केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती को अनशन करने तक की चेतावनी देनी पड़ी। शायद उमा के इन तेवरों को देख मंत्रालय के तर्को को स्वीकार करते हुए अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले ही वन्यजीव समिति ने अपनी मंजूरी देकर इस परियोजना की राह आसान कर दी। अब केवल पर्यावरणीय मंजूरी का इंतजार है, जिसके लिए नई समिति गठित करने की प्रक्रिया के बाद हरी झंडी मिलने की उम्मीद है। इसके लिए केंद्रीय मंत्री उमा भारती उत्साहित है कि पर्यावरणीय मंजूरी मिलते ही जल्द ही केन-बेतवा परियोजना लांच कर दी जाएगी। इस परियोजना के शुरू होने से मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में जल संकट से जूझ रहे बुंदेलखंड क्षेत्र के 70 लाख लोगों की खुशहाली का मार्ग प्रशस्त होगा, जिन्हें पर्याप्त पानी, फसलों की सिंचाई और रोजगार की समस्या से भी निजात मिलेगी।
क्या होगा परियोजना का खाका
मंत्रालय के अनुसार मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश की इस केन-बेतवा परियोजना के तहत लिंक नहर की कुल लंबाई 221 किलोमीटर होगी, जिसमें दो किलोमीटर की सुरंग भी बनेगी। बरसात में केन नदी से आने वाले पानी को रोकने के लिए खजुराहो के निकट गंगऊ वियर से ढाई किलोमीटर दूर दौधन बांध बनेगा। 77 मीटर ऊंचे इस बांध की क्षमता 2953 मीट्रिक घन मीटर होगी। बांध पर 78 मेगावाट क्षमता की दो विद्युत उत्पादन इकाइयां भी स्थापित होंगी। इनमें एक उत्पादन इकाई बांध पर और दूसरी दो किलोमीटर दूर बनने वाली सुरंग के पास स्थापित होगी। यहां से आने वाला पानी बरुआसागर झील में मिलने के बाद बेतवा नदी में पहुंचेगा।
खासबात है कि परियोजना के तहत 1700-1700 मिलियन घन मीटर पानी मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश को मिलेगा। इस परियोजना से जहां मध्यप्रदेश के छतरपुर, टीकमगढ़ एवं पन्ना जिले की 3,69,881 हेक्टेयर भूमि, तो वहीं उत्तर प्रदेश के महोबा, बांदा व झांसी जिले की 2,65,780 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई क्षमत में वृद्धि होगी, जिसमें झांसी जिले की 6,35,661 हेक्टेयर कृषि भूमि भी शामिल है। इसके अलावा इस परियोजना के मार्ग में पड़ने वाली 13.42 लाख जनसंख्या को 49 मिलियन क्यूबिक मीटर पेयजल की उपलब्धता से लोगों की प्यास भी बुझेगी।
राष्ट्रीय मॉडल तैयार
मंत्रालय के अनुसार एमपी व यूपी के बुंदेलखंड की महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना ने अपना कागजी सफर पूरा कर लिया है। राष्ट्रीय विकास अभिकरण ने हाल ही में इस परियोजना का राष्ट्रीय मॉडल भी तैयार कर लिया है। 18/20 फीट के इस मॉडल को इस माह के अंत तक झांसी लाया जाएगा। झांसी में इस मॉडल को राजघाट कालोनी स्थित नदी बेतवा परिषद कार्यालय प्रांगण में जन मानस के अवलोकनार्थ रखा जाएगा। संबंधित विभाग के अफसरों ने परियोजना का शिलान्यास दिसंबर या नए साल की शुरूआत में होने की उम्मीद है। केंद्रीय जल संसाधन राज्य मंत्री संजीव बालियान ने कहा कि केन-बेतवा लिंक परियोजना का निर्माण पर्यावरीय मंजूरी मिलते अगले दिसंबर में ही शुरू कर दिया जाएगा। पर्यावरण विभाग वाइल्ड लाईफ से एनओसी मिलना शेष रह गया है, जो किसी भी क्षण अपेक्षित है। केन बेतवा नदी जोड़ो परियोजना बुन्देलखण्ड अंचल के लिए दैवीय वरदान साबित होगी, क्योंकि इसके पूर्ण हो जाने पर इस अंचल को सूखा और बाढ़ की विभीषिका से मुक्ति मिल जायेगी।
29Oct-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में सूखे और बाढ़ तथा जल संकट जैसी समस्या की चुनौती से निपटने के इरादे से अटल बिहारी वाजपेयी की नदियों को आपस में जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के तहत केन-बेतवा लिंक परियोजना इतिहास रचने के मुहाने पर है, जिसे वन्यजीव से हरी झंडी मिलने के बाद अब पर्यावरणीय मंजूरी का इंतजार बाकी है।
दरअसल मोदी सरकार ने देश में नदियों को आपस में जोड़ने की 30 परियोजनाओं को रडार पर रखा हुआ है, जिसमें इस परियोजना को फास्ट्र टेÑक पर लाने के बाद मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के लिए वरदान बनने जा रही करीब 9393 करोड़ की केन-बेतवा लिंक परियोजना देश की ऐसी पहली परियोजना होगी, जिससे देश में सूखे और बाढ़ की समस्या के साथ जल संकट को दूर करने में मदद मिलेगी। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना की दोनों राज्यों की सरकारों द्वारा सभी औपचारिकताएं पिछले साल ही पूरी हो चुकी हैं और डीपीआर के अनुसार परियोजना शुरू करने का पूरा खाका भी पहले से ही तैयार है। परियोजना की मंजूरी देने में वन्य एवं पर्यावरण मंत्रालय की वन्यजीव समिति रोड़ा बनी रही, जिससे खफा केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती को अनशन करने तक की चेतावनी देनी पड़ी। शायद उमा के इन तेवरों को देख मंत्रालय के तर्को को स्वीकार करते हुए अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले ही वन्यजीव समिति ने अपनी मंजूरी देकर इस परियोजना की राह आसान कर दी। अब केवल पर्यावरणीय मंजूरी का इंतजार है, जिसके लिए नई समिति गठित करने की प्रक्रिया के बाद हरी झंडी मिलने की उम्मीद है। इसके लिए केंद्रीय मंत्री उमा भारती उत्साहित है कि पर्यावरणीय मंजूरी मिलते ही जल्द ही केन-बेतवा परियोजना लांच कर दी जाएगी। इस परियोजना के शुरू होने से मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में जल संकट से जूझ रहे बुंदेलखंड क्षेत्र के 70 लाख लोगों की खुशहाली का मार्ग प्रशस्त होगा, जिन्हें पर्याप्त पानी, फसलों की सिंचाई और रोजगार की समस्या से भी निजात मिलेगी।
क्या होगा परियोजना का खाका
मंत्रालय के अनुसार मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश की इस केन-बेतवा परियोजना के तहत लिंक नहर की कुल लंबाई 221 किलोमीटर होगी, जिसमें दो किलोमीटर की सुरंग भी बनेगी। बरसात में केन नदी से आने वाले पानी को रोकने के लिए खजुराहो के निकट गंगऊ वियर से ढाई किलोमीटर दूर दौधन बांध बनेगा। 77 मीटर ऊंचे इस बांध की क्षमता 2953 मीट्रिक घन मीटर होगी। बांध पर 78 मेगावाट क्षमता की दो विद्युत उत्पादन इकाइयां भी स्थापित होंगी। इनमें एक उत्पादन इकाई बांध पर और दूसरी दो किलोमीटर दूर बनने वाली सुरंग के पास स्थापित होगी। यहां से आने वाला पानी बरुआसागर झील में मिलने के बाद बेतवा नदी में पहुंचेगा।
खासबात है कि परियोजना के तहत 1700-1700 मिलियन घन मीटर पानी मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश को मिलेगा। इस परियोजना से जहां मध्यप्रदेश के छतरपुर, टीकमगढ़ एवं पन्ना जिले की 3,69,881 हेक्टेयर भूमि, तो वहीं उत्तर प्रदेश के महोबा, बांदा व झांसी जिले की 2,65,780 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई क्षमत में वृद्धि होगी, जिसमें झांसी जिले की 6,35,661 हेक्टेयर कृषि भूमि भी शामिल है। इसके अलावा इस परियोजना के मार्ग में पड़ने वाली 13.42 लाख जनसंख्या को 49 मिलियन क्यूबिक मीटर पेयजल की उपलब्धता से लोगों की प्यास भी बुझेगी।
राष्ट्रीय मॉडल तैयार
मंत्रालय के अनुसार एमपी व यूपी के बुंदेलखंड की महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना ने अपना कागजी सफर पूरा कर लिया है। राष्ट्रीय विकास अभिकरण ने हाल ही में इस परियोजना का राष्ट्रीय मॉडल भी तैयार कर लिया है। 18/20 फीट के इस मॉडल को इस माह के अंत तक झांसी लाया जाएगा। झांसी में इस मॉडल को राजघाट कालोनी स्थित नदी बेतवा परिषद कार्यालय प्रांगण में जन मानस के अवलोकनार्थ रखा जाएगा। संबंधित विभाग के अफसरों ने परियोजना का शिलान्यास दिसंबर या नए साल की शुरूआत में होने की उम्मीद है। केंद्रीय जल संसाधन राज्य मंत्री संजीव बालियान ने कहा कि केन-बेतवा लिंक परियोजना का निर्माण पर्यावरीय मंजूरी मिलते अगले दिसंबर में ही शुरू कर दिया जाएगा। पर्यावरण विभाग वाइल्ड लाईफ से एनओसी मिलना शेष रह गया है, जो किसी भी क्षण अपेक्षित है। केन बेतवा नदी जोड़ो परियोजना बुन्देलखण्ड अंचल के लिए दैवीय वरदान साबित होगी, क्योंकि इसके पूर्ण हो जाने पर इस अंचल को सूखा और बाढ़ की विभीषिका से मुक्ति मिल जायेगी।
29Oct-2016
गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016
सपा के अंतर्कलह से आहत है जनता परिवार!
एकजुटता पर फिर मंथन करने की तैयारी में दल
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
जनता परिवार की खंडित ताकत को मजबूत करने वाले मुलायम ही आज अपने परिवार में एक भस्मासुर की भूमिका में नजर आ रहे हैं, तो डा. राम मनोहर लोहिया के सिद्धांतों की दुहाई देकर समाजवाद को संजीवनी देकर एकजुट करने वाले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की पार्टी और परिवार में अंतर्कलह जनता परिवार के सभी दलों के लिए आहत होना स्वाभाविक है। माना जा रहा है कि जनता परिवार जल्द ही समाजवादी दलों की एकजुटता के लिए बैठक बुलाकर मंथन करने की तैयारी में हैं।
सपा प्रमुख की अगुवाई में जनता परिवार के अलग-अलग रास्तो पर बंटे दलों को एकजुट करके एक संयुक्त राजनीतिक पार्टी बनाने की कवायद को सपा में पिछले कई माह से चल रही आंतरिक कलह परेशानी का सबब बनी हुई है। क्योंकि समाजवादी पार्टी ही जनता परिवार की खंडित ताकत को समय-समय पर संजीवनी देने का प्रयास किया है और सपा प्रमुख इसके अलावा कई दलों के लिए खैवनहार साबित हुए हैं। ऐसे में लोहिया के सिद्धांतों को बरकरार रखने वाले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव भले ही समाजवाद की नई परिभाषा गढ़ते हुए जनता परिवार को एकजुट करने की मिसाल पेश की हो, लेकिन खुद की पार्टी और परिवार के खुलेआम तलवारें खींचने की चरम पर पहुंची कलह जनता परिवार के दलों और सदस्यों को आहत कर रही है। सपा के घटनाक्रम पर हरिभूमि की जनता परिवार के दलों के नेताओं से बातचीत की है, जिनकी टीस जनता परिवार की एकजुटता में सपा की कलह साफतौर से झलकती नजर आई।
धर्मनिरपेक्षता के कमजोर होने की टीस
जद-यू के वरिष्ठ नेता व प्रवक्ता केसी त्यागी सपा परिवार में चल रही लड़ाई से इसलिए आहत नजर आए कि सपा के इस अंदरूनी संग्राम से धर्मनिरपेक्षता का संघर्ष मजबूत होने से पहले ही कमजोर हो जाएगा। त्यागी ने सपा परिवार में चल रहे घटनाक्रम को दुखदायी करार देते हुए कहा कि हालांकि उम्मीद है कि मुलायम इस परिवारिक मामले को सहजता से सुलझा लेंगे, लेकिन जनता परविार की एकता के लिए इस संदेश सकारात्मक नहीं है। राकांपा के वरिष्ठ नेता व प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी भी मुलायम परिवार की कलह को लेकर आश्चर्यचकित है जिनका कहना है कि सपा जनता परिवार के लिहाज से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दल है और पूरा जनता परिवार चाहता है कि वह आंतरिक मामले से बाहर आकर धर्मनिरपेक्ष ताकतों को शक्तिशाली बनाने की मुहिम को आगे बढ़ाएं। इसी प्रकार रालोद नेता जयंत चौधरी ने भी सपा के घर में चल रही लड़ाई पर अफसोस व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे पारिवारिक मामले में जनता परिवार को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है जिसके लिए मुलायम खुद सक्षम है। इससे पहले राजद प्रमुख लालू यदव ऐसी ही उम्मीद पहले लगाकर अपनी टीस उजागर कर चुके हैं। वहीं इनेलो सांसद दुष्यंत चौटाला भी सपा परिवार के बीच चल रही आंतरिक जंग को लेकर चिंता में नजर आए, जिनका कहना है कि यह पारिवारिक मामला होने के कारण किसी अन्य का हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा। हां जनता परिवार की एकता के लिए जल्द ही एक बैठक बुलाकर इस बात पर मंथन किया जा सकता है कि जनता परिवार की एकजुटता की अगुवाई वाली सपा के प्रमुख जल्द ही इस मामले को नहीं सुलझाते तो इससे समाजवादी की एकजुटता ओर धर्मनिरपेक्षता की शुरू की गई लड़ाई ज्यादा कमजोर होगी।
खतरे में जनता परिवार की एकता
गौरतलब है कि करीब दो साल पहले सपा प्रमुख मुलायम सिंह की पहल पर जनता परिवार के तितर-बितर दलों जद-यू, राजद, जदएस,रालोद, इनेलो को एकजुट करके राष्ट्रीय स्तर पर एक संयुक्त राजनीतिक दल बनाने की कवायद तेजी के साथ शुरू की गई थी,जिसका मकसद गैरभाजपा व गैर कांग्रेस की नीतियों का विरोध करके धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई को मजबूत करना था। इस परिवार में जनता परिवार में बीजू जनता दल और ऐसे अन्य दलों को भी साथ लेने की तैयारी की गई, लेकिन कई महत्वपूर्ण फैसलों के बावजूद संयुक्त राजनीतिक दल और उसके चुनाव चिन्ह को लेकर मामला अधर में लटका रहा, जिसकी राह करीब चार माह पहले यूपी चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में शुरू हुई परिवारिक कलह ने फिलहाल रोक दी है। राजनीतिकारों की माने तो यदि सपा की आंतरिक रार ऐसे ही चलती रही तो जनता परिवार में शामिल दलों की भी राहें अलग-अलग हो सकती है और उनकी एकता होने से पहले ही खतरे में पड़ सकती है।
ऐसे शुरू हुई थी मुहिम
देश की धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई को मजबूत करने के मकसद से 23 जनवरी 1977 को जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस की नीतियों और रणनीतियों के तंग आकर जनता पार्टी का गठन किया था, जिसके बाद इस जनता पार्टी से कई दलों की शाखाएं फूट-फूटकर अलग राहे पकड़ती नजर आई। मसलन देश की राजनीतिक में एक बड़ा बदलाव सामने आया और जनता पार्टी के उस दौर से निकलने के बाद हुए बिखराव ने कई नई सियासी पार्टियों को जन्म दिया। नतीजतन जनता दल, जद-यू , बीजद, जद-एस,सपा, राजद समेत और भी कई दल क्षेत्रीय राजनीति के क्षितिज पर उभरते नजर आए। यह जरूर है कि कुछ दलों के सितारे बुलंदियों तक पहुंचे और कुछ फिके पड़ने के कारण अन्य दलों के साथ विलय का सहारा बने। ऐसे ही दलों में यूपी जैसे बड़े सूबे में सपा ने सत्ता की हनक, धमक और चकाचौंध का लुत्फ लिया, लेकिन सियासत के शबाब में मुखिया मुलायम सिंह के पैंतरे ने एक परिवारिक संग्राम को हवा दी,जिसका पटाक्षेप होने का इंतजार है।
रार के बीच महागठबंधन की सुगबुगाहट
उत्तर प्रदेश के ‘समाजवादी कुनबे’ में छिड़ी वर्चस्व की जंग के बीच सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की अगुवाई में एक महागठबंधन बनने की सुगबुगाहट शुरू हो गयी है और आगामी पांच नवम्बर को पार्टी के रजत जयन्ती कार्यक्रम में इस सिलसिले में कोई अहम एलान हो सकता है। सपा के प्रान्तीय अध्यक्ष शिवपाल यादव ने आज पार्टी राज्य मुख्यालय पर संवाददाताओं से संक्षिप्त बातचीत में सभी लोहियावादी और चौधरी चरण सिंह वादी लोगों को एक मंच पर लाने की जरूरत बतायी।
उन्होंने कहा, हम किसी भी कीमत पर साम्प्रदायिक शक्तियों को हराना चाहते हैं। इसके लिये लोहियावादी और चौधरी चरणसिंहवादी लोगों को एक मंच पर लाना होगा। इस बीच, सपा के सूत्रों ने बताया कि आगामी पांच नवम्बर को आयोजित होने वाले पार्टी के रजत जयन्ती समारोह में शिरकत के लिये चौधरी चरण सिंह के पुत्र राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह, जनता दल यूनाइडेट के अध्यक्ष बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जनता दल सेक्युलर प्रमुख पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा समेत सभी प्रमुख समाजवादी तथा चरणसिंहवादी नेताओं को निमंत्रण भेजा गया है। सूत्रों का यह भी कहना है कि सपा आगामी पांच नवम्बर को होने वाले कार्यक्रम में अपना शक्ति प्रदर्शन करना चाहती है और इस मौके पर महागठबंधन का एलान होने के मजबूत संकेत हैं।यह घटनाक्रम ऐसे वक्त हुआ है जब समाजवादी परिवार में चाचा शिवपाल सिंह यादव और उनके भतीजे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच वर्चस्व का टकराव चरम पर है।
27Oct-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
जनता परिवार की खंडित ताकत को मजबूत करने वाले मुलायम ही आज अपने परिवार में एक भस्मासुर की भूमिका में नजर आ रहे हैं, तो डा. राम मनोहर लोहिया के सिद्धांतों की दुहाई देकर समाजवाद को संजीवनी देकर एकजुट करने वाले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की पार्टी और परिवार में अंतर्कलह जनता परिवार के सभी दलों के लिए आहत होना स्वाभाविक है। माना जा रहा है कि जनता परिवार जल्द ही समाजवादी दलों की एकजुटता के लिए बैठक बुलाकर मंथन करने की तैयारी में हैं।
सपा प्रमुख की अगुवाई में जनता परिवार के अलग-अलग रास्तो पर बंटे दलों को एकजुट करके एक संयुक्त राजनीतिक पार्टी बनाने की कवायद को सपा में पिछले कई माह से चल रही आंतरिक कलह परेशानी का सबब बनी हुई है। क्योंकि समाजवादी पार्टी ही जनता परिवार की खंडित ताकत को समय-समय पर संजीवनी देने का प्रयास किया है और सपा प्रमुख इसके अलावा कई दलों के लिए खैवनहार साबित हुए हैं। ऐसे में लोहिया के सिद्धांतों को बरकरार रखने वाले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव भले ही समाजवाद की नई परिभाषा गढ़ते हुए जनता परिवार को एकजुट करने की मिसाल पेश की हो, लेकिन खुद की पार्टी और परिवार के खुलेआम तलवारें खींचने की चरम पर पहुंची कलह जनता परिवार के दलों और सदस्यों को आहत कर रही है। सपा के घटनाक्रम पर हरिभूमि की जनता परिवार के दलों के नेताओं से बातचीत की है, जिनकी टीस जनता परिवार की एकजुटता में सपा की कलह साफतौर से झलकती नजर आई।
धर्मनिरपेक्षता के कमजोर होने की टीस
जद-यू के वरिष्ठ नेता व प्रवक्ता केसी त्यागी सपा परिवार में चल रही लड़ाई से इसलिए आहत नजर आए कि सपा के इस अंदरूनी संग्राम से धर्मनिरपेक्षता का संघर्ष मजबूत होने से पहले ही कमजोर हो जाएगा। त्यागी ने सपा परिवार में चल रहे घटनाक्रम को दुखदायी करार देते हुए कहा कि हालांकि उम्मीद है कि मुलायम इस परिवारिक मामले को सहजता से सुलझा लेंगे, लेकिन जनता परविार की एकता के लिए इस संदेश सकारात्मक नहीं है। राकांपा के वरिष्ठ नेता व प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी भी मुलायम परिवार की कलह को लेकर आश्चर्यचकित है जिनका कहना है कि सपा जनता परिवार के लिहाज से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दल है और पूरा जनता परिवार चाहता है कि वह आंतरिक मामले से बाहर आकर धर्मनिरपेक्ष ताकतों को शक्तिशाली बनाने की मुहिम को आगे बढ़ाएं। इसी प्रकार रालोद नेता जयंत चौधरी ने भी सपा के घर में चल रही लड़ाई पर अफसोस व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे पारिवारिक मामले में जनता परिवार को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है जिसके लिए मुलायम खुद सक्षम है। इससे पहले राजद प्रमुख लालू यदव ऐसी ही उम्मीद पहले लगाकर अपनी टीस उजागर कर चुके हैं। वहीं इनेलो सांसद दुष्यंत चौटाला भी सपा परिवार के बीच चल रही आंतरिक जंग को लेकर चिंता में नजर आए, जिनका कहना है कि यह पारिवारिक मामला होने के कारण किसी अन्य का हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा। हां जनता परिवार की एकता के लिए जल्द ही एक बैठक बुलाकर इस बात पर मंथन किया जा सकता है कि जनता परिवार की एकजुटता की अगुवाई वाली सपा के प्रमुख जल्द ही इस मामले को नहीं सुलझाते तो इससे समाजवादी की एकजुटता ओर धर्मनिरपेक्षता की शुरू की गई लड़ाई ज्यादा कमजोर होगी।
खतरे में जनता परिवार की एकता
गौरतलब है कि करीब दो साल पहले सपा प्रमुख मुलायम सिंह की पहल पर जनता परिवार के तितर-बितर दलों जद-यू, राजद, जदएस,रालोद, इनेलो को एकजुट करके राष्ट्रीय स्तर पर एक संयुक्त राजनीतिक दल बनाने की कवायद तेजी के साथ शुरू की गई थी,जिसका मकसद गैरभाजपा व गैर कांग्रेस की नीतियों का विरोध करके धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई को मजबूत करना था। इस परिवार में जनता परिवार में बीजू जनता दल और ऐसे अन्य दलों को भी साथ लेने की तैयारी की गई, लेकिन कई महत्वपूर्ण फैसलों के बावजूद संयुक्त राजनीतिक दल और उसके चुनाव चिन्ह को लेकर मामला अधर में लटका रहा, जिसकी राह करीब चार माह पहले यूपी चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में शुरू हुई परिवारिक कलह ने फिलहाल रोक दी है। राजनीतिकारों की माने तो यदि सपा की आंतरिक रार ऐसे ही चलती रही तो जनता परिवार में शामिल दलों की भी राहें अलग-अलग हो सकती है और उनकी एकता होने से पहले ही खतरे में पड़ सकती है।
ऐसे शुरू हुई थी मुहिम
देश की धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई को मजबूत करने के मकसद से 23 जनवरी 1977 को जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस की नीतियों और रणनीतियों के तंग आकर जनता पार्टी का गठन किया था, जिसके बाद इस जनता पार्टी से कई दलों की शाखाएं फूट-फूटकर अलग राहे पकड़ती नजर आई। मसलन देश की राजनीतिक में एक बड़ा बदलाव सामने आया और जनता पार्टी के उस दौर से निकलने के बाद हुए बिखराव ने कई नई सियासी पार्टियों को जन्म दिया। नतीजतन जनता दल, जद-यू , बीजद, जद-एस,सपा, राजद समेत और भी कई दल क्षेत्रीय राजनीति के क्षितिज पर उभरते नजर आए। यह जरूर है कि कुछ दलों के सितारे बुलंदियों तक पहुंचे और कुछ फिके पड़ने के कारण अन्य दलों के साथ विलय का सहारा बने। ऐसे ही दलों में यूपी जैसे बड़े सूबे में सपा ने सत्ता की हनक, धमक और चकाचौंध का लुत्फ लिया, लेकिन सियासत के शबाब में मुखिया मुलायम सिंह के पैंतरे ने एक परिवारिक संग्राम को हवा दी,जिसका पटाक्षेप होने का इंतजार है।
रार के बीच महागठबंधन की सुगबुगाहट
उत्तर प्रदेश के ‘समाजवादी कुनबे’ में छिड़ी वर्चस्व की जंग के बीच सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की अगुवाई में एक महागठबंधन बनने की सुगबुगाहट शुरू हो गयी है और आगामी पांच नवम्बर को पार्टी के रजत जयन्ती कार्यक्रम में इस सिलसिले में कोई अहम एलान हो सकता है। सपा के प्रान्तीय अध्यक्ष शिवपाल यादव ने आज पार्टी राज्य मुख्यालय पर संवाददाताओं से संक्षिप्त बातचीत में सभी लोहियावादी और चौधरी चरण सिंह वादी लोगों को एक मंच पर लाने की जरूरत बतायी।
उन्होंने कहा, हम किसी भी कीमत पर साम्प्रदायिक शक्तियों को हराना चाहते हैं। इसके लिये लोहियावादी और चौधरी चरणसिंहवादी लोगों को एक मंच पर लाना होगा। इस बीच, सपा के सूत्रों ने बताया कि आगामी पांच नवम्बर को आयोजित होने वाले पार्टी के रजत जयन्ती समारोह में शिरकत के लिये चौधरी चरण सिंह के पुत्र राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह, जनता दल यूनाइडेट के अध्यक्ष बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जनता दल सेक्युलर प्रमुख पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा समेत सभी प्रमुख समाजवादी तथा चरणसिंहवादी नेताओं को निमंत्रण भेजा गया है। सूत्रों का यह भी कहना है कि सपा आगामी पांच नवम्बर को होने वाले कार्यक्रम में अपना शक्ति प्रदर्शन करना चाहती है और इस मौके पर महागठबंधन का एलान होने के मजबूत संकेत हैं।यह घटनाक्रम ऐसे वक्त हुआ है जब समाजवादी परिवार में चाचा शिवपाल सिंह यादव और उनके भतीजे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच वर्चस्व का टकराव चरम पर है।
27Oct-2016
बुधवार, 26 अक्टूबर 2016
सड़क खराब हुई, तो इंजीनियरों की खैर नहीं!
सड़क हादसों के आधार पर तय होगी सड़कों की गुणवत्ता
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में सरकार के अनेक ठोस कदमों के बावजूद सड़कों पर होने वाले हादसों और उनमें होने वाली मौतों में कमी को लेकर दुनियाभर में कलंक जैसी फजीहत झेल रही सरकार ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि सड़क निर्माण की गुणवत्ता के लिए सड़क निर्माण क्षेत्र में कार्यरत इंजीनियर जिम्मेदार होंगे। ऐसे इंजीनियरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई अमल में लाने के साथ ही सुरक्षित सड़कों के लिए बेहतर काम करने वालों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाएगा।
दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले भारत में सबसे ज्यादा सड़क हादसों को लेकर केंद्र सरकार चिंतित है, जिसके लिए अगले दो साल में इन हादसों को 50 फीसदी कम करने के लक्ष्य पर कई योजनाओं के जरिए अनेक ठोस कदम उठाए गये हैं। देश के विभिन्न राज्यों में सडक सुरक्षा को लेकर सड़क निर्माण में जुटे वर्ग व कंपनियों की कार्यशालाएं आयोजित करने के बाद मंगलवार को यहां नई दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर सड़क सुरक्षा के इंजीनियरिंग उपायो पर एक कार्यशाला में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने सड़क निर्माण क्षेत्र के इंजीनियरों को नसीहत देते हुए दो टूक शब्दो में कह दिया है कि सड़क निर्माण की गुणवत्ता खराब निकलने के लिए इंजीनियरों और उनसे संबन्धित अधिकारियों को सीधे जिम्मेदार ही नहीं ठहराया जाएगा, बल्कि उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई अमल में लायी जाएगी। सड़क सुरक्षा में निर्माण की गुणवत्ता को अगले साल मार्च में होने वाली समीक्षा में सड़क हादसों की स्थिति के आधार पर तय किया जाएगा। गडकरी ने कहा कि सरकार का लक्ष्य स्पष्ट है कि देश में सड़क हादसों में लोेगों आकस्मिक मौतों पर अंकुश लगाना है। इसके लिए सुरक्षित सड़क निर्माण प्राथमिकता है। गडकरी ने कहा कि केंद्र सरकार ने सभी परियोजना निदेशकों और राजमार्ग परियोजनाओं के क्षेत्रीय अधिकारियों को अधिकार दिये हैं कि वे स्थानीय स्तर की समस्या को समझकर सड़क निर्माण के डिजाइन तैयार करने के लिए एक संवेदनशील, समझदार, समयबद्ध अपनाने और उन्मुख दृष्टिकोण के तहत ब्लैक स्पॉट या अन्य मार्गो को दुरस्त करने में आगे आएं। उन्होंने कहा कि सरल एवं सुनियोजित डिजाइन जैसे कि रोड डिवाइडर की समुचित ऊंचाई सड़कों पर सुरक्षा सुनिश्चित करने में अत्यंत कारगर साबित हो सकती है। गडकरी ने सभी परियोजना निदेशकों और राजमार्ग परियोजनाओं के क्षेत्रीय अधिकारियों से सड़क दुर्घटनाओं की समस्या से निपटने के लिए एक संवेदनशील, समयबद्ध एवं परिणाम उन्मुख अवधारणा अपनाने के साथ-साथ दुर्घटना वाले ब्लैक स्पॉट्स को एक मिशन के रूप में दुरुस्त करने की अपील की है।
जल्द आएगा सड़क सुरक्षा बिल
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने बताया कि सड़कों पर होने वाले हादसों को लेकर यातायात नियमों को सख्त बनाने और सामने आ रहे अन्य कारणों पर शिकंजा कसने के लिए संसद में लंबित नया सड़क सुरक्षा विधेयक जल्द ही पारित कराने का प्रयास किया जा रहा है,जिसके अगले महीने संसद के शीतकालीन सत्र में पारित होने की उम्मीद है। इस कानून में एक बहु-आयामी रणनीति के तहत उपाय किये गये हैं। सरकार ने इस काननू में इंजीनियरों और सड़क निर्माण कंपनियों से सड़कों की सुरक्षा, उसके उपयोग कर्ताओं के हितों और आॅटो मोबाइल इंजीनियरिंग, वाहन चालकों की क्षमता जैसे ऐसे सभी बिंदुओं को नए सड़क सुरक्षा कानून में संशोािधत प्रावाधानों के तहत शामिल किया है, जिनके जरिए देश में सड़क हादसों और उनके कारण असामयिक मौत का शिकार हो रहे लोगों क जान बचाई जा सके। उन्होंने साफ कहा कि इसके लिए सड़कों के सुरक्षित डिजाइन के तहत निर्माण सबसे जरूरी है, जिसके लिए सड़क निर्माण के लिए डिजाइन तैयार करने ओर निर्माण की गुणवत्ता उच्च कोटि की रखने की जिम्मेदार इंजीनियरों और संबन्धित लोगों की है।
मिशन मोड़ पर दुरस्त होंगे ब्लैक स्पॉट
देशभर में दुर्घटनाग्रस्त क्षेत्रों को ब्लैक स्पॉट के रूप में चिन्हित करके सड़कों को सुरक्षित डिजाइन के तहत दुरस्त करने के लिए मिशन मोड शुरू किया गया है। सरकार ने राज्य सरकारों की पुलिस के जरिए संभावित दुर्घटनाग्रस्त इलाकों को ब्लैक स्पॉट के रूप में चिन्हित करने का काम पूरा कर लिया है, जिसमें करीब 380 ऐसे स्थान हैं जहां इन ब्लैक स्पॉट को मिशन मोड पर सुरक्षित डिजाइन के रूप दुरस्त करने का काम जारी है।
26Oct-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में सरकार के अनेक ठोस कदमों के बावजूद सड़कों पर होने वाले हादसों और उनमें होने वाली मौतों में कमी को लेकर दुनियाभर में कलंक जैसी फजीहत झेल रही सरकार ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि सड़क निर्माण की गुणवत्ता के लिए सड़क निर्माण क्षेत्र में कार्यरत इंजीनियर जिम्मेदार होंगे। ऐसे इंजीनियरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई अमल में लाने के साथ ही सुरक्षित सड़कों के लिए बेहतर काम करने वालों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाएगा।
दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले भारत में सबसे ज्यादा सड़क हादसों को लेकर केंद्र सरकार चिंतित है, जिसके लिए अगले दो साल में इन हादसों को 50 फीसदी कम करने के लक्ष्य पर कई योजनाओं के जरिए अनेक ठोस कदम उठाए गये हैं। देश के विभिन्न राज्यों में सडक सुरक्षा को लेकर सड़क निर्माण में जुटे वर्ग व कंपनियों की कार्यशालाएं आयोजित करने के बाद मंगलवार को यहां नई दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर सड़क सुरक्षा के इंजीनियरिंग उपायो पर एक कार्यशाला में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने सड़क निर्माण क्षेत्र के इंजीनियरों को नसीहत देते हुए दो टूक शब्दो में कह दिया है कि सड़क निर्माण की गुणवत्ता खराब निकलने के लिए इंजीनियरों और उनसे संबन्धित अधिकारियों को सीधे जिम्मेदार ही नहीं ठहराया जाएगा, बल्कि उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई अमल में लायी जाएगी। सड़क सुरक्षा में निर्माण की गुणवत्ता को अगले साल मार्च में होने वाली समीक्षा में सड़क हादसों की स्थिति के आधार पर तय किया जाएगा। गडकरी ने कहा कि सरकार का लक्ष्य स्पष्ट है कि देश में सड़क हादसों में लोेगों आकस्मिक मौतों पर अंकुश लगाना है। इसके लिए सुरक्षित सड़क निर्माण प्राथमिकता है। गडकरी ने कहा कि केंद्र सरकार ने सभी परियोजना निदेशकों और राजमार्ग परियोजनाओं के क्षेत्रीय अधिकारियों को अधिकार दिये हैं कि वे स्थानीय स्तर की समस्या को समझकर सड़क निर्माण के डिजाइन तैयार करने के लिए एक संवेदनशील, समझदार, समयबद्ध अपनाने और उन्मुख दृष्टिकोण के तहत ब्लैक स्पॉट या अन्य मार्गो को दुरस्त करने में आगे आएं। उन्होंने कहा कि सरल एवं सुनियोजित डिजाइन जैसे कि रोड डिवाइडर की समुचित ऊंचाई सड़कों पर सुरक्षा सुनिश्चित करने में अत्यंत कारगर साबित हो सकती है। गडकरी ने सभी परियोजना निदेशकों और राजमार्ग परियोजनाओं के क्षेत्रीय अधिकारियों से सड़क दुर्घटनाओं की समस्या से निपटने के लिए एक संवेदनशील, समयबद्ध एवं परिणाम उन्मुख अवधारणा अपनाने के साथ-साथ दुर्घटना वाले ब्लैक स्पॉट्स को एक मिशन के रूप में दुरुस्त करने की अपील की है।
जल्द आएगा सड़क सुरक्षा बिल
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने बताया कि सड़कों पर होने वाले हादसों को लेकर यातायात नियमों को सख्त बनाने और सामने आ रहे अन्य कारणों पर शिकंजा कसने के लिए संसद में लंबित नया सड़क सुरक्षा विधेयक जल्द ही पारित कराने का प्रयास किया जा रहा है,जिसके अगले महीने संसद के शीतकालीन सत्र में पारित होने की उम्मीद है। इस कानून में एक बहु-आयामी रणनीति के तहत उपाय किये गये हैं। सरकार ने इस काननू में इंजीनियरों और सड़क निर्माण कंपनियों से सड़कों की सुरक्षा, उसके उपयोग कर्ताओं के हितों और आॅटो मोबाइल इंजीनियरिंग, वाहन चालकों की क्षमता जैसे ऐसे सभी बिंदुओं को नए सड़क सुरक्षा कानून में संशोािधत प्रावाधानों के तहत शामिल किया है, जिनके जरिए देश में सड़क हादसों और उनके कारण असामयिक मौत का शिकार हो रहे लोगों क जान बचाई जा सके। उन्होंने साफ कहा कि इसके लिए सड़कों के सुरक्षित डिजाइन के तहत निर्माण सबसे जरूरी है, जिसके लिए सड़क निर्माण के लिए डिजाइन तैयार करने ओर निर्माण की गुणवत्ता उच्च कोटि की रखने की जिम्मेदार इंजीनियरों और संबन्धित लोगों की है।
मिशन मोड़ पर दुरस्त होंगे ब्लैक स्पॉट
देशभर में दुर्घटनाग्रस्त क्षेत्रों को ब्लैक स्पॉट के रूप में चिन्हित करके सड़कों को सुरक्षित डिजाइन के तहत दुरस्त करने के लिए मिशन मोड शुरू किया गया है। सरकार ने राज्य सरकारों की पुलिस के जरिए संभावित दुर्घटनाग्रस्त इलाकों को ब्लैक स्पॉट के रूप में चिन्हित करने का काम पूरा कर लिया है, जिसमें करीब 380 ऐसे स्थान हैं जहां इन ब्लैक स्पॉट को मिशन मोड पर सुरक्षित डिजाइन के रूप दुरस्त करने का काम जारी है।
26Oct-2016
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016
..तो राज्यसभा में बदल जाएगा सपा का नेतृत्व?
रेवती हो सकते हैं सपा संसदीय दल के नेता
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
यूपी में विधानसभा चुनाव से पहले अपने चरम पर समाजवादी पार्टी की कलह का ग्रास बने सपा के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव की अब राज्यसभा में भी सीट बदल जाएगी। सपा से निष्कासित सांसद रामगोपाल के स्थान पर अब उच्च सदन में सपा संसदीय दल के नेता के रूप में रेवती रमन और बेनी प्रसाद के नाम की अटकले लगाई जा रही है। इस औपचारिकता के लिए सपा राज्यसभा के सभापति को एक पत्र भेजने जा रही है।
संसद का शीतकालीन सत्र आगामी 16 नवंबर से शुरू होने जा रहा है और उससे पहले यूपी की सियासत की सुर्खियों में चरम पर सपा की आपसी कलह के चलते समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. राम गोपाल यादव को पार्टी से बर्खास्त कर छह साल के लिए निष्कासित कर दिया है। सपा के सूत्रों के अनुसार पार्टी रामगोपाल की राज्यसभा की सदस्यता भी वापस लेने पर विचार कर रही है। राज्यसभा के नियम के अनुसार इसके लिए समाजवादी पार्टी को अधिकृत रूप से राज्यसभा को रामगोपाल के पार्टी से निष्कासन और सदस्यता वापस लेने के लिए पत्र देना होगा। सूत्रोें के अनुसार समाजवादी पार्टी इसकी औपचारिकता पूरी करने के लिए राज्यसभा चेयरमैन को पत्र लिखने की तैयारी कर रही है। राज्यसभा को सपा को यह भी सूचना देना होगा कि रामगोपाल यादव के स्थान पर सदन में पार्टी नेता कौन होगा। सूत्रों के अनुसार प्रो. रामगोपाल यादव फिलहाल उच्च सदन में सपा संसदीय दल के नेता हैं और नरेश अग्रवाल उप नेता हैं। रामगोपाल के स्थान पर पार्टी सूत्रों के अनुसार राज्यसभा सांसद रेवती रमण सिंह और बेनी प्रसाद के नाम की चर्चा चल रही है। राज्यसभा में समाजवादी पार्टी तीसरे नंबर का दल है, जिसके 19 सदस्य हैं। यदि पार्टी किसी सुलहवश प्रो. रामगोपाल के निष्कासन को वापस लेती है तो सदन में उनकी सीट को लेकर कोई बदलाव नहीं होगा।
राज्यसभा सदस्य बने रहेंगे
राज्यसभा के पूर्व महासचिव एवं संविधान विशेषज्ञ डा. योगेन्द्र नारायण ने उच्च सदन के नियमों की जानकारी देते हुए कहा कि यदि समाजवादी पार्टी प्रो. रामगोपाल यादव के पार्टी से निष्कासन की जानकारी देती है तो भी वे सदन की सदस्यता से निष्कासित नहीं होंगे, बल्कि उन्हें एक निर्दलीय सदस्य के रूप में अलग सीट आवंटित की जाएगी। मसलन उनकी सीट सपा के खेमे में नहीं होगी और उनकी सीट सपा के उस सदस्य को दे दी जाएगी, जिसे पार्टी सदन में अपना नेता की अधिकृत घोषणा करके सदन को लिखित में सूचना देगी। राज्यसभा के नियमों के अनुसार प्रो. रामगोपाल यादव निर्वाचित होकर सदन का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, भले ही वह पार्टी के टिकट पर निर्वाचित हुए हों, लेकिन राज्यसभा की सदस्यता उनके द्वारा स्वयं इस्तीफा देने के बाद ही समाप्त की जा सकती है, न कि संबन्धित राजनीतिक दल की सिफारिश पर।
पार्टी से निष्कासन
गौरतलब है कि समाजवादी पार्टी में चल रही परिवारिक कलह के कारण यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पक्ष लेने वाले राज्यसभा सांसद प्रो. रामगोपाल यादव को रविवार को सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने पार्टी गतिविधियों के खिलाफ साजिश करके सांप्रदायिक ताकतों के साथ मिलने के आरोप में बर्खास्त कर छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था। सपा प्रमुख मुलायम के हवाले से प्रो. रामगोपाल यादव को इस कार्यवाही की जानकारी एक पत्र के जरिए सपा प्रदेशाध्यक्ष शिवपाल यादव ने दी थी।
25Oct-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
यूपी में विधानसभा चुनाव से पहले अपने चरम पर समाजवादी पार्टी की कलह का ग्रास बने सपा के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव की अब राज्यसभा में भी सीट बदल जाएगी। सपा से निष्कासित सांसद रामगोपाल के स्थान पर अब उच्च सदन में सपा संसदीय दल के नेता के रूप में रेवती रमन और बेनी प्रसाद के नाम की अटकले लगाई जा रही है। इस औपचारिकता के लिए सपा राज्यसभा के सभापति को एक पत्र भेजने जा रही है।
संसद का शीतकालीन सत्र आगामी 16 नवंबर से शुरू होने जा रहा है और उससे पहले यूपी की सियासत की सुर्खियों में चरम पर सपा की आपसी कलह के चलते समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. राम गोपाल यादव को पार्टी से बर्खास्त कर छह साल के लिए निष्कासित कर दिया है। सपा के सूत्रों के अनुसार पार्टी रामगोपाल की राज्यसभा की सदस्यता भी वापस लेने पर विचार कर रही है। राज्यसभा के नियम के अनुसार इसके लिए समाजवादी पार्टी को अधिकृत रूप से राज्यसभा को रामगोपाल के पार्टी से निष्कासन और सदस्यता वापस लेने के लिए पत्र देना होगा। सूत्रोें के अनुसार समाजवादी पार्टी इसकी औपचारिकता पूरी करने के लिए राज्यसभा चेयरमैन को पत्र लिखने की तैयारी कर रही है। राज्यसभा को सपा को यह भी सूचना देना होगा कि रामगोपाल यादव के स्थान पर सदन में पार्टी नेता कौन होगा। सूत्रों के अनुसार प्रो. रामगोपाल यादव फिलहाल उच्च सदन में सपा संसदीय दल के नेता हैं और नरेश अग्रवाल उप नेता हैं। रामगोपाल के स्थान पर पार्टी सूत्रों के अनुसार राज्यसभा सांसद रेवती रमण सिंह और बेनी प्रसाद के नाम की चर्चा चल रही है। राज्यसभा में समाजवादी पार्टी तीसरे नंबर का दल है, जिसके 19 सदस्य हैं। यदि पार्टी किसी सुलहवश प्रो. रामगोपाल के निष्कासन को वापस लेती है तो सदन में उनकी सीट को लेकर कोई बदलाव नहीं होगा।
राज्यसभा सदस्य बने रहेंगे
राज्यसभा के पूर्व महासचिव एवं संविधान विशेषज्ञ डा. योगेन्द्र नारायण ने उच्च सदन के नियमों की जानकारी देते हुए कहा कि यदि समाजवादी पार्टी प्रो. रामगोपाल यादव के पार्टी से निष्कासन की जानकारी देती है तो भी वे सदन की सदस्यता से निष्कासित नहीं होंगे, बल्कि उन्हें एक निर्दलीय सदस्य के रूप में अलग सीट आवंटित की जाएगी। मसलन उनकी सीट सपा के खेमे में नहीं होगी और उनकी सीट सपा के उस सदस्य को दे दी जाएगी, जिसे पार्टी सदन में अपना नेता की अधिकृत घोषणा करके सदन को लिखित में सूचना देगी। राज्यसभा के नियमों के अनुसार प्रो. रामगोपाल यादव निर्वाचित होकर सदन का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, भले ही वह पार्टी के टिकट पर निर्वाचित हुए हों, लेकिन राज्यसभा की सदस्यता उनके द्वारा स्वयं इस्तीफा देने के बाद ही समाप्त की जा सकती है, न कि संबन्धित राजनीतिक दल की सिफारिश पर।
पार्टी से निष्कासन
गौरतलब है कि समाजवादी पार्टी में चल रही परिवारिक कलह के कारण यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पक्ष लेने वाले राज्यसभा सांसद प्रो. रामगोपाल यादव को रविवार को सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने पार्टी गतिविधियों के खिलाफ साजिश करके सांप्रदायिक ताकतों के साथ मिलने के आरोप में बर्खास्त कर छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था। सपा प्रमुख मुलायम के हवाले से प्रो. रामगोपाल यादव को इस कार्यवाही की जानकारी एक पत्र के जरिए सपा प्रदेशाध्यक्ष शिवपाल यादव ने दी थी।
25Oct-2016
सोमवार, 24 अक्टूबर 2016
विदेशी तकनीक से मजबूत होगा बुनियादी ढांचा!
सड़क व बंदरगाह के साथ हाईस्पीड ट्रेन में भी मदद करेगा जर्मनी
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश के बुनियादी ढांचे को विश्वस्तरीय मजबूत बनाने की दिशा में विदेशी तकनीक का इस्तेमाल करने पर बल दिया है। खासतौर पर देश के सड़क, रेल, जल परिवहन के साथ बंदरगाह क्षेत्र की परियोजनाओं में सुरक्षा व गुणवत्ता को प्राथमिकात देने हेतु अंतर्राष्ट्रीय मानक अपनाने का फैसला किया है। इस बुनियादी ढांचे में भारत ने जर्मनी से समझौता कर लिया है, जो हाईस्पीड ट्रेन के अलावा सड़क व बंदरगाह क्षेत्र में तकनीकी व वित्तीय मदद करेगा।
केद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार हाल ही में बंदरगाहों तक रेल लाइन नेटवर्क बिछाने में सहयोग के लिए जर्मनी के साथ हुए एक समझौते के तहत देश के बंदरगाहों के आधुनिक विकास और बंदरगाहों तक सड़क व रेल संपर्क बनाने की योजनाओं को आगे बढ़ाया जाएगा। मसलन अब सरकार ने सभी प्रमुख बंदरगाहों के रेल संपर्क में सुधार करने के लिए जर्मनी की तकनीक अपनाने का फैसला किया गया है। हालांकि इस साल अप्रैल में हुए समुद्री भारत शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय पोर्ट रेल निगम लिमिटेड और जर्मन रेल डॉयचे बान के बीच भारतीय बंदरगाहों की रेल पोर्ट कनेक्टिविटी और बंदरगाह पर रेल सुविधाओं के आधुनिकीकरण में सहयोग हेतु एक महत्वपूर्ण करार पर हस्ताक्षर किये जा चुके हैं। इस करार के तहत देश में बंदरगाहों में रेल संपर्क में सुधार के लिए भारत और जर्मनी ने भारतीय पोर्ट रेल निगम लिमिटेड द्वारा कार्यान्वित की जा रही एक लाख करोड़ रुपये की परियोजना का लक्ष्य पूरा हो सकेगा। इसके अलावा जर्मनी सड़क व जल परिवहन के क्षेत्र में भी तकनीकी मदद देने का तैयार है।
पुराने वाहनों में ईको फ्रेंडली तकनीक
सड़क मंत्रालय के अनुसार देश में सड़क पर दौड़ते वाहनों के प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए पुराने वाहनों को हटाने की योजना में भी जर्मनी मदद करने के लिए तैयार हो गया है। भारत ऐसे पुराने वाहनों को स्क्रैप में बदलने के लिए केंद्रीय सड़क मंत्रालय ने व्हीकल स्क्रैप पॉलिसी में जर्मनी की तकनीकी मदद लेने का फैसला किया है। जर्मनी भी भारत में पुराने वाहनों को स्क्रैप कराने के लिए पूरी तरह से तैयार है। मसलन अब ईको फ्रेंडली तरीके के साथ वाहनों को स्क्रैप करके प्रदूषण की समस्या से निपटा जाएगा। सरकार ने पिछले साल मार्च में 15 साल पुराने वाहनों को हटाने के लिए वॉलंट्री व्हीकल μलीट मॉडेर्नाइजेशन प्रोग्राम यानि वीवीएमपी का नामक अभियान शुरू किया था।
केंद्र व राज्यों का मिलेगा आर्थिक फायदा
सूत्रों के अनुसार भारत और जर्मनी के इस तकनीकी सहयोग से अभी तक स्क्रैपिंग पॉलिसी हेतु 14 हजार करोड़ की लागत आने का अनुमान है। इसमें करीब 28 मिनियन वाहनों को स्क्रैप किया जाना है। इस पॉलिसी को अंतिम रूप मिलते ही इसे लागू कर दिया जाएगा, जिससे एक साल में व्यर्थ होने वाले करीब 3.2 बीलियन लीटर तेल के रूप में वाहन उपयोगकर्ताओं 25 से 30 प्रतिशत तक के र्इंधन की बचत होने का अनुमान लगया गया है। यहीं नहीं इस तकनीक से राज्यों में आॅटो इंडस्ट्री की ग्रोथ 22 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना प्रबल होगी। केंद्र सरकार इससे 4 हजार करोड़ का फायदा लेगी और 10 हजार करोड़ का फायदा राज्य सरकारों को होगा।
हाई स्पीड ट्रेन का विस्तार
मैसूर-बंगलूर-चेन्नई हाईस्पीड ट्रेन के प्रस्तावित अध्ययन को विजयवाड़ा तक विस्तार करने के साथ वाहनों की तकनीक में जर्मनी मदद देगा। एक करार के तहत जर्मनी ने मैसूर से बेंगलुरु व चेन्नई होते हुए विजयवाड़ा तक हाईस्पीड ट्रेन गलियारे के निर्माण हेतु अपने खर्च पर अध्ययन करने का फैसला किया है। जिसके लिए भारतीय रेल व जर्मन रेल का एक संयुक्त कार्यदल जल्द ही काम शुरू कर देगा। यह दल देश में अतिरिक्त ट्रेनों की यात्री व मालवहन क्षमता बढ़ाने, ऊर्जा खपत में कमी लाने, कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने तथा स्टेशनों का विकास करने का भी तकनीकी अध्ययन करेगा। यही नहीं रेल दुर्घटनाओं को पूरी तरह खत्म करने के मकसद से भारतीय रेल व जर्मन रेल का यह संयुक्त कार्यदल अध्ययन करेगा। इसके लिए रेल संरक्षण प्रणालियां समझने के लिए भारतीय दल जर्मनी का दौरा भी करेगा।
24Oct-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश के बुनियादी ढांचे को विश्वस्तरीय मजबूत बनाने की दिशा में विदेशी तकनीक का इस्तेमाल करने पर बल दिया है। खासतौर पर देश के सड़क, रेल, जल परिवहन के साथ बंदरगाह क्षेत्र की परियोजनाओं में सुरक्षा व गुणवत्ता को प्राथमिकात देने हेतु अंतर्राष्ट्रीय मानक अपनाने का फैसला किया है। इस बुनियादी ढांचे में भारत ने जर्मनी से समझौता कर लिया है, जो हाईस्पीड ट्रेन के अलावा सड़क व बंदरगाह क्षेत्र में तकनीकी व वित्तीय मदद करेगा।
केद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार हाल ही में बंदरगाहों तक रेल लाइन नेटवर्क बिछाने में सहयोग के लिए जर्मनी के साथ हुए एक समझौते के तहत देश के बंदरगाहों के आधुनिक विकास और बंदरगाहों तक सड़क व रेल संपर्क बनाने की योजनाओं को आगे बढ़ाया जाएगा। मसलन अब सरकार ने सभी प्रमुख बंदरगाहों के रेल संपर्क में सुधार करने के लिए जर्मनी की तकनीक अपनाने का फैसला किया गया है। हालांकि इस साल अप्रैल में हुए समुद्री भारत शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय पोर्ट रेल निगम लिमिटेड और जर्मन रेल डॉयचे बान के बीच भारतीय बंदरगाहों की रेल पोर्ट कनेक्टिविटी और बंदरगाह पर रेल सुविधाओं के आधुनिकीकरण में सहयोग हेतु एक महत्वपूर्ण करार पर हस्ताक्षर किये जा चुके हैं। इस करार के तहत देश में बंदरगाहों में रेल संपर्क में सुधार के लिए भारत और जर्मनी ने भारतीय पोर्ट रेल निगम लिमिटेड द्वारा कार्यान्वित की जा रही एक लाख करोड़ रुपये की परियोजना का लक्ष्य पूरा हो सकेगा। इसके अलावा जर्मनी सड़क व जल परिवहन के क्षेत्र में भी तकनीकी मदद देने का तैयार है।
पुराने वाहनों में ईको फ्रेंडली तकनीक
सड़क मंत्रालय के अनुसार देश में सड़क पर दौड़ते वाहनों के प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए पुराने वाहनों को हटाने की योजना में भी जर्मनी मदद करने के लिए तैयार हो गया है। भारत ऐसे पुराने वाहनों को स्क्रैप में बदलने के लिए केंद्रीय सड़क मंत्रालय ने व्हीकल स्क्रैप पॉलिसी में जर्मनी की तकनीकी मदद लेने का फैसला किया है। जर्मनी भी भारत में पुराने वाहनों को स्क्रैप कराने के लिए पूरी तरह से तैयार है। मसलन अब ईको फ्रेंडली तरीके के साथ वाहनों को स्क्रैप करके प्रदूषण की समस्या से निपटा जाएगा। सरकार ने पिछले साल मार्च में 15 साल पुराने वाहनों को हटाने के लिए वॉलंट्री व्हीकल μलीट मॉडेर्नाइजेशन प्रोग्राम यानि वीवीएमपी का नामक अभियान शुरू किया था।
केंद्र व राज्यों का मिलेगा आर्थिक फायदा
सूत्रों के अनुसार भारत और जर्मनी के इस तकनीकी सहयोग से अभी तक स्क्रैपिंग पॉलिसी हेतु 14 हजार करोड़ की लागत आने का अनुमान है। इसमें करीब 28 मिनियन वाहनों को स्क्रैप किया जाना है। इस पॉलिसी को अंतिम रूप मिलते ही इसे लागू कर दिया जाएगा, जिससे एक साल में व्यर्थ होने वाले करीब 3.2 बीलियन लीटर तेल के रूप में वाहन उपयोगकर्ताओं 25 से 30 प्रतिशत तक के र्इंधन की बचत होने का अनुमान लगया गया है। यहीं नहीं इस तकनीक से राज्यों में आॅटो इंडस्ट्री की ग्रोथ 22 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना प्रबल होगी। केंद्र सरकार इससे 4 हजार करोड़ का फायदा लेगी और 10 हजार करोड़ का फायदा राज्य सरकारों को होगा।
हाई स्पीड ट्रेन का विस्तार
मैसूर-बंगलूर-चेन्नई हाईस्पीड ट्रेन के प्रस्तावित अध्ययन को विजयवाड़ा तक विस्तार करने के साथ वाहनों की तकनीक में जर्मनी मदद देगा। एक करार के तहत जर्मनी ने मैसूर से बेंगलुरु व चेन्नई होते हुए विजयवाड़ा तक हाईस्पीड ट्रेन गलियारे के निर्माण हेतु अपने खर्च पर अध्ययन करने का फैसला किया है। जिसके लिए भारतीय रेल व जर्मन रेल का एक संयुक्त कार्यदल जल्द ही काम शुरू कर देगा। यह दल देश में अतिरिक्त ट्रेनों की यात्री व मालवहन क्षमता बढ़ाने, ऊर्जा खपत में कमी लाने, कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने तथा स्टेशनों का विकास करने का भी तकनीकी अध्ययन करेगा। यही नहीं रेल दुर्घटनाओं को पूरी तरह खत्म करने के मकसद से भारतीय रेल व जर्मन रेल का यह संयुक्त कार्यदल अध्ययन करेगा। इसके लिए रेल संरक्षण प्रणालियां समझने के लिए भारतीय दल जर्मनी का दौरा भी करेगा।
24Oct-2016
सदस्यता लें
संदेश (Atom)












