शुक्रवार, 20 मार्च 2026

पश्चिम बंगाल चुनाव: सत्ता की जंग से बड़ी 'चुनाव आयोग की साख' की अग्नि परीक्षा

लोकतंत्र के उत्सव और साख की अग्निपरीक्षा के बीच 'सत्ता का संग्राम' 
By-ओ.पी. पाल 

श्चिम बंगाल की सत्ता का रण एक बार फिर सज चुका है। भारत निर्वाचन आयोग ने राज्य की 294 विधानसभा सीटों के लिए चुनावी बिगुल फूंक दिया है, जहां की राजनीति हमेशा से ही 'प्रतिबद्धता' और 'प्रतिरोध' की प्रयोगशाला रही है। लेकिन इस बार का यह महामुकाबला केवल यह तय नहीं करेगा कि कोलकाता के ऐतिहासिक 'राइटर्स बिल्डिंग' में अगला मुख्यमंत्री कौन बैठेगा, बल्कि यह भारतीय चुनाव आयोग की उस वैश्विक साख की भी सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है, जिसने 2021 के चुनाव और उसके बाद हुई भीषण हिंसा के दाग को धोने और 'हिंसा मुक्त बंगाल' का संकल्प लिया है। मसलन इस बार का चुनाव न केवल राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया के प्रबंधन के लिहाज से एक बड़ी चुनौती वाला चुनाव है। आयोग ने इस बार अपने आत्मविश्वास को दर्शाते हुए पिछले 8 चरणों के लंबे कार्यक्रम को घटाकर मात्र दो चरणों में समेटने का 'साहसिक' फैसला लिया है, जो अपने आप में एक बड़ा दावं माना जा रहा है। हालांकि इसका असली परिणाम 23 और 29 अप्रैल को होने वाले दोनों चरणों के मतदान की शांति और सुरक्षा से तय होगा? 
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श्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में 'हिंसा' एक ऐसा शब्द रहा है जिसने लोकतांत्रिक उत्सव को कई बार फीका किया है। 2021 के चुनाव और उसके बाद हुई हिंसा के कड़वे अनुभवों को देखते हुए, इस बार चुनाव आयोग का पूरा जोर 'हिंसा मुक्त मतदान' पर है, जिसके लिए पिछले सप्ताह कोलकाता का तीन दिवसीय दौरा करके मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों भाजपा, तृणमूल कांग्रेस, सीपीआई(एम), कांग्रेस और अन्य दलों से रुबरु होकर स्पष्ट संदेश दिया है कि चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने हिंसा, धमकाने की कोशिशों और चुनाव कर्मचारियों को प्रभावित करने वाली किसी भी गतिविधि के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाने का ऐलान किया है। मुख्य आयुक्त ने जोर देकर कहा कि आयोग पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी चुनाव कराने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। अब सवाल है कि क्या यह विधानसभा चुनाव राज्य के चुनावी इतिहास में 'हिंसा-मुक्त' होने का नया कीर्तिमान स्थापित कर पाएगा? हालांकि यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन आयोग की सक्रियता ने उन मतदाताओं में भरोसा जरूर जगाया है, जो लंबे समय से शांतिपूर्ण मतदान की बाट जोह रहे हैं। एक मायने में यह चुनाव न केवल बंगाल का भविष्य तय करेगा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव कराने वाली सर्वोच्च संस्था की साख को भी पुनर्स्थापित करेगा। चुनावी कार्यक्रम के अनुसार इस बार पहले चरण के लिए 23 अप्रैल को उत्तर बंगाल और जंगलमहल के इलाके की 152 सीटों और दूसर चरण में 29 अप्रैल को दक्षिण बंगाल और कोलकाता के आसपास के इलाके की 142 सीटों पर मतदान होना है। जबकि चुनाव के नतीजे चार मई को आएंगे। 
बेहद चुनावी मुकाबले के आसार 
बंगाल की जमीन पर राजनीतिक बिसात भी दिलचस्प है, जहां चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से सत्ताधारी टीएमसी और मुख्य विपक्षी दल भाजपा के बीच आर-पार का है। वहीं पिछले चुनाव में शून्य पर सिमटने के बाद, वाम मोर्चा और कांग्रेस वाला गठबंधन इस बार 'प्रासंगिकता' बचाने की जंग लड़ रहा है। टीएमसी की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने चौथी बार सत्ता बरकरार रखने की बड़ी चुनौती है, जिसमें टीएमसी को 'भ्रष्टाचार' के गंभीर आरोपों और 'एंटी-इनकंबेंसी' (सत्ता विरोधी लहर) से लड़ना है। सत्तापक्ष के लिए हाल ही में मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) को लेकर उपजे विवाद भी भी किसी चुनौती से कम नहीं होगा, जिसका मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पंहुचा है। आयोग के एसआईआर और केंद्रीय फंड में हो रही कटौती को लेकर फैली बेचैनी ने बंगाल में खासतौर से टीएमसी के लिए राजनीतिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। वहीं 2021 में 77 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार सत्ता परिवर्तन की पुरजोर कोशिश में जुटी है। पार्टी व्यापक चुनावी रणनीति के साथ 'घुसपैठ' और 'महिला सुरक्षा' जैसे मुद्दों को आधार बना रही है, लेकिन उसे अभी भी स्थानीय स्तर पर एक सर्वमान्य मजबूत नेतृत्व और सांगठनिक एकजुटता की तलाश है। भले ही सीटों के मामले में टीएमसी आगे दिख रही हो, लेकिन वोट प्रतिशत के मामले में फासला बहुत कम रह गया है, जिसमें यह आंकड़ा बताता है कि बंगाल का मुकाबला बेहद करीबी होने वाला है। हालांकि क्या जमीन पर यह आंकड़े हकीकत में बदलेंगे या 4 मई के नतीजे कुछ और ही कहानी कहेंगे? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। 
सुरक्षा आयोग की सर्वोच्च प्राथमिकता 
पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में 'हिंसा' एक ऐसा शब्द रहा है जिसने लोकतांत्रिक उत्सव को कई बार फीका किया है। 2021 के चुनाव और उसके बाद हुई हिंसा के कड़वे अनुभवों को देखते हुए इस बार आयोग का पूरा जोर 'हिंसा मुक्त मतदान' पर है। इसी रणनीति के तहत चुनाव आयोग चुनाव की घोषणा से पहले ही केंद्रीय बलों 480 कंपनियां राज्य में भेज चुका हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि केंद्रीय बलों का उपयोग केवल मतदान के दिन ही नहीं, बल्कि मतदाताओं में विश्वास पैदा करने के लिए बलों द्वारा एरिया डोमिनेशन और गश्त में पहले से कर रहा है। वहीं दागी अधिकारियों को लेकर भी चुनाव आयोग पूरी तरह से मुस्तैद है यानी आयोग इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। इसलिए आयोग ने उन पुलिस अधिकारियों की सूची मांगी है जिन पर पिछले चुनावों में हिंसा को बढ़ावा देने या लापरवाही बरतने के आरोप लगे थे। ऐसे दागी अधिकारियों को चुनाव प्रक्रिया से दूर रखने के लिए आयोग ने उन्हें हटाने की कार्रवाई भी शुरु कर दी है। वहीं चुनाव आयोग इस बार 'फर्जी मतदान' की गुंजाइश खत्म करने की दिशा में मतदान केंद्रों के बाहर चेहरा सत्यापन के लिए विशेष काउंटर बनाने पर विचार कर रहा है, जहाँ बुर्का या घूंघट वाले मतदाताओं की पहचान महिला कर्मचारियों द्वारा की जाएगी। 
बंगाल के चुनावी 'एक्स-फैक्टर' 
राजनीतिक जानकारों की माने तो पश्चिम बंगाल में महिलाएं अक्सर साइलेंट वोटर होती हैं। 'संदेशखाली' जैसी घटनाओं और 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं के बीच उनका झुकाव ही सत्ता की चाबी तय करेगा। राज्य में बढ़ती बेरोजगारी और भर्ती घोटाले युवाओं के बीच एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुके हैं। बंगाल में बदलते राजनीतिक परिदृश्य ने नए अवसर पैदा किए हैं। कभी बनर्जी को संदेह की नजर से देखने वाले शहरी बंगाली 'भद्रलोक' मतदाता अब एसआईआर के दखल को लेकर अपनी नाराजगी साझा कर रहे हैं। वहीं, 'मतुआ' और 'राजबंशी' जैसे समुदाय जिनके समर्थन ने भाजपा को बंगाल में मुख्य विपक्षी दल के रूप में खड़ा करने में मदद की थी, अब उनमें भी बेचैनी के संकेत दिख रहे हैं। उत्तर बंगाल में भाजपा की पकड़ मजबूत रही है, जबकि दक्षिण बंगाल टीएमसी का किला है। इस बार दोनों दल एक-दूसरे के गढ़ में घुसपैठ की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए इस बार पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव महज आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों मतदाताओं की उम्मीदों का परीक्षण है, जो दशकों से शांतिपूर्ण मतदान का सपना देख रहे हैं। यदि चुनाव आयोग हिंसा मुक्त मतदान कराने में सफल रहता है, तो यह भारतीय चुनाव प्रबंधन के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा। 4 मई के नतीजे यह बताएंगे कि बंगाल ने 'दीदी' की 'निरंतरता' को चुना या 'परिवर्तन' के 'केसरिया' संकल्प को पर भरोसा जताया है। 
19Mar-2026

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: नीति से लेकर शक्ति तक-भारतीय महिलाओं का ऐतिहासिक उदय

नारी शक्ति: भारत के विकास परिदृश्य में नेतृत्व के नए शिखर तक महिलाएं 
By-ओ.पी. पाल 

भारत की प्रगति का पहिया अब केवल पुरुष प्रधान नीति-निर्माण पर नहीं, बल्कि महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और उनके नेतृत्व पर टिका है। आज देश के छोटे गाँवों से लेकर महानगरों तक, महिलाएं न केवल अपनी किस्मत बदल रही हैं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य को एक नई दिशा दे रही हैं। यह बदलाव महज कागजी नहीं है, बल्कि यह खेतों में चलती मशीनों, कार्यालयों में होते फैसलों और स्थानीय पंचायतों में गूँजती आवाजों में साफ झलकता है। आज के समय में न्याय की सुलभता ने महिलाओं को अपनी बात रखने की हिम्मत दी है। कानूनी सुधारों और नीति-निर्माण में बढ़ते प्रतिनिधित्व ने उन्हें एक ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान किया है, जिससे वे आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में बिना किसी डर के अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही हैं। हर वर्ष 8 मार्च को मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस में वर्ष 2026 की ‘अधिकार और न्याय के साथ-साथ हर महिला और बालिका के सशक्तिकरण के लिए वास्तविक कार्रवाई’ पर केंद्रित है। भारत जैसे-जैसे अपनी विकास यात्रा पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसमें स्पष्ट है कि महिलाओं को अब केवल 'भागीदार' के रूप में नहीं, बल्कि 'निर्णायक' के रूप में देखा जा रहा है। परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। अधिकार और न्याय के साथ की गई 'वास्तविक कार्रवाई' ही वह बीज है, जो आने वाले समय में एक सशक्त और समृद्ध भारत का वृक्ष तैयार करेगा। 
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भारत में महिलाओं को लेकर आज कहानी बदल चुकी है। अब हम 'महिलाओं के विकास' से आगे बढ़कर 'महिला-नेतृत्व वाले विकास' के युग में प्रवेश कर चुके हैं। स्वयं सहायता समूह और स्थानीय शासन के तहत आज देश में करोड़ों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं। इस पहल में भविष्य की कृषि क्षेत्र में 1,261 करोड़ के बजट के साथ 15,000 स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन संचालन के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। देश में 10.05 करोड़ ग्रामीण परिवार अब 90.90 लाख स्वयं सहायता समूहों का हिस्सा हैं। इन समूहों ने 12.18 लाख करोड़ रुपये के संस्थागत ऋण तक पहुँच बनाई है, जो ग्रामीण उद्यमशीलता में एक क्रांति है। देश में 3 करोड़ से अधिक महिलाएं अब प्रति वर्ष कम से कम एक लाख रुपये कमाने के लक्ष्य (लखपति दीदी) की ओर तेजी से बढ़ रही हैं। यह पहल ग्रामीण महिलाओं को आधुनिक तकनीक के 'इकोसिस्टम' का हिस्सा बना रही है। यह केवल पैसे बचाने का जरिया नहीं, बल्कि उद्यमशीलता का एक बड़ा मंच बन चुका है। यही नहीं आधुनिक तकनीक के तहत डिजिटल बैंकिंग से लेकर आधुनिक कृषि यंत्रों तक, महिलाओं की पहुँच ने उन्हें पारंपरिक बंधनों से मुक्त किया है और औपचारिक वित्तीय प्रणालियों और मुद्रा ऋण जैसी योजनाओं ने महिला उद्यमियों के लिए सफलता के नए द्वार खोले हैं। 
भविष्य की दिशा तय करती महिलाएं 

तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र यानी क्लासरूम से लेकर प्रयोगशालाओं और स्पेस मिशन तक, भारतीय महिलाएं आज भविष्य की दिशा तय कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 केवल अतीत के संघर्षों को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह उस गहरे बदलाव को पहचानने का अवसर है जो हमारे समाज में आ चुका है। आज महिलाएं खेतों से लेकर कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक भारत की विकास यात्रा को नया आकार दे रही हैं। आज महिलाएं खेतों से लेकर कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक भारत की विकास यात्रा को नया आकार दे रही हैं। यह 'वास्तविक कार्रवाई' ही एक ऐसे समाज का निर्माण करेगी जो समावेशी, न्यायपूर्ण और सशक्त होगा। नतीजन परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। तकनीकी क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए 'नमो ड्रोन दीदी' योजना एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। भारत की विकास यात्रा अब केवल विकास दर (जीडीपी) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात पर टिकी है कि महिलाएं कितनी सशक्त हैं। निर्णय लेने की शक्ति से लेकर ड्रोन उड़ाने तक, भारतीय महिलाएं आज न केवल अपनी प्रगति लिख रही हैं, बल्कि एक विकसित और समावेशी भारत की दिशा भी तय कर रही हैं। 
राजनैतिक क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी 
देश में आज राजनैतिक दृष्टि से भी महिलाएं उड़ान भर रही हैं। भारत के पंचायती राज संस्थानों में लगभग 50 प्रतिशत निर्वाचित प्रतिनिधि महिलाएं हैं। स्थानीय शासन स्तर पर बड़ी संख्या में महिलाएं अब निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में स्थानीय निकायों का संचालन कर रही हैं। महिला नेताओं ने शासन के एजेंडे को स्वास्थ्य, पेयजल, शिक्षा और सामाजिक कल्याण जैसे बुनियादी मुद्दों की ओर मोड़ा है, जिससे समुदायों का समग्र विकास हो रहा है। भारत ने अपनी आजादी के पहले दिन से ही महिलाओं को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रदान किया था। यह उस समय की एक साहसिक वैश्विक मिसाल थी, क्योंकि तब दुनिया के कई विकसित राष्ट्र भी महिलाओं को वोट देने के अधिकार पर हिचकिचा रहे थे। इस संवैधानिक दूरदर्शिता ने भारतीय महिलाओं को गणतंत्र की शुरुआत से ही एक 'निर्णायक' की भूमिका में रखा। 
शिक्षा बनी सशक्तिकरण की पहली सीढ़ी 
शिक्षा के क्षेत्र में आए बदलावों ने सशक्तिकरण की एक मजबूत नींव तैयार की है। सरकार की विभिन्न पहलों के परिणामस्वरूप उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की उपस्थिति में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। उच्च शिक्षा में महिलाओं का नामांकन 2014-15 के 1.57 करोड़ से बढ़कर 2022-23 में 2.18 करोड़ हो गया है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित जैसे विषयों में यूजीसी, नेट, जेआरएफ शोधार्थियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 53 प्रतिशत को पार कर गई है। यह दर्शाता है कि आधुनिक अनुसंधान और नवाचार की बागडोर अब महिलाओं के हाथों में है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की पहल वंचित समुदायों की लड़कियों के लिए शिक्षा के द्वार खोल रही है, जिससे सामाजिक असमानता की खाई कम हो रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा तक उनकी समान पहुँच ने 'महिला-नेतृत्व वाले विकास' को वास्तविकता में बदल दिया है। 
आर्थिक और सामाजिक विकास की धुरी 
भारत में 1990 के दशक के बाद से भारत की नीतियों में एक ‘पैराडाइम शिफ्ट’ आया है। आज महिलाओं को केवल सुरक्षा या कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उन्हें आर्थिक और सामाजिक विकास के मुख्य स्टेकहोल्डर के रूप में पहचाना जाता है। एक महिला का स्वास्थ्य पूरे परिवार की खुशहाली का केंद्र माना गया है। भारत सरकार ने 'मातृ स्वास्थ्य' को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत 4.26 करोड़ महिलाओं को सीधे वित्तीय सहायता पहुँचाई गई है। वहीं ऐसे निरंतर प्रयासों का सबसे सुखद परिणाम मैटरनल मॉर्टेलिटी रेश्यो में आई भारी गिरावट है, जो वर्ष 2014-16 की दर 130 से घटकर 2021-23 में 88 पर आ गई है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि हजारों माताओं के जीवन सुरक्षित होने का द्योतक है। ये सभी योजनाएं अलग-अलग नहीं, बल्कि एक संयुक्त 'इकोसिस्टम' के रूप में काम कर रही हैं। जब एक महिला को धुएं से मुक्ति मिलती है, घर में पानी मिलता है और कार्यस्थल पर सुरक्षा का अहसास होता है, तब वह अपनी पूरी ऊर्जा शिक्षा, उद्यम और नेतृत्व में लगा पाती है। यही वह बुनियाद है जिस पर विकसित भारत की इमारत खड़ी हो रही है। 
सुरक्षा और न्याय: भयमुक्त सशक्तिकरण 
किसी भी देश में सशक्तिकरण तभी संभव है जब वातावरण सुरक्षित हो। मिशन शक्ति के तहत 'वन स्टॉप सेंटर' जैसे तंत्र महिलाओं को संकट के समय कानूनी और चिकित्सा सहायता प्रदान कर रहे हैं। कार्यस्थल पर सुरक्षा के तहत पीओएसएच अधिनियम, 2013 के माध्यम से सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित किया जा रहा है। वहीं सामाजिक सुधार कीदृष्ट से देश में जनवरी 2026 तक 2,153 बाल विवाहों को प्रभावी ढंग से रोका गया है, जो समाज की बदलती सोच का प्रतीक है। जनवरी 1992 में एक सांविधिक निकाय के रूप में स्थापित राष्ट्रीय महिला आयोग ने भारत में महिलाओं के कानूनी हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका प्राथमिक कार्य केवल कानूनों की निगरानी करना नहीं, बल्कि समय के साथ उनमें आवश्यक सुधारों का सुझाव देना भी है। यह आयोग सुनिश्चित करता है कि संविधान द्वारा दी गई समानता की गारंटी धरातल पर भी प्रभावी रहे। 
इतिहास के झरोखे से महिला दिवस 
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की जड़ें किसी उत्सव में नहीं, बल्कि श्रमिक आंदोलनों के कड़े संघर्ष में दबी हैं। इसकी शुरुआत 20वीं सदी की शुरुआत में उत्तरी अमेरिका और यूरोप से हुई थी। लेकिन 8 मार्च की तारीख का असली संबंध वर्ष 1917 से है। उस समय रूस की महिलाओं ने 'रोटी और शांति' की मांग को लेकर एक ऐतिहासिक हड़ताल की थी। दिलचस्प बात यह है कि तत्कालीन जूलियन कैलेंडर के अनुसार वह दिन 23 फरवरी था, लेकिन पूरी दुनिया में प्रचलित ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से वह 8 मार्च की तारीख थी। इसी ऐतिहासिक मोड़ को सम्मान देने के लिए 1977 में संयुक्त राष्ट्र ने इसे आधिकारिक मान्यता दी गई। 
08Mar-2026
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