सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

संसदीय गरिमा और मर्यादाओं में गिरावट का जिम्मेदार कौन?

बजट सत्र के दौरान लोकतांत्रिक जवाबदेही के बजाय बढ़ा टकराव
BY-ओ.पी. पाल
संसद मे बजट सत्र का पहला चरण हुई कई घटनाओं का गवाह बना है और इस दौरान जिस प्रकार से संसदीय गरिमा और मर्यादाओं को तार तार होते देखा गया है, उसकी पृष्ठभूमि में देश की राजनीति के गिरते स्तर की तस्वीर साफतौर से नजर आई है। हालांकि ये पहला मौका नहीं है जब सत्ता पक्ष और विपक्ष का टकराव सामने आया हो। पिछले कई दशकों से संसद सत्रों के दौरान कामकाज कम और विभिन्न मुद्दों पर टकराव ज्यादा रहा है। ऐसे में सवाल है कि संसद सत्रों के दौरान लोकतांत्रिक जवाबदेही के बजाय टकराव की वजह से विधायी कार्यों, बजट चर्चाओं और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा तक नहीं हो पाती, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? खासतौर पर लोकसभा में मौजूदा बजट सत्र में राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर परंपरा के अनुसार प्रधानमंत्री का संबोधन तक नहीं हो सका हो।  
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में विधायी प्रक्रिया की प्रभावशीलता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिहाज से संसद की बैठकों की संख्या में लगातार हो रही कटौती भी राजनीति के गिरते स्तर का कारण मानी जा सकती है। संसद की संस्थागत शक्तियों और लोकतंत्र को कमजोर करने की वजह भी बिगड़ती राजनीतिक तस्वीर है, जो महज चुनाव जीतने के स्वार्थ तक सिमित होने लगी है। इसी कारण से संसद या विधान मंडलों में विधायी कामकाज, बहस और जवाबदेही स्वत: ही कमजोर हो रही है, जो लोकतांत्रिक दृष्टि से एक बेहद बड़ी चिंता का विषय ही नहीं है, बल्कि हमारा लोकतंत्र और ज्यादा शर्मसार होता है।। संसद सत्र के दौरान हाल ही में लोकसभा में प्रधानमंत्री के राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर संबोधन से पहले विपक्ष की कुछ महिला सांसद हाथों में पारे लिखी तख्तियां लेकर प्रधानमंत्री की सीट के पास पहुंच गई थी, जिसके कारण लोकसभा स्पीकर के आग्रह पर पीएम सदन में नहीं आये। संसद में पिछले 22 सालों में ऐसी दूसरी घटना हुई, जब संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रधानमंत्री धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में अपना संबोधन नहीं कर पाए। इसका कारण लोकसभा स्पीकर ने अगले दिन पीएम की सुरक्षा का हवाला देकर स्पष्ट कर दिया था। स्पीकर ने सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष का टकराव के कारण पीएम के साथ सदन में कोई अप्रिय घटना होने की आशंका से उनसे सदन में न आने का आग्रह किया था। हालांकि अगले दिन राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर अपनी बात रखी। इससे पहले 10 जून 2004 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह विपक्षी दल राजग के विरोध के सामने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अपनी बात सदन में नहीं रख सके थे। 
लोकसभा अध्यक्ष से खफा विपक्ष 
सदन के भीतर और बाहर वैसे तो सत्ता पक्ष और विपक्ष के एक दूसरे के खिलाफ आरोप प्रत्यारोप चलता रहा है, लेकिन लोकसभा में एक दूसरी बड़ी घटना हुई, जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी 2020 के चीन गतिरोध पर पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमए नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा का हवाला देना चाहते थे, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने नियमों का हवाला देकर उन्हें इस पुस्तक पर बोलने की इजाजत नहीं दी, तो कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों के सांसदों ने सदन में प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी शुरु कर दी थी। सदन में विपक्षी नेता राहुल गांधी की बार-बार की अड़चनों और विवादों के कारण संसदीय कार्यवाही में भी तनाव के चलते अध्यक्ष ओम बिरला को हस्तक्षेप करना पड़ा, तो विपक्ष उनसे इतना खफा नजर आया कि संसद में सरकार और विपक्ष के बीच टकराव विकराल रुप लेता नजर आया कि विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष पर सदन की कार्यवाही में पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए 118 सांसदों के हस्ताक्षरों के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस ही दे दिया। इससे पहले विपक्ष सदन में कांग्रेस समेत आठ सांसदों को अनुशासनहीन व्यवहार के चलते बजट सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित करने से नारज था। दूसरी तरफ भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया कि राहुल गांधी के सोरोस फाउंडेशन और फोर्ड फाउंडेशन से संबंध हैं। वहीं भाजपा ने राहुल गांधी के आचरण पर भी चर्चा की मांग करते हुए उनकी सदस्यता रद्द करने और भविष्य में चुनाव लड़ने से रोक की मांग की, जो अक्सर निर्वाचन आयोग, सर्वोच्च न्यायालय और लोकसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप लगाते रहे हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष के एक दूसरे पर ऐसे ही आरोप-प्रत्यारोप संसद और संसद के बाहर टकराव का कारण बने हैं। 
बदजुबानी तक पहुंची सियासत 
लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए दिये गये नोटिस के बाद संसद में यह सियासी टकराव ओर ज्यादा तेज हो गया है, जब केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर आरोप लगाया है कि प्रियंका गांधी और केसी वेणुगोपाल के साथ कांग्रेस के कुछ सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के कक्ष में जाकर उनके साथ गाली-गलौज की। रिजिजू ने यह भी दावा किया कि उस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रियंका गांधी और केसी वेणुगोपाल, सांसदों के इस व्यवहार का विरोध करने के बजाय अपने सांसदों को और उकसा रहे थे। ऐसे सियासी टकराव के कारण साफ संकेत हैं कि बजट सत्र का पहला चरण हंगामे में ही कटेगा, क्योंकि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सदन के सुचारु संचालन के लिए बजट पर चर्चा से पहले भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर संक्षिप्त चर्चा की शर्त रखी थी, जिसके जवाब में सरकार ने उनसे सत्र के दौरान सदन में हुई घटनाओं पर खेद जताने की शर्त रखी है। बजट सत्र के दौरान अप्रकाशित किताब, सांसदों के निलंबन, विपक्षी महिला सांसदों पर पीएम पर हमले की साजिश जैसे मुद्दे ने सरकार और विपक्ष के संबंधों की खाई चौड़ी कर दी है। संसद के बजट सत्र का पहला चरण सत्ता पक्षा और विपक्ष के हंगामें के बीच औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कराने के बाद संपन्न तो हो गया, लेकिन 9 मार्च से शुरु होने वाले दूसरे चरण के लिए भी सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों पक्षों के बीच इस टकराव को दूर करने की चुनौती खड़ा कर गया है? हालांकि इस बीच इस टकराव को दूर करने की दिशा में दोनों पक्षों के लिए कोई न कोई रास्ता तलाशने का प्रर्याप्त मौका है और देश व जनहित में यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरुरी भी है। 
15-16-Feb-2026
https://tehelkanews.net/%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%AF-%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%93/?fbclid=IwY2xjawP_1gJleHRuA2FlbQIxMQBzcnRjBmFwcF9pZBAyMjIwMzkxNzg4MjAwODkyAAEetHlep1LfACNwtRHWZCEj1HvuNCdQ3omdpszkxamV1a9itBBcIoS7crhU_vY_aem_tW9V92GJKJyI7U4c_9gPaQ

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

बालिकाओं के सशक्तिकरण का प्रतीक ‘सुकन्या समृद्धि योजना’

11 सालों में अब तक देशभर में खुले 4.53 करोड़ से अधिक खाते 
 BY-ओ.पी. पाल 
भारत में एक बालिका को सशक्त बनाने की दिशा में भारत सरकार की ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ ने 11 साल पूरे कर लिये हैं। बालिकाओं के सशक्तिकरण के साथ परिवार, समुदाय और राष्ट्र को सशक्त के लिहाज से ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ आज एक बनती नजर आ रही है। इन 11 सालों में भारत सरकार द्वारा अधिसूचित एक लघु बचत योजना के तहत अब तक 4.53 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें 3.33 लाख करोड़ रुपये से अधिक राशि जमा हो चुकी है। मसलन सुकन्या समृद्धि योजना (एसएसवाई) देश भर में लाखों युवा लड़कियों के लिए आशा और सशक्तिकरण का एक सशक्त प्रतीक बन रही है, जो उनके सपनों को संजोने और उनके भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में जमीनी स्तर पर आत्मविश्वास, समावेश और दीर्घकालिक प्रगति की भावना के मार्ग को प्रशस्त कर रही है। यही नहीं सुकन्या समृद्धि योजना, वित्तीय समावेशन, लैंगिक समानता और दीर्घकालिक सामाजिक प्रगति को बढ़ावा देकर परिवारों को अपनी बेटियों के भविष्य में निवेश करने के लिए प्रोत्साहन को बढ़ावा दे रही है। 
भारत सरकार ने वैसे तो बालिकाओं की सुरक्षा, शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए अनेक लक्षित योजनाएं लागू की हुई हैं, लेकिन 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान के तहत 22 जनवरी 2015 को शुरु की गई सुकन्या समृद्धि योजना ऐसी है, जिसने 22 जनवरी 2026 को 11 साल का सफर तय कर लिया है और आज यह योजना देश के लाखों परिवारों में अपनी बेटियों के उज्ज्वल भविष्य में सामूहिक विश्वास का प्रमाण बन चुकी है। यही नहीं, सरकार की यह योजना महज़ बचत के लिए की गई पहल से कहीं अधिक वित्तीय सुरक्षा और सामाजिक परिवर्तन के बीच एक सेतु के रूप में साबित होती दिख रही है। यानी परिवारों को अपनी बेटियों की शिक्षा और कल्याण के लिए जल्दी योजना बनाने के लिए प्रोत्साहित करके उनकी आर्थिक स्थिति के संतुलन को भी नियंत्रित करने का काम कर रही है। एक दशक से अधिक का सफर कर चुकी इस योजना का आर्थिक और सामाजिक महत्व है, क्योंकि यह मात्र एक वित्तीय निवेश नहीं है, बल्कि बालिकाओं के उज्ज्वल और समृद्ध भविष्य को सुरक्षित करने का उत्प्रेरक है। इसका मकसद बालिकाओं की शिक्षा और विवाह के खर्चों को पूरा करना है। शिक्षा, आर्थिक सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देकर, यह पहल महिला सशक्तिकरण को मजबूत करती है और भविष्य में आत्मनिर्भरता की परिकल्पना में योगदान देती है। खास बात यह है कि बालिकाओं के लिए दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा के मकसद से बनाई गई सुकन्या समृद्धि योजना उच्च रिटर्न, कर लाभ और शिक्षा तथा भविष्य की जरूरतों के लिए सरल निकासी विकल्प भी प्रदान करती है, जो बालिकाओँ के वित्तीय भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कई अन्य लाभ प्रदान करने का विकल्प भी प्रदान करती है। 
बालिका की बचत सुरक्षित वृद्धि 
इस योजना के तहत माता-पिता और कानूनी अभिभावक एसएसवाई खाते में न्यूनतम 250 रुपए की प्रारंभिक जमा राशि से शुरुआत कर सकते हैं और बाद की जमा राशि 50 रुपए के गुणकों में की जा सकती है, बशर्ते कि एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 250 रुपए जमा किए जाएं। कुल वार्षिक जमा सीमा 1,50,000 रुपए है, इससे अधिक राशि पर ब्याज नहीं मिलेगा और उसे वापस कर दिया जाएगा। खाता खोलने की तारीख से अधिकतम 15 वर्षों की अवधि के लिए जमा राशि जमा की जा सकती है। ब्याज की गणना हर महीने की जाती है और प्रत्येक वित्तीय वर्ष के अंत में इसे खाते में जमा कर दिया जाता है। यदि खाता वर्ष के दौरान किसी अन्य बैंक या डाकघर में स्थानांतरित भी कर दिया जाता है, तब भी वित्तीय वर्ष के अंत में ब्याज जमा कर दिया जाता है, जिससे बालिका की बचत में स्थिर और सुरक्षित वृद्धि सुनिश्चित होती है। 
ऐसे निकाली जा सकती है राशि 
खाताधारक पिछले वित्तीय वर्ष के अंत में उपलब्ध शेष राशि का 50 प्रतिशत तक शैक्षिक उद्देश्यों के लिए निकाल सकता है। यह सुविधा खाताधारक के अठारह वर्ष की आयु प्राप्त करने या दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करने पर, जो भी पहले हो, उपलब्ध हो जाती है। आवेदन करने के लिए, खाताधारक को ज़रुरी दस्तावेजों, जैसे कि प्रवेश का पुष्ट प्रस्ताव या शैक्षणिक संस्थान द्वारा जारी शुल्क पर्ची जिसमें ज़रुरी खर्चों का ज़िक्र हो, के साथ एक औपचारिक आवेदन जमा करना होगा। धन की निकासी एकमुश्त या किश्तों में की जा सकती है, लेकिन अधिकतम पाँच वर्षों की अवधि के लिए प्रति वर्ष एक बार निकासी की जा सकती है। सभी मामलों में निकाली गई राशि जमा किए गए दस्तावेजों में दर्शाए गए वास्तविक शुल्क से अधिक नहीं होनी चाहिए। 
क्या हैं एसएसवाई खाता खोलने के नियम 
एक बालिका का केवल एक एसएसवाई खाता खोला जा सकता है और एक परिवार अधिकतम दो बालिकाओं के लिए खाते खोल सकता है। हालांकि जुड़वां या तीन जुड़वां बच्चों के मामले में, संबंधित जन्म प्रमाण पत्र के साथ शपथ पत्र जमा करने पर दो से अधिक खाते खोलने की अनुमति है। यह खाता भारत में किसी भी स्थान पर स्थानांतरित किया जा सकता है। खास बात यह है कि जब तक बालिका 18 वर्ष की नहीं हो जाती, तब तक खाता माता-पिता अथवा अभिभावक द्वारा प्रबंधित किया जाता है। इससे अभिभावक बचत की निगरानी कर सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि धनराशि का उपयोग बालिका की शिक्षा और भविष्य की ज़रुरतों के लिए प्रभावी ढंग से किया जा रहा है। लेकिन 18 वर्ष की आयु होने पर, खाताधारक लड़की ज़रुरी दस्तावेज जमा करके स्वयं खाते का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकती है। भारत सरकार द्वारा अधिसूचित एक लघु बचत योजना के तहत जमा पर सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित दरों पर 8.2 प्रतिशत की दर से ब्याज मिलता है और राशि का भुगतान योजना के नियमों के अनुसार किया जाता है। यानी एक कम जोखिम वाली जमा योजना में सरकार मूलधन की गारंटी देती है और ब्याज का भुगतान प्रत्येक तिमाही में निर्धारित दरों के अनुसार वार्षिक रूप से किया जाता है। 
योजना की अहम भूमिका 
 सुकन्या समृद्धि योजना भारत में लड़कियों के लिए एक सुरक्षित और सशक्त भविष्य के निर्माण की दिशा में एक सार्थक कदम साबित हो रहा है। दीर्घकालिक बचत को प्रोत्साहित करके और शिक्षा तथा वित्तीय स्वतंत्रता को सर्वोपरि रखकर, यह योजना परिवारों के भीतर आर्थिक जिम्मेदारी और व्यापक सामाजिक प्रगति दोनों को बढ़ावा दे रही है। पिछले 11 सालों में सुकन्या समृद्धि योजना खातों की संख्या में लगातार हो रही वृद्धि इस पहल पर बढ़ते विश्वास और इसके प्रभाव की तस्वीर पेश कर रही है। मसलन जैसे-जैसे भारत लैंगिक समानता और समावेश की ओर सुदृढ़ हो रहा है, वैसे ही सुकन्या समृद्धि योजना हरेक लड़की को विकास, सफलता और अपनी पूरी क्षमता का एहसास करने के लिए ज़रुरी संसाधन और आत्मविश्वास पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती नजर आ रही है। 
24Jan-2026
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