पूर्वोत्तर क्षेत्र में जैविक मूल्य श्रृंखला विकास मिशन शुरू
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी नमामि गंगे मिशन को तेजी से आगे बढ़ाने की दिशा में गंगा नदी के किनारे गांवों में जैविक खेती को प्रोत्साहन देने और कृषि संबन्धी समस्याओं को दूर करने के लिए सरकार ने पूर्वाेत्तर क्षेत्र में ‘जैविक मूल्य श्रंखला विकास मिशन’नामक योजना शुरू कर दी है।
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के बीच गंगा नदी के किनारे वाले गांवों में जैविक खेती को बढ़ावा देने और गंगा स्वच्छता के तहत कृषि एव किसानों संबन्धी मुद्दों के समाधान की दिशा में यह करार हुआ है। इस समझौता ज्ञापन का तेजी से असर उस समय हुआ जब सरकार ने सोमवार को देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में जैविक खेती की संभावनाओं के मद्देनजर ‘पूर्वोत्तर क्षेत्र हेतु जैविक मूल्य श्रृंखला विकास मिशन’ नामक कें्रदीय क्षेत्र की योजना शुरू कर दी। इस योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2015-16 से 2017-18 के दौरान अरूणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में इस योजना को तेजी से क्रियान्वयन किया जा सके। इस करार के तहत गंगा किनारे के गांवों में जैविक कृषि का विकास किया जाएगा। प्रत्येक ग्राम पंचायत एक क्लस्टर का प्रतिनिधित्व करेगी और जागरूकता कार्यक्रमों, स्वयं सहायता समूहों तथा मोबाइल एप के माध्यम से जैविक खेती को प्रोत्साहित करेंगी। वहीं मंत्रालय रसायन, उर्वरक और कीटनाशकों के संतुलित उपयोग के लिए जागरूकता पैदा करेगा, ताकि गंगा बेसिन में जल संरक्षण के लिए सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा मिले। इसके साथ गंगा किनारे आजीविका के अवसर तथा पशुपालन आधारित प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा देगा।
पूर्वोत्तर क्षेत्र में 527 कलस्टर की योजना
मंत्रालय के अनुसार सात पूर्वोत्तर राज्यों में 527 क्लस्टर तैयार करने के लिए 3487 लाख रुपए के परिव्यय वाली वार्षिक कार्य योजना का अनुमोदन किया गया है। सूत्रों के अनुसार पूर्वोत्तर राज्यों में जैविक कृषि को बढ़ावा देने की योजना के तहत 31 जनवरी 2016 तक 1275 लाख रुपए जारी किये गए। इसी प्रकार देश में खासतौर पर पूर्वोत्तर हिमालयी क्षेत्र में जैविक खेती के लिए अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी सहायता प्रदान करने के लिए आईसीएआर ने सिक्किम के गंगटोक में राष्ट्रीय जैविक कृषि अनुसंधान संस्थान की स्थापना रतीय कृषि अनुसंधान परिषद अपनी योजना ‘जैविक कृषि नेटवर्क परियोजना’ तथा मृदा जैव विविधता जैव उवर्रक के माध्यम से देश में जैविक खेती को प्रौद्योगिकी सहायता प्रदान करने के लिए अनुसंधान कर रहा है।
इन राज्यों में हो रही है जैविक खेती
मंत्रालय के अनुसार मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, ओडिशा तथा सिक्किम जैसे राज्यों में पहले से ही राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (एनपीओपी) के तहत बड़े पैमाने पर जैविक खेती की जा रही है। पीकेवीवाई के तहत लगभग 26350 किसान जैविक खेती कर रहे हैं। सरकार ने इसके दायरे में अब पूर्वोत्तर राज्यों को भी शामिल कर लिया है। इसके साथ ही कृषि मंत्रालय की राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन, परंपरागत कृषि विकास योजना तथा अब पूर्वोत्तर क्षेत्र हेतु जैविक मूल्य श्रृंखला विकास मिशन के तहत जैविक खेती को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देने की रμतार बढ़ा दी गई है। सरकार ने ‘जैविक मूल्य श्रंखला विकास मिशन’ योजना को गंगा किनारे वाले गांवों में भी जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए जल संसाधन और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के बीच तीन साल के लिए एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कराए हैं, ताकि गंगा स्वच्छता अभियान यानि नमामि गंगे परियोजना में तेजी लाई जा सके।
20Sep-2016
एक जमाना था जब लोग अपने घरों के बाहर लिखते थे-अतिथि देवो भव: फिर शुरू किया-शुभ लाभ और बाद में लिखा जाने लगा-यूं आर वेलकम अब शुरू हो गया-......से सावधान!
मंगलवार, 20 सितंबर 2016
तमिलनाडु को रोजाना तीन हजार क्यूसेक पानी देगा कर्नाटक
कावेरी निगरानी समिति की बैठक में हुआ निर्णय
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी नदी के जल बंटवारे को लेकर चल रहे विवाद के बीच कावेरी निगरानी समिति ने कर्नाटक को निर्देश दिया है कि वह 21 से 30 सितंबर यानि दस दिन तक प्रतिदिन तमिलनाडु को तीन हजार क्यूसेक पानी देगा।
केंद्रीय जल संसाधन सचिव शशि शेखर की अध्यक्षता में सोमवार को देर शाम श्रमशक्ति भवन में हुई कावेरी निगरानी समिति की सातवीं बैठक में यह निर्णय कर्नाटक, तमिलनाडु, पुडुचेरी के मुख्य सचिवों और केरल के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में लिया गया। सोमवार को साढ़े चार बजे शुरू होने के बाद करीब दो घंटा चली इस बैठक में तर्क-वितर्क के साथ हुई चर्चा के बाद भी कर्नाटक और तमिलनाडु छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा को लेकर ऐसे किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सके, जिस पर कोई सहमति बनाई जा सके। इसके बाद केंद्रीय जल संसाधन सचिव और समिति के अध्यक्ष शशि शेखर को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना पड़ा और तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच मतभेदों को खारिज करते हुए कर्नाटक को आदेश दिया कि वह तमिलनाडु को 21 से 30 सितंबर तक रोजाना 3000 क्यूसेक पानी देगा। दरअसल कावेरी निगरानी समिति पर सुप्रीम कोर्ट के जारी आदेश का भी दबाव है कि वह तमिलनाडु व कर्नाटक के जल संबन्धी आंकड़ों को तय करे जिसका अध्यक्ष शीर्ष अदालत करेगी। दोनों राज्यों के जल संबन्धी इन आंकड़ो का विश्लेषण केंद्रीय जल आयोग के अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है, जिन्हें सोमवार को समिति की बैठक में प्रस्तुत किया गया। अब निगरानी समिति की अगली बैठक अक्तूबर में किसी भी दिन करने का निर्णय लिया गया। मसलन 30 सितंबर के बाद जरूरत पड़ने पर तमिलनाडु को पानी छोड़ने के बारे में अगला निर्णय लिया जा सकता है।
इन मामलों पर बनी सहमति
बैठक के दौरान दोनों राज्य छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा पर सहमति पर नहीं पहुंच सके। वहीं बैठक में कर्नाटक ने जहां थोड़ा भी पानी छोड़ने का जोरदार विरोध किया, वहीं तमिलनाडु ने कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के आदेश के अनुसार पानी प्रवाहित करने का अनुरोध किया। इसके बावजूद इस बैठक में इस बात पर रजामंदी जताई कि कावेरी प्रबंधन बोर्ड के प्रभाव में आने तक फरवरी 2017 से हालात का जायजा लेने के लिए समिति की बैठक हर महीने होनी चाहिए। गौरतलब है कि प्रस्तावित बोर्ड से संबंधित मामला शीर्ष अदालत में लंबित है। वहीं समिति ने नदी के जल प्रवाह के आंकड़े उसी समय (रीयल टाइम में) समिति सचिवालय नयी दिल्ली, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और पुडुचेरी के बीच प्रसारित करने के प्रस्ताव पर एक करार करने पर भी सहमति जताई गई। केंद्रीय जल आयोग ऐसे उपकरणों पर काम कर रहा है जिन्हें रीयल-टाइम में आंकड़े मुहैया कराने के लिहाज से विभिन्न स्थानों पर लगाया जाएगा। कारण है कि प्रामाणिक आंकड़ों की कमी के कारण विभिन्न पक्षों के बीच आम-सहमति बनने में कठिनाई होती है।
आदेश को चुनौती देने में स्वतंत्रता
जल संसाधन सचिव शशि शेखर ने बैठक में विचार विमर्श के बावजूद वे सहमत नहीं हुए हैं। कल जब मामला उच्चतम न्यायालय में आएगा तो दोनों राज्य इस आदेश को चुनौती देने के लिए स्वतंत्र हैं या वे अदालत के समक्ष आदेश पर सहमति जता सकते हैं। गौरतलब है कि निगरानी समिति गत 12 सितंबर को अपनी पहली बैठक में पर्याप्त सूचना के अभाव में कर्नाटक द्वारा छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा पर किसी फैसले पर नहीं पहुंच सकी थी। इसलिए समिति ने इन राज्यों से 15 सितंबर तक जल संबन्धी आंकड़ो की सूचना देने को कहा था। शेखर ने कहा कि उन्होंने कई चीजों को ध्यान में रखकर फैसला लिया, जिनमें कर्नाटक में पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की जरूरत तथा तमिलनाडु में गर्मियों की फसलों के लिए पानी की आवश्यकता कोे भी ध्यान में रखा गया हेै।
क्या था सुप्रीम कोर्ट का आदेश
उच्चतम न्यायालय ने पांच सितंबर को कर्नाटक से तमिलनाडु के किसानों की दुर्दशा को ध्यान में रखते हुए कर्नाटक को 10 दिन तक रोजाना 15000 क्यूसेक पानी छोड़ने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट के इन अंतरिम आदेश के बाद कर्नाटक में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये थे।
20Sep-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी नदी के जल बंटवारे को लेकर चल रहे विवाद के बीच कावेरी निगरानी समिति ने कर्नाटक को निर्देश दिया है कि वह 21 से 30 सितंबर यानि दस दिन तक प्रतिदिन तमिलनाडु को तीन हजार क्यूसेक पानी देगा।
केंद्रीय जल संसाधन सचिव शशि शेखर की अध्यक्षता में सोमवार को देर शाम श्रमशक्ति भवन में हुई कावेरी निगरानी समिति की सातवीं बैठक में यह निर्णय कर्नाटक, तमिलनाडु, पुडुचेरी के मुख्य सचिवों और केरल के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में लिया गया। सोमवार को साढ़े चार बजे शुरू होने के बाद करीब दो घंटा चली इस बैठक में तर्क-वितर्क के साथ हुई चर्चा के बाद भी कर्नाटक और तमिलनाडु छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा को लेकर ऐसे किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सके, जिस पर कोई सहमति बनाई जा सके। इसके बाद केंद्रीय जल संसाधन सचिव और समिति के अध्यक्ष शशि शेखर को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना पड़ा और तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच मतभेदों को खारिज करते हुए कर्नाटक को आदेश दिया कि वह तमिलनाडु को 21 से 30 सितंबर तक रोजाना 3000 क्यूसेक पानी देगा। दरअसल कावेरी निगरानी समिति पर सुप्रीम कोर्ट के जारी आदेश का भी दबाव है कि वह तमिलनाडु व कर्नाटक के जल संबन्धी आंकड़ों को तय करे जिसका अध्यक्ष शीर्ष अदालत करेगी। दोनों राज्यों के जल संबन्धी इन आंकड़ो का विश्लेषण केंद्रीय जल आयोग के अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है, जिन्हें सोमवार को समिति की बैठक में प्रस्तुत किया गया। अब निगरानी समिति की अगली बैठक अक्तूबर में किसी भी दिन करने का निर्णय लिया गया। मसलन 30 सितंबर के बाद जरूरत पड़ने पर तमिलनाडु को पानी छोड़ने के बारे में अगला निर्णय लिया जा सकता है।
इन मामलों पर बनी सहमति
बैठक के दौरान दोनों राज्य छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा पर सहमति पर नहीं पहुंच सके। वहीं बैठक में कर्नाटक ने जहां थोड़ा भी पानी छोड़ने का जोरदार विरोध किया, वहीं तमिलनाडु ने कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के आदेश के अनुसार पानी प्रवाहित करने का अनुरोध किया। इसके बावजूद इस बैठक में इस बात पर रजामंदी जताई कि कावेरी प्रबंधन बोर्ड के प्रभाव में आने तक फरवरी 2017 से हालात का जायजा लेने के लिए समिति की बैठक हर महीने होनी चाहिए। गौरतलब है कि प्रस्तावित बोर्ड से संबंधित मामला शीर्ष अदालत में लंबित है। वहीं समिति ने नदी के जल प्रवाह के आंकड़े उसी समय (रीयल टाइम में) समिति सचिवालय नयी दिल्ली, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और पुडुचेरी के बीच प्रसारित करने के प्रस्ताव पर एक करार करने पर भी सहमति जताई गई। केंद्रीय जल आयोग ऐसे उपकरणों पर काम कर रहा है जिन्हें रीयल-टाइम में आंकड़े मुहैया कराने के लिहाज से विभिन्न स्थानों पर लगाया जाएगा। कारण है कि प्रामाणिक आंकड़ों की कमी के कारण विभिन्न पक्षों के बीच आम-सहमति बनने में कठिनाई होती है।
आदेश को चुनौती देने में स्वतंत्रता
जल संसाधन सचिव शशि शेखर ने बैठक में विचार विमर्श के बावजूद वे सहमत नहीं हुए हैं। कल जब मामला उच्चतम न्यायालय में आएगा तो दोनों राज्य इस आदेश को चुनौती देने के लिए स्वतंत्र हैं या वे अदालत के समक्ष आदेश पर सहमति जता सकते हैं। गौरतलब है कि निगरानी समिति गत 12 सितंबर को अपनी पहली बैठक में पर्याप्त सूचना के अभाव में कर्नाटक द्वारा छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा पर किसी फैसले पर नहीं पहुंच सकी थी। इसलिए समिति ने इन राज्यों से 15 सितंबर तक जल संबन्धी आंकड़ो की सूचना देने को कहा था। शेखर ने कहा कि उन्होंने कई चीजों को ध्यान में रखकर फैसला लिया, जिनमें कर्नाटक में पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की जरूरत तथा तमिलनाडु में गर्मियों की फसलों के लिए पानी की आवश्यकता कोे भी ध्यान में रखा गया हेै।
क्या था सुप्रीम कोर्ट का आदेश
उच्चतम न्यायालय ने पांच सितंबर को कर्नाटक से तमिलनाडु के किसानों की दुर्दशा को ध्यान में रखते हुए कर्नाटक को 10 दिन तक रोजाना 15000 क्यूसेक पानी छोड़ने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट के इन अंतरिम आदेश के बाद कर्नाटक में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये थे।
20Sep-2016
सोमवार, 19 सितंबर 2016
राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना की बढ़ी रफ्तार
जल सुधार की कई योजनाओं का समायोजन
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में जल संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने भूजल के महत्व को खत्म कर अंधाधुंध जल दोहन रोकने के लिए राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना की गति को बढ़ा दी है, जिसके तहत विभिन्न योजनाओं का समायोजन करते हुए जल संबन्धी हरेक चुनौती से निपटने की दिशा में कई महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई हैं।
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार देश में जल की उपलब्धता 1869 अरब घन मीटर यानि बीसीएम है, जिमें 60 प्रतिशत यानि 1123 बीसीएम जल उपयोज्य है। इस उपयोज्य जल में 660 बीसीएम सतही जल और 433 बीसीएम भूजल शामिल है। लेकिन भूजल के गिरते स्तर और उसमें घुलते जहरीले तत्वों का कारण बने भूजल पर सिंचाई, ग्रामीण एवं शहरी पेयजल आवश्यकताओं के लिए भूजल के अंधाधुंध दोहन गंभीर चुनौती बनी हुई है। जल संकट और भूजल की इस चुनौती से निपटने के लिए राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना को आगे बढ़ाने के साथ ही राष्ट्रीय भूजल सुधार कार्यक्रम, समग्र जल सुरक्षा को मनरेगा से जोड़ने, जल क्रांति और अन्य जल संबन्धी गतिविधियों मेें तेजी लाने का फैसेला किया है। जल संसाधन मंत्रालय की भूजल दोहन और प्रबंधन कार्य नीति के तहत जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में भूजल पर सिंचाई की आवश्यकता की 60 प्रतिशत, ग्रामीण पेयजल आवश्यकताओं की 85 प्रतिशत और शहरी जल आवश्यकताओं की 50 प्रतिशत निर्भरता है। पिछले चार दशकों में कुल सिंचाई क्षेत्र की वृद्धि में भूजल का योगदान 80 प्रतिशत से अधिक रहा है। यही नहीं जीडीपी में भी भूजल का करीब 9 प्रतिशत योगदान है। मंत्रालय के अनुसार वर्ष 1975 से खाद्य और फाइबर की पैदावार के लिए भारतीय कृषि विश्व में भूजल के सबसे बड़े उपभोक्ता के रूप सामने आई है। ऐसे में भूजल के स्थायित्व की स्थिाति भविष्य की बड़ी चुनौती है।
जल के पारंपरिक स्रोत लुप्त
मंत्रालय की रिपोर्ट में जल क्षेत्र से जुड़ी संस्था सहस्त्रधारा के एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारत में हर साल 230 घन किलोलीटर पानी धरती से खींचा जाता है और इसका 60 प्रतिशत उपयोग खेती में सिंचाई के लिए और 40 प्रतिशत पेयजल के लिए होता है। एक तरफ जल के पारंपरिक स्रोत जैसे कुएं, पोखर आदि ग्रामीण इलाकों से खत्म होते जा रहे हैं और दूसरी ओर शहरों में कई सौ किलोमीटर दूर से पाइपलाइन से पानी पहुंचाया जा रहा है। नदियों के पानी के स्रोत खत्म हो रहे हैं, लेकिन उनका दोहन कम होने के बजाए बढ़ा है। यही नहीं इस रिपोर्ट में भूजल प्रबंधन की मुख्य चुनौतियों में तीव्र एवं अधिक भूजल की निकासी,कृषि के लिए जल का अकुशल उपयोग, विशेष रूप से कठोर चट्टानों में भूजल स्रोतों का स्थायित्व, अपर्याप्त विनियामक तंत्र, केंद्र एवं राज्य स्तर पर कर्मचारियों की कमी वाले भूजल संस्थान, भूजल के सामुदायिक प्रबंधन के लिए जल प्रयोक्ता संगठनों का न होना तथा भूजल गुणवत्ता में गिरावट का कारण का जिक्र किया गया है।
स्वच्छता मिशन का सहारा
रिपोर्ट में कहा गया है कि भूजल के नए और अब तक अप्रयुक्त स्रोतों का दोहन, भूजल स्रोतों के संवर्द्धन के लिए व्यापक पुनर्भरण,जल निकायों के स्थायित्व और पुनरूद्धार को सुनिश्चित करने के लिए जल निकायों के संरक्षण के माध्यम से वर्षा जल संचयन, चेक बांध, फार्म तालाब का निर्माण, प्राकृतिक वनों, पवित्र उपवनों, अक्षय खांचे का संरक्षण जैसे माध्यमों से जल का संचयन करना भी शामिल हैं। सरकार को राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोयजना में तेजी लाने का मकसद भूजल के गिरते स्तर में सुधार और भूजल में घुलते जहर के कारण करोड़ो लोगों को जलजनित बीमारियों से राहत देना है। इसी लिए चौतरफा उढ़ती मांग के मद्देनजर सरकार स्वच्छ भारत अभियान के तहत फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाईट्रेट व आयरन जैसे विषाक्त रसायन तत्वों से भूजल को मुक्त करके शुद्ध जल की योजना को बढ़ावा दे रही है।
19Sep-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में जल संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने भूजल के महत्व को खत्म कर अंधाधुंध जल दोहन रोकने के लिए राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना की गति को बढ़ा दी है, जिसके तहत विभिन्न योजनाओं का समायोजन करते हुए जल संबन्धी हरेक चुनौती से निपटने की दिशा में कई महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई हैं।
केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार देश में जल की उपलब्धता 1869 अरब घन मीटर यानि बीसीएम है, जिमें 60 प्रतिशत यानि 1123 बीसीएम जल उपयोज्य है। इस उपयोज्य जल में 660 बीसीएम सतही जल और 433 बीसीएम भूजल शामिल है। लेकिन भूजल के गिरते स्तर और उसमें घुलते जहरीले तत्वों का कारण बने भूजल पर सिंचाई, ग्रामीण एवं शहरी पेयजल आवश्यकताओं के लिए भूजल के अंधाधुंध दोहन गंभीर चुनौती बनी हुई है। जल संकट और भूजल की इस चुनौती से निपटने के लिए राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना को आगे बढ़ाने के साथ ही राष्ट्रीय भूजल सुधार कार्यक्रम, समग्र जल सुरक्षा को मनरेगा से जोड़ने, जल क्रांति और अन्य जल संबन्धी गतिविधियों मेें तेजी लाने का फैसेला किया है। जल संसाधन मंत्रालय की भूजल दोहन और प्रबंधन कार्य नीति के तहत जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में भूजल पर सिंचाई की आवश्यकता की 60 प्रतिशत, ग्रामीण पेयजल आवश्यकताओं की 85 प्रतिशत और शहरी जल आवश्यकताओं की 50 प्रतिशत निर्भरता है। पिछले चार दशकों में कुल सिंचाई क्षेत्र की वृद्धि में भूजल का योगदान 80 प्रतिशत से अधिक रहा है। यही नहीं जीडीपी में भी भूजल का करीब 9 प्रतिशत योगदान है। मंत्रालय के अनुसार वर्ष 1975 से खाद्य और फाइबर की पैदावार के लिए भारतीय कृषि विश्व में भूजल के सबसे बड़े उपभोक्ता के रूप सामने आई है। ऐसे में भूजल के स्थायित्व की स्थिाति भविष्य की बड़ी चुनौती है।
जल के पारंपरिक स्रोत लुप्त
मंत्रालय की रिपोर्ट में जल क्षेत्र से जुड़ी संस्था सहस्त्रधारा के एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारत में हर साल 230 घन किलोलीटर पानी धरती से खींचा जाता है और इसका 60 प्रतिशत उपयोग खेती में सिंचाई के लिए और 40 प्रतिशत पेयजल के लिए होता है। एक तरफ जल के पारंपरिक स्रोत जैसे कुएं, पोखर आदि ग्रामीण इलाकों से खत्म होते जा रहे हैं और दूसरी ओर शहरों में कई सौ किलोमीटर दूर से पाइपलाइन से पानी पहुंचाया जा रहा है। नदियों के पानी के स्रोत खत्म हो रहे हैं, लेकिन उनका दोहन कम होने के बजाए बढ़ा है। यही नहीं इस रिपोर्ट में भूजल प्रबंधन की मुख्य चुनौतियों में तीव्र एवं अधिक भूजल की निकासी,कृषि के लिए जल का अकुशल उपयोग, विशेष रूप से कठोर चट्टानों में भूजल स्रोतों का स्थायित्व, अपर्याप्त विनियामक तंत्र, केंद्र एवं राज्य स्तर पर कर्मचारियों की कमी वाले भूजल संस्थान, भूजल के सामुदायिक प्रबंधन के लिए जल प्रयोक्ता संगठनों का न होना तथा भूजल गुणवत्ता में गिरावट का कारण का जिक्र किया गया है।
स्वच्छता मिशन का सहारा
रिपोर्ट में कहा गया है कि भूजल के नए और अब तक अप्रयुक्त स्रोतों का दोहन, भूजल स्रोतों के संवर्द्धन के लिए व्यापक पुनर्भरण,जल निकायों के स्थायित्व और पुनरूद्धार को सुनिश्चित करने के लिए जल निकायों के संरक्षण के माध्यम से वर्षा जल संचयन, चेक बांध, फार्म तालाब का निर्माण, प्राकृतिक वनों, पवित्र उपवनों, अक्षय खांचे का संरक्षण जैसे माध्यमों से जल का संचयन करना भी शामिल हैं। सरकार को राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोयजना में तेजी लाने का मकसद भूजल के गिरते स्तर में सुधार और भूजल में घुलते जहर के कारण करोड़ो लोगों को जलजनित बीमारियों से राहत देना है। इसी लिए चौतरफा उढ़ती मांग के मद्देनजर सरकार स्वच्छ भारत अभियान के तहत फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाईट्रेट व आयरन जैसे विषाक्त रसायन तत्वों से भूजल को मुक्त करके शुद्ध जल की योजना को बढ़ावा दे रही है।
19Sep-2016
सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में ओडिशा सरकार
महानदी जल विवाद:
पटनायक सरकार चाहती है न्यायाधिकरण का गठन
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच महानदी के जल बंटवारे को सुलझाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा लगातार किये जा रहे प्रयासों के बीच ओडिशा सरकार का रवैया नकारात्मक दिशा में नजर आ रहा है। एक दिन पहले ही केंद्र सरकार के साथ दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री स्तर की हुई बैठक में आपसी सहमति से लिए गये कुछ निर्णय के बावजूद ओडिशा सरकार अब इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की तैयारी में है।
केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा सरंक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती की अध्यक्षता में शनिवार को महानदी मुद्दे का सुलझाने के लिए एक त्रिस्तरीय बैठक हुई थी, जिसमें छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ओर ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के अलावा केंद्र और दोनों राज्यों के संबन्धित अधिकारियों की आपसी सहमति से कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये। हालांकि इस मुद्दे पर पहले से ओडिशा के अडियल रवैये की झलक इस बैठक में देखने को मिली। फिर भी सहमति के तहत केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती ने महानदी पर दोनों राज्यों की निर्मित परियोजनाओं की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का ऐलान किया, लेकिन ओडिशा सरकार इस मामले पर अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम-1956 के तहत एक न्यायाधिकरण के गठन पर जोर दे रहा है। दरअसल ओडिशा सरकार किन्ही राजनीतिक कारणों से छत्तीसगढ़ सरकार की महानदी पर चल रही परियोजनाओं पर आपत्तियां जताकर उन्हें बंद कराने पर अड़ा हुआ है। सूत्रों के अनुसार केंद्रीय हस्तक्षेप के तहत इस विवाद को सुलझाने के प्रयासों के विपरीत अब ओडिशा सरकार ने अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम का सहारा लेकर न्यायाधिकरण के गठन के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट जाने के कारण में ओडिशा सरकार के सूत्रों की माने तो बैठक में नवीन पटनायक को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने यह आश्वासन नहीं दिया कि छत्तीसगढ़ सरकार की महानदी पर चल रही निर्माण प्रक्रिया को बंद कर दिया जाएगा।
लगातार रोड़ा बना है ओडिशा
केंद्र के साथ बैठक के दौरान दोनों राज्यों की सहमति से लिए गये निर्णयों के बावजूद ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का इसी बात पर तो जोर रहा कि छत्तीसगढ़ सरकार को महानदी पर किसी भी निर्माण प्रक्रिया को बंद कर देना चाहिए। लेकिन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के इस मुद्दे को सुलझाने के लिए संयुक्त नियंत्रण बोर्ड (जेसीबी) गठित करने पर सहमति जताने का प्रयास नहीं किया। ओडिशा सरकार ने राज्यों के हितों की रक्षा करने में जेसीबी के असक्षम करार देते हुए इस मुद्दे पर कानूनी विकल्प के तहत एक न्यायाधिकरण के गठन पर ज्यादा जोर दिया। जहां तक महानदी पर निर्मित परियोजनाओं की जांच का सवाल है के लिए गठित की जा रही विशेषज्ञ समिति पर पटनायक ने सहमति तो जताई लेकिन यहां तक कहा कि वह अपना रूख भुवनेश्वर जाने के बाद कैबिनेट की बैठक बुलाकर उसमें होने वाले फैसले के बाद बताएंगे।
असमंजस में है ओडिशा सरकार
महानदी मुद्दे को लेकर शायद ओडिशा सरकार असमंजस में है, जिसका कारण राजनीतिक माना जा रहा है। तभी तो ओडिशा सरकार का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार चिल्का झील, भितरकणिका, सतकोसिया और गहिरमाता अभयारण्य जैसे अनोखे जैव विविधता वाले पर्यटक स्थलों के पर्यावरणीय दृष्टिकोण को नजरअंदाज करते हुए महानदी पर जल परियोजनाओं का निर्माण कर रही है। ऐसा आरोप नवीन पटनायक ने केंद्रीय मंत्री उमा भारती के साथ हुई त्रिपक्षीय बैठक में भी मंढा था। गौरतलब है कि दोनों राज्यों के मुख्य सचिव स्तर की जुलाई में केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष की मौजूदगी में हुई बैठक में लिए गये निर्णय के मुताबिक दोनों राज्यों को एक-दूसरे राज्यों के साथ महानदी पर चल रही परियोजनाओं की जानकारी साझा करने पर सहमति बनने के बावजूद ओडिशा ने अभी तक एक भी जानकारी छत्त्तीसगढ़ सरकार को नहीं दी, जबकि छत्तीसगढ़ सरकार अब तक पूरी हुई परियोजनाओं की पूरी जानकारी ओडिशा राज्य के साथ साझा कर चुका है।
19Sep-2016
पटनायक सरकार चाहती है न्यायाधिकरण का गठन
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच महानदी के जल बंटवारे को सुलझाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा लगातार किये जा रहे प्रयासों के बीच ओडिशा सरकार का रवैया नकारात्मक दिशा में नजर आ रहा है। एक दिन पहले ही केंद्र सरकार के साथ दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री स्तर की हुई बैठक में आपसी सहमति से लिए गये कुछ निर्णय के बावजूद ओडिशा सरकार अब इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की तैयारी में है।
केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा सरंक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती की अध्यक्षता में शनिवार को महानदी मुद्दे का सुलझाने के लिए एक त्रिस्तरीय बैठक हुई थी, जिसमें छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ओर ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के अलावा केंद्र और दोनों राज्यों के संबन्धित अधिकारियों की आपसी सहमति से कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये। हालांकि इस मुद्दे पर पहले से ओडिशा के अडियल रवैये की झलक इस बैठक में देखने को मिली। फिर भी सहमति के तहत केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती ने महानदी पर दोनों राज्यों की निर्मित परियोजनाओं की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का ऐलान किया, लेकिन ओडिशा सरकार इस मामले पर अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम-1956 के तहत एक न्यायाधिकरण के गठन पर जोर दे रहा है। दरअसल ओडिशा सरकार किन्ही राजनीतिक कारणों से छत्तीसगढ़ सरकार की महानदी पर चल रही परियोजनाओं पर आपत्तियां जताकर उन्हें बंद कराने पर अड़ा हुआ है। सूत्रों के अनुसार केंद्रीय हस्तक्षेप के तहत इस विवाद को सुलझाने के प्रयासों के विपरीत अब ओडिशा सरकार ने अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम का सहारा लेकर न्यायाधिकरण के गठन के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट जाने के कारण में ओडिशा सरकार के सूत्रों की माने तो बैठक में नवीन पटनायक को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने यह आश्वासन नहीं दिया कि छत्तीसगढ़ सरकार की महानदी पर चल रही निर्माण प्रक्रिया को बंद कर दिया जाएगा।
लगातार रोड़ा बना है ओडिशा
केंद्र के साथ बैठक के दौरान दोनों राज्यों की सहमति से लिए गये निर्णयों के बावजूद ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का इसी बात पर तो जोर रहा कि छत्तीसगढ़ सरकार को महानदी पर किसी भी निर्माण प्रक्रिया को बंद कर देना चाहिए। लेकिन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के इस मुद्दे को सुलझाने के लिए संयुक्त नियंत्रण बोर्ड (जेसीबी) गठित करने पर सहमति जताने का प्रयास नहीं किया। ओडिशा सरकार ने राज्यों के हितों की रक्षा करने में जेसीबी के असक्षम करार देते हुए इस मुद्दे पर कानूनी विकल्प के तहत एक न्यायाधिकरण के गठन पर ज्यादा जोर दिया। जहां तक महानदी पर निर्मित परियोजनाओं की जांच का सवाल है के लिए गठित की जा रही विशेषज्ञ समिति पर पटनायक ने सहमति तो जताई लेकिन यहां तक कहा कि वह अपना रूख भुवनेश्वर जाने के बाद कैबिनेट की बैठक बुलाकर उसमें होने वाले फैसले के बाद बताएंगे।
असमंजस में है ओडिशा सरकार
महानदी मुद्दे को लेकर शायद ओडिशा सरकार असमंजस में है, जिसका कारण राजनीतिक माना जा रहा है। तभी तो ओडिशा सरकार का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार चिल्का झील, भितरकणिका, सतकोसिया और गहिरमाता अभयारण्य जैसे अनोखे जैव विविधता वाले पर्यटक स्थलों के पर्यावरणीय दृष्टिकोण को नजरअंदाज करते हुए महानदी पर जल परियोजनाओं का निर्माण कर रही है। ऐसा आरोप नवीन पटनायक ने केंद्रीय मंत्री उमा भारती के साथ हुई त्रिपक्षीय बैठक में भी मंढा था। गौरतलब है कि दोनों राज्यों के मुख्य सचिव स्तर की जुलाई में केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष की मौजूदगी में हुई बैठक में लिए गये निर्णय के मुताबिक दोनों राज्यों को एक-दूसरे राज्यों के साथ महानदी पर चल रही परियोजनाओं की जानकारी साझा करने पर सहमति बनने के बावजूद ओडिशा ने अभी तक एक भी जानकारी छत्त्तीसगढ़ सरकार को नहीं दी, जबकि छत्तीसगढ़ सरकार अब तक पूरी हुई परियोजनाओं की पूरी जानकारी ओडिशा राज्य के साथ साझा कर चुका है।
19Sep-2016
रविवार, 18 सितंबर 2016
महानदी मुद्दे पर छत्तीसगढ़ व ओडिशा का तकरार
परियोजनाओं की जांच करेगी विशेषज्ञ समिति
बैठक में फिर दिखा ओडिशा का अडियल रवैया
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच महानदी विवाद का समाधान निकालने के लिए केंद्र सरकार के प्रयास में अभी भी ओडिशा सरकार का अडियल रवैया बाधक बनता नजर आ रहा है। यही कारण है कि केंद्र सरकार द्वारा दोनों राज्यों की बैठक में कोई ठोस नतीजा तो नहीं निकल सका। हालांकि दोनों राज्यों ने महानदी पर अभी तक पूरी हुई दोनों राज्यों की परियोजनाओं की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन पर सहमति जरूर बनी है।
केंद्र सरकार पर महानदी के मुद्दे को लेकर छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच बने तकरार को खत्म करने का दबाव बना हुआ है, तो केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा सरंक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने इसकी गंभीरता को देखते हुए दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में मध्यस्थता की भूमिका निभाई। इस बैठक में खास बात यह नजर आई कि छत्तीसगढ़ सरकार केंद्र सरकार के हर सुझाव के लिए तैयार रहा, लेकिन ओडिशा सरकार ने छत्तीसगढ़ की महानदी पर परियोजनाओं पर आपत्तियां उठाने का राग अलापना बंद नहीं किया। दरअसल महानदी पर निर्मित छत्तीसगढ़ की परियोजनाओं पर ओडिशा सरकार आपत्ति जताते हुए इन्हें बंद करने की मांग कर रही है। जबकि छत्त्तीसगढ़ सरकार ने दावा किया है कि उसकी नयमित मानदंडो और नियमों पर आधारित 95 प्रतिशत से भी ज्यादा परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं और ज्यादातर हाइड्रो प्रोजेक्ट होने के कारण उन्हें बंद करने से बहुत बड़ा नुकसान सहन करना पड़ेगा। छत्तीसगढ़ ने इस मुद्दे पर संयुक्त निगरानी बोर्ड के गठन का प्रस्ताव दिया था, जिसमें पर्यावरणविद्, पूर्व न्यायाधीश व जल विज्ञान से जुडे विशेषज्ञ शामिल किए जाएंगे, लेकिन ओडिशा सहमत नहीं हुआ।
एक सप्ताह में रिपोर्ट देगी समिति
शनिवार को यहां नई दिल्ली में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ओर ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक समेत दोनों राज्यों के संबन्धित मंत्रियों और अधिकारियों की बैठक में तर्क-वितर्क के बाद भी कोई नतीजा निकलता नजर नहीं आया। ऐसे में दोनों राज्यों की सहमति से केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती ने महानदी पर दोनों राज्यों की परियोजनाओं की जांच करने के लिए केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय के विशेष कार्यधिकारी डा. अमरजीत सिंह की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन करने का निर्णय लिया। यह समिति एक सप्ताह में अपनी रिपोर्ट देगी। समिति इस बात की जांच करेगी कि महानदी पर छत्तीसगढ़ और ओडिशा की पूरी की गई परियोजनाएं मानदंडो व नियमानुसार हैं या नहीं। यह समिति इस बात का भी पता लगाएगी कि छत्तीसगढ़ व ओडिशा में किन किन परियोजनाओं के लिए विशेषज्ञ सलाहकार समिति का अनुमोदन नहीं था। इस काम के लिए दोनों राज्यों में दो अलग-अलग दल भेजे जाएंगे। इस रिपोर्ट आने के बाद केंद्र सरकार एक और समिति का गठन करेगी, जिसमें केंद्र के साथ दोनों राज्यों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इस प्रस्ताव के तहत सरकार का मकसद है कि महानदी के इस विवाद का सकारात्मक समाधान सामने लाया जा सके।
‘पानी प्यार के लिए है, तकरार के लिए नहीं’
बैठक के दौरान सुश्री उमा भारती ने छत्तीसगढ़ व ओडिशा के मुख्यमंत्रियों से आग्रह किया है कि वे पूरे देश के हित को ध्यान में रखते हुए एक दूसरे के राज्य की आवश्यकताओं का ध्यान रखें और उसके प्रति संवेदनशील हों। सुश्री उमा भारती ने कहा ‘पानी प्यार के लिए होता है, तकरार के लिए नहीं’। सुश्री उमा भारती ने छत्तीसगढ़ से आग्रह किया है कि वह एक सप्ताह के लिए अपने छह बैराजों का निर्माण कार्य रोक दे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केन्द्रीय जल आयोग के पास छत्तीसगढ़ से सिंचाई योजनाओं का कोई भी मास्टर प्लान विचाराधीन नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि छत्तीसगढ़ में निमार्णाधीन बैराजों पर कार्य पिछले 10 वर्षों से चल रहा था, किन्तु ओडिशा ने इस पर इस वर्ष जून में आपत्ति दर्ज की।
बैठक में लिए गये महत्वपूर्ण निर्णय
महानदी के मुद्दे पर त्रिस्तरीय बैठक में लिए गये निर्णय के अनुसार केन्द्र सरकार एक नए गेज स्टेशन के निर्माण के जरिए यह सुनिश्चित करेगी कि हीराकुंड में एक बूंद भी पानी कम न हो, ताकि किसी भी राज्य खासकर ओडिशा के साथ कोई भी अन्याय न हो सके। छत्तीसगढ़ के अनुरोध और ओडिशा की सहमति पर छत्तीसगढ और ओडिशा की सीमा पर महानदी पर नया गेज स्टेशन स्थापित करने के लिए केन्द्रीय जल आयोग को निर्देश जारी किया गया है। केन्द्रीय जल विज्ञान संस्थान रूड़की को पूरी महानदी घाटी के विस्तृत अध्ययन का जिम्मा सौपा गया है। इस संस्थान की रिपोर्ट पर मंत्रालय द्वारा भविष्य में गठित की जाने वाली समिति या बोर्ड विस्तृत विचार करेगा। इस मुद्दे पर एक विशेषज्ञ समिति के गठन का उड़ीसा का सुझाव छत्तीसगढ़ ने मान लिया है।
ओडिशा ने नहीं दी जानकारी
इस विवाद की खास बात है कि दोनों राज्यों के मुख्य सचिव स्तर की जुलाई में केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष की मौजूदगी में हुई बैठक में लिए गये निर्णय के मुताबिक दोनों राज्यों को एक-दूसरे राज्यों के साथ महानदी पर चल रही परियोजनाओं की जानकारी साझा करने पर सहमति बनने के बावजूद ओडिशा ने अभी तक एक भी जानकारी छत्त्तीसगढ़ सरकार को नहीं दी, जबकि छत्तीसगढ़ सरकार अब तक पूरी हुई परियोजनाओं की पूरी जानकारी ओडिशा राज्य के साथ साझा कर चुका है।
18Sep-2016
बैठक में फिर दिखा ओडिशा का अडियल रवैया
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच महानदी विवाद का समाधान निकालने के लिए केंद्र सरकार के प्रयास में अभी भी ओडिशा सरकार का अडियल रवैया बाधक बनता नजर आ रहा है। यही कारण है कि केंद्र सरकार द्वारा दोनों राज्यों की बैठक में कोई ठोस नतीजा तो नहीं निकल सका। हालांकि दोनों राज्यों ने महानदी पर अभी तक पूरी हुई दोनों राज्यों की परियोजनाओं की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन पर सहमति जरूर बनी है।
केंद्र सरकार पर महानदी के मुद्दे को लेकर छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच बने तकरार को खत्म करने का दबाव बना हुआ है, तो केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा सरंक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने इसकी गंभीरता को देखते हुए दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में मध्यस्थता की भूमिका निभाई। इस बैठक में खास बात यह नजर आई कि छत्तीसगढ़ सरकार केंद्र सरकार के हर सुझाव के लिए तैयार रहा, लेकिन ओडिशा सरकार ने छत्तीसगढ़ की महानदी पर परियोजनाओं पर आपत्तियां उठाने का राग अलापना बंद नहीं किया। दरअसल महानदी पर निर्मित छत्तीसगढ़ की परियोजनाओं पर ओडिशा सरकार आपत्ति जताते हुए इन्हें बंद करने की मांग कर रही है। जबकि छत्त्तीसगढ़ सरकार ने दावा किया है कि उसकी नयमित मानदंडो और नियमों पर आधारित 95 प्रतिशत से भी ज्यादा परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं और ज्यादातर हाइड्रो प्रोजेक्ट होने के कारण उन्हें बंद करने से बहुत बड़ा नुकसान सहन करना पड़ेगा। छत्तीसगढ़ ने इस मुद्दे पर संयुक्त निगरानी बोर्ड के गठन का प्रस्ताव दिया था, जिसमें पर्यावरणविद्, पूर्व न्यायाधीश व जल विज्ञान से जुडे विशेषज्ञ शामिल किए जाएंगे, लेकिन ओडिशा सहमत नहीं हुआ।
एक सप्ताह में रिपोर्ट देगी समिति
शनिवार को यहां नई दिल्ली में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ओर ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक समेत दोनों राज्यों के संबन्धित मंत्रियों और अधिकारियों की बैठक में तर्क-वितर्क के बाद भी कोई नतीजा निकलता नजर नहीं आया। ऐसे में दोनों राज्यों की सहमति से केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती ने महानदी पर दोनों राज्यों की परियोजनाओं की जांच करने के लिए केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय के विशेष कार्यधिकारी डा. अमरजीत सिंह की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन करने का निर्णय लिया। यह समिति एक सप्ताह में अपनी रिपोर्ट देगी। समिति इस बात की जांच करेगी कि महानदी पर छत्तीसगढ़ और ओडिशा की पूरी की गई परियोजनाएं मानदंडो व नियमानुसार हैं या नहीं। यह समिति इस बात का भी पता लगाएगी कि छत्तीसगढ़ व ओडिशा में किन किन परियोजनाओं के लिए विशेषज्ञ सलाहकार समिति का अनुमोदन नहीं था। इस काम के लिए दोनों राज्यों में दो अलग-अलग दल भेजे जाएंगे। इस रिपोर्ट आने के बाद केंद्र सरकार एक और समिति का गठन करेगी, जिसमें केंद्र के साथ दोनों राज्यों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इस प्रस्ताव के तहत सरकार का मकसद है कि महानदी के इस विवाद का सकारात्मक समाधान सामने लाया जा सके।
‘पानी प्यार के लिए है, तकरार के लिए नहीं’
बैठक के दौरान सुश्री उमा भारती ने छत्तीसगढ़ व ओडिशा के मुख्यमंत्रियों से आग्रह किया है कि वे पूरे देश के हित को ध्यान में रखते हुए एक दूसरे के राज्य की आवश्यकताओं का ध्यान रखें और उसके प्रति संवेदनशील हों। सुश्री उमा भारती ने कहा ‘पानी प्यार के लिए होता है, तकरार के लिए नहीं’। सुश्री उमा भारती ने छत्तीसगढ़ से आग्रह किया है कि वह एक सप्ताह के लिए अपने छह बैराजों का निर्माण कार्य रोक दे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केन्द्रीय जल आयोग के पास छत्तीसगढ़ से सिंचाई योजनाओं का कोई भी मास्टर प्लान विचाराधीन नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि छत्तीसगढ़ में निमार्णाधीन बैराजों पर कार्य पिछले 10 वर्षों से चल रहा था, किन्तु ओडिशा ने इस पर इस वर्ष जून में आपत्ति दर्ज की।
बैठक में लिए गये महत्वपूर्ण निर्णय
महानदी के मुद्दे पर त्रिस्तरीय बैठक में लिए गये निर्णय के अनुसार केन्द्र सरकार एक नए गेज स्टेशन के निर्माण के जरिए यह सुनिश्चित करेगी कि हीराकुंड में एक बूंद भी पानी कम न हो, ताकि किसी भी राज्य खासकर ओडिशा के साथ कोई भी अन्याय न हो सके। छत्तीसगढ़ के अनुरोध और ओडिशा की सहमति पर छत्तीसगढ और ओडिशा की सीमा पर महानदी पर नया गेज स्टेशन स्थापित करने के लिए केन्द्रीय जल आयोग को निर्देश जारी किया गया है। केन्द्रीय जल विज्ञान संस्थान रूड़की को पूरी महानदी घाटी के विस्तृत अध्ययन का जिम्मा सौपा गया है। इस संस्थान की रिपोर्ट पर मंत्रालय द्वारा भविष्य में गठित की जाने वाली समिति या बोर्ड विस्तृत विचार करेगा। इस मुद्दे पर एक विशेषज्ञ समिति के गठन का उड़ीसा का सुझाव छत्तीसगढ़ ने मान लिया है।
ओडिशा ने नहीं दी जानकारी
इस विवाद की खास बात है कि दोनों राज्यों के मुख्य सचिव स्तर की जुलाई में केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष की मौजूदगी में हुई बैठक में लिए गये निर्णय के मुताबिक दोनों राज्यों को एक-दूसरे राज्यों के साथ महानदी पर चल रही परियोजनाओं की जानकारी साझा करने पर सहमति बनने के बावजूद ओडिशा ने अभी तक एक भी जानकारी छत्त्तीसगढ़ सरकार को नहीं दी, जबकि छत्तीसगढ़ सरकार अब तक पूरी हुई परियोजनाओं की पूरी जानकारी ओडिशा राज्य के साथ साझा कर चुका है।
18Sep-2016
राग दरबार: टीपू की लोकप्रियता पर रार?
मुलायम सिंह को अखिलेश के ऐसे फैसले रास नहीं
देश की सियासत में वैसे तो दोस्ती या दुश्मनी कोई मायने नहीं रखती, लेकिन जब वंशवाद और परिवारवाद की परंपरा में दरार पैदा होने लगे तो उसे भरने के लिए घर में दीवारे खड़ी होना स्वाभाविक है। दरअसल मिशन-2017 को लेकर उत्तर प्रदेश में चल रही सियासी रणनीतियों के बीच सत्तासीन समाजवादी पार्टी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की रणनीतियों की विचारधाराएं जब विपरीत दिशा में बढ़ने लगी तो पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव को कड़े फैसले लेने के लिए मजबूर तो होना पड़ा, वहीं अखिलेश सरकार के फैसलों में दखल देकर पार्टी में डेमेज कंट्रोल की सियासत को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। भले ही मुलायम यह कहे कि उनके होते हुए पार्टी या परिवार में कोई फूट होने का सवाल ही पैदा नहीं हो सकता, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सपा के परिवार के इस विवाद का फायदा यूपी चुनावी मिशन में जुटी भाजपा, कांग्रेस और बसपा जैसे दलों को मिलने की उम्मीद जरूर लगने लगी? सियासी गलियारों की चर्चा में सपा सरकार में चाचा-भतीजे के बीच खींचती इस दरार में डेमेज कंट्रोल करने के प्रयास में अखिलेश यादव को हटाकर भाई शिवपाल को पार्टी में यूपी की कमान देना मुलायम सिंह को शायद परिवारिक परिस्थियों को लेकर भारी पड़ता नजर आ रहा है। हालांकि यूपी के मामले में अध्यक्ष शिवपाल कोई बड़ा फैसला स्वतंत्र रूप से नहीं कर पाएंगे। चुनाव में संगठन से भी अधिक प्रभावी व निर्णायक कारक जनधारणा होता है और इस लिहाज से अखिलेश की छवि अपनी पार्टी के दूसरे बडे नेताओं पर कहीं भारी है। यह भी हकीकत हो सकती है कि लोग अखिलेश को सरल, शालीन व बेदाग छवि वाला नेता मानते हैं। राजनीतिकार मानते हैं कि एक मुख्यमंत्री के नाते टीपू सुल्तान के नाम से चर्चित अखिलेश यादव की बढ़ती लोकप्रियता चाचा शिवपाल यादव को पच नहीं पा रही थी, क्योंकि चुनावी दृष्टि से उन्होंने कड़े फैसले लेना शुरू कर चाचा को हलकान तो किया, लेकिन पिता मुलायम सिंह को अखिलेश के ऐसे फैसले रास नहीं आए, तभी तो पार्टी मुखिया होने के नाते उन्होंने अखिलेश के फैसले बदलने का ऐलान तक कर दिया। जबकि सपा के नजदीकी मानते हैं कि कौमी एकता दल के विलय का विरोध और दागी मंत्रियों की बरखास्तगी जैसे निर्णय, अखिलेश की लोकप्रियता बढाने वाले हैं। यदि लोकसभा चुनाव के बाद ही अखिलेश स्वतंत्र रूप से सरकार चलाने लगते और कुछ कड़े फैसले ले लेते तो फिर 2017 में उनकी सत्ता में वापसी की संभावना प्रबल होती।
जी का जंजाल बने सिद्धू
कुछ दिन पहले तक कांग्रेस और आप के नेता ये सोचकर खुश हो रहे थे कि पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू बीजेपी-अकाली गठबंधन को हराने के लिये तुरुफ का इक्का साबित होंगे पर अब तलवार का वार उल्टा पड़ता दिख रहा है। सिद्धू अब अकेले ही बीजेपी-अकाली, कांग्रेस और आप को चित करने का ऐलान कर रहे हैं। ये बात ठीक है कि अभी कोई उनको गम्भीरता से नहीं ले रहा। लगता भी यही है कि वे कोई बड़ा तीर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में नहीं मार पायेंगे, पर आप और कांग्रेस नेताओं को ये बात बखूबी पता है कि सिद्धू विपक्ष की वोटों में सेंध लगाकर सत्तापक्ष को फायदा पहुंचा सकते हैं। चर्चा है की सिद्धू को लेकर अभी आप के दरवाजे बंद नहीं हुए हैं। पता नवजोत सिंह सिद्धू को भी चुनाव में नई पार्टी बनाकर लड़ना आसान नहीं है। धनबल सिद्धू की सबसे बड़ी दिक्कत है, उनको कोई बड़ा फण्ड मिले तो बात बने पर कोई सेठ अपनी तिजौरी ऐसे नेता के लिए क्यों खोलेगा जो जीतने का माद्दा नहीं रखता हो। कहा जा रहा है कि ये पूर्व क्रिकेटर पूरी ताकत झोंकने के बाद भी मुश्किल से 3-4 सीट ही जीत जाए तो बड़ी बात होगी। फिलहाल तो सिद्धू अपने नए पैतरे से बीजेपी-अकाली गठबंधन को ही फायदा पहुंचाते दिख रहे हैं।
गोवा में बढ़ने लगी पर्रिकर की हाजिरी
गोवा में कुछ महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है। ऐसे में देश के रक्षा मंत्री भी कहां पीछे रहने वाले हैं। चुनावों से पहले ग्रासरूट लेवल पर पार्टी को जनादेश दिलाने के लिए वो अथक प्रयास करने में जुट गए हैं। हो भी क्यों न गोवा तीन दशक तक उनकी कर्मभूमि जो रही है। यहीं मुख्यमंत्री रहते हुए उनका केंद्र की राजनीति यानि राजधानी दिल्ली में आगमन हुआ और उन्हें रक्षा मंत्री की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला। उनकी गोवा यात्राओं को लेकर पहले जहां ये चर्चाएं होती थीं कि पर्रिकर प्रत्येक सप्ताहांत गोवा चले जाते हैं। वहीं अब यह कहा जाता है कि वो सप्ताहभर के दौरे पर गोवा कूच रहे हैं। ऐसे तो उनकी गोवा में हाजिरी बढ़ना लाजिमी है।
-ओ.पी. पाल, आनंद राणा व कविता जोशी
18Sep-2016
देश की सियासत में वैसे तो दोस्ती या दुश्मनी कोई मायने नहीं रखती, लेकिन जब वंशवाद और परिवारवाद की परंपरा में दरार पैदा होने लगे तो उसे भरने के लिए घर में दीवारे खड़ी होना स्वाभाविक है। दरअसल मिशन-2017 को लेकर उत्तर प्रदेश में चल रही सियासी रणनीतियों के बीच सत्तासीन समाजवादी पार्टी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की रणनीतियों की विचारधाराएं जब विपरीत दिशा में बढ़ने लगी तो पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव को कड़े फैसले लेने के लिए मजबूर तो होना पड़ा, वहीं अखिलेश सरकार के फैसलों में दखल देकर पार्टी में डेमेज कंट्रोल की सियासत को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। भले ही मुलायम यह कहे कि उनके होते हुए पार्टी या परिवार में कोई फूट होने का सवाल ही पैदा नहीं हो सकता, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सपा के परिवार के इस विवाद का फायदा यूपी चुनावी मिशन में जुटी भाजपा, कांग्रेस और बसपा जैसे दलों को मिलने की उम्मीद जरूर लगने लगी? सियासी गलियारों की चर्चा में सपा सरकार में चाचा-भतीजे के बीच खींचती इस दरार में डेमेज कंट्रोल करने के प्रयास में अखिलेश यादव को हटाकर भाई शिवपाल को पार्टी में यूपी की कमान देना मुलायम सिंह को शायद परिवारिक परिस्थियों को लेकर भारी पड़ता नजर आ रहा है। हालांकि यूपी के मामले में अध्यक्ष शिवपाल कोई बड़ा फैसला स्वतंत्र रूप से नहीं कर पाएंगे। चुनाव में संगठन से भी अधिक प्रभावी व निर्णायक कारक जनधारणा होता है और इस लिहाज से अखिलेश की छवि अपनी पार्टी के दूसरे बडे नेताओं पर कहीं भारी है। यह भी हकीकत हो सकती है कि लोग अखिलेश को सरल, शालीन व बेदाग छवि वाला नेता मानते हैं। राजनीतिकार मानते हैं कि एक मुख्यमंत्री के नाते टीपू सुल्तान के नाम से चर्चित अखिलेश यादव की बढ़ती लोकप्रियता चाचा शिवपाल यादव को पच नहीं पा रही थी, क्योंकि चुनावी दृष्टि से उन्होंने कड़े फैसले लेना शुरू कर चाचा को हलकान तो किया, लेकिन पिता मुलायम सिंह को अखिलेश के ऐसे फैसले रास नहीं आए, तभी तो पार्टी मुखिया होने के नाते उन्होंने अखिलेश के फैसले बदलने का ऐलान तक कर दिया। जबकि सपा के नजदीकी मानते हैं कि कौमी एकता दल के विलय का विरोध और दागी मंत्रियों की बरखास्तगी जैसे निर्णय, अखिलेश की लोकप्रियता बढाने वाले हैं। यदि लोकसभा चुनाव के बाद ही अखिलेश स्वतंत्र रूप से सरकार चलाने लगते और कुछ कड़े फैसले ले लेते तो फिर 2017 में उनकी सत्ता में वापसी की संभावना प्रबल होती।
जी का जंजाल बने सिद्धू
कुछ दिन पहले तक कांग्रेस और आप के नेता ये सोचकर खुश हो रहे थे कि पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू बीजेपी-अकाली गठबंधन को हराने के लिये तुरुफ का इक्का साबित होंगे पर अब तलवार का वार उल्टा पड़ता दिख रहा है। सिद्धू अब अकेले ही बीजेपी-अकाली, कांग्रेस और आप को चित करने का ऐलान कर रहे हैं। ये बात ठीक है कि अभी कोई उनको गम्भीरता से नहीं ले रहा। लगता भी यही है कि वे कोई बड़ा तीर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में नहीं मार पायेंगे, पर आप और कांग्रेस नेताओं को ये बात बखूबी पता है कि सिद्धू विपक्ष की वोटों में सेंध लगाकर सत्तापक्ष को फायदा पहुंचा सकते हैं। चर्चा है की सिद्धू को लेकर अभी आप के दरवाजे बंद नहीं हुए हैं। पता नवजोत सिंह सिद्धू को भी चुनाव में नई पार्टी बनाकर लड़ना आसान नहीं है। धनबल सिद्धू की सबसे बड़ी दिक्कत है, उनको कोई बड़ा फण्ड मिले तो बात बने पर कोई सेठ अपनी तिजौरी ऐसे नेता के लिए क्यों खोलेगा जो जीतने का माद्दा नहीं रखता हो। कहा जा रहा है कि ये पूर्व क्रिकेटर पूरी ताकत झोंकने के बाद भी मुश्किल से 3-4 सीट ही जीत जाए तो बड़ी बात होगी। फिलहाल तो सिद्धू अपने नए पैतरे से बीजेपी-अकाली गठबंधन को ही फायदा पहुंचाते दिख रहे हैं।
गोवा में बढ़ने लगी पर्रिकर की हाजिरी
गोवा में कुछ महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है। ऐसे में देश के रक्षा मंत्री भी कहां पीछे रहने वाले हैं। चुनावों से पहले ग्रासरूट लेवल पर पार्टी को जनादेश दिलाने के लिए वो अथक प्रयास करने में जुट गए हैं। हो भी क्यों न गोवा तीन दशक तक उनकी कर्मभूमि जो रही है। यहीं मुख्यमंत्री रहते हुए उनका केंद्र की राजनीति यानि राजधानी दिल्ली में आगमन हुआ और उन्हें रक्षा मंत्री की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला। उनकी गोवा यात्राओं को लेकर पहले जहां ये चर्चाएं होती थीं कि पर्रिकर प्रत्येक सप्ताहांत गोवा चले जाते हैं। वहीं अब यह कहा जाता है कि वो सप्ताहभर के दौरे पर गोवा कूच रहे हैं। ऐसे तो उनकी गोवा में हाजिरी बढ़ना लाजिमी है।
-ओ.पी. पाल, आनंद राणा व कविता जोशी
18Sep-2016
शनिवार, 17 सितंबर 2016
‘नामामि गंगे’ मिशन पर बढ़ा एक ओर कदम!
कृषि मंत्रालय कृषि व सिंचाई योजनाओं से करेगा मदद
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
‘नमामि गंगे’ मिशन को तेजी से लागू करने के प्रयास में जुटी केंद्र सरकार ने एक और कदम आगे बढ़ाया, जिसमें कृषि सिंचाई और किसानों से संबन्धित योजनाओं के जरिए कृषि मंत्रालय मदद के लिए आगे आया है। इसमें गंगा किनारे जल सरंक्षण के लिए सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा मिल सकेगा।
नई दिल्ली में शुक्रवार को केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास तथा गंगा संरक्षण मंत्रालय ने कृषि तथा किसान कल्याण मंत्रालय के साथ एक सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गये हैं। इसके तहत ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम को तेजी से लागू करने में आ रही कृषि संबन्धी अड़चने दूर करने का प्रयास है। दरअसल कृषि मंत्रालय से सहमति ज्ञापन के तहत गंगा किनारे के गांवों में जैविक कृषि का विकास करने की योजना को बल देने के लिए परियोजना में प्रत्येक ग्राम पंचायत एक क्लस्टर का प्रतिनिधित्व करने का प्रस्ताव है। वहीं गंगा स्वच्छता के प्रति जागरूकता कार्यक्रमों, स्वयं सहायता समूहों तथा मोबाइल एप के माध्यम से जैविक खेती को प्रोत्साहन दिया जा सकेगा। इस करार के तहत कृषि मंत्रालय रसायन, उर्वरक और कीटनाशकों के संतुलित उपयोग के लिए जागरूकता पैदा करेगा, ताकि गंगा बेसिन में जल संरक्षण के लिए सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा मिले और किसानों को लाभान्वित किया जा सके। यही नहीं कृषि मंत्रालय गंगा किनारे आजीविका से जुड़े पशुपालन आधारित प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा देगा। जल संसाधन मंत्रालय राज्य सरकारों तथा राज्य स्तरीय क्रियान्वयन एजेंसियों के बीच कृषि तथा किसान कल्याण मंत्रालय की विभिन्न गतिविधियों में जरूरी तालमेल सुनिश्चित करेगा। इस सहमति ज्ञापन की उपलब्धि और क्रियान्वयन की प्रगति की निगरानी प्रत्येक मंत्रालय के नोडल अधिकारियों की संचालन समिति द्वारा की जाएगी। तीन महीने में एक बार या आवश्यकता अनुसार समिति की बैठक होगी, जिसमें सहमति ज्ञापन की प्रगति की समीक्षा की जाएगी।
कई मंत्रालयों का समावेश
मोदी सरकार ने एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन के रूप में ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम शुरू किया है, जिस पर 12,728 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। वहीं इस कार्यक्रम के तहत 7272 करोड़ रुपये की लागत वाली कई परियोजनाएं शुरू कर दी गई है, इस करार के तहत उन्हें भी कवर किया जाएगा। इसका मकसद कार्य कुशलता बढ़ाकर सम्मिलित रूप से बेहतर तालमेल के माध्यम से पुराने और नये प्रयास एकीकृत करना है। गौरतलब है कि इससे पहले जल संसाधन मंत्रालय ने पहला समझौता ज्ञापन गत तीन दिसंबर 2015 को रेल मंत्रालय के साथ किया था, जिसके बाद ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम में भाग लेने वाले सात मंत्रालयों-शिपिंग, मानव संसाधन और विकास, ग्रामीण विकास, पर्यटन, आयुष, युवा मामले और खेल तथा पेय जल और स्वच्छता के साथ भी सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गये और इस परियोजना को तेजी से लागू करने की कवायद जारी है।
कृषि मंत्रालय की ये होगी भूमिका
केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री भारती ने कहा कि इस सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर से कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय से तालमेल के साथ ‘नमामि गंगे’ की विभिन्न परियोजनाओं का कारगर तरीके से कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सकेगा। उन्होंने कहा कि ‘नमामि गंगे’ बहुविषयी कार्यक्रम होने के नाते इस परियोजना को अंजाम देने के लिए अन्य मंत्रालयों, राज्य सरकारों तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी अति आवश्यक है। सुश्री भारती ने उम्मीद जताई कि कृषि मंत्रालय ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। कृषि और किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम को सफलतापूर्वक लागू करने में जल संसाधन मंत्रालय को सभी आवश्यक सहायता देने का भरोसा दिया। उन्होंने कहा कि ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम मोदी सरकार का प्रमुख कार्यक्रम है और उन्हें आशा है कि इस सहमति से इस परियोजना में तेजी लाने में मदद मिलेगी। इस समझौता ज्ञापन पर जल संसाधन मंत्रालय, नदी विकास तथा गंगा संरक्षण मंत्रलाय के राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के अपर मिशन निदेशक हरी हर मिश्रा और कृषि तथा किसान कल्याण मंत्रालय के अपर आयुक्त डा. एस.एस. तोमर, ने केंद्रीय मंत्रियों सुश्री उमा भारती तथा राधा मोहन सिंह की मौजूदगी में हस्ताक्षर किए। यह सहमति ज्ञापन तीन वर्षों के लिए किया गया है और दोनों पक्षों की सहमति से इसकी अवधि बढ़ाई जा सकती है।
17Sep-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
‘नमामि गंगे’ मिशन को तेजी से लागू करने के प्रयास में जुटी केंद्र सरकार ने एक और कदम आगे बढ़ाया, जिसमें कृषि सिंचाई और किसानों से संबन्धित योजनाओं के जरिए कृषि मंत्रालय मदद के लिए आगे आया है। इसमें गंगा किनारे जल सरंक्षण के लिए सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा मिल सकेगा।
नई दिल्ली में शुक्रवार को केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास तथा गंगा संरक्षण मंत्रालय ने कृषि तथा किसान कल्याण मंत्रालय के साथ एक सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गये हैं। इसके तहत ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम को तेजी से लागू करने में आ रही कृषि संबन्धी अड़चने दूर करने का प्रयास है। दरअसल कृषि मंत्रालय से सहमति ज्ञापन के तहत गंगा किनारे के गांवों में जैविक कृषि का विकास करने की योजना को बल देने के लिए परियोजना में प्रत्येक ग्राम पंचायत एक क्लस्टर का प्रतिनिधित्व करने का प्रस्ताव है। वहीं गंगा स्वच्छता के प्रति जागरूकता कार्यक्रमों, स्वयं सहायता समूहों तथा मोबाइल एप के माध्यम से जैविक खेती को प्रोत्साहन दिया जा सकेगा। इस करार के तहत कृषि मंत्रालय रसायन, उर्वरक और कीटनाशकों के संतुलित उपयोग के लिए जागरूकता पैदा करेगा, ताकि गंगा बेसिन में जल संरक्षण के लिए सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा मिले और किसानों को लाभान्वित किया जा सके। यही नहीं कृषि मंत्रालय गंगा किनारे आजीविका से जुड़े पशुपालन आधारित प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा देगा। जल संसाधन मंत्रालय राज्य सरकारों तथा राज्य स्तरीय क्रियान्वयन एजेंसियों के बीच कृषि तथा किसान कल्याण मंत्रालय की विभिन्न गतिविधियों में जरूरी तालमेल सुनिश्चित करेगा। इस सहमति ज्ञापन की उपलब्धि और क्रियान्वयन की प्रगति की निगरानी प्रत्येक मंत्रालय के नोडल अधिकारियों की संचालन समिति द्वारा की जाएगी। तीन महीने में एक बार या आवश्यकता अनुसार समिति की बैठक होगी, जिसमें सहमति ज्ञापन की प्रगति की समीक्षा की जाएगी।
कई मंत्रालयों का समावेश
मोदी सरकार ने एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन के रूप में ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम शुरू किया है, जिस पर 12,728 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। वहीं इस कार्यक्रम के तहत 7272 करोड़ रुपये की लागत वाली कई परियोजनाएं शुरू कर दी गई है, इस करार के तहत उन्हें भी कवर किया जाएगा। इसका मकसद कार्य कुशलता बढ़ाकर सम्मिलित रूप से बेहतर तालमेल के माध्यम से पुराने और नये प्रयास एकीकृत करना है। गौरतलब है कि इससे पहले जल संसाधन मंत्रालय ने पहला समझौता ज्ञापन गत तीन दिसंबर 2015 को रेल मंत्रालय के साथ किया था, जिसके बाद ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम में भाग लेने वाले सात मंत्रालयों-शिपिंग, मानव संसाधन और विकास, ग्रामीण विकास, पर्यटन, आयुष, युवा मामले और खेल तथा पेय जल और स्वच्छता के साथ भी सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गये और इस परियोजना को तेजी से लागू करने की कवायद जारी है।
कृषि मंत्रालय की ये होगी भूमिका
केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री भारती ने कहा कि इस सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर से कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय से तालमेल के साथ ‘नमामि गंगे’ की विभिन्न परियोजनाओं का कारगर तरीके से कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सकेगा। उन्होंने कहा कि ‘नमामि गंगे’ बहुविषयी कार्यक्रम होने के नाते इस परियोजना को अंजाम देने के लिए अन्य मंत्रालयों, राज्य सरकारों तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी अति आवश्यक है। सुश्री भारती ने उम्मीद जताई कि कृषि मंत्रालय ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। कृषि और किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम को सफलतापूर्वक लागू करने में जल संसाधन मंत्रालय को सभी आवश्यक सहायता देने का भरोसा दिया। उन्होंने कहा कि ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम मोदी सरकार का प्रमुख कार्यक्रम है और उन्हें आशा है कि इस सहमति से इस परियोजना में तेजी लाने में मदद मिलेगी। इस समझौता ज्ञापन पर जल संसाधन मंत्रालय, नदी विकास तथा गंगा संरक्षण मंत्रलाय के राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के अपर मिशन निदेशक हरी हर मिश्रा और कृषि तथा किसान कल्याण मंत्रालय के अपर आयुक्त डा. एस.एस. तोमर, ने केंद्रीय मंत्रियों सुश्री उमा भारती तथा राधा मोहन सिंह की मौजूदगी में हस्ताक्षर किए। यह सहमति ज्ञापन तीन वर्षों के लिए किया गया है और दोनों पक्षों की सहमति से इसकी अवधि बढ़ाई जा सकती है।
17Sep-2016
शुक्रवार, 16 सितंबर 2016
दाना मांझी वही रहेगा, पर सूरत बदलने को आतुर बहरीन
बहरीन ने दी आर्थिक मदद, ओड़ीशा हाथ मलता रही
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
पिछले महीने ही आडिशा के आदिवासी दाना मांझी द्वारा अस्तपताल में एंबुलैंस की व्यवस्था न मिलने पर अपनी पत्नी के शव को कंधे पर लादकर दस किमी तक पैदल चलने की कहानी सात संमदर पार तक पहुंची। शायद तभी तो ओडिशा की सरकार के कानों में एक आदिवासी की बेबसी का किस्सा कोई रहम न कर पाया हो, लेकिन दूसरे मुल्क यानि बहरीन के सुल्तान का दिल ऐसे पसीजा कि उसने मांझी की आर्थिक मदद के लिए नौ लाख रुपये का चैक उसके हाथों में थमा दिया।
दरअसल बहरीन के भारत स्थित उच्चायुक्त तारिक मुबारक बिन-देन ने बहरीन के प्रधानमंत्री प्रिंस खलीफा बिन सलमान अल के निर्देश पर गुरुवार को ही एक विशेष विमान से ओडिशा राज्य के कालाहांडी जिले में आदिवासी दाना मांझी को नई दिल्ली के पांच सितारा होटल अशोक में बुलाकर करीब नौ लाख रुपये का चैक दाना मांझी के हाथों में थमाया। जिंदगी में पहली बार देश की राजधानी पहुंचे और वो भी हवाई जहाज में। इस बारे में हरिभूमि संवाददाता के एक सवाल पर मांझी ने कहा कि इससे पहले उसे यह भी मालूम नहीं था कि ओडिशा में कोई भुवनेश्वर शहर वाली राजधानी या नई दिल्ली का इतना बड़ा शहर होगा। इस बातचीत के दौरान दाना मांझी ने अपनी बेबसी और लाचारी की जो दास्तां सुनाई उसे सुनकर हर काई देश की व्यवस्थाओं खासकार आदिवासी समुदाय के उत्थान की योजनाओं पर सवालिया निशान लगाने को मजबूर हो जाएगा। दाना मांझी को अस्पताल की प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर गुस्सा किये बिना जिस प्रकार से अपनी पत्नी के शव को कंधे पर लेकर दस किमी से ज्यादा पैदल चलने की कहानी देश में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर की सुर्खियों में रही। मांझी ने कहा कि जब वह पत्नी के शव को लेकर चला तो रास्ते में मोबाइल फोन से फोटो खींचने वालों की कमी नहीं थी, लेकिन कोई भी उसकी लाचारी को समझने के बजाए तमाशबीन ही नजर आए। उन्होंने कहा कि दस किमी जाने के बाद उन्हें मीडियाकर्मियों ने रोक लिया और उससे इस बेबसी व लाचारी को ही नहीं समझा, बल्कि मीडियाकर्मियों ने पैसा इकठ्ठा करके उसके लिए एक निजी एंबुलैंस कराकर मदद की। हां कंधे पर पत्नी को लादकर पैदल चलने की लाचारी जब मीडिया में उजागर हुई तो स्थानीय दो विधायकों ने दस-दस हजार रुपये की मदद जरूर की और एक बाहरी संस्था ने चालीस हजार रुपये उसके परिवार को दिये। एक सवाल के जवाब में मांझी का कहना था कि ओडिशा सरकार की ओर से उसे कोई पैसा नहीं मिला और न ही उसे इस व्यवस्था के बारे में कुछ पता है।
बच्चों का बदलेंगे भविष्य
दाना मांझी का कहना है कि उसे जो आर्थिक मदद दी जा रही है, यदि यह उसकी पत्नी की मौत से पहले मिलती तो शायद तस्वीर कुछ और ही होती, लेकिन ईश्वर को ऐसा ही मंजूर था। इस घटना से सुर्खियों में आने पर बदलाव के एक सवाल पर मांझी ने कहा कि वह तो दाना मांझी ही रहेंगे, लेकिन उसकी तीन बेटियों की शिक्षा मिलने से जिंदगी जरूरत बदल सकती है, जिन्हें वह डाक्टर, इंजीनियर या अन्य सम्मानित पेशेवर बनाने का प्रयास करेंगे। मांझी ने कहा कि जो भी उसे या परिवार को आर्थिक मदद के रूप में पैसा मिल रहा है उसे वे फिक्स डिपोजिट करके बच्चों का भविष्य बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं।
दशा भी सुधारेगा बहरीन
बहरीन के भारत में उच्चायुक्त तारिक मुबारक बिन देन ने कहा कि उनके प्रधानमंत्री के निर्देश हैं कि दाना मांझी के परिवार की सूरत बदलनी चाहिए। यही नहीं बहरीन सरकार की योजना के तहत एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही कालाहांडी जाएगा और आदिवासियों के रहन सहन और उनके उत्थान करने की योजना तैयार करेगा। ऐसे में यह भी सहज-सामान्य नहीं कि यह घटना न केवल भारत के कल्याणकारी राज्य होने पर सवाल खड़ा करता है बल्कि इंसान में इंसानियत होने का शक भी पैदा करता है। यह सिर्फ दाना मांझी की पत्नी की मौत नहीं है बल्कि समूचे तंत्र बेशर्मी की पराकाष्ठा भी है।
16Sep-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
पिछले महीने ही आडिशा के आदिवासी दाना मांझी द्वारा अस्तपताल में एंबुलैंस की व्यवस्था न मिलने पर अपनी पत्नी के शव को कंधे पर लादकर दस किमी तक पैदल चलने की कहानी सात संमदर पार तक पहुंची। शायद तभी तो ओडिशा की सरकार के कानों में एक आदिवासी की बेबसी का किस्सा कोई रहम न कर पाया हो, लेकिन दूसरे मुल्क यानि बहरीन के सुल्तान का दिल ऐसे पसीजा कि उसने मांझी की आर्थिक मदद के लिए नौ लाख रुपये का चैक उसके हाथों में थमा दिया।
दरअसल बहरीन के भारत स्थित उच्चायुक्त तारिक मुबारक बिन-देन ने बहरीन के प्रधानमंत्री प्रिंस खलीफा बिन सलमान अल के निर्देश पर गुरुवार को ही एक विशेष विमान से ओडिशा राज्य के कालाहांडी जिले में आदिवासी दाना मांझी को नई दिल्ली के पांच सितारा होटल अशोक में बुलाकर करीब नौ लाख रुपये का चैक दाना मांझी के हाथों में थमाया। जिंदगी में पहली बार देश की राजधानी पहुंचे और वो भी हवाई जहाज में। इस बारे में हरिभूमि संवाददाता के एक सवाल पर मांझी ने कहा कि इससे पहले उसे यह भी मालूम नहीं था कि ओडिशा में कोई भुवनेश्वर शहर वाली राजधानी या नई दिल्ली का इतना बड़ा शहर होगा। इस बातचीत के दौरान दाना मांझी ने अपनी बेबसी और लाचारी की जो दास्तां सुनाई उसे सुनकर हर काई देश की व्यवस्थाओं खासकार आदिवासी समुदाय के उत्थान की योजनाओं पर सवालिया निशान लगाने को मजबूर हो जाएगा। दाना मांझी को अस्पताल की प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर गुस्सा किये बिना जिस प्रकार से अपनी पत्नी के शव को कंधे पर लेकर दस किमी से ज्यादा पैदल चलने की कहानी देश में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर की सुर्खियों में रही। मांझी ने कहा कि जब वह पत्नी के शव को लेकर चला तो रास्ते में मोबाइल फोन से फोटो खींचने वालों की कमी नहीं थी, लेकिन कोई भी उसकी लाचारी को समझने के बजाए तमाशबीन ही नजर आए। उन्होंने कहा कि दस किमी जाने के बाद उन्हें मीडियाकर्मियों ने रोक लिया और उससे इस बेबसी व लाचारी को ही नहीं समझा, बल्कि मीडियाकर्मियों ने पैसा इकठ्ठा करके उसके लिए एक निजी एंबुलैंस कराकर मदद की। हां कंधे पर पत्नी को लादकर पैदल चलने की लाचारी जब मीडिया में उजागर हुई तो स्थानीय दो विधायकों ने दस-दस हजार रुपये की मदद जरूर की और एक बाहरी संस्था ने चालीस हजार रुपये उसके परिवार को दिये। एक सवाल के जवाब में मांझी का कहना था कि ओडिशा सरकार की ओर से उसे कोई पैसा नहीं मिला और न ही उसे इस व्यवस्था के बारे में कुछ पता है।
बच्चों का बदलेंगे भविष्य
दाना मांझी का कहना है कि उसे जो आर्थिक मदद दी जा रही है, यदि यह उसकी पत्नी की मौत से पहले मिलती तो शायद तस्वीर कुछ और ही होती, लेकिन ईश्वर को ऐसा ही मंजूर था। इस घटना से सुर्खियों में आने पर बदलाव के एक सवाल पर मांझी ने कहा कि वह तो दाना मांझी ही रहेंगे, लेकिन उसकी तीन बेटियों की शिक्षा मिलने से जिंदगी जरूरत बदल सकती है, जिन्हें वह डाक्टर, इंजीनियर या अन्य सम्मानित पेशेवर बनाने का प्रयास करेंगे। मांझी ने कहा कि जो भी उसे या परिवार को आर्थिक मदद के रूप में पैसा मिल रहा है उसे वे फिक्स डिपोजिट करके बच्चों का भविष्य बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं।
दशा भी सुधारेगा बहरीन
बहरीन के भारत में उच्चायुक्त तारिक मुबारक बिन देन ने कहा कि उनके प्रधानमंत्री के निर्देश हैं कि दाना मांझी के परिवार की सूरत बदलनी चाहिए। यही नहीं बहरीन सरकार की योजना के तहत एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही कालाहांडी जाएगा और आदिवासियों के रहन सहन और उनके उत्थान करने की योजना तैयार करेगा। ऐसे में यह भी सहज-सामान्य नहीं कि यह घटना न केवल भारत के कल्याणकारी राज्य होने पर सवाल खड़ा करता है बल्कि इंसान में इंसानियत होने का शक भी पैदा करता है। यह सिर्फ दाना मांझी की पत्नी की मौत नहीं है बल्कि समूचे तंत्र बेशर्मी की पराकाष्ठा भी है।
16Sep-2016
तकनीक से होगा पहाड़ी सड़कों का रख-रखाव
अरुणाचल में राजमार्गो के क्षतिग्रस्त पर चिंता
हरिभूमि ब्यूरो. नई दिल्ली।
सड़क परियोजनाओं के तहत अरुणाचल प्रदेश में सैकड़ो किमी लंबी सड़कें और राजमार्ग का निर्माण पूरा होने के बावजूद भारी बारिश में भूस्खलनों के कारण 30-35 जगहों से क्षतिग्रस्त होने का मामला सामने आया है। ऐसे में केंद्र सरकार पहाड़ी इलाकों में राष्टÑीय राजमार्ग या अन्य सड़क निर्माण में बेहतर तकनीक का इस्तेमाल करने की योजना तैयार कर रही है।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार ऐसी योजनाओं अरुणाचल प्रदेश में जायजा लेन् गये मंत्रालय में राज्यमंत्री
मनसुख लाल मांडविया ने राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं का निरीक्षण किया, तो राष्ट्रीय राजमार्ग 713 ए के पाप्पू-युपिआ-होज-पोतिन खंड और एनएच 13 के पोतिन-जिरो खंड के क्षतिग्रस्त होने के मामले पर विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ चर्चा की। बताया गया कि राष्ट्रीय राजमार्ग 713 ए का 50 किलोमीटर लंबा पाप्पू-युपिआ-होज-पोतिन खंड अप्रैल के बाद से भारी बारिश और उसके परिणामस्वरूप होने वाले भूस्खलनों के कारण 30-35 जगहों से क्षतिग्रस्त हो गया है। राज्य के लोक निर्माण विभाग द्वारा सड़क को दो लेन का बनाने का कार्य इस साल मार्च में पूरा कर लिया गया और अब इसे रख-रखाव के उद्देश्य से मंत्रालय द्वारा अपने हाथ में लेने की आवश्यकता है। मांडविया ने कई क्षतिग्रस्त जगहों का निरीक्षण किया और राजमार्ग की हालत पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को इन स्थलों पर तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए। उन्होंने यह भी भरोसा दिया कि मंत्रालय ऐसे इलाकों में शुरू होने वाली सड़क परियोजनाओं में बेहतर तकनीक के इस्तेमाल की योजना तैयार कर रहा है।
राज्य में बनी 653 किमी सड़के
केंद्रीय सड़क परिवहन राज्य मंत्री मनसुख लाल मांडविया ने देश के पूर्वोत्तर राज्यों में उच्चस्तरीय सड़क अवसंरचना का निर्माण करने की केन्द्र सरकार की प्रतिबद्धता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि राज्य के लिए कुल अनुमोदित 2570 किलोमीटर सड़कों में से 653 किलोमीटर बनकर तैयार हो चुकी हैं और 1917 किलोमीटर निमार्णाधीन है। मंत्रालय के अनुसार सड़क के कुल लंबाई में से सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय 710 किलोमीटर हिस्से का निर्माण करेगा, राज्य पीडब्ल्यूडी 420 किलोमीटर, एनएचआईडीसीएल 722 किलोमीटर और सीमा सड़क संगठन 718 किलोमीटर हिस्से का निर्माण करेगा। राज्य में चालू परियोजनाएं के तहत 1985 करोड़ रुपये की लागत में 250 किलोमीटर नेचिपू-होज, 860 करोड़ रुपये की 20 किलोमीटर दिबांग-अलुबारी नदी पुल प्रणाली, 500 करोड़ रुपये की 75 किलोमीटर पासीघाट-पानगिन और 250 करोड़ रुपये लागत से 12 किलोमीटर ईटानगर-नाहरलगुन 4 लेन बनाने की परियोजना प्रस्तावित है।
16Sep-2016
हरिभूमि ब्यूरो. नई दिल्ली।
सड़क परियोजनाओं के तहत अरुणाचल प्रदेश में सैकड़ो किमी लंबी सड़कें और राजमार्ग का निर्माण पूरा होने के बावजूद भारी बारिश में भूस्खलनों के कारण 30-35 जगहों से क्षतिग्रस्त होने का मामला सामने आया है। ऐसे में केंद्र सरकार पहाड़ी इलाकों में राष्टÑीय राजमार्ग या अन्य सड़क निर्माण में बेहतर तकनीक का इस्तेमाल करने की योजना तैयार कर रही है।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार ऐसी योजनाओं अरुणाचल प्रदेश में जायजा लेन् गये मंत्रालय में राज्यमंत्री
मनसुख लाल मांडविया ने राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं का निरीक्षण किया, तो राष्ट्रीय राजमार्ग 713 ए के पाप्पू-युपिआ-होज-पोतिन खंड और एनएच 13 के पोतिन-जिरो खंड के क्षतिग्रस्त होने के मामले पर विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ चर्चा की। बताया गया कि राष्ट्रीय राजमार्ग 713 ए का 50 किलोमीटर लंबा पाप्पू-युपिआ-होज-पोतिन खंड अप्रैल के बाद से भारी बारिश और उसके परिणामस्वरूप होने वाले भूस्खलनों के कारण 30-35 जगहों से क्षतिग्रस्त हो गया है। राज्य के लोक निर्माण विभाग द्वारा सड़क को दो लेन का बनाने का कार्य इस साल मार्च में पूरा कर लिया गया और अब इसे रख-रखाव के उद्देश्य से मंत्रालय द्वारा अपने हाथ में लेने की आवश्यकता है। मांडविया ने कई क्षतिग्रस्त जगहों का निरीक्षण किया और राजमार्ग की हालत पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को इन स्थलों पर तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए। उन्होंने यह भी भरोसा दिया कि मंत्रालय ऐसे इलाकों में शुरू होने वाली सड़क परियोजनाओं में बेहतर तकनीक के इस्तेमाल की योजना तैयार कर रहा है।
राज्य में बनी 653 किमी सड़के
केंद्रीय सड़क परिवहन राज्य मंत्री मनसुख लाल मांडविया ने देश के पूर्वोत्तर राज्यों में उच्चस्तरीय सड़क अवसंरचना का निर्माण करने की केन्द्र सरकार की प्रतिबद्धता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि राज्य के लिए कुल अनुमोदित 2570 किलोमीटर सड़कों में से 653 किलोमीटर बनकर तैयार हो चुकी हैं और 1917 किलोमीटर निमार्णाधीन है। मंत्रालय के अनुसार सड़क के कुल लंबाई में से सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय 710 किलोमीटर हिस्से का निर्माण करेगा, राज्य पीडब्ल्यूडी 420 किलोमीटर, एनएचआईडीसीएल 722 किलोमीटर और सीमा सड़क संगठन 718 किलोमीटर हिस्से का निर्माण करेगा। राज्य में चालू परियोजनाएं के तहत 1985 करोड़ रुपये की लागत में 250 किलोमीटर नेचिपू-होज, 860 करोड़ रुपये की 20 किलोमीटर दिबांग-अलुबारी नदी पुल प्रणाली, 500 करोड़ रुपये की 75 किलोमीटर पासीघाट-पानगिन और 250 करोड़ रुपये लागत से 12 किलोमीटर ईटानगर-नाहरलगुन 4 लेन बनाने की परियोजना प्रस्तावित है।
16Sep-2016
बुधवार, 14 सितंबर 2016
एलएनजी जल्द बनेगा नौकाओं का ईंधन
पहले एलएनजी भंडारण हेतु 10 एकड़ भूमि देगा केंद्र
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में गंगा समेत 111 नदियों को राष्ट्रीय जलमार्ग में तब्दील करके जल परिवहन परियोजना से क्रांतिकारी बदलाव में जुटी केंद्र सरकार वाराणसी से हल्दिया तक गंगा में मालवाहकों जहाजों का ट्रायल पूरा कर चुकी है। इस परियोजना में एक और कदम आगे बढ़ाते हुए अब सरकार ने एलएनजी को नदियों में दौड़ने वाले जल वाहनों यानि नौकाओं का र्इंधन बनाने की तैयारी शुरू कर दी है, जिसके लिए कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के तहत हल्दिया गोदी परिसर के निकट एलएनजी के भंडारण के लिए 10 एकड़ भूमि मुहैया कराई जाएगी।
केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय के अनुसार सरकार ने माल लागत घटाने और नौकाओं के लिए ईंधन के रूप में एलएनजी का उपयोग करके प्रदूषण को कम करने के लिए एक रोडमैप तैयार किया है। जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी ने एनएनजी के भंडारण एवं अन्य सुविधाओं के लिए हल्दिया गोदी परिसर को एक सकारात्मक और सुरक्षित रूप में देखते हुए इस योजना को मंजूरी दी है। केंद्र सरकार ने कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के तहत हल्दिया गोदी परिसर में, हल्दिया तेल घाट नंबर-1 के आसपास स्थित क्षेत्र में 30 वर्ष की अवधि के लिए एलएनजी भंडारण सुविधाओं की स्थापना हेतु 10 एकड़ भूमि का निर्धारण किया है। इसमें निविदा एवं नीलामी के जरिए पाइपलाइन बिछाने और माल उतारने की सुविधा की अनुमति होगी। इस परियोजना को दिसंबर 2016 तक भूमि को पट्टे पर देने की अनुमति देकर भूमि लीज मॉडल के तहत शुरू किया जाएगा। एलएनजी सुविधाएं भूमि के आवंटन की तारीख से 24 महीने के अंदर विकसित हो जाने का अनुमान है। मंत्रालय का दावा है कि जल परिवहन में विकसित की गई इस महत्वपूर्ण योजना के तहत सरकार एलएनजी की सुविधा और ढुलाई अंतर्देशीय जलमार्ग के साथ-साथ उचित स्थानों पर स्थापित करने के लिए कदम उठा रही है। दुनिया के कुछ विकसित देशों में एलएनजी र्इंधन से संचालित नौकाओं का बेहतर परिणाम को देखते हुए भारत में भी एलएनजी को नौकाओं का र्इंधन बनाने का फैसला किया है। सरकार का मानना है कि एलएनजी भंडारण केन्द्र गंगा नदी के साथ-साथ बनाए जा सकते हैं,जिससे संभावित गैस उपभोक्ताओं को भी सुविधा होगी। सरकार एलएनजी ईंधन का इस्तेमाल सड़क परिवहन क्षेत्र में भी करने पर विचार कर रही है।
जल परिवहन को मिलेगा बढ़ावा
मंत्रालय के अनुसार जल परिवहन में एलएनजी के इस्तेमाल से 20 प्रतिशत र्इंधन की बचत होने का अनुमान लगाया गया है। वहीं इससे कार्बन डाइआॅक्साइड के उत्सर्जन में 20-25 प्रतिशत तथा नाइट्रोजन, सल्फर आॅक्साइड के उत्सर्जन में 90 प्रतिशत की कमी आने की संभावना है। मसलन एलएनजी को नौका ईंधन के रूप में पेश करने का प्रयास अंतर्देशीय जलमार्गों और तटीय शिपिंग को बढ़ावा देने के समग्र प्रयासों का हिस्सा है। सरकार का मानना है कि अंतर्देशीय जल परिवहन एक लागत प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल प्रणाली है, जिसे प्रोत्साहन देने के लिए पिछले दो सालों से महत्व दे रही सरकार ने जल मार्ग विकास के अधीन गंगा नदी में नौकायन की सुविधा के लिए टर्मिनलों और अन्य सुविधाओं का निर्माण पहले से ही कराना शुरू कर दिया है।
डीपीआर का इंतजार
जहाजरानी मंत्रालय इस योजना को सिरे चढ़ाने के लिए पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड (पीएलएल) और भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) के बीच मंथन कर रहा है। यही नहीं इसके लिए पीएलएल हल्दिया, साहिबगंज, पटना और गाजीपुर में एलएनजी सुविधाएं स्थापित करने के लिए विस्तृत व्यवहार्य रिपोर्ट (डीपीआर)तैयार करने की प्रक्रिया में जुटा है। मंत्रालय ने डीपीआर में पीएलएल से नौकाओं के ईंधन के लिए एलएनजी की ढुलाई के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा सहायता का ब्यौरा तैयार करने का भी अनुरोध किया था, ताकि अपेक्षित गतिविधियां अर्जित करने के लिए लक्ष्य निर्दिष्ट करने में आसानी हो सके। इस रिपोर्ट में गोवा और महाराष्ट्र के जलमार्ग में एलएनजी नौकाओं की शुरूआत करने की संभावनाओं को तलाशने का भी अनुरोध सरकार कर चुकी है। यह रिपोर्ट इस वर्ष गत अप्रैल में मुम्बई के समुद्रीय भारत सम्मेलन के दौरान आईडब्ल्यूएआई के साथ किये गये एक करार के अनुसार तैयार की जा रही है, जिसका मंत्रालय को इंतजार है।
14Sep-2016
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में गंगा समेत 111 नदियों को राष्ट्रीय जलमार्ग में तब्दील करके जल परिवहन परियोजना से क्रांतिकारी बदलाव में जुटी केंद्र सरकार वाराणसी से हल्दिया तक गंगा में मालवाहकों जहाजों का ट्रायल पूरा कर चुकी है। इस परियोजना में एक और कदम आगे बढ़ाते हुए अब सरकार ने एलएनजी को नदियों में दौड़ने वाले जल वाहनों यानि नौकाओं का र्इंधन बनाने की तैयारी शुरू कर दी है, जिसके लिए कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के तहत हल्दिया गोदी परिसर के निकट एलएनजी के भंडारण के लिए 10 एकड़ भूमि मुहैया कराई जाएगी।
केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय के अनुसार सरकार ने माल लागत घटाने और नौकाओं के लिए ईंधन के रूप में एलएनजी का उपयोग करके प्रदूषण को कम करने के लिए एक रोडमैप तैयार किया है। जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी ने एनएनजी के भंडारण एवं अन्य सुविधाओं के लिए हल्दिया गोदी परिसर को एक सकारात्मक और सुरक्षित रूप में देखते हुए इस योजना को मंजूरी दी है। केंद्र सरकार ने कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के तहत हल्दिया गोदी परिसर में, हल्दिया तेल घाट नंबर-1 के आसपास स्थित क्षेत्र में 30 वर्ष की अवधि के लिए एलएनजी भंडारण सुविधाओं की स्थापना हेतु 10 एकड़ भूमि का निर्धारण किया है। इसमें निविदा एवं नीलामी के जरिए पाइपलाइन बिछाने और माल उतारने की सुविधा की अनुमति होगी। इस परियोजना को दिसंबर 2016 तक भूमि को पट्टे पर देने की अनुमति देकर भूमि लीज मॉडल के तहत शुरू किया जाएगा। एलएनजी सुविधाएं भूमि के आवंटन की तारीख से 24 महीने के अंदर विकसित हो जाने का अनुमान है। मंत्रालय का दावा है कि जल परिवहन में विकसित की गई इस महत्वपूर्ण योजना के तहत सरकार एलएनजी की सुविधा और ढुलाई अंतर्देशीय जलमार्ग के साथ-साथ उचित स्थानों पर स्थापित करने के लिए कदम उठा रही है। दुनिया के कुछ विकसित देशों में एलएनजी र्इंधन से संचालित नौकाओं का बेहतर परिणाम को देखते हुए भारत में भी एलएनजी को नौकाओं का र्इंधन बनाने का फैसला किया है। सरकार का मानना है कि एलएनजी भंडारण केन्द्र गंगा नदी के साथ-साथ बनाए जा सकते हैं,जिससे संभावित गैस उपभोक्ताओं को भी सुविधा होगी। सरकार एलएनजी ईंधन का इस्तेमाल सड़क परिवहन क्षेत्र में भी करने पर विचार कर रही है।
जल परिवहन को मिलेगा बढ़ावा
मंत्रालय के अनुसार जल परिवहन में एलएनजी के इस्तेमाल से 20 प्रतिशत र्इंधन की बचत होने का अनुमान लगाया गया है। वहीं इससे कार्बन डाइआॅक्साइड के उत्सर्जन में 20-25 प्रतिशत तथा नाइट्रोजन, सल्फर आॅक्साइड के उत्सर्जन में 90 प्रतिशत की कमी आने की संभावना है। मसलन एलएनजी को नौका ईंधन के रूप में पेश करने का प्रयास अंतर्देशीय जलमार्गों और तटीय शिपिंग को बढ़ावा देने के समग्र प्रयासों का हिस्सा है। सरकार का मानना है कि अंतर्देशीय जल परिवहन एक लागत प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल प्रणाली है, जिसे प्रोत्साहन देने के लिए पिछले दो सालों से महत्व दे रही सरकार ने जल मार्ग विकास के अधीन गंगा नदी में नौकायन की सुविधा के लिए टर्मिनलों और अन्य सुविधाओं का निर्माण पहले से ही कराना शुरू कर दिया है।
डीपीआर का इंतजार
जहाजरानी मंत्रालय इस योजना को सिरे चढ़ाने के लिए पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड (पीएलएल) और भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) के बीच मंथन कर रहा है। यही नहीं इसके लिए पीएलएल हल्दिया, साहिबगंज, पटना और गाजीपुर में एलएनजी सुविधाएं स्थापित करने के लिए विस्तृत व्यवहार्य रिपोर्ट (डीपीआर)तैयार करने की प्रक्रिया में जुटा है। मंत्रालय ने डीपीआर में पीएलएल से नौकाओं के ईंधन के लिए एलएनजी की ढुलाई के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा सहायता का ब्यौरा तैयार करने का भी अनुरोध किया था, ताकि अपेक्षित गतिविधियां अर्जित करने के लिए लक्ष्य निर्दिष्ट करने में आसानी हो सके। इस रिपोर्ट में गोवा और महाराष्ट्र के जलमार्ग में एलएनजी नौकाओं की शुरूआत करने की संभावनाओं को तलाशने का भी अनुरोध सरकार कर चुकी है। यह रिपोर्ट इस वर्ष गत अप्रैल में मुम्बई के समुद्रीय भारत सम्मेलन के दौरान आईडब्ल्यूएआई के साथ किये गये एक करार के अनुसार तैयार की जा रही है, जिसका मंत्रालय को इंतजार है।
14Sep-2016
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