सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

स्टार्टअप में कैब कारोबारियों को मिलेगी राहत!

काली-पीली टैक्सियों को बिज नेस में शामिल करने की वकालत
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
मोदी सरकार के अभियान स्टार्टअप में कैब सेवा देने वाली कंपनियों की सामने आ रही मुश्किलों को कम करके उन्हें राहत देने की योजना तैयार की जा रही है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय ने काली और पीले रंग की टैक्सियों को भी इस कारोबार में शामिल करने की वकालत करते हुए कैब चालकों को राहत देने की कवायद तेज कर दी है।
केंद्र सरकार देश की परिवहन व्यवस्था को बदलने के तहत सुरक्षित सफर और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जहां सड़क परियोजनाओं में गुणवत्ता और सुरक्षा को प्राथमिकता दी है, वहीं वातावरण को प्रदूषणमुक्त बनाने के लिए वैकल्पि र्इंधन और इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन देने की योजना पटरी पर उतारी हैं। इसी परिवहन व्यवस्था के तहत कैब सेवाएं देने वाली कंपनियों और कैब चालकों के बीच चल रहे विवाद को भी गंभीरता से लिया है। ऐसे कई कारणों के कारण कैब सेवा संचालित कर रही कंपनियों और कैब चालकों की मुश्किलों को दूर करने का फार्मूला स्टार्टअप में तलाशा जा रहा है। हाल ही में स्वयं केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने एक एप के जरिए कैब कारोबारियों की मुश्किलों को कम करने की बात कही है। इसी दिशा में केंद्र सरकार ने कैब सेवा देती आ रही कंपनियों से अपने स्टार्टअप अनुबंध के दौरान काली-पीली रंग वाली टैक्सियों को भी शामिल करने का विकल्प तलाशने को कहा है। इसका मकसद है कि केंद्र सरकार स्टार्टअप के जरिए देश में सभी कैब सेवाओं और उनके चालकों को राहत देने वाली योजनाओं को लागू कर सकेगी। मंत्रालय के अनुसार सरकार ने ऐसी योजना इसलिए बनाने का निर्णय किया है कि कैब चालकों की शिकायत है कि इन कैब कंपनियों के बिजनेस मॉडल की वजह से उनका रोजगार छीनता जा रहा है।
नियमावली पर आएगी स्कीम
केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के अनुसार केंद्र सरकार ओला और ऊबर जैसी कंपनियों के लिए रेगुलेशंस पर एक स्कीम तैयार कर रही है। हालांकि इस प्रक्रिया में समय लग सकता है, क्योंकि इसके लिए राज्यों के साथ भी सहमति बनानी होगी। केंद्र सरकार की ओर से कैब कंपनियों के उठाए गये रेगुलेटरी मुद्दों पर भरोसा दिया है कि ऐसी सभी समस्याओं का समाधान निकालने का प्रयास किया जा रहा है। मंत्रालय के अनुसार केंद्रीय मंत्री गडकरी ने मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को ड्राइविंग लाइसेंस के लिए वेटिंग पीरियड कम करने और ई-रिक्शा को मोटर वाहन कानून से बाहर करने सहित लाल फीताशाही को समाप्त करने के प्रयास करने को कहा है। मसलन मंत्रालय परिवहन क्षेत्र के लिए इनोवेटिव सॉल्यूशंस पेश करने के मकसद से आईआईटी को 100 करोड़ रुपये देने के लिए तैयार है।
झटके झेल चुका ऊबर व ओला
सूत्रों की माने तो कैब कारोबार में बढ़ती मुश्किलों को हल करने के लिए केंद्र सरकार के हस्तक्षेप और इसे स्टार्टअप के दायरे में लाने की योजना के बावजूद इन दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता होना मुश्किल नजर आ रहा है। इसकी वजह साफ है कि पिछले दिनो नामचीन ऊबर और ओला जैसी कंपनियों को अपने कैब चालकों के उजागर हुए अपराधों, सर्ज प्राइसिंग और अन्य मुद्दों से जूझना पड़ा है। यहां तक नौबत आई कि सॉμटबैंक और टाइगर ग्लोबल के निवेश वाली ओला को अपनी टैक्सी फॉर श्योर यूनिट बंद करनी पड़ी है। यही कारण था कि पिछले दिनों दिल्ली और अन्य शहरों में में टैक्सी और आॅटोरिक्शा यूनियनों ने इन दोनों कैब कंपनियों पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए हड़ताल की थी।
10Oct-2016

रविवार, 9 अक्टूबर 2016

राग दरबार: बंदर के हाथ में उस्तरा...

झूठ से हुई पाकिस्तान की किरकिरी
भारतीय सेना ने उरी आतंकी हमले का पीओके में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक करके बदला लेकर साबित कर दिया है कि वह पाकिस्तान की ओर से पैदा की जाने वाली हर नापाक हरकत से निपटने को तैयार है। यही नहीं लगातार आतंकियों की घाुसपैठ और हमलो को नाकाम करने का सिलसिला जारी है,भारतीय सेना और सुरक्षा बलो की इस चौकस कार्यवाही में आतंकियों का सफाया किया जा रहा है। ऐसी नापाक हरकतों से अंतर्राष्टीय स्तर पर अलग थलग पड़ते जा रहे पाकिस्तान की बौखलाहट बंदर के हाथ में उस्तरा वाली कहावत को चरितार्थ करती है, जिसमें वह बार बार परमाणु हमले का विकल्प चुनने की धमकी देने में भी कसर नही छोड़ रहा है, जब कि परमाणु बम के फोडने के परिणाम एसे भी पता है। सोशल मीडिया और खुलेतौर पर उरी हमले के बाद पाकिस्तान के झूठ से हुई किरकिरी की बाकी कसर पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक को नकारने की पोल उसके अपनो ने ही खोलना शुरू कर दिया है, जिसमे तीन दर्जन से ज्यादा आतंकवादियों में शामिल पां पाक सैनिक भी भारतीय सेना का शिकार बने। दरअसल पाकिस्तान को कहीं तक भी ऐसी उम्मीद नही थी कि भारतीय सेना उसी के घर में घुसकर उरी का बदला सूद समेत चूकताा करेगी। ऐसे में पाक की झुझलाहट जायज ही है जो अभी तक भारत को लेकर गलफत में था, लेकिन पीएम मोदी के उरी का बदला लेने का वादा और आतंकवाद के खिलाफ कूटनीतिक और सख्त फैसलों से देशवासियों को सुरक्षा के प्रति भरोसा मिला और भारतीय सेना और देश की सुरक्षा में सीमाओं पर प्रहरी बने सुरक्षाबलों का मनोबल बढ़ा दिया है। यही नही पाकिस्तान एक आतंकी देश का पर्याय बनता भी नजर आने लगाा। ऐसे में सर्वविदित है कि परंपरागत शस्त्रों के युद्ध में पाकिस्तान कभी भारत से जीता नहीं और ना ही जीज पाएगा, तो जाहिर सी बात है वह परमाणु हमले का विकल्प चुनने की धमकी देकर बंदर के हाथ में उस्तरा वाली कहावत ही चरितार्थ कर सकता है?
सर्जिकल स्ट्राइक पर बुरे फंसे केजरीवाल
जब से अरविंद केजरीवाल ने सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत देने की ललकार लगाई तभी से उनकी पार्टी के प्रवक्ताओं को कुछ कहते नहीं बन रहा है। केजरीवाल भाजपा के निशाने पर हैं। मनीष सिसोदिया ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश की पर उनकी भी दाल नहीं गली। दरसअल आम आदमी पार्टी के भीतर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से चुनावी राज्यों में इसके असर पर विश्लेषण शुरू हो गया था। अगले साल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव है। दिल्ली में नगर निगम का चुनाव भी होना है। आम आदमी पार्टी के नेताओं को लग रहा था कि भाजपा की स्थिति मजबूत हो रही है, ऐसे में किसी भी तरीके से सर्जिकल स्ट्राइक पर सवालिया निशान लगाया जाए। मोर्चा केजरीवाल ने संभाला और उन्होंने प्रधानमंत्री को सैल्यूट करते हुए पाकिस्तान के दुष्प्रचार का जवाब देने की मांग कर डाली। दिल्ली के मुख्यमंत्री का ये वार उन्हीं पर भारी पड़ गया। उधर, पाकिस्तान के मीडिया ने केजरीवाल के बयान को प्रमुखता से प्रकाशित किया तो देश में भाजपा ने उन पर जमकर हमला बोलना शुरू कर दिया। अब आप के नेता कह रहे हैं हमने सबूत कब मांगा।
राफेल पर बन गई बात...
वायुसेना के लिए की गई राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद उसके लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है। समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं और कुछ समय बाद इन विमानों की वायुसेना में दस्तक शुरू हो जाएगी। विमान का ढांचा और मारक क्षमता बेहतरीन है, जिसकी वजह से इसे वायुसेना के लिए खरीदा गया है। इसमें रूचिकर तथ्य यह है कि राफेल विमानों की खरीद को लेकर भारत और फ्रांस के बीच बातचीत का सिलसिला 1990 के दशक के अंत में शुरू हुआ लेकिन वक्त बीतने के साथ-साथ समझौते पर 2016 में हस्ताक्षर हो गए। राफेल को लेकर तर्क-वितर्क चाहे जो भी हों। लेकिन राफेल पर तो बात बन ही गई।
-ओ.पी. पाल, आनंद राणा, कविता जोशी व राहुल
09Oct-2016

शनिवार, 8 अक्टूबर 2016

पहली बार सीबीआई प्रमुख बन सकती हैं महिला!

जांच एजेंसी के निदेशक पद की दौड़ में हैं दो महिला आईपीएस
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक पद पर अगले माह सेवानिवृत्त हो रहे अनिल सिन्हा की जगह पर नई नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार की काबिल अफसरों की फेहरिस्त तैयार की जा रही है। ऐसी भी अटकले हैं कि देश में सीबीआई के निदेशक पद पर पहली बार किसी महिला आईपीएस अधिकारी की नियुक्ति की जा सकती है।
केंद्र सरकार ने सेना ही नहीं, बल्कि अर्धसैनिक बलों में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की रणनीति को अमलीजामा पहनाना शुरू किया है। ऐसी ही नीतियों के तहत अटकले शुरू हो गई हैं कि केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक पद का जिम्मा भी किसी काबिल महिला आईपीएस अधिकारी को सौंपा जा सकता है। दरअसल सीबीआई के निदेशक अनिल सिन्हा अगले महीने 30 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। ऐसे में उनकी जगह नई नियुक्ति के लिए गृह मंत्रालय काबिल अफसरों की सूची तैयार कर रहा है। हालांकि यह तो समय ही बताएगा कि अनिल सिन्हा के स्थान पर सीबीआई निदेशक पर किसकी नियुक्ति होगी। सूत्रों के अनुसार सीबीआई निदेशक पद की दौड़ में दो ऐसी काबिल आईपीएस महिला अधिकारियों के नाम शामिल हैं, जिनमें से किसी एक को इस पद का जिम्मा सौंपा जा सकता है। भारत की प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई निदेशक पद पर नियुक्ति के लिए सशस्त्र सीमा बल का नेतृत्व कर रही अर्चना रामसुंदरम तथा ब्यूरो आॅफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट की महानिदेशक मीरा बोरवानकर के नाम की चर्चा है। यह पहली बार है जब इस एजेंसी के प्रमुख के रूप में महिला अधिकारियों के नाम सामने आ रहे हैं। यदि एजेंसी की बागडोर ऐसी काबिल महिला अफसरों को दी जाती है तो आजाद भारत में कोई महिला इस पद पर काबिज होने का रिकार्ड बनाएगी।
कॉलेजियम करेगा सिफारिश
सूत्रों के अनुसार नए सीबीआई निदेशक के पद के लिए नियुक्ति को लेकर चल रही अटकलों में चयन करने का मामला आसान नहीं है। सीबीआई में ही विशेष निदेशक के पद पर रूपक कुमार दत्ता का नाम भी अनिल सिन्हा के उत्तराधिकारी के रूप में सामने है, जो एजेंसी में सिन्हा के बाद सबसे वरिष्ठतम अधिकारी हैं। वहीं दिल्ली पुलिस आयुक्त आलोक वर्मा का नाम भी इस पद की दौड़ में शामिल है। दत्ता को एजेंसी में कार्यशैली और प्रणाली व प्रक्रिया का ज्यादा अनुभव है। दत्ता इससे पहले अतिरिक्त निदेशक के रूप में सेवा कर चुके हैं। यही नहीं वह पटना, हैदराबाद और चेन्नई क्षेत्रों में एंटी करप्शन जोन, आर्थिक अपराध जोन, बैंक सिक्योरिटीज एंड फ्रॉड्स जैसे संगीन मामलों की जांच में अपनी काबलियत दिखा चुके हैं। इनके अलावा काबिल अधिकारियों में दिल्ली पुलिस आयुक्त आलोक वर्मा के नाम की चर्चा है, जिन्हें गैर-विवादस्पद माना जाता है। सूत्रों के अनुसार इस पद के लिए आने वाले आईपीएस अधिकारियों के पैनल में शामिल नामों पर कॉलेजियम विचार करके केंद्र सरकार को अपनी सिफारिश भेजेगा।
लंबित मामलों का बोझ
सीबीआई में जांच के लिए लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिनके निपटान के लिए सीबीआई पहले से ही काबिल अफसरों की रिक्त पदों पर नियुक्तियों की मांग करता आ रहा है। सूत्रों के अनुसार जांच एजेंसी में निपटान के लिए नौ हजार से भी ज्यादा मामले लंबित पड़े हुए हैं, जिनका कारण पिछले दिनों खुद निदेशक अनिल सिन्हा ने संसदीय समिति के समक्ष समस्या को उजागर किया था। सीबीआई द्वारा सुप्रीम कोर्ट को कह चुकी है कि जांच एजेंसी में 4544 पदों पर 3700 अधिकारी ही कार्यरत है यानि 744 रिक्तियों को भरने के लिए काबिल अफसरों की नियुक्तियां करने की दरकार है।
08Oct-2016

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

जीएसटी बन सकता है पुराने वाहनों का अभयदान!

ऐसी अड़चन हटाने को विकल्प तलाशने में जुटी सरकार
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार देश में एक समान कर व्यवस्था कायम करने की दिशा में जीएसटी कानून लागू करने की कवायद में जुटी हुई है। जहां जीएसटी से करो को लेकर फायदे का सौदा माना जा रहा है, वहीं प्रदूषण फैलाने का सबब बने पुराने डीजल वाहनों को सड़क से हटाने की मुहिम में जीएसटी स्पीड़ ब्रेकर का काम करेगा। हालांकि इस अड़चन को हटाने के लिए सरकार विकल्प की तलाश कर रही है।
मोदी सरकार ने हाल ही में जलवायु परिवर्तन समझौते को स्वीकृति दी है और देश में पर्यावरण की खातिर प्रदूषण के खिलाफ अभियान छेड़ा हुआ है। इसके बावजूद पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले पुराने डीजल वाहनों को सड़कों से हटाने के अभियान में सरकार के सामने जीएसटी का स्पीड़ ब्रेकर आ रहा है। मसलन जीएसटी कानून लागू होते ही इससे जुड़े वॉलंटरी वीइकल μलीट मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (वी-वीएमपी) पर सरकार के सामने पुनर्विचार करने की नौबत आती नजर आ रही है। हालांकि सरकार अपने उस उस विकल्प की समीक्षा कर रही है, जिसमें वाहन मालिकों को ऐसे निर्णय देने का प्रस्ताव था, जो अपनी पुरानी गाड़ियों को छोड़कर कम प्रदूषण फैलाने वाली नई गाड़ी खरीदने को सहमत हों। मंत्रालय के अनुसार स्कीम के तहत वीएमपी में खरीदी गाड़ियों पर कम एक्साइज टैक्स लगना था, लेकिन वित्त मंत्रालय जीएसटी में ऐसे निर्णय देने का समर्थन नहीं कर रहा है। इसलिए वित्त मंत्रालय ने सड़क परिवहन मंत्रालय से इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने की सलाह देते हुए कहा है कि वह लोगों को पुरानी गाड़ियां छोड़ने को प्रोत्साहित करने के लिए किसी अन्य विकल्प तलाशना शुरू करे। इसके लिए हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली व सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के बीच जीएसटी के तहत पुराने वाहनों को सड़क से हटाने में आ रही बाधा को दूर करने के लिए प्रस्तावित पॉलिसी पर गहन मंथन भी हुआ है।
क्या थी पहली योजना
सरकार का प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए पहले बनाई गई योजना के अनुसार वी-वीएमपी के तहत खरीदी जाने वाली नई गाड़ियों पर कम एक्साइज टैक्स लगाने का प्रस्ताव किया गया था। हालांकि इसे अगले वित्त वर्ष से संभावित नई कर प्रणाली यानी जीएसटी में एक्साइज टैक्स का विलय करने का विचार है। केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी प्रस्तावित पॉलिसी में पुरानी गाड़ी छोड़कर नई गाडी खरीदने वालों को फायदा देने के पक्ष में हैं, जिसके लिए इस वित्तीय फायदा किस रूप में दिया जाए इसके विकल्प की तलाश की जा रही है। मंत्रालय के एक अधिकारी की माने तो वित्त मंत्री के सुझावों के तहत ही फिर से इस प्रस्ताव पर काम किया जा रहा है और सचिवों की समिति की जल्द होने वाली एक बैठक में इस मुद्दे को प्रस्तुत किया जाएगा। इस समिति में सड़क परिवहन के अलावा स्टील, हेवी इंडस्ट्रीज और पर्यावरण मंत्रालय के सचिव शामिल हैं। इस पॉलिसी के मौजूदा ड्राμट में पुरानी गाड़ी को हटाकर नई खरीदने पर एक्साइज ड्यूटी घटाकर आधा करने का प्रस्ताव में फेरबदल करने की संभावना है। इस इंसेटिव में इसके अलावा पुरानी गाड़ी के स्क्रैप की उचित वैल्यू और आॅटो कंपनियों से विशेष छूट देने का भी प्रस्ताव है।
कम की जा सकती है छूट
मंत्रालय के अनुसार इस इंसेंटिव से खरीदार के लिए नई गाड़ी की लागत 8-12 प्रतिशत तक कम हो जाने का अनुमान है। वहीं रोजाना सफर करने वाले लोगों को नई और हाई कपैसिटी वाली बसों में शिμट करने की खातिर प्रोत्साहित करने के लिए राज्य ट्रांसपोर्ट की बसों को एक्साइज ड्यूटी में पूरी तरह से छूट दिए जाने का सुझाव दिया गया है। सूत्रों की माने तो मुख्य गाइडलाइंस एक जैसी हैं और इस स्कीम के तहत हम शुरूआती 2-3 साल तक इंसेंटिव देने का प्रस्ताव है, जिसका मकसद खासतौर पर पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले ट्रकों और बसों को सड़कों से हटाना है।
07Oct-2016

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

जल्द तैयार होगा एशिया का सबसे लंबा पुल!

ब्रह्मपुत्र नदी से असम-अरुणाचल प्रदेश के बीच जुडेगा सड़क संपर्क
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
पूर्वोत्तर राज्यों में बुनियादी ढांचों को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही सड़क परियोजनाओं के तहत ब्रह्मपुत्र नदी पर एशिया के सबसे लंबे निर्माणधीन पुल की परियोजना जल्द ही पूरी हो जाएगी। इस पुल के बनने से आने वाले कुछ माह में आवाजाही शुरू होते ही असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच सड़क संपर्क मार्ग का सफर आसान हो जाएगा।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार सुरक्षित सफर और पुल की सुरक्षा सुनिश्चित के लिहाज से ब्रह्मपुत्र नदी पर तैयार होने वाले इस पुल के निर्माण में अंतर्राष्ट्रीय मानकों की तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। 938 करोड़ की लागत वाली इस पुल निर्माण की परियोजना पूरी होते ही कुछ माह में ही इसे वाहनों की आवाजाही के लिए चालू कर दिया जाएगा। यह पुल एशिया का सबसे लंबा पुल होने का दर्जा हासिल कर लेगा। इस पुल के शुरू होने से असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच की दूरी मात्र चार घंटे से कम समय में ही तय की जा सकेगी। सबसे ज्यादा फायदा इस पुल से सीमा क्षेत्र में जाने वाले सेना के टैंक या अन्य वाहनों को भी होगा। दरअसल चीन सीमा की तरफ जाने के लिए भारतीय सेना को रक्षा के साजो सामान ले जाने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ रहा था। मसलन अभी तक यहां पर कोई ऐसा पुल नहीं है। अभी सेना के टैंकों को तिनसुकिया से होकर अरुणाचल प्रदेश तक पहुंचना होता है। इस पुल के बनने के बाद सेना को भी सीमा पर पहुंचने में कम समय लगेगा और वह आसानी से तेजपुर होते हुए दिबांग और अनजा पहुंच सकेंगे। सूत्रों के अनुसार फिलहाल गुवाहाटी से वहां तक पहुंचने में करीब 186 किमी दूरी तय करने में करीब दो दिन का समय लगता है।
सीमा सुरक्षा में खास कदम
ब्रह्मपुत्र नदी पर ढोला-साडिया के बीच आवाजाही के लिए अंतिम चरणों में तैयार हो रहे इस पुल को सीमा सुरक्षा के लिहाज से बेहद खास कदम माना जा रहा है। क्योंकि जिस तेजी से चीन अरुणाचल प्रदेश से लगी सीमा पर अपने लड़ाकू विमानों की तैनाती कर रहा है और सुरक्षाबलों की संख्या में इजाफा कर रहा है उस लिहाज से भारत को भी अरुणाचल प्रदेश में अपनी तैयारियां तेज करने की जरूरत है। गौरतलब है कि एलएसी के नजदीक चीन ने एयरस्ट्रिप तैयार कर रखी है वहीं हमारे पास अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं है।
गांधी सेतु हो जाएगा पीछे
मंत्रालय के अनुसार देश में अभी तक सबसे लंबे पुल के रूप में पटना में गंगा नदी पर बने गांधी सेतु का नाम सबसे ऊपर है, जिसकी लंबाई 5.57 किमी है। इसके बाद ब्रह्मपुत्र नदी पर बन रहे 9.15 किमी लंबे ढोला-सदिया ब्रिज देश का ही नहीं, बल्कि एशिया का सबसे लंबा पुल का दर्जा हासिल कर लेगा। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा 938 करोड़ रुपए की लागत वाली इस पुल की परियोजयना को वर्ष 2010 में शुरू किया था, जिसका निर्माण कार्य अंतिम चरणों हैं और संभावना है कि वर्ष 2017 के पहले तिमाही तक यह आवागन के लिए चालू हो जाएगा। मंत्रालय के अनुसार इस ढोला-साडिया पुल की राह में आने वाले लोगों के मकान व अन्य प्रॉपर्टी के लिए केंद्र सरकार ने भी मुआवजा देने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है।
चीन की सीमा तक बनेगी पहुंच
भारत-चीन सीमा पर सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में सीमा तक जाने वाले सड़क मार्गो पर केंद्र सरकार की शुरू की गई परियोजनाओं के तहत ऐसे चार पुल बनाए जा रहे है, जिससे सीमा तक सेनाओं के वाहनों टैंकों या अन्य साजो सामान ले जाने में तय समय में सफर तय किया जा सकेगा। ये परियोजनाएं इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अति दुर्गम और कच्चे पहाड़ी इलाके में दस हजार फिट की ऊंचाई पर गुंजी से कालापानी, नपल्च्यू से गुंजी के बीच, कलपू नाला और घटीपू नाला में नए पुलों का निर्माण करना सीमा सड़क संगठन के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था।
06Oct-2016

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

नई तकनीक से होगी देश में पुलों की सुरक्षा!

सरकार ने शुरू की भारतीय पुल प्रबंधन प्रणाली
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में सुरक्षित सड़क परियोजनाओं के साथ देशभर में राष्ट्रीय राजमार्गो समेत तमाम सड़को पर नदी-नहरों, रेलवे लाइन या सड़कों के ऊपरी पुलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अब पुल प्रबंधन प्रणाली तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। देशभर में हजारों की संख्या में ऐसे पुल हैं जो जर्जर हालत में सुरक्षित निर्माण की बाट जोह रहे उनका पता लगाने में शुरू की गई यह प्रणाली वरदान साबित होगी।
दुनिया के विकसित देशों में काम कर रही पुल प्रबंधन प्रणाली को पहली बार भारत में भारतीय पुल प्रबंधन प्रणाली (आईबीएमएस) के नाम से शुरू किया गया है। इस तकनीकी प्रणली के जरिए देशभर के पुलों और पुलियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा उनका वरीयता के आधार पर डाटाबेस तैयार किया जा सकेगा। इस प्रणाली की मंगलवार को नई दिल्ली में केंद्रीय सड़क परिवहन राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने शुरूआत की है। गडकरी ने कहा कि यह प्रणाली देश में सभी पुलों की फेहरिस्त बनाने में सहायक सिद्ध होगी। मसलन भारतीय पुल प्रबंधन प्रणाली (आईबीएमएस) का मकसद देश में सभी पुलों का डाटाबेस तैयार करना और उन पुलों की विस्तृत ब्योरा सुरक्षित रखना है, ताकि पुलों की गंभीर स्थिति या उसकी परिस्थितियों के आधार पर मरम्मत या नया पुल बनाने का काम समय पर किया जा सके। आईबीएमएस विश्व का सबसे बड़ा मंच है जिसमें 1.50 लाख से भी अधिक पुलों का डाटाबेस सुरक्षित रखा जा सकता है। हालांकि देश में सरकार अब तक 85 हजार पुलियों समेत 1.15 लाख पुलों की सूची तैयार करा चुकी है,जिसके डाटा का आईबीएम विश्लेषण करेगा और उन पुलों की पहचान करेगा, जिन पर तत्काल सुधार करने की आवश्यकता है। इस प्रणाली के तहत पहचान किये गये पुलों की संचालन उपलब्धता में सुधार, अवधि में वृद्धि तथा मरम्मत कार्य को प्राथमिकता देने के लिए निरीक्षण कार्य किया जाएगा। डाटा से यह निर्णय लेने में मदद मिलेगी, कि किस पुल की स्थिति कितनी गंभीर हैं और किसे फिर से बनाने की जरूरत है।
ऐसे काम करेगी यह प्रणाली
भारतीय पुल प्रबंधन प्रणाली (आईबीएमएस) में तकनीकी प्रक्रिया के तहत फेहरिस्त (इनवेंटरी) बनाने का आधार समयानुसार प्रत्येक पुल को अनूठी पहचान संख्या या राष्ट्रीय पहचान संख्या, राज्य, आरटीओ जोन तथा राष्ट्रीय राजमार्ग अथवा राज्य का राजमार्ग और जिले की सड़क पर किया जाता है। फिर जीपीएस के माध्यम से अक्षांश, देशांतर के संदर्भ में पुल के वास्तविक स्थान का पता किया जाता है और इसी के अधार पर पुल स्थान संख्या दी जाती है। इस प्रक्रिया के बाद उसके डिजाइन, मेटेरियल, पुल के प्रकार, पुल की आयु, लोडिंग, यातायात लेन, लम्बाई, चौड़ाई संबंधी जानकारियां एकत्रित की जाती हैं। इस प्रणाली का इस्तेमाल करके पुल वर्गीकरण संख्या दी जाती है और पुलों को ढांचागत रेटिंग संख्या भी दी जाती है। यह संख्या शून्य के 9 के स्केल पर प्रत्येक पुल को दी जाती है। यह रेटिंग पुल के ढांचे से संबंधित घटकों पर विचार करने के बाद दी जाती है। देश में पुलों को सामाजिक, आर्थिक पुल रेटिंग संख्या भी दी जा रही है। इससे क्षेत्रीय सामाजिक आर्थिक गतिविधि में पुल के योगदान का महत्व निर्धारित होगा।
राजस्थान व महाराष्ट्र में शुरूआत
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार तैयार की जा चुकी सूची के आधार पर राजस्थान और महाराष्ट्र में रेल ओवर ब्रिज पर कार्य शुरू किए हैं। चूंकि ऐसे पुलों को तकनीकी नवाचार को अपनाने की जरूरत है, ताकि कम लागत में उपयोगी और उचित ढांचे का इस्तेमाल किए जा सकें। केंद्रीय मंत्री गडकरी ने तो कचरे के इस्तेमाल और निर्माण के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्ची सामग्री के इस्तेमाल पर बल दिया, ताकि लागत कम की जा सके। दरअसल अभी तक देश में पुलों को लेकर कोई डाटा सरकार के पास उपलब्ध नहीं था, जिससे पुलों की सही संख्या और स्थान स्पष्टता तय की जा सके। मंत्रालय ने राज्य सरकारों की मदद से खासकर जर्जर पुलों की सूची तैयार करना शुरू किया है।
05Oct-2016

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

अब लंबित सड़क परियोजनाओं की बढेगी गति

निर्माण कंपनियों को मिलेंगे मुकदमेबाजी में फंसे छह हजार करोड रुपये
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देशभर में कानूनी विवादों की वजह से लंबित पड़ी सड़क परियोजनाओं को फिर से तेजी के साथ शुरू करने का रास्ता साफ हो गया है। मसलन ऐसी करीब सवा सौ मामलों का निपटान करके एनएचएआई ने मुकदमेबाजी में फंसी छह हजार करोड़ रुपये की रकम सड़क निर्माण कंपनियों को देने का फैसला किया है, ताकि सड़क परियोजनाओं की गति में तेजी लाई जा सके।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्राल के सूत्रों ने बताया कि जल्द ही राष्ट्रीय भारतीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) मुकदमेबाजी के चलते फंसे 6,000 करोड़ रुपये सड़क निर्माण कंपनियों को देना शुरू कर देगा। दरअसल केंद्र सरकार ने अपने विभागों, मंत्रालयों और निजी क्षेत्र की कंपनियों से विचार विमर्श करके एक योजना बनाई, जिसके तहत विवादित रकम का 75 फीसदी हिस्सा उन सड़क निर्माताओं को देने पर विचार किया गया, जो पंचाट में मुकदमे जीत चुके हैं। सरकार ने इस योजना का ऐलान पिछले महीने ही किया था, जिसके तहत एनएचएआई इस रकम को निर्माण कंपनियों को देगा। इस योजना के तहत देश में रूकी हुई या लंबित सड़क परियोजनाओं के लिए धनराशि का भी इंतजाम हो सकेगा और बैंकों को सड़क निर्माताओं से ऋण की वसूली करने में भी मदद मिल सकेगी। सरकार की इस योजना में नीति आयोग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यानि नीति आयोग ने संबन्धित मंत्रालयों और विभागों को पत्र लिखकर इस योजना पर जल्द अमल करने को कहा है। गौरतलब है कि इस सरकार की इस योजना यानि पॉलिसी को हाल में आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने मंजूरी दी है, जिसमें सरकारी एजेंसियों को 75 फिसदी रकम मार्जिन फ्री बैंक गारंटी की एवज में एस्क्रो एकाउंट में जमा कराने को कहा गया है। इस मंजूरी के तहत इस एकाउंट का इस्तेमाल जारी प्रोजेक्ट या बैंक लोन चुकाने के लिए किया जा सकता है।
फंसी है 25 हजार करोड़ की रकम
सूत्रों के अनुसार एनएचएआई के पास ऐसे 123 विवादित मामलों के तहत 25,000 करोड़ रुपये हैं। इसमें 13,000 करोड़ रुपये की वह रकम भी शामिल है, जिनमें पंचाट या मध्यस्थता प्रक्रिया के जरिए फैसला कंपनियों के हक में आया है। एनएचएआई के ही सूत्रों की माने तो अभी तक उसके खिलाफ जो भी मामले गए हैं, उसकी रकम 13 हजार करोड़ रुपये है। लेकिन आपसी रजामंदी के तरीके से पांच हजार करोड़ रुपये का सेटलमेंट किया जा चुका है। जबकि आठ हजार करोड़ की शेष रकम की पॉलिसी के तहत 75 फीसदी रकम 6 हजार करोड़ रुपये का भुगतान केस टु केस बेसिस के आधार पर शुरू कर दिया जाएगा, इसमें बीस कंपनियों का दावा जुड़ा हुआ है। इसके लिए एनएचएआई ने निजी कंपनियों को पत्र भेजकर जल्द ही भुगतान की प्रक्रिया शुरू कर देगी।
शर्ते भी होंगी तय
एनएचएआई के सूत्रों का कहना है कि जैसे ही ये कंपनियां प्राधिकरण को पत्र भेजेंगी और उनका भुगतान शुरू हो जाएगा तो अपना क्लेम पाने के लिए निर्माण कंपनियों को यह बैंक गांरंटी भी लिखित में देना होगा कि हम अपने अनुबंध मसौदे में भी बदलाव कर रहे हैं ताकि कंपनी बैंक गारंटी देने से पीछे न हट सकें। ऐसी शर्तो का मकसद है कि एनएचएआई रूकी हुई सड़क परियोजनाओं को तेजी के साथ चालू करा सके। गौरतलब है कि ऐसे विवादों में फंसी कई सड़क परियोजनाओं को केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने आपसी बातचीत के जरिए सुलह कराकर शुरू भी कराया है।
04Oct-2016

जल्द शुरू होगी पॉड टैक्सी परियोजना

दिल्ली से गुरुग्राम तक का सफर होगा आसान
हरिभूमि ब्यूरो. नई दिल्ली
दिल्ली व गुरुग्राम में यातायात की समस्या का समाधान करने के लिए केंद्र सरकार की पॉड टैक्सी चलाने की परियोजना जल्द शुरू करने की तैयारी है।
केंद्र सरकार की इस पायलट परियोजना के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग-8 यानि (एम्यिंस माल के समीप) पर दिल्ली-हरियाणा राजमार्ग पर इसे चलाया जाएगा। इसे राजीव चौक, इफको और सोहना रोड होते हुए बादशाहपुर तक ले जाया जाएगा। इस पर करीब 800 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। सूत्रों के अनुसार 12.3 किलोमीटर लंबे मार्ग पर 13 स्टेशन होंगे और एक ‘पॉड’ में पांच लोग यात्रा कर सकेंगे। शुरू में सरकार की 1100 पॉड चलाने की योजना है। मसलन चार हजार करोड़ रुपए की यह सार्वजनिक परिवहन परियोजना होगी। पहले चरण में दिल्ली में इसे धौला कुआं से हरियाणा के मानेसर को जोड़ा जाएगा। जिसके लिए एनएचएआई के तहत 800 करोड़ रुपये की लागत से इस परियोजना को अमल में लाने का फैसला किया गया है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार इस योजना को आगे बढ़ाते हुए सरकार ने एनएचएआई के तहत चलाई जाने वाली इस परियोजना के लिए निविदाएं मंगानी शुरू कर दी है, जिसमें अभी तक चार वैश्विक कंपनियों को चुना गया है। पर्सनल रैपिड ट्रांजिट या मेट्रिनों नाम से पहचानी जाने वाली पॉड टैक्सी परियोजना अंतर्राष्ट्रीय मानकों के आधार पर पूरी की जाएगी। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने एनएचएआई के तहत इस पायलट परियोजना के लिए 800 करोड़ रुपये की लागत तय करते हुए मंजूरी दी है।
इससे पहले गडकरी ने केंद्रीय शहरी विकास मंत्री एम वेंकैया नायडू से विस्तार से चर्चा करने के बाद इस परियोजना को पटरी पर उतारा है। इस परियोजना का जिम्मा राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं को कार्यान्वित करने वाले भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानि एनएचएआई को ही सौंपा गया है। मसलन इसे एनएचएआई कानून के तहत क्रियान्वित किया जाएगा। मंत्रालय के अनुसार सरकार इस परियोजना के पूरा होने पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बिना चालक के रस्सी के सहारे चलने वाले ‘पॉड’ टैक्सी के जरिए गुरुग्राम तक यात्रा कर सकेंगे। मंत्रालय के अनुसार इसके लिए जिन चार विदेशी कंपनियों को निविदाओं में पात्र पाया गया है उनमें लंदन, संयुक्त अरब अमीरात, अमरीका और पौलैंड की एक-एक कंपनी शामिल है। अब इन कंपनियों को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय मंजूरी के बाद वित्तीय बोली लगाने के लिए जल्द ही आमंत्रित करेगा।
04Oct-2016

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

सड़कों पर स्पीड ब्रेकर की जगह लेंगे 3-डी जेब्रा

केंद्र के आदेश पर हटाये जाने लगे स्पीड़ ब्रेकर
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में सड़क हादसों पर अंकुश लगाने की दिशा में केंद्र सरकार द्वारा जारी आदेशों के बाद राष्ट्रीय राजमार्गो के अलावा अन्य सभी प्रमुख सड़कों से स्पीड ब्रेकरों को हटाने का काम तेजी से चल रहा है। सरकार की ऐसे स्पीड बे्रकरों के स्थान पर थ्री डाइमेंशनल जेब्रा क्रॉसिंग बनाने की योजना है। जिसमें स्पीड बे्रकर तो नहीं होगा, लेकिन सड़क पर सफर करने वाले को गति अवरोधक नजर आने से सावधानी जरूरत बरतने को मजबूर होना पड़ेगा।
दरअसल देश में सड़क हादसों से चिंतित केंद्र सरकार दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की संख्या कम से कम करके दुनियाभर में लगे इस कलंक को मिटाने के लिए तरह-तरह के ठोस उपाय करके योजनाएं चला रही है। सरकार द्वारा कराए गये एक अध्ययन में सड़क दुर्घटनाओं के कारकों में स्पीड़ ब्रेकर यानि गति अवरोधक भी शामिल है। मसलन देश में कुल सड़क हादसों में 40 फीसदी दुर्घटनाओं का कारण स्पीड ब्रेकर बन रहे हैं। सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार सरकार इन स्पीड़ बे्रकरों के बजाए राष्ट्रीय राजमार्गो पर उन चुनिंदा जगहों पर 3-डी जेब्रा क्रासिंग बनाने की योजना पर काम कर रही है, जिसमें केवल रंगों के चयन करने पर विचार किया जा रहा है, ताकि सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों को भ्रमित न होना पड़े। हालांकि सरकार अन्य कुछ विकल्पों पर भी विचार कर रही है, लेकिन 3डी जेब्रा क्रासिंग केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री को भी रास आ रहा है, जो इसके इस्तेमाल को इसलिए बेहतर मान रहे हैं कि राष्ट्रीय राजमार्गो या अन्य किसी प्रमुख सड़कों पर कोई स्पीड़ ब्रेकर तो नहीं होगा, लेकिन सफर करने वालों को महसूस होगा कि सामने अवरोधक है। मसलन इस योजना में सड़क पर कोई उभार वाला अवरोधक नहीं होगा और केवल वह रंगों से पोती जाने वाली तकनीक होगी, जो उभरी नजर आएगी। सूत्रों के अनुसार दुनिया के कई विकसित देशों में ऐसी जेब्रा क्रासिंग का इस्तेमाल हो रहा है।
नियमों में नहीं स्पीड ब्रेकर
मंत्रालय के अनुसार नियमों में स्पीड बे्रेकर का कोई प्रावधान नहीं है। राष्ट्रीय राजमार्गो को रμतार के लिए बनाया जाता है, लेकिन स्थानीय लोगों के दबाव में देशभर में बड़ी संख्या में अवैध तरीके से बेतरकीब स्पीड ब्रेकर बन जाने से वाहनों को क्षति हो रही है और दुर्घटनाओं की संभावना को भी टालना संभव नहीं है। इसलिए मंत्रालय ने देशभर में हाइवे और मुख्य मार्गो पर बने स्पीड़ बे्रकर हटाने के पहले ही निर्देश दे दिये हैं, जिसके बाद देशभर में स्पीड़ ब्रेकर हटाने का काम स्पीड पकड़ रहा है। सरकार के स्पीड ब्रेकर हटाने के निर्णय का चौतरफा स्वागत हो रहा है, ऐसे मामले कई बार संसद में भी उठाए जा चुके हैं। सरकार और परिवहन के जानकारों का मानना है कि एक्सप्रेस-वे व राष्ट्रीय राजमार्ग वाहनों की गति बढ़ाने के मकसद से बनाए जाते हैं, तो ऐसे में स्पीड़ ब्रेकर बेमानी होगा। गौरतलब है कि इंडियन रोड कांग्रेस के नियमों की बात की जाए तो राजमर्गो पर रेलवे क्रासिंग, दुर्घटना बाहुल्य क्षेत्र, तीखे मोड़, संपर्क मार्ग, पेट्रोल पंप आदि स्थानों पर तय मानक के अनुसार रंबल स्ट्रिप (गतिरोधक पट्टियां) बनाने का ही प्रावधान है।
गडकरी को रास आया जेब्रा
देश में सड़क हादसों पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार योजनाएं बनाने में व्यवस्त रही तो वहीं गुजरात के अहमदाबाद शहर की मां-बेटी सौम्या ठक्कर व उनकी मां शकुंतला ठक्कर ने ऐसा डिजाइन बनाया जो केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को भी रास आ गया। दरअसल यह डिजाइन ऐसा है जिसमें सड़क पर तेज गति से वाहन चलाते हुए रास्ते में अगर आपको उभरी हुई जेब्रा क्रॉसिंग दिखाई दे, तो कोई भी अचानक चौंक जाएंगा अपने वाहन की गति को धीमा जरूर करेगा। इस 3डी जेब्रा डिजाइन को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कई शहरों में स्पीड ब्रेकर के स्थान पर 3-डी जेब्रा का इस्तेमाल प्रयोगिक रूप से कराया भी है, जिसके देशभर में कारगर होने की बड़ी उम्मीद बताई जा रही है।
क्या है 3-डी जेब्रा क्रॉसिंग
देश में सड़क हादसों को रोकने की दिशा में इन जेब्रा क्रॉसिंग को इस तरह डिजाइन किए गए हैं, ताकि तेज स्पीड से आ रहे वाहन चालक के सामने इल्युजन क्रिएट हो और वह इस आभासी तस्वीर से चकमा खाकर अपनी स्पीड कम कर ले। इस तरह पैदल चलने वाले भी सुरक्षित ढंग से सड़क पार कर सकेंगे। इस डिजाइन को गुजरात में स्कूलों के पास थ्री डायमेंशनल स्ट्रीट आर्ट पहले से ही प्रयोग की जा रही है।
03Oct-2016

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

राग दरबार: सर्जिकल स्ट्राइक बनाम सद्बुद्धि..

केजरीवाल व राहुल गांधी ने की मोदी की तारीफ
देश की सियासत भले ही आपसी प्रतिद्वंद्धता में किसी भी हद को पार करते देखी जाती रही हो, लेकिन जब देश की एकता और अखंडता या फिर देश की सुरक्षा का मामला हो, तो देशभर के सभी राजनीतिक दलों की एकजुटता की मिसाल देश की भावना के साथ सुर में सुर में मिलाकर हमेशा की तरह ही दुश्मनों के भ्रम को तोड़ने का काम करती नजर आई ब्है। मसलन उरी आतंकी हमले पर पीएम मोदी के बदला लेने वाले वादे पर पहले तो मजाक उड़ाते रहे सियासीदानो को उस समय हैरानी हुई, जब गुरुवार को सुबह खबर मिली कि पीएम की कूटनीति के तहत भारतीय सेना ने पीओके में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई करके पाक समर्थित आतंकी कैंपों को ध्वस्त ही नहीं कर दिया, बल्कि कम से कम 50 आतंकवादियो को मौत के घाट उतार दिया। भाारतीय सेना के इस पराक्रम की देशभर में ऐसी जय जयकार हुई कि लगातार पीएम मोदी की आलोचना करते आ रहे केजरीवाल व राहुल गांधी जैसे उन नेताओं को भी सद्बुद्धि आ गई और उनकी नकारात्मक सोच ने गिरगिट की तरह ऐसे रंग बदला कि वे भी शायद पहली बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ करते नजर आए और उनके 56 इंच का सीना साबित करने का लोहा मानने को मजबूर हो गये। दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने तो मोदी सरकार व भाजपा के खिलाफ अपने कई कार्यक्रम स्थगित तक कर दिये। सियासी गलियारे में चर्चा है कि जब पाकिस्तान के आतंकवाद के खिलाफ उसके घर में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई को पूरी दुनिया ने समर्थन दिया तो ऐसे सियासीदानों को अपने सियासी भविष्य भंवरजाल के चक्रव्यूह में फंसना तय था, इसलिए उनकी यह हकीकत की मजबूरी मानी जा सकती है या फिर सद्बबुद्धि...।
सुशासन बाबू की चिंता
नीतीश कुमार यानि बिहार के सुशासन बाबू अपने छवि बचाने की जद्दोजहद में फंसे हुए हैं। मोहम्मद शहाबुद्दीन के जमानत पर आने के बाद से बिहार के मुख्यमंत्री विपक्षी नेताओं से लेकर मीडिया के निशाने पर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने शहाबुद्दीन की जमानत रद्द की तो नीतीश को राहत मिली पर उधर पटना हाईकोर्ट ने राज्य में लागू शराबबंदी को खत्म कर दिया तो मुख्यमंत्री सकते में आ गये। पिछला विधानसभा चुनाव जीतवाने में शराबबंदी का बड़ा रोल रहा था, नीतीश कुमार ने इसे लागू किया भी। हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद बिहार में मय के दीवानों की तो जैसे मुंह मांगी मुराद पूरी हो गयी। पर नीतीश ने कह दिया कि बिहार में शराबबंदी लागू रहेगी, राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट जायेगी। बिहार में चर्चा है कि सुशासन बाबू के राज में अमीर लोग ही मोटी कीमत पर तस्करी की शराब गटक रहे हैं जबकि गरीब लोग गला तर नहीं कर पा रहे हैं। बिहार में लोग चाहते हैं कि शराब पर पाबंदी पूरी तरह अमल में लाने का हौंसला नीतीश में हो तो इसे लागू करें अभी तक तो राज्य में अवैध तस्करी जोरों पर है और पुलिस करोड़ों रूपये की शराब जब्त कर चुकी है। देखते हैं सुप्रीम कोर्ट शराबबंदी पर क्या फैसला सुनाता है, फिलहाल तो सुशासन बाबू अपने फैसले पर अडिग हैं।
न्यौता पहुंच गया, मंत्री नहीं पहुंचे
सरकारी व्यवस्था का आम चलन है कि इसमें मंत्री से लेकर अधिकारी तक को किसी कार्यक्रम में बुलाने के लिए आमंत्रण पत्र भेजने से लेकर स्वीकृति लेनी पड़ती है। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि जब इनकी उपस्थिति को लेकर आमंत्रण भेज दिया जाता है,स्वीकृति भी ले ली जाती है। लेकिन फिर भी कोई नहीं पहुंचता। ऐसा ही एक मामला हाल में राजधानी में आयोजित अंतरराष्टÑीय स्तर के कार्यक्रम में देखने को मिला। यहां विभाग की ओर से संबंधित केंद्रीय मंत्री की उपस्थिति को लेकर कागजी कार्रवाई तो की गई। लेकिन उनके कार्यक्रम में बदलाव को लेकर अनुपस्थिति की सूचना को सार्वजनिक नहीं गया। बस फिर क्या था लोग कार्यक्रम में मंत्री जी के पहुंचने का इतंजार करते रह गए लेकिन वो नहीं पहुंचे।
01Oct-2016