रविवार, 10 अप्रैल 2016

साइबर क्राइम के खिलाफ सख्त कानून की तैयारी!

तेजी से पैर पसारते इंटरनेट अपराध से चिंता में सरकार 
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
दुनियाभर में भारत में इंटरनेट के सबसे ज्यादा इस्तेमाल की रिपोर्ट के साथ ही साइबर क्राइम के मामले भी तेजी के साथ पैर पसारने से केंद्र सरकार चिंतित नजर आ रही है। केंद्र सरकार साइबर क्राइम पर शिकंजा कसने की दिशा में बेअसर होते मौजूदा कानून को सख्त करने की तैयारी में है।
भारत में दिनों दिन बढ़ते क्राइम में सबसे ज्यादा तेजी से फैल रहा साइबर क्राइम है जो आज भारत के राज्यों में अपनी जड़े फैला चुका है। जैसे-जैसे इंटरनेट के इस्तेमाल में बढ़ोतरी हो रही है, वैसे-वैसे साइबर अपराध में भी इजाफा देखा जा रहा है। मसलन सोशल वेबसाइट पर भी अपशब्दों वाली भाषा का इस्तेमाल करना कानूनी दायरे में है। यही नहीं केंद्र सरकार ऐसे साइबर अपराधों को रोकने के लिए देश में मौजूदा सूचना तकनीक कानून-2000 और सूचना तकनीक (संशोधन) कानून-2008 को सख्त बनाने की कवायद कर रही है। हालांकि इसी श्रेणी के कई मामलों में देश में भारतीय दंड संहिता, कॉपीराइट कानून-1957, कंपनी कानून, सरकारी गोपनीयता कानून और यहां तक कि आतंकवाद निरोधक कानून के तहत भी कार्रवाई करने के प्रावधान किये गये, लेकिन मौजूदा कानून साइबर क्राइम की बढ़ती रμतार को रोकने में नाकाफी साबित हो रहे हैं। इस दिशा में ऐसे इंटरनेट क्राइम पर निगरानी के लिए केंद्र सरकार एक अलग से सॉμटवेयर विकसित करने की जुगत में है, जिसके तहत कानून में भी सख्त प्रावधान करने की तैयारी कर रही है। साμटवेयर सुरक्षा समाधन उपलब्ध कराने वाली फर्म नोर्टन इंडिया के कंट्री मैनेजर रितेश चोपड़ा की माने तो उनका अनुमान है कि व्यक्तिगत डेटा में सेंधमारी के कारण 11.3 करोड़ भारतीयों को पिछले साल औसतन लगभग 16,558 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है।
क्या है साइबर अपराध
आज का युग कम्प्यूटर और इंटरनेट का युग है। कम्पयूटर की मदद के बिना किसी बड़े काम की कल्पना करना भी मुश्किल है। ऐसे में अपराधी भी तकनीक के सहारे हाईटेक हो रहे हैं। जो जुर्म को अंजाम देने के लिए कम्प्यूटर, इंटरनेट, डिजिटल डिवाइसेज और वर्ल्ड वाइड वेब आदि का इस्तेमाल करने में कोई चूक नहीं करते। आॅनलाइन ठगी या चोरी की भी इसी श्रेणी का अहम गुनाही हिस्सा बनने लगा है। यहां तक कि किसी की वेबसाइट को हैक करना या सिस्टम डेटा को चुराना ये सभी तरीके साइबर क्राइम की श्रेणी में शामिल है। मसलन साइबर क्राइम दुनियाभर में सुरक्षा और जांच एजेंसियां के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है। किसी कंप्यूटर, डिवाइस, इंफॉर्मेशन सिस्टम या नेटवर्क में अनधिकृत रूप से घुसपैठ डेटा से छेड़छाड़ करने और किसी व्यक्ति, संस्थान या संगठन आदि के निजी या गोपनीय डेटा या सूचनाओं की चोरी करना करने की वारदाते भी बढ़ रही है, जो साइबर क्राइम की श्रेणी का हिस्सा है, जिसके लिए सजा का प्रावधान है।

राग दरबार: सियासी चक्रव्यूह में देश प्रेम....

दारुल उलूम देवबंद के फतवे
देश प्रेम जताने के लिए हिंदुस्तान में ‘भ्‍ाारत माता की जय’ बोलना जरूरी है या नही, इसी पर छिड़ी बहस पर कुछ सियासीदान सुर्खियोंं में बने रहना ज्यादा पसंद करते हैं, जिन्हें शायद न तो देश प्रेम और न ही संविधान की परवाह है। ऐसी सियासत करने वाले केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करके देश व समाज को बांटने का ही प्रयास करते हैं। जरा इस मामले में इस्लामी दीनी तालीम के मरकज दारुल उलूम देवबंद के फतवे को ही देखें, तो इस्लाम के नजरिए से यह फतवा दुरुस्त माना जा रहा है। इसीलिये तमाम मुसलमानों ने दारुल उलूम से जानना चाहा था कि इसलामी एतबार से भ्‍ाारत माता की जय बोलना उनके लिए जायज है या नहीं? दारुल इफ्ता के आठ मुफ्तियों ने तमाम माथापच्ची के बाद जो तर्क दिये हैं उनमें मुसलमानों के लिए भ्‍ाारत माता की जय बोलना जायज नहीं है, लेकिन अपने वतन से मोहब्बत करना दिनी इमान है। इसका तात्पर्य मुसलमान वतन को अपना माबूत यानि भ्‍ागवान नहीं समझते। मुफ्तियों ने वतन परस्ती को लेकर अपने खयाल के इजहार में यहां तक कहा कि हम और हमारे पूर्वज यही पैदा हुए तो वतन से मोहब्बत स्वाभ्‍ााविक है, लकिन इसे देवी मान कर पूजा नहीं कर सकते। ऐसे बयान के बाद तमाम लोग दारुल उलूम पर नजला उतारते नजर आए। मसलन विहिप ने तो दारूल उलूम के फतवे को आतंकवाद का समर्थक बताया, लेकिन वहीं इस मामले में संघ प्रमुख मोहन भ्‍ाागवत ने सही बात को तकदीद करते हुए कहा कि भ्‍ाारत माता की जय बोलना किसी के ऊपर थोपना उचित नहीं है। ये विचार करने की बात यह है कि आखिर यह नौबत क्यों आयी कि देवबंद को फतवा देना पड़ा? राजनीतिक गलियारं में इस मामले पर चर्चा होना लाजिमी है और इतिहास भी गवाह है कि जंग-ए-आजादी के दौरान हिंदू और मुसलमान दोनों ने मिलकर भ्‍ाारत माता की जय का नारा लगाया, तब विवाद पैदा नही हुआ? तो अब किस बात का विवाद। एक तरह का ये विवाद उन लोगों की देन है जिन्होंने देश प्रेम जताने वाले इस नारे को धार्मिक निष्ठा से जोड़ दिया या फिर धार्मिक निष्ठा के प्रतिकार के रुप में एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ शुरू हुई है। जबकि भ्‍ाारत माता की जय वाला भ्‍ााव ही हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे में निहित है।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

नई रणनीति से जल संकट से निपटने की तैयारी!

केंद्र सरकार ने राज्यों से जल लिकेज को जीरो करने को कहा
ओ.पी. पाल
. नई दिल्ली।
देश में जल संकट की चुनौतियों से निपटने के लिए मोदी सरकार ने नई रणनीतियों और विदेशी तकनीक से जल संरक्षण और जल प्रबंधन को बेहतर बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। इसके लिए केंद्र सरकार ने सभी राज्यों से खासकर पानी की बर्बादी यानि वाटर लिकेज को जीरो करने के लिए पत्र लिखकर खासकर पेयजल को सुरक्षित करने पर बल दिया है।
दरअसल पानी की समस्या दुनियाभर के सामने विकराल रूप धारण करती जा रही है। मसलन जल संकट से अकेला भारत ही ही नहीं जूझ रहा है। इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जल को कानून के दायरे में लाने पर भी बहस चल रही है। यह दिगर बात है कि कुछ देश पानी की सुरक्षा करने के लिए वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल करके कुछ हद तक राहत की सांस ले रहे हैं, लेकिन भारत में जिस तरह से पानी की बर्बादी हो रही है उसके लिए यदि केंद्र और राज्य सरकारें सचेत होकर जनता को ‘जल है तो कल है’ के महत्व को न समझाते हुए जल के प्रति जागरूक न कर सकी, तो भविष्य में देश पानी की बूंद-बंूद से तरस जाएगा। ऐसा वैज्ञानिकों ने अध्ययन करके अकेले भारत के लिए ही नहीं, बल्कि समूची दुनिया के सामने खुलासा करते हुए चेतावनी तक दे डाली है कि वर्ष 2025 तक दुनिया के दो तिहाई देशों को पानी की भारी किल्लत झेलने को मजबूर होना पड़ सकता है। जबकि एशिया और खासतौर से भारत में ऐसी स्थिति उससे भी पहले यानि वर्ष 2020 तक ही होने की आशंका है। मसलन एशिया में यह समस्या कहीं अधिक विकराल होने की संभावनाएं जताई जा रही है। मोदी सरकार ने इस चेतावनी को गंभीरता से लिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जल चिंता के तहत केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय ने जल संसाधन मंत्रालय के साथ समन्वय करके गत एक अप्रैल को ही सभी राज्यों के प्रमुख सचिवों और जल आपूर्ति सचिवों को पत्र लिखकर शहरी और ग्रामीण जल आपूर्ति योजना में पानी के लिकेज को जीरो करने के लिए कदम उठाने को कहा है।
समूचे एशिया पर खतरा
जल से जुड़े वैज्ञानिकों और जल क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं की माने तो तिब्बत के पठार पर मौजूद हिमालयी ग्लेशियर समूचे एशिया में 1.5 अरब से अधिक लोगों को मीठा जल मुहैया करता है। इस ग्लेशियर से नौ नदियों में पानी की आपूर्ति होती है, जिनमें भारत की गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियां भी शामिल हैं। मसलन इन नदियों से अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल और बांग्लादेश में जलापूर्ति हो रही है, लेकिन जलवायु परिवर्तन और ‘ब्लैक कार्बन’ जैसे प्रदूषक तत्वों ने हिमालय के कई ग्लेशियरों पर जमी बर्फ की मात्रा को कम कर दिया है, जिसके कारण इनमें से कुछ इस सदी के अन्त तक निश्चित रूप से खत्म हो जाएंगे। इसका तात्पर्य ग्लेशियरों पर जमी बर्फ की मात्रा के घटने से लाखों लोगों की जलापूर्ति पर असर पड़ेगा और बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है जिससे जान-माल को भारी नुकसान होगा। वैज्ञानिकों का मत है जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या बढ़ोत्तरी के कारण अगले दो दशक में पानी की मांग, आपूर्ति से 40 फीसदी ज्यादा होगी यानी दस में से चार लोग पानी से वंचित रह सकते हैं। यही नहीं कृषि क्षेत्र, जिस पर जल की कुल आपूर्ति का 71 फीसदी खर्च होता है, सबसे बुरी तरह प्रभावित होगा। इससे दुनिया के साथ भारत के खाद्य उत्पादन पर विपरीत असर पड़ेगा।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

डेढ़ दशक में देश में होंगे सभी इलेक्ट्रिक वाहन!

केंद्र ने प्रदूषण से निपटने की शुरू की तैयारी
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में बढ़ते र्इंधन के खर्च और प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार की मेगा योजना को अंतिम रूप दिया जा चुका है, जिसके तहत केंद्र सरकार ने अगले डेढ़ दशक के भीतर देशभर में चलने वाले वाहनों को शतप्रतिशत इलेक्ट्रिक मोड़ पर लाने का लक्ष्य तय किया है, जबकि डीजल और पेट्रोल चलित वाहनों को अगले दो साल के भीतर ई-वाहन में तब्दील करने का फैसला किया है।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की हरित राजमार्ग नीति का मकसद राष्ट्रीय राजमार्गो एवं अन्य सड़कों को हराभरा बनाकर पर्यावरण को बढ़ावा देने के साथ सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों को भी वैकल्पिक र्इंधन से जोड़ने की योजना है। देश में इलेक्ट्रिक वाहनों के परिचालन की योजना को गति देने के लिए केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की अगुआई में एक कार्यसमूह पहले ही गठित हो चुका है, जिसमें तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर शामिल हैं। इस समूह की एक सप्ताह के भीतर होने वाली बैठक में देश को 2030 तक शतप्रतिशत इलेक्ट्रिक वाहनों वाला बनाने पर मंथन किया जाएगा, जिसमें समूह बड़े पैमाने पर योजना बनाने पर विचार करके ऐसा खाका तैयार करने की तैयारी में ताकि दुनिया के पीछे चलने के बजाय इस मेगा योजना में भारत अगुआई करने वाला देश साबित हो सके। इस योजना के बारे में केंद्रीय बिजली मंत्री पीयूष गोयल ने भी उम्मीद जताई है कि आगामी वर्ष 2030 तक भारत 100 प्रतिशत इलेक्ट्रिक वाहनों वाला दुनिया का पहला देश बनने का दर्जा हासिल कर सकता है।
ऐसी है सरकार की योजना
सूत्रों के अनुसार देश को ई-वाहन का परिचायक बनाने की दिशा में सरकार बैटरी चालित कारों के लिए जीरो डाउन पेमेंट वाली योजना को जल्द लाने की योजना बना रही है। जिसमें सरकार ऐसी बैटरी चालित कार मुμत यानि जीरो डाउन पेमेंट पर लोगो को देने की योजना है, जिसमें लोग पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद पर होने वाली बचत से इसकी किस्तें भर सकते हैं। वहीं सरकार इस योजना को सेल्फ फाइनेंसिंग बनाने का प्रयास कर रही है, ताकि इस महत्वकांक्षी परियोजना में सरकार के सामने वित्तीय बोझ भी न आ सके और लोगों भी इसके लिए एक रुपये का निवेश नहीं करना पड़े। मोदी सरकार की इस विजनरी योजना के तहत देश को ई-वाहन मोड़ पर लाने का मकसद न सिर्फ प्रदूषण से मुक्ति पाना है, बल्कि महंगे जीवाश्म ईंधनों के आयात पर निर्भरता को भी खत्म करना है। मसलन अगले 15 साल के भीतर भारत ऐसा देश बन जाएगा, जहां केवल बैटरी चालित वाहन चलते नजर आएंगे। सरकार इस योजना को सेल्फ फाइनेंसिंग बनाने का प्रयास कर रही है, ताकि इस महत्वकांक्षी परियोजना में सरकार के सामने वित्तीय बोझ भी न आ सके और लोगों भी इसके लिए एक रुपये का निवेश नहीं करना पड़े।
इसरो बनाएगा बैटरी
सड़क मंत्रालय के अनुसार इस योजना के तहत इसरो के साथ करार हो चुका है, जो लिथियम इओन बैटरी तैयार करेगा, जो वैज्ञानिक पद्धति पर चार्ज होगी और इसे कनवर्ट करके हर प्रकार के परिवहन वाहन में इस्तेमाल की जा सकेगी। इससे पहले इंडियन स्पेस रिसर्च आॅगेर्नाइजशन (इसरो) के वैज्ञानिकों ने लिथियम इओन बैटरी को तैयार की है, जो अन्य दूसरी बैटरियों से करीब दस गुना सस्ती है। सरकार का प्रयास है कि इस इलेक्ट्रिक परिवहन प्रणाली से सिर्फ तेल को कम मात्रा में मंगवाने में ही मदद नहीं मिलेगी,बल्कि पर्यावरण को भी सुरिक्षत रखने में यह प्रणाली कारगर होगी।

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

जल संरक्षण का सबब बनेगी विदेशी तकनीक!

कृषि सिंचाई में वैज्ञानिक तौर तरीकों पर रहेगा जोर
ओ.पी. पाल.
नई दिल्ली।
देश में सूखा और बाढ़ की चुनौतियों के अलावा कृषि विकास के लिए जल संरक्षण और अपशिष्ट जल प्रबंधन की योजना में केंद्र सरकार विदेशी तकनीक का इस्तेमाल करेगी। देश में जल संकट से निपटने के लिए सरकार ऐसी जल संबन्धी योजनाओं को पीपीपी मॉडल पर शुरू करने का खाका तैयार कर रही है।
दरअसल दुनियाभर में जल को लेकर बनती जा रही भयावह स्थिति से निपटने के लिए हरेक देश जल संरक्षण की दिशा में तकनीकी प्रणाली अपनाई जा रही है। भारत में भी बाढ़ और सूखे की स्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार की कई परियोजनाएं पटरी पर है, जिनकी दशा और दिशा को विदेशी तकनीक से रμतार देने की तैयारी है। केंद्र सरकार ने मानव सभ्यता, जल संचयन और जल प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए न्यूनतम जल का अधिकतम इस्तेमाल की नीति पर विकास की बुनियादी चुनौती में जल संरक्षण को प्राथमिकता पर रखा है। लिहाजा सरकार ने ऐसे देशों की वैज्ञानिक और तकनीकियों के इस्तेमाल को साझा करने का फैसला किया है, जिन्होंने अपने देश में जल संबन्धी चुनौतियों से निपटते हुए विकास को आगे बढ़ाया है। केंद्र सरकार के निर्णय से खासकर इजराइल,नीदरलैंड, हंगरी जैसे देशों की तकनीक भारत में जल संरक्षण के लिए बेहतर सबब बनेगी। मसलन इन देशों की तकनीक से सबक लेते हुए भारत भी कृषि विकास के अलावा मानव के उपयोग, विकास, निर्माण, उद्योग और अन्य क्षेत्रों में कम से कम जल से ज्यादा उपयोग से जल संरक्षण को बढ़ावा देने की योजना बना रहा है। इजराइल की इस तकनीक का इस्तेमाल मध्य प्रदेश में सफल होता दिखा है, तो वहीं महाराष्टÑ सरकार ने नीदरलैंड के साथ करार करके उसकी तकनीक पर काम शुरू कर दिया है। वहीं 'क्लीन वॉटर एंड ग्रीन एनर्जी इनकोरपेशन' के तकनीक को पेयजल व सिंचाई के लिए इस्तेमाल के लिए पंजाब सरकार ने हंगरी की तकनीक अपना शुरू कर दिया है। खासकर हंगरी के 'वन ड्रॉप मोर क्रॉप' (एक बूंद से अधिक फसल) के नारे के अनुकूल तकनीकी पंजाब के लिए वरदान बन सकती है।
क्या है विदेशी तकनीक
जल संरक्षण के तहत कृषि सिंचाई के लिए इजराइल में गंदे पानी को शोध संयंत्रों के बाद वैज्ञानिक तकनीक के बाद सिंचाई में प्रयोग किया जा रहा है, जबकि नीदरलैंड के अलावा हंगरी जैसे कई देशों में कम लागत पर ज्यादा जल का उपयोग करने के लिए भी तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। नीदरलैंड अपशिष्ट जल को शुद्ध जल में तब्दील करने की तकनीक का भरपूर उपयोग कर रहा है। इसी प्रकार हंगरी ने भी अपने देश में जल संरक्षण और उसके उपयोग में तकनीक का सहारा लेकर चुनौतियों का मुकाबला करके अन्य देशों को सबक दिया है। भारत में जहां तक कृषि विकास और सिंचाई का सवाल है उसमें ऐसे देशों की तकनीक मोदी सरकार को पूरी तरह रास आ रही है, जिसके लिए सरकार ने इजराइल, नीदरलैंड और हंगरी की इन तकनीकों को साझा करके कृषि विकास के साथ देश के विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास तेज कर दिये हैं। इजराइल के कृषि मंत्री यूरी एरियल ने तो यहां चल रहे ‘भारत जल सप्ताह’ समारोह भरोसा दिया है कि भारत में जल प्रबंधन के क्षेत्र में वह विशेष सहयोग करने को तैयार है।
भू-जल स्तर सुधार
जल संसाधन मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार उनका मंत्रालय जल प्रबंधन और जल संरक्षण की दिशा में अपनी योजनाओं में विदेशी तकनीकों को शामिल करते हुए गंदे पानी को उपयोगी बनाने के लिए संयंत्रों की स्थापना की जाएगी, वहीं भू-जल के स्तर में सुधार के लिए अपनाई जाने वाली तकनीक का भी आदान प्रदान किया जाएगा। मंत्रालय के सूत्रों की माने तो जल संरक्षण और अपशिष्ट जल प्रबंधन में नीदरलैंड की तकनीक का दुनिया ने लोहा माना है और सबसे बेहतर तकनीक के लिए भारत ने नीदरलैंड सरकार के सहयोग से देश में दिसंबर 2014 में ही वेस्ट वैल्यू संघ की स्थापना कर ली थी, जिसके तहत नीदरलैंड भारत में जल संरक्षण और अपशिष्ट जल प्रबंधन में ही सहयोग नहीं कर रहा, बल्कि नीदरलैंड भारत में अपशिष्ट जल प्रबंधन की बढ़ती मांग के मद्देनजर निवेश करने को भी तैयार है, इसके अलावा केंद्र सरकार जल संबन्धी परियोजनाओं को सार्वजनिक निजी भागीदारी के तहत करने की योजना बना रही है।
06Apr-2016

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

जनांदोलन से होगा जल संरक्षण!


 जल संरक्षण में हरेक को काम करने की जरूरत
हरिभूमि ब्यूरो. नई दिल्ली।
जल संकट से जूझते देश में विकास और कृषि विकास, उद्योग और बुनियादी ढांचे का विकसित करने के लिए पानी की पहली जरूरत होती है। सोमवार को यहां शुरू हुए भारत जल सप्ताह के दौरान केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने कहा कि जल संरक्षण के लिए किये जा रहे प्रयासों समाज के हर वर्ग को आगे आकर काम करने की जरूरत है।
नई दिल्ली में सोमवार को शुरू हुए भारत जल सप्ताह का उद्घाटन करते हुए केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती कहा कि बिना जल संरक्षण के देश का विकास संभव नहीं है और कृषि विकास को गति देने के लिए जल संरक्षण बहुत ही जरूरी है। सुश्री भारती ने न्यूनतम जल के अधिकतम इस्तेमाल की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि इस क्षेत्र में नई तकनीक के उपयोग की आवश्यकता है। जल प्रबंधन के क्षेत्र में इजराइल की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए उमा भारती ने कहा कि कृषि क्षेत्र में जल की उपयोगिता के लिए इजराइल की तकनीक से सबक लेने की जरूरत है। उमा भारती ने देश में जल की उपलब्धता और उसकी गुणवत्ता में गिरावट को बेहद चिंता का विषय बताते हुए कहा कि दुनियाभर में हो रहे जलवायु परिवर्तनों से भी जल संसाधनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। उमा ने कहा कि वे इस क्षेत्र में इजराइल को इसलिए अपना गुरू मानती है, कि वहां कम पानी में ज्यादा सिंचाई करने की तकनीक अपनाई जा रही है, जिससे भारत को सबक लेने की जरूरत है।
नदी जोड़ो अभियान से मिलेगी निजात
सुश्री भारती ने कहा कि जल संसाधन मंत्रालय नदी जोड़ो परियोजना के जरिए देश में जल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि केंद्र में नई सरकार को नदी जोड़ों परियोजना को मिशन मोड में पूरा करने का फैसला किया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि केन-बेतवा नदी संपर्क योजना पर शीघ्र ही काम शुरू हो जाएगा। जल क्रांति अभियान और जल ग्रामीण योजना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इनका उद्देश्य जल संरक्षण के क्षेत्र में पंचायती राज संस्थाओं, स्थानीय निकायों और सभी हितधाराकों को समान रूप से साथ लेकर आगे बढ़ना है।
बेहतर जल प्रबंधन के प्रयास
इस मौके पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कृषि के विकास में जल संरक्षण की जरूरत बताते हुए कहा कि सिंचाई के क्षेत्र में निवेश का लाभ अन्य क्षेत्रों की तुलना में बहुत जल्दी मिलता है, वहीं देश के समग्र और आर्थिक विकास में इसका प्रभाव तत्काल दिखना शुरू हो जाता है। उन्होंने कहा कि मानसून कमजोर रहने के कारण कृषि पर बुरा असर पड़ता है, लेकिन बेहतर जल प्रबंधन के जरिए हम इस समस्या से निपट सकते है। उन्होंने जल के बेहतर इस्तेमाल के जरिए कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने में विशेष रूप से मध्य प्रदेश का उल्लेख किया और कहा कि पिछले आठ दस वर्षों में राज्य में कृषि की स्थिति में जबरदस्त सुधार आया है।

राग दरबार: पर्दे के पीछे की बाजीगरी....

अल्पसंख्यक मंत्रालय की नाकामी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद अल्पसंख्यकों में अपनी और सरकार की छवि को संतुलित करने की दिशा में जिस प्रकार से देश में उनके सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक उत्थान के लिए सरकारी खजाने का मुंह खोला था, उसे देखते हुये समाज के लोगों को सुखद आश्चर्य हुआ था। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार अल्पसंख्यकों को सीधे फायदा पहुंचे, इसके लिये मोदी सरकार ने डीबीटी यानि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (प्रत्यक्ष लाभ अंतरण) व्यवस्था को अपनाया। समाज के विद्यार्थियों ने इसे हाथों-हाथ लिया। लेकिन सरकार के बयान और उसके आंकड़े कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। नया वित्तीय वर्ष शुरु हुआ तो अल्पसंख्यक मंत्रालय की बाजीगरी भी उजागर हो गयी।
अब भला देखिये, बीते वित्त वर्ष में केंद्र सरकार ने अल्पसंख्यक विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देने के लिये पर्याप्त धनराशि आवंटित की थी। मंत्रालय ने अल्पसंख्यकों के लिये कई योजनाओं की शुरूआत बड़े धूमधाम से की थी, लेकिन निर्धारित छात्रवृत्ति राशि का पूरा इस्तेमाल कर पाने में बुरी तरह विफल रहा। एक अप्रैल से नया वित्तवर्ष शुरू होते ही मंत्रालय ने एक बयान जारी कर वैकल्पिक व्यवस्था से पिछले वित्तवर्ष की बकाया राशि को चालू वर्ष में हस्तांतरित कर दिया। अब इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में खुली चर्चा हो रही है कि मंत्रालय छात्रवृत्ति के छात्रों को भुगतान करने के लिये डीबीटी मोड की चुनौतियों से पार नही पा सका, जिसका कारण है कि 80 लाख के लक्ष्य के बावजूद वित्तीय वर्ष समाप्त होने तक मात्र 39 लाख अल्पसंख्यक छात्र ही अपने बैंक खातों में डीबीटी मोड से छात्रवृति प्राप्त कर पाये हैं।
हालांकि, मोदी सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की डीबीटी मोड की व्यवस्था का मकसद छात्रों को कदाचारों से छुटकारा दिलाना और छात्रवृत्ति के नाम पर होती रही अनियमितताओं पर अंकुश लगाना था। सच तो यही है कि इतने बड़े पैमाने पर आॅनलाइन सत्यापन और धनराशि को सीधे छात्रों के बैंक खातों में ट्रांसफर करने के पहले प्रयास में कुछ तकनीकी और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करने में मंत्रालय पीएम मोेदी की कसौटी पर खरा नही उतर पाया। अलबत्ता, मंत्रालय बड़े जोर शोर से यह दावा कर रहा है कि मोदी सरकार ने बकाया राशि को चालू वित्तवर्ष में अग्रसारित करके इसे खर्च करने की मंजूरी दे दी है। कुछ समझे जनाब..... यही तो है आंकड़ों की बाजीगरी।
सिद्धू का बहाना
पंजाब में भाजपा के लिए सिद्धू दंपती परेशानी का सबब बन गये हैं। पूर्व सांसद नवजोत सिंह सिद्धू पार्टी से खफा हैं, लोकसभा चुनाव में अमृतसर से टिकट कटने के बाद से उनकी नारजगी किसी से छुपी नहीं है। वे ज्यादातर मौकों पर भाजपा के खिलाफ खुलकर बोलने से बच निकलते हैं पर उनकी पत्नी ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ती हैं। पंजाब में भाजपा की विधायक नवजोत कौर ने जब पार्टी से इस्तीफे का ऐलान किया तो भाजपा हाईकमान को सांप सूंघ्‍ गया। बताते हैं कि कुछ बड़े नेताओं ने नवजोत सिंह सिद्धू से संपर्क किया और नवजोत कौर को समझाने की बात कही। सुनने में आ रहा है कि हर किसी की बोलती अपनी हाजिर जवाबी से बंद करने में माहिर भाजपा के इस पूर्व सांसद और स्टार प्रचारक ने यह कहकर पीछा छुड़ा लिया कि पत्नी के सामने उनकी भी ‘बोलती’ बंद हो जाती है। बात तो पते की कही नवजोत सिंह सिद्धू ने। उनकी इस दलील का भाजपा के सेनापतियों के पास भी कोई जवाब नहीं था। कहा जा रहा है कि दोनों मियां-बीबी भाजपा से किनारा कर आम आदमी पार्टी में जाना चाहते हैं। केजरीवाल से लगातार संपर्क में होने की बात भी हवा में तैर रही है। नवजोत कौर का इस्तीफा इस दिशा में पहला कदम है। देखना ये है कि नवजोत सिंह सिद्धू कब ऐसा करने का फैसला लेते हैं।
रक्षा मंत्री का सेंस आॅफ ह्ययुमर
कहने को तो देश के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के पास एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील माने वाले रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी है, जिसमें थलसेना,वायुसेना और नौसेना द्वारा की जा रही स्वदेशी भूभाग की सुरक्षा शामिल है। लेकिन इसके अलावा उनके व्यक्तित्व का एक बेहद अहम पहलू उनका शांत, संयमित और मजाकिया होना है। सेंस आॅफ ह्ययुमर इतना कमाल का कि कई बार वो अपने आसपास मौजूद लोगों का गंभीर माहौल के बीच में भी मनोरंजन कर स्थिति को सामान्य बना देते हैं। उनका यह अंदाज राजनीति में आने के बाद का नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व से शुरूआत से ही जुड़ा हुआ है। बीते दिनों एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार के दौरान देश की सामरिक सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे पर सवाल-जवाब के बीच रक्षा मंत्री ने मजाकिया अंदाज में अपने आईआईटी बॉम्बे में पढ़ाई के दौरान हुआ एक रोचक किस्सा सुना दिया जिससे माहौल कुछ देर के लिए ही सही हॉल में हंसी और ठहाकों की गूंज से भर उठा। मानो सभी उनके सेंस आॅफ ह्ययुमर के कायल हो गए हो।
-ओ.पी. पाल, आनंद राणा, कविता जोशी
03Apr-2016

अब स्मारकों का निहारना हुआ महंगा

ऐतिहासिक स्मारकों के प्रवेश शुल्क में वृद्धि लागू
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
देश में केंद्रीय संरक्षित स्मारकों को देखने वालों के लिए अच्छी खबर नहीं है। मसलन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत टिकट से स्मारक स्थलों में प्रवेश शुल्क में दो से तीन गुणा तक की बढ़ोतरी की गई है। केंद्र सरकार द्वारा स्मारकों के प्रवेश शुल्क में वृद्धि करने वाले संशोधन शुक्रवार यानि एक अप्रैल से लागू कर दिये गये हैं।
केंद्र सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत टिकट से प्रवेश वाले केंद्रीय संरक्षित स्मारकों का प्रवेश शुल्क बढ़ाने का यह डेढ़ दशक बाद किया है। इससे पहले वर्ष 2000 में प्रवेश शुल्क में बढ़ोत्तरी की गई थी। केंद्रीय सरकार ने इस शुल्क संशोधन में तर्क दिया है कि यह फैसला आम जनता की टिप्पणियों व सुझाव लेने के बाद पर्यटन मंत्रालय, टूर परिचालकों व ट्रैवल एसोसिएशनों के साथ परामर्श के बाद किया गया है। दरों में यह बढ़ोत्तरी विदेश में स्मारकों के प्रवेश शुल्क के अनुरूप की गई है। प्रवेश शुल्क में किये गये संशोधित स्वरूप में प्रवेश शुल्कों में दो से तीन गुना तक बढ़ोतरी की गई है। सरकार का यह भी दावा है कि यह फैसला मुख्य रूप से पर्यटन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए किया गया है। वहीं इस फैसले से एएसआई स्मारकों में आने वाले पर्यटकों को बेहतर सुविधाएं प्रदान की जा सकेंगी।
विश्व धरोहर स्मारकों बढ़ाई सुविधाएं
सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि विश्व धरोहर स्मारकों और अन्य टिकट से प्रवेश वाले स्मारकों को क्रमश: 750 रुपये और 300 रुपये प्रति व्यक्ति की ऊंची दरों की टिकट खरीदने पर मुμत बोतल बंद पानी, वाई-फाई कनेक्टिविटी, स्मृति चिह्न और तस्वीरों के साथ सीडी जैसी सुविधाओं की भी पेशकश की जाएगी। इससे सरकारी खजाने को अतिरिक्त राजस्व मिलेगा। वहीं 750 रुपये, 500 रुपये, 300 रुपये और 200 रुपये प्रति व्यक्ति टिकट लेने वालों को स्मारकों में आसान प्रवेश उपलब्ध कराने के लिए अलग कतार उपलब्ध कराई जाएगी।
ऐसे हुआ दरों में संशोधन
विश्व धरोहर स्मारक- इन स्मारकों के मौजूदा दस रुपये से 30 रुपये का प्रवेश शुल्क किया गया है, इसमें भारतीय नागरिक और सार्क देशों के आगंतु, बिम्सटेक देशों के आगंतुक और भारत के विदेशी नागरिक शामिल हैं। जबकि इनके अलावा अन्य देशों के नागरिकों के लिए 200 रुपये के टिकट की दर को 500 रुपये तक बढ़ाया गया है।
अन्य स्मारक-केंद्र सरकार द्वारा प्रवेश टिकटों की दरों में किये गये संशोधन के तहत भारतीय और सार्क देशों के अलावा बिम्सटेक देशों के नागरिकों के लिए पांच रुपये वाले टिकट को 15 रुपये तथा इनके अलावा अन्य देशों के नागरिकों के लिए मौजूदा 100 रुपये के टिकट को 200 रुपये तक बढ़ाने का फैसला किया है।
02Apr-2016

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

सड़क हादसे में सरकार देगी आर्थिक मदद!

सड़क दुघर्टना कोष के गठन की राह आसान बनाने की तैयारी
ओ.पी. पाल. नई दिल्ली।
मोदी सरकार का नया मोटर वाहन और सड़क सुरक्षा विधेयक भले ही संसद में लंबित हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सड़क हादसों पर जारी दिशानिर्देशों की मंजूरी के फैसले ने केंद्र सरकार की यात्रियों व माल वाहकों को सुरक्षित, तीव्र, किफायती एवं समावेशी यातायात
की सुविधा की राह आसान बना दी है। मसलन सड़क हादसों पर अंकुश लगाने की दिशा में अब सरकार ने सड़क हादसों में घायलों को तत्काल राहत देने के लिए प्रस्तावित वाहन दुर्घटना कोष के गठन की राह तेज करना शुरू कर दिया है। 
दरअसल केंद्र में मोदी सरकार ने देश की परिवहन व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन लाने और सड़कों के सफर को सुरक्षित करने के नया मोटर एवं सुरक्षा विधेयक का मसौदा तैयार करने की पहल की, लेकिन यह विधेयक लोकसभा में तो पारित हो चुका है, लेकिन राज्यसभा में इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार हालांकि सड़क हादसों के पीड़ितों को फोरी राहत के लिए राष्ट्रीय कोष है, लेकिन मंत्रालय ने सड़क क्षेत्र के लिए अलग से एक राष्ट्रीय ‘सड़क दुर्घटना कोष’ के गठन का प्रस्ताव करके उसे नए विधेयक के प्रावधानों में शामिल किया था। चूंकि विधेयक संसद में अटका हुआ है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सरकार के दिशानिर्देशों में सड़क हादसों पर अंकुश लगाने की पहल की गई और सुप्रीम कोर्ट ने एक दिन पहले ही सरकार के इस कदम पर मुहर लगाकर सरकार की राह आसान कर दी है। हालांकि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी कई बार इस नये विधेयक पर राज्यों के क्षेत्राधिकार हनन की आशंका को दूर कर मकसद को पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं।
राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड बनेगा
मंत्रालय के अनुसार सड़क विधेयक के पारित होने की इंतजार में अटकी प्रस्तावित सड़क सुरक्षा कोष की स्थापना करने की तैयारियां शुरू कर दी है। सरकार ने इसके लिए पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले रोड सेस से राशि जुटाने की योजना बनाई है। ऐसे संकेत बजट में भी सरकार दे चुकी है। इस कोष की स्थापना के नियंत्रण के लिए सरकार सुंदर कमेटी के सुझाव पर एक छह सदस्यीय राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड के गठन करेगी। इस बोर्ड में सड़क परिवहन, सिविल इंजीनियरिंग, आपात चिकित्सा, अनुसंधान, सर्वेक्षण व डाटा संग्रह से जुड़े विशेषज्ञ शामिल किये जा रहे हैं।

आज से बदला दिखेगा अपना देश

नए वित्तीय वर्ष में बदलाव की बहेगी बयार
हरिभूमि ब्यूरो.
नई दिल्ली।
सरकार की देश में बदलाव की बयार को दिशा देने के लिए बजट और नीतियों के तहत कुछ क्षेत्रों में नियमों में बदलाव किये गये हैं,जो एक अप्रैल यानि नये वित्तीय वर्ष से आम लोगों की जिंदगी में भी बदलाव नजर आना शुरू हो जाएगा।
मोदी सरकार ने कई ऐसी रोजमर्रा की चीजों में भी बदलाव करने की नीतियां शुरू की है, जिसके तहत कुछ चीजों में बचत पर कम ब्याज मिलेगा, तो कुछ क्षेत्रों में हर किसी को ब्याज में छूट भी मिलना शामिल है। यही नहीं स्कूलों, अस्पतालों का समय तक में बदलाव होने जा रहा है, तो वहीं ड्राइविंग लाइसेंस सहित कुछ चीजों में आसानी होगी, जिससे नए स्टार्टअप्स पर कर में सौ फीसदी छूट मिलेगी। इसके अलावा रेलवे के नियमों में भी बदलाव से भी कहीं राहत और कहीं जेबों पर बोझ पडना तय है।
ये नजर आएगा खास बदलाव
-सोने के आभूषणों पर एक फीसदी उत्पाद शुल्क रिटर्न की पहली किस्त।
-दस लाख से अधिक की लग्जरी कारें एक फीसदी महंगी।
-थर्ड पार्टी मोटर वाहन बीमा 15 से 40 फीसदी तक महंगा हो जाएगा।
-दो लाख से अधिक नकद खरीदारी पर पैन कार्ड जरूरी।
-नए स्टार्टअप्स को कर लाभ पर सौ फीसदी की छूट।
-यात्री ड्यूटी युक्त उत्पाद नहीं ला रहा है तो घोषणा पत्र भरने की जरूरत नहीं।
-पंजीयन दμतरों से आॅनलाइन रजिस्ट्री का सिस्टम में अब बिना नक्शे के रजिस्ट्री नहीं होगी।
-छत्तीसगढ़ में बायोमैट्रिक मशीन में अंगूठा लगाने के बाद ही लोगों को राशन मिल सकेगा।
ब्याज दरों में होगी कटौती
छोटी बचत योजनाओं पीपीएफ, आरडी, डाकघर एफडी, सीनियर सिटीजन स्कीम, मासिक आय योजना, सुकन्या समृद्धि योजना,
किसान विकास पत्र में ब्याज दरें 0.60 से 1.30 फीसदी तक घट जाएंगी।
सिलेंडर का नया कोटा
एक अप्रैल से उपभोक्ताओं को 12 रियायती सिलेण्डर मिलेंगे। 31 मार्च के बाद शेष बुकिंग निरस्त होगी और बीपीएल परिवारों को नए कनेक्शन पर निर्धारित 1600 की छूट मिलेगी।
चालीस हजार कनेक्शन का लक्ष्य
नए वित्त वर्ष में कृषि कनेक्शनों की राह खुल रही है यानि इस साल भी 40 हजार किसानों को कनेक्शन दिए जाएंगे।
चिकित्सकों की सेवानिवृत्ति चिकित्सकों की सेवानिवृत्ति का नया नियम प्रभावी होगा, जिसके तहत अब चिकित्सक 62 साल की आयु में सेवानिवृत्त होंगे।
रेलवे देगा कई नई सहूलियतें
-रेलवे नया हेल्पलाइन नं. 182 शुरू, हर श्रेणी में होगा 30 फीसदी कोटा।
-आम यात्रियों के लिए टिकट कैंसिल एसएमएस से हो सकेगा।
-टिकट रद्दीकरण के लिए 139 डायल कर कन्फर्म टिकट की विस्तृत जानकारी जरूरी।
-युवा के लिए 100 स्टेशनों पर वाईफाई कनेक्टिविटी, एप से टिकट मिलेगा।
-बुजुर्गों के लिए ट्रेन में निचली बर्थ को कोटा 50 फीसदी बढ़ा।
-बुजुर्गों को अब एक ट्रेन में 80 से 90 आरक्षित बर्थ मिलेंगी।
-बच्चों के लिए बेबी फूड़, गर्म पानी व चेंजिंग बोर्ड की सुविधा।
-आम यात्रियों के लिए टिकट कैंसिल एसएमएस से हो सकेगा।
-वहीं रेलों में 5 से 12 साल के बच्चों के लिए पूरी सीट समाप्त।
-राजधानी, शताब्दी, दूरंतो तथा पूर्णत: वातानुकूलित ट्रेनों में नीचे की चार शायिकाएं इस श्रेणी के लिए आरक्षित होंगी।
-जोड़ी में बुकिंग कराने पर इसका लाभ 45 वर्ष से अधिक उम्र की महिला या किसी भी उम्र की गर्भवती को भी मिलेगा।
बीड़ी-सिगरेट के पैकेटों पर  चेतावनी
आज से बीड़ी-सिगरेट समेत तमाम तंबाकू उत्पादों के पैकेट के दोनों ओर 85 फीसदी  हिस्से में चेतावनी चित्र प्रकाशित करना अनिवार्य हो जाएगा।
केंद्र सरकार ने राजस्थान हाईकोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा कि 1 अप्रैल 2016 से 85 फीसदी  हिस्से में चेतावनी चित्र संबंधित अधिसूचना लागू होगी केंद्र ने लोकसभा की समिति की सिफारिशों से किनारा कर लिया, जिनमें चेताावनी चित्र 50 फीसदी  हिस्से में प्रकाशित करने को कहा गया था।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने हलफनामे में कहा है कि 3 जुलाई 2015 को अदालत ने सिगरेट एवं अन्य तंबाकू उत्पाद (पैकेजिंग एंड लेबलिंग) संशोधन नियम, 2014 को तत्काल प्रभाव से लागू करने का आदेश दिया था।
01Apr-2016