सपा, कांग्रेस व बसपा की कमजोरियों पर होगा दांव
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
भारतीय जनता पार्टी देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए हर उस दांव को मजबूत कर रही है, जिसमें सपा, कांग्रेस या बसपा की कमजोरियां छिपी है। मसलन युवाओं, महिलाओं और जातीय यानि सामाजिक समीकरणों को साधने के
साथ राज्य में विकास के मुद्दे को सामने लाकर फिलहाल चुनावी सियासत में भाजपा अन्य दलों में सेंधमारी करने के मामले में भारी पड़ती नजर आ रही है।
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव की बढ़ती तपिश में भाजपा, कांग्रेस, बसपा जैसे प्रमुख दल सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को बेदखल करने के इरादे से अपनी चुनावी रणनीति का ताना-बाना बुनने में जी-जान से जुटे हुए हैं। केंद्र की सत्ता में होने के कारण भाजपा प्रदेश में ताबड़तोड़ बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की मुहिम में सड़क और पुल निर्माण की परियोजनाओं को भी पटरी पर उतारने में पीछे नहीं है। राज्य में सत्तारूढ़ सपा की अखिलेश सरकार भी चुनावी सियासत के मद्देनजर हरेक कैबिनेट बैठकों में सरकारी कर्मचारियों से लेकर अंतिम छोर पर बैठे आम आदमी को लुभाने के लिए योजनाओं को बाहर निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हों, चाहे वह स्मार्ट फोन देने का ही निर्णय क्यों न हो। लेकिन सत्तारूढ़ सपा के अंदरूनी विवाद पहली बार मुलायम परिवार में सिर चढ़कर बोल रहा है, जिसका फायदा लेने में भाजपा की रणनीति कांग्रेस या बसपा से ज्यादा धारधार साबित हो रही है। भाजपा ने हरहाल में यूपी की सत्ता कब्जाने की सियासत में विकास के एजेंडे को लांखते हुए श्रीराम मंदिर निर्माण या जातीय समीकरणों को साधने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी और कांग्रेस, सपा, बसपा में सेंधमारी करके उनके दिग्गज और बागी चेहरों को कमल थामने के लिए मजबूर करना शुरू कर दिया है। हाल में कांग्रेस की प्रदेशाध्यक्ष और कई महत्वपूर्ण पदो पर रही दिग्गज रीता बहुगुणा जोशी को ब्राह्मण चेहरे के रूप में अपने खेमे में शामिल कर भाजपा ने कांग्रेस की रणनीति पर बड़ी चोट कर हैरान कर दिया। इससे पहले ऐसे ही बसपा के स्वामी प्रसाद मौर्या, बसपा के ब्रजेश पाठक जैसे कई बडे चेहरों को अपनी चुनावी रणनीति से प्रभावित किया है।
उम्मीदवारों का ऐसे होगा चयन
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने जिस प्रकार की चुनावी रणनीति तय की है, उसमें प्रत्याशी बनाने के लिए भाजपा ने पांच मानक तय करके उन्हीं पर फोकस करने का फैसला किया है। इन मानको में प्रत्याशी के जीतने की संभावना, सामाजिक व निजी पृष्ठभूमि, पार्टी के प्रति निष्ठा खासकर दूसरे दलों से आए नेता, युवा व प्रभावी नेतृत्व व सामाजिक व जातीय समीकरणों की अनुकूलता शामिल हैं। भाजपा ने संभावित उम्मीदवार के विभिन्न सोशल साइट पर पार्टी व राजनीतिक मुद्दों की सक्रियता का भी आकलन करना भी शुरू करा दिया हैै। यही कारण है कि इस बार ज्यादातर नए चेहरों में युवाओं, महिलाओं और चुनावी क्षेत्र में सामाजिक छवि तथा जनाधार वाली पृष्ठभूमि वालों को भाजपा का टिकट मिलने की ज्यादा संभावना है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुमत से बड़ा आंकड़ा हासिल करने के लक्ष्य पर चल रही भाजपा ने टिकट वितरण में फूंक फूंककर कदम आगे बढ़ा रही है। जाहिर है कि भाजपा मेें इस बार किसी सिफारिश के बजाय तय किये गये मानदंडो पर खरा उतरने वाला ही भाजपा का उम्मीदवार होगा। सूत्रों के अनुसार भाजपा ने पार्टी के किसी भी बड़े या प्रमुख नेताओं के बेटे या बेटियों या पत्नी या पति को टिकट न देने की रणनीति साफ कर दी है।
तो इन पर गाज गिरना तय
भाजपा के सूत्रों की माने तो पार्टी के इन तय मानदंड व नियम के आधार पर उन दावेदारों पर गाज गिरना तय है, जो वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में जमानत जब्त करा चुके हैं। जमानत गंवाने के दायरे में ऐसे भाजपा के 229 उम्मीदवार शामिल हैं। हालांकि मौजूदा 47 विधायकों पर दांव अजमाया जा सकेगा, लेकिन कुछ को बदलने की भी अटकले हैं। सूत्रों के अनुसार भाजपा यूपी चुनाव में युवा और सामाजिक समीकरणों के लिहाज से ज्यादातर नए चेहरे सामने लाने की रणनीति बना रही है। भाजपा की इस रणनीति में आरएसएस की टीमें भी बूथ स्तर पर सक्रिय हैं, जिनकी रिपोर्ट के आधार पर टिकट तय किया जाना है।
23Oct-2016
एक जमाना था जब लोग अपने घरों के बाहर लिखते थे-अतिथि देवो भव: फिर शुरू किया-शुभ लाभ और बाद में लिखा जाने लगा-यूं आर वेलकम अब शुरू हो गया-......से सावधान!
रविवार, 23 अक्टूबर 2016
दुनिया के कई देश हमारी चुनाव प्रणाली पर लट़टू
देशों ने मतदाता जागरूता पर पारित किया प्रस्ताव
28
हरिभूमि ब्यूरो. नई दिल्ली
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में निष्पक्ष और स्वस्थ चुनाव कराने की दिशा में चुनाव सुधार के लिए अपनाई जा रही नई-नई चुनाव प्रणाली और प्रक्रियाओं को दुनिया के अन्य देशों को भी भाने लगी है। भारतीय चुनाव प्रक्रिया को लेकर करीब 28 देशों ने ऐसी प्रणालियों को साझा ही नहीं किया, बल्कि भारतीय चुनाव आयोग द्वारा मतदाता जागरूकता को लेकर लाये गये एक संकल्प प्रस्ताव का सर्मथन करते हुए उसे पारित भी किया है।
संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर भारत निर्वाचन आयोग द्वारा हाल ही में चुनाव के प्रति मतदाता जागरूकता को लेकर आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे करीब 28 देशों के चुनाव आयोगों और चुनाव निकाय संस्थाओं के उच्चाधिकारियों व प्रतिनिधियों ने भारत में अपनाई जा रही चुनाव प्रणालियों को अन्य देशों से बेहतर करार दिया। दरअसल यहां भारत निर्वाचन आयोग की मेजबानी में चले दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में मतदाता जागरूकता और नैतिक मतदान, मतदाता प्रशिक्षण और नैतिक भागीदारी, समावेशी, सूचित तथा नैतिक सहभागिता हेतु मतदाता शिक्षा के अलावा 27वीं सदी में निर्वाचन की महत्ता जैसे पांच प्रमुख विषयों पर मंथन किया गया। इस सम्मेलन में अनिवार्य मतदान को खुद भारत ने ही नकार दिया, लेकिन इन विषयों को आगे बढ़ाने पर लगभग सभी देशों के साथ सहमति बनाई और सभी देशों के चुनाव प्रबंधन निकायों द्वारा सर्वोत्तम प्रथाओं, नीतियों और मतदाता शिक्षा की पहल को साझा करने की पहल की। सभी देशों ने स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिचित करने के लिए एक तंत्र विकसित करने, सीएसओ, मीडिया और प्रभावी मतदाता को लागू करने जैसी अन्य संबंधित संगठनों के साथ साझेदारी शिक्षा कार्यक्रम, मतदाता शिक्षा की पहुंच बढ़ाने के लिए सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के प्रभावी उपयोग कार्यक्रम के साथ मतदाता जागरूकता पर बल दिया, जिसके लिए पर्याप्त धन और मानव संसाधन के आवंटन सर्वोत्तम प्रथाओं और तौर तरीकों का आदान-प्रदान भी हुआ। सम्मेलन में प्रमुख रूप से चुनाव सुधार की दिशा में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता लाने पर जोर दिया गया और ज्यादा से ज्यादा मतदान सुनिश्चित करने की दिशा में मतदाता जागरूकता पर बल दिया गया। इस सम्मेलन में प्रवासी भारतीय मतदाताओं की दिक्कतों और उनके अधिकारों आदि के विषय में कराए गये एक सर्वेक्षण को भी सभी देशों ने साझा किया। सम्मेलन के अंत में आमसहमति के आधार पर समावेशी सूचना और नैतिक चुनावी भागीदारी को मजबूत बनाने हेतु एक संकल्प प्रस्ताव पारित किया गया। इस सम्मेलन का मुख्य मकसद मतदाताओं में जागरूकता, मतदान में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना, चुनाव प्रक्रिया को दुरस्त बनाने के लिए चुनाव सुधार की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना शामिल है। इस सम्मेलन में पाकिस्तानप, अफगानिस्तान, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, फिजी, जाजिर्या, इंडोनेशिया, इराक, केन्या, लेसोथो, मलेशिया, मॉरीशस, माल्द्वीप, मैक्सिको, नेपाल, फिलीपिंस, र्शीलंका, थाईलैंड, युगांडा, नांबिया जैसे देशों ने हिस्सा लिया।
प्रदर्शनी का आकर्षण
सम्मेलन के दौरान मतदाता शिक्षा पर ग्लोबल नॉलेज नेटवर्क ऑन वोटर एजुकेशन, वॉइज डॉटनेट का भी शुभारंभ करने के आलवा मतदाता शिक्षा उपकरण तथा मतदान प्रक्रिया एवं सामग्रियों पर एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। एक प्रदर्शनी के जरिए प्रदर्शित भी किया गया है। इस प्रदर्शनी में हालांकि सभी देशों ने अपनी चुनाव प्रक्रियाओं का प्रदर्शन किया है, लेकिन भारत की प्रदर्शनी और चुनाव प्रणाली सभी देशों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस प्रदर्शनी में सूचनात्मक सामग्री, मॉडल मतदान केंद्र, ईवीएम पर लाइव वोटिंग के प्रावधान, मतदाता शिक्षा उपकरण और सामग्री के अलावा फोटो, वीडियो, 3डी मॉडल, ईसीआई द्वारा विकसित इंटरैक्टिव स्वीप अभियान का भी प्रदर्शन किया गया है।
23Oct-2016
28
हरिभूमि ब्यूरो. नई दिल्ली
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में निष्पक्ष और स्वस्थ चुनाव कराने की दिशा में चुनाव सुधार के लिए अपनाई जा रही नई-नई चुनाव प्रणाली और प्रक्रियाओं को दुनिया के अन्य देशों को भी भाने लगी है। भारतीय चुनाव प्रक्रिया को लेकर करीब 28 देशों ने ऐसी प्रणालियों को साझा ही नहीं किया, बल्कि भारतीय चुनाव आयोग द्वारा मतदाता जागरूकता को लेकर लाये गये एक संकल्प प्रस्ताव का सर्मथन करते हुए उसे पारित भी किया है।
संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर भारत निर्वाचन आयोग द्वारा हाल ही में चुनाव के प्रति मतदाता जागरूकता को लेकर आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे करीब 28 देशों के चुनाव आयोगों और चुनाव निकाय संस्थाओं के उच्चाधिकारियों व प्रतिनिधियों ने भारत में अपनाई जा रही चुनाव प्रणालियों को अन्य देशों से बेहतर करार दिया। दरअसल यहां भारत निर्वाचन आयोग की मेजबानी में चले दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में मतदाता जागरूकता और नैतिक मतदान, मतदाता प्रशिक्षण और नैतिक भागीदारी, समावेशी, सूचित तथा नैतिक सहभागिता हेतु मतदाता शिक्षा के अलावा 27वीं सदी में निर्वाचन की महत्ता जैसे पांच प्रमुख विषयों पर मंथन किया गया। इस सम्मेलन में अनिवार्य मतदान को खुद भारत ने ही नकार दिया, लेकिन इन विषयों को आगे बढ़ाने पर लगभग सभी देशों के साथ सहमति बनाई और सभी देशों के चुनाव प्रबंधन निकायों द्वारा सर्वोत्तम प्रथाओं, नीतियों और मतदाता शिक्षा की पहल को साझा करने की पहल की। सभी देशों ने स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिचित करने के लिए एक तंत्र विकसित करने, सीएसओ, मीडिया और प्रभावी मतदाता को लागू करने जैसी अन्य संबंधित संगठनों के साथ साझेदारी शिक्षा कार्यक्रम, मतदाता शिक्षा की पहुंच बढ़ाने के लिए सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के प्रभावी उपयोग कार्यक्रम के साथ मतदाता जागरूकता पर बल दिया, जिसके लिए पर्याप्त धन और मानव संसाधन के आवंटन सर्वोत्तम प्रथाओं और तौर तरीकों का आदान-प्रदान भी हुआ। सम्मेलन में प्रमुख रूप से चुनाव सुधार की दिशा में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता लाने पर जोर दिया गया और ज्यादा से ज्यादा मतदान सुनिश्चित करने की दिशा में मतदाता जागरूकता पर बल दिया गया। इस सम्मेलन में प्रवासी भारतीय मतदाताओं की दिक्कतों और उनके अधिकारों आदि के विषय में कराए गये एक सर्वेक्षण को भी सभी देशों ने साझा किया। सम्मेलन के अंत में आमसहमति के आधार पर समावेशी सूचना और नैतिक चुनावी भागीदारी को मजबूत बनाने हेतु एक संकल्प प्रस्ताव पारित किया गया। इस सम्मेलन का मुख्य मकसद मतदाताओं में जागरूकता, मतदान में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना, चुनाव प्रक्रिया को दुरस्त बनाने के लिए चुनाव सुधार की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना शामिल है। इस सम्मेलन में पाकिस्तानप, अफगानिस्तान, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, फिजी, जाजिर्या, इंडोनेशिया, इराक, केन्या, लेसोथो, मलेशिया, मॉरीशस, माल्द्वीप, मैक्सिको, नेपाल, फिलीपिंस, र्शीलंका, थाईलैंड, युगांडा, नांबिया जैसे देशों ने हिस्सा लिया।
प्रदर्शनी का आकर्षण
सम्मेलन के दौरान मतदाता शिक्षा पर ग्लोबल नॉलेज नेटवर्क ऑन वोटर एजुकेशन, वॉइज डॉटनेट का भी शुभारंभ करने के आलवा मतदाता शिक्षा उपकरण तथा मतदान प्रक्रिया एवं सामग्रियों पर एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। एक प्रदर्शनी के जरिए प्रदर्शित भी किया गया है। इस प्रदर्शनी में हालांकि सभी देशों ने अपनी चुनाव प्रक्रियाओं का प्रदर्शन किया है, लेकिन भारत की प्रदर्शनी और चुनाव प्रणाली सभी देशों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस प्रदर्शनी में सूचनात्मक सामग्री, मॉडल मतदान केंद्र, ईवीएम पर लाइव वोटिंग के प्रावधान, मतदाता शिक्षा उपकरण और सामग्री के अलावा फोटो, वीडियो, 3डी मॉडल, ईसीआई द्वारा विकसित इंटरैक्टिव स्वीप अभियान का भी प्रदर्शन किया गया है।
23Oct-2016
राग दरबार: सबके सामने मोदी का दिल...
जानते सबकुछ हैं, लेकिन मानते नहीं.
देश की राजनीति ही कुछ ऐसी है कि जानते सबकुछ हैं, लेकिन मानते नहीं..। मसलन मौजूदा सुरतेहाल में देश के विकास, सुरक्षा, आतंकवाद, सामाजिक समरसता, भ्रष्टाचार के अलावा अंतर्राष्टÑीय मुद्दों पर कौन खरा उतर रहा है यह सबकी नजर में है। तभी तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करने वाली पार्टियों के समझदार नेता अपने दलों में अलग-थलग देख अपना दामन छुड़ाने में लगे हैं। मोदी की आलोचना करने वालों की फेहरिस्त में शामिल रही यूपी कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी का पलटा मारना ऐसी ही देशभक्त वाली सियासत का जीताजागता उदाहरण सामने आया है, जो देश की सुरक्षा और सैनिकों के अपनी पार्टी के स्यापो द्वारा किये जा रहे अपमान को सहन नहीं कर पायी। मोदी के सुरक्षा के मामले पर आतंकवाद के खिलाफ इस कड़े फैसले से प्रभावित हुई रीता ने उन फैसलों का भी समर्थन करना शुरू कर दिया है, जिसकी कांग्रेस संस्कृति में रहते आलोचना करती रही है। मसलन केंद्र की राजग सरकार के इन दो साल से ज्यादा शासनकाल में सत्ता में आने से पहले किये गये कई वादों पर प्रधानमंत्री के रूप में मोदी कसौटी पर खरे उतरते नजर आ रहे हैँ। एक ताजा उदाहरण ने तो मोदी से स्वार्थ की सियासत करने वालों को चौंका ही दिया, जिसमें सरकार ने रक्षा संबंधी सूचना लीक करने के आरोपों से घिरे अपनी ही पार्टी के वरुण गांधी के खिलाफ कार्यवाही तेज करते हुए साबित कर दिया है। राजनीतिकारों की माने तो मोदी के जमाने में देश की राजनीति भी करवट बदली और तीस साल बाद केंद्र में एक बार फिर पूर्ण बहुमत वाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने अपनो के अलावा नौकरशाही को पारदर्शी व जवाबदेह बनाए रखने के लिए कई अहम कदम उठाए हैं, जिनके सकारात्मक प्रभाव सामने आने लगे हैं। कालेधन पर चली आ रही बहस में जितना इस सरकार ने अघोषित रकम बाहर निकलवाई है ऐसा अब तक कोई सरकार नहीं कर सकी। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसमें मोदी के दिल और उनके साहस को पूरा देश देख चुका है कि वह अपने फैसलों पर किस कदर अड़िग है, लेकिन उनके खिलाफ सिसासी दल हैं कि सबकुछ जानते हुए भी मानने को तैयार नहीं हैं।
कैबिनेट की मीटिंग से नहीं होंगे लीक...
कैबिनेट की मीटिंग को सरकार की शीर्ष बैठकों में शुमार किया जाता है, जिसमें सरकार अपने तमाम अहम फैसले लेती है। लेकिन अगर बैठक से पहले ही इसमें लिए जाने वाले अहम फैसलों की सूचना पब्लिक हो जाए तो हड़कंप मचना लाजÞमी है। ऐसा ही कुछ घटनाक्रम बीते कुछ समय से मौजूदा सत्तासीन सरकार की केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठकों के दौरान भी देखने को मिल रहा था। इसमें किसी मामले पर कैबिनेट की सहमति से पहले ही सूचना सार्वजनिक हो रही थी। इसके संकेत मिलते ही पीएम एक्शन मोड में आ गए और उन्होंने सभी कैबिनेट मंत्रियों को निर्देंश दिया कि वो बैठक के दौरान अपने मोबाइल फोन बैठक स्थल से बाहर जमा करेंगे और फिर अंदर दाखिल होंगे। पीएम के इस कदम से आने वाले वक्त में ही यह तस्वीर साफ हो जाएगी कि कैबिनेट की मीटिंग से सूचनाएं लीक होंगी या उनपर लगाम लगेगी।
बैठकों से कैसे जीतेंगे चुनाव...
वर्तमान में कांग्रेस पार्टी की खस्ता हालत को लेकर पार्टी के कार्यालय में चर्चा जोरो पर है। चाहे बड़ा नेता हो या छोटा कार्यकर्ता सब इसी सोच में लगे हुए है कि पार्टी फिर कैसे खड़ी हो सकती है। नेताओं का मनाना है कि यूपी के चुनाव पार्टी के लिए अहम है। यूपी चुनाव को लेकर पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी यूपी के नेताओ की लगातार बैठके भी ले रहे है। लेकिन पार्टी के कई नेता बैठकों पर अलग ही राय रखते है। उनका मानना है कि बंद कमरे में दो से तीन घंटे बैठक करने से कोई चुनाव नहीं जीते जाते। आज पार्टी की जो देशभर में जो स्थिति है कि उसके लिए बड़े नेता से लेकर कार्यकर्ताओ को जमीन पर उतरना होगा। लोगों की नब्ज को समझना होगा। इसके बाद ही पार्टी मजबूत स्थिति में पहुुंच सकेंगी। बैठक करने से मैदान की स्थिति को समझा नहीं जा
सकता।
-ओ.पी.पाल, कविता जोशी व राहुल
23Oct-2016
देश की राजनीति ही कुछ ऐसी है कि जानते सबकुछ हैं, लेकिन मानते नहीं..। मसलन मौजूदा सुरतेहाल में देश के विकास, सुरक्षा, आतंकवाद, सामाजिक समरसता, भ्रष्टाचार के अलावा अंतर्राष्टÑीय मुद्दों पर कौन खरा उतर रहा है यह सबकी नजर में है। तभी तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करने वाली पार्टियों के समझदार नेता अपने दलों में अलग-थलग देख अपना दामन छुड़ाने में लगे हैं। मोदी की आलोचना करने वालों की फेहरिस्त में शामिल रही यूपी कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी का पलटा मारना ऐसी ही देशभक्त वाली सियासत का जीताजागता उदाहरण सामने आया है, जो देश की सुरक्षा और सैनिकों के अपनी पार्टी के स्यापो द्वारा किये जा रहे अपमान को सहन नहीं कर पायी। मोदी के सुरक्षा के मामले पर आतंकवाद के खिलाफ इस कड़े फैसले से प्रभावित हुई रीता ने उन फैसलों का भी समर्थन करना शुरू कर दिया है, जिसकी कांग्रेस संस्कृति में रहते आलोचना करती रही है। मसलन केंद्र की राजग सरकार के इन दो साल से ज्यादा शासनकाल में सत्ता में आने से पहले किये गये कई वादों पर प्रधानमंत्री के रूप में मोदी कसौटी पर खरे उतरते नजर आ रहे हैँ। एक ताजा उदाहरण ने तो मोदी से स्वार्थ की सियासत करने वालों को चौंका ही दिया, जिसमें सरकार ने रक्षा संबंधी सूचना लीक करने के आरोपों से घिरे अपनी ही पार्टी के वरुण गांधी के खिलाफ कार्यवाही तेज करते हुए साबित कर दिया है। राजनीतिकारों की माने तो मोदी के जमाने में देश की राजनीति भी करवट बदली और तीस साल बाद केंद्र में एक बार फिर पूर्ण बहुमत वाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने अपनो के अलावा नौकरशाही को पारदर्शी व जवाबदेह बनाए रखने के लिए कई अहम कदम उठाए हैं, जिनके सकारात्मक प्रभाव सामने आने लगे हैं। कालेधन पर चली आ रही बहस में जितना इस सरकार ने अघोषित रकम बाहर निकलवाई है ऐसा अब तक कोई सरकार नहीं कर सकी। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसमें मोदी के दिल और उनके साहस को पूरा देश देख चुका है कि वह अपने फैसलों पर किस कदर अड़िग है, लेकिन उनके खिलाफ सिसासी दल हैं कि सबकुछ जानते हुए भी मानने को तैयार नहीं हैं।
कैबिनेट की मीटिंग से नहीं होंगे लीक...
कैबिनेट की मीटिंग को सरकार की शीर्ष बैठकों में शुमार किया जाता है, जिसमें सरकार अपने तमाम अहम फैसले लेती है। लेकिन अगर बैठक से पहले ही इसमें लिए जाने वाले अहम फैसलों की सूचना पब्लिक हो जाए तो हड़कंप मचना लाजÞमी है। ऐसा ही कुछ घटनाक्रम बीते कुछ समय से मौजूदा सत्तासीन सरकार की केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठकों के दौरान भी देखने को मिल रहा था। इसमें किसी मामले पर कैबिनेट की सहमति से पहले ही सूचना सार्वजनिक हो रही थी। इसके संकेत मिलते ही पीएम एक्शन मोड में आ गए और उन्होंने सभी कैबिनेट मंत्रियों को निर्देंश दिया कि वो बैठक के दौरान अपने मोबाइल फोन बैठक स्थल से बाहर जमा करेंगे और फिर अंदर दाखिल होंगे। पीएम के इस कदम से आने वाले वक्त में ही यह तस्वीर साफ हो जाएगी कि कैबिनेट की मीटिंग से सूचनाएं लीक होंगी या उनपर लगाम लगेगी।
बैठकों से कैसे जीतेंगे चुनाव...
वर्तमान में कांग्रेस पार्टी की खस्ता हालत को लेकर पार्टी के कार्यालय में चर्चा जोरो पर है। चाहे बड़ा नेता हो या छोटा कार्यकर्ता सब इसी सोच में लगे हुए है कि पार्टी फिर कैसे खड़ी हो सकती है। नेताओं का मनाना है कि यूपी के चुनाव पार्टी के लिए अहम है। यूपी चुनाव को लेकर पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी यूपी के नेताओ की लगातार बैठके भी ले रहे है। लेकिन पार्टी के कई नेता बैठकों पर अलग ही राय रखते है। उनका मानना है कि बंद कमरे में दो से तीन घंटे बैठक करने से कोई चुनाव नहीं जीते जाते। आज पार्टी की जो देशभर में जो स्थिति है कि उसके लिए बड़े नेता से लेकर कार्यकर्ताओ को जमीन पर उतरना होगा। लोगों की नब्ज को समझना होगा। इसके बाद ही पार्टी मजबूत स्थिति में पहुुंच सकेंगी। बैठक करने से मैदान की स्थिति को समझा नहीं जा
सकता।
-ओ.पी.पाल, कविता जोशी व राहुल
23Oct-2016
शनिवार, 22 अक्टूबर 2016
मिशन मोड़ पर आई सिंचाई परियोजनाएं!
नाबार्ड ने केंद्र को सौंपी 1500 करोड़ की रकम
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश के कृषि क्षेत्र को प्रोत्साहन देने की दिशा में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत लंबित 99 सिंचाई परियोजनाओं को मिशन मोड़ पर शुरू करते हुए तीन साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा है। इन परियोजनाओं को पूरा करके 76 लाख हेक्टेयर से भी ज्यादा सिंचाई क्षमता सृजित करने हेतु सरकार ने नाबार्ड का वित्तीय सहारा लिया है, जिसने केंद्र सरकार को पहली किश्त के रूप में 1500 करोड़ रुपये की रकम सौंप दी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कृषि और किसानों की अर्थव्यवस्था में सुधार की दिशा में देश में दो दशक पहले शुरू की गई त्वरित सिंचाई कार्यक्रम की लंबित सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई परियोजना का ऐलान किया था। इसके तहत केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गत 27 जुलाई चयनित की गई 99 प्राथमिकता वाली इन परियोजनाओं को पूरा करने और नाबार्ड के माध्यम से धन की व्यवस्था के लिए एक मिशन की स्थापना को अपनी मंजूरी दी गई थी। इसमें विभिन्न राज्यों में सूखा एवं बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए लंबित 99 परियोजनाओं के लिए करीब 77 हजार करोड़ रुपये की लागत का अनुमान लगाया गया। इसके लिए पिछले महीने नाबार्ड और केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के बीच हुए करार के तहत नाबार्ड ने देश के इतिहास में पहली बार सिंचाई परियोजनाओं के लिए ऋण के रूप में शुक्रवार को केंद्रीय वित्त मंत्रालय के जरिए जल संसाधन मंत्रालय को 1500 करोड़ रुपये का चेक सौंप दिया है। इस संबन्ध में केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा सरंक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने बताया कि इस रकम को नौ राज्यों में जरूरत के हिसाब से भेजने की प्रक्रिया तत्काल प्रभाव से शुरू कर दी गई है। उन्होंने बताया कि इन लंबित सिंचाई परियोजनाओं को दिसंबर 2019 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके तहत 76 लाख हेक्टेयर से भी ज्यादा सिंचाई क्षमता का सृजन हो सकेगा। इन परियोजनाओं को पूरा करने के बारे में उन्होंने कहा के इस साल 23 और वर्ष 2017-18 में 31 तथा बाकी बची 45 सिंचाई परियोजनाओं को दिसंबर 2019 तक पूरा कर लिया जाएगा।
देश में यह पहली बार
केंद्रीय मंत्री सुश्री उमा भारती ने कहा कि देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि देश के कृषि और किसानों के लिए केंद्र सरकार इस परियोजनाओं को पूरा करने में नाबार्ड आर्थिक मदद के लिए आगे आया है, जिसमें वित्त मंत्रालय, निति आयोग और कृषि मंत्रालय और अन्य संबन्धित मंत्रालयों व विभागों ने एक मेगा योजना के तहत ऐसी योजना तैयार की है। देश में सिंचाई परियोजना को पहली बार मिशन मोड पर लाया गया है। पहली बार ही केंद्र के अलावा राज्यों को भी नाबार्ड ऋण मुहैया कराएगा। उनका दावा है कि जब सिंचाई क्षमता का विकास होगा तो निश्चित तौर पर गांवों से शहर की ओर पलायन में भी कमी आएगा और देश की जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान भी बढ़ेगा। उन्होेंने इस सिंचाई परियोजना की विशेषताएं गिनाते हुए कहा कि जहां इस परियोजना के दायरे में देशभर के वे सभी जिले शामिल किये गये हैं, जहां सूखा या बाढ़ के कारण किसान आर्थिक रूप से कमजोर हो रहा है। इसके लिए सरकार ने पहले ही एक सर्वे कराने के बाद ही इस परियोजना को पटरी पर उतारा गया है।
छग के पांच जिलों में तीन परियोजना
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत छत्तीसगढ़ के मनियारी टैंक, केलो तथा खरुंग नामक तीन सिंचाई परियोजनाओं को प्राथकिता में रखा है, जिसमें बिलासपुर में दो, रायगढ़ जांजगीर, चंपा में इस योजना को कार्यान्वित करके सिंचाई क्षमता में वृद्धि करने की योजना है। इसके मध्य प्रदेश में ऐसी 14 सिंचाई परियोजनाएं शुरू की जा रही है, जिसमें राज्य के कई दर्जन जिलों में इसका कार्यान्वयन किया जाएगा।
22Oct-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश के कृषि क्षेत्र को प्रोत्साहन देने की दिशा में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत लंबित 99 सिंचाई परियोजनाओं को मिशन मोड़ पर शुरू करते हुए तीन साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा है। इन परियोजनाओं को पूरा करके 76 लाख हेक्टेयर से भी ज्यादा सिंचाई क्षमता सृजित करने हेतु सरकार ने नाबार्ड का वित्तीय सहारा लिया है, जिसने केंद्र सरकार को पहली किश्त के रूप में 1500 करोड़ रुपये की रकम सौंप दी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कृषि और किसानों की अर्थव्यवस्था में सुधार की दिशा में देश में दो दशक पहले शुरू की गई त्वरित सिंचाई कार्यक्रम की लंबित सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई परियोजना का ऐलान किया था। इसके तहत केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गत 27 जुलाई चयनित की गई 99 प्राथमिकता वाली इन परियोजनाओं को पूरा करने और नाबार्ड के माध्यम से धन की व्यवस्था के लिए एक मिशन की स्थापना को अपनी मंजूरी दी गई थी। इसमें विभिन्न राज्यों में सूखा एवं बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए लंबित 99 परियोजनाओं के लिए करीब 77 हजार करोड़ रुपये की लागत का अनुमान लगाया गया। इसके लिए पिछले महीने नाबार्ड और केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के बीच हुए करार के तहत नाबार्ड ने देश के इतिहास में पहली बार सिंचाई परियोजनाओं के लिए ऋण के रूप में शुक्रवार को केंद्रीय वित्त मंत्रालय के जरिए जल संसाधन मंत्रालय को 1500 करोड़ रुपये का चेक सौंप दिया है। इस संबन्ध में केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा सरंक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने बताया कि इस रकम को नौ राज्यों में जरूरत के हिसाब से भेजने की प्रक्रिया तत्काल प्रभाव से शुरू कर दी गई है। उन्होंने बताया कि इन लंबित सिंचाई परियोजनाओं को दिसंबर 2019 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके तहत 76 लाख हेक्टेयर से भी ज्यादा सिंचाई क्षमता का सृजन हो सकेगा। इन परियोजनाओं को पूरा करने के बारे में उन्होंने कहा के इस साल 23 और वर्ष 2017-18 में 31 तथा बाकी बची 45 सिंचाई परियोजनाओं को दिसंबर 2019 तक पूरा कर लिया जाएगा।
देश में यह पहली बार
केंद्रीय मंत्री सुश्री उमा भारती ने कहा कि देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि देश के कृषि और किसानों के लिए केंद्र सरकार इस परियोजनाओं को पूरा करने में नाबार्ड आर्थिक मदद के लिए आगे आया है, जिसमें वित्त मंत्रालय, निति आयोग और कृषि मंत्रालय और अन्य संबन्धित मंत्रालयों व विभागों ने एक मेगा योजना के तहत ऐसी योजना तैयार की है। देश में सिंचाई परियोजना को पहली बार मिशन मोड पर लाया गया है। पहली बार ही केंद्र के अलावा राज्यों को भी नाबार्ड ऋण मुहैया कराएगा। उनका दावा है कि जब सिंचाई क्षमता का विकास होगा तो निश्चित तौर पर गांवों से शहर की ओर पलायन में भी कमी आएगा और देश की जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान भी बढ़ेगा। उन्होेंने इस सिंचाई परियोजना की विशेषताएं गिनाते हुए कहा कि जहां इस परियोजना के दायरे में देशभर के वे सभी जिले शामिल किये गये हैं, जहां सूखा या बाढ़ के कारण किसान आर्थिक रूप से कमजोर हो रहा है। इसके लिए सरकार ने पहले ही एक सर्वे कराने के बाद ही इस परियोजना को पटरी पर उतारा गया है।
छग के पांच जिलों में तीन परियोजना
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत छत्तीसगढ़ के मनियारी टैंक, केलो तथा खरुंग नामक तीन सिंचाई परियोजनाओं को प्राथकिता में रखा है, जिसमें बिलासपुर में दो, रायगढ़ जांजगीर, चंपा में इस योजना को कार्यान्वित करके सिंचाई क्षमता में वृद्धि करने की योजना है। इसके मध्य प्रदेश में ऐसी 14 सिंचाई परियोजनाएं शुरू की जा रही है, जिसमें राज्य के कई दर्जन जिलों में इसका कार्यान्वयन किया जाएगा।
22Oct-2016
शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016
सड़क सुरक्षा पर राज्य सरकारें भी हुई गंभीर!
वाहन चालकों और श्रमिकों को मिलेगा प्रशिक्षण
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में सड़क सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार की चिंता में धीरे-धीरे राज्य भी गंभीर नजर आने लगे हैं। मसलन देश में सुरक्षित सड़क निर्माण तथा सड़कों पर दौड़ते वाहनों के चालकों की कौशल क्षमता बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार के कौशल विकास कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए राज्य सरकारें भी सामने आ गई हैं।
दरअसल केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने देश में सड़क परियोजनाओं में निर्माण की गुणवत्ता और सुरक्षित तकनीक को अपनी प्राथमिकता में शामिल किया है। देश में लगातार बढ़ते सड़क हादसों पर अंकुश लगाने के लिए मंत्रालय ने जहां सड़क के बुनियादी ढांचे को आधार बनाने का निर्णय लिया, वहीं सड़कों पर चलने वाले वाहनों के चालकों की कौशल क्षमता को दायरे में शामिल किया। इसके लिए केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने सड़क निर्माण के लिए काम करने वाले श्रमिको और चालकों के प्रशिक्षण हेतु इसी साल एक कौशल विकास कार्यक्रम की शुरूआत की है, जिसमें केंद्रीय कौशल विकास मंत्रालय के साथ करार करके सड़क मंत्रालय ने पिछले तीन माह में इस दिशा में कई दिशानिर्देश जारी करके राज्यों से प्रस्ताव मांगे हैं। इस कार्यक्रम के तहत सड़क निर्माण में लगे श्रमिकों और वाहनों के चालकों को प्रशिक्षण देकर उनका कौशल विकास करना शामिल है। मंत्रालय के अनुसार इस कार्यक्रम के लिए अभी तक नौ राज्यों के परिवहन निगमों से वाहन चालकों के प्रशिक्षण हेतु 55 प्रस्ताव हासिल हुए हैं। ये निगम अपने संचालित प्रशिक्षण केंद्रों में वाहन चालकों को प्रशिक्षण देकर कौशल विकास कार्यक्रम को अंजाम देंगे।
श्रमिको को यहां मिलेगा प्रशिक्षण
मंत्रालय के अनुसार इस कार्यक्रम के तहत राजमार्ग निर्माण के श्रमिकों के प्रशिक्षण की समीक्षा के लिए छूट ग्राहियों की सेवा ली जा रही है। इनके अलावा परियोजना स्थल के ठेकेदारों, आईटीआई तथा भारतीय राजमार्ग इंजीनियर्स अकादमी द्वारा श्रमिकों को प्रशिक्षण देने का प्रस्ताव है। केंद्र के हाल ही में जारी दिशानिर्देश के अनुसार सौ करोड़ रुपये और इसके अधिक की परियोजना के लिए प्रशिक्षण कार्य परियोजना प्रमुख द्वारा चलाया जाएगा। यह प्रशिक्षण कार्य प्रशिक्षण महानिदेशक द्वारा अधिकृत प्रशिक्षण केन्द्रों पर चलाये जाएंगे। परियोजना स्थल के निकट के संस्थानों को वरीयता दी जाएगी। परियोजना प्रमुख और कार्यपालक अभियंता को यह सुनिश्चित करना होगा, कि प्रशिक्षण एनएसक्यूएफ के दिशा-निदेर्शों के अनुरूप दिया जा रहा है या नहीं।
प्रशिक्षण केंद्रों को अनुदान
मंत्रालय के अनुसार सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने केन्द्र तथा सभी राज्यों के संबंधित विभाग के अधिकारियों और एजेसियों को निर्देश दिये हैं कि इस कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षण सुविधाएं स्थापित करने हेतु निजी प्रवर्तकों को भी आंमत्रित किया जा रहा है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय प्रत्येक राज्य के सड़क परिवहन निगम को प्रशिक्षण एवं कौशल प्रशिक्षण और प्रत्येक निजी प्रवर्तक को प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित के लिए एक-एक करोड़ रुपये का अनुदान दे रही है। इसमें निजी प्रवर्तकों को यह अनुदान परियोजना की उचित समीक्षा और एनएसडीसी या मान्यता प्राप्त वित्तीय संस्थान की मंजूरी के बाद दिया जाएगा। केंद्र सरकार की योजना है कि इस तरह के प्रशिक्षण केंद्रों में प्रशिक्षण लेने वाले श्रमिको और चालकों को दैनिक न्यूनतम परिश्रामिक के आधार पर छात्रवृत्ति देने का भी प्रावधान किया गया है, जिसका पूरा खर्च केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय की सड़क सुरक्षा निधि के जरिए वहन किया जाएगा। जबकि प्रशिक्षण लागत का खर्च कौशल विकास मंत्रालय की प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना कोष से होगा।
21Oct-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में सड़क सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार की चिंता में धीरे-धीरे राज्य भी गंभीर नजर आने लगे हैं। मसलन देश में सुरक्षित सड़क निर्माण तथा सड़कों पर दौड़ते वाहनों के चालकों की कौशल क्षमता बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार के कौशल विकास कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए राज्य सरकारें भी सामने आ गई हैं।
दरअसल केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने देश में सड़क परियोजनाओं में निर्माण की गुणवत्ता और सुरक्षित तकनीक को अपनी प्राथमिकता में शामिल किया है। देश में लगातार बढ़ते सड़क हादसों पर अंकुश लगाने के लिए मंत्रालय ने जहां सड़क के बुनियादी ढांचे को आधार बनाने का निर्णय लिया, वहीं सड़कों पर चलने वाले वाहनों के चालकों की कौशल क्षमता को दायरे में शामिल किया। इसके लिए केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने सड़क निर्माण के लिए काम करने वाले श्रमिको और चालकों के प्रशिक्षण हेतु इसी साल एक कौशल विकास कार्यक्रम की शुरूआत की है, जिसमें केंद्रीय कौशल विकास मंत्रालय के साथ करार करके सड़क मंत्रालय ने पिछले तीन माह में इस दिशा में कई दिशानिर्देश जारी करके राज्यों से प्रस्ताव मांगे हैं। इस कार्यक्रम के तहत सड़क निर्माण में लगे श्रमिकों और वाहनों के चालकों को प्रशिक्षण देकर उनका कौशल विकास करना शामिल है। मंत्रालय के अनुसार इस कार्यक्रम के लिए अभी तक नौ राज्यों के परिवहन निगमों से वाहन चालकों के प्रशिक्षण हेतु 55 प्रस्ताव हासिल हुए हैं। ये निगम अपने संचालित प्रशिक्षण केंद्रों में वाहन चालकों को प्रशिक्षण देकर कौशल विकास कार्यक्रम को अंजाम देंगे।
श्रमिको को यहां मिलेगा प्रशिक्षण
मंत्रालय के अनुसार इस कार्यक्रम के तहत राजमार्ग निर्माण के श्रमिकों के प्रशिक्षण की समीक्षा के लिए छूट ग्राहियों की सेवा ली जा रही है। इनके अलावा परियोजना स्थल के ठेकेदारों, आईटीआई तथा भारतीय राजमार्ग इंजीनियर्स अकादमी द्वारा श्रमिकों को प्रशिक्षण देने का प्रस्ताव है। केंद्र के हाल ही में जारी दिशानिर्देश के अनुसार सौ करोड़ रुपये और इसके अधिक की परियोजना के लिए प्रशिक्षण कार्य परियोजना प्रमुख द्वारा चलाया जाएगा। यह प्रशिक्षण कार्य प्रशिक्षण महानिदेशक द्वारा अधिकृत प्रशिक्षण केन्द्रों पर चलाये जाएंगे। परियोजना स्थल के निकट के संस्थानों को वरीयता दी जाएगी। परियोजना प्रमुख और कार्यपालक अभियंता को यह सुनिश्चित करना होगा, कि प्रशिक्षण एनएसक्यूएफ के दिशा-निदेर्शों के अनुरूप दिया जा रहा है या नहीं।
प्रशिक्षण केंद्रों को अनुदान
मंत्रालय के अनुसार सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने केन्द्र तथा सभी राज्यों के संबंधित विभाग के अधिकारियों और एजेसियों को निर्देश दिये हैं कि इस कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षण सुविधाएं स्थापित करने हेतु निजी प्रवर्तकों को भी आंमत्रित किया जा रहा है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय प्रत्येक राज्य के सड़क परिवहन निगम को प्रशिक्षण एवं कौशल प्रशिक्षण और प्रत्येक निजी प्रवर्तक को प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित के लिए एक-एक करोड़ रुपये का अनुदान दे रही है। इसमें निजी प्रवर्तकों को यह अनुदान परियोजना की उचित समीक्षा और एनएसडीसी या मान्यता प्राप्त वित्तीय संस्थान की मंजूरी के बाद दिया जाएगा। केंद्र सरकार की योजना है कि इस तरह के प्रशिक्षण केंद्रों में प्रशिक्षण लेने वाले श्रमिको और चालकों को दैनिक न्यूनतम परिश्रामिक के आधार पर छात्रवृत्ति देने का भी प्रावधान किया गया है, जिसका पूरा खर्च केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय की सड़क सुरक्षा निधि के जरिए वहन किया जाएगा। जबकि प्रशिक्षण लागत का खर्च कौशल विकास मंत्रालय की प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना कोष से होगा।
21Oct-2016
गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016
भिक्षावृत्ति की समस्या से निपटने की तैयारी!
अभावग्रस्त लोगों की सुरक्षा में आएगा मॉडल कानून
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार देश में अभावग्रस्त और भिक्षावृत्ति की समस्या से निपटने के लिए अभावग्रस्त (संरक्षण, देखभाल और पुनर्वास) विधेयक जैसे मॉडल कानून लाने की तैयारी में है। जिसके मसौदे पर विशेषज्ञों और राज्यों से राय मांगी जा रही है।
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने बुधवार को इस विधेयक के मसौदे को लेकर विधायी परामर्श के लिए एक बैठक में विशेषज्ञों और विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने मंत्रालय द्वारा तैयार किये गये अभावग्रस्त (संरक्षण, देखभाल और पुनर्वास) व्यक्तियों के लिए मॉडल विधेयक-2016 के बारे में विस्तार से विचार विमर्श किया गया। बैठक की अध्यक्षता करते हुए केंद्रीय मंत्री गहलोत ने कहा कि इस मॉडल कानून के जरिए सरकार का अभावग्रस्त और भिक्षावृत्ति की समस्या से निपटना प्रमुख मकसद है। सरकार चाहती है कि इस समस्या से निपटने के लिए दंडात्मक तौर तरीकों के बजाए ऐसे अभावग्रस्त लोंगों की सुरक्षा,देखभाल, सहायता, आश्रय, प्रशिक्षण और अन्य सेवाएं मुहैया कराकर उनका पुनर्वास कराया जाए। जिसके लिए एक आदर्श कानून बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है। इसीलिए मंत्रालय द्वारा तैयार किये गये इस मॉडल कानून संबन्धी विधेयक के मसौदे पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अलावा सामाजिक विशेषज्ञों की राय जरूरी है, जिनसे ऐसे विधान को अपनाने का आव्हान किया जा रहा है। इस बैठक में राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रशासनों के समाज कल्याण विभाग के प्रतिनिधि वरिष्ठ अधिकारियों, संबंधित मंत्रालयों व विभागों के प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकतार्ओं, विधि आयोग, बार काउंसिल और बेसहारा लोगों के कल्याण के लिए कार्यरत प्रतिष्ठित गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी मंथन किया।
विशेषज्ञों की राय पर मसौदा
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की सचिव श्रीमती अनीता अग्निहोत्री ने इस विधेयक की मुख्य विशेषताओं के बारे में बताया कि मंत्रालय के इस दृष्टिकोण में मंत्रालय ने राज्य प्रतिनिधियों और भिक्षावृत्ति के क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ आयोजित राष्ट्रीय परामर्श बैठकों में भी मंथन किया है और मंत्रालय के सामने सामने आई सिफारिशों के आधार पर अभावग्रस्त व्यक्तियों के लिए मॉडल कानून का मसौदा तैयार किया गया है। इस विधेयक का उद्देश्य अभावग्रस्त व्यक्तियों सामाजिक सुरक्षा के तहत पहचान करने के लिए इस प्रयास को आगे बढ़ाने हेतु एजेंसियों की स्थापना करने पर विचार किया जा रहा है।
राज्य ने भी बनाए कानून
मंत्रालय के अनुसार इस दिशा में 20 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों ने या तो अपने कानून तैयार किए हैं या अन्य राज्यों द्वारा बनाए गए कानूनों को अपनाया है। इसलिए इन कानूनों के प्रावधान और इन्हें लागू करने की स्थिति विभिन्न राज्यों में अलग-अलग है। इसी प्रकार भिखारियों के पुनर्वास के प्रयास भी एक समान नहीं है। अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने बम्बई भिक्षावृत्ति निरोधक कानून 1959 को अपना रखा है जिसके तहत भिक्षावृत्ति अपराध है।
देश में बढ़ रही है भिक्षावृत्ति
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भिखारियों और खानाबदोशों की जनसंख्या लगभग 4.13 लाख आंकी गई थी, जिनमें 3.72 लाख गैर कामगार श्रेणी और 41,453 सीमांत श्रमिक श्रेणी के शामिल है। जबकि मंत्रालय के पास फिलहाल बेसहारा लोगों की जनसंख्या के बारे में कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं हैं।
20Oct-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार देश में अभावग्रस्त और भिक्षावृत्ति की समस्या से निपटने के लिए अभावग्रस्त (संरक्षण, देखभाल और पुनर्वास) विधेयक जैसे मॉडल कानून लाने की तैयारी में है। जिसके मसौदे पर विशेषज्ञों और राज्यों से राय मांगी जा रही है।
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने बुधवार को इस विधेयक के मसौदे को लेकर विधायी परामर्श के लिए एक बैठक में विशेषज्ञों और विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने मंत्रालय द्वारा तैयार किये गये अभावग्रस्त (संरक्षण, देखभाल और पुनर्वास) व्यक्तियों के लिए मॉडल विधेयक-2016 के बारे में विस्तार से विचार विमर्श किया गया। बैठक की अध्यक्षता करते हुए केंद्रीय मंत्री गहलोत ने कहा कि इस मॉडल कानून के जरिए सरकार का अभावग्रस्त और भिक्षावृत्ति की समस्या से निपटना प्रमुख मकसद है। सरकार चाहती है कि इस समस्या से निपटने के लिए दंडात्मक तौर तरीकों के बजाए ऐसे अभावग्रस्त लोंगों की सुरक्षा,देखभाल, सहायता, आश्रय, प्रशिक्षण और अन्य सेवाएं मुहैया कराकर उनका पुनर्वास कराया जाए। जिसके लिए एक आदर्श कानून बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है। इसीलिए मंत्रालय द्वारा तैयार किये गये इस मॉडल कानून संबन्धी विधेयक के मसौदे पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अलावा सामाजिक विशेषज्ञों की राय जरूरी है, जिनसे ऐसे विधान को अपनाने का आव्हान किया जा रहा है। इस बैठक में राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रशासनों के समाज कल्याण विभाग के प्रतिनिधि वरिष्ठ अधिकारियों, संबंधित मंत्रालयों व विभागों के प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकतार्ओं, विधि आयोग, बार काउंसिल और बेसहारा लोगों के कल्याण के लिए कार्यरत प्रतिष्ठित गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी मंथन किया।
विशेषज्ञों की राय पर मसौदा
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की सचिव श्रीमती अनीता अग्निहोत्री ने इस विधेयक की मुख्य विशेषताओं के बारे में बताया कि मंत्रालय के इस दृष्टिकोण में मंत्रालय ने राज्य प्रतिनिधियों और भिक्षावृत्ति के क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ आयोजित राष्ट्रीय परामर्श बैठकों में भी मंथन किया है और मंत्रालय के सामने सामने आई सिफारिशों के आधार पर अभावग्रस्त व्यक्तियों के लिए मॉडल कानून का मसौदा तैयार किया गया है। इस विधेयक का उद्देश्य अभावग्रस्त व्यक्तियों सामाजिक सुरक्षा के तहत पहचान करने के लिए इस प्रयास को आगे बढ़ाने हेतु एजेंसियों की स्थापना करने पर विचार किया जा रहा है।
राज्य ने भी बनाए कानून
मंत्रालय के अनुसार इस दिशा में 20 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों ने या तो अपने कानून तैयार किए हैं या अन्य राज्यों द्वारा बनाए गए कानूनों को अपनाया है। इसलिए इन कानूनों के प्रावधान और इन्हें लागू करने की स्थिति विभिन्न राज्यों में अलग-अलग है। इसी प्रकार भिखारियों के पुनर्वास के प्रयास भी एक समान नहीं है। अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने बम्बई भिक्षावृत्ति निरोधक कानून 1959 को अपना रखा है जिसके तहत भिक्षावृत्ति अपराध है।
देश में बढ़ रही है भिक्षावृत्ति
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भिखारियों और खानाबदोशों की जनसंख्या लगभग 4.13 लाख आंकी गई थी, जिनमें 3.72 लाख गैर कामगार श्रेणी और 41,453 सीमांत श्रमिक श्रेणी के शामिल है। जबकि मंत्रालय के पास फिलहाल बेसहारा लोगों की जनसंख्या के बारे में कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं हैं।
20Oct-2016
अनिवार्य मतदान व्यवहारिक नहीं: जैदी
मतदाता जागरूकता पर अंतर्राष्ट्रीय मंथन शुरू
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
भारतीय निर्वाचन आयोग की मेजबानी में बुधवार को यहां शुरू हुए मतदाता जागरूकता पर शुरू हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया के 28 देशों ने चुनाव प्रक्रिया को दुरस्त करने के लिए मंथन मंथन शुरू कर दिया है। सम्मेलन में मतदाता जागरूकता पर बल देते हुए भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त डा. नसीम जैदी ने कहा कि मतदान को अनिवार्य बनाने का विचार किसी भी तरह व्यवहारिक नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर भारत निर्वाचन आयोग की मेजबानी में मतदाता जागरूकता पर आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त डा. नसीम जैदी ने भारत में मतदान को अनिवार्य बनाने को लेकर पिछले कई सालों से चल रही राजनीतिक बहस और मांग को एक सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनिवार्य मतदान व्यवहारिक नहीं है, लेकिन मतदान के प्रति मतदाताओं को जागरूक करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि लोकसभा में इसी तरह की मांग को सरकार ने भी खारिज कर दिया था। जैदी ने कहा इससे पहले यूपीए के शासनकाल में भी इस अनिवार्य मतदान चर्चा का विषय रहा है, लेकिन ऐसा विचार इतना व्यावहारिक नहीं लगता। इस मौके पर भारत के चुनाव आयुक्त ए.के. जोती और ओपी रावत के अलावा उप चुनाव आयुक्त उमेश सिन्हा अन्य देशों के सामने भारतीय चुनाव प्रक्रिया की प्रस्तुतिकरण भी पेश किया।
लोकसभा में हुई थी चर्चा
मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा इसी साल फरवरी में बजट सत्र के दौरान भाजपा सांसद जनार्दन सिंह सीग्रीवाल द्वारा लोकसभा में लाये गये ऐसे एक निजी विधेयक पर चर्चा हो चुकी है, जिसका जवाब देते हुए तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री सदानंद गौड़ा ने मतदान को अनिवार्य बनाने को अव्यवहारिक करार देते हुए कहा था कि कि लोकतंत्र में मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी जरूरी है लेकिन मतदान एक स्वैच्छिक अधिकार है और किसी को इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। ऐसा करना मानवाधिकार का उल्लंघन होगा। किसी को मतदान न करने के लिए दंडित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ होगा। यहीं नहीं विधि आयोग ने मार्च महीने में चुनाव सुधारों पर अपनी रिपोर्ट में अनिवार्य मतदान की सिफारिश नहीं करने का फैसला किया था। विधि आयोग ने इसे कई कारणों से अत्यंत अनुपयुक्त बताया था।
दुनिया के 32 देशों में अनिवार्य मतदान
केंद्र सरकार का मत है कि भले ही ब्राजील समेत दुनिया के 32 देशों में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था है, लेकिन भारत जैसे विविधताओं से भरे लोकतांत्रिक देश में ऐसा संभव नहीं है। कानून मंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी जरूरी है, लेकिन मतदान एक स्वैच्छिक अधिकार है और किसी को इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। इस सम्मेलन में भारत और ब्राजील समेत 28 देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं।
एक साथ चुनाव की कवायद
मुख्य चुनाव आयुक्त जैदी ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कवायद पर कहा कि इस बारे में चुनाव आयोग ने एक संसदीय समिति और कानून मंत्रालय को बताया है कि जब राजनीतिक दल सर्वसम्मति से संविधान में संशोधन करें और नयी ईवीएम खरीदने जैसी आयोग की कुछ मांगों को पूरा किया जाए, तो ऐसा संभव हो सकता है। मई में इस मुद्दे पर कानून मंत्रालय को अपने जवाब में आयोग ने कहा था कि वह प्रस्ताव का समर्थन करता है, लेकिन इसमें 9000 करोड़ रुपये से अधिक लागत आएगी। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल मार्च को भाजपा के पदाधिकारियों की एक बैठक में पांच साल में एक बार लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की वकालत की।
रास आई भारत की चुनाव प्रणाली
इस सम्मेलन के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त जैदी ने पिछले एक दशक में हुए चुनाव सुधार के बारे में अपनाई गई चुनाव प्रणाली और प्रक्रियाओं की जानकारी दी, जिसे इस दौरान एक प्रदर्शनी के जरिए प्रदर्शित भी किया गया है। इस प्रदर्शनी में हालांकि सभी देशों ने अपनी चुनाव प्रक्रियाओं का प्रदर्शन किया है, लेकिन भारत की प्रदर्शनी और चुनाव प्रणाली सभी देशों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस प्रदर्शनी में सूचनात्मक सामग्री, मॉडल मतदान केंद्र, ईवीएम पर लाइव वोटिंग के प्रावधान, मतदाता शिक्षा उपकरण और सामग्री के अलावा फोटो, वीडियो, 3डी मॉडल, ईसीआई द्वारा विकसित इंटरैक्टिव स्वीप अभियान का भी प्रदर्शन किया गया है।
20Oct-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
भारतीय निर्वाचन आयोग की मेजबानी में बुधवार को यहां शुरू हुए मतदाता जागरूकता पर शुरू हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया के 28 देशों ने चुनाव प्रक्रिया को दुरस्त करने के लिए मंथन मंथन शुरू कर दिया है। सम्मेलन में मतदाता जागरूकता पर बल देते हुए भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त डा. नसीम जैदी ने कहा कि मतदान को अनिवार्य बनाने का विचार किसी भी तरह व्यवहारिक नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर भारत निर्वाचन आयोग की मेजबानी में मतदाता जागरूकता पर आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त डा. नसीम जैदी ने भारत में मतदान को अनिवार्य बनाने को लेकर पिछले कई सालों से चल रही राजनीतिक बहस और मांग को एक सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनिवार्य मतदान व्यवहारिक नहीं है, लेकिन मतदान के प्रति मतदाताओं को जागरूक करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि लोकसभा में इसी तरह की मांग को सरकार ने भी खारिज कर दिया था। जैदी ने कहा इससे पहले यूपीए के शासनकाल में भी इस अनिवार्य मतदान चर्चा का विषय रहा है, लेकिन ऐसा विचार इतना व्यावहारिक नहीं लगता। इस मौके पर भारत के चुनाव आयुक्त ए.के. जोती और ओपी रावत के अलावा उप चुनाव आयुक्त उमेश सिन्हा अन्य देशों के सामने भारतीय चुनाव प्रक्रिया की प्रस्तुतिकरण भी पेश किया।
लोकसभा में हुई थी चर्चा
मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा इसी साल फरवरी में बजट सत्र के दौरान भाजपा सांसद जनार्दन सिंह सीग्रीवाल द्वारा लोकसभा में लाये गये ऐसे एक निजी विधेयक पर चर्चा हो चुकी है, जिसका जवाब देते हुए तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री सदानंद गौड़ा ने मतदान को अनिवार्य बनाने को अव्यवहारिक करार देते हुए कहा था कि कि लोकतंत्र में मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी जरूरी है लेकिन मतदान एक स्वैच्छिक अधिकार है और किसी को इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। ऐसा करना मानवाधिकार का उल्लंघन होगा। किसी को मतदान न करने के लिए दंडित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ होगा। यहीं नहीं विधि आयोग ने मार्च महीने में चुनाव सुधारों पर अपनी रिपोर्ट में अनिवार्य मतदान की सिफारिश नहीं करने का फैसला किया था। विधि आयोग ने इसे कई कारणों से अत्यंत अनुपयुक्त बताया था।
दुनिया के 32 देशों में अनिवार्य मतदान
केंद्र सरकार का मत है कि भले ही ब्राजील समेत दुनिया के 32 देशों में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था है, लेकिन भारत जैसे विविधताओं से भरे लोकतांत्रिक देश में ऐसा संभव नहीं है। कानून मंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी जरूरी है, लेकिन मतदान एक स्वैच्छिक अधिकार है और किसी को इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। इस सम्मेलन में भारत और ब्राजील समेत 28 देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं।
एक साथ चुनाव की कवायद
मुख्य चुनाव आयुक्त जैदी ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कवायद पर कहा कि इस बारे में चुनाव आयोग ने एक संसदीय समिति और कानून मंत्रालय को बताया है कि जब राजनीतिक दल सर्वसम्मति से संविधान में संशोधन करें और नयी ईवीएम खरीदने जैसी आयोग की कुछ मांगों को पूरा किया जाए, तो ऐसा संभव हो सकता है। मई में इस मुद्दे पर कानून मंत्रालय को अपने जवाब में आयोग ने कहा था कि वह प्रस्ताव का समर्थन करता है, लेकिन इसमें 9000 करोड़ रुपये से अधिक लागत आएगी। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल मार्च को भाजपा के पदाधिकारियों की एक बैठक में पांच साल में एक बार लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की वकालत की।
रास आई भारत की चुनाव प्रणाली
इस सम्मेलन के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त जैदी ने पिछले एक दशक में हुए चुनाव सुधार के बारे में अपनाई गई चुनाव प्रणाली और प्रक्रियाओं की जानकारी दी, जिसे इस दौरान एक प्रदर्शनी के जरिए प्रदर्शित भी किया गया है। इस प्रदर्शनी में हालांकि सभी देशों ने अपनी चुनाव प्रक्रियाओं का प्रदर्शन किया है, लेकिन भारत की प्रदर्शनी और चुनाव प्रणाली सभी देशों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस प्रदर्शनी में सूचनात्मक सामग्री, मॉडल मतदान केंद्र, ईवीएम पर लाइव वोटिंग के प्रावधान, मतदाता शिक्षा उपकरण और सामग्री के अलावा फोटो, वीडियो, 3डी मॉडल, ईसीआई द्वारा विकसित इंटरैक्टिव स्वीप अभियान का भी प्रदर्शन किया गया है।
20Oct-2016
बुधवार, 19 अक्टूबर 2016
लोकतांत्रिक मोर्चे पर अंतिम क्षणों में जागा पाक !
मतदाता जागरूकता पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आज से
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता जागरूकता पर कल बुधवार से आरंभ हो रहे दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया के 28 देश चुनाव प्रक्रिया को दुरस्त करने के लिए मंथन करेंगे। पहले लोकतांत्रिक मोर्चे पर ना-नुकर करते पाकिस्तान ने अंतिम क्षणों में अपना इरादा बदला और एक कनिष्ठ अधिकारी को भारत भेजने का निर्णय लिया।
संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर भारत निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता जागरूकता के साथ चुनावों में पारदर्शिता लाने के लिए कल बुधवार यानि 19 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक नई दिल्ली में दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है, जिसमें 28 देशों के चुनाव आयोग और पांच अंतर्राष्ट्रीय चुनाव निकाय संबन्धी संस्थाएं हिस्सा ले रहे हैं। चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का मकसद चुनाव प्रक्रिया को दुरस्त करना और मतदान की सुनिश्चितता के लिए मतदाताओं को जागरूक करने की रणनीति तैयार करना है। इस सम्मेलन में हिस्सा ले रहे सभी देश अपने अपने देशों की चुनाव प्रक्रियाओं ओर अनुभव को एकदूसरे के साथ साझा करेंगे। वहीं भारत के विभिन्न राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों और वरिष्ठ अधिकारी भी इस सम्मेलन का हिस्सा होंगे। सम्मेलन के एक दिन पहले चुनाव आयोग के प्रवक्ता ने यह जानकारी दी है कि पाकिस्तान के चुनाव आयोग से निदेशक जनसंपर्क एवं राजनीतिक वित्त अल्ताफ अहमद सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत आ रहे हैं। जबकि बलूचिस्तान न्यायमूर्ति सेवानिवृत्त शकील अहमद बलोच जैसे वरिष्ठ अधिकारी को प्रतिनिधित्व इस सम्मेलन में प्रतिनिधित्व करना था। गौरतलब है कि उरी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया है। इस कवायद में उसके मुल्क में होने वाले तमाम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का भी बहिष्कार किया है। नतीजतन सार्क सम्मेलन रद्द करना पड़ा था।
चुनाव प्रक्रिया दुरस्त करने पर होगा मंथन
भारत के उप चुनाव आयुक्त उमेश सिन्हा के अनुसार भारत ने करीब 40 देशों के निर्वाचन आयोगों को इस सम्मेलन में पंजीकरण कराने के लिए आॅनलाइन निमंत्रण दिया था। सिन्हा के अनुसार करीब तीन महीने पहले निमंत्रण पत्र आॅनलाइन भेजे गए थे और सभी देशोें के चुनाव आयोगों को अपनी भागीदारी के लिए आॅनलाइन पंजीकरण कराने को कहा गया था, लेकिन निर्धारित तिथि तक पाकिस्तान ने इस सम्मेलन में प्रतिनिधित्व करने के लिए पंजीकरण नहीं कराया। सिन्हा के अनुसार करीब तीन महीने पहले निमंत्रण पत्र आॅनलाइन भेजे गए थे और सभी देशोें के चुनाव आयोगों को अपनी भागीदारी के लिए आॅनलाइन पंजीकरण कराने को कहा गया था।
एजेंडे में पांच विषय शामिल
उप चुनाव आयुक्त उमेश सिन्हा के अनुसार इस अंतर्राष्ट्रीय मंच से दुनियाभर में निष्पक्ष और स्वस्थ्य चुनाव प्रक्रिया के तहत पारदर्शिता लाने पर मंथन किया जाएगा। सम्मेलन में चुनाव सुधारों के लिए प्रमुख रूप से पांच विषय को एजेंडे में शामिल किया गया है। इसमें मतदाताओं में जागरूकता, मतदान में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना, चुनाव प्रक्रिया को दुरस्त बनाने के लिए चुनाव सुधार की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना शामिल है। उन्होंने कहा कि सम्मेलन में विस्तार से होने वाली चर्चा के बाद एक रेगुलेशन का प्रस्ताव भी पारित किया जाएगा, ताकि दुनियाभर में चुनाव प्रक्रिया में एकरूपता का समावेश किया जा सके। सम्मेलन में अफगानिस्तान, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, फिजी, जार्जिया, इंडोनेशिया, इराक, केन्या, लेसोथो, मलेशिया, मॉरीशस, माल्द्वीप, मैक्सिको, नेपाल, फिलीपिंस, श्रीलंका, थाईलैंड, युगांडा, नांबिया जैसे देश प्रतिनिधित्व करेंगे।
19Oct-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता जागरूकता पर कल बुधवार से आरंभ हो रहे दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया के 28 देश चुनाव प्रक्रिया को दुरस्त करने के लिए मंथन करेंगे। पहले लोकतांत्रिक मोर्चे पर ना-नुकर करते पाकिस्तान ने अंतिम क्षणों में अपना इरादा बदला और एक कनिष्ठ अधिकारी को भारत भेजने का निर्णय लिया।
संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर भारत निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता जागरूकता के साथ चुनावों में पारदर्शिता लाने के लिए कल बुधवार यानि 19 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक नई दिल्ली में दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है, जिसमें 28 देशों के चुनाव आयोग और पांच अंतर्राष्ट्रीय चुनाव निकाय संबन्धी संस्थाएं हिस्सा ले रहे हैं। चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का मकसद चुनाव प्रक्रिया को दुरस्त करना और मतदान की सुनिश्चितता के लिए मतदाताओं को जागरूक करने की रणनीति तैयार करना है। इस सम्मेलन में हिस्सा ले रहे सभी देश अपने अपने देशों की चुनाव प्रक्रियाओं ओर अनुभव को एकदूसरे के साथ साझा करेंगे। वहीं भारत के विभिन्न राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों और वरिष्ठ अधिकारी भी इस सम्मेलन का हिस्सा होंगे। सम्मेलन के एक दिन पहले चुनाव आयोग के प्रवक्ता ने यह जानकारी दी है कि पाकिस्तान के चुनाव आयोग से निदेशक जनसंपर्क एवं राजनीतिक वित्त अल्ताफ अहमद सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत आ रहे हैं। जबकि बलूचिस्तान न्यायमूर्ति सेवानिवृत्त शकील अहमद बलोच जैसे वरिष्ठ अधिकारी को प्रतिनिधित्व इस सम्मेलन में प्रतिनिधित्व करना था। गौरतलब है कि उरी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया है। इस कवायद में उसके मुल्क में होने वाले तमाम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का भी बहिष्कार किया है। नतीजतन सार्क सम्मेलन रद्द करना पड़ा था।
चुनाव प्रक्रिया दुरस्त करने पर होगा मंथन
भारत के उप चुनाव आयुक्त उमेश सिन्हा के अनुसार भारत ने करीब 40 देशों के निर्वाचन आयोगों को इस सम्मेलन में पंजीकरण कराने के लिए आॅनलाइन निमंत्रण दिया था। सिन्हा के अनुसार करीब तीन महीने पहले निमंत्रण पत्र आॅनलाइन भेजे गए थे और सभी देशोें के चुनाव आयोगों को अपनी भागीदारी के लिए आॅनलाइन पंजीकरण कराने को कहा गया था, लेकिन निर्धारित तिथि तक पाकिस्तान ने इस सम्मेलन में प्रतिनिधित्व करने के लिए पंजीकरण नहीं कराया। सिन्हा के अनुसार करीब तीन महीने पहले निमंत्रण पत्र आॅनलाइन भेजे गए थे और सभी देशोें के चुनाव आयोगों को अपनी भागीदारी के लिए आॅनलाइन पंजीकरण कराने को कहा गया था।
एजेंडे में पांच विषय शामिल
उप चुनाव आयुक्त उमेश सिन्हा के अनुसार इस अंतर्राष्ट्रीय मंच से दुनियाभर में निष्पक्ष और स्वस्थ्य चुनाव प्रक्रिया के तहत पारदर्शिता लाने पर मंथन किया जाएगा। सम्मेलन में चुनाव सुधारों के लिए प्रमुख रूप से पांच विषय को एजेंडे में शामिल किया गया है। इसमें मतदाताओं में जागरूकता, मतदान में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना, चुनाव प्रक्रिया को दुरस्त बनाने के लिए चुनाव सुधार की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना शामिल है। उन्होंने कहा कि सम्मेलन में विस्तार से होने वाली चर्चा के बाद एक रेगुलेशन का प्रस्ताव भी पारित किया जाएगा, ताकि दुनियाभर में चुनाव प्रक्रिया में एकरूपता का समावेश किया जा सके। सम्मेलन में अफगानिस्तान, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, फिजी, जार्जिया, इंडोनेशिया, इराक, केन्या, लेसोथो, मलेशिया, मॉरीशस, माल्द्वीप, मैक्सिको, नेपाल, फिलीपिंस, श्रीलंका, थाईलैंड, युगांडा, नांबिया जैसे देश प्रतिनिधित्व करेंगे।
19Oct-2016
मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016
इसी सप्ताह तय होंगी जीएसटी कर की दरें!
जीएसटी परिषद की तीन दिवसीय बैठक आज से
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
आगामी एक अप्रैल से जीएसटी कानून लागू करने की कवायद में जुटी केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में जीएसटी विधेयक पारित करने की तैयारी में है। इसी मकसद से कल मंगलवार से यहां शुरू होने वाली जीएसटी परिषद की तीन दिवसीय बैठक में जीएसटी कर की दरें तय किया जाना है और राज्यों की नई प्रणाली के फार्मूले पर भी आम सहमति बनाए जाने की संभावना है।
संसद के अगले महीने 16 नवंबर से शुरू हो रहे शीतकालीन सत्र में केंद्र सरकार की प्राथमिकता जीएसटी विधेयक को पारित कराने की होगी। इसका मकसद है कि सरकार आगामी नए वित्तीय वर्ष यानि एक अप्रैल से हरसंभव जीएसटी कानून लागू करना चाहती है। कल मंगलवार को यहां केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में शुरू होने वाली जीएसटी परिषद की तीन दिवसीय बैठक को इस लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दरअसल इस बैठक में परिषद को जीएसटी दरों का फैसला करना है। जीएसटी परिषद इस बैठक के एजेंडे में राज्यों को नयी प्रणाली में राजस्व हानि पर क्षतिपूर्ति के फामूर्ले जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों का समाधान भी तय किया जाना है। इससे पहले वित्त मंत्रालय जीएसटी परिषद में सभी मुद्दों पर आमसहमति बनाने के लिए 22 नवंबर की समयसीमा निर्धारित कर चुकी है, ताकि अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में व्यापक बुनियादी सुधार के प्रस्तावित वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली को देशभर में एक अप्रैल 2017 से लागू करने का लक्ष्य हासिल किया जा सके।
बैठक पर टिकी होंगी नजरे
जीएसटी परिषद की इस महत्वपूर्ण बैठक में होने वाले फैसलों पर देशभर खासरकार उद्योगजगत की नजरें लगी होंगी। इसका कारण साफ है कि जीएसटी की दर निर्धारित किए जाने की दृष्टि में तय होने वाली जीएसटी कर की दरें लोगों की जिंदगी को प्रभावित करने का काम करेंगी। जीएसटी परिषद की पिछले महीने हुई बैठक में बीस लाख रुपये सालाना कारोबार करने वाली कंपनियों को जीएसटी से छूट देने का फैसला किया है। वहीं इस छूट की सीमा को पहाड़ी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों के 11 राज्यों में दस लाख रुपये निर्धारित की गई थी। गत 30 सितंबर को परिषद इस छूट के लिए तैयार किये गये नियमों के मसौदे को अंतिम रूप दे चुकी है। जीएसटी कानून के तहत सेवाओं तथा वस्तुओं की आवाजाही को सुगम बनाने की कवायद में वित्त मंत्री अरुण जेटली पहले ही कह चुके हैं कि देश के एक कोने से दूसरे कोने तक वस्तुओं को ले जाने का खर्च कम होगा और एक देश और एक कर की समान व्यवस्था कायम की जा सकेगी।
जटिल मुद्दो पर होगी चर्चा
वित्त मंत्रालय के सूत्रों की माने तो जीएसटी परिषद की मंगलवार को शुरू हो रही इस महत्वपूर्ण बैठक में केंद्र सरकार द्वारा नई व्यवस्था में 11 लाख सेवा कर देने वाले को अपने जिम्मे रखने के जटिल मुद्दे पर भी विचार विमर्श भी किया जाएगा। वहीं इस बैठक में मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियम की अध्यक्षता वाली समिति के अधिकतर वस्तुओं और सेवाओं के लिये जीएसटी की मानक दर 17 से 18 प्रतिशत रखने का सुझाव पर भी मंथन होना तय है, जिसमें समिति ने कम कर वाली वस्तुओं पर जीएसटी 12 प्रतिशत और कार, पान मसाला और तंबाकू जैसी विलासिता की वस्तुओं पर 40 प्रतिशत मानक दर प्रस्ताव किया था। मूल्यवान धातुओं पर 2 से 6 प्रतिशत के दायरे में दर की सिफारिश की गयी है। वित्त मंत्रालय प्रमुख मुद्दों पर आम सहमति बनाने की कोशिश करेगा, ताकि उसके बाद केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी) तथा समन्वित जीएसटी (आईजीएसटी) को 16 नवंबर से शुरू संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किया जा सके।
18Oct-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
आगामी एक अप्रैल से जीएसटी कानून लागू करने की कवायद में जुटी केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में जीएसटी विधेयक पारित करने की तैयारी में है। इसी मकसद से कल मंगलवार से यहां शुरू होने वाली जीएसटी परिषद की तीन दिवसीय बैठक में जीएसटी कर की दरें तय किया जाना है और राज्यों की नई प्रणाली के फार्मूले पर भी आम सहमति बनाए जाने की संभावना है।
संसद के अगले महीने 16 नवंबर से शुरू हो रहे शीतकालीन सत्र में केंद्र सरकार की प्राथमिकता जीएसटी विधेयक को पारित कराने की होगी। इसका मकसद है कि सरकार आगामी नए वित्तीय वर्ष यानि एक अप्रैल से हरसंभव जीएसटी कानून लागू करना चाहती है। कल मंगलवार को यहां केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में शुरू होने वाली जीएसटी परिषद की तीन दिवसीय बैठक को इस लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दरअसल इस बैठक में परिषद को जीएसटी दरों का फैसला करना है। जीएसटी परिषद इस बैठक के एजेंडे में राज्यों को नयी प्रणाली में राजस्व हानि पर क्षतिपूर्ति के फामूर्ले जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों का समाधान भी तय किया जाना है। इससे पहले वित्त मंत्रालय जीएसटी परिषद में सभी मुद्दों पर आमसहमति बनाने के लिए 22 नवंबर की समयसीमा निर्धारित कर चुकी है, ताकि अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में व्यापक बुनियादी सुधार के प्रस्तावित वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली को देशभर में एक अप्रैल 2017 से लागू करने का लक्ष्य हासिल किया जा सके।
बैठक पर टिकी होंगी नजरे
जीएसटी परिषद की इस महत्वपूर्ण बैठक में होने वाले फैसलों पर देशभर खासरकार उद्योगजगत की नजरें लगी होंगी। इसका कारण साफ है कि जीएसटी की दर निर्धारित किए जाने की दृष्टि में तय होने वाली जीएसटी कर की दरें लोगों की जिंदगी को प्रभावित करने का काम करेंगी। जीएसटी परिषद की पिछले महीने हुई बैठक में बीस लाख रुपये सालाना कारोबार करने वाली कंपनियों को जीएसटी से छूट देने का फैसला किया है। वहीं इस छूट की सीमा को पहाड़ी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों के 11 राज्यों में दस लाख रुपये निर्धारित की गई थी। गत 30 सितंबर को परिषद इस छूट के लिए तैयार किये गये नियमों के मसौदे को अंतिम रूप दे चुकी है। जीएसटी कानून के तहत सेवाओं तथा वस्तुओं की आवाजाही को सुगम बनाने की कवायद में वित्त मंत्री अरुण जेटली पहले ही कह चुके हैं कि देश के एक कोने से दूसरे कोने तक वस्तुओं को ले जाने का खर्च कम होगा और एक देश और एक कर की समान व्यवस्था कायम की जा सकेगी।
जटिल मुद्दो पर होगी चर्चा
वित्त मंत्रालय के सूत्रों की माने तो जीएसटी परिषद की मंगलवार को शुरू हो रही इस महत्वपूर्ण बैठक में केंद्र सरकार द्वारा नई व्यवस्था में 11 लाख सेवा कर देने वाले को अपने जिम्मे रखने के जटिल मुद्दे पर भी विचार विमर्श भी किया जाएगा। वहीं इस बैठक में मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियम की अध्यक्षता वाली समिति के अधिकतर वस्तुओं और सेवाओं के लिये जीएसटी की मानक दर 17 से 18 प्रतिशत रखने का सुझाव पर भी मंथन होना तय है, जिसमें समिति ने कम कर वाली वस्तुओं पर जीएसटी 12 प्रतिशत और कार, पान मसाला और तंबाकू जैसी विलासिता की वस्तुओं पर 40 प्रतिशत मानक दर प्रस्ताव किया था। मूल्यवान धातुओं पर 2 से 6 प्रतिशत के दायरे में दर की सिफारिश की गयी है। वित्त मंत्रालय प्रमुख मुद्दों पर आम सहमति बनाने की कोशिश करेगा, ताकि उसके बाद केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी) तथा समन्वित जीएसटी (आईजीएसटी) को 16 नवंबर से शुरू संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किया जा सके।
18Oct-2016
कावेरी जल विवाद: तकनीकी समिति ने सुप्रीम कोर्ट में सौंपी रिपोर्ट
तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर आज होगी सुनवाई
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट बहुचर्चित कावेरी विवाद पर कल मंगलवार को फिर सुनवाई करेगी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केंद्र सरकार की गठित तकनीकी रिपोर्ट पर गौर किया जाएगा। इसलिए सोमवार को तकनीकी समिति ने अपनी तकनीकी रिपोर्ट में सामाजिक और अन्य तकनीकी पहलुओं का आकलन करके रिपोर्ट तैयार की है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 4 अक्टूबर को जारी निर्देश पर केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती ने केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष जीएस झा की अगुवाई में एक उच्च स्तरीय तकनीकी विशेषज्ञ दल का गठन किया था। इस दल ने कावेरी बेसिन की वास्तविक स्थिति का आकलन के लिए कावेरी बेसिन का दौरा करने के बाद अपनी रिपोर्ट को कोर्ट के निर्देशानुसार तैयार करके सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दी है, जो कल मंगलवार को सुनवाई के दौरान सामने आएगी। सुप्रीम कोर्ट ने 4 अक्तूबर को कावेरी मैनेजमेंट बोर्ड बनाने के मामले को 18 अक्टूबर तक टाल दिया था। कल जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अमिताव रॉय और जस्टिस एएम खानविलकर की बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी।
रिपोर्ट में सामाजिक पहलू
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार इस तकनीकी समिति ने जो रिपोर्ट सोमवार को सौंपी है उसमें कावेरी जल विवाद के कारणों के साथ सामाजिक और तकनीकी पहलुओं पर विचार कर निष्कर्ष निकाला गया है। समिति ने सामाजिक पहलू के तहत पाया है कि कर्नाटक और तमिलनाडु में पानी की कमी को लेकर किसान बदहाल हैं। किसान और मछुवारे बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। कर्नाटक के मंड्या जिले में बड़ी संख्या में खुदकुशी के मामले सामने आये हैं। कर्नाटक सरकार ने कावेरी बेसिन के 48 तालुका में से 42 तालुका को केंद्र सरकार के गाइडलाइन के तहत सूखा घोषित किया है।
समिति ने दिये सुझाव
सरकार की विशेषज्ञ तकनीकी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों राज्यों को तमिलनाडु और पुडुचेरी में सिंचाई के लिए लोगों के हित के लिए काम करने पर बल दिया। वहीं कर्नाटक के विकास के बारे में गंभीरता से विचार करने को कहा है, जिसके लिए राज्य के लोगों को इस बाबत जागरूक करने पर बल दिया गया है। तमिलनाडु सरकार की खेती को दी जाने वाली सब्सिडी की सुविधा तभी सफल हो सकती है, जब फसल के समय पूरा पानी उपलब्ध हो। समिति ने कहा कि पीने के पानी के लिए बंटवारे सिस्टम में बेहतरी लाने की जरूरत है। पानी के बहाव और कटाव के लिए आॅटोमैटिक वॉटर मैनजेमेंट सिस्टम लगाने की जरूरत है। सम्बन्धित राज्यों के सिंचाई प्रबंधन को किसानों के बीच पानी के बराबर बंटवारे की जरूरत है।
तकनीकी में सुधार पर बल
समिति की रिपोर्ट में पानी के वितरण के लिए जो तकनीक लगाई गई है वो पुरानी है। इसलिए किसानों को दिए जाने वाले पानी का तरीका एक सदी पुराना है। समिति ने इस तकनीक में सुधार करके पानी की कमी को दूर करने और नई तकनीक का इस्तेमाल करने पर जोर दिया है। पानी के बंटवारे के लिए पाइप का इस्तेमाल करना चाहिए। समुद्र के तट के इलाकों में भूमिगत जल का इस्तेमाल नहीं हो सकता क्योंकि समुद्र की वजह से पानी नमकीन हो जाता है इसलिए मैटुर जलाशय से ही सिंचाई संभव है।
18Oct-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट बहुचर्चित कावेरी विवाद पर कल मंगलवार को फिर सुनवाई करेगी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केंद्र सरकार की गठित तकनीकी रिपोर्ट पर गौर किया जाएगा। इसलिए सोमवार को तकनीकी समिति ने अपनी तकनीकी रिपोर्ट में सामाजिक और अन्य तकनीकी पहलुओं का आकलन करके रिपोर्ट तैयार की है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 4 अक्टूबर को जारी निर्देश पर केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती ने केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष जीएस झा की अगुवाई में एक उच्च स्तरीय तकनीकी विशेषज्ञ दल का गठन किया था। इस दल ने कावेरी बेसिन की वास्तविक स्थिति का आकलन के लिए कावेरी बेसिन का दौरा करने के बाद अपनी रिपोर्ट को कोर्ट के निर्देशानुसार तैयार करके सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दी है, जो कल मंगलवार को सुनवाई के दौरान सामने आएगी। सुप्रीम कोर्ट ने 4 अक्तूबर को कावेरी मैनेजमेंट बोर्ड बनाने के मामले को 18 अक्टूबर तक टाल दिया था। कल जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अमिताव रॉय और जस्टिस एएम खानविलकर की बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी।
रिपोर्ट में सामाजिक पहलू
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार इस तकनीकी समिति ने जो रिपोर्ट सोमवार को सौंपी है उसमें कावेरी जल विवाद के कारणों के साथ सामाजिक और तकनीकी पहलुओं पर विचार कर निष्कर्ष निकाला गया है। समिति ने सामाजिक पहलू के तहत पाया है कि कर्नाटक और तमिलनाडु में पानी की कमी को लेकर किसान बदहाल हैं। किसान और मछुवारे बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। कर्नाटक के मंड्या जिले में बड़ी संख्या में खुदकुशी के मामले सामने आये हैं। कर्नाटक सरकार ने कावेरी बेसिन के 48 तालुका में से 42 तालुका को केंद्र सरकार के गाइडलाइन के तहत सूखा घोषित किया है।
समिति ने दिये सुझाव
सरकार की विशेषज्ञ तकनीकी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों राज्यों को तमिलनाडु और पुडुचेरी में सिंचाई के लिए लोगों के हित के लिए काम करने पर बल दिया। वहीं कर्नाटक के विकास के बारे में गंभीरता से विचार करने को कहा है, जिसके लिए राज्य के लोगों को इस बाबत जागरूक करने पर बल दिया गया है। तमिलनाडु सरकार की खेती को दी जाने वाली सब्सिडी की सुविधा तभी सफल हो सकती है, जब फसल के समय पूरा पानी उपलब्ध हो। समिति ने कहा कि पीने के पानी के लिए बंटवारे सिस्टम में बेहतरी लाने की जरूरत है। पानी के बहाव और कटाव के लिए आॅटोमैटिक वॉटर मैनजेमेंट सिस्टम लगाने की जरूरत है। सम्बन्धित राज्यों के सिंचाई प्रबंधन को किसानों के बीच पानी के बराबर बंटवारे की जरूरत है।
तकनीकी में सुधार पर बल
समिति की रिपोर्ट में पानी के वितरण के लिए जो तकनीक लगाई गई है वो पुरानी है। इसलिए किसानों को दिए जाने वाले पानी का तरीका एक सदी पुराना है। समिति ने इस तकनीक में सुधार करके पानी की कमी को दूर करने और नई तकनीक का इस्तेमाल करने पर जोर दिया है। पानी के बंटवारे के लिए पाइप का इस्तेमाल करना चाहिए। समुद्र के तट के इलाकों में भूमिगत जल का इस्तेमाल नहीं हो सकता क्योंकि समुद्र की वजह से पानी नमकीन हो जाता है इसलिए मैटुर जलाशय से ही सिंचाई संभव है।
18Oct-2016
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